सोमवार, 28 सितंबर 2015

जंगल का दर्द

जंगल का दर्द


न दल, न दलदल, बस एक दरख़्त
बैठे हैं जिसके नीचे
लड़ते झगड़ते, लार टपकाते, अंतहीन रेवड़
प्रतीक्षा हैं सबको
कि दरख़्त गिर जाए
इतिहास कहता है दरख़्त जब गिरता है
तभी कुछ होता है।
दरख़्त अब होते ही नहीं
जंगलात का हाकिम कहता है
नहीं है शेष एक पेड़ यहाँ से वहाँ तक
जो, जा सके आरा मशीन तक।
निपट खाली मैदान
जंगल अब रहता ही नही है
चलो रोप आएँ हम एक पेड़
कल तुमने ही कहा था,

मौसम भी अब मज़ाक करता है
तभी कह रहा था
वक़्त को अब हरी दूब की जरूरत है
न शाख होगी, न कटेगी
दूब का क्या,
जब कुचलती है
तभी हरी होती है
और हरा होना
इस मौसम में युग गांधारी की होनी जरूरत है।

जंगल जलते हुए

जंगल जलते हुए



नहीं, नहीं, नहीं
यह तुमसे किसने कहा
ज़मीन उसकी होती है जो हल चलाता है
भूख की शिद्दत में
ज़मीन कलेजे से चिपकाए हुए
आषाढ़ी बादल निहारता है।
ज़मीन साहब की है
बी.डी.ओ. जिनके यार हैं
तहसीलदार ख़ास हैं,
पटवारी फसल का हिसाब लिखा करता है
तालुका अधिकारी की जहाँ मौज मनती है
ज़मीन उन साहब की है,
तेरी भी, मेरी भी, और उन सबकी भी
जिनके हाथ पतले हैं
थके थके जिस्म कुम्हलाए हैं
सब उनकी हो चुकी है।
ज़मीन अब
माँ नहीं, बहन नहीं, धर्म नहीं, प्यार नहीं
औरत है
नहीं उससे भी गई गुज़री बाज़ारू तवायफ है
जिसके पेट में दौलत की खाद जब गिरती है
सोना उगलती है
साहबों के लिए वह
वह साल में दो बार दौलत जनती है।तेरी भूख का जमीन से वास्ता नहीं है
तेरे पास जो इतिहास है
वह तेरा है,
तेरे पिता,
तेरे बाबा,
तू इतिहास आंखों में रखता है
तेरे घर में कुम्हलाए फूल
साहबों के गले में माला बन सिसकते हैं।
ये कागज..... ये किताबें
वकील और ये अफ़सर
पोषाहार केन्द्र की तरह चलते हैं
तेरी आग को पलाश वन में मैने देखा है
जंगल जब जल रहा था
यह आग कब हड्डियाँ जलाएगी
यह आग
तेरी आंखों में क्या महाभारत उठाएगी
वामन.........
तेरे तीन डग कब पदचिन्ह बनाएंगे
प्रतीक्षा है
ज़मीन और औरत के बीच की तमीज़
कब अंगार बन दहकेगी।
ज़मीन उसकी नहीं जो कागज़ में नाम रखता है
ज़मीन उस हाथ की
ज़मीन उस फौलाद की
जो ज़मीन काबू में रखता है।                                 नरेन्द्र नाथ

बुधवार, 23 सितंबर 2015

इन दिनो

इन दिनो

हम न जाने क्यों,
इन दिनो
बहुत चुप हैं,

जो मुखर हैं,
दहकते अंगारे,
क्यों नहीं देख पाते
आग, धीरे- धीरे जो लगती है
वही बहुत देर रहती है।

प्रतीक्षा रत , किसी तूफान की प्रतीक्षा में
किसी भी दिशा से आए
बस हमें सुरक्षित रख जाए,

पहले भी किले बनाए थे,
खुले में लड़ने की ताकत
कभी से खो बैठे,

आदत यही थी बची
हर परिजन के विनाश की प्रतीक्षा में
घर की मुंडेर पर
बस बतियाते रहें।

शब्दों की जुगाली इतनी-
इतनी कर बैठे
कि अपने ही पते पर अपने ही खत
भिजवाते रहे
खुद के पास समय ही कहॉं बचा है
हथेली पर लिखी इबारत पढ़ पाएॅं?

ऑंखे नहीं देख पातीं जाल मकड़ी का
क्या इतना घना है,

सच तो यही है,
यह कभी  हमने ही बुना है।