कुछ कहा तुमने
हवा गुपचुप
गुनगुनाती
कुछ कह रही,हमसे ,
और तुम
न कुछ सोचती, न बोलती
बस मौन मुखरित
रक्ताभ महावर से सजाए पद
शुभ्रता में लीन नूपुर
पद नख से कुरेदा वक्ष धरती का,
हाँ, सचमुच लिखा था
नाम मेरा,
मेैं,प्रेमासिक्त उर्वर चित्त संजोए,
‘‘मैं’’
उस मौन में जो हुआ स्वीकार्य
ले आकृति अपनी
रंग इंद्रधनुश से लिए साभार
छोड़ता पदचाप,
रह रहकर उभरता नाद
नाभि, हृदय कंठ तक रोमांचित
सिहरता गान
इयत्ता छूटती निज की,
बचा क्या,... हुआ क्या,
देह कारा-भार,छूटती इयत्ता,
हवा आपूरित गंध प्रेम मयी
जो हमारे बीच , धटा अचानक
जाना नि;शब्द का अपना ही छंद है।
नरेन्द्र नाथ
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें