बुधवार, 23 सितंबर 2015

इन दिनो

इन दिनो

हम न जाने क्यों,
इन दिनो
बहुत चुप हैं,

जो मुखर हैं,
दहकते अंगारे,
क्यों नहीं देख पाते
आग, धीरे- धीरे जो लगती है
वही बहुत देर रहती है।

प्रतीक्षा रत , किसी तूफान की प्रतीक्षा में
किसी भी दिशा से आए
बस हमें सुरक्षित रख जाए,

पहले भी किले बनाए थे,
खुले में लड़ने की ताकत
कभी से खो बैठे,

आदत यही थी बची
हर परिजन के विनाश की प्रतीक्षा में
घर की मुंडेर पर
बस बतियाते रहें।

शब्दों की जुगाली इतनी-
इतनी कर बैठे
कि अपने ही पते पर अपने ही खत
भिजवाते रहे
खुद के पास समय ही कहॉं बचा है
हथेली पर लिखी इबारत पढ़ पाएॅं?

ऑंखे नहीं देख पातीं जाल मकड़ी का
क्या इतना घना है,

सच तो यही है,
यह कभी  हमने ही बुना है।

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