रविवार, 2 नवंबर 2014

कहता था वृक्ष वह

कहता था वृक्ष वह


नहीं छोड़ा, कुछ भी
यही तो होना था

कहता था वृक्ष वह
हाँ, ऋतु अपनी थी
शाखाऐं लदी ढकीं हरे नए पत्तों से
कहता समीर
सच, यहाँ संगीत बहता था।

ओरे, शिशिर कब आए तुम
यहाँ ठिठुरन ही ठिठुरन
सहमी डालियाँ
बोझ रखे पत्तों का,

ओरे, बसंत
पतझड़ के साथ तुम
ले आए पीत वस्त्र
रह रह कर उड़ते हैं।

छोड़ गए त्रृण विहीन
शेष रही डालियाँ
रसहीन, गुप-चुप
छोड़ा नहीं कुछ
स्वतः ही हो गया
रस सिक्त अंतस में।

खड़ा यह वृक्ष
छूटता सब कुछ
बाहर से लौटता
भीतर दरवाजे पर, पत्र हीन
आज यूँ ही ठहर गया।