रविवार, 19 फ़रवरी 2023

 प्रस्तुति

ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री रामेश्वराश्रम जी महाराज दिनांक 26 फरवरी, 2000 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 89 वर्ष की अवस्था में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।

28 जनवरी, 1911 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में रेडी गांव में आपका जन्म हुआ था। बचपन से सतत् आत्मानुंसधान में आप लगे रहे। सन् 1952 में आपने राजस्थान के सुदूर बकानी ग्राम में ‘गुरुकुल’ की स्थापना की थी। लगभग 25 वर्ष तक संन्यास लेने के बाद भी आप स्वतः शिक्षा कार्य में लगे रहे। सन् 1972 में संस्था को सरकार को सौंप दिया, आज जहां उच्च माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है।

आप एक परिव्राजक की तरह आम-जन के भीतर अध्यात्म की वैज्ञज्ञ निक प्रक्रिया को जीपन- जगत से जोड़ कर एक मार्गदर्शक की तरह संदेश वाहक की भूमिका का सहज निर्वहन करते रहे।  

 

स्न् 1995 में शिकागो अमेरिका से प्रख्यात मनोवैज्ञानिक  डॉ बसावडा स्वामीजी से अपनी एक अमरीकी शिष्या के साथ गुरुकुल बकानी आए थे , उसके कुछ महीने बाद केलीफोर्निया से अमरीकी महिला केरोल नागले जो भारत में जाग्रत पुरुषों पर शोध कार्य कर रहीं थीं। वे दक्षिण में सत्य श्री सांईं बाबा , केरल से अम्मा जी से मिलकर गुरुकुल आईं थीं ।


स्वामीजी के पास न कोई विधिवत आश्रम ही था , न कोई विशाल प्रबंधन , उनकी कुटिया और एक रसोई , पास में एक अतिथियों के लिए कमरा। वे वहॉं तीन दिन रुकीं।


वे अवाक थीं , यह देखकर कैसे  एक संत बिना सुचिधाओं केे इस प्रकार रह रहा हेै , और हमेशा वहॉं आने वालों का तांता भी लगा रहता हेै। 


निरंतर चिंतनरत स्वामी जी ‘सहज साधना’ का अमृत संदेश साधारण जन तक पहुंचाते रहे। न तो विधिवत कोई आश्रम वहां था न ही कहीं विशिष्ट परंपरा के निर्वाह की प्रक्रिया थी, एक साधारण सी कुटिया, और झोले के साथ स्वामीजी अंचल के सामान्य अकिंचन घर तक आध्यात्मिक का संदेश देते रहे। न अमीर न गरीब किसी प्रकार का कोई भेद वहां नहीं था। सभी के लिए कुटिया का द्वार सदा खुला रहता था। अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा के बावजूद स्वामी सरल व सहज ही रहे।उनका यही आप्त वचन रहा , जब मैंने पायाहै, तुम भी पा सकते हो , जो मेैंने  जाना है , तुम भी जान सकते हो। मेै तो बस गवाह हूूं , मार्ग भी कहना गलत है, छोटी सी बात है , निरंतर वर्तमान में रहने का प्रयास करो। तुम्हारा चिन्तन ही बाधा है।  

 

मेैं 1972 में आपके सानिध्य में आया था ,  आपके निरन्तर सानिध्य में कुछ प्रश्न उभरते रहे, उन्हें 

निरंतर लिपिबद्ध करता रहा । लगभग तेरह पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुईं।   

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न जो हमेशा उठते रहते हैं , उन्हें , इस पुस्तक के माध्यम से कि एक वैज्ञानिक की आत्म विज्ञान की खोजों को सुधी साधको ंसे परिचय कराया जाए , प्रेषित है। 



नरेन्द्र नाथ


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2023

गुरुवाणी नरेन्द्र नाथ अपनी बात ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि।। (बृ़.स्तो.र.) सन् 1972 में पूज्य स्वामीजी के सम्पर्क में आया था। धर्म , सम्प्रदाय ,अध्यात्म को लेकर अनेक जिज्ञासाएं थीं। वर्ष कब बीत गए ,पता ही नहीं लगा। सन् 2000 में अचानक कोटा से बीकानेर तबादला होगया था। जाना पड़ा। 28 जनवरी को गुरुकुल में उत्सव था, देखा स्वामीजी बीमार हैं। कोटा चलने के लिए , निवेदन किया। चार बजे बताएंगे कहा। वे कोटा आगए, अवकाश लेकर मैं भी आगया था। सभी परिचित आगए थे । स्वामीजी पहले की तरह गंभीर बीमारी में भी प्रसन्न थे। मधुमेह से पांव में घाव होगया था। परन्तु वे जिज्ञासुओं के उत्तर देते रहे। उनकी अपनी ही नियंत्रित व्यवस्था थी। जहाँ वे एक वैज्ञानिक की तरह आत्मानुसंधान में किए प्रयागों को समझाने का प्रयास अनवरत करते रहे, वहाँ किसी प्रकार का कोई भेद-भाव नहीं था। इस अत्यधिक नकारात्मक दुनिया में वे अत्यधिक सकारात्मकता के वाहक थे। ”वर्त्तमान में कैसे रहा जाए?“और ”यह वर्त्तमान ही तो स्थितिप्रज्ञता है“, वे अध्यात्म को मनुष्य जाति के लिए एक शक्ति सूत्र की तरह प्रयोग में लाने के लिए प्रयत्नशील रहे। , उनसे मिली आज्ञाओं को यहाँ लाने का प्रयास, एक साधक की विनम्र श्रद्धंजलि है। अनुक्रम 1-मेरी बात 2-गुरुतत्व और साधन 3-ध्यान 4.वर्तमान में रहना 5-स्वधर्म 6-अंतिम मुक्ति 7-याचक नहीं दाता बना 8-जीवन एक खेल है बस 9-सत्य की खोज 10-बंधन और मुक्ति 11-कर्मशील बनो 12 एक सही कदम 13 अंतिम आज्ञा 14-मम माया दुरत्या 15- v/;kREk 16-साधन तत्व 17-सरलता क्या है 18-अन्त में मेरी बात अमरीका से आई केरोल नागले को अमरीका में डॉ. बसावड़ा ने बताया था कि अमरीका वाले भारत में जिन प्रबुद्ध व्यक्तियों की तलाश में हैं, स्वामी जी उनमें से एक है। म्दसपहीजमदमक च्मतेवद यह उनका प्रयुक्त वाक्य था। वह कोटा में मेरे ही घर में ठहरी। उसका पहला सवाल था, क्या ये प्रबुद्ध हैं? वे दक्षिण के साईं बाबा, केरल की अम्मा, आदि वर्तमान के प्रख्यात संतों से मिलकर यहाँ आई थी। स्वामी जी का नाम लोकप्रिय नहीं था, वे अपनी कुटिया से बाहर जाना बहुत कम पसन्द करते थे, बहुत ही कम लोगों का उनके पास आना-जाना था। रामप्रसाद जी पुरोहित कहा करते थे, मैंने अपने जीवन में ऐसे संत नहीं देखे, क्या है इनके पास में नहीं जानता, पर ऐसा कुछ है, मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार इसीलिए खिंचा चला आता है। अमरीका से आई केरोल नागले ने मुझसे कहा था, मैं क्या उत्तर देता। यही कहा पिछले पच्चीस साल से साथ हूूँ, पर तुम्हारा सवाल जो है, उसका उत्तर मैं नहीं दे सकता। हम लोग कुटिया में थे। गुरुकुल में कार्यक्रम था। श्री कडवानीजी, ओझाजी आदि भी वहाँ थे। केरोल का पहला सवाल था, ”क्या आप जागृत पुरुष; मदसपहीजमदमक च्मतेवदद्ध हैं?“ स्वामी जी बोले-”मैं नहीं जानता, आपको जो लगता है, आप माने। उसका अगला सवाल था-” क्या आप मुझे भी जागृति;मदसपहीजमदउमदजद्ध करा सकते है?“ स्वामीजी चुप थे, फिर हंसे,” अभी तुम्हारा बच्चा नारायण छोटा है, पति ग्रेग है, नौकरी है, इतनी जिम्मेदारियाँ है, क्या वास्तव में चाहती हो? बहुत कुछ छोड़ना भी होगा।“ वह चुप रही। वह स्वाजी से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछती रही। स्वामी जी हंस रहे थे, कह रहे थे, ”नदी तो बह रही है, पर किनारे को हो ही पकड़े रहोगी, तो भीतर कैसे प्रवेश करोगी? यहाँ सबकी हालत यही है। नाव भी पार उतारने के लिए ही होती है, पर नाव में बैठे रहे तो...?“ वह पूछ रही थी,”आपने कौन-सी साधना की है?“ स्वामी जी हँसे,”सब, तब पता नहीं था, जिसने जो बताया, सभी किया, फिर एक इंजीनियर साहब मिले, वे थियोसाफिस्ट थे, उन्होंने कुछ रास्ता बताया। तब नौ-दस साल की आयु थी। धीरे-धीरे बाहर का सब छूटता गया। पाया विधियां सब व्यर्थ हैं, मन ही कुंजी है, मन क्या है, किसी ने देखा नहीं है, इसके क्रिया कलाप को सब जानते हैं। पर मन को इन्द्र्रियाँ बाहर ले जाती हैं, उन्हें विषय भोग चाहिए। पर यही मन जब नियंत्रित होता है, इसको बाहर जाने की जगह नहीं मिलती, तब यह अंतर्मुखी होने लगता है, वहीं द्वार है।तब यह मस्तिष्क से नीचे उतरता है, तब मन और मस्तिष्क का गठबंधन टूटता है। तब पता लगता है कि मन अलग है, मस्तिष्क अलग है। मन एक कागज की तरह है, ऊपर की सतह बाह्य मन है। नीचे की अंतर्मन, यह अंतर्मन अत्यंत शक्तिशाली है। जहाँ बाह्य मन है, वहाँ संसार है, वहाँ भटकाव है। सभी विकार वहाँ हैं।वहीं मृत्यु है, वहीं जन्म है। वहीं भय है, वहीं भटकाव है। पर बाह्य मन जब नीचे उतरता है ;यह भी समझाने के लिए कहा गया है द्ध। तब मन दोनो भोहांे के बीच जहाँ भृकुटी है, वहीं उसकी अनुभूति होती है। फिर यह नासिका तथा कंठ से हृदय तक आता है। तभी कहा जाता है हृदय में अंगुष्ठ बराबर उसका निवास है। मन अपने मूल निवास, नाभि तक चला जाता है, पर वहाँ टिक नहीं पाता है। उसे हृदय तक आकर ठहरना होता है। यह ज्ञानी की अवस्था है। वह शांत है, वह सुखी है, वह संतोषी है, वह आत्मविश्वासी है, साथ ही वह प्रसन्न है। वहाँ उसे कोई संशय नहीं है। बुद्धि विवेक में परिणित हो जाती है। तुम कहो कि वह जादूगरी से चीजंे हवा में बनाए, यह संभव नहीं है। प्राकृतिक नियमों के विरुद्धवह कुछ भी नहीं कर सकता है। कुछ घटता भी है तो उसके होने से संभव अपने आप हो जाता है। उसके पास जो ‘औरा’ है, वह सकारात्मक है। वह प्रकृति के हाथ का एक पुर्जा मात्र रह जाता है।‘दाइ विल बी डन’ उसकी कोई इच्छा नहीं रहती है, यह उसकी पहली मृत्यु कह सकते हो। क्योंकि मन वहाँ नहीं रहा है। जन्म और मृत्यु का कारण मन ही है। बंधन औरऔर मोक्ष भी मन का ही है। पर जब मन अंतर्मन में विलीन होता है। तब कार्य भी होंगे। पर मन शांत है। एक दर्पण की तरह , लोग आए और गए। वह भीतर अविचलित रहता है। ”तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती? हाँ, देह जब तक है, उसका अपना स्वाभाविक नियम रहेगा।मृत्यु वह तो प्रकृति का नियम है। समुद्र के किनारे हवा के झौकों से लकड़ियाँ आ जाती हैं। इक्कट्ठी हो जाती हैं। समय पर फिर हवा के थपेड़ों से अलग-अलग हो जाती हैं। यह मिलना, बिछुड़ना, प्रकृति का अपना नियम है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। मृत्यु ज्ञानी की भी होती है, जो नहीं जानता है , उसकी भी। संसार की उपस्थिति बाह्यमन में है और संस्कार नाभि में रहता है। वहीं अंतर्मन है, जो निरन्तर विराट से होने वाले प्रवाह से जुड़ा रहने के कारण सजग रहता है । ये लहरें अनवरत हैं। समस्त ब्रह्मांड की गति का ये कारण हैं।संसार इन लहरों के धक्कांेे से स्पंदित होकर निरन्तर गतिशील है। यही स्पंदन अंतर्मन के पास आकर संस्कार को गति देते हैं। पुनः इन सूक्ष्म स्पंदनों का वेग बाह्य मन को गति देता है। मन, मस्तिष्क को गति देता है। यही कारण है कि एक ही घटना की अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाँ होती है। फिर साधना क्या है? कुछ नया नहीं है। शरीर के माध्यम से की गई कोई भी विधि यहॉं कारगर नहीं है।यह तो मन के द्वारा मन को ही नियंत्रित करने की कला है। हाँ, शरीर की बनावट व बुनावट सबकी अलग है। इसलिए इसके लिए कोई एक रास्ता नहीं है। इसीलिए मैं किसी को भी ध्यान नहीं सिखाता। ध्यान तो सिखाने की चीज नहीं है। यह तो अपने आप हो जाता है। मन जब वर्तमान में रहने लगता है तब मन का भटकाव कम हो जाता हे। वह जहाँ है, वहीं हैं, यही ध्यान है। ध्यान तो अपने आप पाया जाता है। यह जीवन और जगत से काटकर सिखाने की चीज नहीं है। मैंने ”अंनत यात्रा“, में इस बात पर स्पष्ट लिखा है उसे लोग पढ़ते ही नहीं है। मैं बहुत पहले रमण महर्षि के आश्रम गया था। वहाँ मौन सत्संग होता था। वे आते थे और शांत बैठे रहते थे। लोग आते थे और सामने कतार में पंक्तिबद्ध बैठे रहते थे। उनके प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल जाते थे। वहाँ मैंने पाया था, नियांत्रित मन कितना शक्तिशाली होता है। क्या यह अन्तर्मन ही आत्मा है? आत्मा भी दिया हुआ शब्द है। यह कोई स्थाई इकाई नहीं है। आत्म कहो या अर्न्तमन, वह भी निरन्तर बदलने वाला है। यहाँ सब बदल रहा है। विराट से जुड़ा रहने के कारण यह अंतर्मन जहाँ शक्तिशाली है, वहीं यहाँ लहरों के निरन्तर स्पंदन हैं। लहर भी क्या स्थाई होती है? निरन्तर बनती -बिगड़ती है? संस्कार बीज है। यही कारण है, जब मन नियंत्रित होता है, तब यह संस्कार रूपी बीज भुनने लग जाता है। इसकी अंकुरण क्षमता समाप्त होने लगती है। जब तक संस्कार है , मन का भटकाव रहेगा। मन का नियंत्रण तथा संस्कारांे की शुद्धि एक साथ होती है। एक सधता है, दूसरा अपने आप सधने लग जाता है। यही जीवन का उद्देश्य है। साधना के नाम पर मेरा यही कहना है, यहाँ कुछ भी स्थाई नहीं है। सब बदल रहा है। मेरे विचार भी आपको अच्छे लगंे। स्वीकारंे नहीं तो छोड़दें। हाँ, एक बात जरुर कर सकते है, जहाँ आप का शरीर है, वहाँ आपके प्राण सदा रहते हैं, पर मन वहाँ नहीं रहता। उसको वहाँ लाना ही साधना है। मन और प्राण की वास्तविक युति ही वास्तविक योग है। इसलिए यहाँ करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह तो रहने की कला है। जहाँ आप हांे, जो भी कार्य कर रहे हों, काम तो आज की दुनिया में करना ही होगा। जीवन यापन भी करना है, धन की जरुरत होती है। बस जहाँ हम हैं, वहीं मन रहे। उसका भटकाव कम से कम रहे। शुरु-शुरु में कठिनाई आती है। लोगों ने बहुत गलत समझा रखा है। यह तो बहुत जटिल मार्ग है। ये करो - वो करो, कर्मकांड की भूल -भुलैया है। मैंने रास्ते सभी देखे, प्रयोग किए, प्रकृति निरन्तर मार्गदर्शन करती रही । सबमें सरल और सीधा यही रास्ता है , निरंतर वर्त्तमान में रहो। जो गया , वह गया, जो अभी नहीं आया पता नहीं, पर मन हमेशा भूत काल को ही वर्त्तमान में ढकेलता रहता है। बहुत पहले सबको एक सत्तूवाली कहानी सुनाई थी। वह हांडी लाकर तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। अपनी शादी भी कर लेता हे। बच्चे होजाते हैं। बच्चे पर गुस्सा करता हैं। मन कल्पना में उड़ान भरता रहता हैं , अचानक वर्त्तमान में खुद की लात से ही सत्तू की हांडी टूट जाती है। रास्ता इतना सरल और सीधा है। विश्वास ही नहीं होता। वर्तमान में रहना, वर्तमान में ही सम्भव है। गीता में कहा गया है ” क्षिप्रं भवति धर्मात्मा,“। यह धर्मात्मा वही है, जो वर्तमान में है। वहाँ न अतीत का दबाव है, न स्मृतियाँ हैं, न कोई विचारणा है, न कोई अवधारणा है, शांतमन ही शक्तिशाली होता है। जब वह किसी भी क्रिया के साथ लगता है, सफलता मिलती है, यही योग की स्थिति है। तो क्या हम इसे पाने में असमर्थ हैं? यह वर्तमान में रहने की क्षमता हमारी अपनी ही है, जिसे हमने खो दिया है।इसको पाना ही धर्म है, यही आध्यात्म है और यह अभी इसी जीवन में संभव है। जो निरन्तर वर्तमान में है, वही ध्यानी है, वही शांत सजगता है। उसी को तुम लोग जागृत;म्दसपहीजमदमकद्ध कहते हो। शरीर तो जैसा सबका है, उसका भी वैसा ही रहेगा। हाँ, शांत मन, प्रसन्नाता, संतोष, उसकी कुछ-कुछ पहचान बता सकते हैं। वैसे तुम लोगों ने नियम -कायदे बनाए होंगे वो तुम जानो। 2 गुरु तत्व और साधन गुरु पूर्णिमा का उत्सव पहले यहाँ नहीं होता था। शुरु-शुरु मंे बहुत कम लोग यहाँ आते थे। बाद में उनका मन हुआ साल में एक बार कार्यक्रम हो तो सब एक-दूसरे को जानते, मिलते, बस इतना ही लक्ष्य था। कई बार तो मैं पूरे चातुर्मास कुटिया से नीचे ही नहीं उतरा। फिर लोगों का आग्रह था, स्वीकारना पड़ा। कारण यही रहा। मैं गुरु नहीं हूँ। न ही मेरी कोई इच्छा रहीं। हाँ, आप लोग मानते हैं, यह आपका विश्वास है, मेरा तो इतना ही कहना है, जो यहाँ कहा गया है, उस पर विचार करंे, प्रयोग करें, अनुभव में लाएँ। अगर आप को लाभ मिलता है तो आगे बढ़ें। मेरी तो कुटिया का दरवाजा सबके लिए सदा खुला रहता है। यहाँ पर किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है, यह सबकी अपनी ही है। यह सवाल सब पूछते हैं, कि क्या गुरु की जरुरत नहीं है? अगर मैं कहता हूँ, हाँ, तो सब खुश हो जाते हैं। अगर नहीं, तो सबके चेहरे उतर जाते हैं। इन गुरुओं ने बहुत परेशान किया है। जब बच्चा छोटा होता है, तो उसकी माँ या कोई और उसे पहली बार स्लेट पर कुछ लिखना सिखाता है। बिना शिक्षक के सामान्य शिक्षा भी सम्भव नहीं है। प्रारम्भ में अभ्यास सिखाया जाता है। यह आवश्यक है। जब मैं छोटा था, तब इंजीनियर साहब मिले थे, उन्होंने मार्गदर्शन दिया और कहा, करना तुम्हें ही पड़ेगा। जब मैने कहा, सन्यासी बनना चाहता हूँ, तब वे बोले, भोजन और वस्त्र की आवश्यकताएं कम से कम होनी चाहिए। बात कहने की है कि मार्ग दर्शन अपेक्षित है। अनन्त यात्रा में बताया गया है कि किस प्रकार रानी चूड़ाला कुंभ को बटुक बनाकर अपने साथ ले जाती है। ब्रह्मनिष्ठ गुरु और सामान्य गुरु में भेद है। आज तो हमें हजारों गुरु मिल जायेंगे। उनकी रुचि लोकेषणा और धन कमानेमें है। ब्रह्मनिष्ठ जिनकी ब्रह्म में निष्ठा हो, जो श्रोत्रि़य भी हो, जो कुछ उसने जाना है, वह दूसरों को बता भी सके। पर आजकल शास्त्र कथन व बुद्धि का प्रदर्शन अधिक है। चोयल और मेहरा, कृष्णमूर्ति को मानते थे। कृष्णमूर्ति गुरु को नहीं मानते। मानने से न मानना अच्छा है। मैं उनसे यही कहता था। वे कहते थे फिर आप क्या हैं? ”आपका मित्र, सहयात्री।“ डॉ बसावड़ा नेे चोयल को फोन किया था, कि मैं मिलना चाहता हूँ। तब मैं बम्बई गया हुआ था। बम्बई में पदमा के यहाँ मिलना तय हुआ। वे आए, दरवाजे पर खडे़ होकर बहुत देर तक टकटकी लगाए मुझे देखते रहे, वे बहुत बडे़ मनोवैज्ञानिक थे। मैंने कहा, अन्दर तो आइए। वे अन्दर आए, उन्होंने हाथ बढ़ाया। मैं मुस्कराया, उनके लिए कुर्सी लगी थी, वे वहाँ बैठ गए। जाने लगे, बोले, फिर दस-पन्०ह दिन में आऊंगा। पर वो तो अगले ही दिन आ गए। कुर्सी लगी थी, पर वो नीचे बैठना चाह रहे थे। मैंने मना किया। उस दिन बोले, जो आपने अर्जित किया है, मुझे दे दें। मैं यह मांगता हूं। मैं हंसा, मैंने कहा, यहाँ तो नदी बह रही है, जिसका जितना पात्र हो, वह ले जाए। कहने का मतलब है, कि कही पर भी हमें , हम क्या हैं, क्या जानते है, प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। आज तो सब दुकान लगा कर बैठ गए हैं। इसीलिए कृष्णमूर्तिजी सही कहते हैं, गलत जगह पर जाने से कहीं पर भी नही जाना बेहतर है। ”पर आप?“ ”मैं यही कहता हूँ बीच का रास्ता ठीक है। एक बार मागदर्शन अवश्य लेना चाहिए। पर गुरु को ही पकड़ कर बैठ गए। उससे कुछ नहीं होगा। इस देश में यही हुआ है। गुरुवाद ने सबको निकम्मा कर दिया है। पहले तो मानसिक गुलामी आई, फिर दैहिक गुलामी आ गई। सात सौ साल से अधिक यह देश गुलाम रहा है, क्यों? जहाँ गीता का उपदेश दिया गया, वहाँ गुलामी क्यांे? कभी पूछा है। भगवान ने तो यही कहा था-”माम अनुस्मर युद्ध च...“ मेरा सतत स्मरण, और कर्म कर, पर हमने काहिली को ही धर्म मान लिया। मैं इसीलिए गुरुपूजा नहीं कर वाता। मुझे कोई पांव में रोली लगाए, माला पहनाए, पसंद नहीं है। मैं भी आप की तरह साधारण इन्सान हूँ। ”आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेष हितैरेतः, यही सार तत्व है। फिर दूसरे से पूजा करवाना, यह, कहाँ का नियम है? पर सब जगह भेड़ चाल है, न तो कोई समझना चाहता है, न खुद प्रयोग करना चाहता है। लोग आते है, बड़ी-बड़ी किताबें लिख देते हैं। जितना पुराना छप चुका है, उससे हर बार नया तैयार हो जाता है। मैं पूछता हूँ, आपका इसमें क्या है, उत्तर नहीं मिलता है। सब ब्रह्म का पता बता रहे हैं। भ्रम ही अधिक फैला है। मैंने पहले ही कहा है, साधक को, जो जानना चाहता है,उसकी जिज्ञासा ही बड़ी चीज है। तब जिज्ञासा उसे उस व्यक्ति के पास स्वतः ले जाती है, जो जानता है। मुंडक उपनिषद में कहा गया है कि उसके शीष पर अग्नि जलती है, बटुक छोटा बच्चा। जो अपनी माँ को ही समस्त ज्ञान का अधिकारी मानता है। उसका और उसकी माँ का जो सम्बन्ध है, देखा है, वह माँ कहकर उसके साथ चिपट जाता है। बाहर खेलता रहेगा, पर जहाँ माँ हटी ,वह तुरंत उसके साथ हो लेगा।यह गुरु और शिष्य का संबंध है। वे तब दो नहीं रह पाते है। जो जहाँ जाना गया है, वह वहाँ तुरन्त सम्प्रेषित होने लगता है। पर यहाँ तो लोग शार्टकट चाहते हैं। गुरु हैं, तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे। भगवान राम ने कितने कष्ट उठाए। कृष्ण को जन्म से ही दुःख मिलेे। पर एक बात है, हम न देखते हैं, न समझते हैं। उस गुरु से संसार के सुख चाहते हैं। चाहते हैं संसार पार कर जाना, जाग्रत पुरुष होना। पर भीतर ही भीतर पूरी तरह संसार में डूबे रहते हैं। मैं किसी को सन्यासी बनने को नहीं कहता। मैं गृहस्थों के ही घर ठहरता रहा हूँ, मेरी इस बारे में आलोचना भी हुई है। पर सच बात यह है कि आज शांति और शक्ति की उनको ही जरुरत है। मुफ्त का भोजन पाना मुझको पसंद नहीं था। जब तक शरीर में शाक्ति रही, समाज की सेवा की। सन्यास लेने के बाद गुरुकुल चलाया। संस्था चलाई। जब शरीर से सेवा नहीं होती, तो मन से करता हूँ, न मेरे पास पैसा है, न बैंक में खाता है, न मकान है, न जमीन है, फिर भी प्रसन्न हूँ। इस शरीर से समाज की सेवा हुई है। यही जीवन का उद्देश्य है। प्रकृति पर जो निर्भर है, वह उसके कामों का स्वयं संचालन करती है। मैनें बहुत बार आपको बताया है, यह कोई शास्त्रों की चर्चा नहीं है, यह अनुभव है। लाभ, लोभ और भय से कोई काम नहीं होना चाहिए। यहाँ सेवा करो, मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा, यह भी लोभ ही है।स्वभाव ही सेवा रहे। सर्व भूतेषु हितै रतः यह भावना रहे। होना यही चाहिए, हम अधिक से अधिक वर्तमान में रहें।“ प्रश्न था - प्रारम्भ में कठिनाई आती है। यह समझने में नहीं आता है। स्वामीजी कह रहे थे- ”हाँ, हम हमेशा बाहर ही दुनिया में ही उलझे रहते हैं, संसार जितना बाहर है, उससे अधिक हमारे भीतर भी है, वह ज्यादा है। हम निरंतर सोचते रहते हैं, रात को सोने का अभिनय करते हैं, वहाँ भी स्वप्न में विचारधारा शुरु हो जाती है। संसार नाना रुपों में उपस्थित हो जाता है। यह सब मन ही है। वर्तमान में रहने की कला है, जहाँ शरीर है, वहाँ मन रहे। मैंने यह जाना, इसका प्रारम्भ, रात से शुरु हो सकता है। जब हम अपने रोजमर्रा के काम सारे समाप्त कर बिस्तर पर जाएँ तो तब बाहर के विचारों को आने से रोकंे तथा मन को देखें, वहाँ क्या विचार आ रहे हैं। यहाँ कोई संकल्प नहीं, कोई आदर्श नहीं, कैसे विचार आ रहे है, उन्हें बस देखें, यही पहला कदम है। होगा क्या, भीतर सजग होते ही, दूसरा विचार आते-आते रुक जायेगा। वही सजगता रहे, यही ध्यान है। हो सकता है, नींद आ जाए। पर अगर सजगता रही, तो कुछ दिन बाद, एक विचार से दूसरे विचार के बीच का ,‘गैप’ दिखने लग जाता है। यही सार है। यह अंतराल ही बढ़ना चाहिए। यही ध्यान है। सुबह उठते समय भी यही किया करंे। जो विचार आ रहे हैं, उन्हें देखंे। यहाँ सतर्कता पूर्वक किया गया, अवलोकन ही ध्यान बन जाता है। फिर जब दिन में कभी फुरसत मिले, हमें यह क्रिया करते रहना चाहिए। इससे वर्तमान में रहने में सहायता मिलतेी है। मन का भटकाव कम होने लगता है। प्रश्न था-”पर यह संभव नहीं हो पाता है।“ ”हाँ, प्रारम्भ में कठिनाई आती है, मन का स्वभाव है। वह नियंत्रण में नहीं आना चाहता। इसीलिए यहाँ बल नहीं लगाना है। क्रिया सहज हो, इसमें कोई कठिनाई भी नही है। फिर जो भी कार्य हो, क्रिया हो, वहीं मन को रखनेे का अभ्यास बने।“ प्रश्न था- ”फिर त्राटक, ध्यान, मंत्र जप, पूजा, का क्या प्रभाव रहेगा?“ ”यह सभी मन को एकाग्र करने की विधियाँ हैं। समय-समय पर बताई गई हैं। मूर्तिपूजा का भी यही आधार बना था। पर मन जितना बाह्य में उलझता जाता है, उतना ही मन बाह्य से प्रेरित होकर दबाव बनाता चला जाता है। मंत्र भी एक बार गहराई में जाने के बाद छूटता नहीं है। ध्यान निर्विचारता को पाना है। किसी मूर्ति, चित्र पर एकाग्रता नहीं है। हम जिसके बारे में ज्यादा सोचते हैं, उसके गुलाम हो जाते हैं। क्या कारण रहा, इस्लाम में उनके महान गुरु का चित्र ही नहीं बनाया। चित्र मन ही बनाता है। गुरुडम का यही खेल है, हम गुरु के गुलाम बन कर रह जाते हैं। एकाग्रता प्रारम्भ में सहायक है। बच्चों को सिखाते हैं, सूर्य की किरणें कागज को जला नहीं पाती हैं। पर जब आतशी शीशे से गुजरती हैं, तो कागज जल उठता है। एकाग्रता में शक्ति है। परन्तु बाद में यही एकाग्रता बाधक भी हो जाती है। निर्विचारता में रहने में यही बाधा बन जाती है। अंत में इसे भी दूर होना पड़ता है। पुरानी कहानी है। परमहंस जब भी ध्यान लगाते थे, माँ काली के ध्यान में उनका मन डूब जाता था। गुरु उन्हें निर्विचारता का अभ्यास करा रहे थे। पर उनका चित्त काली में डूब जाता था। तब गुरु ने कांच निकाल कर , उनकी भृकुटि के बीच में चुभो दिया। खून निकल आया। काली की प्रतिमा चली गई, वे शांत मन से समाधि में चले गए। सार क्या है, एकाग्रता कहीं भी हो, वह भी अंत में एक बाधा बन जाती है। अनंत के सरोवर में डुबकी तभी लगती है, जब बाहर के सारे आधार खो जाते है, इसीलिए यहाँ जो अभ्यास है, वहाँ मन को प्रारम्भ से ही कही चिपटने की जरुरत नहीं रहती है। साध्य तक पहुँचने की यह सरल विधि है। बाह्य मन ही संसार है, वह तो रहेगा, पर जब मन अन्तर्मुखी होकर अन्तर्मन में लीन हो जाता है, तब भटकाव नहीं रहता। शांति रहती है। जो गीता के दूसरेे अध्याय में बताया है, प्रसाद की प्राप्ति होती है। यह प्रसाद मांगने से नहीं मिलता, न चोरी से मिलता है। यह सहज प्राप्ति है, जिसको पाकर चित को ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। वह संसार में ही रहेगा, उसके सभी कार्य यथावत होते रहेंगे। पर उसका व्यवहार संतुलित, स्थिति प्रज्ञ की तरह रहेगा। यह बातें पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं हैं। यह हमारा स्वभाव बनना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सभी के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। पता करंे, अपने आप से पूछें, क्या आप यह नहीं चाहते हैं? 3 ध्यान ”हाँ, यहाँ वर्षो से लोग आते हैं। एक बात कहते हैं, ‘मैं उन्हें ध्यान सिखाऊँ। मैं उनसे कहता हूँ, यहाँ आए हो, ठहरंे, मुझे देखंे।“ पर इसके लिए उनके पास समय नहीं है। वे बहुत रेडीमेड चाहते हैं। उनका भी कसूर नहीं है। हजार साल से लोग आ रहे हैं, हजारों ग्रन्थ ध्यान सिखाने के लिए लिखे गए हैं। सम्प्रदाय चल पडे़ हैं, पर बात वहीं की वहीं है। बाहर-बाहर परिवर्तन दिखाई पड़ता है, पर भीतर का संग्रह यथावत बना रहता है। विकार लेश मात्र भी कम नहीं होते हैं। बचपन से बुढ़ापे तक अगर कोई परिवर्तन आता है, तो शरीर युवा हुआ, प्रौढ़ हुआ, बूढ़ा हो जाता है, बुद्धि तीव्र हो जाती है। पहले इतनी न तो बुद्धि की तीव्रता थी, न इतना धन रखा कहाँ था? कहाँ से आया? जिसे एकाग्रता कहते हैं, उसका विकास हुआ है। एकाग्रता मस्तिष्क की शक्ति है, वहाँ मन किसी एक वस्तु पर, विचार पर एकाग्र हो जाता है। कवि, कलाकार विचारक, व्यवसायी इसी शक्ति से विकास पाते हैं। वैज्ञानिकों को तो कहा जाता है, वे अपने कार्य में इतने डूब जाते हैं, उन्हें बाहर का पता ही नहीं होता, एकाग्रता बहुमूल्य है। जब बचपन था, सभी प्रकार की साधनाएं भी बताई जाती रहीं। पर बाद में पता लगा, इनकी अपनी सीमा है। एक मुकाम पर आकर ये ठहर जाती हैं। जब भगवान शिव की बहुत आराधना की थी, तब वे प्रकट तो हुए थे, पर उन्होंने यही कहा कि मैं तुम्हारी शक्ति से ही पैदा हुआ हूँ। तब धीरे-धीरे मन अंतर्मुखी होता गया। जाना जिसे बाहर तलाश कर रहा था, वह भीतर ही है। चोयल आए थे, वे बम्बई गये थे। निसर्गदत्त महाराज से मिलकर आए थे। उन्होंने कहा, ‘डीप मेडीटेशन करोे।’ वे मुझसे पूछ रहे थे। मैंने कहा, आप मिलकर आए हैं, आप पता करें। मेडीटेशन शब्द ही गलत है। वहाँ कहा जाता है कि बाहर की वस्तु पर एकाग्रता लाओ। ये बाहर की वस्तु, मूर्ति हो, जप हो, रूप हो, या कुछ भी हो, पर यह एकाग्रता ही है। ध्यान का अर्थ है, मात्र वर्तमान में रहना। वहाँ शरीर भी वर्तमान में है। प्राण भी है और मन भी है। वर्तमान में न भूत का दबाव है, न भविष्य का संक्रमण है। पर मन एक पल के लिए भी वर्तमान में नही रहना चाहता। निर्विचारता में रहना ही ध्यान है। यही सजगता है। यही अेवयरनेस है। जैसे सागर में हवा के स्पर्श से तरंगे बन जाती हैं, पर हवा न हो तो , ...कुछ-कुछ ऐसा ही होता है। शांत सागर की तरह कोई भीतर तरंग नहीं होती हैं। पर वहाँ नींद नहीं है। बेहोशी नहीं है। बस शांति है। यहाँ एकाग्रता तो है, पर किसी एक निश्चित बिन्दु पर नहीं है। समग्रता मंे है, जहाँ है, जो भी है, वहीं एकाग्रता भी है। बस एक दर्पण है, जहाँ है, जो भी है, आ रहा है, जा रहा है, वह दिखता है। एक पासिंग शो, बस, वस्तु हटी दर्पण खाली का खाली हो गया है। कोई विचार नहीं। लोग पूछते है, ”मैं ध्यान क्यों नहीं सिखाता?“ यह तो सिखाने की चीज नहीं है, यह मात्र रहने की कला है। जीवन जीने की शैली है। जहाँ शरीर सक्रिय है, पर मन निष्क्रिय है। शांत है। ध्यान सीखने की कला नहीं है। यह तो रहने की कला है। जो लोग एकाग्रता के नाम पर सिखाते हैं, उसे मेडीटेशन कहकर शब्द का दुरुपयोग करते हैं। वे खुद तो अंधकार में जाते ही हैं, साथ वाले को भी ले जाते हैं। संत कबीर दास ने बहुत पहले कहा था-दोनों कुएं में ही गिर जाते हैं। उस दिन कोई बता रहा था, बौद्धों के यहाँ भी अब मंत्र जप, मूर्ति पर एकाग्रता, तथा विपश्यना को मेडीटेशन के नाम से सिखाया जाता है। बुद्ध ने तो कभी यह नहीं कहा। मेडीटेशन का अर्थ एकाग्रता है, ध्यान नहीं है। अंग्रेजी भाषा में ध्यान के लिए कोई शब्द नहीं है। वहाँ का दर्शन इस शब्द से परिचित ही नहीं था। उनका शब्द डिवोशन है। मेडीटेशन के लिए बाहर कोई ऑब्जेक्ट चाहिए। ”तो फिर जो किया है, वह व्यर्थ है“ नहीं तो, ”अनंत यात्रा“,बताया है, जब भटकाव में आया शिखिघ्वज आत्मघात तक के लिए उतारू हो जाता है, तब कुंभ रुपी चूड़ाला उसे यही समझाती है, ये बहिर्मुख्री साधनाएं व्यर्थ तो हैं, पर उसकी लगन, या जिज्ञासा महत्वपूर्ण है। इस बात को स्पष्ट बताया गया है, पर समझना कौन चाहता है। सभी इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमते हैं। पूजा कैसे की जाए, माला कैसे जपी जाए, तीर्थ यात्रा कब करें, व्रत कितने करें, ज्यादा हुआ गुरुपूर्णिमा पर गुरु को भंेट दे आए, आशीर्वाद ले आए, बस। धाणी के बैल की तरह आँख पर पटृटी बाँधकर चलना चाहते हैं। आप भी वर्षो से यही सवाल पूछते रहे हैं। टेप भी करते रहे हैं। मैंने कितना मना किया, सुनो, समझो, प्रयोग करो, पर आपने कभी किया? बात तो छोटी सी है। कितना घुमाकर कहो, अधिक से अधिक वर्तमान में रहना ही ध्यान है। वर्तमान में जब होते हैं, वहाँ मन में कोई अवधारणा नहीं रहती। कोई विचार नहीं है, न विकार है, परन्तु एकाग्रता है। जहाँ विचारणा है, वहाँ विकार भी हैं। ये दोनो एक-दूसरे के विरोधी शब्द नहीं हैं। जो लोग मेडीटेशन के नाम पर एकाग्रता सिखा रहे हैं, वे आपको अपना गुलाम बना लेते हैं। आप बार-बार उन्ही का चिन्तन करते हैं। सम्प्रदाय में कहा जाता है, गुरु की तस्वीर लगाओ, उसका ध्यान करो, उनके बताए नियमो की पालना करो, आप मात्र एक पुर्जा बन जाते हैं। वहाँ शांति कहाँ? आप बस भीख मांगने वाले भिखारी बन जाते हैं। हजार साल में हमने यही तो किया है। व्यवहारिक जगत में सफलता पाने के लिए एकाग्रता आवश्यक है, अनिवार्य है। यहाँ सफलता पाने के लिए मन की एकाग्रता बहुमूल्य है, पर उससे परे आत्मतत्व को पाने में, अपनी निजता से जुड़ने में उतनी ही बाधक है। हाँ, पर जहाँ सतर्कता सधती है, वहाँ वर्तमान में रहना उपलब्ध होता है, वहाँ यह एकाग्रता सहज आ जाती है। मैं लोगों से यही कहता हूँ, आप यहाँ आएं, रहें , मुझे देखंे। मेरी कोई कमजोरी दिखाई पडे़ तो बताएं। मैं भी एक प्रयोगशील सामान्य व्यक्ति हूँ। जो मैंने जाना है,वही बताया है। पैंसठ साल सेे अधिक समय से इस मार्ग पर हूँ, यही जान पाया हूँ, छिपाया कुछ भी नहीं है। इसे आप यों समझ सकते है। आप पूजा में एकाग्रता रखते है। मंत्र जप में आप तल्लीन हैं, पर पड़ौसी ने आपको आकर आवाज लगाई, आपकी एकाग्रता टूट जाएगी। एकाग्रता आप को एक ही वस्तु या विचार पर ठहराती है। उससे हटते ही विकर्षण शुरु हो जाता है। कवि को कविता पाठ करते देखा है, तल्लीनता से गीत गा रहा है, पर बाधा पहुँचते ही वह क्रोधित हो जाता है, गीत भूल जाता है। पर जहाँ ध्यान है, वहाँ सहज एकाग्रता है, हर क्षण सजगता है। यह बुनियादी समझने की बात है। सारा झगड़ा शब्दों का है। मेडीटेशन को, कंसन्टेªशन को ध्यान मानने से भ्रम बन गया है। मेडीटेशन सिखाया जा सकता है, पर ध्यान नहीं। शरीर की क्रिया सिखायी जाती है। पतंजलि ने आसन सिखाए हैं। प्रणायाम, प्राण का निग्रह है। पर इसके बाद जब मन में प्रवेश हुआ है। तब सविकल्प और निर्विकल्प समाधि के भेद किए गए है। समाधि शरीर का जड़ हो जाना नहीं है। सविकल्प में एकाग्रता है, पर मन की जटिलता है, जितना उसे एकाग्रता में रखा जाए वह चला जाता है, वहाँ उसे ठहरने के लिए जगह मिलती है, पर निर्विकल्पता में ठहरना कठिन हो जाता है। इसलिए पतंजलि ने वृतियों का निरोध जो कहा है, वह महत्वपूर्ण हो जाता है। ध्यान में प्रवेश यहीं होता है। मन, इन्द्रियाँ और विषय का सम्बन्ध टूट जाए, यही जानना, ‘ज्ञान’ है। इसीलिए मैंने मेडीटेशन शब्द का कभी प्रयोग नहीं किया। ध्यान हमारा शब्द है, एकाग्रता हमारा शब्द है। एकाग्रता को कंसन्टेªशन कहा जा सकता है। जहाँ ध्यान है, वहाँ खालीपन है, विचार ही विकार है, वहाँ निर्विकल्पता है। मन की पहचान विचार से है, वहाँ विचार नहीं है। उस खालीपन में, बस एक दर्पण है, जहाँ दिखता है, वहाँ आकाश है, जहाँ सुनाई पड़ता है, जो है, वह है, भीतर कोई संग्रह कर्त्ता नहीं है। पर जहाँ एकाग्रता है, वहाँ उस बिन्दु से नीचे गिरना संभव है। यहाँ एकाग्रता सहज व स्वभाविक है। भटकाव नहीं है। ध्यान को ही मैं वर्तमान में रहना कह रहा हूँ। यहाँ जो खालीपन है, वह एकाग्रता से प्राप्त कोई उपलब्धि नहीं है, न ही एकाग्रता से उत्पन्ना कोई अवस्था है। यहाँ हर पल एकाग्रता है, जिसे सचेत कहा जा सकता है। यह कोई निष्क्रिय जड़ता नहीं है। यहाँ प्राप्त सजगता, शक्ति सम्पन्न है। मैंने पहले कहा था, मन की दो परतें हैं, बाह्य मन और अंतर्मन। यहाँ बाह्य मन जो संसार से आकर्षित है, वह अंतर्मुखी होता हुआ , अपने मूल स्थान की ओर आता है। यह अलगाव स्पष्ट दिखई पड़ता है, तब स्वयं आकृष्ट होता है। मन का नाश हो नहीं सकता है। तब तो सभी नाश हो जाएगा। इस अवस्था में जो है, वहाँ मन विलीन हो जाता है। अंतर्मन विराट से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। तभी कहा जाता है, वर्तमान ही सभी रहस्यों की कुंजी है। वहाँ आकर जीवन के उद्देश्य का पता लगता है। अगर बात समझ में आ गई हैं तो फिर क्यों रुके हुए हो? जब मैंने जाना, तुम भी जान सकते हो। बंधन बाहर से कोई नहीं आया है। तुमने ही बांधा है, तुम्हें ही खोलना है, उतरो अपने भीतर उतरो। पहले भी समझाया था,स्मृति पाप है, अतीत की बातों में मत डूबो, अवधारणा दुष्कर्म है, किसी भी प्रकार की धारणा मत पालो, अनावश्यक विचारणा अभिशाप हैं। ज्यादा मत सोचो। ये सब मन के भटकाव हैं। मन इन्हीं खूंटियों पर उलझना चाहता है। इनका जन्म अतीत में है। अतीत से वर्तमान की किसी भी समस्या का समाधान संभव नहीं है। इस बोझे को उतारो। मन को जितना हो सके, मैं तो यहाँ तक रहँूगा, चौबीस घंटे वर्तमान में रहने का अभ्यास रखो। तब तुम्हारा अपना अनुभव होगा। तुम्हे न किसी गुरु की जरुरत होगी, न किसी शास्त्र की। तुम्हारा ही अनुभव तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। तुम्हारा अनुभव तुम्हारा ही सत्य होगा। मैं तुम्हें कितना भी समझाऊँ, पर जब तक तुम्हारा सत्य तुम्हारे भीतर नहीं जगेगा, तुम्हारा भटकाव यथावत रहेगा। सत्य अनुभव जन्य ज्ञान है, जो स्वयं का होता है, वही सदा बना रहता है। प्रश्न था - ”क्या यह प्रतिभासित सत्य नहीं है?“ स्वामीजी कह रहे थे- ”नहीं , जो भास रहा है, वह निरंतर परिवर्तित हो रहा है। ज्ञान की पहचान बताई है, वह बस हैं । सत्य वही है, जो असत नहीं हैं, जो बस ,”है,“ प्रतिभासित माने कल्पना, जो खिाई पड़ता है पर है नहीं। पुरानी कहानी सुनाई थी। राजा जनक को स्वप्न हुआ था। वे स्वप्न में भिखारी हैं। भीख मांग रहे हैं। किसी पंक्ति में बैठे है, तभी बैल ने उठाकर फेंक दिया। धक् से नींद खुल गई। उन्होंने सोचा, सत्य क्या है, यह जो वे राजा हैं, यह राजभवन है, पर वह जहाँ भिखारी है। तब अष्टावक्रजी ने कहा था,” राजा दोनो ही स्वप्न हैं, एक लघु स्वप्न है, एक दीर्घ स्वप्न है।“ जो जागा हुआ है, वह दर्पण में मात्र जगत को एक कल्पना की तरह देखता है। एक सीरियल की तरह, वहाँ लोग स्क्रीन पर आते हैं, चले जाते हैं। उस दिन कोई कह रहा था, वे तो सीरियल में दुखद घटना को देखकर रोते भी हैं। पुरानी फिल्मों में महिलाएं रोने के लिए रुमाल तक घर से लेकर जाती थीं। हम इन सपनो को ही सच मानकर जीते हैं। पर जो जागा हुआ है, वह इन सपनो से अप्रभावित रहता है। उनके भीतर छाप नहीं बनती है। सामान्य व्यक्ति और जागरुक व्यक्ति में इतना ही भेद है। सामान्य व्यक्ति तुरन्त प्रभावित हो जाता है, चिन्तन करके उसे गहरा बनाता चला जाता है। यह बात सूक्ष्म रुप में उसके अंतर्मन में चली जाती है। वहाँ छाप बन जाती है। या तो वर्तमान में या स्वप्न में उसे भोगना पड़ता है। पर जो जाग्रत है, वहाँ बीज भुना हुआ हैं, वहाँ अब अंकुरण की क्षमता चली गई है। वहाँ जो खालीपन है, वहाँ जो दिखाई पड़ता है, वह एक स्क्रीन पर चल रहे सीरियल की तरह होता है।” फिर प्रश्न था - पर संसार भी व्यवहारिक सत्ता तो है।“ स्वामीजी कह रहे थे- ”हाँ, वह तो होगी। आप नौकरी कर रहे है, जाना है। काम तो करना ही है। मैं इस जगत की बात कर रहा हूँ, वह आपके भीतर का है। जिसे आप निरंतर बनाते है, वह आपका ही निर्मित है। बाहर यह मकान भी होगा, आपकी कार भी रहेगी। वेदांत में उसे प्रतिभासित कहा है, जो हम निरन्तर अपने भीतर बनाए जाते है। दृश्य जो है, वह दृष्टा ने ही बनाया है। वही उसे समेट सकता है। जब प्रतिभासित सत्य सिमटता है, तब जिसे परमार्थिक सत्य कहा जाता है, वह जाना जा सकता है। सत्य तो तुम्हारा ही अनुभव है, जो तुम्हें जानना है। पर सबसे पहले जो मनोजगत में हम कल्पना से बनाए चले जाते हैं, उसे समझना है। तब जिसे ध्यान कहा जाता है, वह समझ का हिस्सा बन जाता है। यही वर्तमान है। इसे ही जागृति में रहना या अवेयरनेस कहा जाता है। “ 4.वर्तमान में रहना ”जो मेरे लिए सरल व सहज है, वह आपके लिए कठिन क्यों है। आप विचार करें, जो बात इतनी सीधी-सच्ची है, उससे हम दूर क्यो चले जाते हैं। शास्त्र ने इसी को माया कहा है। माया जो है नहीं, जो भासती है। यह मन का ही प्रक्षेपण है, जैसे मकड़ी जाला बुनती है, वह उसके थूक के रस से बन जाता है। उसी प्रकार व्यक्ति अपना जाल खुद बुनता है, यही उसका इस स्वप्न जगत में फैलाव है। दूसरा कोई समेटने वाला नहीं है। उसे ही इस जगत को समेटना है, तब जो रहना होता है, वहाँ स्मृति का दबाव नहीं है, मात्र वर्तमान है। जो क्षण को क्षण से जोड़ रहा है, यही स्वाभाविक धर्म है। धर्म यानी स्वभाव। धर्म किसी विचारधारा के ग्रहण या छोड़ने का नाम नहीं है। यह तो वस्तु का, प्राणी का अपना निजी स्वभाव है। आध्यात्म उसे अपने इस स्वभाव को जानने की विधि का नाम है, जिसे ध्यान कहा जाता है। पर मेडीटेशन नहीं। जब हम अपने मूल स्वभाव को पा लेते है, तब वह उसका स्वाभाविक धर्म कहा जाता है, यहाँ पर बाह्य का कोई दबाव नहीं है। जब मैं कहता हूँ, अंत प्रेरणा जग जाती है, तब कहने का आशय यही हैं कि बाह्य का कोई दबाव न अतीत का न भविष्य का यहाँ रहता है। मैं, जो भी यहाँ आता है, उससे एक ही बात कहता हूँ, यहाँ कुटिया का दरवाजा हर एक के लिए खुला है, कोई रोक टोक नहीं, आप आएं रहें, देखें, कुछ समझ में आए तो प्रयोग करंे। अनुभव को शब्दों से न तो बताया जा सकताहै, न समझाया जा सकता है। उचित लगे, समझ,ंे करंे। नहीं उचित लगे, छोड़ दंे। रहना ही धर्म है। जहाँ कोई आडम्बर नहीं है। न कोई पूजा है, न पाठ है। बस मात्र रहना है, आप भी रहें। केरोल अमरीका से एनलाइटन्ड व्यक्तियों की खोज में यहाँ भी आई थी। कुछ दिन रही। उसने पूछा था, पहले आप कहाँ रहते थे? मैंने कहा, यहीं। ”क्या इसी प्रकार दिन भर लोग यहाँ आते रहते हैं।“ मैंने कहा, हाँ। वह बोली, आपको तकलीफ नहीं होगी? मैंने कहाँ, नहीं। उसने पूछा, क्या आप एनलाइटन्ड हो, मैंने कहा, यह तुम पता करो। तुम्हारा विषय है, पर जो जाग्रत है, वह सामान्य ही रहता है, वह विशिष्ट नहीं हो जाता। संत कबीर सारी उम्र कपड़ा बुनते रहे, रैदास जूते ही बनाते रहे, बाहर से कोई परिवर्तन नहीं आता है। जो लोग बाहर परिवर्तन दिखाते हैं, वे अभिनेता ही हैं, बस। यहाँ बस रहना ही होता है। बाहर की दुनिया यथावत रहेगी। न उसके बदलने की कोई इच्छा होगी। यह प्रकृति का अपना कार्य है, वह जानता है, वह कुछ कर सकता है, पर करेगा नहीं। प्रकृति के नियमों का ही पालन करना है। वह जानता है, वह नींद में नहीं है। वह शांत है, पर भीतर अनंत शक्ति के अनुभव में भी है। शक्ति का वह अनुभव भी करता है। वह जानता है, वह शरीर भी है, वह मन भी है, बुद्धि भी है। मन जैसे सेवक हो, रहता है। जरुरत हुई, वह इन्०ियों से विषयों से जुड़ जाता है, अन्यथा सम्बन्ध टूटा सा रहता है। वह है, उसका अस्तित्व है, और वह एकांगी नहीं है, वह समग्र से जुड़ा हुआ है, वह उसका हिस्सा भी है, और वह,‘वह’ भी है। यह अनुभव उसका अपना है, उसका अपना सत्य है। 5 स्वधर्म स्वामीजी कह रहे थे,” यहाँ कुटिया में लोग आते हैं। मुझे तो पता भी नहीं रहता। वे सोते हैं और चले जाते हैं। कहते है, वहाँ नींद अच्छी आती है।“ चलो, उन्हें विश्राम मिल जाता है, यह तो अच्छी बात है। साधारण लोगों की चाहत भी कम होती है। गाँव के लोग छोटी -छोटी चीजों को लेकर आते हैं, पर शहरी लोगों की चिन्ताएं तथा आशाएँ अनंत हैं। न उनका पेट भरता है, न मन। सम्पत्ति की चाहत अनन्त है। हर जगह मांगनेे वालों की भीड़ है। पुरानी कहानी है, फकीर का जूता फट गया था। उसने सोचा बादशाह से ले आऊॅं, पता लगा वह नमाज पढ़ रहा है। देखा बादशाह हाथ फैलाकर मांग रहा था, खुदा सब कुछ है, तेरी महर बनी रहे। पड़ौसी का राज भी मिल जाए। इतनी दौलत है, और भी आ जाए। चाह ही चाह। फकीर वापिस मुड़ गया। बादशाह को लगा कोई है, देखा फकीर वापिस जा रहा था। आप कैसे आए? तुमसे जूता मांगने आया था, पर मेरी चाहत छोटी-सी है। तू तो मुझसे बड़ा भिखारी है। तुमसे क्या मांगना, वह वापिस मुड़ गया। सोचंे,क्या हम सारी उम्र याचक ही बने रहेंगे? मैंने सन्यास लिया। गुरुजी ने कहा, भिक्षा मांग लाओ। मैंने मना किया, यह मैं नहीं कर सकता। मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा। फिर भोजन कहाँ से होगा। मैं चुप था, दो दिन निकल गए। मैं नहीं गया। तब गुरुजी ने कहा, जहाँ से भोजन मेरे लिए आता है, तुम्हारे लिए भी आ जायेगा। परन्तु साधना को मैं शिक्षण नहीं बनाना चाहता। कन्हैयालाल जी जब भी आते एक ही बात कहते मैं, घ्यान सिखाऊँ , कोई शिविर लगाऊँ, मैं हँसकर टाल जाता, एक बार जरूर उनसे कहा था, आप इतनी देर यहाँ रहे पर आपका मन कहाँ था? वे चुप रह गए। बात उन्हें बुरी लगी थी मुझे पता है, पर उनके पाँव लगातार हिल रहे थे।ये जो ध्यान सीखने-सिखाने की बाते होती है, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। पुराने गुरुकुल थे। वहाँ गुरु कैसे रहते थे, क्या था उनके पास? वे इस विद्या को जगत की विद्या के साथ अपने शिष्यों को बांटते थे। जगत से कटकर कोई साधना नहीं है। यह शरीर और जगत दोनों एक रूप हैं। जब तक शरीर है, जगत भी रहेगा। हाँ, जैसा शास्त्र कहता है, कीचड़ में कमलवत , वह लिप्त भी नहीं होता, वैसे रहा जा सकता है। कबीर दास जी कहते थे-‘ज्योंकी त्यों धर दीनी चदरिया’। पर लोग कबीर को आधा ही पढ़ना चाहते है, उनका आधे से काम चल जाता है। नेता लोग उनके कर्मकांड पर हुए प्रहारों से संतुष्ट हो जाते हैं। वे वहाँ बड़ी बात तलाश करते है। वे उनके साहित्य को जानना नहीं चाहते हैं। जो संत मार्र्गी हैं, वे आधे कबीर के साम्प्रदायिकता पर प्रहारों से नाराज है। सब आधे से काम चलाते हैं। पूरा ही सार है, ज्यांे-ज्यांे साधना बढ़ती है। जो निरर्थक है, वह छूटता चला जाता है। थोथा उड़ता चला जाता है। सच्चा साधु कहता है, सबने किया, मैने भी किया, पर जाना सारहीन कर्म था। छूट गया, यहाँ छोड़ा नहीं जाता। जो निरर्थक है, वह छूटता चला जाता है। यहाँ यह ध्यान रहे, यहाँ कुछ भी स्थाई नहीं है। सब परिवर्तनशील है। इसीलिए स्थाई की खोज व्यर्थ है। इस परिवर्तनशील जगत में कैसे रहा जाए, इसी की खोज का नाम धर्म बना। धर्म जिसे धारण किया जाए। बाद में यह पैतृक जन्म से जुड़ गया। धर्म परिवर्तन कोई बुरी बात नहीं है। धर्म जिसके धारण से, मेरे स्वभाव में परिवर्तन आए। मैं अपने लक्ष्य को पाने में सफल हो सकूँ, वह धर्म है। हरधातु का धर्म होता है, वह उसका स्वभाव है। वह उसकी गुण सत्ता है। बुद्धको तभी कहना पड़ा था,‘धम्मं शरणं गच्छामि’ धर्म की शरण में आता हूँ। गीता में इसकी व्यापक व्याख्या हैं। ‘स्वधर्म निधनं श्रेय’ जो तुम्हारा धर्म है, उसमें मरना श्रेयस्कर है। इसका हिन्दू, मुस्लमान से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्वभाव परिवर्तनही, धर्म का परिवर्तन होता है। स्वभाव हमारी आदतों से बनता है। आदतों में परिवर्तन बहुत कठिनाई से आता है। जो हमारा स्वभाव है, उसके साथ जब रहने लगते हैं, तब स्वतः वर्तमान में रहना उपलब्ध होने लगता है। स्वभाव-स्व का भाव, स्वभाव से परिचय स्व के साक्षात्कार से ही सम्भव है। हम दूसरों के बारे में बहुत जानते हैं, पर अपने बारे में भी, अपनी देह के बारे में भी, क्या हम खुद अपने हृदय की धड़कन सुनने में सक्षम हैं। हमारी इन्द्रियांँ किस प्रकार कार्य कर रही हैं, हम नहीं जानते। चिकित्सक ही हमें बताता है। अपने स्वभाव को जानना आवश्यक है। हमारी आधी बीमारियाँ इसी सजगता से दूर हो जाती हैं। स्वभाव से जुड़ते ही, जो बाहर का कचरा है, वह अपने आप छूटता चला जाता है। 6- अन्तिम मुक्ति ”बात हो रही थी। सवाल किसी ने पूछा था, ”जो बहुत दान करते हैं, धर्मशालाएं बनाते हैं, भंडारे चलाते हैं,क्या यह पुण्य नहीं है? पर जिसके पास कुछ भी नहीं है, तो क्या वह पापी होगा?“ स्वामीजी का उत्तर था। ”यह सब बातंे नीति शास्त्र की हैं, समाज को समझाना पड़ता हैै। बहुत कुछ समझाने वालांे का भी लाभ होता है। न नरक है, न स्वर्ग है। ये सब मन की ही गढ़ी हुई कल्पनाएं हैं। हजारो सालो से यही समझाया जा रहा है, परन्तु सही दान वही है, जहाँ स्मृति न बने, अहंकार खड़ा न हो। जब तक हम अहंकार में हैं। हम जो भी कर रहे हैं, वहाँ हमारा स्वार्थ है। हमारी तारीफ हो। इस ब्रह्माण्ड में जहाँ बनना और बिगड़ना ही पंचमहाभूतों का धर्म है, वहाँ कुछ स्थाई नहीं है। दस धर्मशालाएं बनाई, दस लंगर दिए। क्या मतलब, हम चाहते है, हमारी प्रशंसा हो। इतिहास में हमारा नाम रहे। मंदिरों में लोग पत्थर लगवाते हैं, अपना नाम लिख देते हैं। धन की भूख से, प्रशंसा की भूख बढ़ी होती है। हममें लालच होता है, वे आकर उसे बढ़ाते हैं। कहते हैं, ऐसा करो, ऐसा करो, जहाँ लालच है, वहीं धोखा कोई भी दे सकता है। ”तो फिर क्या करना है?“ ”आपको वो जो रामगंजमंडी में प्राइवेट चिकित्सक हैं उनके बारे में बताया था। यहाँ पहले जो भोजनशाला थी ,वह इमारत गिर गई थी। वह भवन भी स्कूल को दे दिया था। यहाँ भीड़ बढ़ने लगी थी , सोचा उधर कुटिया के पास जो जगह है, वहाँ एक कवर्ड चबूतरा दो छोटे कमरे बनवा दिए जाएं। पैसे कहाँ से आएंगे सोचा नहीं था। कारीगर लग गया था। तभी एक शाम को वे डाक्टर साहब मोटरसाइकिल से इधर आए। पूछा क्या हो रहा है? फिर मेरे पास आए , बोले खर्चा मैं दूंगा। मैंने कहा लगभग लाख खर्च हो जाएगा। आप भावुक नहीं बनें। आता रहेगा लगता रहेगा। पर वो कुछ नहीं बोले, दो चार दिन ही हुए होंगे , वे अपनी पत्नी के साथ रुपयों की गड्डी साथ लेकर आगए। बोले हम दोनो ने ही तय किया है। ये खर्चा हम देंगे, आप किसी से कुछ नहीं कहें। न उन्होंने कभी किसी से इस बात की चर्चा की , न कोई प्रचार, न अपनी तख्ती लगवाई। आप क्या समझे? बात एक ही है, कितनी बार पूछी जाएगी? कहा गया है, अधिक से अधिक वर्तमान में रहने का अभ्यास करो। चंन्द्रधर जी आए थे, दार्शनिक हैं। विदेशों में भी पढ़ाने गए। सभी दार्शनिक हजार साल से माथा-पच्ची कर रहे हैं, पर एक मत पर आज तक नहीं पहुँचे। बुद्धि से वे सत्य को जानना चाहते हैं। सत्य तुम्हारे ही पास है। बाहर से तो कोई सिखाने आएगा नहीं। जो तुम्हारे पास है, तुम्हें उसका पता नहीं है। पता ही तो करना है। पता भी क्या करना है? जैसा मेरा शरीर है, तुम्हारा भी वैसा ही शरीर है। मुझे भी भूख,प्यास लगती है। देखा है, समय पर भोजन नहीं आया तो भूख चली जाती है। यह देह की जरुरत है। मिठाई कभी खाई नहीं, न मेवा खाया, सुबह दो रोटी थोड़े चावल, शाम का खाना नहीं खाया। कुछ साल पहले चिकित्सकों ने कहा, लेना चाहिए, तो एक रोटी लेनी शुरु की है। पर बात कहने की हैै। जैसा तुम्हारा शरीर है, वैसा ही मेरा शरीर है। शरीर का अपना धर्म है, वह पोषण चाहता है। नींद भी आवश्यक है। पर तुम्हारा मन और मेरा मन बस दो धरातल पर हैं। जहाँ तुम विचारों में हो, यहाँ सब खाली है। कुछ नहीं है। एक दर्पण है बस, जो भी सामने आया, दिखा, वह गया, छाप नहीं बनती है। भीतर सम्बन्ध इन्०ियों का तथा मन का टूटा हुआ है। कभी कोई दो-तीन बार बोलता है, तब लगता है, कोई कुछ कह रहा है, तब मन जुड़ जाता है। नहीं तो, मन है तो सही, पर वह नियंत्रित पड़ा रहता है। प्रश्न था- ”क्या यही नो माइंड, अमनी अवस्था है?“ ”यह शब्द भी समझाने के लिए ही है। नो माइंड का मतलब है, यहाँ स्फुरणा नहीं है। प्रवाह की कोई छाप नहीं है। छाप बनती है, चिन्तन से, पर यहाँ कोई चिन्तन नहीं है। पहले भी कहा था, मन एक द्वार है, जो बाहर भी खुलता है, जहाँ दुनिया है, भीतर वह अंतर्मन में चला जाता है। यह भी कहीं दूर नहीं है। यह भी मन ही है। कागज की तरह मन की दूसरी परत, जहाँ निरन्तर विराट से जुड़े रहने का अहसास ही रह जाता है। जुड़ा तो पहले भी था, पर इसका अहसास नहीं था। अब वह जुड़ा है, यह आभास नहीं है, अहसास है। यहाँ पर वह बस दर्पण की तरह है। जो सामने आया, वह दिख गया। बस उसकी छाप नहीं बन पाती है। न कोई विचार है, न विचारणा है। कोई प्रतिक्रिया नहीं है। क्रिया के साथ जब मन जुड़ता है, तब कर्म बन जाता है। वह क्रिया तो करेगा, पर कर्म नहीं। मैंने पहले भी कहा है, शरीर की स्वाभाविक क्रियाएं यथावत हांेगी। प्रश्न था- ”वो मुक्तानन्द जी के बारे में पढ़ा था। उनकी पुस्तक में सिद्धियों के बारे में लिखा है।“ ”हाँ, मैंने भी पढ़ा था। वह सब गलत है। पंच महाभूतो का उनका धर्म है। लोग प्रचार पाने के लिए बहुत कुछ गलत कह देते हैं। योगी हो या संत या जाग्रत पुरुष या सामान्य पुरुष, उसके मल-मूत्र में वही दुर्गन्ध होगी। वहाँ की सुगंध से किसी को समाधि नहीं मिलेगी।“ प्रश्न- ”तो क्या यह समाधि शब्द ही अनुचित है?“ ”यह शब्द भी गढ़ा हुआ है। बस वह है। वह वर्तमान में है। बस यहाँ मन नहीं है। इन्द्रियाँ, मन और विषय इन तीनों का सम्बन्ध टूटा हुआ है। यहाँ कोई सीमा नहीं है। जो खालीपन है, वह समझाने के लिए है, अंतर्मन बहुत शक्तिशाली है। वहाँ जो है, वहाँ असीम उर्जा है, अनंत ज्ञान है, शक्ति है, वह वहाँ है, वहाँ सारे सवाल गिर जाते हैं। उत्तर ही शेष रहता है। प्रश्न- ”सवाल जब पूछा जाता है,तब क्या सोचना पड़ता है?“ ”तब भीतर से उत्तर अपने आप चला आता है। सोचने वाला रहा ही नहीं है। सामने वाला आया, पूछता हूँ, कैसे आए, क्या बात है। यह बात को छिपाना चाहता है। पर तभी मेरे भीतर से जो वह जानना चाहता है, इसका उत्तर चला आता है। यह सब सहज घटता है। रिकार्डर मन तो है नहीं। इसीलिए एक ही बात कहता हूँ। हमेशा वर्तमान में रहने का अभ्यास रखो। मन जो है, बहुत शक्तिशाली है, उसके पास तर्क हैं। तर्क का जन्म मस्तिष्क में होता है। सभी दार्शनिक तार्किक हैं, वे तर्क से सत्य को जानना चाहते हैं। सत्य तर्क के गिर जाने के बाद आता है। बस मेरा मन और तुम्हारा मन एक ही है। तुम्हारा मन विचारों से भरा हुआ है। बहुत संग्रह हैं। बार-बार पूछते हो, पर संग्रह जरा भी कम नहीं होता है। हमेशा प्रेशर कुकर में रखे आलू की तरह उबलते रहते हो। वहाँ भटकाव ही भटकाव है। पर मेरा मन विचारों से रहित है। किसी भी प्रकार की विचारणा का दबाव नहीं है। शांत है। बस इससे अधिक कुछ भी नहीं है। हाँ, जब मैंने पाया है, जाना है, तुम भी जान सकते हो। वैसे यहाँ पाने जैसी कोई चीज नहीं है।“ फिर प्रश्न था- ”क्या यही अंतर्मन है?“ ”यह शब्द भी समझाने के लिए है। मन जब विचारों से रहित हो जाता है। उस प्रशांत मन को शास्त्र ने आत्म की संज्ञा दी है। संज्ञा मात्र समझाने के लिए है। यह अनुभव है। समझाने के लिए कहा जाता है। मन में विचार हजारों की संख्या में उठ रहे हैं। हम मन में आने वाले विचार को देखने का प्रयास करें, तो उसके बाद आने वाले विचारों की गति धीमी हो जाती है। धीरे-धीरे, देखते-देखते दो विचारों के बीच का अंतराल भी दिखाई दे जाता है। तब मन के दो हिस्से अपने आप दिखाई पड़ते हैं। एक वह जो दिख रहा है, एक वह जो देख रहा है, वह जो साक्षी है। जो अप्रभावित है। चाहे पीड़ा का विचार हो या घृणा का, या क्रोध का, वह बस देख रहा है। यह जो दृष्टा है, यह आत्म है, यह अप्रभावित रहता है। यह दृष्टा भाव ही सार है, यही आत्मरुप है, यही अंतर्मन की झलक है। इसी को पाना अपने स्वाभाविक स्वरुप को पाना होता है। यही तब कहा जाता है, दर्पण की तरह हो जाना होता है। जैसे बाहर से विचारों का प्रवाह आ रहा है, वहाँ चट्टान की तरह होना कहा है। लहरंे आएंगी, टकराकर लौट जाएंगी। भीतर से प्रवाह उठे, वहाँ बर्फ हो जाना है। लहर ऊपर तक नहीं पहुँच पाए। यही अवस्था जब रह जाती है, तब उसे संतों ने अलग-अलग नाम से बताया है। सार एक ही है दृष्टा भाव, या साक्षी भाव का सघन होते जाना। मैंने यही जाना है, यहाँ बाह्य मन अपने अस्वाभाविक स्थान मस्तिष्क के नीचे आता है। मूल स्थान नाभि की ओर लौटता है, जहाँ अंतर्मन है, वहाँ वह अंतर्मन में विलीन हो जाता है। मन का स्वभाव विचारणा है, अंतर्मन साक्षी है, दृष्टा है, यहाँ शक्ति है, शांति भी है। प्रश्न था- ”क्या यही मुक्ति है?“ ”यह शब्द भी अनावश्यक है। गीता में कहा गया है, जीवन मुक्त अवस्था। बुद्ध धर्म ने माना है, निर्वाण। बांधता कौन है, मन। जब मन ही नहीं रहा, तब बंधन किसका? किससे, जब तक मन है, तेरा और मेरा बना रहेगा। जब मन ही चला गया, वहाँ तेरा मेरा कहाँ रहा? यहाँ सौ टका देना होता है। एक भी बचा, तो सारे विकार यथावत लौट आएंगे। जुज माने टोटल मन, सौ टका गिर जाना है। जागरुकता भी घ्यान है। इसे अंग्रेजी में अवेयरनेस कहते हैं।“ प्रश्न था- ”इसे कैसे जाना जाए?“ ”जब बूंद सागर में गिरी, तब बूंद क्या कह पाएगी। वह क्या है, बस इसीलिए बूंद को कहना पड़ा नेति-नेति, न इति न इति, यही... नहीं, यही,.... नहीं, इतना ही नहीं , वह और भी है, तुम्हारी बौद्धिक क्षमता से आगे है।कहना कठिन हैै। तुम पता करो, सवाल जहाँ से पैदा होते है, वहाँ से सवाल पूछना बंद करो, उत्तर पाने का प्रयास करो। सवाल मस्तिष्क पूछता है, उत्तर हृदय देता है। मन जब हृदय में आता है, वहाँ श्रद्धा पैदा होती है। जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ विश्वास भी है। मुक्ति किसकी, किससे। जगत भी रहेगा, यह पंच महाभूतों की सृष्टि है। किससे, किसका छुटकारा। शरीर का नाश दोनों का ही होगा। चाहे सामान्य पुरुष हो या ज्ञानी। मृत्यु दोनों की एक-सी ही होगी।एक जागृति में शरीर छोड़ता है, दूसरा अज्ञान में चला जाता है। एक की दुकान खाली हो जाती है। न कोई सामान बचा है, न खरीददार आने वाला है। उस खालीपन में वह आनंदित है। जानता है, न स्वर्ग है न नरक है। बस। जो जाग्रत है, वहाँ संशय नहीं है। प्रमाद नहीं है। यह अहंकारी की नींद है, जिसमें संसार बह रहा है। परन्तु जो ज्ञानी है, वह शांत है, उसकी यह शांति बाह्य की किसी घटना से प्रभावित ही नहीं होती है, वह जानता है, इसको इसी तरह घटना था, घट गई।“ प्रश्न- ”क्या इसी को बुद्ध धर्म में तथाता कहा जाता है?“ ”हाँ, समझाने के लिए है, यह स्वभाव हो जाता है। तब माने वही, , जो है, जो किसी बाह्य से प्रभावित नहीं है। फिरकनी भी चलती है, तेज घूमती है, पर बाह्य का बल लगाना पड़ता है। बल हटा,फिरकनी गिर जाती है। पर यहाँ बाह्य का बल नहीं है। ‘बस’ वह है, यह अंतर्मन नाशवान नहीं हैं। यह वही है, जो ‘वह ’ है, जो विराट हैं, शरीर नाशवान है। यह कहीं बाहर नहीं है, यह तुम्हारे ही पास है, समीप है, बस इस तरफ तुम देखना नहीं चाहते हो। यह शब्द मूल स्वभाव की छाया है। जाग्रत पुरुष के भीतर सहज उर्जा प्रभावित होती है। शरीर तो वही है, पर उर्जा दूसरे को अनुभव होती है। यह हवा में व्याप्त सुगंध की तरह है। बस वह है। यहाँ जो शिष्य होता है, जो भाव रखता है, जहाँ श्रद्धा है, वहाँ यह अनुभव की जा सकती है। सामान्य पुरुष के लिए यह प्राप्त होना कठिन है, वह उसके भीतर इस सकारात्मक उर्जा को अनुभव नहीं कर सकता है। ”तुमने पूछा है इस शरीर का क्या किया जाए?“ मेरा यही कहना है, किसी अस्पताल को दान कर देना, मेरी यही इच्छा है। अगर कोई अंग किसी के काम आ जाए तो बेहतर होगा, शरीर का विनाश होना अपना धर्म है। ”और आप?.....“ ‘मैं’ ,......अभी तक समझ नहीं पाए। जो विराट में है, वह अलग कहाँ है। बूंद सागर में मिलकर क्या हुई। फिर पूछोगे, जो अलगाव है, वह तुम्हारा है। तुम शरीर को ही मुझे , और शरीर में ही मुझे देख रहे हो। मुझे जाना है। रामायण में कहा है, राम ने सीता को पाने के लिए सेतु बनाया था। सेतु और परकोटे में यही भेद है। शरीर हमें सेतु के रूप में मिला है, जहाँ से हम चरम की ओर जा सकते हैं। उसे तुम परमात्मा कहते हो, नाम तुम्हारा है, पर शरीर ही माध्यम है, यह बंधन नही है बंधन तो तुम्हारा मन है, श्रृंखला ,विचारणा, अवधारणा और स्मृतियाँ हैं। फिर प्रश्न था- ”बचपन से आप इस मार्ग पर रहे, कठोर संयमित जीवन जीया, क्या जाना आपने, इतने वर्षो की साधना में?“ ”कुछ नहीं, यहाँ कुछ जानने के लिए है ही नहीं। बस सहज स्वभाव में रहना ही साध्य है। तुम वही तो हो, जो मैं हूँ। जो मैं हूॅं, वही तो वह है। बस यहाँ जानना कुछ नहीं है। नहीं कुछ पाया जा सकता है। संसार में जो भी पाया जाता है, जो भी उपलब्धियाँ हैं, उनकीे कोई भी कीमत नहीं है। न वो तुम्हारे साथ जाएंगी, न तुम उन्हें साथ ले जा सकते हो। हाँ, यह जानना या पाना, मात्र ‘जागना’ है। यही गीता कहती है। जब सब सोते है, तब वह जागता है। जागना ही जागरुकता है,सजगता है जिसे अंग्रेजी में अवेयरनेस कहा जाता है। यह जागना अपने सही स्वरुप को पाना है। पर बाधा मन की है, उसके पास अपने तर्क हैं। दुनियां में उपदेशकों की भरमार है, वे भी अपने स्वार्थ में सबको भटकाए रखते हैं। जो नहीं जानते है, वही बताते है। तुम्हें कहीं नहीं जाना है। बस अपने घर लौटना है, अपने भीतर लौटना है। अपने आपको जानना है। अपने मूल स्वभाव को पाना है। बस यही पाना ही, ”सार तत्व“ है। लोग पूछते है, मैं ‘एन्लाइटन्ड’ कब हो जाऊंगा। मैं क्या उत्तर दूँ। चुप रह जाता हूँ, हँसी आती है। यह भी कोई बाजार में मिलने वाली वस्तु है। तुम्हें अपने आपको, अपने स्वभाव को पाना है, जो तुम्हारा है। यहाँ कुछ बाहर से मिलने वाला कुछ नहीं है। सत्य यही है,यहाँ ऐसा कुछ नहीं है,जो पाया जा सकता है। नहीं ऐसा कुछ है, जो खोया जा सकता है, फिर यह सवाल कहाँ से? यह गलत लोगों ने प्रचारित कर रखा है। हाँ, यह बात दूसरी है, जब मूल स्वभाव से हम जुड़ जाते है, तब उस विराट का स्पर्श उस सकारात्मक उर्जा को प्रवाहित कर देता है, जहाँ परम शांति है, साथ अनंत उर्जा का प्रवाह भी। जिसे हम आकर्षण कह सकते हैं, लेकिन यह कोई पाने की चीज नहीं है। यह तो प्राकृतिक देन है, बस। जहाँ भी कुछ भी पाने की कामना है, वहाँ मन है। मैंने पहले भी कहा है, यहाँ मन को पूरा दे देना होता है, तभी ”पूरा“ अपने आप पाया जाता हे, जो सहज है।“ ”तो क्या यही हमारा धर्म है? ”धर्म कोई बाहर की चीज भी नहीं है, यह स्वभाव हैै। हर वस्तु का अपना गुण-धर्म है। मनुष्य का धर्म उसका स्वभाव है। ‘स्व’, यानि आत्म का भाव। वह है जागृति। संसार का धर्म है जिसे ‘वेदों’ ने ,ऋत कहा है, जो‘राइट’ है। यह प्राकृतिक विधान है। नैतिक भी कहा गया है। जो नियमन करता है। पृथ्वी का गुण आकर्षण है। आकाश का अपना धर्म है। सभी पंच महाभूत अपने-अपने स्वाभाविक धर्म में बंधे हैं। यहाँ धर्म वह नहीं है, जो मजहब के रुप में जाना जाता है। इसीलिए आज सम्प्रदाय, धर्म शब्द का अर्थ हो गया है। अध्यात्म भी शब्द है, जिसका अर्थ है, अपने इस आत्मतत्व को जानने का प्रयास करना। जो जिज्ञासु है, वह अध्यात्मिक पथ पर आता है। जो मात्र कौतुहल से भरा है, वह सम्प्रदायों में चला जाता है। जो शिष्य होता है, , वह किसी गुरु की तलाश में जाता है, वह उसे मात्र देखता है, और खुश हो जाता है। पर जहाँ तर्क गिर गया, वहाँ विश्वास-अविश्वास दोनों चले जाते हैं, वहाँ मात्र श्रद्धा रह जाती है। जहाँ श्रद्धा है, वहीं रुपांतरण सम्भव है। यही गीता कहती है, जो संशय में है, वहाँ विनाश है। संशय का समाधान विश्वास ही है। भीतर ही भीतर संशय बना रहता है। वर्षो हो गए, कृष्णमूर्तिजी के अनुयायी आते हैं, वे ही सवाल, वे ही बातें। मैं हैरान हूँ, इतने वर्षो में तो वर्षा से पत्थर भी बदल जाता है। पर क्यों? उनका तर्क, उनकी बुद्धि उतनी ही संशयालु तथा ढृढ़ है। वे मुझसे मिलकर खुश होते हैं, कि मैं भी उनकी ही तरह बातें कर रहा हूँ। वे मुझसे अपने तर्क की पुष्टि करवाने आते हैं। उनका कृष्णमूर्ति पर भरोसा है, पर वे भरोसा तोड़ देते हैं, संशय फिर बना रहता है, जिसे विश्वास कहा जाता है, वह सौ टका होता है। यहाँ संदेह पानी में पड़ी बर्फ की तरह पिघल जाता है। जब तक मन मस्तिष्क में रहेगा, वहाँ संदेह होगा, तर्क भी होगा। हाँ, हृदय मे जब आता है, वहीं श्रद्धा है, वहीं विश्वास है। शिष्य होना आसान नहीं है, वहाँ हृदय से सुना जाता है। तब शब्द-सबद बन जाता है। 7‘याचक नहीं दाता बनो।’ ”मैं कह रहा हूँ, इसलिए मेरी बात मानी जाए, यह सही नहीं है। आप स्वयं प्रयोग करें।“ उस दिन वसावड़ा कह रहे थे, ”आप गलत जगह आ गए। आप अगर बौद्ध होते तो उनके बड़े मास्टर कहलाते।“ मुझे हँसी आ गई, क्या मास्टर बनने के लिए बौद्ध भी होना पड़ता है। यह शब्द ही गलत है। विदेशी शब्द है। वे हर चीज को यंत्र में जानना चाहते हैं। बुद्धि के पार जो है, उसे बुद्धि से कैसे समझा जा सकता है। ज्ञान के दोनों स्तरों को वे जानते हैं। इन्द्रिय जन्य ज्ञान और बुद्धि जन्य ज्ञान के परे विवेक है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक में बदल जाती है। जहाँ विवेक रहता है, वहाँ तीक्ष्णता रहती है सजगता, जागरुकता, ये शब्द बस कहने के ही नहीं हैं, यह होता है। तब मन अंतर्मुखी होकर, उस मन से जो सर्वत्र व्याप्त है, उससे जुड़ जाता हैं, उसी अवस्था को हर धर्म ने अपना-अपना नाम दिया है। जब कोई अनुभवी आता है, तब उसके पीछे आने वाले लोग सीढ़ियाँ बना लेते हैं। पर सीढ़ियों से जो पार है, वहाँ तक सीढ़ी नहीं पहुँचाती। बुद्ध के बाद यही हुआ, जब वे कहते हैं निर्वाण, वहाँ उनके पास व्याख्या भी है। शब्द कहाँ से आएंगे, उन्होंने बुझ गया, दिया बुझ गया कहा। आत्मा शब्द का मैंने प्रयोग नहीं किया, तभी बसावड़ा मुझे बौद्ध कहने लगे। हाँ, वहाँ कुछ नहीं रहता। बस खालीपन दुकान उठ गई। कैसे कहा जाए, तुम पूछो मत, खुद पाने का प्रयास करो। जब मैंने जाना है, तुम्हें भी मिलेगा, सबको मिलेगा। गीता कहती है,‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’ यह मार्ग सुलभ है। मेरा भोजन अत्यन्त ही अल्प था। गुरुजी अवाक थे, मात्र इतने कम आहार से मेरा शरीर कैसे चल रहा है? बात समझनेे की है, हम अपनी आवश्कताएं कम करंे। जरुरत से ज्यादा संग्रह न हो, और मांगना तो सबसे खराब बात है। मैंने यहाँ मैने पहले लिखा भी रखा था, ‘याचक नहीं दाता बनो।’ कई बार मौके आए, गुरुकुल की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। खर्चे भी आए। मैंने आपको ‘ब्यावरा’ वाली घटना बताई थी। किस प्रकार बकानी वाले, रामस्नेही महाराज को निमन्त्रण दे आए थे, यहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। पर प्रकृति ने सारा कार्य बहुत बढ़िया पूरा करा दिया। हम जब शांत होते हैैं, उस अनन्त से हमारा सम्बन्ध जुड़ जाता है, तब प्रकृति स्वयं हमारे कार्य व्यवहार संभाल लेती है। पर हमें इसका विश्वास नहीं है। हमें कुछ नहीं करना है, शांत बैठे रहना है, निट्ठल्ला होना है, यह मैं कभी नहीं कहता, न चाहता हूँ। जब स्वयं निरन्तर कर्मशील रहता हूँ, तब आपको निट्ठल्ला कैसे बनने के लिए कह सकता हूँ। पर इन्०िया गतिशील रहंे, पर मन शांत रहे, यह तो सम्भव है। और यह सम्भव हो पाता है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। हम जहाँ भी हों, जो भी कार्य कर रहे हांे, मन वहीं रहे। मैंने ‘अनंत यात्रा’ उपन्यास आपके लिए लिखा था। वहाँ तो कागज कलम की कोई व्यवस्था थी नहीं। जो भी कागज आया, उस पर आपको लिख कर भेज दिया। कभी पहले क्या लिखा था, कोई प्रति वहाँ नहीं रही। मन की शक्ति को अभी तक पूरी तरह जाना नहीं गया है। 8 जीवन एक खेल है, बस प्रश्न था- ”शंकराचार्य नेे तो जगत को ही माया माना है? ”तो क्या हुआ? हम आधा-अधूरा ही जानते है, जानना चाहते हैं। जब मैं कहता हूँ, हृदय, तो लोग पूछते है, देह में हृदय कहां होता है, तब हृदय का पता कैसे लगेगा? कोई भी चिकित्सक आज तक मन का ठिकाना ढूंढ नहीं पाया। पहले तो मन और मस्तिष्क को ही एक माना जाता था। अधिकांश बातचीत में माइन्ड का अर्थ मस्तिष्क की क्रियाओं से ही जान पाते हैं। तब हृदय का ठिकाना कहाँ है? इसीलिए शुरु से मस्तिष्क और हृदय का फर्क रहा है। विज्ञान, विचार की भाषा जानता है, दर्शन भी विचार की शुद्धता है। सभी शास्त्र यहीं तक आते हैं। पर उससे परे हृदय का क्षेत्र है। वेद और उपनिषद में दिखाई पड़ता है। एक में कविता है, दूसरे में दर्शन है। बुद्धिमता है, तथा उससे भी पार जाने की क्षमता है। बहुत पुरानी कहावत है कि जहाँ हृदय खुलता है, वहाँ कविता आती है। हर शहर में पचासों दुकानदार होंगे, पर कवि, कलाकार, गायक उतने ही कम होंगे।ये लोग प्रशिक्षित नहीं किए जाते। इनकी जन्मजात प्रतिभा होती है। यह बात दूसरी है कि आजकल इनका आदर नहीं हैं, पर समाज में ये बहुमूल्य होते हैं। इनकी क्षमता सृजनशीलता है। पर इन दोनो से परे, जहाँ बुद्धि और हृदय दोनो का संतुलन होता है, वहाँ के लिए शब्द नहीं है। हमारे संत कवियों की यही पहचान है। पुराना शब्द धर्म था, स्वभाव था, पर वह आज लुप्त हो गया है। आज धर्म, शब्द रिलिजन बन गया है। इससे दुविधा पैदा हो जाती है। स्वभाव को पाना और जानना कठिन है। हमारे यहाँ इसीलिए सनातन धर्म कहा गया था। पर आज शब्द तलाश करना कठिन है। गीता के दूसरे अध्याय में कहा गया है,‘उसे प्रसाद की प्राप्ति होती है’, तब सब दुखों का अभाव हो जाता है। यहाँ बुद्ध धर्म ने उसे ‘निर्वाण’ कहा है। आज दोनो ही शब्द अपना अर्थ खो बैठे है। प्रसाद तो मंदिर मंे बँटने वाला प्रसाद हो गया है। और निर्वाण की व्याख्या सबकी अलग-अलग है। वहाँ जो शांति है, वहाँ शक्ति भी है, वहाँ सृजनशीलता है। प्रतिभासित सत्य, व्यावहारिक सत्य के पार ही पारमार्थिक सत्य है। इसको पाना ही वर्तमान में रहना है। जिसे निर्विचारता कहा जाता है, वह कोई अलग, समाज से कटकर रहने की व्यवस्था का नाम नहीं है। वह तो यहीं उपलब्ध होगी। बस इतना सा ही भेद है, वह जिसे प्राप्त होती है, वह अत्यधिक सामान्य हो जाता है। विशिष्टता पाने का मोह तो अहंकार है। यह अवस्था मात्र रहने की है। सुचेत, एक जगह नहीं, सर्वत्र जागरुकता। गीता में इसको बताया गया है, वहाँ शब्द ‘संयमी’ आया है। पर अब उसका भी अर्थ मात्र इसमें इन्द्रिय निग्रह तक सीमित रह गया है। इसीलिए पुराने शब्दों का प्रयोग आज व्यर्थ हो गया है। मैं तो बस एक ही बात कहता हूँ, ‘वर्तमान में रहो’। बहुत पहले मैंने कहा था, आज सबसे बड़ा खतरा पर्यावरण का है। यहाँ मेरा आशय स्पष्ट था। प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार गलत हो गया है। हम मात्र दुरुपयोग करते है। पुराने समय में कहा जाता था, मनुष्य की प्रकृति पर विजय। क्या मतलब? यहाँ किसे-किससे लड़ना है। बात है, हमें रहना सीखना आए। प्रकृति का अपना नियम है। इसे ही सबसे पहले जानकर ‘ऋत’कहा गया था। एक नियम है, उस नियम को ही धर्म कहा गया है। यह प्रकृति का नियम हैं, धर्म है, पदार्थ के नियमों की जानकारी से विज्ञान बन गया। मनुष्य के, प्राणी के जीवन को प्रभावित करने वाले नियमों से धर्म बन गया। आचरण के नियमों से नीतिशास्त्र बना। मूल तो प्रकृति है। उससे लड़ना, उससे विजय पाना, व्यर्थ की बात है। प्रकृति से साहचर्य, समरसता बहुमूल्य है। और यह पुराने जमाने से धर्म का एक हिस्सा बन गया है। प्रश्न था - ”रमण आश्रम आप गए थे। आपने पहले भी उनके बारे में बताया है। उनकी साधना थी, ”मैं कौन हूँ, पता करो,“ यह कैसे संभव है?“ ” वेे अपने अनुयायियों को कहते थे, शांत बैठ जाओ। पता करो, मैं कौन हूँ, यह नकारात्मक यात्रा है। मैं यह नहीं हूँ, मैं यह भी नहीं हूँ। अनवरत विचार करते करते एक दिन ऐसा आता है, सब विचार गिर जाते हैं, पहले शब्द गिरते हैं, फिर जो भावना बनती है, अचानक वह भी शांत हो जाती है।। तब वहाँ ,...वहाँ कुछ भी शेष नहीं रहता है। वह जो खालीपन बचता है, वहाँ प्रश्न गिर जाते हैं, बस। यह सवाल किसी दूसरे से पूछने का नहीं है। वह क्या बता पाएगा, उसे तुम्हारे बारे में क्या पता? सबके अपने-अपने तरीके हैं। मैंने पहले भी कहा, खुद विचार करो। जो अच्छा लगे, उस पर प्रयोग करो, सफलता मिलती है, तो आगे बढ़ो, नहीं तो छोड़ दो। निर्णय तुम्हारा ही हो, दूसरे से कहने मात्र से नकल नहीं करनी है। मैंने बार-बार यही कहा है कि हमें दूसरे के भाव जगत को बदलने की जरुरत नहीं है। जब तक उसकी जिज्ञासा न हो, उससे यह चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। आजकल यही गलत हो रहा है। हर गली में गुरु पैदा हो गए हैं, अपना अधूरा ज्ञान बांटते रहते हैं। जिन्हे खुद का पता नहीं, वे दूसरे को आत्मज्ञान देते हैं। उसमें जितनी गलती उनकी है, उससे अधिक तुम्हारी है। तुम्हें, जो जाना गया है, उसका आदर करो, जिसे मानते हो, उस पर विश्वास लाओ। मात्र नकल नहीं, प्रयोगशील तुम्हें ही बनना होगा, तब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिलेगा। तुम कौन हो? यह उत्तर मैं नहीं दे सकता। मेरा उत्तर भी गलत हो जाएगा। शास्त्र यही कहता है, ‘जब सब सोते है, वह जागता है’। तुम्हें ही अपनी गहरी नींद को तोड़ना होगा, जगना, जागरुकता, अवेयर होना एक ही बात है। तुम्हारे काम को कोई दूसरा नहीं कर सकता। मेडीटेशन क्या सिखाया जा सकता है? यह सवाल मुझसे बार-बार पूछा जाता है। मैंने अपने साठ साल की इस यात्रा में कभी यह चर्चा नहीं की। मेडीटेशन और ईश्वर दो शब्द मेरे पास नहीं आए। जब हम जानते है कि मेडीटेशन का अर्थ एकाग्रता ही है, कन्सनट्रेशन है, तब तो यह सिखाने की चीज है, सीखना चाहिए। पर जब हम इस शब्द का प्रयोग विदेशियों के लिए ‘ध्यान’ के रुप में करते हैं। तब बात साफ हो जाती है, यह तो रहने की कला है, जहाँ निरन्तर सजगता है। यह आप कैसे सिखा सकते हैं। न यह दूसरे को सिखाई जा सकती हैं, न समझाई जा सकती है। हाँ, संकेत किया जा सकता है, बस। शास्त्र यही काम करता है। शास्त्र आध्यात्मिक नहीं है, पर शास्त्रों में आध्यात्मिक इशारे हैं। जो, जो जानना चाहता है, उसके लिए मार्ग बताते हैं। पतंजलि ने जो महत्वपूर्ण बात कही है, वह यही है कि, चित्तवृतियों का निरोध योग है, निरोध नाश नहीं है। यह जो रुपान्तरण है, जहाँ उर्जा अंतर्मुखी हो जाती है, वह महत्वपूर्ण संकेत है। यहाँ तक आने के लिए तो वे सीढ़ियाँ बना गए, पर इसके बाद क्या होगा? मात्र संकेत है। क्यों? यह अनुभवजन्य है। बुद्धिजन्य नहीं है। इसीलिए यह घटता है, दिया नहीं जाता। इन्द्रियाँ,मन और बुद्धि से परे हैं। जहाँ तक बुद्धिजन्य ज्ञान है, वहाँ तक प्रशिक्षण दिया जा सकता है। पश्चिमी दर्शन में कहा जाता है ‘वर्च्यू’ सिखाई जा सकती है। इसका अर्थ सदगुण है, पर यह सदगुण ही नहीं है। इसमें सद गुण तो होगा, पर वह उसकी आंशिक अभिव्यक्ति ही है। जैसा मैंने कहा, महर्षि रमण ने एक विधि बताई थी। यह नकारात्मक तो है, मैं यह नहीं हूँ। यह उसी प्रकार है, जिसे अवलोकन कहा जाता है। हम अपने विचारों को देखते हैं। दृष्टा, दृश्य व दर्शक तीनों का पता लगता है। धीरे-धीरे दृश्य सिमटना शुरु होता है। विचार ही विकार है। विचारों की संख्या कम होते-होते, विकार भी कम होते चले जाते है। बस यहीं तक आप समझा सकते है कि यह ध्यान है, यह वर्तमान में रहने की सीढ़ी है। फिर आप जहाँ भी हो, जो भी कार्य कर रहे हो, वहाँ विचारण का दबाव नहीं रहे। पर इसका कोई प्रदर्शन नहीं हो सकता। शब्दों के उलटफेर ने ही बहुत सी किताबों को, विचारकों को नई भाषा देदी है। जहाँ तक मेडीटेशन का सवाल है, यह बाहर की वस्तु पर, विचार पर मन को एकाग्र करने की विधि है, पर ध्यान तो उस विचार को ही कम करते- करते निर्विचारता पर आने की कला है। दोनो एक-दूसरे की विरोधी हैं। यह बात दूसरी है कि निर्विचारता में अनायास एकाग्रता हर पल रहती है। प्रश्न था- ”आप की क्या स्थिति है?“ ”मुझे क्या पता, आप जानें। यहाँ तो दुकान खाली है। मुझे आनन्द है। प्रसन्नता है। कोई आकांक्षा नहीं है।“ प्रश्न था - ”क्या यहीं प्रेम है?“ ”प्रेम का मुझे पता नहीं। प्रेम अन्य को अनुभव होता है। जहाँ चुम्बक होता है, वहाँ लोहा खिंचा चला आता है। यह आकर्षण ही प्रेम कहा जाता है। यहाँ मन ही नहीं है, विचार ही नहीं है, जो धारा है, वह अनवरत बह रही है। जिसका जितना बड़ा पात्र है, सही पात्र है, भरकर ले जाए। पर पात्र ही फूटा हो तो क्या होगा? बह्मनिष्ठ गुरु खुद कुछ नहीें करता, न करना चाहता है, परन्तु उसके भीतर जो प्रेम की धारा बह रही हैं, वह अनायास शिष्य के भीतर परिवर्तन ले आती है। उसे तो इसका पता नहीं रहता है।“ प्रश्न था- ”तो साधना क्या होगी?“ ”रमण महर्षि की बात बताई थी। वे शांत बैठे रहते थे। मैं वहाँ रहा था, देखा कतारों में लोग आते शांत बैठे रहते। उनके प्रश्नों के उत्तर भी उन्हें मौन में मिल जाते थे। तब पाया,मौन की भाषा बहुत ही ताकतवर होती है। वे भोजन भी सबके साथ ही पंक्ति में बैठकर करते थे। जब हम मौन होते है, तब विचारों का जो समूह हमारे भीतर जमा रहता है, वह हट जाता है। चुप रहना वाणी का मौन है, और विचार ही न हांे, वहाँ चुप रहने की आदत हो, यह वास्तविक मौन है। तब हमारे भीतर का जो श्रेष्ठ है, वह प्रकट होने लगता है। यही सागर मंथन का रहस्य है। सभी तुम्हारे पास है। गरल भी और अमृत भी। जब मन की गति बढ़ती है, तब मन की शक्ति घट जाती है। विचारों के बढ़ने से मन की गति बढ़ने लगती है, तब हम अशांत हो जाते है। आपने पूछा, मेरी क्या स्थिति है? यहाँ बस शांति है। अठ्यासी साल की आयु है। चला फिरा ज्यादा नहीं जाता, फिर भी सेवा कार्य चलता है, मन से सेवा हो जाए, बस। अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। प्रकृति ने जो कार्य सौपा है, वह कर दिया, करना है। इस शरीर को लेकर कोई आसक्ति नहीं है। आप जब इस शरीर में प्राण न रहें, किसी अस्पताल को दे आना, शायद कोई अंग किसी के काम आ जाए। बहुत पहले अंग्रेजी की एक कविता पढ़ी थी-”मुझे यहाँ अकेले पड़े रहने दो, बाद में एक पत्थर भी निशानी के लिए नहीं हो,“ यह हमेशा याद रहे, इस संसार में हम बहुत कुछ कर सकते हैं। पर उसका अंत में कोई मूल्य नहीं है, यह भी दीर्घ स्वप्न है। गीता में सही शब्द आया है ‘स्थितिप्रज्ञ’, वह हर स्थिति में शांत है। अपने भीतर से जुड़ा हुआ, निरन्तर कर्मशील। अत्यधिक सामान्य। प्रश्न था- ”फिर यहाँ की उपलब्धि क्या है?“ ”आपको बहुत पहले बताया था, जब हम छोटे थे। चौपाटी पर शाम को रेत में खेलने जाते थे। वहाँ रेत पर मकान बनाते थे-बड़े-बड़े। कोई पास आ जाए तो उसे दूर से भगाते थे। पर रात होते-होते खुद ही अचानक पांव से सब गिराकर घर भाग आते थे। यह बचपन का खेल ही महत्वपूर्ण है। इससे अधिक कुछ नहीं। छोटा बच्चा खिलोनौं से खेलता है, पर जब माँ जाने को होती है, सब फेंक कर मां की गोदी में चढ़ जाता है। न यहाँ कोई महत्वपूर्ण है, न बेकार। बस एक खेल है। भागवत में इसे ‘रास’ कहा गया है। रस यानि आनन्द। आनन्ददायी खेल, बस इससे अधिक नहीं। जितने लोग हैं, उतनी बातें। पर मैंने यही जाना है, यहाँ की कोई उपलब्धि नहीं है। सुख-शांति से जीना ही जीवन की कला है। जो दुःखी है, वह शांत नहीं हो सकता। सुख इन्द्रियों से, जगत से मिलता है। और शांति मन के इस बोझे को कम करते जाओ, उससे। यह संतुलन पाना ही धर्म है। प्रतिभासित सत्य जो सपना है, व्यवाहारिक रुप जो जगत है। इन दो में भी जो एक रस चेतना बहती है, उसे जानना, उस सब को अनुभव करना ही अवेयरनेस है, यही उपलब्धि है। जब यह बोध हो जाता है, तब बोध होता है, हम महल बना सकते है, बना दिया है, पर इसकी भी कोई अर्थवत्ता नहीं है, या तुम इसे छोड़ दोगे, या यह तुम्हंे। तब मात्र एक खिलाड़ी का भाव शेष रह जाता है। न करने से करना बेहतर है और करने से यह बोध की, इसकी कोई उपलब्धि नहीं है। एक खेल है, बस, तब आनन्द शेष रह जाता है। 9.सत्य की खोज प्रश्न ,क्या सोचने से, मनन करने से, चिन्तन करने से सत्य को पाया जा सकता है?शास्त्र तो यही कहते हैं। ”सोचना ही जहाँ प्रारम्भ है, अंत है, वहाँ इससे परे भी है। इस पर स्वयं को ही विश्वास नहीं होता। जब मैं कहता हूँ, किसी बात को एक बार सोचो, तय करो पर उस पर भी विश्वास नहीं होता है। हम काम करते है, तब भी सोचते रहते हैं। काम होता रहता है, तब भी सोचते हैं। काम पूरा हो जाता है, उस पर उसके बाद भी सोचते हैं। यह पश्चाताप और प्रायश्चित शब्द तभी पैदा हुए है। जीवन तो विरोधाभासो से भरा है। सब तरफ से हमारे पास हमें प्रवाहित करने के लिए विचारों का जाला फैला हुआ है, इतनी सूचनाएं पहले नहीं थी। जीवन अपने आप शांत था, पर आज मनुष्य के मस्तिष्क का विकास इतना हो गया है कि उसके पास सब तरफ की हजारों जानकारियाँ है, वह यही जानता है कि वह सोचता है, इसीलिए वह है भी। पर सत्य, क्या है? यह भाषा का सच तो नहीं है। जहाँ तर्क शास्त्र से वाक्य की परीक्षा होती है या व्याकरण के हिसाब से वाक्य को पूरा किया जाता है। सत्य की खोज का अर्थ होता है। जीवन और जगत का आधार क्या है, जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? यह सृष्टि का आधार क्या है? ये प्रश्न कम होते-होते मनुष्य के पास आते है, दुःख का कारण क्या है? वह प्रकृति के रहस्य को जानना चाहता है? “पर क्या यह विचारों से जानना सम्भव है?” “पश्चिमी दर्शन का आधार तार्किक जांच है? वे बु(ि से परीक्षण करना चाहते हैं। पर सत्य तो बु(ि के ही पार है। भारतीय )षि कहता है, नेति, नेति। उस दिन कोई कह रहा था, जो भले है, वे दुःख पाते है, जो दुष्ट है, वे समाज में खुश है, क्यांे? जीवन जो है, विरोधाभासों से भरा है। मार्क्सवादी ने इसका कारण सामाजिक व्यवस्था में देखा। जो मनोवैज्ञानिक है, वेउसके मन की ग्रन्थियों में बताया करते है, उनकी अपनी थियरी है। धार्मिक लोग कर्मकाण्ड में तलाशा करते है, पर सबकी अपनी सीमा है? एक ही वृक्ष की सभी पत्तियां अलग क्यों है? पता करंे, यह प्रकृति का स्वभाव है। एक ही क्यारी में, सब तरह की खुशबू के दस तरह के पौधे कैसे खिलतेे है। पता करे? यह सत्य जो है, यह बु(ि से परे झांकने को कहता है, तब वह पाता है कि वह चुप हो जाता है। नहीं जान पाया है, तब भी चुप है। जान गया तो भाषा उसके पास नहीं है, हम अपने से आगे ही देख पाते है। पीछे नहीं, इन्द्रिया विषय को देखती है। मन से इन्द्रियों को देख पाता है, पर बु(ि से परे क्या है, यह बु(ि नहीं देख पाती है। इसी को ही रहस्य कहा जाता है। ”फिर हमारे सवाल क्या हैं?“ उस दिन स्वामीजी के पास , चोयल साहब किसी रेल्वे के रिटायर्ड अधिकारी को लेकर आए थे। वे पास के सोफे पर ही बैठे। आते ही सवाल ही सवाल, उसके सवालों का अंत नहीं था। वे यह साबित करना चाह रहे थे, जितना उनका ज्ञान है, उतना किसी का नहीं। वे सवाल पूछते, पर उत्तर आने के पहले दूसरा सवाल। स्वामीजी शांत थे। बोले,” ये सवाल तो किताबों के हैं, आपने पढ़ा बहुत है, उत्तर भी आपके पास हैं। आपका कोई सवाल हो तो पूछें?“ सही सवाल हम पूछना ही नहीं चाहते है। वह हमारा सवाल है और उसका उत्तर भी हमारे पास है। सही सवाल को मस्तिष्क नहीं पूछ सकता? मन और मस्तिष्क का गठजोड़ जब टूटता है, जब स्मृति का दबाव हट जाता है, तब सही सवाल पैदा होता है, सही सवाल वह है, जो तुम्हारा है? तुम अपने सवाल को न्यायोचित ठहराने के लिए उसे अधिक से अधिक सबका बनाने का प्रयास करते है। मुझ में आत्म विश्वास की कमी है? तुम पूछते हो, महिलाओं में आत्म विश्वास कम क्यों है? सही सवाल वहीं पैदा होता है, जहाँ मस्तिष्क चुप हो जाता है, तब पुकार हृदय में उठती है और तब उत्तर वहाँ अपने आप उपस्थित हो जाता है? यह उत्तर बु(ि नहीं देती है। यह विवेक देता है। बु(ि जब शत-प्रतिशत शुरु हो जाती है, तब विवेक में ढल जाती है। अब विवेक कौंधता नहीं है, वरन स्पष्ट हो जाता है। विवेक जहाँ है, वहाँ बु(ि है, शांत है, निश्चयात्मक है। जहाँ अवेयरनेस है, वहाँ एकाग्रता भी है। पर जहाँ मात्र बु(िमता है, वहाँ विवेक हो, आवश्यक नहीं है। जहाँ एकाग्रता हो, वहाँ अवेयरनेस हो, जरुरी नहीं है। यह विरोधाभास शाब्दिक नहीं है, उसकी प्रकृति में है। मन का स्वभव द्वन्द्व में है, प्रकृति द्वन्द्वात्मक है। द्वन्द्व में ही गति है। मन की गति मन की शक्तिहीनता है। मन की शक्ति निकर्वचारता है। जो बु(िमान है, वह उसे बकवास मानता है। आप दिन-रात को एक कैसे कह सकते हैं?पाप और पुण्य को अलग मानते हैं? हम स्वर्ग और नरक को भी दो मानते है। मोक्ष तो एक ही है। यह भी आप मानते हैं। वहाँ कोई द्वन्द्व नहीं है। मोक्ष शब्द शांत मन की उपलब्धि है। वहाँ दोनों ही गिर गए। शास्त्र कहता है, वृक्ष से ”यमलार्जुन“, प्रकट हो गए। वृक्ष में मन बस सुप्त है, पर प्राण है। वैज्ञानिक कहते है, पौधे भी बागवान को देखकर हर्षित होते है, पर हम निरन्तर कुल्हाड़ी लिए रहते है। हृदय की तो एकता है, पर बु(ि में भटकाव है। शास्त्र कहता है बु(ि का पुत्र अहंकार है, उसका पुत्र मन है। जब हम कहते है, पंच महाभूतों से शरीर बना है,तब हम पृथ्वी का इतना दोहन व शोषण क्यों करते है? हम अपने ही शरीर के आवश्यक अंग को, उसके कारण को दूषित करते जा रहे है? हमारे शास्त्रों ने इसे तभी धरती ‘माँ’ कहा था। धरती पर वृक्ष खड़ा होता है, फूल आते है,फल आते है, धरती पर सब गिरते है।फिर वर्षा आती है, अंकुरण फिर हो जाता है, यह अस्तित्व है। वह नाना रुपों में स्वतः अभिव्यक्त हो रहा है, क्या कारण है? मैंने पहले कहा था, ”कारण रहित कारण,“ यहाँ बस हो रहा है। इसके साथ एकरसता पाना ही, अस्तित्व के समीप आना है। अब तो विज्ञान है, प्रयोगशालाएं पर पहले वनस्पति का ज्ञान कैसे होता होगा? यह तीसरा रास्ता भी है, वहाँ वस्तु स्वयं अपने आप को प्रकाशित कर देती है। पर यह ‘सत्य’ बु(ि से नहीं पाया जाता, यहीँ विरोधाभास है। वहाँ पर जो दर्पण है, वहाँ वस्तु अपने स्वभाव को प्रकट कर देती है, यही जानना ध्यान है। हम मन से ही सवाल करते है, और मन से ही उत्तर जानना चाहते है, मन विरोधाभासी है, वह संतुष्ट नहींहोता है, वहाँ असंख्य प्रश्न है। आपने पूछा है, डॉ बसावड़ा जो अमरीका से आए थे, उनमें क्या खास बात थी। बात क्या खास होगी।इतने बडे़ मनोवैज्ञानिक थे, पर वे जब सुनते थे, पूरी तल्लीनता से सुनते थे, मानों वे शब्दों को घूंट-घूंट के पी रहे हों। जब हम हृदय से सुनते है, वहाँ प्रश्न उठते ही नहीं है। क्योंकि वहाँ उत्तर अपने आप आना शुरु हो आता है। प्रश्न वहीं तक खडे़ होते है, जहाँ तक मन है। वहीं तक सारे विरोधाभास है। इसीलिए संतों ने दर्शन शब्द को पास नहीं आने दिया। दर्शन और ग्रन्थ बाद में आते है, ये बु(ि की उपज है। जहाँ एक ही सवाल के हजारों उत्तर तैयार है। सबकी अपनी-अपनी व्यवस्थाएं है, मेरी छोटी सी थियरी है, वर्तमान में रहो, बस।“ ”वर्तमान है क्या?“ ”यह आप पता लगाओ, जहाँ तक आपका मन है, समय में है, वहाँ अतीत है, स्मृति है और कल्पना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ मन नहीं है, वहाँ समय नहीं है, वहाँ बस है, अस्तित्व है। शास्त्र में उसे ‘ज्ञानी’ कहा है, ‘ज्ञान’ वर्तमान में ही है। स्मृति मे सूचना है, भंडार है, अनुपयोगी है। शब्द है, ध्यान, जागना, स्मृति भी नींद है, कल्पना भी नींद है, अनवश्यक विचारणा भी नींद है। उसे भी दिवा स्वप्न कहा जाता है। डेेेेेे ड्रीमींग थी सब सपना है। जहाँ जगना है, वहाँ नींद नहीं है, वहाँ समय नहीं है। जब हम विचारधारा के दबाव से परे चले जाते है, वहाँ फिर सपने देखना बंद हो जाता है। तब नींद खुलती है, जहाँ तक मन है, समय है, समय में ही ड्रीमींग है। गहरी नींद है। जगना और ध्यान,अवेयरनेस, शब्द एक ही बात को बता रहे हैं। जब हम इस वर्तमान को शब्द देना चाहते हैं, वह यह है, वह तुरंत अतीत में चला जाता है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ कोई सपना नहीं है, वहाँ नींद नहीं है। नींद ही प्रमाद है, यह समय है, यह मन है, यह अतीत है, यह भविष्य है। वहाँ कहंे तो निर्विचारता है। वहाँ शरीर तो सक्रिय होगा, पर मन निष्क्रिय होता चला जाता है। उसे भुना हुआ बीज भी कहा जाता है। उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। मन की पहचान हमेशा विचारणा, अवधारणा और कल्पनाओं में ही होती है। कामना का भी जन्म भविष्य में होता है। वर्तमान में कामना खड़ी ही नहीं हो पाती है। वर्तमान वही है, जहाँ किसी प्रकार का ‘कल’ नहीं है। आपने ही बताया था कि श्री ”क“, अपनी पत्नी श्रीमती ख से बात कर रहे थे, श्री नहीं थी। श्रीमती स वहीं थीं, श्री क ने कुछ कहा था। श्रीमती ”रव“ ने कुछ और सुना, उनकी बातें तीखी हो गईं। वे अतीत में जाकर बोलीं, ये तो पहले भी कभी मुझसे खुशनहीं थे, आज भी नहीं। इनकी बीमारी में मैंने कितना ध्यान रखा। वे बोली चली जा रही थी। श्री ”क“े कहना, कुछ और चाह रहे थे, उनको दो घंटे बाद ही सत्संग भवन से दूर अपने घर जाना था। श्रीमती ”स” जो पास बैठीं थीं, कुछ और कहने लग गईं थीं। श्री क ने कहा, आप तो मेरे पक्ष में थी, ये अचानक क्या हुआ? आपने ही बताया था तीनों अपने-अपने आंतरिक ”मानोलॉग में जाकर बतिया रहे थे, क्यों? सब अपने आप में ही बतियाते है, उनकी अपनी दुनिया में है, जहाँ वे है, जब दूसरा कोई आता है, वे उसे अपनी ही दुनिया में लाना चाहते हैं। पास आते है, कुछ ही देर में संघर्ष शुरु हो जाता है। सब अपने-अपने सपनों को अपनी-अपनी दृष्टि कोे दूसरे पर थोपना चाहते है। यही कल है, हर घर की यही कहानी है। बु(ि की लघुतम इकाई विचार है। जहाँ विचार है, वहाँ विकार है। दोनों एक ही है। यह भी सच है कि हम दूसरे के सपनों को नहीं देख पाते है और जब तक हम सपनों की दुनिया में है, हम सच को नहीं जान सकते है। सपने हमेशा अनवरत विचारणा में रहते है। जो भी समस्या है, वह वास्तविक है। उसका समाधान सपनों की दुनिया से नहीं हो सकता है। इसीलिए शब्द है, जागना, जो जागा है, वही साफ-साफ देख पाता है, कारण कहाँ है? अवधारणा, विचारना और स्मृति, स्वप्न जो यह मन की पहचान है, यह स्वप्न ही है। जब यह मन पूरी तरह विलीन हो जाता है, तब कहा जाता है कि वह जग गया है। इसीलिए मैंने पहले कहा था कि यहाँ बु(ि शत-प्रतिशत शु( हो जाती है, तब विवेक जागता है। इस सपने में बु(िमता तो है, आप जानकार है, पर विवेकी नहीं हैं। अनंत यात्रा में कहा है,- ” कुृभ नीलकंठ से कहता है, तुम्हारा विवेक जाग्रत हुआ, मेरे जीवन का यही उद्देश्य था, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे।“ गुरु का लक्ष्य शिष्य को विवेकी बनाना है। जो कुछ मुझे कहना था, मैंने अनंत यात्रा में साफ-साफ कहा है। जो विवेकी है, वह अपनी आत्म प्रशंसा, आत्म-विज्ञापन सबसे परे चला जाता है। जहाँ तक पहचान की भूख है, वहाँ तक मन सक्रिय है। जहाँ मन की सक्रियता नहीं है, वहाँ अहंकार अपने आप गिर जाता है। ”तब उनमें और हम में फर्क क्या है?“ ‘कुछ भी नहीं, तुम भोजन करते हो। तुम्हारे साथ में भी करता हूँ। वर्षो से साथ है, क्या अन्तर पाया है?’ ‘आप ज्ञानी है।’ ‘आप कम है क्या?’ ”लोगों ने शास्त्रों के आधार पर कपोल कल्पित कहानियाँ गढ़ ली है। जहाँ मूल बात दब जाती है। मैं सबसे यही कहता हूँ, मेरे साथ रहो, मेरे पास आओ। भेद इतना ही है, मेरी पहचान नहीं है, मैं साधारण हूँ, सामान्य हूँ। आप विशिष्ट, आपकी पहचान है। आप पद पर हैं, वचास लोग मिलने आते हैं। जब आप विशिष्ट हैं, तब आप सबमें सामान्य देखते है। वह जो साधारणता है, वही आप सबमें पाते हैं, पर जो जाग्रत है, उसके बाहर का दृश्य गिर जाता है। वह सब जगह, सब में, वही एक भाव देखता है। वहाँ कोई भेद नहीं है। यह कोई समझने की चीज नहीं है। तर्क नहीं है, यह आचरण हो जाता है। बस यही भेद है। वहाँ न कोई आशा है, न निराशा, कुछ नहीं, बस यह एक रस आनन्द में है और उसके आस पास प्रेम घटता है, वही बचा रहता है, बस। तब आनन्द शेष रह जाता है।8 सत्य की खोज प्रश्न था- ”क्या सोचने से, मनन करने से, चिन्तन करने से सत्य को पाया जा सकता है? शास्त्र तो यही कहते हैं।“ ”सोचना ही जहाँ प्रारम्भ है, अंत है, वहाँ इससे परे भी है। इस पर स्वयं को ही विश्वास नहीं होता। जब मैं कहता हूँ, किसी बात को एक बार सोचो, पूरी तरह सोचो, अपने अहंकार को हटाओ, तय करो , पर उस पर भी विश्वास नहीं होता है। हम काम करते हैं, तब भी सोचते रहते हैं। काम होता रहता है, तब भी सोचते हैं। काम पूरा हो जाता है, उस पर उसके बाद भी सोचते हैं। यह पश्चाताप और प्रायश्चित शब्द तभी पैदा हुए हैं। जीवन तो विरोधाभासांे से भरा है। सब तरफ से हमारे पास हमें प्रवाहित करने के लिए विचारों का जाला फैला हुआ है, इतनी सूचनाएं पहले नहीं थीं। जीवन अपने आप शांत था, पर आज मनुष्य के मस्तिष्क का विकास इतना हो गया है कि उसके पास सब तरफ की हजारों जानकारियाँ हैं, वह यही जानता है कि वह सोचता है, इसीलिए वह है भी। पर सत्य, क्या है? यह भाषा का सच तो नहीं है। जहाँ तर्क शास्त्र से वाक्य की परीक्षा होती है या व्याकरण के हिसाब से वाक्य को पूरा किया जाता है। सत्य की खोज का अर्थ होता है। जीवन और जगत का आधार क्या है, जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? इस सृष्टि का आधार क्या है? ये प्रश्न कम होते-होते मनुष्य के पास आते है, दुःख का कारण क्या है? वह प्रकृति के रहस्य को जानना चाहता है? प्रश्न था- “पर क्या यह विचारों से जानना सम्भव है?” “पश्चिमी दर्शन का आधार तार्किक जांच है? वे बुद्धिसे परीक्षण करना चाहते हैं। पर सत्य तो बुद्धि के ही पार है। भारतीय ऋषि कहता है, नेति, नेति। उस दिन कोई कह रहा था, जो भले हैं, वे दुःख पाते हैं, जो दुष्ट हैं, वे समाज में खुश हैं, क्यांे? जीवन जो है, विरोधाभासों से भरा है। मार्क्सवादी ने इसका कारण सामाजिक व्यवस्था में देखा। जो मनोवैज्ञानिक हैं, वे उसके मन की ग्रन्थियों में बताया करते हैं, उनकी अपनी थियरी है। धार्मिक लोग कर्मकाण्ड में तलाशा करते हैं, पर सबकी अपनी सीमा है? एक ही वृक्ष की सभी पत्तियां अलग क्यों हैं? पता करंे, यह प्रकृति का स्वभाव है। एक ही क्यारी में, सब तरह की खुशबू के दस तरह के पौधे कैसे खिलतेे हैं। पता करें? यह सत्य जो है, यह बुद्धि से परे झांकने को कहता है, तब वह पाता है कि वह चुप हो जाता है। नहीं जान पाया है, तब भी चुप है। जान गया तो भाषा उसके पास नहीं है, हम अपने से आगे ही देख पाते हैं। पीछे नहीं, इन्द्रियाँ विषय को देखती हैं। मन , इन्द्रियों को देख पाता है, पर बुद्धि से परे क्या है, यह बुद्धि नहीं देख पाती है। इसी को ही रहस्य कहा जाता है। प्रश्न था- ”फिर हमारे सवाल भी तो हैं, वे बैचेन करते रहते हैं। (स्वामीजी चुप थे) (इसका उत्तर अगले दिन अपने आप मिल गया था ) उस दिन स्वामीजी के पास , चोयल साहब किसी रेल्वे के रिटायर्ड अधिकारी को लेकर आए थे। वे पास के सोफे पर ही बैठे। आते ही सवाल ही सवाल, उनके सवालों का अंत नहीं था। वे यह साबित करना चाह रहे थे, जितना उनका ज्ञान है, उतना किसी का नहीं। वे सवाल पूछते, पर उत्तर आने के पहले दूसरा सवाल। स्वामीजी शांत थे। बोले,” ये सवाल तो किताबों के हैं, आपने पढ़ा बहुत है, उत्तर भी आपके पास हैं। आपका ही कोई सवाल हो तो पूछें? सही सवाल हम पूछना ही नहीं चाहते हैं।जो हमारा सवाल है और उसका उत्तर भी हमारे पास है। सही सवाल को मस्तिष्क नहीं पूछ सकता? मन और मस्तिष्क का गठजोड़ जब टूटता है, जब स्मृति का दबाव हट जाता है, तब सही सवाल पैदा होता है, सही सवाल वह है, जो तुम्हारा है? तुम अपने सवाल को न्यायोचित ठहराने के लिए उसे अधिक से अधिक सब लोगों का बनाने का प्रयास करते हो। मुझ में आत्म विश्वास की कमी है? तुम पूछते हो, महिलाओं में आत्म विश्वास कम क्यों है? सही सवाल वहीं पैदा होता है, जहाँ मस्तिष्क चुप हो जाता है, तब पुकार हृदय में उठती है और तब उत्तर वहाँ अपने आप उपस्थित हो जाता है? यह उत्तर बुद्धि नहीं देती है। यह विवेक देता है। बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक में ढल जाती है। अब विवेक कौंधता नहीं है, वरन स्पष्ट हो जाता है। विवेक जहाँ है, वहाँ बुद्धिहै, शांत है, निश्चयात्मक है। जहाँ अवेयरनेस है, वहाँ एकाग्रता भी है। पर जहाँ मात्र बुद्धिमत्ता है, वहाँ विवेक हो, आवश्यक नहीं है। जहाँ एकाग्रता हो, वहाँ अवेयरनेस हो, जरुरी नहीं है। यह विरोधाभास शाब्दिक नहीं है, उसकी प्रकृति में है। मन का स्वभाव द्वन्द्व में है, प्रकृति द्वन्द्वात्मक है। द्वन्द्व में ही गति है। मन की गति, मन की शक्तिहीनता है। मन की शक्ति निर्विचारिता है। जो बुद्धिमान है, वह उसे बकवास मानता है। आप दिन-रात को एक कैसे कह सकते हैं?पाप और पुण्य को अलग मानते हैं? हम स्वर्ग और नरक को भी दो मानते है। मोक्ष तो एक ही है। यह भी आप मानते हैं। वहाँ कोई द्वन्द्व नहीं है। मोक्ष शब्द शांत मन की उपलब्धि है। वहाँ दोनों ही गिर गए। शास्त्र कहता है, वृक्ष से ”यमलार्जुन“, प्रकट हो गए। वृक्ष में मन बस सुप्त है, पर प्राण हैं। वैज्ञानिक कहते है, पौधे भी बागवान को देखकर हर्षित होते हैं, पर हम निरन्तर कुल्हाड़ी लिए रहते हैं। हृदय की ही तो एकता है, पर बुद्धि में भटकाव है। शास्त्र कहता है बुद्धि का पुत्र अहंकार है, उसका पुत्र मन है। जब हम कहते हैं, पंच महाभूतों से शरीर बना है,तब हम पृथ्वी का इतना दोहन व शोषण क्यों करते हैं? हम अपने ही शरीर के आवश्यक अंगों को, उसके कारण को दूषित करते जा रहे हैं? हमारे शास्त्रों ने इसे तभी धरती ‘माँ’ कहा था। धरती पर वृक्ष खड़ा होता है, फूल आते हैं,फल आते हैं, धरती पर सब गिरते हैं।फिर वर्षा आती है, अंकुरण फिर हो जाता है, यह अस्तित्व है। वह नाना रुपों में स्वतः अभिव्यक्त हो रहा है, क्या कारण है? मैंने पहले कहा था, ”कारण रहित कारण,“ यहाँ बस हो रहा है। इसके साथ एकरसता पाना ही, अस्तित्व के समीप आना है। अब तो विज्ञान है, प्रयोगशालाएं हैं,पर पहले वनस्पति का ज्ञान कैसे होता होगा? यह तीसरा रास्ता भी है, वहाँ वस्तु स्वयं अपने आप को प्रकाशित कर देती है। पर यह ‘सत्य’ बुद्धि से नहीं पाया जाता, यहीँ विरोधाभास है। वहाँ पर जो दर्पण है, वहाँ वस्तु अपने स्वभाव को प्रकट कर देती है, यही जानना ध्यान है। हम मन से ही सवाल करते हैं, और मन से ही उत्तर जानना चाहते हैं, मन विरोधाभासी है, वह संतुष्ट नहीं होता है, वहाँ असंख्य प्रश्न हैं।“ आपने पूछा है, डॉ बसावड़ा जो अमरीका से आए थे, उनमें क्या खास बात थी। बात क्या खास होगी।इतने बडे़ मनोवैज्ञानिक थे, पर वे जब सुनते थे, पूरी तल्लीनता से सुनते थे, मानों वे शब्दों को घूंट-घूंट के पी रहे हों। जब हम हृदय से सुनते है, वहाँ प्रश्न उठते ही नहीं है। क्योंकि वहाँ उत्तर अपने आप आना शुरु हो जाता है। प्रश्न वहीं तक खडे़ होते हैं, जहाँ तक मन है। वहीं तक सारे विरोधाभास हैं। इसीलिए संतों ने दर्शन शब्द को पास नहीं आने दिया। दर्शन और ग्रन्थ बाद में आते हैं, ये बुद्धि की उपज है। जहाँ एक ही सवाल के हजारों उत्तर तैयार हैं। सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं, मेरी छोटी सी थियरी है, ”वर्तमान में रहो,“ बस।“ प्रश्न था- ”वर्तमान है क्या?“ ”यह आप पता लगाओ, जहाँ तक आपका मन है, समय में है, वहाँ अतीत है, स्मृति है और कल्पना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ मन नहीं है, वहाँ समय नहीं है, वहाँ बस है, अस्तित्व है। शास्त्र में उसे ‘ज्ञानी’ कहा है, ‘ज्ञान’ वर्तमान में ही है। स्मृति मे सूचना है, भंडार है, जो अनुपयोगी है। शब्द है, ध्यान, जागना, स्मृति भी नींद है, कल्पना भी नींद है, अनावश्यक विचारणा भी नींद है। उसे भी दिवा स्वप्न कहा जाता है। ड्रीमींग थी , सब सपना है। जहाँ जगना है, वहाँ नींद नहीं है, वहाँ समय नहीं है। जब हम विचारधारा के दबाव से परे चले जाते है, वहाँ फिर सपने देखना बंद हो जाता है। तब नींद खुलती है, जहाँ तक मन है, समय है, समय में ही ड्रीमींग है। गहरी नींद है। जगना और ध्यान,अवेयरनेस, शब्द एक ही बात को बता रहे हैं।जब हम इस वर्तमान को शब्द देना चाहते हैं, वह यह है, वह तुरंत अतीत में चला जाता है। मन विचार है और विचार ही विकार है। यह सीधी सी समझने की बात है।मन चाहता है, वह अधिक से अधिक संग्रह रखे। उसे अधिक से अधिक खूंटिया चाहिए। समझाने के लिए जो कहा गया, वह भी सीढ़ी बन जाती है। क्योंकि जहाँ खाली मन आया, वहाँ मन नहीं रहता है। मन तो गति है, उर्जा है, उसका नाश तो नहीं होगा। पर वह गति अंतर्मुखी होकर अंतर्मन में विलीन हो जाती है। पर मन यह हाँ कोई सपना नहीं है, वहाँ नींद नहीं है। नींद ही प्रमाद है, यह समय है, यह मन है, यह अतीत है, यह भविष्य है। वहाँ कहंे तो निर्विचारता है। वहाँ शरीर तो सक्रिय होगा, पर मन निष्क्रिय होता चला जाता है। उसे भुना हुआ बीज भी कहा जाता है। उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। मन की पहचान हमेशा विचारणा, अवधारणा और कल्पनाओं में ही होती है। कामना का भी जन्म भविष्य में होता है। वर्तमान में कामना खड़ी ही नहीं हो पाती है। वर्तमान वही है, जहाँ किसी प्रकार का ‘कल’ नहीं है। आपने ही बताया था कि श्री ”क“, अपनी पत्नी श्रीमती ख से बात कर रहे थे, । श्रीमती स भी वहीं थीं, श्री क ने कुछ कहा था। श्रीमती ”रव“ ने कुछ और सुना, उनकी बातें तीखी हो गईं। वे अतीत में जाकर बोलीं, ये तो पहले भी कभी मुझसे खुश नहीं थे, आज भी नहीं। इनकी बीमारी में मैंने कितना ध्यान रखा। वे बोली चली जा रही थी। श्री ”क“े कहना, कुछ और चाह रहे थे, उनको दो घंटे बाद ही सत्संग भवन से दूर अपने घर जाना था। श्रीमती ”स” जो पास बैठीं थीं, कुछ और कहने लग गईं थीं। श्री क ने कहा, आप तो मेरे पक्ष में थी, ये अचानक क्या हुआ? आपने ही बताया था तीनों अपने-अपने आंतरिक ”मानोलॉग में जाकर बतिया रहे थे, क्यों? (यहाँ वास्तविक नाम हटा दिए हैं) सब अपने आप में ही बतियाते हैं, उनकी अपनी दुनिया में है, जहाँ वे हैं, जब दूसरा कोई आता है, वे उसे अपनी ही दुनिया में लाना चाहते हैं। पास आते हैं, कुछ ही देर में संघर्ष शुरु हो जाता है। सब अपने-अपने सपनों को अपनी-अपनी दृष्टि कोे दूसरे पर थोपना चाहते है। यही कल है, हर घर की यही कहानी है। बुद्धि की लघुतम इकाई विचार है। जहाँ विचार है, वहाँ विकार है। दोनों एक ही हैं। यह भी सच है कि हम दूसरे के सपनों को नहीं देख पाते हैं और जब तक हम सपनों की दुनिया में है, हम सच को नहीं जान सकते है। सपने हमेशा अनवरत विचारणा में रहते हैं। जो भी समस्या है, वह वास्तविक है। उसका समाधान सपनों की दुनिया से नहीं हो सकता है। इसीलिए शब्द है, जागना, जो जागा है, वही साफ-साफ देख पाता है, कारण कहाँ है? अवधारणा, विचारना और स्मृति, स्वप्न जो यह मन की पहचान है, यह स्वप्न ही है। जब यह मन पूरी तरह विलीन हो जाता है, तब कहा जाता है कि वह जग गया है। इसीलिए मैंने पहले कहा था कि यहाँ बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जागता है। इस सपने में बुद्धिमता तो है, आप जानकार हैं, पर विवेकी नहीं हैं। अनंत यात्रा में कहा है,- ” कुृभ नीलकंठ से कहता है, तुम्हारा विवेक जाग्रत हुआ, मेरे जीवन का यही उद्देश्य था, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे।“ गुरु का लक्ष्य शिष्य को विवेकी बनाना है। जो कुछ मुझे कहना था, मैंने अनंत यात्रा में साफ-साफ कहा है। जो विवेकी है, वह अपनी आत्म प्रशंसा, आत्म-विज्ञापन सबसे परे चला जाता है। जहाँ तक पहचान की भूख है, वहाँ तक मन सक्रिय है। जहाँ मन की सक्रियता नहीं है, वहाँ अहंकार अपने आप गिर जाता है। प्रश्न था- ”तब उनमें और हम में फर्क क्या है?“ ‘कुछ भी नहीं, तुम भोजन करते हो। तुम्हारे साथ में भी करता हूँ। वर्षो से साथ हैं, क्या अन्तर पाया है?’ ‘आप ज्ञानी हैं।ं’ ‘आप कम हैं क्या?’ ”लोगों ने शास्त्रों के आधार पर कपोल कल्पित कहानियाँ गढ़ ली है। जहाँ मूल बात दब जाती है। मैं सबसे यही कहता हूँ, मेरे साथ रहो, मेरे पास आओ। भेद इतना ही है, मेरी पहचान नहीं है, मैं साधारण हूँ, सामान्य हूँ। आप विशिष्ट हैं, आपकी पहचान है। आप पद पर हैं, पचास लोग मिलने आते हैं। जब आप विशिष्ट हैं, तब आप सबमें सामान्य देखते है। वह जो साधारणता है, वही आप सबमें पाते हैं, पर जो जाग्रत है, उसके बाहर का दृश्य गिर जाता है। वह सब जगह, सब में, वही एक भाव देखता है। वहाँ कोई भेद नहीं है। यह कोई समझने की चीज नहीं है। तर्क नहीं है, यह आचरण हो जाता है। बस यही भेद है। वहाँ न कोई आशा है, न निराशा, कुछ नहीं, बस यह एक रस आनन्द है और उसके आस पास प्रेम घटता है, वही बचा रहता है, बस। 10 बंधन और मुक्ति ”क्या मुक्ति यही है?“ ”मुक्ति किससे, जाना कहाँ है? छुटकारा किससे? बंधन है क्या? विचार तो कभी करते नहीं है। वस्तु है, व्यक्ति है, परिस्थितियाँ हैें, ये कहाँ है? बाहर जो घट रहा है, उसे आप बदल सकते हैं क्या? ये असंख्य लोगों के संकल्प हैं। संकल्प ही सृष्टि है? बंधन और मुक्ति दोनों ही शब्द आपस में उलझे हुए हैं। पुरानी कहानी है-किसान गाय को बांध कर ले जा रहा था। गुरु ने शिष्य से पूछा-किसनेे किसको बांधा है। शिष्य बोला-किसान ने गाय को रस्सी से बांध रखा है।गाय बंधी हुई है। गुरु ने पूछा, रस्सी टूट गई तो? तभी रस्सी टूट गई। गाय भाग रही थी। पीछे-पीछे किसान भाग रहा था। यही बंधन है। वस्तु हमें नहीं बांधती, न परिवार, न नौकरी, न धन, हम स्वयं बंधे हुए हैं। बंधन हम में ही है। बंधन का स्वरुप क्या है? क्या वहाँ रस्सी है? बंधन मात्र विचार है।विचारों से मुक्ति ही बंधनों से मुक्ति है। पुरानी कहावत है। दृश्य का चिन्तन ही पराधीनता है। जब दृष्टा बनते हैं, तभी दृश्य का पता लगता है। एक दृश्य बाहर है, उसकी ही अनुकृति भीतर है, वह निरन्तर प्रवाहित है। जब उसे देखने का अभ्यास होता है, तब पता लगता है, जो दिख रहा है, जो देख रहा है, वे एक होते हुए भी दो हैं। यह दृष्टा जब इस दृश्य का बार-बार चिन्तन करता है, तब यह उसे संस्कार रुप में ढालता चला जाता है। वह नचाता है, यह नाचता है। यही बंधन है। प्रश्न था- ”फिर कौन छुटकारा देगा?“ कोई गुरु, कोई ग्रन्थ, कोई नहीं, कोई दूसरा नहीं। हम प्रायः दूसरों को दोष देते हैं कि उसने बांध रखा है, दूसरा ही आकर हमारा उद्धार करेगा। शास्त्र में अवतार की प्रतीक्षा का यही रहस्य है। दूसरे को न तो तुम्हें बांधने की जरुरत है, न तुम्हारे बंधन से मुक्त होने की। जैसे हर वस्तु दूसरी है, उसी तरह तुम जिसे ईश्वर कह कर मांगते हो, उसके आश्रय में चले जाते हो, वह भी दूसरा ही है। गीता में बार-बार कहा गया है, पर सुनता कोई नहीं है।‘माम’ जो है, वह दूसरा नहीं है। वह तुम्हारा ‘आत्मरुप’ है, तुम्हारा‘स्व’ है, वह तुम्हारी अपनी ही निजता है। उसकी ही शरण में जाना, अपने निज स्वरुप को पाना है। उससे दूरी विचारों की है, विचार मन स्वरुप है। भाव के वह समीप है। मन जब अंतर्मुखी होता है। तब गीता का दूसरा अध्याय उस रहस्य को खोलता है। जिसे प्रसाद कहा जाता हे, वही यह भाव की प्राप्ति है। यहाँ विचार और विकार खो जाते हैं। विचार ही विकार है। जब अंतःकरण राग-द्वेष से रहित होता है, तब यह शुद्धता प्राप्त होती है। विषय भी रहेंगे, वस्तु भी होगी, इन्द्रियाँ भी होगी। पर मन जो है, वह नियंत्रित है, यहाँ मुक्ति सहज है। पर हम मुक्ति को बाहर तलाश करते हैं। न बाहर से किसी ने बांधा है, न कोई बांध सकता है। बंधने वाले हम ही हैं। हनुमानजी लंका में गए। स्वतः ही अपनी इच्छा से नागपाश में बंध गए। वे तो मुक्त थे, पर जानते थे ‘पाश’ की मर्यादा रखनी है। बंध गए। वही यहाँ है, जो सोया हुआ है, वह प्रमाद में कार्य कर रहा है, बस कर रहा है, क्यों? पता नहीं, पर जो जागा हुआ है, वह होश में है, वह जानते हुए भी, जागे हुए ही कर रहा है। काम तो दोनों को ही करना पड़ता है। प्रश्न था- ”तो क्या यह सेवा है?“ ”सेवा सहज कर्म है। करना तो पडे़गा ही। प्रकृति कार्य कराती है। कहा गया है ‘ दाइ विल बी डन“ ’ यहाँ अंतःप्रेरणा प्रमुख हो जाती है। अपनी कोई इच्छा नहीं होती। किसके लिए क्या करना है? गुणों की उपासना नहीं होती। यह तो दिखाने की सेवा है। जहाँ दान का दिखावा है,वहाँ प्रशंसा पाने की भूूख है। लोग देश सेवा के लिए जेल गए, बहुत से शहीद होगए। पर जो आज बूढ़े बचे हैं, वे पेंशन पाने के लिए तत्पर हैं। जहाँ कुछ पाने की लालसा है, वहाँ भोग की कामना है। यह सेवा नहीं है। सब एन.जी.ओ. हो गए हैं। जहाँ जाग्रति है, बोध है, वहीं प्रेम है, वहीं त्याग है, वहीं सेवा है। सबकी सेवा ही अहंकार को तोड़ सकती है। यही आत्म बीज का कठोर आवरण है। नारियल के भीतर पानी है, पर बाहर कठोर कवच चढ़ा होता है। वह टूटता है, तब पानी मिलता है। यह मन अपने न मिटने के लिए पचास उपाय तलाश करता है। मिटने की बात भी समझाने के लिए है। मन तो उर्जा है। उसका विनाश नहीं होगा। हाँ, नियंत्रित मन, एकाग्रता को पाकर, अंतर्मुखी हो जाता है। तब जो उर्जा बाहर बह रही थी, वह भीतर की ओर लौटने लगती है। मन का मस्तिष्क से सम्बन्ध हट जाता है, भीतर हृदय से हो जाता है। यह हृदय भी तुम्हारा बायोलोजिकल हार्ट नहीं है। पर यह है। यहाँ डिवोशन है। जब तक मन मस्तिष्क में है, तर्क हैं, वह साधक है, वह शिष्य है, वह विद्यार्थी है, पर जब अंतर्मुखी होता है। वहाँ सारे प्रश्न ही गिर जाते हैं। उत्तर उसे स्वयं प्राप्त होने लगते हैं। वहीं प्रेम की अनभूति भी होती है। यहीं वह मुक्ति है, जहाँ बंधन नहीं है। कोई भटकाव नहीं होता है। बुद्धि सम होती है, फिर निश्चयात्मक होती हुई विवेक में ढल जाती है। मैंने पहले भी कहा था, विवेक अलौकिक होता है। विवेक प्राप्त होना ही गुरुतत्व का पहला लक्षण है। गुरु शिष्य के विवेक को ही जाग्रत करता है। विवेक की धरती पर पुराना कचरा जल जाता है। संग्रह समाप्त होने लगता है। जब पुराना सामान हटता है, तभी नया भी आ सकता है। हम चाहते हैं, पुराना भी रखा रहे, और नया भी आ जाए, पर यह क्या संभव है।जब विवेक का आदर होना शुरु होता है, तब बुद्धि चातुर्य का दबाव छूटना शुरु हो जाता है। जैसे बच्चे को प्रारम्भ में सीखने के लिए स्लेट-बत्ती दी जाती है, पर बाद में जब कॉपी पर लिखता है, वह भी छूट जाती है। प्रारम्भ में जो उपाय दिए जाते हैं, वे सारहीन हो जाते हैं। व्यर्थ की साधनाएं छूटने लगती हैं। पर जो प्रबुद्ध है, ज्ञानी है, वह जानता है कि उसके आचरण को तो लोग नहीं समझेंगे। पर जो अंधानुसरण में जो कर रहे है, वह भी छोड़ देंगे, तो उससे उनका अहित और भी हो जाएगा। वह इन रुढ़ियों के प्रति भी चुप हो जाता है, वह प्रकट नहीं करता। हजारों सालों से चली आ रही परम्परागत साधनाओं का यही मूल्य है कि ये जिज्ञासा को पैदा तो करती हैं। गौतम बुद्ध ने इसीलिए, उन सवालों को पूछने के लिए ही मना कर दिया था, जो मात्र बौद्धिक कौतुहल ही पैदा करते है। संत कबीर ने रुढ़ियों पर, परम्परागत साधनाओं पर, अंध विश्वास पर प्रहार भी किया, सही रास्ता भी बताया। पर हुआ क्या, लोग आधा कबीर ही पढ़ते है। जहाँ प्रहार किया, वह उन्हें रुचिकर है, वे उसके तत्व की बात को बोझिल मानकर छोड़ देते है। बात एक ही है। समय कम है और संग्रह बहुत है। भटकाव बहुत है। भटकाव तुम्हारा ही है। तुम्हारे विचारों का है। उन्हें तुम ही कम कर सकते हो। कोई दूसरा नहीं, मैं भी नहीं। करना तुम्हें ही है। यहाँ पाने के नाम पर कुछ भी नहीं है। कोई उपलब्धि नहीं। हाँ, शांत व शक्तिशाली रहना हम सभी चाहते हैं, वह यहाँ रहने की कला है। इसीलिए कुछ पाने की लालसा में यहाँ आए हो, तो व्यर्थ है। मैं छू लूंगा। तुम्हारे कर्म फल कट जाएंगे, यह सोचना ही व्यर्थ है। जो यह समझा रहे हैं, कह रहे हैं, वे दुकान चलाकर माल बेच रहे हैं। धोखा ही धोखा है। कर्म का फल अटल है, वह तो भोगना ही होगा। इसीलिए कर्मकांड व्यर्थ है। निरर्थक है। बस मन घबराए नहीं। व्यक्ति में आशा बनी रहे, इसके लिए उपाय है। इससे अधिक नहीं। महत्वपूर्ण तुम्हारा जगना है। तुम्हारी जागरुकता है । जितने विचार होंगे, विचारधारा सघन होगी, उतनी ही गहरी नींद होगी। तुम्हारी नींद टूट जाए, यही गुरु का रास्ता है। अनंत यात्रा में बताया है, उसे समझो, रानी चूड़ाला नीलकंठ को समझाती है कि व्यर्थ की साधनाओं से कुछ होने वाला नहीं है। वह अपने पति राजा शिखिध्वज को तो गुरु रुप में उपस्थित होकर ज्ञान देती ही है। नीलकंठ को भी समझाती है। तुम्हारा विवेक जाग्रत हो गया है, यही मेरे जीवन का उद्देश्य था। क्या पता इसके बाद मेरा शरीर रहे अथवा नहीं? गुरु का उद्देश्य मात्र शिष्य का विवेक जागरण है। विवेक जाग्रति बोध, जागरूकता, अवेयरनेस, संज्ञा कुछ भी हो, पर सारतत्व यही है। जहाँ वह निरन्तर अपने आत्म तत्व से जुड़ा हुआ सचेत है। यही मुक्ति है। उसकी अपने बंधनों से पहचान कर उनसे हटते चले जना ही मुक्ति पथ है। 11 कर्मशील बनो ”मै वही तो हूँ।“ जो दूसरों की आंखों में बहुमूल्य होना चाहता है, वह अपने आप से दूर चला जाता है। बस में हूँ, जो हूँ, वही हूँ। तुम्हारी आँखों में तुम्हारी उम्मीदों के अनुसार बनने के लिए, जो ”मैं हूँ“, उससे हटना पड़ता है। अपने स्वभाव को पाना ही सार है। यही स्वधर्म है। मैंने पहले कहा था, यहाँ छोड़ना नहीं पड़ता, जो छूटना होगा, वह स्वाभाविक ही होगा, वह छूटता चला जाता है। वस्तु जगत ऐसा ही रहता है, रहेगा, पर पकड़ चली जाएगी। पकड़ता मन है। जहाँ मन नहीं है, वहाँ पकड़ना भी नहीं है।यह जो आसक्ति है, अपने आप कम होती है। तुम छोड़ने और छूटनेे की चिन्ता मत करो। जैसे-जैसे पहाड़ पर उसकी चोटी पर पहुँचना शुरु होता है, नीचे ही भारी सामान छूटने लग जाता है। भार की पहचान अपने आप होती है। बोझा अपने आप हटता है। दार्शनिक हर अनुभव को जब शब्द में गढ़ते है, तब बाद वाले उस शब्द तक आने की सीढ़ी बना लेते है। दोनों ही अनावश्यक हैं, मूल बात प्रयोग की है। यह बात सही है, जितना वह अपने आप से जुड़ता जाता है, उतनी ही सरलता उसके भीतर आती जाती है। सरलता व त्याग कोई ओढ़ने वाली चादर नहीं है। सादगी कपड़ों से नहीं आती। यह सहज है, वह भीतरी है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है। किसको क्या दिखाना है, जहाँ दिखने की चाह है, वहाँ जगत है। वहाँ मन सक्रिय है। वहाँ यह बोध ही नहीं है कि मैं कोई विशेष हूँ। वहाँ कोई परम्परागत अवधारणा नहीं है, न ही पवित्रता है, न अपवित्रता। जब गुरुकुल चलाया था, बच्चों को लेकर पर्यटन पर भी जाता था। मैंने कहीं पूजा-पाठ नहीं किया, न सिखाया। एक ही बात बताई, कर्मशील बनो। यहाँ गुरुकुल में केाई मंदिर नहंीं है। व्यायाम शला बनाई थी। वहाँ बाद में हनुमान जी की प्रतिमा लोगों ने लगा दी। यहाँ कोई यज्ञ या अनुष्ठान नहीं हुआ। बाद में लोग करने लगे। मैंने यही कहा, आप जो चाहंे, करंे, आपकी स्वाधीनता है, पर मैं कुटिया से नीचे नहीं उतरुंगा। क्यों,...... मैं ज्ञानी हूँ, मैं भक्त हूँ, यह जो मान्यता है, व्यर्थ है,... मैं,..... मैं ही हूँ, बस। यह कहना कि मैं वह हूँ,..... यह भी एक अतिश्योक्ति है। यह वाक्य भी ‘योग वशिष्ठ’ से आया है। यह भी अहंकार की सूक्ष्म छाया है। जहाँ भी हमने अपने आपको दूसरों से विशेष , पवित्र असाधारण माना, हम नीचे आ गिरे। पतन की कोई सीमा नहीं है। पहले आपको बताया था, कानपुर के विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में गया था। मंच पर बहुरुपियों की भीड़ थी। वहीं पर ही लोग छोटे-छोटे आइनों में अपना चेहरा ठीक कर रहे थे। हाँ भीड़ में अवश्य जो सामने थे, कुछ लोगों का प्रभामंडल दिखाई पड़ा। वे जरुर पवित्र थे, साधक थे। हम लोग नामों से, प्रभावित हो जाते हैं। यहाँ तो अपनी पहचान भी रहे, इसकी भी जरुरत नहीं है।“ प्रश्न था -” इस साधारणता से क्या आशय है, क्या पाया है?“ ”यहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं है। कुछ पाना है, आप नौकरी कर रहे है, प्रशासक हैं। कार है, बंगला है, सुख- सुविधाएं है, वेतन मिलता है। पाने के लिए कुछ करना पड़ता है। यहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं है।“ प्रश्न था- ”पर कुछ तो है, जो हमारे पास नहीं है।“ ”क्या है, पता करंे।“ ”आपके पास से उठने का मन नहीं होता। मैं ही क्या जो भी आता है, जाता ही नहीं है। आप ही जाने को कह देते है। आपके पास एक ऐसी आभा है, चमक है, जो हमारे पास नहीं है, आप शांत है, आप अविचलित हैं।“ ”बस..... पर मैं भी आपकी ही तरह हूँ। हाँ, जो जितना साधारण होता चला जाता है, वह सब जगह उसी एक को देखता है। शास्त्र में कहा है, जो आपको पत्र में लिखा था। ‘आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेषु हिते रतः।’ यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। सब में वह एक ही है, और उस एक में जो सबको देखता है, उसका योग-क्षेम प्रकृति स्वयं वरण कर लेती है, तब वह जो कहता है, वह जो करता है, वह जो चाहता है, वह स्वयं वहाँ नहीं होता । प्रकृति ही उससे करवाती है। इसीलिए प्रकृति की शक्तियाँ उसे स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। कई बार तो यह पता भी नहीं होता, कौन आया था, क्यों आया था? पर जब उसके संकल्प स्वतः पूरे हो जाते हैं, तब प्रकृति की महान शक्ति का पता लगता है। क्योंकि यहाँ अपनी कोई चाह नहीं है। यह जो खालीपन है, पात्र खाली तो है, बाहर की दुकान तो उठ गई है, पर भीतर वह स्वयं अभिव्यत होने लगता है।...... शास्त्र कहते हैं, संतों ने इसे कई तरह से कहा है, पर सही कहा, उत्तर..... नेति, नेति ही है। प्रश्न था- ”इसके लिए क्या करंे?“ ”फिर वही बात, उत्तर खुद तलाश करो, प्रश्न पूछना बंद करो। जो प्रश्न पूछता है, उसे देखो, वह सिर्फ अपने अहंकार की तृप्ति के लिए सवाल पूछता है कि वह ज्ञानी है। जब उत्तर स्वयं आने लग जाएँ, तब चुप हो जाना। तब उस खालीपन में प्रश्न अपने आप गिर जाते हैं। पतझड़ में पत्ते वृक्ष पर ठहर नहीं सकते। अनावश्यक बोझे को प्रकृति स्वयं हटा देती है। उसका नियंत्रण, उसका शासन सर्वोपरि है। उसके नियमों के प्रतिकूल जाना कठिन है। उसकी समझ ही वास्तविक ज्ञान है। सारा ब्रह्माण्ड एक नियम के अधीन है। व्यक्ति, समाज, राजा,राष्ट्र कोई इस नियम से बाहर नहीं है। छोटी सी बात है, अधिक से अधिक वर्तमान में रहने का अभ्यास हो। जागरूक रहना, अवेयर रहना ही साधन है। जागरूकता या अवेयरनेस ही साध्य है। जहाँ अवेयरनेस है, वहाँ स्मृति नहीं है। तब वहाँ मात्र वर्तमान है। वहाँ स्मृति से भविष्य का प्रक्षेपण भी नहीं है। भले ही अभी एक विचार और दूसरेे विचार के बीच का गेप या अंतराल अनुभव में आए, पर धीरे-धीरे वह गेप बड़ा होता जाता है। यहाँ मन तो निष्क्रिय होगा, पर शरीर गतिशील रहेगा। मन जब अंतर्मुखी होता है, तभी पता लगता है, जीवन का उद्देश्य क्या है? इस महारास में अपनी भूमिका का भी पता लगता है।“ प्रश्न- ”पर आपने अपने आपको इतना छिपाकर क्यों रखा है?“ ”कहाँ छिपाया है, मेरी कुटिया का दरवाजा हमेशा खुला रहता है। वहाँ ताला ही नहीं है। एक बार डकैत आए थे। पास के गाँव में डाका डालने जा रहे थे। रात का एक बजा होगा। प्यास लगी होगी। तब बाहर लालटेन को कम रोशनी कर रख के रख देता था। मुझे लगा बाहर कोई है। पूछा-कौन है? कोई बोला, पानी पीना है। मैंने कहा, बाहर बाल्टी रखी है, लालटेन तेज करो, कुएं से भर लो। थोड़ी देर बाद किसी ने किवाड़ धकेला। दो-तीन लोग अन्दर आ गए। उनके पास हथियार थे। मैं तख्त पर बैठ गया। पूछा, ”कहाँ से आ रहे हो?“ ”तभी कोई बोला, तुम्हें डर नहीं है, हम डकैत हैं।“ ”अरे! मैं हँसा, मैंने कहा, मैं भी हूँ।“ वे चाैंके। वे नीचे बैठ गए। बातंे होने लगीं। बाते होते-होते सुब्ह के चार बज गए होंगे। वे बोले, ”चलें आपकी बातों में हम उलझ गए। फिर देखा जाएगा।“ मैं हँसा, मैंने कहा, ”मैंने सही कहा था, न।“ भय किससे ? भय वहीं होता है, जहाँ आप समाज में विशिष्ट होना चाहते है, आपकी विशिष्टता खो न जाए, आप भयभीत हो जाते हैं। उन्होंने पूछा था, ”आपकी सम्पत्ति क्या है?“ मैंने कहा, ”एक थैला, जिसमें दाढ़ी का सामान, चश्मा व एक आधी धोती व छोटा कुर्ता है, बस, ले जाओ।“ आप देखते है, जब भी कहीं जाना होता है, थैला उठाया और चल दिया। मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखता। यहाँ पर था, जिस भी काश्तकार ने खाना लाकर दे दिया, खा लिया। एक रोटी, कांदा(प्याज) से पेट भर गया। बस कभी किसी की जाति नहीं पूछी। इसीलिए मैं संतों की बिरादरी में नहीं रहा। वे कहते थे, गृहस्थों में क्यों ठहरता हूँ? मैं कहता, उनको मेरी अधिक जरुरत है। वो कहते,पैसा क्यों नहीं पास रखते? मैं कहता, प्रकृति का खजाना रखा है, जितनी जरुरत होगी, आ जाएगा। सवाल आपके विश्वास का है, जो जाग्रत है, उसके शब्द भी वहीं से आते हैं। वही तो इस देह का संचालन करता है। यह बात बुद्धि से समझने और समझाने की नहीं हैं। न चिन्तन की है। समझा है, तो प्रयोग करो। जब उस खालीपन में रहना शुरु होता है, वहाँ विराट स्वयं अभिव्यक्त हो जाता है। तब जो कहा जाता है, जैसे रहा जाता है, जो किया जाता है, वह सहज, सरल, स्वाभाविक हो जाता है। वहाँ सौन्दर्य स्वतः खिलता है। प्रकृति की खुशबू, उसका सौन्दर्य उसका अपना है। वहाँ बाहर से सामान लाकर चेहरा चमकाने की जरुरत नहीं होती है। जो इस रास्ते पर है, सही तरह से है, वह फिर समाज में कुछ होने की इच्छा खो देता है। न समाज उसे समझ पाता है, न उसे समाज को समझाने की जरुरत होती है। पर उसके पास असंतोष नहीं है, खिन्नाता नहीं है। वह प्रसन्न है। वह जानता है मठ, सम्प्रदाय, शिष्य, जमात, यह सब उस झूठे, अहंकार के ही धक्के है, जो उसे विशिष्ट होने के लिए प्रेरित कर रहे है। वह मुक्त है, पर प्रकृति के बंधन में बंधा है। प्रकृति के नियमों के विरुद्ध वह नहीं जाता। कभी चला जाता भी है, पर जानता है, इसका भोग उसे भोगना नहीं पड़ेगा। यह कायर नहींहोता। हाँ, प्रकृति जो कार्य उससे करवाना चाहती है, वह वहाँ उसे पूरी शक्ति से करता है। दुनिया उसे महान मानती है या बंकम, यह शब्द डॉ. बसावड़ा ने चोयल से कहाथा, , ”मैं किसी बंकम से मिलना नहीं चाहता। पर जब मिलने आए, तो जाने का नाम नहीं लिया। फिर अमरीका से गुरुकुल भी आते रहे। मैं पूछता था, आप तो इस बंकम से मिलना नहीं चाहते थे।...... फिर उन्होंने कुछ लोगों को अमरीका से यहाँ कुछ जानने के लिए भी भेजा।“ 12 एक सही कदम ”आपके पास होते है, तब विचार मानो रुक जाते हैं। एक नई दुनिया दिखाई पड़ती है। बाद में सब वैसा का वैसा ही हो जाता है। क्यों?“ ”इसका उत्तर आप ही पता करंे।“ ”यहाँ तो दुकान खाली है, कोई विचार उठते हीं नहीं हैं। खाली तो है। पर मन जब मैंने कहा, अंतर्मन में विलीन हो जाता है। वहाँ एक अनवरत उर्जा का प्रवाह बना रहता है। इसीलिए मैं घंटो यहाँ चुप बैठा रहता हूँ। बोलने का मन तब होता है, जब विचार हो। सामने कोई है, इसका आभास भी नहीं होता है। वह दो-चार बार कुछ कहता है, तब होता है। फिर भी वह कौन है, यह पहचान देर से बनती है। आपके पास विचारों का संग्रह है, खर्च होता ही नहीं है। रोजाना बढ़ता जा रहा है। इसीलिए जब यहाँ आते है, यहाँ मन की गति कम होने लग जाती है। आप लोगों को अच्छा लगता है। बाद में फिर वही संग्रह बनना और जमा होना शुरु हो जाता है। उस दिन आपसे कहा था, जब भी कोई आए। आते ही उसके बारे में कोई पूर्वाग्रह रखकर बात न करंे। मन को आदर न मिलने से वह चुप होने लगता है। इसी प्रकार किसी को भी गलत आश्वासन नहीं दें। वाक पर नियन्त्रण सबसे पहले जरुरी है। प्रश्न था- ”आप प्रार्थना पर जोर नहीं देते।“ ”प्रार्थना किससे, किसके लिए, यह भी माँगने की एक कला है। प्रकृति के द्वारा जो भी प्राप्त होना है, वह अपने आप होगा। शरीर है, पुरुषार्थ है, काम तो करना ही पडे़गा। मैंने कभी किसी को आलसी बनने को नहीं कहा। काम तो जो प्रकृति ने साैंपा है, करना ही होगा। पर काम करते समय मन शांत रहे, जिसे अवेयरनेस कहा जाता है, वह क्या है? शरीर तो हमेशा वर्तमान में ही रहता है, पर मन नहीं , इधर से उधर जाता है। एक पल भी ठहर नहीं पाता। इसी मन को वर्तमान में लाना ही ध्यान है, यही जागरुकता है, यही अवेयरनेस है। ”पर यह तो सर्वाधिक कठिन है।“ ”कठिन तो है, पर सम्भव है। जब मैंने किया, मुझे तो बहुत कठिनाईयाँ थीं। बचपन में पिता नहीं रहे। बड़ा हुआ तो माँ चली गई। परवरिश भी नाना के यहाँ हुई। वहाँ भी गलत व्यवहार था, सन्यास लिया। पर भिक्षा कभी नहीं मांगी। फिर जब मैं कर सकता हूँ, तब आप क्यों नहीं। आपको तो बहुत सुविधाएं हैं, पर मन अशांत है। संतुष्ट नहीं होता है, जिम्मेदारियाँ कम होती ही नहीं हैं, आप खुद बढ़ाए चले जाते हैं। हम एक साथ सब नहीं छोड़ सकते हैं, क्योंकि संग्रह हमारी आदतों के रुप में जमा होता है। आदतों के परिवर्तन से ही स्वभाव में परिवर्तन आता है। आदतंे और हम एकरुप हो गए हैं। जागरुकता क्या है, वहाँ ध्यान है। वहाँ मन अनुपस्थित है। मन ही नहीं है। यह भी एक प्रकार की मृत्यु है। हम शरीर को सब कुछ मान बैठे हैं। जड़ तो मन है। बीमारियाँ पहले मन में घर बनाती हैं, शरीर तो मन का अनुगामी है। वह वह उसकी आज्ञा मानकर वैसा ही करना शुरु कर देता है। शास्त्र कहता है-‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’, वह तुरन्त हो जाता है। जिसे छोड़ना चाहते हो, उसे पूरा छोड़ो, तुरन्त छोड़ो। लोग आते है। कहते है, एक साल बाद से प्रवचन देना बंद कर दूंगा। इससे कोई लाभ नहीं।“ पूछा, ”आज से क्यों नहीं?“ ”बोले, साल भर के कार्यक्रम तो बन चुके हैं।“ यह आधे गर्म, कुनकुने पानी की कहानी है। दिल कहता है, बेकार की बात है। मन कहता है, यश मिलता है। यही उधेड़ बुन चला रखी है। तुम जोे भी चाहते हो, उसे अपने हृदय से पूछो। हृदय जो कहता है, वहाँ मस्तिष्क का कार्य अधिक नहीं होता है। मस्तिष्क मन नहीं है। मन का वहाँ अस्थाई निवास है और हृदय में (यहाँ बायलोजिकल हार्ट नही ंहै) उसकी सत्ता है, उसका भाव है, वहाँ गहनता है, वहाँ मस्तिष्क का कोई दबाव नहीं है। मस्तिष्क की पूंजी विचार है।विचार की ढृढ़ता या शुद्धता तर्क है। जितना बड़ा तार्किक होगा, वहाँ उतना ही उलझाव होगा। बुद्धि निश्चयात्मक हो ही नहीं सकती है। ”क्या किया जाए“ ”कुछ नहीं, ....रहा जाए। जैसे संगीतकार के साथ जो साजिंदे बैठते हैं, उनके वाद्य तो अलग-अलग होते है, पर वे उसके इशारे पर एक धुन के साथ, एक लय के साथ बज उठते है, तब वहाँ संगीत पैदा होता है। यह शरीर भी उसी तरह कई प्रकार के वाद्य यंत्रों का घर है। ध्यान ही वह विधि है, जहाँ सारे यंत्र एक लय में बज उठते है। एक लय,एक प्रकाश हमारे भीतर जन्मता है, यहाँ भटकाव नहीं होता। उस संगीतकार को हम पाना तो चाहते है, पर विश्वास नहीं है। मन उसके साथ पहचान बनने नहीं देता, तब क्योंकि उसी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, वह यह नहीं चाहता। हमारा केन्द्र ्रमस्तिष्क से हृदय तक आ जाए, यही करना है। यह संभव हो पाता है, निरन्तर वर्तमान में रहने से मन और प्राण की युति स्वाभाविक हो जाती है, यही सार है। उस दिन किसी ने कहा था, ”यहाँ किसी प्रकार का अनुशासन नहीं है। एक प्रकार की अराजकता भी है।“ यहाँ कोई बंधन नहीं है। नियम जो सौपे जाते हैं, वे बनावटी होते हैं, फिर नियम तोड़े जाते हैं। मैं पहले स्वेटर भी नहीं पहनता था। जब आयु बढ़ी तब लोगों ने कहा पहना। एक चादर के अलावा कोई वस्त्र नहीं रखा। भोजन एक बार करता था, ग्यारह बजे। समय गया, तब भूख है, इसका पता भी नहीं रहा। क्यों यहाँ तो तब कोई घड़ी भी नहीं थी। प्रकृति के साथ जब एकरुपता होती है, तब बायलोजिकल वाच अपनेे आप नियंत्रण संभाल लेती है। गाँव वाले आते है, वे घूम-फिरकर सो जाते है। कहते हैं, नींद अच्छी आई। आप चाहते है, वे नियम में रहे, आध्यात्मिक सवाल पूछंे। उन्हें इससे क्या मतलब? उनके लिए पानी कैसा बरसेगा? यह जानना जरुरी है। मैं आपके पिता के देहावसान पर आया था। आप सकुचा रहे थे। मैंने कहा, क्या भोजन नहीं बनेगा? कैसा नियम? नियम हमने ही बनाए हैं। क्या किसी की मृत्यु पर सब अपवित्र हो जाता है। यह सब ढाँचे हमने बनाए हैं। जितना पवित्र जन्म होता है, उतनी ही मृत्यु भी है। वहाँ भय या अपवित्रता कैसी? यहाँ गाँव वाले भोजन लाते थे। कई बार तो कांदा (प्याज) और रुखी रोटी भी लाते, वही खा ली। यह सब जाति-पाति के बखेड़े हमने बनाए है।मुख्य बात है, आहार जो लाया है, उसकी भावना कैसी है? और हमारे मन की अवस्था क्या है? यही नियमन है। नियम प्रकृति ने सौपा है, उसके साथ रहना ही निर्देश की पालना है। जहाँ ज्यादा नियम, कायदे होते हैं, वहाँ जड़ता आ जाती है। पानी सड़ने लगता है। इसीलिए मेरी कुटिया का दरवाजा सबके लिए खुला रहता है। भय ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है। भय का विरोधी अभय है। निर्भयता में दूसरे का सहारा होता है। पर जहाँ हृदय हैं, वहाँ प्रेम है। वहाँ भय नहीं रहता। भय का जन्म मस्तिष्क में होता है। वहीं वह फलताहै,फूलताहै। 13 अन्तिम आज्ञा प्रश्न था-”वह है ,यह कहना कठिन है, बस किताबी सूचनाएं है, वह नहीं है, यह पता नहीं, वर्षो तक आपसे सवाल पूछते रहे हैं?“ गलती हमारी ही थी।“ स्वामीजी कह रहे थे,- ”पर किसी उत्तर से सहमत नहीं हुए। सहमत हो जाते तो फिर प्रश्न पूछना ही बंद हो जाता। मैंने कितनी बार कहा है-प्रश्न मत पूछो, उत्तर सोचो। मैं तो कहीं नहीं गया। खोज जारी रही। यह नहीं कहता, वह गलत था। आप जब मिले, मैं गुरुकुल छोड़ आया था। सब कुछ सरकार को सौंप दिया था। तभी आप मिले। मैं बकानी में सन पचास के बाद आ गया था। लगभग बाईस साल यहाँ रहा। तब आयु भी साठ के ऊपर हो गई थी।यह रिटायरमेंट की आयु होती है। इतने वर्षो में बहुत लोग आए, पर सबके सवाल उनकी गृहस्थी के थे। मोहन जोशी जो बाद में विश्व हिन्दू परिषद के अधिकारी बने,वे यहाँ पढ़ाते थे। पर इस बारे में उनसे कोई संवाद नहीं हुआ। क्यों? यह जो है, शायद इसीलिए गोपनीय रखा है। कारण था, किसी की कोई रुचि नहीं है। नहीं जिज्ञासा है। मैं चुप ही रहा। जितना आवश्यक हो, उतना बोलो, उससे कम सोचो, विचारों के कम होते ही विकार गिर जाते हैं। संकल्प तभी बनता है। हमारी सारी साधना पद्धतियाँ कर्मकाण्ड में पड़ गई हैं। बाहरी जगत में भटकाती हैं। बहुत कम लोग हैं, जो इस तरफ आते हैं। जो आते हैं, सवाल पूछते हैं, ग्रन्थ पढ़ते हैं। बड़ी-बड़ी किताबंे लिख देते हैं, प्रवचन देते हैं, पर खुद भीतर-भीतर पोलेे रहते हैं। सारा माल उधार का है। जब भीतर से सवाल गिर जाएँ, उत्तर आना शुरु हो जाएँ, यहीं से शुरुआत होती है। सवाल मस्तिष्क पूछता है, उत्तर हमेशा हृदय से आता है। पतंजलि ने शब्द दिया है, समाधि। समाधि पत्थर हो जाना नहीं। जड़ हो जाना नहीं है। यहाँ समाधान होता है। समाधान हमेशा हृदय देता है। आप तब सवाल पूछते थे।तख्त के नीचे टेप रख देते थे।क्यों? मैंने मना भी किया था। जो कहा जा रहा है, उसे सुनो। पर आपका ध्यान सुनने पर नहीं था। दूसरों को सुनाने पर था। इतना समय इसीलिए चला गया। वह जाना भी था। जब तक भीतर का संग्रह ठसा- ठस बना रहता है, नई चीज को आने के लिए जगह नहीं होती है। हम पुराना संग्रह चाहे बहिर्जगत में हो या अन्तर्जगत में निकालना नहीं चाहते। हमारे घर भी सामान से ठसा ठस भरे रहते है। वही स्थिति हमारे मन की है। हमारे पास जन्म से लेकर आज तक की सारी बातें जमा है। कोई व्यक्ति के सामने आया ही नहीं कि भीतर से उसके बारे में सारी सूचनाएं सतह पर आ जाती हैं। हम उसे नहीं, उन बातों के जरिए, उसे देखते हैं। सुनना भी एक साधना है, इसीलिए वेदांत में कहा जाता है।सुनो, श्रवण, फिर कहा है मनन। जब पूरी तरह से कोई बात सुनी जाती है, तब मनन होना स्वाभाविक होता है। पर हम सुनते ही कहाँ है? मैं जब तक एक सवाल का उत्तर दे पाता था, आप तत्काल दूसरा सवाल पूछ लेते थे। मैं यही तो कहता था। मुझे अपनी बात तो पूरी कर लेने दो। क्यों मन बहुत चालाक है। वह कभी भी यह मानने को तैयार नहीं होता है कि जो कहा जा रहा है, वह सही भी है। आपको याद है, यहाँ चोयल, मेहरा आते थे। वे कृष्णमूर्ति के अनुयायी थे। वे जब भी भारत आते, ये उनके लैक्चर सुनने जाते। फिर मुझसे मिलने आते। वे मुझसे बात कर, यह जानने का प्रयास करते थे कि मेरे कितने विचार उनसे मिलते हैं। वे बस एक प्रकार का कन्फर्मेशन चाहते थे कि उनके गुरु महान हैं। लोगों की आदत है , वे बड़ेे लोगो के नाम व किताबों से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं।“ ”आपने कहा है, कुछ भी नहीं जानना है।“ ”तो चुप रहो, और जानते हो तो भी चुप रहो। नहीं जाना है तो उसके बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है। जो तुम कहना चाह रहे हो, सबको पता है। बस तुम्हें अच्छी तरह से कहना आता है, बस वाक् चातुर्य है। जब तक जो तुमने जाना है, तुम्हारा वह शब्द न बने, खुद का अनुभव न हो, चुप रहो। मौन में ही वह बोलता है, तब उनको सुनो। उस दिन आपने टेप लगाया था। मीरा बाई का भजन था। ‘सुनि मैंने हरि आवन की आवाज’ तब तुम्हें उसकी आवाज सुनाई देगी। जब तक पता नहीं हो, चुप रहोे। पूरा ध्यान सुनने पर लगा दो। बहुत पहले नाद के बारे में कहा था। नाद यह कान नहीं सुनते। अंतःइन्द्रिय सुनती है। फिर यह आवाज जहाँ से उठती है, उसका पता लगता है। लहरों से सागर का पता लगता है, पर ध्वनियों के साथ, खोजी सागर तक पहुँच जाता है। शास्त्र कहता है ‘चरैवेतिः,चरैवेतिः।’ रुकना नहीं बस चलते रहो। और तब जानोगे, प्रकृति सबकी कामना पूरी करती है, यह रहस्य है। जो मांगता है, उसे मिलता है, पर जो नहीं माँगता, उसे ज्यादा मिलता है। इसीलिए माँगना बुरी बात है। निरन्तर प्रयत्नशील रहो, पुरुषार्थ मत छोड़ना। फिर जो होना है, होगा। पर पहले चुप रहना सीखो। जब आप मिले,आपने पूछा, तब स्वतः प्रेरणा हुई। कहा जाए, नहीं तो चुप रहा। सुनने वाला जब आता है, तभी कहा जाता है। मैंने यह नहीं कहा। सवाल पूछना व्यर्थ था। पर पूछने के साथ ही उत्तर पाने की भी कोशिश स्वयं करनी चाहिए। तब सवाल पूछने वाला ही नहीं रहता है। आपको उस पंडित की कहानी सुनाई थी, जो राजा के पास भागवत की कथा सुनाने गया था। राजा ने कहा, , अभी आपने भागवत पूरी नही पढ़ी है। एक बार और पढं़े। उसे बुरा लगा। वह महीने भर कमरे में कैद रहा। फिर राजा के पास गया। राजा ने कहा, अभी पंडितजी कुछ कमी है। वह सब कुछ छोड़कर जंगल में भागवत को लेकर चला गया। महिने बीत गए, वह नहीं आया। राजा ने पता लगवाया, पता लगा, वह तो जंगल में है। राजा उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उनके पास पहुँचा। पंडित जी कुएँ की पाल पर बैठे थे, शांत। राजा ने प्रणाम किया। ‘कौन?’ ‘मैं राजा हूँ, भागवत सुनने आया हूँ।’ ‘क्या, कैसी भागवत?’ पंडित जी मौन थे। जो जानता है, चुप हो जाता है, जब तक नहीं जाना गया है, चुप रहना ही बेहतर है। मैं यहाँ कुटिया में था। कई बार तो पूरा दिन निकल जाता था। मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाता था। कई बार ‘वीरम’ सुबह का काम कर चला जाता था। ग्यारह बजे बकानी से खाना आजाता था। फिर यहाँ कोई नहीं रहता था। तब न टेलिफोन था, न लाइट। पर मैं दिन भर कुटिया से बाहर कदम नहीं रखता था। अब आपके सवाल तो गिर गए है, पर भीतर भय है। वर्षो आप साथ रहे। इतना कोई नहीं, यह प्रारब्ध है। आपने ही कहा था, ”मैं ही समझ नहीं पाया हूँ, इतना आपके साथ क्यों रहा?“ इस चर्चा में पड़ना बेकार है। साथ रहे, यही महत्वपूर्ण है। कहा जाता है, आनन्द जो भाई था, गौतम बुद्ध के साथ रहा। गौतम जो शिष्य था, महावीर के साथ रहा। जो लिखा गया है, वह बहुत कुछ इनका ही है। साथ तो यही थे। पर जो साथ रहता है, वह एक बात चूक जाता है। वह गुरु की महानता देखता है, तो छोटापन भी देखता है। वह पाता है कि उसकी अपेक्षा पर गुरु खरा कभी उतरता है, कभी नहीं। उसके भीतर जो प्रतिमा है, वह बनती है, टूटती है। मैं जब बच्चा था, इंजीनियर साहब से प्रभावित था। उनसे ही एकांत में सवाल पूछा करता था। वे थियोसोफिस्ट थे। उनके बारे में पहले कहा है। एक बार में उनके कमरे में गया। वे किसी के साथ बैठे शराब पी रहे थे, मैं चौंक गया। मैं तुरन्त कमरे से बाहर आ गया। वे मेरे आदर्श थे। उनके बारे में बहुत सारी बाते सुना करता था, पर मेरा उन पर ही विश्वास था। मुझे जाता देखकर वे चौकें। फिर एक दिन मुझे समुद्र के किनारे ले गए। वहाँ वे समुद्र का पानी पी रहे थे। मैं चौक गया। वे बोले, ”क्या समझे?“ उनकी किसी वस्तु में आसक्ति नहीं थी। हम अपनी छोटी बुद्धि से, जो सामान्यता हम में है, हम हमेशा दूसरे पर सौप देते है और संतुष्ट हो जाते है, पर जो प्रबुद्ध है, वह ”सियाराम मय सब जग जानी’ मानता है। इतना सा ही भेद है। जब तक बुद्ध थे। आनंद बस सूचनाएँ संग्रहित करता रहा। पर बुद्ध के जाते ही, उसके सवाल भी गिर गए थे। तब अचानक उसे लगाा, बुद्ध उससे क्या कह रहे थे। उन्होंने अचानक पूछा था ‘तुम टेप क्यों कर रहे थे?“ उत्तर था- ” जो जाना गया है, वह महत्वपूर्ण है, सुरक्षित रखा जाए , सबको बताया जाए?’ स्वामीजी कह रहे थे- ”तुमने कहा था, आपके बारे में लोग नहीं जानते है।, जान जाएं? पर कभी सोचा था, यह भी मन ही है। मन में लोभ है। लोभ पैसे का ही नहीं होता है। प्रशंसा पाने का भी लोभ होता है। लोग विद्वान मानंे, भेंट चढ़ाएँ। यहाँ कुटिया में पचास साल के आस पास रहा। कभी हाथ नहीं फैलाया। जो आया, वापिस समाज को सौप दिया। न कहीं बैंक में खाता है, न एफ.डी़ है। लोगों ने समझाया, जब बुढ़ापा आयेगा, तब जरुरत होगी, उनकी अभी तक तो जरूत नहीं, पड़ी। उस दिन आपसे कहा था, आपके पास आना है, विशेष कार्यक्रम होगा, तब आऊँगा। चंद्रेश छोड़ने आई थी। आपने कहा था, कोटा रुक जाओ, पर मैं बकानी आ गया। जन्मोत्सव का उत्सव था। आपने कोटा चलने को कहा, मैंने कहा, चार बजे बताऊँगा। आ गया। आपसे यही कहा था, यह कार्य आपके लिए रखा था, किसी से कोई पैसा मत लेना। एक दुकान बाहर होती है, एक भीतर। जाने के पहले, दोनों दुकाने खाली कर देनी होती हैं। यह लोभ ही मन है। अपने लालच को कम कर दो। मन अपने आप नियंत्रण में आने लगेगा। बाहर का आकर्षण कम होना चाहिए। काम तो करना ही होगा। व्यक्ति को अपना खर्चा, परिवार का खर्चा निकालना होगा। प्रकृति पुरुषार्थ के अनुसार देती है। पर लोभ बढ़ गया है।जरुरत से ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति है। मैंने पढ़ा था, एक संत जो सब कुछ त्याग आए, वस्त्र भी। उनके चातुर्मास पर कई करोेड़ रुपया खर्च हुआ। यह भी छिपा हुआ लोभ है। सब खाली करते जाओ। अपने भीतर के खालीपन को जानना ही सार है। इसे समझो। जब मृत्यु आकर हटा ले, तब भी जगत छूट जाता है। उससे बेहतर है, हम स्वयं भीतर से खाली होते जाएँ। लोग गलत सवाल करते हैं। बाहर का जगत तो वैसा ही रहेगा। वस्तु जगत का परित्याग नहीं होता है। हमारे भीतर जो जगत है, जो लोभ है, जो चिपकने की आदत है, वह कम होती चली जानी चाहिए। होता उल्टा है, बुढ़ापे में आसक्ति बढ़ती जाती है। यही अज्ञान है। याद रखना, जहाँ तक मन है, वहाँ तक अज्ञान है। जहाँ मन गिरा, वही ज्ञान जन्मता है। इसीलिए बोलने से पहले सोचना, विचारना, जिस शब्द का प्रयोग कर रहे हो, वह सही तो है। ‘ज्ञान मार्ग या ज्ञान का मार्ग,..... ज्ञान का मार्ग’ वर्तमान में रहता है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ समझने के लिए नो माइंड है। मैंने समझाने के लिए उसे अंतर्मन कहा है। समझ गए हो तो ”जानो,“ पर भाषण देने के लिए शब्दों से खिलवाड़ मत करना। प्रश्न था - ”आप... इस अवस्था को क्या कहेंगे,“ ़़़़़़़़........(.पूछा ही नहीं जाता) ”क्या? बूंद सागर में मिल रही है, बस। कल ‘कोकाकोला’, मंगवाया था, क्यों? अब न उसका स्वाद रहा है, न गले के नीचे उतरता है। जाना, इतना बूढ़ा शरीर है। इन्द्रियाँ एक-एक कर जाने को होती हैं। आप कहते है कि मैं कभी अस्वस्थ नहीं रहा। पर यह पंच महाभूत का शरीर है। इसको जितना भी बचाओ,विनाश होगा। चेतना है, जीवन है, यह अबाध है, जो दिखता है, वह कभी नहीं भी दिखता है। जब वह शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त हो जाता है, हम उसे जीवन कह देते है। पर जब वह अभिव्यक्त नहीं होता है, तो क्या जीवन नहीं है? नहीं है तो आया कहाँ से? एक प्रवाह है,जो आने के पहले भी था, शरीर छोड़ने के बाद भी रहेगा। अचानक फिर प्रश्न उठ गया -”तो क्या, यह मुक्ति नहीं है?“ ”मुक्ति किससे, बंधन कौनसा? यहाँ भगवान को भी हमने तो अवतरित होना माना है। यह अवतारवाद क्या है? शरीर का अपना नियम है, वह हमेशा बना नहीं रहेगा। प्रकृति ने जब जिसे जो कार्य सौपा है, उसे करना है। यह रंगमंच है। विराट का सीरियल चल रहा है, बस। उसे देखते रहो। जो काम सौपा है, वह अच्छा हो जाए, यही सफलता है, इससे अधिक नहीं। हम अपना खेल तो बढ़िया खेलना चाहते हैं, पर दूसरे का खेल बिगड़ जाए, यह भी चाहते हैं। यही प्रकृति की निगाह में बड़ा अपराध है। इसीलिए यही हमारा धर्म रहे, हम अपना काम करते रहें, जिसे छूटना है, वह छूटता चला जायेगा। जब बूंद सागर में मिल जायेगी, तब बताने वाला कहाँ से आयेगा। अचानक कह उठा- ”यही तो मुक्ति है?“ ”फिर गलत बात, बूंद सागर से अलग कहाँ है, और सागर बूंद से अलग कहाँ है, जो आभास बीच में बना रहता है, वही हट जाता है। दोनों अवस्थाएँ एक ही हैं। पर बुद्धि से समझने की चीज नहीं है। उसे अनुभव करो। सत्य कोई अवधारणा नहीं है, जिसे हम परिभाषित कर सकें। यही जीवन है, जो अबाध है, बस। जन्म और मृत्यु के पहले भी कुछ ह,ै और बाद में भी है, यही चेतना है। उसकी अभिव्यक्ति के प्रकार अलग-अलग हैं। प्रगाढ़ निद्रा में और मृत्यु में क्या भेद है। अष्ट्रावक्रजी ने ‘राजा जनक’ को उसे स्वप्नवत बनाया है। ड्रीमिंग, बस। यही प्रतिभासित सत्य है। जो सिर्फ भासता है। दार्शनिक तरह-तरह से ही व्याख्या कर सकते है। वह इन सबसे परे है। यहाँ कोई ‘चॉइस’, नहीं है। जो कहा जाता है, वहाँ शांत सजगता है। भीतर कोई विचार ही नहीं है। आप भूल गए हैं, पर आपने कहा था , मैं सरकारी नौकरी करता हूँ, चाहता हूँ, जब आपका अन्तिम समय हो, मैं आपके पास रहूँ, आप भूल गए, मुझे याद आया। मैं आ गया। आपसे मना किया, मेरा इलाज मत कराओ, आप नहीं माने, लोग आ गए। चिकित्सक आ गए। शब्द है, ‘जैसी उसकी इच्छा’ मैंने मना नहीं किया। बस रहना है। उस दिन चंद्रधरजी पूछ रहे थे, ”आप प्रकृति से शरीर स्वस्थ हो जाए, इसके लिए प्रार्थना नहीं कर सकते।“ वे बहुत बडे़ दार्शनिक है, पर उनकी बात सुनकर मुझे हँसी आ गई। दार्शनिक होकर मृत्यु से भय। जन्म और मृत्यु एक ही तो है, मात्र अभिव्यक्ति का प्रकार अलग-अलग है। कैरोल अमरीका से आई थी। वह जाग्रत पुरुषों की भारत में खोज कर रही थी। शिकागो में ”बसावड़ा ने मेरे बारे में बताया था, यहाँ चली आई। मैंने कहा, ”पहले तुम जाग्रत पुरुष की पहचान तो बताओ।“ वह बोली, आप हैं। मैंने कहा, मुझे क्या पता, उसने क्या लिखा, मुझे पता नहीं। अमरीका जाने के बाद उससे सम्पर्क नहीं हो पाया। बाद में बसावड़ा भी चले गए। खैर, जो जागरुक है, वहाँ कोई विचार नहीं है, कोई आदर्श भी नहीं है। जो जैसा है, वहाँ है। कहना कठिन हो जाता है। इस उम्र में बाहर के लोगों का दबाव पड़ता है। मैं शांत जड़वत हो जाता हूँ कि, सब उठकर चले जाएंगे। शरीर की व्याधि का मुझसे सम्बन्ध नहीं है। मुझे पता है, भोग है, पर जाने के पहले, दुकान खाली हो जाएगी, इतना कह सकता हूँ। इसीलिए रहना सीखो और सारे प्रपंच छोड़ देना। जब जब जिम्मेदारियाँ पूरी हो जाएं, नई मत ओढ़ना। जितना समझा है, उसे प्रयोग में लाओ। सही कहा है, जो नहीं जाना है, नहीं पता है, चुप रहो। विद्वान बनने की चाह, लोभ की परमावस्था है। धन कमाना अधिक बुरा नहीं है। वहाँ मन दिखाई पड़ता है। यहाँ मन छिपा हुआ है। मन ही लोभ है। चुप रहना सीखो। प्रशंसा का बोझा वाकचातुर्य में है। पर निन्दा में है। आत्म प्रशंसा में है। चुप रहो। जब जान लो तो और चुप हो जाना। उस गहरी चुप्पी में, उस मौन में ही तुम जब जाओगे, तब वह है या नही, तब सवाल सारे गिर जाएंगे, क्योंकि उठाने वाला मन ही जब नहीं होगा, तब मात्र एक गूंज रहेगी, जो तुम्हारी खुद की होगी। ं 14 मम् माया दुरत्या ”सवाल क्यों पूछते हो? क्या जिज्ञासा है, पूछते रहो, सवाल कभी खत्म होने वाला नहीं है। सवालों की जड़ तुम्हारे मन में है। हाँ जब इससे पार चले जाओगे। तब सवाल पीले पत्तों की तरह अपने आप छूट जाते हैं। सवालों के उत्तर नहीं मिलते, पर सवाल उठने ही बंद हो जाते हैं। कारण है, सवाल मन पूछता है। मन और मस्तिष्क का गठजोड़ ,आसानी से नहीं टूटता है। जब तक एक भी सवाल बचा है, यह गठजोड़ तो रहेगा। मैंने पहले भी कहा था, यहाँ सौ टका देना होता है। शत-प्रतिशत तभी यह गठजोड़ टूटता है। मन-मस्तिष्क से नीचे खिसकता हुआ हृदय पर आता है। यहाँ समाधान है। जब उत्तर स्वयं अपने आप आने लगे, यह हृदय का खुलना है। यह बायलोजिकल हार्ट नहीं है। यह अनुभूति है। दर्शन शब्द बहुत अच्छा था। पर सार था। दृश्य व दृष्टा और दर्शन की जब त्रिपुटी समाप्त हो जाती है। बस एक दृष्टा ही शेष रह जाता है। तब दर्शन सहायक होता है। दर्शन मात्र जानने की विधि ही नहीं है। मैंने पहले ही कहा था, मैं ध्यान नहीं सिखाता। रमण महर्षि के यहाँ मूक सत्संग था। जाओ, चुप बैठ जाओ। चुप हो जाना ही साधन है। चुप होते ही सवाल गिर जाते हैं। उनसे सम्बन्ध टूट जाता है। वहाँ सवाल पूछने से क्या मिलेगा? तुम वहाँ इसीलिए जाते हो कि तुम्हें जो पता है, उसकी पुष्टि हो जाए। वही उत्तर नहीं मिलता तो तुम निराश हो जाते हो। दुबारा आते ही नहीं। ग्रन्थों ने बहुत उलझा रखा है। तथाकथित जो गुरु हैं, वे भी यही काम करते हैं। जो वास्तविक गुरु है, वहाँ शब्द ही नहीं है। वहाँ मौन में ही समाधान हो जाता है। वास्तविक सम्बन्ध मौन में होता है। जो गुरु है, वह वहाँ स्वयं उपस्थित हो जाता है। मन ही लोभी है। मन विचार है और विचार ही विकार है। यह सीधी सी समझने की बात है। मन चाहता है, वह अधिक से अधिक संग्रह रखे। उसे अधिक से अधिक खूंटिया चाहिए। समझाने के लिए जो कहा गया, वह भी सीढ़ी बन जाती है। क्योंकि जहाँ खाली मन आया, वहाँ मन नहीं रहता है। मन तो गति है, उर्जा है, उसका नाश तो नहीं होगा। पर वह गति अंतर्मुखी होकर अंतर्मन में विलीन हो जाती है। पर मन यह नहीं चाहता। आपने घर छोड़ दिया। सन्यास ले लिया। वहाँ आश्रम बन गया। वहाँ सामान आ गया। सम्पत्ति बन गई। खूब किताबंे लिख दीं। खूब विचार इकट्ठेे कर लिए, यह क्या है? यही लोभ है। वस्तु लोभ नहीं है। पर उससे चिपकाव लोभ है। यह जाता नहीं है। यह मन का स्वभाव है। जितना भीतर खालीपन होता जाता है, उतना बाहर का संग्रह भी कम होने लगता हे। पर हम यह नहीं चाहते। बाहर की हर वस्तु, हर विचार की छाप हमारे भीतर इकट्ठी होती रहती है। आपने मुझसे पूछा था, आप को याद होगा, ”मुझ में क्या परिवर्तन आया है?“ तब मैंने कहा था, अभी तो संग्रह बहुत जमा है, ठसा-ठस। संग्रह कम होता है, निरन्तर वर्तमान में रहने के अभ्यास से। पर यह बात समझने में नहीं आती। बाहर का दबाव निरन्तर हिलाता रहता है। कभी सोचने का समय नहीं मिलता। बस आए, कुछ सवाल पूछ लिए और प्रसन्न हो गए। यही तो अब तक किया है। भीतर से खालीपन न हो, यह आदत हो गई है। पेट की भूख तो शांत हो जाती है। पर मन की भूख नहीं होती है। शास्त्र कहता है‘प्रजहाति यदा कामनि’ जहाँ सब कामनाओं का क्षरण हो जाता है। यह कामनाएं ही तो भीतर भरी रहती है। हम निरन्तर जो बाहर का संग्रह करते है, वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। वह तो यहीं रह जाता है, पर भीतर जो संग्रह जमा करते जा रहे हैं, उस पर निगाह रहे। वह कम हो। कहा जाता है, बीज भुन गया। फिर उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। होना यही है। निरन्तर यही अभ्यास होना है, पर यही नहीं होता है। आपको दो संतों की कहानी सुनाई थी। जो सब छोड़कर हिमालय में कुटिया बना कर रह रहे थे। अपनी लंगोटी सुखाने के लिए रस्सी ले आए थे।बांध दी। फिर रस्सी पर झगड़ा हो गया। दोनों का आधा-आधा हिस्सा था। मारपीट तक हो गई। वस्तु में मोह नहीं है, लोभ वस्तु में नहीं है। लोभ मन में है, यही जानना महत्वपूर्ण है। चन्द्रधर जी ने बहुत बड़ी किताब लिखी है। भंेट करने आए थे। अद्वैत वेदान्त व बुद्ध दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन है। मैंन देखा वे बहुत बड़े विद्वान हैं। आते है। मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा। उनकी आंखों में झांका। वे सकपका गए। मैंने कुछ नहीं कहा। पूछा आपने क्या जाना? वे बोले, जानना क्या? किताबों का सार है। सार है, जाना क्या जाता है। सूचनाएं ज्ञान नहीं होती हैं। यहाँ जो भी आता है, गले तक भरा हुआ आता है। लगातार बोलता रहता है। जब उसके होठ बंद हो जाते है, तब उसकी ओर ध्यान जाता है। सम्बन्ध सुनने का भी टूट जाता है। वह समझता है, बहुत ज्ञान की बातें कर रहा है। आत्मा परमात्मा की चर्चा ज्ञान की बात है।” अरे! ये तो किताबी सूचना है, तुम्हारा अपना अनुभव क्या है? वह चुप हो जाता है।“ अधिकांश के सवाल किताबों के सवाल हैं। मैं कहता हूँ, प्रयोग करो, अनुभव में ले आओ, वह तुम्हारा अपना होगा। मेरी बात भी मन मानो। प्रकृति ने दो पत्तियाँ कभी एक सी नहीं बनाईं। हमें किसी की भी नकल नहीं करनी चाहिए। ‘ज्ञान’ शब्द का अर्थ बाहर की दुनिया की जरुरत नहीं है। ये सूचनाएं निरन्तर बदलती रहती हैं। एक आदमी बाहर से बहुत विद्वान हो सकता है, पर भीतर से उतना ही रीता, किताबी जानकारी ज्ञान नहीं है। कबीरदास कहीं पढ़ने नहीं गए। पर उनका कथन अविश्वसनीय नहीं है। यह जो आज का व्यक्ति है, यह पहले की अपेक्षा अधिक जानकार है। इसके पास सूचनाओं का विशाल भंडार है,पर यह अपने आप से उतना ही दूर है। जब हम निरन्तर वर्तमान में रहने लगते है, तब क्या होता हे। भीतर का संग्रह या तो खतम हो जाता है या भुनेे बीज की तरह अपनी अंकुरण क्षमता खो देता है। तब जो खालीपन है, वह अनुभव में आता है, वहाँ वह निरन्तर अंतर्मन जो विराट से जुड़ा हुआ है, वह अचानक उसे भर देता है,उसे अपने अस्तित्व का बोध होता है। वह जान जाता है, वह अकेला नहीं है। यह अनुभूति ही ज्ञान है। ”पर यहाँ तक मन नहीं आने देता है?“ ”क्योंकि वह स्वयं खोना नहीं चाहता। न हम में इतना साहस होता है, हम उसके पार छलांग लगालें। मन ही लोभ है, मन ही अहंकार है। इसकी कोई अलग मूर्ति थोड़ी होती है। यह विचार रुप है। तुम यहाँ आए हो, कितने वर्षो से मेरे साथ रहे। तुम किसके साथ रहे, मेरे विचारों के साथ या मेरे साथ। तुम हर बार उलझते रहे। मेरे विचार जो आज हैं, कल बदल जाएं। यहाँ सब परिवर्तनशील है, पर मैं जो हूँ , जिसे गीता में ‘माम’ कहा है। उसके साथ रहना ही सत्संग है। पर तुम्हारा मन, बुद्धि हमेशा तुम्हें भी बाहर ढकेलती रही। कभी विश्वास तो कभी अविश्वास। मैं यही कह सकता हूँ, जब जिम्मेदारियाँ खत्म हो जायेगी, तब तुम्हें भी वह प्राप्त होगा, जो तुम चाहते हो। पाना जैसी चीज कोई नहीं है, पर जो अस्तित्व है, उसका अहसास होगा, यही जीवन का उद्देश्य है। यहाँ पाना और खोने जैसी चीज कोई नहीं है। जब तक विचारों से जुड़ो़गे, सवाल पूछते रहोगे, अपने आपको विशेष मानते रहोगेे, भटकाव ही होगा।जैसे सब हैं, वैसे ही हम हैं। सब मिट्टी के भांडे है, इससे अधिक नहीं। धन के अहंकार से भी अधिक, इन झूठी सूचनाओं के संग्रह का अहंकार होता है। दो पात्रों में पानी भर दो, नली से जोड़ दो। दोनों पात्रों में जल की ऊंचाई बराबर हो जाती है। जहाँ गुरु है, वहाँ बस रहना है। कोई तर्क नहीं हो, वहाँ सहज चेतना का प्रवाह बन जाता है, पर अहंकार यही नही होने देता। बु(िमता का अधिक होना भी हानिकारक होता है। जब यह विचार भी गिर जाता है, तब भीतर से स्वतः अपने होने का अहसास होता है। पर यह विचार नहीं है। हमेशा भाषा में अपने आपको व्यक्त करने की कोशिश मत करना। अहंकार फिर आकर दबोच लेगा।‘मैं हूँ ही नहीं’, यह सोच ज्योति की तरह बना रहे। शास्त्र ने बहुत तरह से समझाने का प्रयास किया था। पर उनकी भी कमजोरी है। अनुभव, शब्द से परे है। वहाँ तुम्हें ही अपना रास्ता तलाश करना है। वहाँ किसी की जरुरत नहीं होगी। शास्त्र, गुरु सब बाहर ही रह जाते है। उस यात्रा में तुम्हें अकेला जाना है।गुरु बस उसके भीतर इस ‘मैं नहीं हूँ’ यह बोध एक चिन्गाारी की तरह छोड़कर अलग हो जाता है। इसीलिए मैंने कहा था, मैंने किसी को शिष्य नहीं बनाया। हाँ, जो तुम मानते हो, उसके लिए स्वतंत्र हो, पर मुझे भी ढोना नहीं। मैं भी एक साधारण-सा इन्सान हूँ। जो मैंने जाना है, कुछ भी छिपाया नहीं है।“ तब कहा था- ”आपके पांव में तकलीफ है, घाव है, आपको दर्द तो बहुत होगा?“ ”हूँ ,(;हंसते है) पर जब मैंने कहा आपकी तरह मैं भी हूँ, तो आपको अच्छा लगा होगा। दर्द तो होगा, होता है, पर मुझे अनुभव नहीं होता। मैं अपने आपको वहाँ से हटा लेता हूँ। डाक्टर आते हैं , चीरफाड़ करते हैं, पर मुझे पता नहीं लगता। मैं एनस्थीटिया नहीं लेता। बंबई में आंख का आपरेशन था, उनसे मना कर दिया था। पर वे नहीं माने इंजेक्शन लगा दिया। मुझे होश था। उसने सहायक से पूछा था, ‘ क्या इंजेक्शन नहीं दिया’। मैंने कहा, ”दिया था आप अपना काम करंे।“ शरीर का जो धर्म है, वह यथावत रहता है। पर विषय, इन्द्रियाँ और मन का सम्बन्ध टूट जाता है। इस अवस्था में जहाँ मन क्रियाशील नहीं है। वह रहेगा तो पर एक कोने में में पड़ा रहेगा। जरुरत होगी तो जुड़ेगा, यह बात समझ में आने वाली नहीं है। अनुभव करो। निरन्तर वर्तमान में रहने से यह सम्भव होता है। यहाँ किसी प्रकार की न तो धारणा रहती है, नहीं विचारणा। मन ही समय है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ न भूत है, न भविष्य है। बस बूंद है, जो सागर से मिली नहीं है, वह जानती भी है, जा रही है, यही अनुभव रहता है। अचानक प्रश्न उठ गया था, ”क्या यहाँ आकर भी पतन हो जाता है?“ “हाँ, शास्त्र में भी बहुत कहानियाँ है, इस जगह आकर भी संभलना रहता है। कांस्टेन्ट अवेयरनेस, जागरूकता वह निरन्तर बनी रहे। रमण महर्षि के अंतिम दिनों में उनकी माँ वहाँ आकर रहने लग गईं थी। उनकी मृत्यु हुई। रमण ने उनके लिए समाधि बनवाई थी। वहाँ भी पूजा उनके ही सामने होने लग गई थीं। ओशो भी पहुँच गये थे। फिर हीरे के मुकुट लगाने लग गए। सब चलता है, यह अंतिम अवस्था बस एक छलांग है, बहुत पास है, पर जरूरत यहाँ दुकान पूरी खाली करने की होती है। कुछ भी नहीं, मात्र अस्तित्व, वह भी मिट रहा है। ”बूंद जब समुद्र में मिल जायेगी, वहाँ क्या अनुभव होगा,“ ...... ”कौन किसको बताएगा? पूछो मत, चुप रहो। तुम्हें एकलव्य की कहानी सुनाई थी। कहानी सबने सुनी है, पर अर्थ समझा नहीं है। जब गुरु के साथ एक लय बन जाती है, एक रसता, तब उसी की ही अनुगूंज सुनाई देती है। वही उसके भीतर प्रकट हो जाता है। पूरा अस्तित्व उसमें प्रकट हो जाता है। भीतर सब खाली कर देना। यही अभ्यास रहे। कुछ भी नहीं रहे। सुख-दुःख सब आएंगे। हिलना मत। डगमगाना मत। मुसीबतें आएंगी। छाती खोलकर सामना करना। हमें पोला नहीं होना है। प्रकृति पर भरोसा पूरा रहे। जितना भीतर खाली होता जाता है। न भूत न भविष्य, वहाँ बस वाह्यमन सिमटना चला जाएगा। फिर अंतर्मन ही सारे कार्य व्यवहार संभाल लेगा। वही विवेक है। वही गुरु है। सब जगह वही है, वही होगा, मौन में वही बोलेगा। कार्य-व्यवहार सभी सही होते वले जाएंगे। मेरे जाने के बाद मेरी बाते समझ में आयेगी। अभी व्यवहार में बहुत से काम हैं, घर है, परिवार है, नौकरी है।सब जगह रहो, बाहर की बात बाहर रहे, भीतर नहीं ले जाना है। रात को बिस्तर पर जाएँ। पर बाहर का सब छूट जाए। वर्तमान में रहने से पहली यही बात मिलती है। जीवन और जगत सें कटकर या काटकर कही नहीं जाना है। दूसरे क्या करते हैं, हमंे इससे कोई मतलब नहीं। हमें जो काम मिला है, उसे पूरा करना है। मन अधिक से अधिक वहीं रहे। स्वाभाविक रुप से मन की गति कम होती है। उसकी शक्ति बढ़ जाती हैं। हमें रहने की कला आनी चाहिए। बाहर जो घट रहा है, वह हमारे संकल्पों से कम होने वाला नहीं है। अरबों मनुष्यों के संकल्प हैं। जो घट रहा है, जैसा घट रहा है, वहाँ रहना है। मैंने बहुत पहले कहा था, शराब, जुआ, यह कभी बंद नहीं होगा। यह प्रकृति चाहती है। हजारों सालों से इन्हें बंद करने का प्रयास हो रहा है। जितना समाज आगे बड़ रहा है, ये प्रवृत्तियाँ भी उतनी तेजी से आगे बढ़ी हैं। समझना कठिन है। जिसने हमको बनाया है , उसी ने उनको भी भेजा है। अनावश्यक इस पचड़े में मत पड़ना। यहाँ न कुछ अच्छा है, न बुरा। चीजों को जैसे घटना है, वह घटेगीं पर हमें प्रभावित नहीं होना है। कहने का मतलब है न अतीत में झांकना है, न भविष्य में कल्पना करना है। दोनों ही मन के खेल है। यहाँ कुछ भी न अच्छा है, न बुरा है। नैतिकता हमारे ऐच्छिक कर्मो से आती है। जो माँस खाते है, वे माँस को अपने भगवान को अर्पित करते हैं, शाकाहारी फल-दूध अर्पित करते है, ये सब उनकी परम्पराएं हैं। हमें इस विवाद में नहीं पड़ना है। जो जहाँ जैसा है, वहाँ वह है। हम कौन बदलने वाले होते हैं। हाँ, हमारा ही यह कर्त्तव्य हो तो उत्कृष्टता के साथ कर्त्तव्य निभाना चाहिए। भागवत में कहानी है , उस मांस बेचने वाले को भी वही स्थिति प्राप्त होगई थी , जो उस संत को दुर्लभ थी। जो सवाल पूछने उस के पास गया था। मैंने आपको बहुत पहले कंवरलाल की लड़की की शादी की घटना बताई। उसकी मदद के लिए धन जमा किया। प्रकृति ने मना किया। कुतिया काट लेगी पता लगा। उसने काट भी लिया। धन उस तक पहुँच भी गया। पर उसके काम नहीं आया। कोई ले गया। प्रकृति के खेल में हम सहयोगी तो बन सकते है, पर उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य नहीं करना है, यह ध्यान रहे। हम जब अंतर्मुखी बनेंगे , भीतर से अंतः प्रेरणा अपने आप बतायेगी, क्या करना है, क्या नहीं करना है। मैंने दीनदयाल जी को बताया था। मुझसे भी एक कार्य हो गया, जो नहीं होना था। मेरे मुँह से निकल गया, हो जाएगा। काम तो हो गया, पर प्रकृति के विरुद्ध था, उसका परिणाम भी मिला। यह अटूट सिद्धान्त है, याद रखना। शक्ति जरा सी आते ही बाहर का प्रलोभन बहुत जोर से आता है। मैंने भोग लिया, मेरा योग था। हाँ, अब दुकान खाली है। कुछ नहीं बचा है। एक बात हमेशा याद रहे, जो अंतःप्रेरणा उठे, वह कार्य करते रहना है। पर कोई अपना चयन नहीं हो, अपनी निजी मान्यता नहीं हो। जहाँ कामना है, वही मन है। मन का जाला, मकड़ी के जाले से भी महीन है। इससे निकलना कठिन है। शास्त्र ने इसी का माया कहा है, ‘मन माया दुरत्या, यह मेरी माया है’ मेरी, भगवान कृष्ण की नहीं, तुम्हारी है। निरन्तर वर्तमान में रहने से ही इससे पार जाया जा सकता है। वर्तमान में क्या होगा, क्रिया होगी, पर विचारणा का दबाव नहीं होगा। लोग पूछते हैं, क्या मन नहीं होगा। अरे! मन तो भूत और भविष्य में रहता है। वहाँ जो है, बहुत शक्तिशाली है, पता करो, वहाँ सजगता तो होगी। पर वहाँ मन का दबाव नहीं हैं, वहाँ स्वतः ही कामना नहीं है। यह कोई निठल्ले की अवस्था नहीं है। आज भी इस नब्बे साल की उम्र में शरीर थक गया है, फिर भी में निरन्तर क्रियारत हूँ। 15 अघ्यात्म मैं कह रहा था- ”मुझे याद है, आज सत्ताईस वर्ष पूर्व आपसे मिला था, तब लगता था, बहुत कुछ पाया है, बचपन से ही संस्कार थे। साधना जैसी भी मिली, करता गया। पर अब इतने वर्षो बाद लगता है, कुछ नहीं पाया है। मैं वैसा का वैसा ही रह गया हूँ। मात्र कुछ भावनाएं साथ रही, वे यहाँ आकर पूरी हो सकती है, यही उम्मीद बची रही। शुरु के वर्षो में जिज्ञासा थी, पर धीरे-धीरे लगा, मैं कही का नहीं रहा। आपने ‘अनंत यात्रा’ के पृष्ठ भेजे थे, मैंने छपा दिए। पर लगता है , उस उपन्यास के नायक ‘शिखिध्वज’, से भी गई गुजरी मेरी हालत रही, मैं न तो पूरी तरह अपने आप जुड़ पाया, न पूरी तरह संसार में ही पूरा उतरा। क्या कारण रहा?“ स्वामीजी कह रहे थे- ”जाना कहाँ था, मैंने तो कभी कोई आश्वासन नहीं दिया। जब में ही हिमालय से उतरकर बकानी के इस गांव में आ गया, तो जाना कहाँ है? हम आशाएं लेकर ही कहीं जाते है। वो कहते है, जब तक हम है, आप यहाँ है, चिन्ता न करे, ये सब पाखंड है। प्रकृति का अपना एक नियम है, उससे हम सब बंधे है। उम्मीद किससे? यहाँ तुम्हारी या किसी की आशाओं को पूरा क्यों करना है? जो यह वादा करते है, वे अपने आपसे झूठ बोलते है। मैं तो कुछ नहीं करता, जानता भी नहीं, बाहर क्या हो जाता है। कुटिया में गांव वाले आते हैं, बस नहाये-धोये बाहर चबूतरे पर सो गए। जाते समय मिलने आते है, कहते हैं, अच्छी नींद आई। उनकी तो कोई आशा नहीं है। न ही वे कुछ पाना चाहते हैं। जो पाने के लिए आता है, उसकी कभी कोई तृप्ति नहीं होती है। जो जानता है, वह कुछ करना नहीं चाहता। आप इतने वर्षों से यहाँ है? मैंने तो कोई सवाल आपसे नहीं पूछा। आपसे यही कहा है, सवाल नहीं, उत्तर देना सीखो। सवाल मन करता है, उत्तर हृदय देता है।पर अभी जो कहा गया है, उस पर विश्वास नहीं हुआ। विश्वास तो अंधा होता है। जो माना गया है, वहाँ विश्वास तो पूरा करो। कमी यही रही। मैंने आपको पत्र में लिखा था, अभी आप में आत्मविश्वास की कमी है। मुझे उम्मीद है, भविष्य में आपका हर कदम सही ही होगा। मुझे तो उम्मीद है, पूरा विश्वास है। जो कहा है, उसे सुनो, उसे समझो, प्रयोग में लाओ। उम्मीद नहीं, आशा तो परम दुःख का कारण है। यहाँ तो बस एक सीरियल चल रहा है, इससे अधिक नहीं, जो काम प्रकृति ने सौपा है, उसे पूरा कर दो, बस ज्यादा उलझना बेकार है। प्रश्न था - ”आपने अनंत यात्रा में कुंभ के द्वारा नीलकंठ को कहलाया है। मेरा कार्य तुम्हारा विवेक जाग्रत करना था। हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी न रहे.यह क्यो”? क्यों, बस एक कहानी है, बस। प्रकृति हर एक को अपना कार्य करने भेजती है। यह भी कि एक ड्रामा चल रहा है। इसका कोई कारण नहीं है। किसी ने कहा है,‘एब्सर्ड ड्रामा’, आपने ही बताया था। इसका कोई कारण नहीं है। बुद्धिमत्ता और विवेक में फर्क है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जाग्रत होता है। नीलकंठ और कुंभ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो मन संसार में भटकता है, वही मन अंतर्मुखी हो जाता है, तब वह अपने अस्तित्व को पाता है, पर मार्ग विवेक के द्वारा ही मिलता है। संसार में सफलता बुद्धि के द्वारा मिलती है। शक्ति एक ही है। बुद्धिमत्ता जहाँ दुनिया में वैभवशाली बनाती है, वहीं विवेक भीतर की सम्पदा को सौपता है। पर जो विवेकी है, उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि उसे लोग किस तरह देखते हैं। वह बाहर के दबाव में विचलित नहीं होता है। पवित्रता उसकी अपनी निजी होती है, वह बाहर के दबाव के आगे अपने आपको बदलता भी नहीं है। मैंने बकानी की घटना बताई थी, जब गुरुकुल शुरु हुआ, तब मेरे विरुद्ध बहुत ही गलत व्यवहार होता था। यहाँ तक कि मुझे मारने के लिएभी लोग आए थे। यहाँ तक कि जो गुरुकुल का सेवक था, वह भी यह ंजानता था, पर उसने भी मुझे नहीं बताया। वे लोग लाठियाँ लेकर आए, मैं कुए पर एक लंगोटी में नहा रहा था। वे लोग सामने आए और लाठी फेंककर नमस्कार करके चले गए। बाद में मैंने पूछा क्या बात थी। तब मुझे बताया गया था कि मुझे पीटकर भगाने के लिए कोई षडयंत्र था। बात बताने की है कि मुझे पता हो जाता तो क्या होता? मैं भी कुछ सोचता? पर नहीं, प्रकृति ने हमें साधारण मनुष्य बनाकर ही भेजा है।हमें, हम कुछ विशिष्ट हैं, ज्यादा जानते है, इस भ्रम से दूर रहना होगा। जो वास्तविक ब्रह्मनिष्ठ गुरु होते है, वे अपनी किसी भी विशिष्टता से अवगत भी नहीं होते। जो कुछ बाहर अप्रत्याशित घट जाता है, वह स्वतः हो जाता है, वे इस बारे में किसी भी प्रकार की कामना भी नहीं करते। यहाँ बहुत से लोग आए। आए और चले गए, साधारण सी कुटिया में उन्हें कुछ नहीं मिला। वे कुछ पाने आए थे, चले गए, कुछ रुक गए कुछ ठहर गए। कई लोग हैं, क्यों रुक गए उन्हें पता नहीं, डॉ. बसावड़ा आए थें। शिकागो में अपना क्लिनिक चलाते थे। दरवाजे से मुझे एकटक देखते रहे, फिर पास आकर बोले, जो आपने पाया, मुझे दे दें। मैंने कहा मुझे पता नहीं, क्या है। यहाँ तो नदी बह रही है, वह सभी की है।आपका पात्र जितना बड़ा है , ले जाएँ मुझे कुछ पता नहीं है। यह जल सबका है, किसी एक का नहीं है। आप अपने सवाल का उत्तर खुद पता करें, उत्तर मिलेगा। 16 साधन तत्व ”आप ही क्या, यहाँ जो भी आता है,शार्टकट चाहता है। यह दुनिया का कायदा है, दुनिया में सफलता पाने के लिए शार्टकट चल पड़ा है। परयहाँ का नियम दूसरा है।यहाँ कोई शार्टकट नहीं है। मुझे साठ साल से अधिक का समय लग गया था। बचपन में एक बार बैठा था। तब अचानक विचारों की श्रृंखला रुक गई थी। कुछ समझ नहीं पाया। फिर इंजीनियर साहब से पूछा, उन्होंने सब समझाया, पर फिर मैं भी परम्परागत साधनाओं में चला गया। धीरे-धीरे सब छूटता गया, आपने ‘अनाम यात्री’ भी लिखा है। जब मुझे इतने वर्ष लग गए। आप चाहते है, कुछ दिनों में कुछ घंटों में हो जाए। आप जाग्रत हो जाएं। ‘अनन्त यात्रा’ में कहा है, लगन महत्वपूर्ण है, एक दिन लक्ष्य तक ले जाती है। शास्त्रों ने इसीलिए इसे साधना माना है। मैंने बहुत बार समझाया है, शरीर और उसके द्वारा की गई साधनाओं से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह मानसिक क्रिया है। गीता में दो शब्द आए है। ‘मम‘ और ‘माम,’ एक व्यक्तिगत मन है, दूसरा अंतर्मन है। मैंने कभी आत्मा शब्द का प्रयोग नहीं किया। यह रुढ़ हो गया है। फिर इसकी व्याख्या करो। ईश्वर शब्द भी रुढ़ हो गया है। सबके अपने-अपने ईश्वर है। जैसे कागज की दो परतें होती हैं, उसी तरह इस मन की दो परत हैं। एक बाहर की ओर है, एक भीतर की ओर है। बाहर की ओर जो जाता है, वह आपका बाहरी मन है, जो भीतर की ओर हो रहा है, वह आपका अंतर्मन है। है वह शक्ति एक ही। एक की पहचान बुद्धिमता से होती है, दूसरी की पहचान विवेक से होती है। सबसे कठिन होता है मन और मस्तिष्क का गठजोड़ टूटना। मन का यह अस्वाभाविक निवास स्थान है। मन का मूल स्थान नाभि में है। इसे आप ”कॉस्मिक माइन्ड“ या ”नो माइन्ड“, भी कह सकते हैं। मैंने इसे अंतर्मन कहा है। यह विराट से जुड़ा रहने कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। पर यह जो कुछ कहा है, यह बुद्धिगत विवेचन नहीं है। यह उससे परे है, यह अनुभव है। पहले आपको अपने मन को नियंत्रण में ले जाना होगा। मैंने बार-बार कहा, मन की मृत्यु नहीं होगी। मन का नाश नहीं होगा। पंतजलिजी ने निरोध शब्द को सही तरह से समझाया होगा। चित्त की वृत्तियाँ जो तरंगों की तरह हैं, जब शांत हो जाती हैं, तब क्या होता है। योग मन और प्राण दोनों शक्तियों का एक हो जाना है। यह स्वाभाविक अवस्था है। अनन्त यात्रा में ‘रानी चूड़ाला’ राजा शिखिध्वज को यही समझाती है, आसन, प्रणायाम आदि बहिर्मुखी निरर्थक साधनाओं सेकोई लाभ होने वाला नहीं है। बाह्य मन जब नीचे उतरता है, तब इसकी अनुभूति स्वयं को होती है। विचारों की संख्या कम होने लगती है। कुछ दिव्य अनुभव भी होते हैं। अनवरत नाद सुनाई पड़ता है। पूर्वभास सा होने लगता है। फिर मन धीरे-धीरे कंठ पर होता हुआ हृदय तक आता है। यहाँ पर आकर प्रेमानुभूति उठती है। रविन्द्रनाथ टेगोर का संस्मरण पढ़ा था।अचानक उन्हें तालाब में, रास्ते के पोखर में, छोटे डबरेमें एक ही प्रकाश दिखाई पड़ा था, यह बात गीतांजलि लिखने के बहुत बाद की है। मन जब हृदय पर आता है, तब बाहर का बहुत कुछ छूट जाता है। यहाँ पर आकर बूंद निर्मल तो हो जाती है, पर तभी भीतर का भी अनुभव होता है और बाहर भी आना-जाना बना रहता है। पर हमारा मन अहंकारी है, वह बाहर अपनी पहचान चाहता है। संत लोग कितनी मालाएं पहनते हैं, भभूत लगाते हैं, इससे क्या होगा? जो नहीं है, क्या वह प्रकट हो जाएगा। वह तो तभी प्रकट होगा। जब मन, अंर्तमन में लय होगा। तब अंतर्मन सारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है। बुद्धि विवेक में डूब जाती है। यहाँ पर आकर राग-द्वेष विलीन होने लगते हैं। हम कहते है, दर्पण हो जाओ। वह यहाँ घटता है, पर यहाँ आओगे कैसे? बहुत पहले जब आप मिले थे। मूलचंद जी आते थे। डाह्याभाई आते थे। पोस्टमास्टर कन्हैयालाल जी थे। वे लोग आते गुरुकुल में थे। पर इनका अधिक समय आसन, प्रणायाम, शास्त्र अध्ययन तथा बातों मे बीतता था।मैंने एक-दो बार इशारा भी किया पर समझ नहीं पाए। वे बहुत भले सेवा भावी थे।निर्मल चरित्र के थे। पर मन जो एक बार परम्परागत विचारों में बंध जाता है, वह छूट नहीं पाता है। मन तो किसी न किसी एक खूंटे में बंधा रहना चाहता है। कन्हैयालाल जी विपश्यना सीखकर आए थे। वे वहाँ कुछ बन भी गए थे। चोयल साहब कहते थे, ध्यान सिखाओ, वे कृष्णमूर्ति के अनुयायी है, वे अवेयरनेस की बात करते है। जब कृष्णमूर्ति आते वे और उनके मित्र उनके लैक्चर सुनने पहुंच जाते।फिर मुझे सुनाने आते। मुझे उस आधार पर परखते। अगर मैं उन जैसी बात कर रहा हूॅं, तो ठीक है, नहीं तो, क्या कहा जाए? चाहे मंत्र जपो, किसी मूर्ति का ध्यान लगाओ, विपश्यना में जाओ, सब बाहर ही भटकाते रहेंगे। यह बात ध्यान रखना। जब स्वाभाविक साधन उपलब्ध है, तब बाह्य साधनों में जाकर मन को भटकाने की क्या जरुरत है? मैंने ‘अनंत यात्रा’ में कहा है, आपको समझाया है, जो भी कार्य प्रकृति ने सौपा है, मन को पूरी तरह उस में लगा दो। किसी भी हालत में उसे विपरीत जाने से रोकना होगा, मन की यह स्वाभाविक अवस्था हो जायेगी। वह हर जगह एकाग्र होने लगेगा। किसी एक ही मुकाम पर एकाग्र करने से उसकी दासता शुरु हो जाती है। ये सारेे, पंथ मत, मनुष्य को गुलाम बनाए रखने की परम्परा में ही है। ये सब व्यर्थ हैं। जो भी साधन है, उसमें मन लगाए रखना ही सार है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है, मन जब क्रिया में न हो, तब उसे बलपूर्वक क्रिया में लगाना बेकार है। यह सब सम्भव होता है, खाली समय मिलते ही अपने मन को विचार रहित लाने का प्रयास करना। यह सामान्य विधि है। इसे अवलोकन कहदो। धीरे-धीरे दो विचारों का गैप अनुभवन में आता है, इसे आप वर्तमान कह सकते है, यह समय नहीं है। विचार ही भूत और भविष्य में रहता है। जहाँ विचार नहीं है, वही वर्तमान घटता है। भले ही यह क्षण भर का हो, साधना यही है। यह अन्तराल धीरे-धीरे बढ़ता जावे। वर्तमान में विचार अपने आप गिर जाता है। वर्तमान ही, इस अनंत का दरवाजा है। ‘अनंत यात्रा’ में इसी बात को स्पष्ट किया है। बात होती भी है, लोग आते हैं, पूछते हैं। मैं कहता हूँ, वर्तमान में रहो। वो कहते है, यह कैसे सम्भव है। मैं कहता हूँ, आप यहाँ आए हैं, अकेले आए हैं या और भी साथ है? वे हँसते है, कहते है, अकेले है, फिर मैं चुप हो जाता हूँ। कैसे समझााऊँ, कि वे अकेले नहीं आए,अपने साथ बहुत बड़ी भीड़ साथ लेकर आए हैं। रात को सपने आते है, कितने लोग दिखाई पड़ते हैं। ये शाम तक तो साथ नहीं थे, रात को कहाँ से आ गए। सुबह उठते ही कहाँ चले गए? इन सभी की विदाई हो, तब जागृति, विचारणा और स्वप्न में चेतना की एक धारा का अनुभव होता है। तब प्रश्न था- आपने आत्मकृपा की बात कही थी?“ “हाँ आपने किताब भी लिखी, पर आत्मकृपा आपसे ही गायब हो गई। ”मैं“ और ”आत्म“, में भेद है, मैं और माम में भेद है। ”मम“, की कृपा, जब मैं इस ‘माम’ में विलीन हो जाती है, तब ‘माम’ ही सारे कार्य व्यवहार को संभाल लेता है। तब यह पता लगता है कि यह मेरी ही माया है। यह बाहर और भी भीतरका जगत मैंने ही बनाया है। बाह्य जगत से अधिक कष्टकारी मनोजगत होता है। बाह्य का जगत तो निरन्तर परिवर्तनशील है, पर भीतर का जगत तो संस्कार में ढलता जाता है। खाली न हो तो संग्रह ही कारण बनता चला जाता है।“ ”यह कैसे कम हो?“ ”फिर वही बात, बाह्य में किया गया कोई भी प्रयास अन्तर्मुखी बनने में सहायक नहीं होगा। इसके लिए एक ही उपाय है, निरन्तर वर्तमान में रहा जाए। वर्तमान का यह क्षण समय की सबसे छोटी इकाई मानलो। जहाँ समय है, वहाँ मन है, वहीं भूत है, वहीं भविष्य है। भूत का कोई अस्तित्व नहीं है। वह तो गया, हम उसे स्मृति के द्वारा वर्तमान में लाते हैं। भविष्य है वह एक सम्भावना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ निरन्तर सजग रहो तो पता लगता है। हम वर्तमान में हैं, वहाँ विचार नहीं हैं। यह निर्विचारता ही हमारा लक्ष्य है, जो हमें सदा से उपलब्ध है, पर हमें इसका ध्यान नहीं है। यहाँ जानना कुछ भी नहीं है, मात्र जिसे हम भूल गए थे, उसकी याद है। गीता में कहा गया ह, ‘माम अनुस्मर युद्धच’, मेरा निरन्तर स्मरण। यह स्मरण जप करना नहीं है। सुमिरन शब्द यहीं से बना है। काम तो करना ही होगा। मैंने यहाँ कुटिया पर लिख दिया था, ‘आलसी मत बनो,कार्यरत रहो।’ इसीलिए मैंने ध्यान शब्द का भी प्रयोग नहीं किया। ध्यान शब्द एकाग्रता के साधनों के लिए रुढ़ हो गया है। जितना हम वर्तमान में रहेंगे, एकाग्रता सहज ही प्राप्त होती जाएगी। मन स्वतः नियंत्रण में रहना सीखता जाएगा। मन बहुत चतुर है, याद रखना। ज्यांे ही तुम भीतर उतारोगे,यह तुम्हारे अनुभव को शब्द देने लगेगा। तुम अपने आप को असाधरण मानने लगोगे। गुरु बनना चाहोगे, बचना। यह काम तो तुमने पहले ही बहुत किया है। इसीलिए बार-बार यहाँ आते हो, बचना, बाहर के दुश्मन इतने बुरे नहीं हैं, जितने भीतर के होते हैं। यह मन बहुत चतुर है। अनुभूति बुद्धि से परे है। जहाँ तक बुद्धि है, वहाँ तक सब मन की कपोल कल्पनाएँ है, हम सत्य को कल्पनाओं से ढक देते हैं। वहाँ निरन्तर सजगता ही उपाय है। मन ज्यांे ही कल्पना लोक में ले जाना चाहे, तब सजग हो जाना। सजगता आग की तरह है, घास-फूस को तुरन्त जला देती है। प्रश्न था- ”गीता में कहा गया है,‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’, इसका क्या आशय रहा होगा?“ ”आशय क्या, वह धर्मात्मा तुरन्त हो जाता है। कहानियाँ हैं। इसके पहले श्लोक में आया है, ‘कोई कितना भी बुरा क्यों न हो। स्त्री, पाप योनी, शुद्ध सभी धर्मात्मा हो सकते हैं। इसमें क्या गलत है, धार्मिकता, कर्मकांड से परे है। इसे अध्यात्म भी कहा जाता है। यह जीवन जीने की शैली है। एक वाक्य में कहा जा सकता है, वर्तामान में रहो। ज्योंही हम यह सीख जाते हैं,यह हमारे जीवन जीने की शैली बन जाती है।हम धर्मात्मा हो जाते हैं। जहाँ तक मन है , वहीं तक समय है। वहीँ तक अतीत है और भविष्य है, वहीं तक पाप और पुण्य है। स्वर्ग और नर्क है। सब मन ही तो है, मन के खेल हैं। जब मन ही नहीं रहा तब क्या,...... क्षिप्रं, रस्सी जब कुएं में बाल्टी उतारती है, तब निरन्तर वह कार्य करती है, पर धीरे-धीरे वह घिसती जाती है, फिर अचानक टूट जाती है। परन्तु इस अचानक तक आते-आते उसे समय तो लगा था। यह हम क्यों भूल जाते है? जब पहली बार आप मिले थे, आप व्रत, उपवास करते थे। मुझे देखकर आप चौके थे। मैंने कभी व्रत के लिए नहीं कहा। स्वयं मेरा भोजन इतना अल्प रहा है कि लोग आश्चर्य करते हैं। व्रत-उपवास से जाग्रत पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह परम्परागत रुढ़ी है। हाँ, भोजन स्वास्थ्य के लिए अनुकूल हो। आहार-विहार में संतुलन हो। आपको दो कहानियाँ कहीं थीं। पहली ब्राह्मण बालक मूर्ति बनाता है और सिर काट देता है। पिता जाकर वणिक जिसने अनुष्ठान करवाया था ,उससेे पूछता है, धन वहाँ से आया था। वह बताता है कि उसका संकल्प था जो धन कसाई के यहाँ डूब गया है, मिल जाएगा तो कथा कराएगा। वह जाकर वणिक को उसका धन दे आता है। दूसरी कहानी थी कि संत जो भोजन करने गए थे, वे सेठानी का हार चुरा लाते है। फिर सोचते हैं, यह क्यों हुआ। वापिस लौटते हैं, पूछते हैं, तब पता लगता है कि जिस सेविका ने भोजन बनाया था, उसकी हार चुराने की भावना ढ्ढ़ हो चुकी थी। वही भावना अन्न ग्रहण के साथ उन्हें पराजित कर गई। संत हार वहाँ रख कर लौटते हैं। कहानी, कहानी होती है। सार जानना चाहिए। अन्ना से मन बनता है। मन का पोषण होता है। अन्न की शुद्धि अपरिहार्य है। इससे मन की गति कम होती है। पर यह छोड़कर अनीति से धन कमाओ, व्रत-उपवास करो, सब व्यर्थ है। पर कितना समझाओ, कोई मानने वाला नहीं है। सबके पास अपने- अपने तर्क हैं। सभी आसन सबके लिए नहीं हैं। हठ योग का जागृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। आध्यात्म के नाम पर बजार में सभी कुछ परोसा जाता है। रास्ता मन से ही है। मन से ही उसके पार जाया जा सकता है। मन को देखना है। गहरी सतर्कता के साथ, हर पल साथ रहता है। मन एक साथ दो कार्य कर सकता है। वह देखता भी है और दिखता भी है। वही दृष्टा है, वही दृश्य है। देखते-देखते दृश्य सिमटने लग जाता है। बातें सुनने के लिए नहीं है, प्रयोग में लाओ। ”तुमने पूछा था, पच्चीस सालों से मेरे साथ रहे, क्या पाया?“ ”पूछा, अपने आप से पूछो, अगर कुछ पाने के लिए ही आए थे, तो समय व्यर्थ गया। पानी में पड़ा पत्थर भी सौ साल तक भी वैसा ही रहता है, परिवर्तन वहीं आता है, जहाँ उसके लिए जगह हो। गीता में जो कहा गया है, वह प्रवचन के लिए नहीं है। तुरन्त, और यह भी कहा गया है, मन पर नियन्त्रण पाना कठिन है। अगर तुम यह समझ गए कि मन ही समय है। वे पच्चीस साल तुम्हारे मन पर अंकित छाप की तरह हैं,तो और वर्ष लग जाऐगेे। समझ गए कि मन ही समय है। मन जिन्दा रहता है, अतीत में या भविष्य में। जहाँ दोनों नहीं है, वही मन भी नहीं है। वहाँ समय कहाँ होगा? मात्र वर्तमान है, वर्तमान का द्वार ही भीतर का दरवाजा खोल देता है। जहाँ उस जगह जाना सम्भव है। परिवर्तन बाहर कुछ नहीं होगा, पर भीतर कुछ-कुुछ बदलनेे लगता है। विचारों के कम होते ही , विकार भी कम होने लगते है। पर जो लोग एक बाहर की ओर लक्ष्य बनाकर कुछ पाने के लिए निकलते हैं, वे वैसे के वैसे ही रह जाते हैं। बाहर जो आज सही दिख रहा है, वह कल गलत भी हो सकता है। बाहर कहाँ तक जाना है, परम्परागत साधनाएं पद्धतियाँ बाहर ही भटकाती हैं। यहाँ समय महत्वपूर्ण नहीं है। समझो, यह भटकाने वाली बातें हैं। हमारे ग्रन्थ यही करते आ रहे हैं। वे बाहर कोई लक्ष्य बनाते है। हम जब तक उस तक आते है, दूसरा हमारे सामनेे आ जाता है। मन को जरा सी छूट मिलती है, सतर्कता हटती है, वह पचासों सपने ले आता है, वह तुरन्त भविष्य में दौड़ जाता हैं। समझ यही है कि रास्ता भी यही है। इसलिए कृष्णमूर्ति कहते थे पाथ लैस लैंड , पर उनके अनुयायी समाज से कटकर रास्ता तलाश कर रहे थे। मेरी बातें उन लोगों के समझने में नही आतीं थीं। जाना मन से ही है। व्रत, उपवास, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, तंत्र- मंत्र , ये सब परम्परागत उपाय हैं। जड़ तो मन मे ंहै, वहीं से शुरुआत हो। सही आहार और व्यायाम शरीर के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। बस इतना ही इनका महत्व है। मन से हटकर क्रियाएं करो तथा वर्षो बाद मन पर आओ। यह सब व्यर्थ के उपाय है। दूसरे जो अपने ऊपर किसी नाम पर, किसी चित्र पर, एकाग्रता करना बताते है, वे भी धोखा ही देते है। मन ही तुम्हें नियंत्रित कर रहा है, अभी तक तुम मन से ही नियंत्रित हो रहे हो। मन तुम्हारे भीतर कोई एक लक्ष्य बना देता है। तुम उनके पीछे चल देते हो। बार-बार कहा है, मन से ही मन के पार तुम्हें जाना है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। मन ही कल्पनाओं से तुम्हें अनुभव भी दिखा देता है। जो भावतीत ध्यान की बात करते हैं, वह भी एक प्रकार की कल्पना ही है। यह हमारा मन ही हमें मुक्ति दिलाता है। यह बंधन में बांधता जाता है। जब जो चाहते हैं, वही दिखना शुरु हो जाता है। मन की शक्ति अपरम्पार है। पर उसके परे जो है, जो अंतर्मन है, वह विराट से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। जो समझदार हैं, वे इसी मन को एक उपाय देकर तुम्हें उलझा देते हैं। उस दिन तांत्रिक आए थे। वे भूत-प्रेतों की, सीद्धियों की चर्चा कर रहे थे। उनको भैरव दिखाई पड़ते हैं। मुझ से भी कहलाना चाह रहे थे, यह भी मन का ही प्रोजेक्शन है। मन जैसा चाहता है, बाहर वैसा ही दिखना शुरु हो जाता है। हम जो भी कल्पनाएं करते हैं, वे हमें सच दिखाई देती हैं। क्योंकि उन्हें हम ही ताकत देते है। देवी-देवताओं के दर्शन के पीछे यही धारणा है। हमारी ही शक्ति उन्हें प्रकट कर देती है। वे भी यही कहते हैं। शक्ति तुम्हारी ही है,जिसने मुझे प्रकट किया है। स्वर्ग और नर्क हमने ही बनाए हैं । हमारा लोभ और भय इन्हंे बना देता है। आपने सवाल किया था, हम लोग वृन्दावन गए थे। स्वामी शरणानन्दजी के आश्रम में ठहरे थे। वहाँ के लगभग सभी मंदिरों में आप गए थे। मैं बाहर ही गााड़ी में रहा। आप बार-बार पूछते थे, मैं भीतर क्यों नहीं जा रहा हूँ? गुरुकुल मंे मुकेश भाई अखण्ड रामायण कराते थे, यज्ञ होता था, मैं उधर नहीं गया। वे भी पूछते थे, क्यों? क्या उत्तर होगा, आपने मुझे अपने साथ जैसा आप चाहते हैं, करने को क्यों कहते हैं? हम ही तो मूर्तियाँ बना रहे हैं, और हम ही पूजा कर रहे हैं, उनसे मांगते भी हैं, यह सब मन का ही प्रपंच है, इससे अधिक कुछ भी नहीं है। एक दिन मेरी बातें समझ में आएंगी। मैं क्या साथ लेकर आया था। एक झोला था, यह शरीर, गुरुकुल कभी का छोड़ दिया। जिस दिन सरकार को सोंपा ,सब छोड़ दिया। शरीर को भी अब जाना है, यह प्रकृति का नियम है। पर यह याद रखना है कि यह कभी हमारा रहा ही नहीं। यह सम्पत्ति भी हमारी नहीं है शास्त्र की पहली पंक्ति थी-”तेन त्यक्तेन भुंजीथा,“ त्याग करते हुए भोग कर। पर जो हम चाहते हैं, जो पाना चाहते हैं, वह हमारी पूंजी निरन्तर हमारे साथ है, पर हमें उसका ध्यान नहीं है। यह ध्यान ही सजगता है। अवेयरनेस है। उसका स्मरण निरन्तर रहे, यही ध्यान है। पर जो हमारा नहीं है, वह हमेशा हमारा बना रहे, हम इसी प्रयास में सारा जीवन गवॉं देते हैं।। यही संसार है। यही हमारी मृग-मरीचिका है, जो हमारा हमेशा है, उसकी कोई खोज-खबर नहीं है।जो हमारा है, उसे क्या पाना है, उसे जो भूल गए है, उसकी स्मृति ही साधना है। यही सुमिरन है।“ प्रश्न था,- ”आपका सिद्धान्त तो बहुत छोटा सा है?“ ”पर आपने पूछ-पूछ कर इतना बड़ा कर दिया है। मौन ही सत्संग है। वही साधन है, वही साधना है। वहाँ मन अपने स्वाभाविक रुप को पाने लगता है। पर जहाँ शब्द आए, वहीं बुद्धि आ जाती है। विचार-बुद्धि की पहचान है। हस पथ पर चलने के लिए दो ही बाते मैंने बताई है, स्वाद पर नियंत्रण रखना और बोलने पर। यही एक इंद्रिय दो-दो काम एक साथ करती है। इस पर नियंत्रण सबसे कठिन होता है।जितना नियंत्रण होता जाए, उतना बेहतर है। आखिरी बात, शांत बैठ जाना और कुछ न करना,मैंने कभी नहीं कहा। योगः कर्मसु कौशलम, और माम अनुस्मर युद्ध च , जो भी काम आए , उसमें पूरा अपने आपको लगा देना , पर मन शांत रहे। मन की शांति की खोज में मत जाना। प्राण के साथ जो मन को लगाने की विधि है, वह आंशिक सफलता देती हे। महत्वपूर्ण है, मन जो संस्कारों के वेग से जो निरंत गतिशील रहता है, वहॉं , विकारों के वेग को कम करने का प्रयास, वह सधता है। विचारों के कम होने से, पर इसके लिए , कहीं चुप होकर बैठना नहीं हे। निरंतर कर्मरत रहो, पर भीतर चिन्तन न हो। निरंतर वर्तमान ें रहने से यह सधने लग जाता है।। चोयल और मेहरा ने पूछाथा, पैसिव अवेयरनैस, चॉइस लैस अवेयर नैस, यह मेरी मान्यता नहीं है। ध्यान जिसे अंग्रेजी में ममैडीेशन कहा जाता है, मात्र एकाग्रता ही हे। होना चाहिए यानि निरंतर अवेयरनैस, निरन्तर वर्तमान में रहना, जीवन की शैली है। प्रकृति ने हमें एक निश्चित कार्य से यहाँ भेजा है। उसका पता तभी लगता है, जब हम अन्तर्मुखी होते हैं। और अन्तर्मुखता में प्रवेश तभी होता है, जब हम वर्तमान में रहने लगते हैं। पर हम जीवन का उद्देश्य ध्न, प्रभुता , यश पाने में लगा देते है। आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति करती है, सहयोग देती है, पर हम इसी जाल में फॅंस जाते हैं। यहाँ जो भी घटता है, जो भी होता है, वहाँ न लोभ है, न भय है। न स्वर्ग की चाह है, न नरक का भय है। जो कृत्य होता है, वह स्वतः सेवा में ढल जाता है। ध्यान इसीलिए नहीं सिखाया जा सकता। जो ध्यान सिखाने की बात करते है वे समाज से भागकर कहीं ओर ले जाने की बात करते हैं। प्रकृति ने शांत होकर जड़ हो जाने के लिए नहीं भेजा है। हम शांत रहें , निरन्तर सजग रहें और कर्मरत रहें। सब प्रकृति का है, वह निरन्तर दे रही है,” तेरा तुझको साैंपत, क्या लागे मेरा,“ यही भावना बनी रहे। मेरे जाने के बाद यह शरीर भी किसी के काम आए तो अच्छा होगा। इसे किसी अस्पताल में दे देना, वैसे बहुत कृश हो गया है। 17 ”सरलता क्या है, प्रश्न था -”सरलता क्या है, क्या साधारण जीवन जीना ही आध्यात्मिक है? आज जबकि हर जगह धर्म के साथ वैभव जमा हो रहा है?“ स्वामीजी कह रहे थे- ”सरलता और साधारण जीवन एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं। जब मैं गुरुकुल को छोड़कर बाहर आया था, तब आप मिले थे। चातुर्मास पहले उदयपुर के पास एक लिंगजी में किया था, उसके बाद डॉ. भाटिया के यहाँ किया। आप तो उनके बारे में सब जानते है। वे निरामिष थे। साथ ही उनका कुछ व्यवहार असंगत भी था। भाटिया को लेकर समाज में अच्छी चर्चा नहीं थी। आप या माणकजी दो ही परिवारों में आना-जाना था। समाज के लोग कहते थे, यह आपने क्या किया? जो जागृत है, वह समाज की अपेक्षा में नहीं रहता है। उसका व्यवहार सामान्य लोगों की बुद्धि की अपेक्षा नहीं करता है। मुझे याद है, जब विश्व हिन्दू परिषद के लोग मेरे पास आए थे। पास में एक साधु था, वेशधारी। वे उसके साथ मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रचार करते थे। पाटन में मुझे जोधराज जी ने बताया। मैं हंँसा, ”आप क्या कहते है? मुझे क्या करना,“ वे उत्तेजित हो गए थे। बात सामान्य है। सरलता का अंग्रेजी में शब्द इनोसेन्स है। गीता के दूसरे अध्याय में भी इस शब्द की सही वर्णना है। उसका हृदय शांत रहता है, बुद्धि शुद्ध होती है, वह प्रसाद पाता है। यह प्रसाद क्या है, उसका हृदय निर्मल है। साथ ही उसके भीतर प्रसन्नाता है। सबसे शुद्ध बुद्धि बालक की होती है। पुराने जमाने में गुरुकुल में जब बालक का प्रवेश होता था, तभी उसका उपनयन संस्कार भी होता था। उसकी बुद्धि जहाँ शुद्ध होती है, वहीं हृदय भी शुद्ध होता है। यह निर्मलता आन्तरिक है।अबोध शब्द भी उस पवित्रता को थोड़ा बहुत बताता है। निर्दोेषता, शब्द भी है, पर यहाँ उसके चित्त में कोई स्पंदन नहीं है। कोई उफान होने की क्षमता नहीं है। वह क्षण में नाराज है, अगले ही क्षण प्रसन्न है, उसका मन अभी अतीत में जाना शुरु नहीं हुआ है। साधना भी मन की यह निर्मलता प्रदान करती है। साधु वही है, जो भीतर से अत्यन्त सरल है। धागे को तो दस गांठे लगा दे, उतना ही वजन रहेगा। पर गांठे धांगे की सरलता को दबा जाती है। वही हमारे साथ होता है। हमारे भीतर क्या है, हमें क्या पता, कितना संग्रह जमा कर रखना है? मेरे पास सामान कम से कम है। पर इसका कारण है, मेरी आवश्यकताएं भी कम से कम हैं। एक साधारण काश्तकार की झौंपड़ी में भी, मैं रहा हूँ। शुरु-शुरु में घास के पूलों पर चारा बिछाकर भी रहा हूँ। बहुत सर्दी जब होती थी, तब शरीर को ताप भी उनसे मिल जाता था। कोड़क्या में तब पुरोहित जी की स्थिति साधारण थी। वहाँ रहा, उनके घर के पास यही व्यवस्था हुई थी। जहाँ विचारणा का आदर नहीं रहता। भीतर कुछ है ही नहीं। जो तुलना करे, संग्रह करे। जहाँ निर्विचरता में रहना है, वहाँ सजगता है, एक चौकन्नापन, बस दर्पण के आगे, चित्र आए और गए। वह तो अप्रभावित है। जो गया सो गया, उसकी छाप नहीं। प्रश्न था- ”परन्तु आपकी स्मृति तो ठीक है, आपको तीन वर्ष की आयु से अब तक की सारी बातें याद है?“ ”नहीं, याद कुछ भी नहीं है।“ ”फिर?“ ”तो क्या होता है, मन जो है, सक्रिय होते ही बंद कमरे से वह चीज निकल लाता है। आप याद रखते हैं, दस बार दोहराते है, पर जहाँ यह शांत निर्विचारता होती है, वहाँ स्मृति का दबाव नहीं होता है। जब सम्बन्ध जुड़ता है, तब वह वस्तु, उसका परिप्रेक्ष्य उजागर हो जाता है। सोता हूँ, एक करवट सोता हूँ, सोते ही नींद आ जाती है। एक रोशनी की बीम सी, तेज रोशनी भोंहो के बीच में अनुभव होती है, और प्रगाढ़ निद्रा आ जाती है। प्रश्न था- ”स्वप्न नहीं आते?“ सामान्यतः नहीं। जब किसी ने कोई प्रश्न पूछा है और भीतर से प्रेरणा उठी है। उसके बारे में बताया जाए। तब नींद में जाते समय उस पर सोचता हूँ, उसका उत्तर आ जाता है। आपको पहले ”व्यावरा“, वाली घटना के बारे में बताया था। प्रश्न था- ”पर संतों का जीवन तो अब बहुत विलासी हो गया है?“ ”यह अपने-अपने सोचने की बात है। ओशो हीरो का मुकुट लगाते हैं। ‘राल्सराय’कार रखते है। दीनदयाल जी आए थे, उन्होंने यह सवाल पूछा था। मैंने कहा था, रामकृष्ण परमहंस को तो मैंने नहीं देखा, पर वे जागृत थे। रमण महर्षि के पास रहा, वहाँ जाकर समय बिताया। वे जागृत थे। ओशो भी वर्तमान में जागृत पुरुष हैं।“ ”पर उनका वैभवशाली जीवन?“ वे इससे प्रभावित है, या नहीं, यह पता नहीं। आसक्ति अलग चीज है। वह तो एक कॉपीन से भी हो जाती है। पुरानी कहानी है, राजा के पास एक फकीर आकर रुके थे, उनके पास एक कॉपीन और एक कमंडल था। वे राजा को ब्रह्मज्ञान देने आए थे। दोनों बात कर रहे थे कि तभी एक सेवक ने आकर सूचना दी कि नगर के पूर्व कोने में आग लग गई है। राजा ने कहा, आग बुझाओ। थोड़ी देर बाद फिर प्रहरी आया, आग बुझ नहीं पा रही हैं। आगे बढ़ती हुई, बाजार तक आ पहुँची है। राजा ने कहा, सेनापति से कहो, जाएं उसे रोकें। कुछ देर बाद प्रहरी ने कहा,आग रुकी नहीं है, अतिथि शाला तक आ गई है। राजा ने कहा, अरे, मंत्री जी को बोलो, जाएं। तब तक देखा, संत जी उठ रहे थे। राजा ने पूछा, आप कहाँ चले? वे बोले,” मेरा कमंडल वहाँ रह गया है?“ राजा हँसा, बोला, ”महाराज, मेरा तो नगर ही जल गया है। आपको अपने कमंडल की याद है।“ कहानी, कहानी होती है। सार एक ही है। सरलता और साधारण जीवन दोनों एक नहीं है। जहाँ निर्विचारता है, वहाँ वर्तमान है, वहाँ चित की सरलता है। उनके लिए साधारण जीवन हो या वैभवशाली जीवन हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हमारे यहाँ इसीलिए राजा जनक का उदाहरण दिया जाता है। राजा होना कोई अभिशाप नहीं है। और अकिंचन होना कोई वरदान नहीं है। दोनों के बीच का सेतु आसक्ति है। आसक्तिका रहना हमेशा अतीत में है। हम उसे बुद्धिमता से मजबूत करते हैं। चित्त की सरलता का संपत्ति होने या न होने से फर्क नहीं पड़ता है। फ़र्क पड़ता है, मजबूती से उसे पकड़ने में। जो अनासक्त है, वह कीचड़ में तो रहेगा, पर अप्रभावित है। उसके भीतर किसी प्रकार द्वन्द्व नहीं है। उसे न पश्चाताप है, न प्रायश्चित है । वह तो अपने भीतर स्वाभाविक प्रसन्नता में है। उसका किसी के साथ किसी प्रकार का अलगाव ही नहीं है। जहाँ वर्तमान है, जो वर्तमान में है, वहाँ सरलता का आना स्वाभाविक है। गांँठे हमेशा धागे में अतीत के आग्रह से बनती है। वर्तमान में तो गांँठ खुल जाती है। जो धागा है, वही चेतना की सहज परिभाषा है। हमेशा सीधा पर मुड़ा हुआ भी, उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है। जैसे चाहो, मोड़ लो, जितना चाहो, मोड़ लो, सरलता वहीं है। 18 अंत में- स्वामीजी का अंतिम संस्कार कैसे होगा?“ समय आचुका है, यह आभास सबको होचुकाथा।पर प्रश्न पूछने का साहस नहीं हो पारहा था। अचानक स्वामीजी खुद ही बता रहे थें । ”आप मेरे लिए जानना चाहते हैं।। पुरानी प्रथा थी, पानी में शरीर बहा देते थे। पर इससे पर्यावरण संकट खड़ा होता है। फिर गड्डा खोदकर उसमें पानी भर के शरीर को रखने की प्रथा आयी। जमीन में सन्यासी को मुसलमानो की तरह रख देते है। सामान्य जीवन में अंतिम संस्कार शवदाह गृह में होता है। शरीर तो मिट्टी है। मरने के बाद किस काम का। आप तो उसे अस्पताल में दे देना, शायद कोई अंग किसी के काम आ जाए।“ सब चुप थे। वे कह रहे थे- ”मैंने बहुत पहले कहा था, मैं एक अंग्रेजी की कविता जो बचपन में पढ़ी थी, आपको सुनाई थी। मुझे यहाँ शांत अकेला पड़े रहने दो। मेरे जाने के बाद एक पत्थर भी यहाँ न रहे, जो किसी को मेरी पहचान भी बताया करे।“ मैंने कहा- ”पर यह तो संभव नहीं है।“ ”क्यों,“ ” मैं कहूँगा भी तो क्या लोग मेरी बात सुनेंगे। वे मेरे प्रति क्रोध से भर जाएंगे। जो वो चाहेंगे वही करना पड़ेगा।“ ”जाने के बाद क्या होगा, किसे पता। पर कालीबाड़ी“ गया था। वहाँ देखा, परमहंस की और माँ शारदा की पूजा होती है। बनारस में देखा, जिस कबीर ने सारे कर्मकांड की बुराई की, वहाँ उसकी मूर्ति की पूजा, भोग लगता है। और तो कुछ सीखा नहीं जाता, यह पुराणवाद वहाँ पहुँच जाता है। मैं तो यह भी नहीं चाहता कोई फूल तोडे़। मैं माला पहनना पसन्द नहीं करता। मैं अपने अंगूठे में गुलाल लगाना पसन्द नहीं करता। मैंने किसी प्रकार के गुरुडम को यहाँ जगह नहीं दी। कुटिया है, जिसका मन है, आ जाए, चला जाए। न मैंने यहाँ मेरी या किसी और की तस्वीर कभी लगवाई। लोग आते थे, पूछते थे। यहाँ यह खुशबू कहाँ से आती है? वे ढूँढ़ते, पर कोई अगरबत्ती नहीं पाकर चुप हो जाते। मैंने इसीलिए कुटिया छोड़ दी। स्कूल तक सरकार को दे दिया। सारा सामान सौप दिया। जब जीवन में संग्रह नहीं करना, तब बाद में क्यों?“ पर लोग चाहते हैं-,सभी के कहने का आशय यही था। च्रंद्रधर जी थे, चोयल थे, पार्वती बाई, मेनकाजी, क्षमा, उम्मेदसिंह ,सभी की राय थी, ”पर लोग प्रेम करते है। वे चाहते हैं, उनकी भावना का भी आदर होना चाहिए।“ ”तो रहे, पर होता क्या है, बाद में मूर्ति लग जाती है। पूजा-पाठ शुरु हो जाता है। जो कहा गया है, वह तो कोई सुनता नहीं। उनका मन और अधिक जटिल हो जाता है। वे हर बात की गली निकाल लाते है। हिन्दू धर्म का यही पुराणवाद प्रभावी है। जहाँ हर विचार को हम गलत विचार में बदल देते है।“ ”मैं आपके साथ वृन्दावन गया था।“ स्वामीजी कह रहे थे, हरे राम हरे कृष्ण मंदिर में आप लोग गए थे। क्या देखा? गुरु की प्रतिमा लगाकर उसकी पूजा होती है।भीतर भगवान की पूजा हो रही है। हम लोग स्वामी शरणानंदजी के आश्रम में रुके थे। उनका साहित्य ही मैंने आपको पढ़ने को दिया था। वहाँ उनके शिष्य जो आश्रम चलाते है, मिलने को आए थे। वहाँ क्या देखा। उनके विचार, उन पर विचार करता हुआ कोई नहीं मिला। आप उनकी समाधि पर भी गए थे। उस स्थान पर शांति यथावत थी। पुराने लोग आते नहीं है। नए जुड़ नहीं पा रहे है। यह चर्चा का विषय था। क्यों? जो सम्प्रदाय के विरुद्ध खड़ा होता है, उसके जाने के बाद उसके अनुयायी सबसे पहले उसे सम्प्रदाय में ही डाल देते है। भीड़ जब तक वह जीवित होता है, उसकी उपेक्षा रखती है, पर जाने के बाद सबसे पहले वे ही उसकी मूर्ति पर माला पहनाते है। कुछ अपराध भावना होती है। जो कभी नहीं आते, वे सबसे आगे आकर अपना चेहरा दिखाना चाहते हैं।“ ”तो क्या किया जाए?“ हम सभी का यही सवाल था। ”मुझे क्या कहना। मेरे विचार हैं, आपको सही लगें तो इन पर विचार करें, प्रयोग में लाएँ। मैं नहीं कहता, ये ही सही हैं। हर युग में विचारक आते है। यहाँ हर चीज बदल रही है। विचार भी बदलते है। जो विचारों को स्थाई मानकर उनकी गतिशीलता का विरोध करता है, वही साम्प्रदायिक हो जाता है। महत्वपूर्ण है, खाली सोचते मत रहो, जो जाना है,उसका आदर हो, वह प्रयोग में आए। दुनिया का अपना सोचने का तरीका है, वह अपनी अपेक्षा सें, अपनी जरुरत में चीजे गढ़ लेती है। जाने के बाद, जो नहीं सुना है, वह सुनती है, जो नहीं देखा है, वह देखती है। वह अपने आदर्श को महान से महान बनाना चाहती है। मैं भी आपकी तरह साधारण इन्सान हूँ, .....बस।“ यह तो सच नहीं, हम सब उदास थे, क्या सचमुच हम जिनके साथ वर्षों से हैं, जो एक पिता की तरह हम सभी का एक परिवार मानते हुए पालन करते रहे, क्या वे साधारण हैं?“यह प्रश्न सबके मन में था। ”क्यों, इससे अधिक क्या होगा। मैं आपके यहाँ हूँ। जैसे घर का सदस्य बीमार होता है, वैसे ही बीमार हूँ। आप लोग देख रहे है, मुझे भी रोग हुआ है, चिकित्सक आते है,शरीर तो एक ही है।“ चंद्रधर जी उदास थे, बोले ,” आप एकबार स्वस्थ हो जाएं, प्रकृति से ही प्रार्थना करलें।“ ”क्या?“ स्वामीजी हँसे, अरे! आप तो दार्शनिक हैं, वेदांत के आचार्य हैं।“ ”परन्तु!“....... वे अटकते हुए बोले। ” यही जानने का प्रयास करो। प्रकृति के नियमों का कोई उल्लघंन नहीं कर सकता। हाँ, शांत सागर में विलीन होती हुई एक लहर की तरह रहना यहाँ सम्भव है। बाकी अब कुछ कहना कठिन है।“ यह सच है, हम उनकी इस बात को नहीं मान पाए। हमारी भावनाएं प्रभावी होती चली गईं। हम उनकी निर्वाणी देह के साथ गुरुकुल आए। जहाँ हजारों की भीड़ थी। जहाँ स्वामीजी एक बड़े परिवार के मुखिया की तरह लगभग पचास साल से रह रहे थे। कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि वे हमारे बीच में नहीं हैं। यही भावना आज भी बलवती है, उनकी कुटिया, उनका ट्रान्जिस्टर, उनके दो जोड़ी कपड़े, चार नंबर के कपड़े के जूते और कुटिया का ख्ुला दरवाजा, समाधि -स्थल पर दूर से आने वाले अतिथि से यही कहता है, वे हैं तो यहीं, शायद कुछ देर के लिए कहीं बाहर गए हुए हैं।

 

                                                            गुरुवाणी

 

 

 

 

 

नरेन्द्र नाथ

 

 

अपनी बात

            ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्ति

            द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्

            एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं

            भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि।।

                                                                                    (बृ़.स्तो..)

           

            सन् 1972 में पूज्य स्वामीजी के सम्पर्क में आया था। धर्म , सम्प्रदाय ,अध्यात्म को लेकर अनेक जिज्ञासाएं थीं। वर्ष कब बीत गए ,पता ही नहीं लगा। सन् 2000 में अचानक कोटा से बीकानेर तबादला होगया था। जाना पड़ा। 28 जनवरी को गुरुकुल में उत्सव था, देखा स्वामीजी बीमार हैं। कोटा चलने के लिए , निवेदन किया। चार बजे बताएंगे कहा।

 

वे कोटा आगए, अवकाश लेकर मैं भी आगया था। सभी परिचित आगए थे स्वामीजी पहले की तरह गंभीर बीमारी में  भी प्रसन्न थे। मधुमेह से पांव में घाव होगया था। परन्तु वे जिज्ञासुओं के उत्तर देते रहे। उनकी अपनी ही नियंत्रित व्यवस्था थी।

 

जहाँ वे एक वैज्ञानिक की तरह आत्मानुसंधान में किए प्रयागों को समझाने का प्रयास अनवरत करते रहे, वहाँ किसी प्रकार का कोई भेद-भाव नहीं था। इस  अत्यधिक नकारात्मक दुनिया में वे अत्यधिक सकारात्मकता के वाहक थे।वर्त्तमान में कैसे रहा जाए?“औरयह वर्त्तमान ही तो स्थितिप्रज्ञता है“, वे अध्यात्म को मनुष्य जाति के लिए एक शक्ति सूत्र की तरह प्रयोग में लाने के लिए प्रयत्नशील रहे।

 

, उनसे मिली आज्ञाओं  को यहाँ लाने का प्रयास, एक साधक की विनम्र श्रद्धंजलि है।

 

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                            अनुक्रम

1-मेरी बात    

2-गुरुतत्व और साधन         

3-ध्यान

4.वर्तमान में रहना   

5-स्वधर्म       

6-अंतिम मुक्ति                     

7-याचक नहीं दाता बना      

8-जीवन एक खेल है बस     

9-सत्य की खोज      

10-बंधन और मुक्ति           

11-कर्मशील बनो

12 एक सही कदम   

13 अंतिम आज्ञा      

14-मम माया दुरत्या

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 16-साधन तत्व       

17-सरलता क्या है   

 

18-अन्त में   

                        मेरी बात

 

 

            अमरीका से आई केरोल नागले को अमरीका में डॉ. बसावड़ा ने बताया था कि अमरीका वाले  भारत में जिन प्रबुद्ध व्यक्तियों की तलाश में हैं, स्वामी जी उनमें से एक है। म्दसपहीजमदमक च्मतेवद यह उनका प्रयुक्त वाक्य था। वह कोटा में मेरे ही घर में ठहरी। उसका पहला सवाल था, क्या ये प्रबुद्ध हैं? वे दक्षिण के  साईं बाबा,  केरल की अम्मा,  आदि वर्तमान के प्रख्यात संतों से मिलकर यहाँ आई थी।

 

 स्वामी जी का नाम लोकप्रिय नहीं था, वे अपनी कुटिया से बाहर जाना बहुत कम पसन्द करते थे, बहुत ही कम लोगों का उनके पास आना-जाना था।  रामप्रसाद जी पुरोहित कहा करते थे, मैंने अपने जीवन में ऐसे संत नहीं देखे, क्या है इनके पास में नहीं जानता, पर ऐसा कुछ है, मैं ही क्या मेरा पूरा परिवार इसीलिए खिंचा चला आता है। अमरीका से आई केरोल नागले ने मुझसे कहा था, मैं क्या उत्तर देता। यही कहा पिछले पच्चीस साल से साथ हूूँ, पर तुम्हारा सवाल जो है, उसका उत्तर मैं नहीं दे सकता।

 

            हम लोग कुटिया में थे। गुरुकुल में कार्यक्रम था। श्री कडवानीजी, ओझाजी आदि भी वहाँ थे। केरोल का पहला सवाल था, ”क्या आप जागृत पुरुष; मदसपहीजमदमक च्मतेवदद्ध हैं?“

            स्वामी जी बोले-”मैं नहीं जानता, आपको जो लगता है, आप माने।

            उसका अगला सवाल था-” क्या आप मुझे भी जागृति;मदसपहीजमदउमदजद्ध करा सकते है?“

                        स्वामीजी चुप थे, फिर हंसे,” अभी तुम्हारा बच्चा नारायण  छोटा है, पति ग्रेग है,  नौकरी है, इतनी जिम्मेदारियाँ है, क्या वास्तव में चाहती हो? बहुत कुछ छोड़ना भी होगा।

 

            वह चुप रही।  

           

            वह स्वाजी से उनके जीवन के बारे में सवाल पूछती रही।

            स्वामी जी हंस रहे थे, कह रहे थे, ”नदी तो बह रही है, पर किनारे को हो ही पकड़े रहोगी, तो भीतर कैसे प्रवेश करोगी? यहाँ सबकी हालत यही है। नाव भी पार उतारने के लिए ही होती है, पर नाव में बैठे रहे तो...?“

वह पूछ रही थी,”आपने कौन-सी साधना की है?“

            स्वामी जी हँसे,”सब, तब पता नहीं था, जिसने जो बताया, सभी किया, फिर एक इंजीनियर साहब मिले, वे थियोसाफिस्ट थे, उन्होंने कुछ रास्ता बताया। तब नौ-दस साल की आयु थी। धीरे-धीरे बाहर का सब छूटता गया। पाया विधियां सब व्यर्थ हैं, मन ही कुंजी है, मन क्या है, किसी ने देखा नहीं है, इसके क्रिया कलाप को सब जानते हैं।

 

            पर मन को इन्द्र्रियाँ बाहर ले जाती हैं, उन्हें विषय भोग चाहिए। पर यही मन जब नियंत्रित होता है, इसको बाहर जाने की जगह नहीं मिलती, तब यह अंतर्मुखी होने लगता है, वहीं द्वार है।तब यह मस्तिष्क से नीचे उतरता है, तब मन और मस्तिष्क का गठबंधन टूटता है। तब पता लगता है कि मन अलग है, मस्तिष्क अलग है। मन एक कागज की तरह है, ऊपर की सतह बाह्य मन है।

 

             नीचे की अंतर्मन, यह अंतर्मन अत्यंत शक्तिशाली है। जहाँ बाह्य मन है, वहाँ संसार है, वहाँ भटकाव है। सभी विकार वहाँ हैं।वहीं मृत्यु है, वहीं जन्म है। वहीं भय है, वहीं भटकाव है। पर बाह्य मन जब नीचे उतरता है ;यह भी समझाने के लिए कहा गया है द्ध।

 

            तब मन दोनो भोहांे के बीच जहाँ भृकुटी है, वहीं उसकी अनुभूति होती है। फिर यह नासिका तथा कंठ   से हृदय तक आता है। तभी कहा जाता है हृदय में अंगुष्ठ बराबर उसका निवास है। मन अपने मूल निवास, नाभि तक चला जाता है, पर वहाँ टिक नहीं पाता है। उसे हृदय तक आकर ठहरना होता है। यह ज्ञानी की अवस्था है। वह शांत है, वह सुखी है, वह संतोषी है, वह आत्मविश्वासी है, साथ ही वह प्रसन्न है। वहाँ  उसे कोई संशय नहीं  है। बुद्धि विवेक में परिणित हो जाती है। तुम कहो कि वह जादूगरी से   चीजंे हवा में बनाए, यह संभव नहीं है। प्राकृतिक नियमों के विरुद्धवह कुछ भी नहीं कर सकता है। कुछ घटता भी है तो उसके होने से संभव अपने आप हो जाता है। उसके पास जोऔराहै, वह सकारात्मक है। वह प्रकृति के हाथ का एक पुर्जा मात्र रह जाता है।दाइ विल बी डनउसकी कोई इच्छा नहीं रहती है, यह उसकी पहली मृत्यु कह सकते हो। क्योंकि मन वहाँ नहीं रहा है। जन्म और मृत्यु  का कारण मन  ही  है।  बंधन औरऔर मोक्ष भी  मन का ही है। पर जब मन अंतर्मन में विलीन होता है। तब कार्य भी होंगे। पर मन शांत है। एक दर्पण की तरह , लोग आए और गए। वह भीतर अविचलित रहता है।

 

तो क्या उसकी मृत्यु नहींे होती?

 

 हाँ, देह  जब तक है, उसका अपना स्वाभाविक नियम रहेगा।मृत्यु वह तो प्रकृति का नियम है। समुद्र के किनारे हवा के झौकों  से लकड़ियाँ जाती हैं। इक्कट्ठी हो जाती हैं। समय पर फिर हवा के थपेड़ों से अलग-अलग हो जाती हैं। यह मिलना, बिछुड़ना, प्रकृति का अपना नियम है। इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

 

            मृत्यु ज्ञानी की भी होती है, जो नहीं जानता है , उसकी भी। संसार की उपस्थिति बाह्यमन में  है और संस्कार नाभि में रहता है। वहीं अंतर्मन है, जो निरन्तर विराट से होने वाले प्रवाह से जुड़ा रहने के कारण सजग रहता है ये लहरें अनवरत हैं। समस्त ब्रह्मांड की गति का ये कारण हैं।संसार इन लहरों  के धक्कांेे से स्पंदित होकर निरन्तर गतिशील है। यही स्पंदन  अंतर्मन के पास आकर संस्कार को गति देते हैं। पुनः इन सूक्ष्म स्पंदनों का वेग बाह्य मन को गति देता है। मन, मस्तिष्क को गति देता है। यही कारण है कि एक ही घटना की अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाँ होती है।

           

            फिर साधना क्या है?

            कुछ  नया नहीं है। शरीर के माध्यम से की गई कोई भी विधि यहॉं  कारगर नहीं है।यह तो मन के द्वारा मन को ही नियंत्रित करने की कला है। हाँ, शरीर की बनावट बुनावट सबकी अलग है। इसलिए इसके लिए कोई एक रास्ता नहीं है। इसीलिए मैं किसी को भी ध्यान नहीं सिखाता। ध्यान तो सिखाने की चीज नहीं है। यह तो अपने आप हो जाता है। मन जब वर्तमान में रहने लगता है तब मन का  भटकाव कम हो जाता हे। वह जहाँ है, वहीं हैं, यही ध्यान है। ध्यान तो अपने आप पाया जाता है। यह जीवन और जगत से काटकर सिखाने की चीज नहीं है। मैंनेअंनत यात्रा“, में इस बात पर स्पष्ट लिखा है उसे लोग पढ़ते ही नहीं  है।

 

 मैं बहुत पहले रमण महर्षि के आश्रम गया था।

 वहाँ मौन सत्संग होता था। वे आते थे और शांत बैठे रहते थे। लोग आते थे और सामने कतार में पंक्तिबद्ध बैठे रहते थे। उनके प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल जाते थे। वहाँ मैंने पाया था, नियांत्रित मन कितना शक्तिशाली होता है।

 

क्या यह अन्तर्मन ही आत्मा है?

 

            आत्मा भी दिया हुआ शब्द है। यह कोई  स्थाई इकाई नहीं है। आत्म कहो या अर्न्तमन, वह भी निरन्तर बदलने वाला है। यहाँ सब बदल रहा है। विराट से जुड़ा रहने के कारण यह अंतर्मन जहाँ शक्तिशाली है, वहीं यहाँ लहरों के निरन्तर स्पंदन हैं। लहर भी क्या स्थाई होती है? निरन्तर बनती -बिगड़ती है? संस्कार बीज   है। यही कारण है, जब मन नियंत्रित होता है, तब यह संस्कार रूपी बीज भुनने लग जाता है। इसकी अंकुरण क्षमता समाप्त होने लगती है। जब तक संस्कार  है , मन का भटकाव रहेगा। मन का नियंत्रण तथा संस्कारांे की शुद्धि  एक साथ होती है। एक सधता है, दूसरा अपने आप सधने लग जाता है। यही जीवन का उद्देश्य है।

 

            साधना के नाम पर मेरा यही कहना है, यहाँ कुछ भी स्थाई नहीं है। सब बदल रहा  है। मेरे विचार भी आपको अच्छे लगंे। स्वीकारंे नहीं तो छोड़दें। हाँ, एक बात जरुर कर सकते है, जहाँ आप का शरीर है, वहाँ आपके प्राण सदा रहते हैं, पर मन वहाँ नहीं रहता। उसको वहाँ लाना ही साधना है। मन और प्राण की वास्तविक युति ही वास्तविक योग है। इसलिए यहाँ करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह तो रहने की कला है। जहाँ आप हांे, जो भी कार्य कर रहे हों, काम तो आज की दुनिया में करना  ही होगा। जीवन यापन भी करना है, धन की जरुरत होती है। बस जहाँ हम हैं, वहीं मन रहे। उसका भटकाव कम से कम रहे। शुरु-शुरु में कठिनाई आती है। लोगों ने बहुत गलत  समझा  रखा  है। यह तो बहुत जटिल मार्ग है। ये करो - वो करो, कर्मकांड की भूल -भुलैया है। मैंने रास्ते सभी देखे, प्रयोग किए, प्रकृति निरन्तर मार्गदर्शन करती रही सबमें सरल और सीधा यही रास्ता है , निरंतर वर्त्तमान में रहो।

 

जो गया , वह गया, जो अभी नहीं आया पता नहीं, पर मन हमेशा भूत काल को ही वर्त्तमान में  ढकेलता रहता है। बहुत पहले सबको एक सत्तूवाली कहानी सुनाई थी। वह हांडी लाकर तरह-तरह की कल्पनाएं करता है। अपनी शादी भी कर लेता हे। बच्चे होजाते हैं। बच्चे पर गुस्सा करता हैं। मन कल्पना में उड़ान भरता रहता हैं , अचानक वर्त्तमान में खुद की लात से ही सत्तू की हांडी टूट जाती है।

 

रास्ता इतना सरल और सीधा है। विश्वास ही नहीं होता। वर्तमान में रहना, वर्तमान में ही सम्भव है। गीता में कहा गया हैक्षिप्रं भवति  धर्मात्मा,“ यह धर्मात्मा वही है, जो वर्तमान में है। वहाँ अतीत का दबाव है, स्मृतियाँ हैं, कोई विचारणा है, कोई अवधारणा  है, शांतमन ही शक्तिशाली होता है। जब वह किसी भी क्रिया के साथ लगता है, सफलता मिलती है, यही योग की स्थिति है। तो क्या हम इसे पाने में असमर्थ हैं? यह वर्तमान में रहने की क्षमता हमारी अपनी ही है, जिसे हमने खो दिया है।इसको पाना ही धर्म है, यही आध्यात्म है और यह अभी इसी जीवन में संभव है। जो निरन्तर वर्तमान में है, वही ध्यानी है, वही शांत सजगता है। उसी को तुम लोग जागृत;म्दसपहीजमदमकद्ध कहते हो। शरीर तो  जैसा सबका है, उसका भी  वैसा ही रहेगा। हाँ, शांत मन, प्रसन्नाता, संतोष,  उसकी कुछ-कुछ पहचान बता सकते हैं। वैसे तुम लोगों ने नियम -कायदे बनाए होंगे वो तुम जानो।

 

 

 

 

 

                                    2 गुरु तत्व और साधन

 

 

गुरु पूर्णिमा का उत्सव पहले यहाँ नहीं होता था। शुरु-शुरु मंे बहुत कम लोग यहाँ आते थे। बाद में उनका मन हुआ साल में एक बार कार्यक्रम हो तो सब एक-दूसरे को जानते, मिलते, बस इतना ही लक्ष्य था।

 

            कई बार तो मैं पूरे चातुर्मास कुटिया से नीचे ही नहीं उतरा। फिर लोगों का आग्रह था, स्वीकारना पड़ा। कारण यही रहा। मैं गुरु नहीं हूँ। ही मेरी कोई इच्छा रहीं। हाँ, आप लोग मानते हैं, यह आपका विश्वास है, मेरा तो इतना ही कहना है, जो यहाँ कहा गया है, उस पर विचार करंे, प्रयोग करें, अनुभव में लाएँ। अगर आप को लाभ मिलता है तो आगे बढ़ें। मेरी तो कुटिया का दरवाजा सबके लिए सदा खुला रहता है। यहाँ पर किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है, यह सबकी  अपनी ही है।

 

            यह सवाल सब पूछते हैं, कि क्या गुरु की जरुरत नहीं है? अगर मैं कहता हूँ, हाँ, तो सब खुश हो जाते हैं। अगर नहीं, तो सबके चेहरे उतर जाते हैं। इन गुरुओं ने बहुत परेशान किया है। जब बच्चा छोटा होता है, तो उसकी माँ या कोई और उसे पहली बार स्लेट पर कुछ लिखना सिखाता है। बिना शिक्षक के सामान्य शिक्षा भी सम्भव नहीं है। प्रारम्भ में अभ्यास सिखाया जाता है। यह आवश्यक है। जब मैं छोटा था, तब इंजीनियर  साहब मिले थे, उन्होंने मार्गदर्शन दिया और कहा, करना तुम्हें ही पड़ेगा। जब मैने कहा, सन्यासी बनना चाहता हूँ, तब वे बोले, भोजन और वस्त्र की आवश्यकताएं कम से कम होनी चाहिए।

 

बात कहने की है कि मार्ग दर्शन अपेक्षित है।  अनन्त यात्रा में बताया गया है कि किस प्रकार रानी चूड़ाला कुंभ को बटुक बनाकर अपने साथ ले जाती है। ब्रह्मनिष्ठ गुरु और सामान्य गुरु में भेद है। आज तो हमें हजारों गुरु मिल जायेंगे। उनकी रुचि लोकेषणा और धन कमानेमें है।

 

            ब्रह्मनिष्ठ जिनकी ब्रह्म में निष्ठा हो, जो श्रोत्रि़य भी हो, जो कुछ उसने जाना है, वह दूसरों को बता भी सके। पर  आजकल शास्त्र कथन बुद्धि का प्रदर्शन अधिक है।

 

            चोयल और मेहरा, कृष्णमूर्ति को मानते थे। कृष्णमूर्ति गुरु को नहीं मानते। मानने से मानना अच्छा है।  मैं उनसे यही कहता था।

             वे कहते थे फिर आप क्या हैं?

            आपका मित्र, सहयात्री। 

 

               डॉ बसावड़ा नेे चोयल को फोन किया था, कि मैं मिलना चाहता हूँ। तब मैं बम्बई गया हुआ था।

            बम्बई में पदमा के यहाँ मिलना तय हुआ।

            वे आए, दरवाजे पर खडे़ होकर बहुत देर तक टकटकी लगाए मुझे देखते रहे, वे बहुत बडे़ मनोवैज्ञानिक थे।

            मैंने कहा, अन्दर तो आइए।

            वे अन्दर आए, उन्होंने हाथ बढ़ाया।

            मैं मुस्कराया, उनके लिए कुर्सी लगी थी,  वे वहाँ बैठ गए।

            जाने लगे, बोले, फिर दस-पन्०ह दिन में आऊंगा।

            पर वो तो अगले ही दिन गए। कुर्सी लगी थी, पर वो नीचे बैठना चाह रहे थे। मैंने मना किया।

            उस दिन बोले, जो आपने अर्जित किया है, मुझे दे दें। मैं यह मांगता हूं।

            मैं हंसा, मैंने कहा, यहाँ तो नदी बह रही  है, जिसका जितना पात्र हो, वह ले जाए।

            कहने का मतलब है, कि कही  पर भी हमें , हम क्या हैं, क्या जानते है, प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। आज तो सब दुकान लगा कर बैठ गए हैं। इसीलिए कृष्णमूर्तिजी सही कहते हैं, गलत जगह पर जाने से कहीं  पर भी नही जाना बेहतर है।

            पर आप?“

            मैं यही कहता हूँ बीच का रास्ता ठीक है। एक बार मागदर्शन अवश्य लेना चाहिए। पर गुरु को ही पकड़ कर बैठ गए। उससे कुछ नहीं होगा। इस देश में यही हुआ है। गुरुवाद ने सबको निकम्मा कर दिया है। पहले तो मानसिक गुलामी आई, फिर दैहिक गुलामी गई। सात सौ साल से अधिक यह देश गुलाम रहा है, क्यों? जहाँ गीता का उपदेश दिया गया, वहाँ गुलामी क्यांे? कभी पूछा है।

 

            भगवान ने तो यही कहा था-”माम अनुस्मर युद्ध ...“ मेरा सतत स्मरण, और कर्म कर, पर हमने काहिली को ही धर्म मान लिया।

 

            मैं इसीलिए गुरुपूजा नहीं कर वाता। मुझे कोई पांव में रोली लगाए, माला पहनाए, पसंद नहीं है। मैं भी आप की तरह साधारण इन्सान हूँ।आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेष       हितैरेतः, यही सार तत्व है।

            फिर दूसरे से पूजा करवाना, यह, कहाँ का नियम  है?

 

            पर सब जगह भेड़ चाल है, तो कोई समझना चाहता है, खुद प्रयोग करना चाहता है। लोग आते है, बड़ी-बड़ी किताबें लिख देते हैं। जितना पुराना छप चुका है,  उससे हर बार नया तैयार हो जाता है। मैं पूछता हूँ, आपका इसमें क्या है, उत्तर नहीं मिलता है। सब ब्रह्म का पता बता रहे हैं। भ्रम ही अधिक फैला है।

 

            मैंने पहले ही कहा है, साधक को, जो जानना चाहता है,उसकी जिज्ञासा  ही बड़ी चीज है। तब जिज्ञासा उसे उस व्यक्ति के  पास स्वतः ले जाती है, जो जानता है। मुंडक उपनिषद में कहा गया है कि उसके शीष पर अग्नि जलती है, बटुक छोटा बच्चा। जो अपनी माँ को ही समस्त ज्ञान का अधिकारी मानता है। उसका और उसकी माँ का जो सम्बन्ध है, देखा है, वह माँ कहकर उसके साथ चिपट जाता है। बाहर खेलता रहेगा, पर जहाँ माँ हटी ,वह तुरंत उसके साथ हो लेगा।यह गुरु और शिष्य का संबंध है।  वे तब दो नहीं रह पाते है। जो जहाँ जाना गया है, वह वहाँ तुरन्त सम्प्रेषित होने लगता है।

 

            पर यहाँ तो लोग शार्टकट चाहते हैं। गुरु हैं, तो तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जायेंगे। भगवान राम ने कितने कष्ट उठाए। कृष्ण को जन्म से ही दुःख मिलेे। पर एक बात है, हम देखते हैं, समझते हैं। उस गुरु से संसार के सुख चाहते हैं। चाहते हैं संसार पार कर जाना, जाग्रत पुरुष होना। पर भीतर ही भीतर पूरी तरह संसार में डूबे रहते हैं।

           

            मैं किसी को सन्यासी बनने को नहीं कहता। मैं गृहस्थों के ही घर ठहरता रहा हूँ, मेरी इस बारे में आलोचना भी हुई है। पर सच बात यह है कि आज शांति और शक्ति की उनको ही जरुरत है।

 

            मुफ्त का भोजन पाना मुझको पसंद नहीं था। जब तक शरीर में शाक्ति रही, समाज की सेवा की। सन्यास लेने के बाद गुरुकुल चलाया। संस्था चलाई। जब शरीर से सेवा नहीं होती, तो मन से करता हूँ, मेरे पास पैसा है, बैंक में खाता है, मकान है, जमीन है, फिर भी प्रसन्न हूँ। इस शरीर से समाज की सेवा हुई है। यही जीवन का उद्देश्य है। प्रकृति पर जो निर्भर है, वह उसके कामों का स्वयं संचालन करती है। मैनें बहुत बार आपको बताया है, यह कोई शास्त्रों की चर्चा नहीं है, यह अनुभव है। लाभ, लोभ और भय से कोई काम नहीं होना चाहिए। यहाँ सेवा करो, मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा, यह भी लोभ ही है।स्वभाव ही सेवा रहे। सर्व भूतेषु हितै रतः यह भावना रहे।

होना यही चाहिए, हम अधिक से अधिक वर्तमान में रहें।

 

 प्रश्न था - प्रारम्भ में कठिनाई आती है।  यह समझने में  नहीं  आता है।

 

 स्वामीजी कह रहे थे- ”हाँ, हम हमेशा बाहर ही दुनिया में ही उलझे रहते हैं, संसार जितना बाहर है, उससे अधिक हमारे भीतर भी है, वह ज्यादा है। हम  निरंतर सोचते रहते  हैं,  रात को सोने का अभिनय करते हैं, वहाँ भी स्वप्न में विचारधारा शुरु हो जाती है। संसार नाना रुपों में उपस्थित हो जाता है। यह सब मन ही है। वर्तमान में रहने की कला है, जहाँ शरीर है, वहाँ मन रहे।

 

            मैंने यह जाना, इसका प्रारम्भ, रात से  शुरु हो  सकता है। जब हम अपने रोजमर्रा के काम सारे समाप्त कर  बिस्तर पर जाएँ तो तब बाहर के विचारों को आने से रोकंे तथा मन को देखें, वहाँ क्या विचार रहे हैं। यहाँ कोई संकल्प नहीं, कोई आदर्श नहीं, कैसे विचार रहे है, उन्हें बस देखें, यही पहला कदम है। होगा क्या, भीतर सजग होते ही, दूसरा विचार आते-आते रुक जायेगा। वही सजगता रहे, यही ध्यान है।

 

            हो सकता है, नींद जाए। पर अगर सजगता रही, तो कुछ दिन बाद, एक विचार से दूसरे विचार के बीच का ,‘गैपदिखने लग जाता है। यही सार है। यह अंतराल ही बढ़ना चाहिए। यही ध्यान है। सुबह उठते समय भी यही किया करंे। जो विचार रहे हैं, उन्हें देखंे। यहाँ सतर्कता पूर्वक किया गया, अवलोकन ही ध्यान बन जाता है। फिर जब दिन में कभी फुरसत मिले, हमें यह क्रिया करते रहना  चाहिए। इससे वर्तमान में रहने में सहायता मिलतेी है। मन का भटकाव कम होने लगता है।

 

            प्रश्न था-”पर यह संभव नहीं हो पाता है।

            हाँ, प्रारम्भ में कठिनाई आती है, मन का स्वभाव है।  वह नियंत्रण में नहीं आना चाहता। इसीलिए यहाँ बल नहीं लगाना है। क्रिया सहज हो, इसमें कोई कठिनाई भी नही है। फिर जो भी कार्य  हो, क्रिया हो, वहीं मन को रखनेे का अभ्यास बने।

 

            प्रश्न था- ”फिर त्राटक, ध्यान, मंत्र जप, पूजा,    का क्या प्रभाव रहेगा?“

            यह सभी  मन को एकाग्र करने की विधियाँ हैं। समय-समय पर बताई गई हैं। मूर्तिपूजा का भी यही आधार बना था। पर मन जितना बाह्य में उलझता जाता है, उतना ही मन बाह्य से प्रेरित होकर दबाव बनाता चला जाता है। मंत्र भी  एक बार गहराई में जाने के बाद छूटता नहीं है। ध्यान निर्विचारता को पाना है। किसी मूर्ति, चित्र पर एकाग्रता नहीं है। हम जिसके बारे में ज्यादा सोचते हैं, उसके गुलाम हो जाते हैं। क्या कारण रहा, इस्लाम में उनके महान गुरु का चित्र ही नहीं बनाया। चित्र मन ही बनाता है। गुरुडम का यही खेल है, हम गुरु के गुलाम बन कर रह जाते हैं।

           

            एकाग्रता प्रारम्भ में सहायक है। बच्चों को सिखाते हैं, सूर्य की किरणें कागज को जला नहीं पाती हैं। पर जब आतशी शीशे से गुजरती हैं, तो कागज जल उठता है। एकाग्रता में शक्ति है। परन्तु बाद में यही एकाग्रता बाधक भी हो जाती है। निर्विचारता में रहने  में यही बाधा बन जाती है। अंत में इसे भी दूर होना पड़ता है। पुरानी कहानी है। परमहंस जब भी ध्यान लगाते थे, माँ काली के  ध्यान में उनका मन डूब जाता था। गुरु उन्हें निर्विचारता का अभ्यास करा रहे थे। पर उनका चित्त काली में डूब जाता था। तब गुरु ने कांच निकाल कर , उनकी भृकुटि के बीच में चुभो दिया। खून निकल आया। काली की प्रतिमा चली गई, वे शांत मन से समाधि में चले गए। सार क्या है, एकाग्रता कहीं भी हो, वह भी अंत में एक बाधा बन जाती है। अनंत के सरोवर में डुबकी तभी लगती है, जब बाहर के सारे आधार खो जाते है, इसीलिए यहाँ जो अभ्यास है, वहाँ मन को प्रारम्भ से ही कही चिपटने की जरुरत नहीं रहती है।

           

            साध्य तक पहुँचने की यह सरल विधि है।

            बाह्य मन  ही संसार है, वह तो रहेगा, पर जब मन अन्तर्मुखी होकर अन्तर्मन में लीन हो जाता है, तब भटकाव नहीं रहता। शांति रहती है। जो गीता के दूसरेे अध्याय में बताया है, प्रसाद की प्राप्ति होती है। यह प्रसाद मांगने से नहीं मिलता, चोरी से मिलता है। यह सहज प्राप्ति है, जिसको पाकर चित को ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। 

           

            वह संसार में ही रहेगा, उसके सभी कार्य यथावत होते रहेंगे। पर उसका व्यवहार संतुलित, स्थिति प्रज्ञ की तरह रहेगा। यह बातें पढ़ने-पढ़ाने की भी नहीं हैं। यह हमारा स्वभाव बनना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सभी के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। पता करंे, अपने आप से पूछें, क्या आप यह नहीं चाहते हैं?

 

                                               

 

 

 

 

 

                                   3   ध्यान

           

हाँ, यहाँ वर्षो से लोग आते हैं। एक बात कहते हैं, ‘मैं उन्हें ध्यान सिखाऊँ। मैं उनसे कहता हूँ, यहाँ आए हो, ठहरंे, मुझे देखंे।

 

            पर इसके लिए उनके पास समय  नहीं है। वे बहुत रेडीमेड चाहते हैं। उनका भी कसूर नहीं है। हजार साल से लोग रहे हैं, हजारों ग्रन्थ ध्यान सिखाने के लिए लिखे गए हैं। सम्प्रदाय चल पडे़ हैं, पर बात वहीं की वहीं है।

 

            बाहर-बाहर परिवर्तन दिखाई पड़ता है, पर भीतर का संग्रह यथावत बना रहता है। विकार लेश मात्र भी कम नहीं होते हैं। बचपन से बुढ़ापे तक अगर कोई परिवर्तन आता है, तो शरीर युवा हुआ, प्रौढ़ हुआ, बूढ़ा हो जाता है, बुद्धि तीव्र हो जाती है। पहले इतनी तो बुद्धि की तीव्रता थी, इतना धन रखा कहाँ था? कहाँ से आया?

 

            जिसे एकाग्रता कहते हैं, उसका विकास हुआ है। एकाग्रता मस्तिष्क की शक्ति है, वहाँ मन किसी एक वस्तु पर, विचार पर एकाग्र हो जाता है। कवि, कलाकार विचारक, व्यवसायी इसी शक्ति से विकास पाते हैं। वैज्ञानिकों को तो कहा जाता है, वे अपने कार्य में इतने डूब जाते हैं, उन्हें बाहर का पता ही नहीं होता, एकाग्रता बहुमूल्य है। जब बचपन था, सभी प्रकार की साधनाएं भी बताई जाती रहीं। पर बाद में पता लगा, इनकी अपनी सीमा है। एक मुकाम पर आकर ये ठहर जाती हैं। जब भगवान शिव की बहुत आराधना की थी, तब वे प्रकट तो हुए थे, पर उन्होंने यही कहा  कि मैं तुम्हारी शक्ति से ही पैदा हुआ हूँ। तब धीरे-धीरे मन अंतर्मुखी होता गया। जाना जिसे बाहर तलाश कर रहा था, वह भीतर ही है।  

 

            चोयल आए थे, वे बम्बई गये थे। निसर्गदत्त महाराज से मिलकर आए थे। उन्होंने कहा, ‘डीप मेडीटेशन करोे।

            वे मुझसे पूछ रहे थे। मैंने कहा, आप मिलकर आए हैं, आप पता करें। मेडीटेशन शब्द ही गलत है। वहाँ कहा जाता है कि बाहर की वस्तु पर एकाग्रता लाओ। ये बाहर की वस्तु, मूर्ति हो, जप हो, रूप हो, या कुछ भी हो, पर यह एकाग्रता ही है।

 

            ध्यान का अर्थ है, मात्र वर्तमान में रहना। वहाँ शरीर भी वर्तमान में है। प्राण भी है और मन भी है। वर्तमान में भूत का दबाव है, भविष्य का संक्रमण है। पर मन एक पल के लिए भी वर्तमान में नही रहना चाहता। निर्विचारता में रहना ही ध्यान है। यही सजगता है। यही अेवयरनेस है। जैसे सागर में हवा के स्पर्श से तरंगे बन जाती हैं, पर हवा हो तो , ...कुछ-कुछ ऐसा ही होता है। शांत सागर की तरह कोई भीतर तरंग नहीं होती  हैं। पर वहाँ नींद नहीं है। बेहोशी नहीं है। बस शांति है। यहाँ एकाग्रता तो है, पर किसी एक निश्चित बिन्दु पर नहीं है। समग्रता मंे है, जहाँ है, जो भी है, वहीं एकाग्रता भी है। बस एक दर्पण है, जहाँ  है, जो भी है, रहा है, जा रहा है, वह दिखता है। एक पासिंग शो,   बस, वस्तु हटी दर्पण खाली का खाली हो गया है। कोई विचार नहीं।

 

            लोग पूछते है, ”मैं ध्यान क्यों नहीं सिखाता?“

            यह तो सिखाने की चीज नहीं है, यह मात्र रहने की कला है। जीवन जीने की शैली है। जहाँ शरीर सक्रिय है, पर मन निष्क्रिय है। शांत है। ध्यान सीखने की कला नहीं है। यह तो रहने की कला है। जो लोग एकाग्रता के नाम पर सिखाते हैं, उसे मेडीटेशन कहकर शब्द का दुरुपयोग करते हैं। वे खुद तो अंधकार में जाते ही हैं, साथ वाले  को भी ले जाते हैं। संत कबीर दास ने बहुत पहले कहा था-दोनों कुएं में  ही गिर जाते हैं।

 

            उस दिन कोई बता रहा था, बौद्धों के यहाँ भी अब मंत्र जप, मूर्ति पर एकाग्रता, तथा विपश्यना को मेडीटेशन के नाम से सिखाया जाता है। बुद्ध ने तो कभी यह नहीं कहा। मेडीटेशन का अर्थ एकाग्रता है, ध्यान नहीं  है। अंग्रेजी भाषा में ध्यान के लिए कोई शब्द नहीं है। वहाँ का दर्शन इस शब्द से परिचित ही नहीं था। उनका शब्द डिवोशन है। मेडीटेशन के लिए बाहर कोई ऑब्जेक्ट चाहिए।

            तो फिर जो किया है, वह व्यर्थ है          

            नहीं तो, ”अनंत यात्रा“,बताया है, जब भटकाव में आया शिखिघ्वज आत्मघात तक के लिए उतारू हो जाता है, तब कुंभ रुपी चूड़ाला उसे यही समझाती है, ये बहिर्मुख्री साधनाएं व्यर्थ तो हैं, पर उसकी लगन, या जिज्ञासा महत्वपूर्ण है। इस बात को स्पष्ट बताया गया है, पर समझना कौन चाहता है। सभी इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमते हैं। पूजा कैसे की जाए, माला कैसे जपी जाए, तीर्थ यात्रा कब करें, व्रत कितने करें, ज्यादा हुआ गुरुपूर्णिमा पर गुरु को भंेट दे आए, आशीर्वाद ले आए, बस। धाणी के बैल की तरह आँख पर पटृटी बाँधकर चलना चाहते हैं।

           

            आप भी वर्षो से यही सवाल पूछते रहे  हैं। टेप भी करते रहे हैं। मैंने कितना मना किया, सुनो, समझो, प्रयोग करो, पर आपने कभी किया? बात तो छोटी सी है। कितना घुमाकर कहो, अधिक से अधिक वर्तमान में रहना ही ध्यान है। वर्तमान में जब होते  हैं, वहाँ मन में कोई अवधारणा नहीं रहती। कोई विचार नहीं है, विकार है, परन्तु एकाग्रता है। जहाँ विचारणा है, वहाँ विकार भी हैं। ये दोनो एक-दूसरे के विरोधी शब्द नहीं हैं।

           

            जो लोग मेडीटेशन के नाम पर एकाग्रता सिखा रहे  हैं, वे आपको अपना गुलाम बना लेते हैं। आप बार-बार उन्ही का चिन्तन करते  हैं। सम्प्रदाय में कहा जाता है, गुरु की तस्वीर लगाओ, उसका ध्यान करो, उनके बताए नियमो की पालना करो, आप मात्र एक पुर्जा बन जाते हैं। वहाँ शांति कहाँ? आप बस भीख मांगने वाले भिखारी बन जाते हैं। हजार साल में हमने यही तो किया है।

           

            व्यवहारिक जगत में सफलता पाने के लिए एकाग्रता आवश्यक है, अनिवार्य है। यहाँ सफलता पाने के लिए मन की एकाग्रता बहुमूल्य है, पर उससे परे आत्मतत्व को पाने में, अपनी निजता से जुड़ने  में उतनी ही बाधक है। हाँ, पर जहाँ सतर्कता सधती है, वहाँ वर्तमान में रहना उपलब्ध होता है, वहाँ यह एकाग्रता सहज जाती है।

           

            मैं लोगों से यही कहता हूँ, आप यहाँ आएं, रहें , मुझे देखंे। मेरी कोई कमजोरी दिखाई पडे़ तो बताएं। मैं भी एक प्रयोगशील सामान्य व्यक्ति हूँ। जो मैंने जाना है,वही बताया है। पैंसठ साल सेे अधिक समय से इस मार्ग पर हूँ, यही जान पाया हूँ, छिपाया कुछ भी नहीं है।

 

            इसे आप यों  समझ सकते है।

            आप पूजा में एकाग्रता रखते है। मंत्र जप में आप तल्लीन हैं, पर पड़ौसी ने आपको आकर आवाज लगाई, आपकी एकाग्रता टूट जाएगी। एकाग्रता आप को एक ही वस्तु या विचार पर ठहराती है। उससे हटते ही विकर्षण शुरु हो जाता है। कवि को कविता पाठ करते देखा है, तल्लीनता से गीत गा रहा है, पर बाधा पहुँचते ही वह क्रोधित हो जाता है, गीत भूल जाता है। पर जहाँ ध्यान है, वहाँ सहज एकाग्रता है, हर क्षण सजगता है। यह बुनियादी समझने की बात है। सारा झगड़ा शब्दों का है।  मेडीटेशन को,  कंसन्टेªशन को ध्यान मानने से भ्रम बन गया है। मेडीटेशन    सिखाया जा सकता है, पर  ध्यान नहीं।

 

            शरीर की क्रिया सिखायी जाती है। पतंजलि ने आसन सिखाए हैं। प्रणायाम, प्राण का निग्रह है।

            पर इसके बाद जब मन में प्रवेश हुआ है। तब सविकल्प और निर्विकल्प समाधि के भेद किए गए है।

            समाधि शरीर का जड़ हो जाना नहीं है।

           

            सविकल्प में एकाग्रता है, पर मन की जटिलता है, जितना उसे एकाग्रता में रखा जाए वह चला जाता है, वहाँ उसे ठहरने के लिए जगह मिलती है, पर निर्विकल्पता में ठहरना कठिन हो जाता है।

 

            इसलिए पतंजलि ने वृतियों का निरोध जो कहा है, वह महत्वपूर्ण हो जाता है। ध्यान में प्रवेश यहीं होता है। मन, इन्द्रियाँ और विषय का सम्बन्ध टूट जाए, यही जानना, ‘ज्ञानहै।

 

            इसीलिए मैंने मेडीटेशन शब्द का कभी प्रयोग नहीं किया। ध्यान हमारा शब्द है, एकाग्रता हमारा शब्द है। एकाग्रता को कंसन्टेªशन कहा जा सकता है। जहाँ ध्यान है, वहाँ खालीपन है, विचार ही विकार है, वहाँ निर्विकल्पता है। मन की पहचान विचार से है, वहाँ विचार नहीं है। उस खालीपन में, बस एक दर्पण है, जहाँ दिखता है, वहाँ आकाश है, जहाँ सुनाई पड़ता है, जो है, वह है, भीतर कोई संग्रह कर्त्ता नहीं है। पर जहाँ एकाग्रता है, वहाँ उस बिन्दु से नीचे गिरना संभव है। यहाँ एकाग्रता सहज स्वभाविक है। भटकाव नहीं है।

 

            ध्यान को ही मैं वर्तमान में रहना कह रहा हूँ। यहाँ जो खालीपन है, वह एकाग्रता से प्राप्त कोई उपलब्धि नहीं है, ही एकाग्रता से उत्पन्ना कोई अवस्था है। यहाँ हर पल एकाग्रता है, जिसे सचेत कहा जा सकता है। यह कोई निष्क्रिय जड़ता नहीं है।

 

            यहाँ प्राप्त सजगता,  शक्ति सम्पन्न है। मैंने पहले कहा था, मन की दो परतें हैं, बाह्य मन और अंतर्मन। यहाँ बाह्य मन जो संसार से आकर्षित है, वह अंतर्मुखी होता हुआ , अपने मूल स्थान की ओर आता है। यह अलगाव स्पष्ट दिखई पड़ता है, तब स्वयं आकृष्ट होता है। मन का नाश हो नहीं सकता है। तब तो सभी नाश हो जाएगा। इस अवस्था में जो है, वहाँ मन विलीन हो जाता है। अंतर्मन विराट से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। तभी कहा जाता है, वर्तमान ही सभी रहस्यों की कुंजी है। वहाँ आकर जीवन के उद्देश्य का पता लगता है।

 

            अगर बात समझ में गई हैं तो फिर क्यों रुके हुए हो? जब मैंने जाना, तुम भी जान सकते हो। बंधन बाहर से कोई नहीं आया है। तुमने ही बांधा है, तुम्हें ही खोलना है, उतरो अपने भीतर उतरो। पहले भी समझाया था,स्मृति पाप है, अतीत की बातों में मत डूबो, अवधारणा दुष्कर्म  है, किसी भी प्रकार की धारणा मत पालो, अनावश्यक विचारणा अभिशाप हैं। ज्यादा मत सोचो। ये सब मन के भटकाव हैं। मन इन्हीं खूंटियों पर उलझना चाहता है। इनका जन्म अतीत में है। अतीत से वर्तमान की किसी भी समस्या का समाधान संभव नहीं है। इस बोझे को उतारो। मन को जितना हो सके, मैं तो यहाँ तक रहँूगा, चौबीस घंटे वर्तमान में रहने का अभ्यास रखो। तब तुम्हारा अपना अनुभव होगा। तुम्हे किसी गुरु की जरुरत होगी, किसी शास्त्र की। तुम्हारा ही अनुभव तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। तुम्हारा अनुभव तुम्हारा ही सत्य होगा। मैं तुम्हें कितना भी समझाऊँ, पर जब तक तुम्हारा सत्य तुम्हारे भीतर नहीं जगेगा, तुम्हारा भटकाव यथावत रहेगा। सत्य अनुभव जन्य ज्ञान है, जो स्वयं का होता है, वही सदा बना रहता है।

 

            प्रश्न था - ”क्या यह प्रतिभासित सत्य नहीं है?“

           

 स्वामीजी कह रहे थे-  नहीं , जो भास रहा है,  वह निरंतर परिवर्तित हो रहा है।  ज्ञान की पहचान बताई है, वह बस हैं सत्य वही है, जो असत नहीं हैं, जो बस ,”है,“ प्रतिभासित माने  कल्पना, जो खिाई पड़ता है पर है नहीं। पुरानी कहानी सुनाई थी। राजा जनक को स्वप्न हुआ था। वे स्वप्न में भिखारी हैं। भीख मांग रहे हैं। किसी पंक्ति में बैठे है, तभी बैल ने उठाकर फेंक दिया। धक् से नींद खुल गई। उन्होंने सोचा, सत्य क्या है, यह जो वे राजा हैं, यह राजभवन है, पर वह जहाँ भिखारी है। तब अष्टावक्रजी ने कहा था,” राजा दोनो ही स्वप्न हैं, एक लघु स्वप्न है, एक दीर्घ स्वप्न है।

 

            जो जागा हुआ है, वह दर्पण में मात्र जगत को एक कल्पना की तरह देखता है। एक सीरियल की तरह, वहाँ लोग स्क्रीन पर आते हैं, चले जाते हैं। उस दिन कोई कह रहा था, वे तो सीरियल में  दुखद घटना को देखकर रोते भी हैं। पुरानी फिल्मों में महिलाएं रोने के लिए रुमाल तक घर से लेकर जाती थीं। हम इन सपनो को ही सच मानकर जीते हैं।

 

            पर जो जागा हुआ है, वह इन सपनो से अप्रभावित रहता है। उनके भीतर छाप नहीं बनती है। सामान्य व्यक्ति और जागरुक व्यक्ति में इतना ही भेद है। सामान्य व्यक्ति तुरन्त प्रभावित हो जाता है, चिन्तन करके उसे गहरा   बनाता चला जाता है। यह बात सूक्ष्म रुप में उसके अंतर्मन में चली जाती है। वहाँ छाप  बन जाती है। या तो वर्तमान में या स्वप्न में उसे भोगना पड़ता है। पर जो जाग्रत है, वहाँ बीज भुना हुआ हैं, वहाँ अब अंकुरण की क्षमता चली गई है। वहाँ जो खालीपन है, वहाँ जो दिखाई पड़ता है, वह एक स्क्रीन पर चल रहे सीरियल की तरह होता है।

 

फिर प्रश्न था - पर संसार भी व्यवहारिक सत्ता तो है।

           

स्वामीजी कह रहे थे-   हाँ, वह तो होगी। आप नौकरी कर रहे है, जाना है। काम तो  करना ही है। मैं इस जगत की बात कर रहा हूँ, वह आपके भीतर का है। जिसे आप निरंतर बनाते है, वह आपका ही निर्मित है। बाहर यह मकान भी होगा, आपकी कार भी रहेगी।

 

वेदांत में उसे प्रतिभासित कहा है, जो हम निरन्तर अपने भीतर बनाए जाते है। दृश्य जो है, वह दृष्टा ने ही बनाया है। वही उसे समेट सकता है।

 

जब प्रतिभासित सत्य सिमटता है, तब जिसे परमार्थिक सत्य कहा जाता है, वह जाना जा सकता है। सत्य तो तुम्हारा ही अनुभव है, जो तुम्हें जानना है। पर सबसे पहले जो मनोजगत में हम कल्पना से बनाए चले जाते हैं, उसे समझना है। तब जिसे ध्यान कहा जाता है, वह समझ का हिस्सा बन जाता है। यही वर्तमान है। इसे ही जागृति में रहना या अवेयरनेस कहा जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

4.वर्तमान में रहना

 

जो मेरे लिए सरल सहज है, वह आपके लिए कठिन क्यों है। आप विचार करें, जो बात इतनी सीधी-सच्ची है, उससे हम दूर क्यो चले जाते हैं। शास्त्र ने इसी को माया कहा है। माया जो है नहीं, जो भासती है। यह मन का ही प्रक्षेपण है, जैसे मकड़ी जाला बुनती है, वह उसके थूक के रस से बन जाता है। उसी प्रकार व्यक्ति अपना जाल खुद बुनता है, यही उसका इस स्वप्न जगत में फैलाव है। दूसरा कोई समेटने वाला नहीं है। उसे ही इस जगत को समेटना है, तब जो रहना होता है, वहाँ स्मृति का दबाव नहीं  है, मात्र वर्तमान है। जो क्षण को क्षण से जोड़ रहा है, यही स्वाभाविक धर्म है। धर्म यानी स्वभाव।

 

            धर्म किसी विचारधारा के ग्रहण या छोड़ने का नाम नहीं है। यह तो वस्तु का, प्राणी का अपना निजी स्वभाव है। आध्यात्म उसे अपने इस स्वभाव को जानने की विधि का नाम है, जिसे ध्यान कहा जाता है। पर मेडीटेशन नहीं। जब हम अपने मूल स्वभाव को पा लेते है, तब वह उसका स्वाभाविक धर्म कहा जाता है, यहाँ पर बाह्य का कोई दबाव नहीं है। जब मैं कहता हूँ, अंत प्रेरणा जग जाती है, तब कहने का आशय यही हैं कि बाह्य का कोई दबाव अतीत का भविष्य का यहाँ रहता है।

 

            मैं, जो भी यहाँ आता है, उससे एक ही बात कहता हूँ, यहाँ कुटिया का दरवाजा हर एक के लिए खुला है, कोई रोक टोक नहीं, आप आएं रहें, देखें, कुछ समझ में आए तो प्रयोग करंे। अनुभव को शब्दों से तो बताया  जा सकताहै, समझाया जा सकता है।

 

उचित लगे, समझ,ंे करंे। नहीं उचित लगे, छोड़ दंे। रहना ही धर्म है। जहाँ कोई आडम्बर नहीं है। कोई पूजा है, पाठ है। बस मात्र रहना है, आप भी रहें।

 

            केरोल अमरीका से एनलाइटन्ड व्यक्तियों की खोज में यहाँ भी आई थी। कुछ दिन रही। उसने पूछा था, पहले आप कहाँ रहते थे? मैंने कहा, यहीं।

            क्या इसी प्रकार दिन भर लोग यहाँ आते रहते हैं।

             मैंने कहा, हाँ। वह बोली, आपको तकलीफ नहीं होगी?

            मैंने कहाँ, नहीं।

            उसने पूछा, क्या आप एनलाइटन्ड हो, मैंने कहा, यह तुम पता करो। तुम्हारा विषय है, पर जो जाग्रत है, वह सामान्य ही रहता है, वह विशिष्ट नहीं हो जाता। संत कबीर सारी उम्र कपड़ा बुनते रहे, रैदास जूते ही बनाते रहे, बाहर से कोई परिवर्तन नहीं आता है।

 

            जो लोग बाहर परिवर्तन दिखाते हैं, वे अभिनेता ही हैं, बस। यहाँ बस रहना ही होता है।

            बाहर की दुनिया यथावत रहेगी। उसके बदलने की कोई इच्छा होगी। यह प्रकृति का अपना कार्य है, वह जानता है, वह कुछ कर सकता है, पर करेगा नहीं। प्रकृति के नियमों का ही पालन करना है। वह जानता है, वह नींद में नहीं है।

           

            वह शांत है, पर भीतर अनंत शक्ति के अनुभव में  भी है। शक्ति का वह अनुभव भी करता है। वह जानता है, वह शरीर भी है, वह मन भी है, बुद्धि भी है। मन जैसे सेवक हो, रहता है। जरुरत हुई, वह इन्०ियों से विषयों से जुड़ जाता है, अन्यथा सम्बन्ध टूटा सा रहता है। वह है, उसका अस्तित्व है, और वह एकांगी नहीं है, वह समग्र से जुड़ा हुआ है, वह उसका हिस्सा भी है, और वह,‘वहभी है। यह अनुभव उसका अपना है, उसका अपना सत्य है।

 

 

 

                                                5          स्वधर्म

 

स्वामीजी कह रहे थे,” यहाँ कुटिया में लोग आते हैं। मुझे तो पता भी नहीं रहता। वे सोते हैं और चले जाते हैं। कहते है, वहाँ नींद अच्छी आती है।

 

            चलो, उन्हें विश्राम मिल जाता है, यह तो अच्छी बात है। साधारण लोगों की चाहत भी कम होती है। गाँव के लोग छोटी -छोटी चीजों को लेकर आते हैं, पर शहरी लोगों की चिन्ताएं तथा आशाएँ अनंत हैं। उनका पेट भरता है, मन। सम्पत्ति की चाहत अनन्त है। हर जगह मांगनेे वालों की भीड़ है।

 

            पुरानी कहानी है, फकीर का जूता फट गया था। उसने सोचा बादशाह से ले  आऊॅं,  पता लगा वह नमाज पढ़ रहा है। देखा बादशाह हाथ फैलाकर मांग रहा था, खुदा सब कुछ है, तेरी महर बनी  रहे। पड़ौसी का राज भी मिल जाए। इतनी दौलत है, और भी जाए। चाह ही चाह। फकीर वापिस मुड़ गया।

            बादशाह को लगा कोई है, देखा फकीर वापिस जा रहा था।

            आप कैसे आए?

            तुमसे जूता मांगने आया था, पर मेरी चाहत छोटी-सी है। तू तो मुझसे बड़ा भिखारी है। तुमसे क्या मांगना, वह वापिस मुड़ गया। सोचंे,क्या हम सारी उम्र याचक ही बने रहेंगे?

 

            मैंने सन्यास लिया। गुरुजी ने कहा, भिक्षा मांग लाओ।

            मैंने मना किया, यह मैं नहीं कर सकता। मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा।

            फिर भोजन कहाँ से होगा।

            मैं चुप था, दो दिन निकल गए। मैं नहीं गया।

            तब गुरुजी ने कहा, जहाँ से भोजन  मेरे लिए आता है, तुम्हारे लिए भी जायेगा।

           

            परन्तु साधना को मैं शिक्षण नहीं बनाना चाहता। कन्हैयालाल जी जब भी आते एक ही बात कहते मैं, घ्यान सिखाऊँ , कोई शिविर लगाऊँ, मैं हँसकर टाल जाता, एक बार जरूर उनसे कहा था, आप इतनी देर यहाँ रहे पर आपका मन कहाँ था? वे चुप रह गए। बात उन्हें बुरी लगी थी मुझे पता है, पर उनके पाँव लगातार हिल रहे थे।ये जो ध्यान सीखने-सिखाने की बाते होती है, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ।

 

 पुराने गुरुकुल थे। वहाँ गुरु कैसे रहते थे, क्या था उनके पास? वे इस विद्या को जगत की विद्या के साथ अपने शिष्यों को बांटते थे। जगत से कटकर कोई साधना नहीं है। यह शरीर और जगत दोनों एक रूप हैं। जब तक शरीर है, जगत भी रहेगा। हाँ, जैसा शास्त्र कहता है, कीचड़ में कमलवत , वह लिप्त भी नहीं होता, वैसे रहा जा सकता है। कबीर दास जी कहते थे-‘ज्योंकी त्यों धर दीनी चदरिया पर लोग कबीर को आधा ही पढ़ना चाहते है, उनका आधे से काम चल जाता है। नेता लोग उनके कर्मकांड पर हुए प्रहारों से संतुष्ट हो जाते हैं। वे वहाँ बड़ी बात तलाश करते है। वे उनके साहित्य को जानना नहीं चाहते हैं। जो संत मार्र्गी हैं, वे आधे कबीर के साम्प्रदायिकता पर प्रहारों से नाराज है। सब आधे से काम चलाते हैं। पूरा ही सार है, ज्यांे-ज्यांे साधना बढ़ती है। जो निरर्थक है, वह छूटता चला जाता है। थोथा उड़ता चला जाता है। सच्चा साधु कहता है, सबने किया, मैने भी किया, पर जाना सारहीन कर्म था। छूट गया, यहाँ छोड़ा नहीं जाता। जो निरर्थक है, वह छूटता चला जाता है।

 

            यहाँ यह ध्यान रहे, यहाँ कुछ भी स्थाई नहीं है। सब परिवर्तनशील है। इसीलिए स्थाई की खोज व्यर्थ है। इस परिवर्तनशील जगत में कैसे रहा जाए, इसी की खोज का नाम धर्म बना। धर्म जिसे धारण किया जाए। बाद में यह पैतृक जन्म से जुड़ गया।

 

            धर्म परिवर्तन कोई बुरी बात नहीं है। धर्म जिसके  धारण से, मेरे स्वभाव में परिवर्तन आए। मैं अपने लक्ष्य को पाने में सफल हो सकूँ, वह धर्म है। हरधातु का धर्म होता है, वह उसका स्वभाव है। वह उसकी गुण सत्ता है। बुद्धको तभी कहना पड़ा था,‘धम्मं शरणं गच्छामिधर्म की शरण में आता हूँ। गीता में इसकी व्यापक व्याख्या हैं।स्वधर्म निधनं श्रेयजो तुम्हारा धर्म है, उसमें मरना श्रेयस्कर है।

 

 इसका हिन्दू, मुस्लमान से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्वभाव परिवर्तनही, धर्म का परिवर्तन होता है। स्वभाव हमारी आदतों से बनता है। आदतों में परिवर्तन बहुत कठिनाई से आता है। जो हमारा स्वभाव है, उसके साथ जब रहने लगते हैं, तब स्वतः वर्तमान में रहना उपलब्ध होने लगता है। स्वभाव-स्व का भाव, स्वभाव से परिचय स्व के साक्षात्कार से ही सम्भव है। हम दूसरों के बारे में बहुत जानते हैं, पर अपने बारे में भी, अपनी देह के बारे में भी, क्या हम खुद अपने हृदय की धड़कन सुनने में सक्षम हैं। हमारी इन्द्रियांँ किस प्रकार कार्य कर रही हैं, हम नहीं जानते। चिकित्सक ही हमें बताता है। अपने स्वभाव को जानना आवश्यक है। हमारी आधी बीमारियाँ इसी सजगता से दूर हो जाती हैं। स्वभाव से जुड़ते ही, जो बाहर का कचरा है, वह अपने आप छूटता चला जाता है।

 

 

           

 

                                                6- अन्तिम मुक्ति

 

बात हो रही थी। सवाल किसी ने पूछा था, ”जो बहुत दान करते हैं, धर्मशालाएं बनाते हैं, भंडारे चलाते हैं,क्या यह पुण्य नहीं है? पर जिसके पास कुछ भी नहीं है, तो क्या वह पापी होगा?“

 

स्वामीजी का उत्तर था।

यह सब बातंे नीति शास्त्र की हैं, समाज को समझाना पड़ता हैै। बहुत कुछ समझाने वालांे का भी लाभ होता है। नरक है, स्वर्ग है। ये सब मन की ही गढ़ी हुई कल्पनाएं हैं।

           

            हजारो सालो से यही समझाया जा रहा है, परन्तु सही दान वही है, जहाँ स्मृति बने, अहंकार खड़ा हो।

            जब तक हम अहंकार में हैं। हम जो भी कर रहे हैं, वहाँ हमारा स्वार्थ है। हमारी तारीफ हो। इस ब्रह्माण्ड में जहाँ बनना और बिगड़ना ही पंचमहाभूतों का धर्म है, वहाँ कुछ स्थाई नहीं है। दस धर्मशालाएं बनाई, दस लंगर दिए। क्या मतलब, हम चाहते है, हमारी प्रशंसा हो। इतिहास में हमारा नाम रहे। मंदिरों में लोग पत्थर लगवाते हैं, अपना नाम लिख देते हैं। धन की भूख से, प्रशंसा की भूख बढ़ी होती है। हममें लालच होता है, वे आकर उसे बढ़ाते हैं। कहते हैं, ऐसा करो, ऐसा करो, जहाँ लालच है, वहीं धोखा कोई भी दे सकता है।

           

            तो फिर क्या करना है?“

            आपको वो जो रामगंजमंडी में प्राइवेट चिकित्सक हैं उनके बारे में बताया था। यहाँ पहले जो भोजनशाला थी ,वह  इमारत गिर गई थी। वह भवन भी स्कूल को दे दिया था। यहाँ भीड़ बढ़ने लगी थी , सोचा उधर कुटिया के पास जो जगह है, वहाँ एक कवर्ड चबूतरा दो छोटे कमरे बनवा दिए जाएं। पैसे कहाँ से आएंगे सोचा नहीं था। कारीगर लग गया था। तभी एक शाम को वे डाक्टर साहब मोटरसाइकिल से इधर आए। पूछा क्या हो रहा है? फिर मेरे पास आए , बोले खर्चा मैं दूंगा। मैंने कहा लगभग लाख खर्च हो जाएगा। आप भावुक नहीं बनें। आता रहेगा लगता रहेगा। पर वो कुछ नहीं बोले, दो चार दिन ही हुए होंगे , वे अपनी पत्नी के साथ रुपयों की गड्डी साथ लेकर आगए। बोले हम दोनो ने ही तय किया है। ये खर्चा हम देंगे, आप किसी से कुछ नहीं कहें।

उन्होंने कभी किसी से इस बात की चर्चा की , कोई प्रचार, अपनी तख्ती लगवाई।

 

 आप क्या समझे?

 बात एक ही है, कितनी बार पूछी जाएगी? कहा गया है, अधिक से अधिक वर्तमान में रहने का अभ्यास करो।

चंन्द्रधर जी आए थे, दार्शनिक हैं। विदेशों में भी पढ़ाने गए। सभी दार्शनिक हजार साल से माथा-पच्ची कर रहे हैं, पर एक मत पर आज तक नहीं पहुँचे। बुद्धि से वे सत्य को जानना चाहते हैं। सत्य तुम्हारे ही पास है। बाहर से तो कोई सिखाने आएगा नहीं। जो तुम्हारे पास है, तुम्हें उसका पता नहीं है। पता  ही तो करना है।

           

            पता भी क्या करना है?

            जैसा मेरा शरीर है, तुम्हारा भी वैसा ही शरीर है। मुझे भी भूख,प्यास लगती है। देखा है, समय पर भोजन नहीं आया तो भूख चली जाती है। यह देह की जरुरत है। मिठाई कभी खाई नहीं, मेवा खाया, सुबह दो रोटी थोड़े चावल, शाम का खाना नहीं खाया। कुछ साल पहले चिकित्सकों ने कहा, लेना चाहिए, तो एक रोटी लेनी शुरु की है। पर बात कहने की हैै। जैसा तुम्हारा शरीर है, वैसा ही मेरा शरीर है। शरीर का अपना धर्म है, वह पोषण चाहता है। नींद भी आवश्यक है।

 

            पर तुम्हारा मन और मेरा मन बस दो धरातल पर हैं। जहाँ तुम विचारों में हो, यहाँ सब खाली है। कुछ नहीं है। एक दर्पण है बस, जो भी सामने आया, दिखा, वह गया, छाप नहीं बनती है। भीतर सम्बन्ध इन्०ियों का तथा मन का टूटा हुआ है। कभी कोई दो-तीन बार बोलता है, तब लगता है, कोई कुछ कह रहा है, तब मन जुड़ जाता है। नहीं तो,  मन है तो सही, पर वह नियंत्रित पड़ा रहता है।

 

प्रश्न था-         क्या यही नो माइंड, अमनी अवस्था है?“

 

            यह शब्द भी समझाने के लिए ही है। नो माइंड का मतलब है, यहाँ स्फुरणा नहीं है। प्रवाह की कोई छाप नहीं है। छाप बनती है, चिन्तन से, पर यहाँ कोई चिन्तन नहीं है। पहले भी कहा था, मन एक द्वार है, जो बाहर भी खुलता है, जहाँ दुनिया है, भीतर वह अंतर्मन में चला जाता है। यह भी कहीं दूर नहीं है। यह भी मन ही है। कागज की तरह मन की दूसरी परत, जहाँ  निरन्तर विराट से जुड़े रहने का अहसास ही रह जाता है। जुड़ा तो पहले भी था, पर इसका अहसास नहीं था। अब वह जुड़ा है, यह आभास नहीं है, अहसास है। यहाँ पर वह बस दर्पण की तरह है। जो सामने आया, वह दिख गया। बस  उसकी छाप नहीं बन पाती है। कोई विचार है, विचारणा है। कोई प्रतिक्रिया नहीं है। क्रिया के साथ जब मन जुड़ता है, तब कर्म बन जाता है। वह क्रिया तो करेगा, पर कर्म नहीं। मैंने पहले भी कहा है, शरीर की स्वाभाविक क्रियाएं यथावत हांेगी।

 

प्रश्न था-         वो मुक्तानन्द जी के बारे में पढ़ा था। उनकी पुस्तक में सिद्धियों के बारे में लिखा है।

           

            हाँ, मैंने भी पढ़ा था। वह सब गलत है। पंच महाभूतो का उनका धर्म है। लोग प्रचार पाने के लिए बहुत कुछ गलत कह  देते हैं। योगी हो या संत या जाग्रत पुरुष या सामान्य पुरुष, उसके मल-मूत्र में वही दुर्गन्ध होगी। वहाँ की सुगंध से किसी को समाधि नहीं मिलेगी।

 

प्रश्न-  तो क्या यह समाधि शब्द ही अनुचित  है?“

 

            यह शब्द भी गढ़ा हुआ है। बस वह है। वह वर्तमान में है। बस यहाँ मन नहीं है। इन्द्रियाँ, मन और विषय इन तीनों का सम्बन्ध टूटा हुआ है। यहाँ कोई सीमा नहीं है। जो खालीपन है, वह समझाने के लिए है, अंतर्मन बहुत शक्तिशाली है। वहाँ जो है, वहाँ असीम उर्जा है, अनंत ज्ञान है, शक्ति है, वह वहाँ है, वहाँ सारे सवाल गिर जाते हैं। उत्तर ही शेष रहता है।

 

प्रश्न-  सवाल जब पूछा जाता है,तब क्या  सोचना पड़ता है?“

 

            तब भीतर से उत्तर अपने आप  चला आता है। सोचने वाला रहा ही नहीं है। सामने वाला आया, पूछता हूँ, कैसे आए, क्या बात है। यह बात को छिपाना चाहता है। पर तभी मेरे भीतर से जो वह जानना चाहता है, इसका उत्तर चला आता है। यह सब सहज घटता है। रिकार्डर मन तो है नहीं।

           

            इसीलिए एक ही बात कहता हूँ।

            हमेशा वर्तमान में रहने का अभ्यास रखो। मन जो है, बहुत शक्तिशाली है, उसके पास तर्क हैं। तर्क का जन्म मस्तिष्क में होता है। सभी दार्शनिक तार्किक हैं, वे तर्क से सत्य को जानना चाहते हैं। सत्य तर्क के गिर जाने के बाद आता है।

           

            बस मेरा मन और तुम्हारा मन एक ही है।

            तुम्हारा मन विचारों से भरा हुआ है। बहुत संग्रह हैं। बार-बार पूछते हो, पर संग्रह जरा भी कम नहीं होता है। हमेशा प्रेशर कुकर में रखे आलू की तरह उबलते रहते हो। वहाँ भटकाव ही भटकाव है। पर मेरा मन विचारों से रहित है। किसी भी प्रकार की विचारणा का दबाव नहीं है। शांत है। बस इससे अधिक कुछ भी नहीं है।

            हाँ, जब मैंने पाया है, जाना है, तुम भी जान सकते हो। वैसे यहाँ पाने जैसी कोई चीज नहीं है।

 

फिर प्रश्न था-            क्या यही अंतर्मन है?“

 

            यह शब्द भी समझाने के लिए है। मन जब विचारों से रहित हो जाता है। उस प्रशांत मन को शास्त्र ने आत्म की संज्ञा दी है। संज्ञा मात्र समझाने के लिए है। यह अनुभव है।

 

            समझाने के लिए कहा जाता है। मन में विचार हजारों की संख्या में उठ रहे हैं। हम मन में आने वाले विचार को देखने का प्रयास करें, तो उसके बाद आने वाले विचारों की गति धीमी हो जाती है। धीरे-धीरे, देखते-देखते दो विचारों के बीच का अंतराल भी दिखाई दे जाता है। तब मन के दो हिस्से अपने आप दिखाई पड़ते हैं। एक वह जो दिख रहा है, एक वह जो देख रहा है, वह जो साक्षी है। जो अप्रभावित है। चाहे पीड़ा का विचार हो या घृणा का, या क्रोध का, वह बस देख रहा है। यह जो दृष्टा है, यह आत्म है, यह अप्रभावित रहता है। यह  दृष्टा भाव ही सार है, यही आत्मरुप है, यही अंतर्मन की झलक है। इसी को पाना अपने स्वाभाविक स्वरुप को पाना होता है। यही तब कहा जाता है, दर्पण की तरह हो जाना होता है। जैसे बाहर से विचारों का प्रवाह रहा है, वहाँ चट्टान की तरह होना कहा है। लहरंे आएंगी, टकराकर लौट जाएंगी। भीतर से प्रवाह उठे, वहाँ बर्फ  हो जाना है। लहर ऊपर तक नहीं पहुँच पाए। यही अवस्था जब रह जाती है, तब उसे संतों ने अलग-अलग नाम से बताया है।

             सार एक ही है दृष्टा भाव, या साक्षी भाव का सघन होते जाना। मैंने यही जाना है, यहाँ बाह्य मन अपने अस्वाभाविक स्थान मस्तिष्क के नीचे आता है। मूल स्थान नाभि की ओर लौटता है, जहाँ अंतर्मन है, वहाँ वह अंतर्मन में विलीन हो जाता है। मन का स्वभाव विचारणा है, अंतर्मन साक्षी है, दृष्टा है, यहाँ शक्ति है, शांति भी है।

           

प्रश्न था-         क्या यही मुक्ति है?“

 

            यह शब्द भी अनावश्यक है। गीता में कहा गया है, जीवन मुक्त अवस्था। बुद्ध धर्म ने माना है, निर्वाण। बांधता कौन है, मन। जब मन ही नहीं रहा, तब बंधन किसका? किससे, जब तक मन है, तेरा और मेरा बना रहेगा। जब मन ही चला गया, वहाँ तेरा मेरा कहाँ रहा? यहाँ सौ टका देना  होता है। एक भी बचा, तो सारे विकार यथावत लौट आएंगे। जुज माने टोटल मन, सौ टका  गिर जाना है। जागरुकता भी घ्यान है। इसे अंग्रेजी में अवेयरनेस कहते हैं।

           

प्रश्न था-             इसे कैसे जाना जाए?“

 

            जब बूंद सागर में गिरी, तब बूंद क्या कह पाएगी। वह क्या है, बस इसीलिए बूंद को कहना पड़ा नेति-नेति, इति इति, यही... नहीं, यही,.... नहीं,  इतना ही नहीं , वह और भी है, तुम्हारी बौद्धिक क्षमता से आगे है।कहना कठिन हैै। तुम पता करो, सवाल जहाँ से पैदा होते है, वहाँ से सवाल पूछना बंद करो, उत्तर पाने का प्रयास करो। सवाल मस्तिष्क पूछता है, उत्तर हृदय देता है। मन जब हृदय में आता है, वहाँ श्रद्धा पैदा होती है। जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ विश्वास भी है।

           

            मुक्ति किसकी, किससे। जगत भी रहेगा, यह पंच महाभूतों की सृष्टि है। किससे, किसका छुटकारा। शरीर का नाश दोनों का ही होगा। चाहे सामान्य पुरुष हो या ज्ञानी। मृत्यु दोनों की एक-सी ही होगी।एक जागृति में शरीर छोड़ता है, दूसरा अज्ञान में चला जाता है। एक की दुकान खाली हो जाती है। कोई सामान बचा है, खरीददार आने वाला है। उस खालीपन में वह आनंदित है। जानता है, स्वर्ग है नरक है। बस।

           

            जो जाग्रत है, वहाँ संशय नहीं है। प्रमाद नहीं है। यह अहंकारी की नींद है, जिसमें संसार बह रहा है। परन्तु जो ज्ञानी है, वह शांत है, उसकी यह शांति बाह्य की किसी घटना से प्रभावित ही नहीं होती है, वह जानता है, इसको इसी तरह घटना था, घट गई।

           

प्रश्न-  क्या इसी को बुद्ध धर्म में तथाता कहा जाता है?“

 

            हाँ, समझाने के लिए है, यह स्वभाव हो जाता है। तब माने वही, , जो है, जो किसी बाह्य से प्रभावित नहीं है। फिरकनी भी चलती है, तेज घूमती है, पर बाह्य का बल लगाना पड़ता है। बल हटा,फिरकनी गिर जाती है। पर यहाँ बाह्य का बल नहीं है।बसवह है, यह अंतर्मन नाशवान नहीं हैं। यह वही है, जोवहहै, जो विराट हैं, शरीर नाशवान है। यह कहीं बाहर नहीं है, यह तुम्हारे ही पास है, समीप है, बस इस तरफ तुम देखना नहीं चाहते हो।

           

            यह शब्द मूल स्वभाव की छाया है। जाग्रत पुरुष के भीतर सहज उर्जा प्रभावित होती है। शरीर तो वही है, पर उर्जा दूसरे को अनुभव होती है। यह हवा में व्याप्त सुगंध की तरह है। बस वह है। यहाँ जो शिष्य होता है, जो भाव रखता है, जहाँ श्रद्धा है, वहाँ यह अनुभव की जा सकती है। सामान्य पुरुष के लिए यह प्राप्त होना कठिन है, वह उसके भीतर इस सकारात्मक उर्जा को अनुभव नहीं कर सकता है।

 

तुमने पूछा है इस शरीर का क्या किया जाए?“

            मेरा यही कहना है, किसी अस्पताल को दान कर देना, मेरी यही इच्छा है। अगर कोई अंग किसी के काम जाए तो बेहतर होगा, शरीर का विनाश होना अपना धर्म है।

           

            और आप?.....“

            मैं’ ,......अभी तक समझ नहीं पाए। जो विराट में है, वह अलग कहाँ है। बूंद सागर में मिलकर क्या हुई। फिर पूछोगे, जो अलगाव है, वह तुम्हारा है। तुम शरीर को ही मुझे , और शरीर में ही मुझे देख रहे हो। मुझे जाना है। रामायण में कहा है, राम ने सीता को  पाने के लिए सेतु बनाया था। सेतु और परकोटे में यही भेद है। शरीर हमें सेतु के रूप में मिला है, जहाँ से हम चरम की ओर जा सकते हैं। उसे तुम  परमात्मा कहते हो, नाम तुम्हारा है, पर शरीर ही माध्यम है, यह बंधन नही है बंधन तो तुम्हारा मन है,  श्रृंखला ,विचारणा, अवधारणा और स्मृतियाँ हैं।

           

फिर प्रश्न था-            बचपन से आप इस मार्ग पर रहे, कठोर संयमित जीवन जीया, क्या जाना आपने, इतने वर्षो की साधना में?“

           

            कुछ नहीं, यहाँ कुछ जानने के लिए है ही नहीं। बस सहज स्वभाव में रहना ही साध्य है। तुम वही तो हो, जो मैं हूँ। जो मैं हूॅं,  वही तो वह है। बस यहाँ जानना कुछ नहीं है। नहीं कुछ पाया जा सकता है। संसार में जो भी पाया जाता है, जो भी उपलब्धियाँ हैं, उनकीे कोई भी कीमत नहीं है।

 

            वो तुम्हारे साथ जाएंगी, तुम उन्हें साथ ले जा सकते हो। हाँ, यह जानना या पाना, मात्रजागनाहै। यही गीता कहती है। जब सब सोते है, तब वह जागता है। जागना ही जागरुकता है,सजगता है जिसे अंग्रेजी में अवेयरनेस कहा जाता है। यह जागना अपने सही स्वरुप को पाना है।

 

            पर बाधा मन की है, उसके पास अपने तर्क हैं। दुनियां में उपदेशकों की भरमार है, वे भी अपने स्वार्थ में सबको भटकाए रखते हैं। जो नहीं जानते है, वही बताते है। तुम्हें कहीं नहीं जाना है। बस अपने घर लौटना है, अपने भीतर लौटना है। अपने आपको जानना है। अपने मूल स्वभाव को पाना है। बस यही पाना ही, ”सार तत्वहै।

           

            लोग पूछते है, मैंएन्लाइटन्ड   कब हो जाऊंगा।

           

            मैं क्या उत्तर दूँ। चुप रह जाता हूँ, हँसी आती है। यह भी कोई बाजार में मिलने वाली वस्तु है।  तुम्हें अपने आपको, अपने स्वभाव को पाना है, जो तुम्हारा है। यहाँ कुछ बाहर से मिलने वाला  कुछ नहीं है। सत्य यही है,यहाँ ऐसा कुछ नहीं है,जो पाया जा सकता है। नहीं ऐसा कुछ है, जो खोया जा सकता है, फिर यह सवाल कहाँ से? यह गलत लोगों ने प्रचारित कर रखा है। हाँ, यह बात दूसरी है, जब मूल स्वभाव से हम जुड़ जाते है, तब उस विराट का स्पर्श उस सकारात्मक उर्जा को प्रवाहित कर देता है, जहाँ परम शांति है, साथ अनंत उर्जा का प्रवाह भी। जिसे हम आकर्षण कह सकते हैं, लेकिन यह कोई पाने की चीज नहीं है। यह तो प्राकृतिक देन है, बस। जहाँ भी कुछ भी पाने की कामना है, वहाँ मन है। मैंने पहले भी कहा है, यहाँ मन को पूरा दे देना होता है, तभीपूराअपने आप पाया जाता हे, जो सहज है।

 

            तो क्या यही हमारा धर्म है?

 

            धर्म कोई बाहर की चीज भी नहीं है, यह स्वभाव हैै। हर वस्तु का अपना गुण-धर्म है। मनुष्य का धर्म उसका स्वभाव है।स्व’, यानि आत्म का भाव। वह है जागृति। संसार का धर्म है जिसेवेदोंने ,ऋत कहा है, जोराइटहै। यह प्राकृतिक विधान है। नैतिक भी कहा गया है। जो नियमन करता है। पृथ्वी का गुण आकर्षण है। आकाश का अपना धर्म है। सभी पंच महाभूत अपने-अपने स्वाभाविक धर्म में बंधे हैं।

 

यहाँ धर्म वह नहीं है, जो मजहब के रुप में जाना जाता है। इसीलिए आज सम्प्रदाय, धर्म शब्द का अर्थ हो गया है। अध्यात्म भी शब्द है, जिसका अर्थ है, अपने इस आत्मतत्व को जानने का प्रयास करना। जो जिज्ञासु है, वह अध्यात्मिक पथ पर आता है। जो मात्र कौतुहल से भरा है, वह सम्प्रदायों में चला जाता है। जो शिष्य होता है, , वह किसी गुरु की तलाश में जाता है, वह उसे मात्र देखता है,  और खुश हो जाता है। पर जहाँ तर्क गिर गया, वहाँ विश्वास-अविश्वास दोनों चले जाते हैं, वहाँ मात्र श्रद्धा रह जाती है। जहाँ श्रद्धा है, वहीं रुपांतरण सम्भव है। यही गीता कहती है, जो संशय में है, वहाँ विनाश है। संशय का समाधान विश्वास ही है। भीतर ही भीतर संशय बना रहता है।

 

 वर्षो हो गए, कृष्णमूर्तिजी के अनुयायी आते हैं, वे ही सवाल, वे ही बातें। मैं हैरान हूँ, इतने वर्षो में तो वर्षा से पत्थर भी बदल जाता है। पर क्यों? उनका तर्क, उनकी बुद्धि उतनी ही संशयालु तथा ढृढ़ है। वे मुझसे मिलकर खुश होते हैं, कि मैं भी उनकी ही तरह बातें कर रहा हूँ। वे मुझसे अपने तर्क की पुष्टि करवाने आते हैं। उनका कृष्णमूर्ति पर भरोसा है, पर वे भरोसा तोड़ देते हैं, संशय फिर बना रहता है, जिसे विश्वास कहा जाता है, वह सौ टका होता है। यहाँ संदेह  पानी में पड़ी बर्फ की तरह पिघल जाता है। जब तक मन मस्तिष्क में रहेगा, वहाँ संदेह होगा, तर्क भी होगा। हाँ, हृदय मे जब आता है, वहीं श्रद्धा है, वहीं विश्वास है। शिष्य होना आसान नहीं है, वहाँ हृदय से सुना जाता है। तब शब्द-सबद बन जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

                                    7‘याचक नहीं दाता बनो।

 

मैं कह रहा हूँ, इसलिए मेरी बात मानी जाए, यह सही नहीं है। आप स्वयं प्रयोग करें।

 

            उस दिन वसावड़ा कह रहे थे, ”आप गलत जगह गए। आप अगर बौद्ध होते तो उनके बड़े मास्टर कहलाते।

            मुझे हँसी गई, क्या मास्टर बनने के लिए बौद्ध भी होना पड़ता है। यह शब्द ही गलत है। विदेशी शब्द है।  वे हर चीज को यंत्र में जानना चाहते हैं। बुद्धि के पार जो है, उसे बुद्धि से कैसे समझा जा सकता है। ज्ञान के दोनों स्तरों को वे जानते हैं। इन्द्रिय जन्य ज्ञान और बुद्धि जन्य ज्ञान के परे विवेक है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक में बदल जाती है। जहाँ विवेक रहता है, वहाँ तीक्ष्णता रहती है सजगता, जागरुकता, ये शब्द बस कहने के ही नहीं  हैं, यह होता है। तब मन अंतर्मुखी होकर, उस  मन से जो सर्वत्र व्याप्त है, उससे जुड़ जाता हैं, उसी अवस्था को हर धर्म ने अपना-अपना नाम दिया है।

 

जब कोई अनुभवी आता है, तब उसके पीछे आने वाले लोग सीढ़ियाँ बना लेते हैं। पर सीढ़ियों से जो पार है, वहाँ तक सीढ़ी नहीं पहुँचाती। बुद्ध के बाद यही हुआ, जब वे कहते हैं निर्वाण, वहाँ उनके पास व्याख्या भी है। शब्द कहाँ से आएंगे, उन्होंने बुझ गया, दिया बुझ गया कहा। आत्मा शब्द का मैंने प्रयोग नहीं किया, तभी  बसावड़ा मुझे बौद्ध कहने लगे। हाँ, वहाँ कुछ नहीं रहता। बस खालीपन दुकान उठ गई। कैसे कहा जाए, तुम पूछो मत, खुद पाने का प्रयास करो। जब मैंने जाना है, तुम्हें भी  मिलेगा, सबको मिलेगा। गीता कहती है,‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मायह मार्ग सुलभ है। 

 

            मेरा भोजन अत्यन्त ही अल्प था। गुरुजी अवाक थे, मात्र इतने कम आहार से मेरा शरीर कैसे चल रहा है?

            बात समझनेे की है, हम अपनी आवश्कताएं कम करंे। जरुरत से ज्यादा संग्रह हो, और मांगना तो सबसे खराब बात है। मैंने यहाँ मैने पहले लिखा भी रखा था, ‘याचक नहीं दाता बनो।कई बार मौके आए, गुरुकुल की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। खर्चे भी आए। मैंने आपकोब्यावरावाली घटना बताई थी। किस प्रकार बकानी वाले, रामस्नेही महाराज को निमन्त्रण दे आए थे, यहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। पर प्रकृति ने सारा कार्य बहुत बढ़िया पूरा करा दिया।

 

            हम जब शांत होते हैैं, उस अनन्त से हमारा सम्बन्ध जुड़ जाता है, तब प्रकृति स्वयं हमारे कार्य व्यवहार संभाल लेती है। पर हमें इसका विश्वास नहीं है। हमें  कुछ नहीं करना है, शांत बैठे रहना है,  निट्ठल्ला होना है, यह मैं कभी नहीं कहता, चाहता हूँ। जब स्वयं निरन्तर कर्मशील रहता हूँ, तब आपको निट्ठल्ला कैसे बनने के लिए कह सकता हूँ। पर इन्०िया गतिशील रहंे, पर मन शांत रहे, यह तो सम्भव है। और यह सम्भव हो पाता है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। हम जहाँ भी हों, जो भी कार्य कर रहे हांे, मन वहीं रहे। मैंनेअनंत यात्राउपन्यास आपके लिए लिखा था। वहाँ तो  कागज कलम की कोई  व्यवस्था थी नहीं। जो भी कागज आया, उस पर आपको लिख कर भेज दिया। कभी पहले क्या लिखा था, कोई प्रति वहाँ नहीं रही। मन की शक्ति को अभी तक पूरी तरह जाना नहीं गया है।

 

 

 

                        8 जीवन एक खेल है, बस

 

            प्रश्न था- ”शंकराचार्य नेे तो जगत को ही माया माना है?

 

            तो क्या हुआ? हम आधा-अधूरा ही जानते है, जानना चाहते हैं। जब मैं कहता हूँ, हृदय, तो लोग पूछते है, देह में हृदय कहां होता है, तब हृदय का पता कैसे लगेगा? कोई भी चिकित्सक आज तक मन का ठिकाना ढूंढ नहीं पाया। पहले तो मन और मस्तिष्क को ही एक माना जाता था। अधिकांश बातचीत में माइन्ड का अर्थ मस्तिष्क की क्रियाओं से ही जान पाते हैं। तब हृदय का ठिकाना कहाँ है? इसीलिए शुरु से मस्तिष्क और हृदय का फर्क रहा है। विज्ञान, विचार की भाषा जानता है, दर्शन भी विचार की शुद्धता है। सभी शास्त्र यहीं तक आते हैं।

 

पर उससे परे हृदय का क्षेत्र है। वेद और उपनिषद  में दिखाई पड़ता है। एक में कविता है, दूसरे में दर्शन है। बुद्धिमता है, तथा उससे भी पार जाने की क्षमता है। बहुत पुरानी कहावत है कि जहाँ हृदय खुलता है, वहाँ कविता आती है। हर शहर में पचासों दुकानदार होंगे, पर कवि, कलाकार, गायक उतने ही कम होंगे।ये लोग प्रशिक्षित नहीं किए जाते। इनकी जन्मजात प्रतिभा होती है। यह बात दूसरी है कि आजकल इनका आदर नहीं हैं, पर समाज में ये बहुमूल्य होते हैं। इनकी क्षमता सृजनशीलता है। पर इन दोनो से परे, जहाँ बुद्धि और हृदय दोनो का संतुलन होता है, वहाँ के लिए शब्द नहीं है। हमारे संत कवियों की यही पहचान है। पुराना शब्द धर्म था, स्वभाव था, पर वह आज लुप्त हो गया है। आज धर्म, शब्द रिलिजन बन गया है। इससे दुविधा पैदा हो जाती है। स्वभाव को पाना और जानना कठिन है। हमारे यहाँ इसीलिए सनातन धर्म कहा गया था। पर आज शब्द तलाश करना कठिन है। गीता के दूसरे अध्याय में कहा गया है,‘उसे प्रसाद की प्राप्ति होती है’, तब सब दुखों का अभाव हो जाता है। यहाँ बुद्ध धर्म ने उसेनिर्वाणकहा है।

 

            आज दोनो ही शब्द अपना अर्थ खो बैठे है। प्रसाद तो मंदिर मंे बँटने वाला प्रसाद हो गया है। और निर्वाण की व्याख्या सबकी अलग-अलग है। वहाँ जो शांति है, वहाँ शक्ति भी है, वहाँ सृजनशीलता है।

 

            प्रतिभासित सत्य, व्यावहारिक सत्य के पार ही पारमार्थिक सत्य है। इसको पाना ही वर्तमान में रहना है। जिसे निर्विचारता कहा जाता है, वह कोई अलग, समाज से कटकर रहने की व्यवस्था का नाम नहीं है। वह तो यहीं उपलब्ध होगी। बस इतना सा ही भेद है, वह जिसे प्राप्त होती है, वह अत्यधिक सामान्य हो जाता है। विशिष्टता पाने का मोह तो अहंकार है।

 

            यह अवस्था मात्र रहने की है। सुचेत, एक जगह नहीं, सर्वत्र जागरुकता। गीता में इसको बताया गया है, वहाँ शब्दसंयमीआया है। पर अब उसका भी अर्थ मात्र इसमें  इन्द्रिय निग्रह तक सीमित रह गया है। इसीलिए पुराने शब्दों  का प्रयोग आज व्यर्थ हो गया है। मैं तो बस एक ही बात कहता हूँ, ‘वर्तमान में रहो

 

            बहुत पहले मैंने कहा था, आज सबसे बड़ा खतरा पर्यावरण का है। यहाँ मेरा आशय स्पष्ट था। प्रकृति के साथ हमारा व्यवहार गलत हो गया है। हम मात्र दुरुपयोग करते है। पुराने समय में कहा जाता था, मनुष्य की प्रकृति पर विजय। क्या मतलब? यहाँ किसे-किससे लड़ना है। बात है, हमें रहना सीखना आए। प्रकृति का अपना नियम है। इसे ही सबसे पहले जानकरऋतकहा गया था। एक नियम है, उस नियम को ही धर्म कहा गया है। यह प्रकृति का नियम हैं,   धर्म है, पदार्थ के नियमों की जानकारी से विज्ञान बन गया। मनुष्य के, प्राणी के जीवन को प्रभावित करने वाले नियमों से धर्म बन गया। आचरण के नियमों से नीतिशास्त्र बना। मूल तो प्रकृति है। उससे लड़ना, उससे विजय पाना, व्यर्थ की बात है। प्रकृति से साहचर्य, समरसता बहुमूल्य है। और यह पुराने जमाने से धर्म का एक हिस्सा बन गया है।

 

प्रश्न था -        रमण आश्रम आप गए थे। आपने पहले भी उनके बारे में बताया है। उनकी साधना थी, ”मैं कौन हूँ, पता करो,“ यह कैसे संभव है?“

 

            वेे अपने अनुयायियों को कहते थे, शांत बैठ जाओ। पता करो, मैं कौन हूँ, यह नकारात्मक यात्रा है। मैं यह नहीं हूँ, मैं यह भी नहीं हूँ। अनवरत विचार करते करते एक दिन ऐसा आता है, सब विचार गिर जाते हैं, पहले शब्द गिरते हैं, फिर जो भावना बनती है, अचानक वह भी शांत हो जाती है।। तब वहाँ ,...वहाँ कुछ भी शेष नहीं रहता है। वह जो खालीपन बचता है, वहाँ  प्रश्न गिर जाते हैं, बस।

 

            यह सवाल किसी दूसरे से पूछने का नहीं है। वह क्या बता पाएगा, उसे तुम्हारे बारे में क्या पता? सबके अपने-अपने तरीके हैं। मैंने पहले भी कहा, खुद विचार करो। जो अच्छा लगे, उस पर प्रयोग करो, सफलता मिलती है, तो आगे बढ़ो, नहीं तो छोड़ दो। निर्णय तुम्हारा ही हो, दूसरे से कहने मात्र  से नकल नहीं करनी है।

 

            मैंने बार-बार यही कहा है कि हमें दूसरे के भाव जगत को बदलने की जरुरत नहीं  है। जब तक उसकी जिज्ञासा हो, उससे यह चर्चा भी नहीं करनी चाहिए। आजकल यही गलत हो रहा है। हर गली में गुरु पैदा हो गए हैं, अपना अधूरा   ज्ञान बांटते रहते हैं। जिन्हे खुद का पता नहीं, वे दूसरे को आत्मज्ञान देते हैं। उसमें जितनी गलती उनकी है, उससे अधिक तुम्हारी है। तुम्हें, जो जाना गया है, उसका आदर करो, जिसे मानते हो, उस पर विश्वास लाओ। मात्र नकल नहीं, प्रयोगशील तुम्हें ही बनना होगा, तब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तुम्हें मिलेगा। तुम कौन हो? यह उत्तर मैं नहीं दे सकता। मेरा उत्तर भी गलत हो जाएगा। शास्त्र यही कहता है, ‘जब सब सोते है, वह जागता है तुम्हें ही अपनी गहरी नींद को तोड़ना होगा, जगना, जागरुकता, अवेयर होना एक ही बात है। तुम्हारे काम को कोई दूसरा नहीं कर सकता। 

 

            मेडीटेशन क्या सिखाया जा सकता है? यह सवाल मुझसे बार-बार पूछा जाता है। मैंने अपने साठ साल की इस यात्रा में कभी यह चर्चा नहीं की। मेडीटेशन और ईश्वर दो शब्द मेरे पास नहीं आए। जब हम जानते है कि मेडीटेशन का अर्थ एकाग्रता ही है, कन्सनट्रेशन है, तब तो यह सिखाने की चीज है, सीखना चाहिए।

 

            पर जब हम इस शब्द का प्रयोग विदेशियों के लिएध्यानके रुप में करते हैं। तब बात साफ हो जाती है, यह तो रहने की कला है, जहाँ निरन्तर सजगता है। यह आप कैसे  सिखा सकते हैं। यह दूसरे को सिखाई जा सकती हैं, समझाई जा सकती है। हाँ, संकेत किया जा सकता है, बस। शास्त्र यही काम करता है। शास्त्र आध्यात्मिक नहीं  है, पर शास्त्रों में आध्यात्मिक इशारे हैं। जो, जो जानना चाहता है, उसके लिए मार्ग बताते हैं। पतंजलि ने जो महत्वपूर्ण बात कही है, वह यही है कि, चित्तवृतियों का निरोध योग है, निरोध नाश नहीं है। यह जो रुपान्तरण है, जहाँ उर्जा अंतर्मुखी हो जाती है, वह महत्वपूर्ण संकेत है। यहाँ तक आने  के लिए तो वे सीढ़ियाँ बना गए, पर इसके बाद क्या होगा? मात्र संकेत है।

 

            क्यों?

            यह अनुभवजन्य है। बुद्धिजन्य नहीं है। इसीलिए यह घटता है, दिया नहीं जाता। इन्द्रियाँ,मन और बुद्धि से परे हैं। जहाँ तक बुद्धिजन्य ज्ञान है, वहाँ तक प्रशिक्षण दिया जा सकता है। पश्चिमी दर्शन में कहा जाता हैवर्च्यूसिखाई जा सकती है।  इसका अर्थ सदगुण है, पर यह सदगुण ही नहीं है। इसमें सद गुण तो होगा, पर वह उसकी आंशिक अभिव्यक्ति ही है।

 

            जैसा मैंने कहा, महर्षि रमण ने एक विधि   बताई थी। यह नकारात्मक तो है, मैं यह नहीं हूँ। यह उसी प्रकार है, जिसे अवलोकन कहा जाता है।

           

            हम अपने विचारों को देखते हैं। दृष्टा, दृश्य दर्शक तीनों का पता लगता है। धीरे-धीरे दृश्य सिमटना शुरु होता है। विचार ही विकार है। विचारों की संख्या कम होते-होते, विकार भी कम होते चले जाते है। बस यहीं तक आप समझा सकते है कि यह ध्यान है, यह वर्तमान में रहने की सीढ़ी है। फिर आप जहाँ भी हो, जो भी कार्य कर रहे हो, वहाँ विचारण का दबाव नहीं रहे। पर इसका कोई प्रदर्शन नहीं हो सकता।

 

            शब्दों के उलटफेर ने ही बहुत सी किताबों को, विचारकों को नई भाषा देदी है। जहाँ तक मेडीटेशन का सवाल है, यह बाहर की वस्तु पर, विचार पर मन को एकाग्र करने की विधि है, पर ध्यान तो उस विचार को ही कम करते- करते निर्विचारता पर आने की कला है। दोनो एक-दूसरे की विरोधी हैं। यह बात दूसरी है कि निर्विचारता में  अनायास एकाग्रता हर पल रहती है।

 

प्रश्न था-         आप की क्या स्थिति है?“

 

            मुझे क्या पता, आप जानें। यहाँ तो दुकान खाली है। मुझे आनन्द है। प्रसन्नता है। कोई आकांक्षा नहीं है।

           

प्रश्न था -        क्या यहीं प्रेम है?“

 

            प्रेम का मुझे पता नहीं। प्रेम अन्य को अनुभव होता है। जहाँ चुम्बक होता है, वहाँ लोहा खिंचा चला आता है। यह आकर्षण ही प्रेम कहा जाता है। यहाँ मन ही नहीं है, विचार ही नहीं  है, जो धारा है, वह अनवरत बह रही है। जिसका जितना बड़ा पात्र है, सही पात्र है, भरकर ले जाए। पर पात्र ही फूटा हो तो क्या होगा? बह्मनिष्ठ गुरु खुद कुछ नहीें करता, करना चाहता है, परन्तु उसके भीतर जो प्रेम की धारा बह रही हैं, वह अनायास शिष्य के भीतर परिवर्तन ले आती है। उसे तो इसका पता नहीं रहता है।

 

प्रश्न था-         तो साधना क्या होगी?“

           

            रमण महर्षि की बात बताई थी। वे शांत बैठे रहते थे। मैं वहाँ रहा था, देखा कतारों में लोग आते शांत बैठे रहते। उनके प्रश्नों के उत्तर भी उन्हें मौन में मिल जाते थे। तब पाया,मौन की भाषा बहुत ही ताकतवर होती है। वे भोजन भी सबके साथ ही पंक्ति में बैठकर करते थे।

 

            जब हम मौन होते है, तब विचारों का जो समूह हमारे भीतर जमा रहता है, वह हट जाता है। चुप रहना वाणी   का मौन है, और विचार ही हांे, वहाँ चुप रहने की आदत हो, यह वास्तविक मौन है। तब हमारे भीतर का जो श्रेष्ठ है, वह प्रकट होने लगता है। यही सागर मंथन का रहस्य है। सभी तुम्हारे पास है। गरल भी और अमृत भी। जब मन की गति बढ़ती है, तब मन की शक्ति घट जाती है। विचारों के बढ़ने से मन की गति बढ़ने लगती है, तब हम अशांत हो जाते है।

 

            आपने पूछा, मेरी क्या स्थिति है?

           

            यहाँ बस शांति है। अठ्यासी साल की आयु है। चला फिरा ज्यादा नहीं जाता, फिर भी सेवा कार्य चलता है, मन से सेवा हो जाए, बस। अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। प्रकृति ने जो कार्य सौपा है, वह कर दिया, करना है। इस शरीर को लेकर कोई आसक्ति नहीं है। आप जब  इस शरीर में प्राण रहें, किसी अस्पताल को दे आना, शायद कोई अंग किसी के काम जाए। बहुत पहले अंग्रेजी की एक कविता पढ़ी थी-”मुझे यहाँ अकेले पड़े रहने दो, बाद में एक पत्थर भी निशानी के लिए नहीं हो,“ यह हमेशा याद रहे, इस संसार में हम बहुत कुछ कर सकते हैं। पर उसका अंत में कोई मूल्य नहीं है, यह भी दीर्घ स्वप्न है। गीता में सही शब्द आया हैस्थितिप्रज्ञ’, वह हर स्थिति में शांत है। अपने भीतर से जुड़ा हुआ, निरन्तर कर्मशील। अत्यधिक सामान्य।

 

प्रश्न था- ”फिर यहाँ की उपलब्धि क्या है?“

           

            आपको बहुत पहले बताया था, जब हम छोटे थे। चौपाटी पर शाम को रेत में खेलने जाते थे। वहाँ रेत पर मकान बनाते थे-बड़े-बड़े। कोई पास जाए तो उसे दूर से भगाते थे। पर रात होते-होते खुद ही अचानक पांव से सब गिराकर घर भाग आते थे। यह बचपन का खेल ही महत्वपूर्ण है। इससे अधिक कुछ नहीं।

 

            छोटा बच्चा खिलोनौं से खेलता है, पर जब माँ जाने को होती है, सब फेंक कर  मां की गोदी में चढ़ जाता है।

            यहाँ कोई महत्वपूर्ण है, बेकार। बस एक खेल है। भागवत में इसेरासकहा गया है। रस यानि आनन्द। आनन्ददायी खेल, बस इससे अधिक नहीं। जितने लोग हैं, उतनी बातें। पर मैंने यही जाना है, यहाँ की कोई उपलब्धि नहीं है। सुख-शांति से जीना ही जीवन की कला है। जो दुःखी है, वह शांत नहीं हो सकता। सुख इन्द्रियों से, जगत से मिलता है। और शांति मन के इस बोझे को कम करते जाओ, उससे। यह संतुलन पाना ही धर्म है।

 

 प्रतिभासित सत्य जो सपना है, व्यवाहारिक रुप जो जगत है। इन दो में भी जो एक रस चेतना बहती है, उसे जानना, उस सब को अनुभव करना ही अवेयरनेस है, यही उपलब्धि है। जब यह बोध हो जाता है,  तब बोध होता है,  हम महल बना सकते है, बना दिया है, पर इसकी भी कोई अर्थवत्ता नहीं है, या तुम इसे छोड़ दोगे, या यह तुम्हंे। तब मात्र एक खिलाड़ी का भाव शेष रह जाता है। करने से करना बेहतर है और करने से यह बोध की, इसकी कोई उपलब्धि नहीं है। एक खेल है, बस, तब आनन्द शेष रह जाता है।

 

 

           

 

 

 

 

9.सत्य की खोज

 

 

 

प्रश्न  ,क्या सोचने से, मनन करने से, चिन्तन करने से सत्य को पाया जा सकता है?शास्त्र तो यही कहते हैं।

           

            सोचना ही जहाँ प्रारम्भ है, अंत है, वहाँ इससे परे भी है। इस पर स्वयं को ही विश्वास नहीं होता। जब मैं कहता हूँ, किसी बात को एक बार सोचो, तय करो पर उस पर भी विश्वास नहीं होता है। हम काम करते है, तब भी सोचते रहते हैं। काम होता रहता है, तब भी सोचते हैं। काम पूरा हो जाता है, उस पर उसके बाद भी सोचते हैं। यह पश्चाताप और प्रायश्चित शब्द तभी पैदा हुए है।

           

            जीवन तो विरोधाभासो से भरा है। सब तरफ से हमारे पास हमें प्रवाहित करने के लिए विचारों का जाला फैला हुआ है, इतनी सूचनाएं पहले नहीं थी। जीवन अपने आप शांत था, पर आज मनुष्य के मस्तिष्क का विकास इतना हो गया है कि उसके पास सब तरफ की हजारों जानकारियाँ है, वह यही जानता है कि वह सोचता है, इसीलिए वह है भी।    

 

            पर सत्य, क्या है? यह भाषा का सच तो नहीं है। जहाँ तर्क शास्त्र से वाक्य की परीक्षा होती है या व्याकरण के हिसाब से वाक्य को पूरा किया जाता है। सत्य की खोज का अर्थ होता है। जीवन और जगत का आधार क्या है, जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? यह सृष्टि का आधार क्या है? ये प्रश्न कम होते-होते मनुष्य के पास आते है, दुःख का कारण क्या है? वह प्रकृति के रहस्य को जानना चाहता है?

 

            पर क्या यह विचारों से जानना सम्भव है?”

            पश्चिमी दर्शन का आधार तार्किक जांच है? वे बु(ि से परीक्षण करना चाहते हैं। पर सत्य तो बु(ि के ही पार है। भारतीय )षि कहता है, नेति, नेति।

           

            उस दिन कोई कह रहा था, जो भले है, वे दुःख पाते है, जो दुष्ट है, वे समाज में खुश है, क्यांे? जीवन जो है, विरोधाभासों से भरा है। मार्क्सवादी ने इसका कारण सामाजिक व्यवस्था में देखा। जो मनोवैज्ञानिक है, वेउसके मन की ग्रन्थियों  में बताया करते है, उनकी अपनी थियरी है। धार्मिक लोग कर्मकाण्ड में तलाशा करते है, पर सबकी अपनी सीमा है? एक ही  वृक्ष की सभी पत्तियां अलग क्यों है? पता करंे, यह प्रकृति का स्वभाव है। एक ही क्यारी में, सब तरह की खुशबू के दस तरह के पौधे कैसे खिलतेे है। पता करे? यह सत्य जो है, यह बु(ि से परे झांकने को कहता है, तब वह पाता है कि वह चुप हो जाता है। नहीं जान पाया है, तब भी चुप है। जान गया तो भाषा उसके पास नहीं है, हम अपने से आगे ही देख पाते है। पीछे नहीं, इन्द्रिया विषय को देखती है। मन से इन्द्रियों को देख पाता है, पर बु(ि से परे क्या है, यह बु(ि नहीं देख पाती है। इसी को ही रहस्य कहा जाता है।

 

            फिर हमारे सवाल क्या हैं?“

            उस दिन स्वामीजी के पास , चोयल साहब किसी रेल्वे के रिटायर्ड अधिकारी को लेकर आए थे। वे पास के सोफे पर ही बैठे। आते ही सवाल ही सवाल, उसके सवालों का अंत नहीं था। वे यह साबित करना चाह रहे थे, जितना उनका ज्ञान है, उतना किसी का नहीं। वे सवाल पूछते, पर उत्तर आने के पहले दूसरा सवाल।

 

            स्वामीजी शांत थे। बोले,” ये सवाल तो किताबों के हैं, आपने पढ़ा बहुत है, उत्तर भी आपके पास हैं। आपका कोई सवाल हो तो पूछें?“

 

            सही सवाल हम पूछना ही नहीं चाहते है। वह हमारा सवाल है और उसका उत्तर भी हमारे पास है। सही सवाल को मस्तिष्क नहीं पूछ सकता? मन और मस्तिष्क का गठजोड़ जब टूटता है, जब स्मृति का दबाव हट जाता है, तब सही सवाल पैदा होता है, सही सवाल वह है, जो तुम्हारा है?

 

            तुम अपने सवाल को न्यायोचित ठहराने के लिए उसे अधिक से अधिक सबका बनाने का प्रयास करते है।  मुझ में आत्म विश्वास की कमी है? तुम पूछते हो, महिलाओं में आत्म विश्वास कम क्यों है? सही सवाल वहीं पैदा होता है, जहाँ मस्तिष्क चुप हो जाता है, तब पुकार हृदय में उठती है और तब उत्तर वहाँ अपने आप उपस्थित हो जाता है? यह उत्तर बु(ि नहीं देती है। यह विवेक देता है। बु(ि जब शत-प्रतिशत शुरु हो जाती है, तब विवेक में ढल जाती है। अब विवेक कौंधता नहीं है, वरन स्पष्ट हो जाता है। विवेक जहाँ है, वहाँ बु(ि है, शांत है, निश्चयात्मक है। जहाँ अवेयरनेस    है, वहाँ एकाग्रता भी है। पर जहाँ मात्र बु(िमता है, वहाँ विवेक हो, आवश्यक नहीं  है। जहाँ एकाग्रता हो, वहाँ अवेयरनेस  हो, जरुरी नहीं है। यह विरोधाभास शाब्दिक नहीं है, उसकी प्रकृति में है।

            मन का स्वभव द्वन्द्व में है, प्रकृति द्वन्द्वात्मक है। द्वन्द्व में ही गति है। मन की गति मन की शक्तिहीनता है। मन की शक्ति निकर्वचारता है। जो बु(िमान है, वह उसे बकवास मानता है। आप दिन-रात को एक कैसे कह सकते हैं?पाप और पुण्य को अलग मानते हैं? हम स्वर्ग और नरक को  भी दो मानते है। मोक्ष तो एक ही है। यह भी आप मानते हैं। वहाँ कोई द्वन्द्व नहीं है। मोक्ष शब्द शांत मन की उपलब्धि है। वहाँ दोनों ही गिर गए।

           

            शास्त्र कहता है, वृक्ष सेयमलार्जुन“, प्रकट हो गए। वृक्ष में मन बस सुप्त है, पर प्राण है। वैज्ञानिक कहते है, पौधे भी बागवान को देखकर हर्षित होते है, पर हम निरन्तर कुल्हाड़ी लिए रहते है। हृदय की तो एकता है, पर बु(ि में भटकाव  है। शास्त्र कहता है बु(ि का पुत्र अहंकार है, उसका पुत्र मन है। जब हम कहते है, पंच महाभूतों से शरीर बना है,तब हम पृथ्वी का इतना दोहन शोषण क्यों करते है? हम अपने ही शरीर के आवश्यक अंग को, उसके कारण को दूषित करते जा रहे है? हमारे शास्त्रों ने इसे तभी धरतीमाँकहा था।

 

            धरती पर वृक्ष खड़ा होता है, फूल आते है,फल आते है, धरती पर सब गिरते है।फिर वर्षा आती है, अंकुरण फिर हो जाता है, यह अस्तित्व है। वह नाना रुपों में स्वतः अभिव्यक्त हो रहा है, क्या कारण है? मैंने पहले कहा था, ”कारण रहित कारण,“ यहाँ बस हो रहा है। इसके साथ एकरसता पाना ही, अस्तित्व के समीप आना है। अब तो विज्ञान है, प्रयोगशालाएं पर पहले वनस्पति का ज्ञान कैसे होता होगा? यह तीसरा रास्ता भी है, वहाँ वस्तु स्वयं अपने आप को प्रकाशित कर देती है। पर यहसत्यबु(ि से नहीं पाया जाता, यहीँ विरोधाभास है। वहाँ पर जो दर्पण है, वहाँ वस्तु अपने स्वभाव को प्रकट कर देती है, यही जानना ध्यान है।

 

            हम मन से ही सवाल करते है, और मन से ही उत्तर जानना चाहते है, मन विरोधाभासी है, वह संतुष्ट नहींहोता है, वहाँ असंख्य प्रश्न है।

 

            आपने पूछा है, डॉ बसावड़ा  जो अमरीका से आए थे, उनमें क्या खास बात थी।

            बात क्या खास होगी।इतने बडे़ मनोवैज्ञानिक थे, पर वे जब सुनते थे, पूरी तल्लीनता से सुनते थे, मानों वे शब्दों को घूंट-घूंट के पी रहे हों।

 

            जब हम हृदय से सुनते है, वहाँ प्रश्न उठते ही नहीं है। क्योंकि वहाँ उत्तर अपने आप आना शुरु हो आता है। प्रश्न वहीं तक खडे़ होते है, जहाँ तक मन है। वहीं तक सारे विरोधाभास है। इसीलिए संतों ने दर्शन शब्द को पास नहीं आने दिया। दर्शन और ग्रन्थ बाद में आते है, ये बु(ि की उपज है। जहाँ एक ही सवाल के हजारों उत्तर तैयार है। सबकी अपनी-अपनी व्यवस्थाएं है, मेरी छोटी सी थियरी है, वर्तमान में रहो, बस।

 

            वर्तमान है क्या?“

            यह आप पता लगाओ, जहाँ तक आपका मन है, समय में है, वहाँ अतीत है, स्मृति है और कल्पना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ मन नहीं है, वहाँ समय नहीं है, वहाँ बस है, अस्तित्व है। शास्त्र में उसेज्ञानीकहा है, ‘ज्ञानवर्तमान में ही है। स्मृति मे सूचना है, भंडार है, अनुपयोगी है।

 

            शब्द है, ध्यान, जागना, स्मृति भी नींद है, कल्पना भी नींद है, अनवश्यक विचारणा भी नींद है। उसे भी दिवा स्वप्न कहा जाता है। डेेेेेे ड्रीमींग  थी सब सपना है। जहाँ जगना है, वहाँ नींद नहीं है, वहाँ समय नहीं है।

 

            जब हम विचारधारा के दबाव से परे चले जाते है, वहाँ फिर सपने देखना बंद हो जाता है। तब नींद खुलती है, जहाँ तक मन है, समय है, समय में ही ड्रीमींग है। गहरी नींद है। जगना और ध्यान,अवेयरनेस, शब्द एक ही बात को बता रहे हैं।

 

            जब हम इस वर्तमान को शब्द देना चाहते हैं, वह यह है, वह तुरंत अतीत में चला जाता है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ कोई सपना नहीं है, वहाँ नींद नहीं है। नींद ही प्रमाद है, यह समय है, यह मन है, यह अतीत है, यह भविष्य है। वहाँ कहंे तो निर्विचारता है। वहाँ शरीर तो सक्रिय होगा, पर मन निष्क्रिय होता चला जाता है। उसे भुना हुआ बीज भी कहा जाता है। उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। मन की पहचान हमेशा विचारणा, अवधारणा और कल्पनाओं में ही होती है। कामना का भी जन्म भविष्य में होता है। वर्तमान में कामना खड़ी ही नहीं हो पाती है। वर्तमान वही है, जहाँ किसी प्रकार काकलनहीं है।

 

            आपने ही बताया था कि श्री“,   अपनी पत्नी श्रीमती   से बात कर रहे थे, श्री    नहीं थी। श्रीमती      वहीं थीं, श्री ने कुछ कहा था। श्रीमतीरवने कुछ और सुना, उनकी बातें तीखी हो गईं। वे अतीत में जाकर बोलीं, ये तो पहले भी कभी मुझसे खुशनहीं थे, आज भी नहीं। इनकी बीमारी में मैंने कितना ध्यान रखा। वे बोली चली जा रही थी। श्री कहना, कुछ और चाह रहे थे, उनको दो घंटे बाद ही सत्संग भवन  से दूर अपने घर जाना था। श्रीमती  जो पास बैठीं थीं, कुछ और कहने लग गईं थीं। श्री ने कहा, आप तो मेरे पक्ष में थी, ये अचानक क्या हुआ? आपने ही बताया था तीनों अपने-अपने आंतरिक  मानोलॉग में जाकर बतिया रहे थे, क्यों?

 

            सब अपने आप में ही बतियाते है, उनकी अपनी दुनिया में है, जहाँ वे है, जब दूसरा कोई आता है, वे उसे अपनी ही दुनिया में लाना चाहते हैं। पास आते है, कुछ ही देर में संघर्ष शुरु हो जाता है।

 

            सब अपने-अपने सपनों को अपनी-अपनी दृष्टि कोे दूसरे पर थोपना चाहते है। यही कल है, हर घर की यही कहानी है। बु(ि की लघुतम इकाई विचार है। जहाँ विचार है, वहाँ विकार है। दोनों एक ही है। यह भी सच है कि हम दूसरे के सपनों को नहीं देख पाते है और जब तक हम सपनों की दुनिया में है, हम सच को नहीं जान सकते है। सपने हमेशा अनवरत विचारणा में रहते है।

 

            जो भी समस्या  है, वह वास्तविक है। उसका समाधान सपनों की दुनिया से नहीं हो सकता है। इसीलिए शब्द है, जागना, जो जागा है, वही साफ-साफ देख पाता है, कारण कहाँ है? अवधारणा, विचारना और स्मृति, स्वप्न जो यह मन की पहचान है, यह स्वप्न ही है। जब यह मन पूरी तरह विलीन हो जाता है, तब कहा जाता है कि वह जग गया है। इसीलिए मैंने पहले कहा था कि यहाँ बु(ि शत-प्रतिशत शु( हो जाती है, तब विवेक जागता है। इस सपने में बु(िमता तो है, आप जानकार है, पर विवेकी नहीं हैं। अनंत यात्रा में कहा है,- ” कुृभ नीलकंठ से कहता है, तुम्हारा विवेक जाग्रत हुआ, मेरे जीवन का यही उद्देश्य था, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे।गुरु का लक्ष्य शिष्य को विवेकी बनाना है। जो कुछ मुझे कहना था, मैंने अनंत यात्रा में साफ-साफ कहा है। जो विवेकी है, वह अपनी आत्म प्रशंसा, आत्म-विज्ञापन सबसे परे चला जाता है। जहाँ तक पहचान की भूख है, वहाँ तक मन सक्रिय है। जहाँ मन की सक्रियता नहीं है, वहाँ अहंकार अपने आप गिर जाता है।

 

            तब उनमें और हम में फर्क क्या है?“

            कुछ भी नहीं, तुम भोजन करते हो। तुम्हारे साथ में भी करता हूँ। वर्षो से साथ है, क्या अन्तर पाया है?’

            आप ज्ञानी है।

            आप कम है क्या?’

लोगों ने शास्त्रों के आधार पर कपोल कल्पित कहानियाँ गढ़ ली है। जहाँ मूल बात दब जाती है। मैं सबसे यही कहता हूँ, मेरे साथ रहो, मेरे पास आओ। भेद इतना ही है, मेरी पहचान नहीं है, मैं साधारण हूँ, सामान्य हूँ। आप विशिष्ट, आपकी पहचान है। आप पद पर हैं, वचास लोग मिलने आते हैं।

जब आप विशिष्ट हैं, तब आप सबमें सामान्य देखते है। वह जो साधारणता है, वही आप  सबमें पाते हैं, पर जो जाग्रत है, उसके बाहर का दृश्य गिर जाता है। वह सब जगह, सब में, वही एक भाव देखता है। वहाँ कोई भेद नहीं है।

यह कोई समझने की चीज नहीं है। तर्क नहीं है, यह आचरण हो जाता है। बस यही भेद है। वहाँ  कोई आशा है, निराशा, कुछ नहीं, बस यह एक रस आनन्द में है और उसके आस पास प्रेम घटता है, वही बचा रहता है, बस। तब आनन्द शेष रह जाता है।8 सत्य की खोज

 

प्रश्न था-         क्या सोचने से, मनन करने से, चिन्तन करने से सत्य को पाया जा सकता है? शास्त्र तो यही कहते हैं।

           

            सोचना ही जहाँ प्रारम्भ है, अंत है, वहाँ इससे परे भी है। इस पर स्वयं को ही विश्वास नहीं होता। जब मैं कहता हूँ, किसी बात को एक बार सोचो, पूरी तरह सोचो,  अपने अहंकार को हटाओ, तय करो , पर उस पर भी विश्वास नहीं होता है। हम काम करते हैं, तब भी सोचते रहते हैं। काम होता रहता है, तब भी सोचते हैं। काम पूरा हो जाता है, उस पर उसके बाद भी सोचते हैं। यह पश्चाताप और प्रायश्चित शब्द तभी पैदा हुए हैं।

            जीवन तो विरोधाभासांे से भरा है। सब तरफ से हमारे पास हमें प्रवाहित करने के लिए विचारों का जाला फैला हुआ है, इतनी सूचनाएं पहले नहीं थीं। जीवन अपने आप शांत था, पर आज मनुष्य के मस्तिष्क का विकास इतना हो गया है कि उसके पास सब तरफ की हजारों जानकारियाँ हैं, वह यही जानता है कि वह सोचता है, इसीलिए वह है भी।    

 

            पर सत्य, क्या है? यह भाषा का सच तो नहीं है। जहाँ तर्क शास्त्र से वाक्य की परीक्षा होती है या व्याकरण के हिसाब से वाक्य को पूरा किया जाता है। सत्य की खोज का अर्थ होता है। जीवन और जगत का आधार क्या है, जीवन क्या है? जीवन का उद्देश्य क्या है? इस सृष्टि का आधार क्या है? ये प्रश्न कम होते-होते मनुष्य के पास आते है, दुःख का कारण क्या है? वह प्रकृति के रहस्य को जानना चाहता है?

 

प्रश्न था-         पर क्या यह विचारों से जानना सम्भव है?”

 

            पश्चिमी दर्शन का आधार तार्किक जांच है? वे बुद्धिसे परीक्षण करना चाहते हैं। पर सत्य तो बुद्धि के ही पार है। भारतीय ऋषि कहता है, नेति, नेति।

           

            उस दिन कोई कह रहा था, जो भले हैं, वे दुःख पाते हैं, जो दुष्ट हैं, वे समाज में खुश हैं, क्यांे? जीवन जो है, विरोधाभासों से भरा है। मार्क्सवादी ने इसका कारण सामाजिक व्यवस्था में देखा। जो मनोवैज्ञानिक हैं, वे उसके मन की ग्रन्थियों  में बताया करते हैं, उनकी अपनी थियरी है। धार्मिक लोग कर्मकाण्ड में तलाशा करते हैं, पर सबकी अपनी सीमा है? एक ही  वृक्ष की सभी पत्तियां अलग क्यों हैं? पता करंे, यह प्रकृति का स्वभाव है। एक ही क्यारी में, सब तरह की खुशबू के दस तरह के पौधे कैसे खिलतेे हैं। पता करें? यह सत्य जो है, यह बुद्धि से परे झांकने को कहता है, तब वह पाता है कि वह चुप हो जाता है। नहीं जान पाया है, तब भी चुप है। जान गया तो भाषा उसके पास नहीं है, हम अपने से आगे ही देख पाते हैं। पीछे नहीं, इन्द्रियाँ विषय को देखती हैं। मन , इन्द्रियों को देख पाता है, पर बुद्धि से परे क्या है, यह बुद्धि नहीं देख पाती है। इसी को ही रहस्य कहा जाता है।

 

प्रश्न था-         फिर हमारे सवाल भी तो हैं, वे बैचेन करते रहते हैं।

                        (स्वामीजी चुप थे)

            (इसका उत्तर अगले दिन अपने आप मिल गया था )

           

            उस दिन स्वामीजी के पास , चोयल साहब किसी रेल्वे के रिटायर्ड अधिकारी को लेकर आए थे। वे पास के सोफे पर ही बैठे। आते ही सवाल ही सवाल, उनके सवालों का अंत नहीं था। वे यह साबित करना चाह रहे थे, जितना उनका ज्ञान है, उतना किसी का नहीं। वे सवाल पूछते, पर उत्तर आने के पहले दूसरा सवाल।

 

            स्वामीजी शांत थे। बोले,” ये सवाल तो किताबों के हैं, आपने पढ़ा बहुत है, उत्तर भी आपके पास हैं। आपका  ही कोई सवाल हो तो पूछें?

 

            सही सवाल हम पूछना ही नहीं चाहते हैं।जो हमारा सवाल है और उसका उत्तर भी हमारे पास है। सही सवाल को मस्तिष्क नहीं पूछ सकता? मन और मस्तिष्क का गठजोड़ जब टूटता है, जब स्मृति का दबाव हट जाता है, तब सही सवाल पैदा होता है, सही सवाल वह है, जो तुम्हारा है?

 

            तुम अपने सवाल को न्यायोचित ठहराने के लिए उसे अधिक से अधिक सब लोगों का  बनाने का प्रयास करते हो।  मुझ में आत्म विश्वास की कमी है? तुम पूछते हो, महिलाओं में आत्म विश्वास कम क्यों है? सही सवाल वहीं पैदा होता है, जहाँ मस्तिष्क चुप हो जाता है, तब पुकार हृदय में उठती है और तब उत्तर वहाँ अपने आप उपस्थित हो जाता है? यह उत्तर बुद्धि नहीं देती है। यह विवेक देता है। बुद्धि जब शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक में ढल जाती है। अब विवेक कौंधता नहीं है, वरन स्पष्ट हो जाता है। विवेक जहाँ है, वहाँ बुद्धिहै, शांत है, निश्चयात्मक है। जहाँ अवेयरनेस    है, वहाँ एकाग्रता भी है। पर जहाँ मात्र बुद्धिमत्ता है, वहाँ विवेक हो, आवश्यक नहीं  है। जहाँ एकाग्रता हो, वहाँ अवेयरनेस  हो, जरुरी नहीं है। यह विरोधाभास शाब्दिक नहीं है, उसकी प्रकृति में है।

 

मन का स्वभाव द्वन्द्व में है, प्रकृति द्वन्द्वात्मक है। द्वन्द्व में ही गति है। मन की गति, मन की शक्तिहीनता है। मन की शक्ति निर्विचारिता है। जो बुद्धिमान है, वह उसे बकवास मानता है। आप दिन-रात को एक कैसे कह सकते हैं?पाप और पुण्य को अलग मानते हैं? हम स्वर्ग और नरक को  भी दो मानते है। मोक्ष तो एक ही है। यह भी आप मानते हैं। वहाँ कोई द्वन्द्व नहीं है। मोक्ष शब्द शांत मन की उपलब्धि है। वहाँ दोनों ही गिर गए।

           

            शास्त्र कहता है, वृक्ष सेयमलार्जुन“, प्रकट हो गए। वृक्ष में मन बस सुप्त है, पर प्राण हैं। वैज्ञानिक कहते है, पौधे भी बागवान को देखकर हर्षित होते हैं, पर हम निरन्तर कुल्हाड़ी लिए रहते हैं। हृदय की ही तो एकता है, पर बुद्धि में भटकाव  है। शास्त्र कहता है बुद्धि का पुत्र अहंकार है, उसका पुत्र मन है। जब हम कहते हैं, पंच महाभूतों से शरीर बना है,तब हम पृथ्वी का इतना दोहन शोषण क्यों करते हैं? हम अपने ही शरीर के आवश्यक अंगों को, उसके कारण को दूषित करते जा रहे हैं? हमारे शास्त्रों ने इसे तभी धरतीमाँकहा था।

 

            धरती पर वृक्ष खड़ा होता है, फूल आते हैं,फल आते हैं, धरती पर सब गिरते हैं।फिर वर्षा आती है, अंकुरण फिर हो जाता है, यह अस्तित्व है। वह नाना रुपों में स्वतः अभिव्यक्त हो रहा है, क्या कारण है? मैंने पहले कहा था, ”कारण रहित कारण,“ यहाँ बस हो रहा है। इसके साथ एकरसता पाना ही, अस्तित्व के समीप आना है। अब तो विज्ञान है, प्रयोगशालाएं  हैं,पर पहले वनस्पति का ज्ञान कैसे होता होगा? यह तीसरा रास्ता भी है, वहाँ वस्तु स्वयं अपने आप को प्रकाशित कर देती है। पर यहसत्यबुद्धि से नहीं पाया जाता, यहीँ विरोधाभास है। वहाँ पर जो दर्पण है, वहाँ वस्तु अपने स्वभाव को प्रकट कर देती है, यही जानना ध्यान है।   हम मन से ही सवाल करते हैं, और मन से ही उत्तर जानना चाहते हैं, मन विरोधाभासी है, वह संतुष्ट नहीं होता है, वहाँ असंख्य प्रश्न हैं।

 

आपने पूछा है, डॉ बसावड़ा  जो अमरीका से आए थे, उनमें क्या खास बात थी।

 

बात क्या खास होगी।इतने बडे़ मनोवैज्ञानिक थे, पर वे जब सुनते थे, पूरी तल्लीनता से सुनते थे, मानों वे शब्दों को घूंट-घूंट के पी रहे हों।

 

            जब हम हृदय से सुनते है, वहाँ प्रश्न उठते ही नहीं है। क्योंकि वहाँ उत्तर अपने आप आना शुरु हो जाता है। प्रश्न वहीं तक खडे़ होते हैं, जहाँ तक मन है। वहीं तक सारे विरोधाभास हैं। इसीलिए संतों ने दर्शन शब्द को पास नहीं आने दिया। दर्शन और ग्रन्थ बाद में आते हैं, ये बुद्धि की उपज है। जहाँ एक ही सवाल के हजारों उत्तर तैयार हैं। सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं, मेरी छोटी सी थियरी है, ”वर्तमान में रहो,“ बस।

 

प्रश्न था-         वर्तमान है क्या?“

           

            यह आप पता लगाओ, जहाँ तक आपका मन है, समय में है, वहाँ अतीत है, स्मृति है और कल्पना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ मन नहीं है, वहाँ समय नहीं है, वहाँ बस है, अस्तित्व है। शास्त्र में उसेज्ञानीकहा है, ‘ज्ञानवर्तमान में ही है। स्मृति मे सूचना है, भंडार है,  जो अनुपयोगी है।

 

            शब्द है, ध्यान, जागना, स्मृति भी नींद है, कल्पना भी नींद है, अनावश्यक विचारणा भी नींद है। उसे भी दिवा स्वप्न कहा जाता है। ड्रीमींग  थी , सब सपना है। जहाँ जगना है, वहाँ नींद नहीं है, वहाँ समय नहीं है।

 

            जब हम विचारधारा के दबाव से परे चले जाते है, वहाँ फिर सपने देखना बंद हो जाता है। तब नींद खुलती है, जहाँ तक मन है, समय है, समय में ही ड्रीमींग है। गहरी नींद है। जगना और ध्यान,अवेयरनेस, शब्द एक ही बात को बता रहे हैं।जब हम इस वर्तमान को शब्द देना चाहते हैं, वह यह है, वह तुरंत अतीत में चला जाता है।

मन विचार है और विचार ही विकार है। यह सीधी सी समझने की बात है।मन चाहता है, वह अधिक से अधिक संग्रह रखे। उसे अधिक से अधिक खूंटिया चाहिए। समझाने के लिए जो कहा गया, वह भी सीढ़ी बन जाती है। क्योंकि जहाँ खाली मन आया, वहाँ मन नहीं रहता है। मन तो गति है, उर्जा है, उसका नाश तो नहीं होगा। पर वह गति अंतर्मुखी होकर अंतर्मन में विलीन हो जाती है। पर मन यह हाँ कोई सपना नहीं है, वहाँ नींद नहीं है। नींद ही प्रमाद है, यह समय है, यह मन है, यह अतीत है, यह भविष्य है। वहाँ कहंे तो निर्विचारता है। वहाँ शरीर तो सक्रिय होगा, पर मन निष्क्रिय होता चला जाता है। उसे भुना हुआ बीज भी कहा जाता है। उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। मन की पहचान हमेशा विचारणा, अवधारणा और कल्पनाओं में ही होती है। कामना का भी जन्म भविष्य में होता है। वर्तमान में कामना खड़ी ही नहीं हो पाती है। वर्तमान वही है, जहाँ किसी प्रकार काकलनहीं है।

 

            आपने ही बताया था कि श्री“,   अपनी पत्नी श्रीमती   से बात कर रहे थे, श्रीमती   भी  वहीं थीं, श्री ने कुछ कहा था। श्रीमतीरवने कुछ और सुना, उनकी बातें तीखी हो गईं। वे अतीत में जाकर बोलीं, ये तो पहले भी कभी मुझसे खुश नहीं थे, आज भी नहीं। इनकी बीमारी में मैंने कितना ध्यान रखा। वे बोली चली जा रही थी। श्री कहना, कुछ और चाह रहे थे, उनको दो घंटे बाद ही सत्संग भवन  से दूर अपने घर जाना था। श्रीमती  जो पास बैठीं थीं, कुछ और कहने लग गईं थीं। श्री ने कहा, आप तो मेरे पक्ष में थी, ये अचानक क्या हुआ? आपने ही बताया था तीनों अपने-अपने आंतरिक  मानोलॉग में जाकर बतिया रहे थे, क्यों? (यहाँ  वास्तविक नाम हटा दिए हैं)

 

            सब अपने आप में ही बतियाते हैं, उनकी अपनी दुनिया में है, जहाँ वे हैं, जब दूसरा कोई आता है, वे उसे अपनी ही दुनिया में लाना चाहते हैं। पास आते हैं, कुछ ही देर में संघर्ष शुरु हो जाता है।

सब अपने-अपने सपनों को अपनी-अपनी दृष्टि कोे दूसरे पर थोपना चाहते है। यही कल है, हर घर की यही कहानी है। बुद्धि की लघुतम इकाई विचार है। जहाँ विचार है, वहाँ विकार है। दोनों एक ही हैं। यह भी सच है कि हम दूसरे के सपनों को नहीं देख पाते हैं और जब तक हम सपनों की दुनिया में है, हम सच को नहीं जान सकते है। सपने हमेशा अनवरत विचारणा में रहते हैं।

 

            जो भी समस्या  है, वह वास्तविक है। उसका समाधान सपनों की दुनिया से नहीं हो सकता है। इसीलिए शब्द है, जागना, जो जागा है, वही साफ-साफ देख पाता है, कारण कहाँ है? अवधारणा, विचारना और स्मृति, स्वप्न जो यह मन की पहचान है, यह स्वप्न ही है। जब यह मन पूरी तरह विलीन हो जाता है, तब कहा जाता है कि वह जग गया है। इसीलिए मैंने पहले कहा था कि यहाँ बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जागता है। इस सपने में बुद्धिमता तो है, आप जानकार हैं, पर विवेकी नहीं हैं।

 

 अनंत यात्रा में कहा है,- ” कुृभ नीलकंठ से कहता है, तुम्हारा विवेक जाग्रत हुआ, मेरे जीवन का यही उद्देश्य था, हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी नहीं रहे।गुरु का लक्ष्य शिष्य को विवेकी बनाना है। जो कुछ मुझे कहना था, मैंने अनंत यात्रा में साफ-साफ कहा है। जो विवेकी है, वह अपनी आत्म प्रशंसा, आत्म-विज्ञापन सबसे परे चला जाता है। जहाँ तक पहचान की भूख है, वहाँ तक मन सक्रिय है। जहाँ मन की सक्रियता नहीं है, वहाँ अहंकार अपने आप गिर जाता है।

 

प्रश्न था-         तब उनमें और हम में फर्क क्या है?“

            कुछ भी नहीं, तुम भोजन करते हो। तुम्हारे साथ में भी करता हूँ। वर्षो से साथ हैं, क्या अन्तर पाया है?’

            आप ज्ञानी हैं।ं

            आप कम हैं क्या?’

लोगों ने शास्त्रों के आधार पर कपोल कल्पित कहानियाँ गढ़ ली है। जहाँ मूल बात दब जाती है। मैं सबसे यही कहता हूँ, मेरे साथ रहो, मेरे पास आओ। भेद इतना ही है, मेरी पहचान नहीं है, मैं साधारण हूँ, सामान्य हूँ। आप विशिष्ट हैं, आपकी पहचान है। आप पद पर हैं, पचास लोग मिलने आते हैं।

 

जब आप विशिष्ट हैं, तब आप सबमें सामान्य देखते है। वह जो साधारणता है, वही आप  सबमें पाते हैं, पर जो जाग्रत है, उसके बाहर का दृश्य गिर जाता है। वह सब जगह, सब में, वही एक भाव  देखता है। वहाँ कोई भेद नहीं है।

 

यह कोई समझने की चीज नहीं है। तर्क नहीं है, यह आचरण हो जाता है। बस यही भेद है। वहाँ  कोई आशा है, निराशा, कुछ नहीं, बस यह एक रस आनन्द  है और उसके आस पास प्रेम घटता है, वही बचा रहता है, बस।

 

                                    10 बंधन और मुक्ति

 

क्या मुक्ति यही है?“

 

            मुक्ति किससे, जाना कहाँ है? छुटकारा किससे? बंधन है क्या? विचार तो कभी करते नहीं है। वस्तु है, व्यक्ति है, परिस्थितियाँ हैें, ये कहाँ है? बाहर जो घट रहा है, उसे आप बदल सकते हैं क्या? ये असंख्य लोगों के संकल्प हैं। संकल्प ही सृष्टि है?

 

            बंधन और मुक्ति दोनों ही शब्द आपस में उलझे हुए हैं। पुरानी कहानी है-किसान गाय को बांध कर ले जा रहा था। गुरु ने शिष्य से पूछा-किसनेे किसको बांधा है। शिष्य बोला-किसान ने गाय को रस्सी से बांध रखा है।गाय बंधी हुई है। गुरु ने पूछा, रस्सी टूट गई तो? तभी रस्सी टूट गई। गाय भाग रही थी। पीछे-पीछे किसान भाग रहा था।

            यही बंधन है।

 

            वस्तु हमें नहीं बांधती, परिवार, नौकरी, धन, हम स्वयं बंधे हुए हैं। बंधन हम में ही है। बंधन का स्वरुप क्या है? क्या वहाँ रस्सी है? बंधन मात्र विचार है।विचारों से मुक्ति ही बंधनों से मुक्ति है।

 

            पुरानी कहावत है। दृश्य का चिन्तन ही पराधीनता है। जब दृष्टा बनते हैं, तभी दृश्य का पता लगता है। एक दृश्य बाहर है, उसकी ही अनुकृति भीतर है, वह निरन्तर प्रवाहित है। जब उसे देखने का अभ्यास होता है, तब पता लगता है, जो दिख रहा है, जो देख रहा है, वे एक होते हुए भी दो हैं। यह दृष्टा जब इस दृश्य का बार-बार चिन्तन करता है, तब यह उसे संस्कार रुप में ढालता चला जाता है। वह नचाता है, यह नाचता है। यही बंधन है।

 

प्रश्न था-         फिर कौन छुटकारा देगा?“

 

            कोई गुरु, कोई ग्रन्थ, कोई नहीं,  कोई दूसरा नहीं।

 

            हम प्रायः दूसरों को दोष देते हैं कि उसने बांध रखा है, दूसरा ही आकर हमारा उद्धार करेगा। शास्त्र में अवतार की प्रतीक्षा का यही रहस्य है। दूसरे को तो तुम्हें बांधने की जरुरत है, तुम्हारे बंधन से मुक्त होने की। जैसे हर वस्तु दूसरी है, उसी तरह तुम जिसे ईश्वर कह कर मांगते हो, उसके आश्रय  में चले जाते हो, वह भी दूसरा ही है।

 

            गीता में बार-बार कहा गया है, पर सुनता कोई नहीं है।मामजो है,  वह दूसरा नहीं है। वह तुम्हाराआत्मरुपहै, तुम्हारास्वहै, वह तुम्हारी अपनी ही निजता है। उसकी ही शरण में जाना, अपने निज स्वरुप को पाना है। उससे दूरी विचारों की है, विचार मन स्वरुप है। भाव के वह समीप है। मन जब अंतर्मुखी होता है। तब गीता का दूसरा अध्याय उस रहस्य को खोलता है। जिसे प्रसाद कहा जाता हे, वही यह भाव की प्राप्ति है। यहाँ विचार और विकार खो जाते हैं। विचार ही विकार है। जब अंतःकरण राग-द्वेष से रहित होता है, तब यह शुद्धता प्राप्त होती है। विषय भी रहेंगे, वस्तु भी होगी, इन्द्रियाँ भी होगी। पर मन जो है, वह नियंत्रित है, यहाँ मुक्ति सहज है।

 

            पर हम मुक्ति को बाहर तलाश करते हैं। बाहर से किसी ने बांधा है, कोई बांध सकता है। बंधने वाले हम ही हैं। हनुमानजी लंका में गए। स्वतः ही अपनी इच्छा से नागपाश में बंध गए। वे तो मुक्त थे, पर जानते थेपाशकी मर्यादा रखनी है। बंध गए। वही यहाँ है, जो सोया हुआ है, वह प्रमाद में  कार्य कर रहा है, बस कर रहा है, क्यों? पता  नहीं, पर जो जागा हुआ है, वह होश में है, वह जानते हुए भी, जागे हुए ही कर रहा है। काम तो दोनों को ही करना पड़ता है।

 

प्रश्न था-         तो क्या यह सेवा है?“

 

            सेवा सहज कर्म है। करना तो पडे़गा ही। प्रकृति कार्य कराती है। कहा गया हैदाइ विल बी डन   यहाँ अंतःप्रेरणा प्रमुख हो जाती है। अपनी कोई इच्छा नहीं होती। किसके लिए क्या करना है? गुणों की उपासना नहीं होती। यह तो दिखाने की सेवा है।  जहाँ दान का दिखावा है,वहाँ प्रशंसा पाने की भूूख है। लोग देश सेवा के लिए जेल गए, बहुत से शहीद होगए। पर जो आज बूढ़े बचे हैं, वे पेंशन पाने के लिए तत्पर हैं। जहाँ कुछ पाने की लालसा है, वहाँ भोग की कामना है। यह सेवा नहीं है। सब एन.जी.. हो गए हैं। जहाँ जाग्रति है, बोध है, वहीं प्रेम है, वहीं त्याग है, वहीं सेवा है। सबकी सेवा ही अहंकार को तोड़ सकती है। यही आत्म बीज का कठोर आवरण है। नारियल के भीतर पानी है, पर बाहर कठोर कवच चढ़ा होता है। वह टूटता है, तब पानी मिलता है। यह मन अपने मिटने के लिए पचास उपाय तलाश करता है।

           

मिटने की बात भी समझाने के लिए है। मन तो उर्जा है। उसका विनाश नहीं होगा। हाँ, नियंत्रित मन, एकाग्रता को पाकर, अंतर्मुखी हो जाता है। तब जो उर्जा बाहर बह रही थी, वह भीतर की ओर लौटने लगती है। मन का मस्तिष्क से सम्बन्ध हट जाता है, भीतर हृदय से हो जाता है। यह हृदय भी तुम्हारा बायोलोजिकल हार्ट नहीं है। पर यह है। यहाँ डिवोशन है। जब तक मन मस्तिष्क में है, तर्क हैं, वह साधक है, वह शिष्य है, वह विद्यार्थी है, पर जब अंतर्मुखी होता है। वहाँ सारे प्रश्न ही गिर जाते हैं। उत्तर उसे स्वयं प्राप्त होने लगते हैं। वहीं प्रेम की अनभूति भी होती है। यहीं वह मुक्ति है, जहाँ बंधन नहीं है। कोई भटकाव नहीं होता है। बुद्धि सम होती है, फिर निश्चयात्मक होती हुई विवेक में ढल जाती है।

 

            मैंने पहले भी कहा था, विवेक अलौकिक होता है। विवेक प्राप्त होना ही गुरुतत्व का पहला लक्षण है। गुरु शिष्य के विवेक को ही जाग्रत करता है। विवेक की धरती पर पुराना कचरा जल जाता है। संग्रह समाप्त होने लगता है। जब पुराना सामान हटता है, तभी नया भी सकता है। हम चाहते हैं, पुराना भी रखा रहे, और नया भी जाए, पर यह क्या संभव है।जब विवेक का आदर होना शुरु होता है, तब बुद्धि चातुर्य का दबाव छूटना शुरु हो जाता है। जैसे बच्चे को प्रारम्भ में सीखने के लिए स्लेट-बत्ती दी जाती है, पर बाद में जब कॉपी पर लिखता है, वह भी छूट जाती है।

 

            प्रारम्भ में जो उपाय दिए जाते हैं, वे सारहीन हो जाते हैं। व्यर्थ की साधनाएं छूटने लगती हैं। पर जो प्रबुद्ध है, ज्ञानी है, वह जानता है कि उसके आचरण को  तो लोग नहीं समझेंगे। पर जो अंधानुसरण में जो कर रहे है, वह भी छोड़ देंगे, तो उससे उनका  अहित और भी हो जाएगा। वह इन रुढ़ियों के प्रति भी चुप हो जाता है, वह प्रकट नहीं करता। हजारों सालों से चली रही परम्परागत साधनाओं का यही मूल्य है कि ये जिज्ञासा को पैदा तो करती हैं।

 

गौतम बुद्ध ने इसीलिए, उन सवालों को पूछने के लिए ही मना कर दिया था, जो मात्र बौद्धिक कौतुहल ही पैदा करते है। संत कबीर ने रुढ़ियों पर, परम्परागत साधनाओं पर, अंध विश्वास पर प्रहार भी किया, सही रास्ता भी बताया। पर हुआ क्या, लोग आधा कबीर ही पढ़ते है। जहाँ प्रहार किया, वह उन्हें रुचिकर है, वे उसके तत्व की बात को बोझिल मानकर छोड़ देते है। बात एक ही है। समय कम है और संग्रह बहुत है। भटकाव बहुत है। भटकाव तुम्हारा ही है। तुम्हारे विचारों का है। उन्हें तुम ही कम कर सकते हो। कोई दूसरा नहीं, मैं भी नहीं। करना तुम्हें ही है। यहाँ पाने के नाम पर कुछ भी नहीं है। कोई उपलब्धि नहीं। हाँ, शांत शक्तिशाली रहना हम सभी चाहते हैं, वह यहाँ रहने की कला है। इसीलिए कुछ पाने की लालसा में यहाँ आए हो, तो व्यर्थ है। मैं छू लूंगा। तुम्हारे कर्म फल कट जाएंगे, यह सोचना ही व्यर्थ है।

 

            जो यह समझा रहे हैं, कह रहे हैं, वे दुकान चलाकर माल बेच रहे हैं। धोखा ही धोखा है। कर्म का फल अटल है, वह तो भोगना ही होगा। इसीलिए कर्मकांड व्यर्थ है। निरर्थक है। बस मन घबराए नहीं। व्यक्ति में आशा बनी रहे, इसके लिए उपाय है। इससे अधिक नहीं। महत्वपूर्ण तुम्हारा जगना है। तुम्हारी जागरुकता है जितने विचार होंगे, विचारधारा सघन होगी, उतनी ही गहरी नींद होगी। तुम्हारी नींद टूट जाए, यही गुरु का रास्ता है।

 

अनंत यात्रा में बताया है, उसे समझो, रानी चूड़ाला  नीलकंठ को समझाती है कि व्यर्थ की साधनाओं से कुछ होने वाला नहीं है। वह अपने पति राजा शिखिध्वज को तो गुरु रुप में उपस्थित होकर ज्ञान देती ही है। नीलकंठ को भी समझाती है। तुम्हारा विवेक जाग्रत हो गया है, यही मेरे जीवन का उद्देश्य था। क्या पता इसके बाद मेरा शरीर रहे अथवा नहीं? गुरु का उद्देश्य मात्र शिष्य का विवेक जागरण है। विवेक जाग्रति बोध, जागरूकता, अवेयरनेस, संज्ञा कुछ भी हो, पर सारतत्व यही है। जहाँ वह निरन्तर अपने आत्म तत्व से जुड़ा हुआ सचेत है। यही मुक्ति है। उसकी अपने बंधनों से पहचान कर उनसे हटते चले जना ही मुक्ति पथ है। 

 

 

 

                                    11   कर्मशील बनो

 

             मै वही तो हूँ।

            जो दूसरों की आंखों में बहुमूल्य होना चाहता है, वह अपने आप से दूर चला जाता है। बस में हूँ, जो हूँ, वही हूँ। तुम्हारी आँखों में तुम्हारी उम्मीदों के अनुसार बनने के लिए, जोमैं हूँ“, उससे हटना पड़ता है।

 

            अपने स्वभाव को पाना ही सार है। यही स्वधर्म है। मैंने पहले कहा था, यहाँ छोड़ना नहीं पड़ता, जो छूटना होगा, वह स्वाभाविक ही होगा, वह छूटता चला जाता है। वस्तु जगत ऐसा ही रहता है, रहेगा, पर पकड़ चली जाएगी। पकड़ता मन है। जहाँ मन नहीं है, वहाँ पकड़ना भी नहीं है।यह जो आसक्ति है, अपने आप कम होती है। तुम छोड़ने और छूटनेे की चिन्ता मत करो।

 

            जैसे-जैसे पहाड़ पर उसकी चोटी पर पहुँचना शुरु होता है, नीचे ही भारी सामान छूटने लग जाता है। भार की पहचान अपने आप होती है। बोझा अपने आप हटता है। दार्शनिक हर अनुभव को जब शब्द में गढ़ते है, तब बाद वाले उस शब्द तक आने की सीढ़ी बना लेते है। दोनों ही अनावश्यक हैं, मूल बात प्रयोग की है।

 

            यह बात सही है, जितना वह अपने आप से जुड़ता जाता है, उतनी ही सरलता उसके भीतर आती जाती है। सरलता त्याग कोई ओढ़ने वाली चादर नहीं है। सादगी कपड़ों से नहीं आती। यह सहज है, वह भीतरी है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है। किसको क्या दिखाना है, जहाँ दिखने की चाह है, वहाँ जगत है। वहाँ मन  सक्रिय है। वहाँ यह बोध ही नहीं है कि मैं कोई विशेष हूँ। वहाँ कोई परम्परागत अवधारणा नहीं है, ही पवित्रता है, अपवित्रता। जब गुरुकुल चलाया था, बच्चों को लेकर पर्यटन पर भी जाता था। मैंने कहीं पूजा-पाठ नहीं किया, सिखाया।

 

            एक ही बात बताई, कर्मशील बनो। यहाँ गुरुकुल में केाई मंदिर नहंीं है। व्यायाम शला बनाई थी। वहाँ बाद में हनुमान जी की प्रतिमा लोगों ने लगा दी। यहाँ कोई यज्ञ या अनुष्ठान नहीं हुआ। बाद में  लोग करने लगे। मैंने यही कहा, आप जो चाहंे, करंे, आपकी स्वाधीनता है, पर मैं कुटिया से नीचे नहीं उतरुंगा।

 

            क्यों,...... मैं ज्ञानी हूँ, मैं भक्त हूँ, यह  जो मान्यता है, व्यर्थ है,... मैं,..... मैं ही हूँ, बस। यह कहना कि मैं वह हूँ,..... यह भी एक अतिश्योक्ति  है। यह वाक्य भीयोग वशिष्ठ   से आया है। यह भी अहंकार की सूक्ष्म छाया है। जहाँ भी हमने अपने आपको दूसरों से विशेष , पवित्र असाधारण माना, हम नीचे गिरे। पतन की कोई सीमा नहीं है। पहले आपको बताया था, कानपुर के विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में गया था। मंच पर बहुरुपियों की भीड़ थी। वहीं पर ही लोग छोटे-छोटे आइनों में अपना चेहरा ठीक कर रहे थे। हाँ भीड़ में अवश्य जो सामने थे, कुछ लोगों का   प्रभामंडल   दिखाई पड़ा। वे जरुर पवित्र थे, साधक थे। हम लोग नामों से, प्रभावित हो जाते हैं। यहाँ तो अपनी पहचान भी रहे, इसकी भी जरुरत नहीं है।

 

प्रश्न था -” इस साधारणता से क्या आशय है, क्या पाया है?“

 

            यहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं है। कुछ पाना है, आप नौकरी कर रहे है, प्रशासक हैं। कार है, बंगला है, सुख- सुविधाएं है, वेतन मिलता है। पाने के लिए कुछ करना पड़ता है। यहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं है।

 

प्रश्न था-         पर कुछ तो है, जो हमारे पास नहीं है।

            क्या है, पता करंे।

            आपके पास से उठने का मन नहीं होता। मैं ही क्या जो भी आता है, जाता ही नहीं है। आप ही जाने को कह देते है। आपके पास एक ऐसी आभा है, चमक है, जो हमारे पास नहीं है, आप शांत है, आप अविचलित हैं।

 

            बस..... पर मैं भी आपकी ही तरह हूँ। हाँ, जो जितना साधारण होता चला जाता है, वह सब जगह उसी एक को देखता है। शास्त्र में कहा है, जो आपको पत्र में लिखा था।

 

            आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेषु हिते रतः।यही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है। सब में वह एक ही है, और उस एक में जो सबको देखता है, उसका योग-क्षेम प्रकृति स्वयं वरण कर लेती है, तब वह जो कहता है, वह जो करता है, वह जो चाहता है, वह स्वयं वहाँ नहीं होता प्रकृति ही उससे करवाती है। इसीलिए प्रकृति की शक्तियाँ उसे स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। कई बार तो यह पता भी नहीं होता, कौन आया था, क्यों आया था? पर जब उसके संकल्प स्वतः पूरे हो जाते हैं, तब प्रकृति की महान शक्ति का पता लगता है। क्योंकि यहाँ अपनी कोई चाह नहीं है। यह जो खालीपन है, पात्र खाली तो है, बाहर की दुकान तो उठ गई है, पर भीतर वह स्वयं अभिव्यत होने लगता है।...... शास्त्र कहते हैं, संतों ने इसे कई तरह से कहा है, पर सही कहा, उत्तर..... नेति, नेति ही है।

 

प्रश्न था-         इसके लिए क्या करंे?“

 

            फिर वही बात, उत्तर खुद तलाश करो, प्रश्न पूछना बंद करो। जो प्रश्न पूछता है, उसे देखो, वह सिर्फ अपने अहंकार की तृप्ति के लिए सवाल पूछता है कि वह ज्ञानी है। जब उत्तर स्वयं आने लग जाएँ, तब चुप हो जाना। तब उस खालीपन में प्रश्न अपने आप गिर जाते हैं। पतझड़ में पत्ते वृक्ष पर ठहर नहीं सकते।

 

            अनावश्यक बोझे को प्रकृति स्वयं हटा देती है। उसका नियंत्रण, उसका शासन सर्वोपरि है। उसके नियमों के प्रतिकूल जाना कठिन है। उसकी समझ ही वास्तविक ज्ञान है। सारा ब्रह्माण्ड एक नियम के अधीन है। व्यक्ति, समाज, राजा,राष्ट्र कोई इस नियम से बाहर नहीं है।

 

            छोटी सी बात है, अधिक से अधिक वर्तमान में रहने का अभ्यास हो।

            जागरूक रहना, अवेयर रहना ही साधन है। जागरूकता या अवेयरनेस ही साध्य है। जहाँ अवेयरनेस है, वहाँ स्मृति नहीं है। तब वहाँ मात्र वर्तमान है। वहाँ स्मृति  से भविष्य का प्रक्षेपण भी नहीं है। भले ही अभी एक विचार और दूसरेे विचार के बीच का गेप या अंतराल अनुभव में आए, पर धीरे-धीरे वह गेप बड़ा होता जाता है। यहाँ मन तो निष्क्रिय होगा, पर शरीर गतिशील रहेगा। मन जब अंतर्मुखी होता है, तभी पता लगता है, जीवन का उद्देश्य क्या है? इस महारास में अपनी भूमिका का  भी पता लगता है।

 

प्रश्न-  पर आपने अपने आपको इतना छिपाकर क्यों रखा है?“

 

            कहाँ छिपाया है, मेरी कुटिया का दरवाजा हमेशा खुला रहता है। वहाँ ताला ही नहीं है। एक बार डकैत आए थे। पास के गाँव में डाका डालने जा रहे थे। रात का एक बजा होगा। प्यास लगी होगी। तब बाहर लालटेन को कम रोशनी कर रख के रख देता था।

 

            मुझे लगा बाहर कोई है।

            पूछा-कौन है?

            कोई बोला, पानी पीना है।

            मैंने कहा, बाहर बाल्टी रखी है, लालटेन तेज करो, कुएं से भर लो। थोड़ी देर बाद किसी ने किवाड़ धकेला। दो-तीन लोग अन्दर गए। उनके पास हथियार थे।

 

            मैं तख्त पर बैठ गया। पूछा, ”कहाँ से रहे हो?“

            तभी कोई बोला, तुम्हें डर नहीं है, हम डकैत हैं।

            अरे! मैं हँसा, मैंने कहा, मैं भी हूँ।

            वे चाैंके। वे नीचे बैठ गए। बातंे होने लगीं। बाते होते-होते सुब्ह के चार बज गए होंगे।

 

            वे बोले, ”चलें आपकी बातों में हम उलझ गए। फिर देखा जाएगा।

            मैं हँसा, मैंने कहा, ”मैंने सही कहा था, न।

 

            भय किससे ? भय वहीं होता है, जहाँ आप समाज में विशिष्ट होना चाहते है, आपकी विशिष्टता खो जाए, आप भयभीत हो जाते हैं। उन्होंने पूछा था, ”आपकी सम्पत्ति क्या है?“ मैंने कहा, ”एक थैला, जिसमें दाढ़ी का सामान, चश्मा एक आधी धोती छोटा कुर्ता है, बस, ले जाओ।

           

            आप देखते है, जब भी कहीं जाना होता है, थैला उठाया और चल दिया। मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखता। यहाँ पर था, जिस भी काश्तकार ने खाना लाकर दे दिया, खा लिया। एक रोटी, कांदा(प्याज) से पेट भर गया। बस कभी किसी की जाति नहीं पूछी। इसीलिए मैं संतों की बिरादरी में नहीं रहा। वे कहते थे, गृहस्थों में क्यों ठहरता हूँ? मैं कहता, उनको मेरी अधिक जरुरत है। वो कहते,पैसा क्यों नहीं पास रखते? मैं कहता, प्रकृति का खजाना रखा है, जितनी जरुरत होगी, जाएगा।

 

            सवाल आपके विश्वास का है, जो जाग्रत है, उसके शब्द भी वहीं से आते हैं। वही तो इस देह का संचालन करता है। यह बात बुद्धि से समझने और समझाने की नहीं हैं। चिन्तन की है। समझा है, तो प्रयोग करो। जब उस खालीपन में रहना शुरु होता है, वहाँ विराट स्वयं अभिव्यक्त हो जाता है। तब जो कहा जाता है, जैसे रहा जाता है, जो किया जाता है, वह सहज, सरल, स्वाभाविक हो जाता है। वहाँ सौन्दर्य स्वतः खिलता है। प्रकृति की खुशबू, उसका सौन्दर्य उसका अपना है। वहाँ बाहर से सामान लाकर चेहरा चमकाने की जरुरत  नहीं होती है।

 

            जो इस रास्ते पर है, सही तरह से है, वह फिर समाज में कुछ होने की इच्छा खो देता है। समाज उसे समझ पाता है, उसे समाज को समझाने की जरुरत होती है। पर उसके पास असंतोष नहीं है, खिन्नाता नहीं है। वह प्रसन्न है। वह जानता है मठ, सम्प्रदाय, शिष्य, जमात, यह सब उस झूठे, अहंकार के ही धक्के है, जो उसे विशिष्ट होने के लिए प्रेरित कर रहे है।

 

            वह मुक्त है, पर प्रकृति के बंधन में बंधा है। प्रकृति के नियमों के विरुद्ध वह नहीं जाता। कभी चला जाता भी है, पर जानता है, इसका भोग उसे भोगना नहीं पड़ेगा। यह कायर नहींहोता। हाँ, प्रकृति जो कार्य उससे करवाना चाहती है, वह वहाँ उसे पूरी शक्ति से करता है। दुनिया उसे महान मानती है या बंकम, यह  शब्द डॉ. बसावड़ा ने चोयल से कहाथा, , ”मैं  किसी बंकम से मिलना नहीं चाहता। पर जब मिलने आए, तो जाने का नाम नहीं लिया। फिर अमरीका से गुरुकुल भी आते रहे। मैं पूछता था, आप तो इस बंकम से मिलना नहीं चाहते थे।...... फिर उन्होंने कुछ लोगों को अमरीका से यहाँ कुछ जानने  के लिए भी भेजा।

                                    12 एक सही कदम   

           

            आपके पास होते है, तब विचार मानो रुक जाते हैं। एक नई दुनिया दिखाई पड़ती है। बाद में सब वैसा का वैसा ही हो जाता है। क्यों?“

            इसका उत्तर आप ही पता करंे।

           

            यहाँ तो दुकान खाली है, कोई विचार उठते हीं नहीं  हैं। खाली तो है। पर मन जब मैंने कहा, अंतर्मन में विलीन हो जाता है। वहाँ एक अनवरत उर्जा का प्रवाह बना रहता है। इसीलिए मैं घंटो यहाँ चुप बैठा रहता हूँ। बोलने का मन तब होता है, जब विचार हो। सामने कोई है, इसका आभास भी नहीं  होता है। वह दो-चार बार कुछ कहता है, तब    होता है। फिर भी वह कौन है, यह पहचान देर से बनती है। आपके पास विचारों का संग्रह है, खर्च होता ही नहीं  है। रोजाना बढ़ता जा रहा है। इसीलिए जब यहाँ आते है, यहाँ मन की गति कम होने लग जाती है। आप लोगों को अच्छा लगता है। बाद में फिर वही संग्रह बनना और जमा होना शुरु हो जाता है।

           

            उस दिन आपसे कहा था, जब भी कोई आए। आते ही उसके बारे में कोई पूर्वाग्रह रखकर बात करंे। मन को आदर मिलने से वह चुप होने लगता है। इसी प्रकार किसी को भी गलत आश्वासन नहीं दें। वाक पर नियन्त्रण सबसे पहले जरुरी है।

           

प्रश्न था-         आप प्रार्थना पर जोर नहीं देते।

 

            प्रार्थना किससे, किसके लिए, यह भी माँगने की एक कला है। प्रकृति के द्वारा जो भी प्राप्त होना है, वह अपने आप होगा। शरीर है, पुरुषार्थ है, काम तो करना ही पडे़गा। मैंने कभी किसी को आलसी बनने को नहीं कहा।

           

            काम तो जो प्रकृति ने साैंपा है, करना ही होगा। पर काम करते समय मन शांत रहे, जिसे अवेयरनेस कहा जाता है, वह क्या है? शरीर तो हमेशा वर्तमान में ही रहता है, पर मन नहीं , इधर से उधर जाता है। एक पल भी ठहर नहीं पाता। इसी मन को वर्तमान में लाना ही ध्यान है, यही जागरुकता है, यही अवेयरनेस है।

 

            पर यह तो सर्वाधिक कठिन है।

            कठिन तो है, पर सम्भव है। जब मैंने किया, मुझे तो बहुत कठिनाईयाँ थीं। बचपन में पिता नहीं रहे। बड़ा हुआ तो माँ चली गई। परवरिश भी नाना के यहाँ हुई। वहाँ भी गलत व्यवहार था, सन्यास लिया। पर भिक्षा   कभी नहीं मांगी। फिर जब मैं कर सकता हूँ, तब आप क्यों नहीं। आपको तो बहुत सुविधाएं हैं, पर मन अशांत है। संतुष्ट नहीं होता है, जिम्मेदारियाँ कम होती ही नहीं हैं, आप खुद बढ़ाए चले जाते हैं। हम एक साथ सब नहीं छोड़ सकते हैं, क्योंकि संग्रह हमारी आदतों के रुप में जमा होता है। आदतों के परिवर्तन से ही स्वभाव में परिवर्तन आता है। आदतंे और हम एकरुप हो गए हैं।

 

            जागरुकता क्या है, वहाँ ध्यान है। वहाँ मन अनुपस्थित है। मन ही नहीं है। यह भी एक प्रकार की मृत्यु है। हम शरीर को सब कुछ मान बैठे हैं। जड़ तो मन है। बीमारियाँ पहले मन में घर बनाती हैं, शरीर तो मन का अनुगामी है। वह वह उसकी आज्ञा मानकर वैसा ही करना शुरु कर देता है।

 

            शास्त्र कहता है-‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’, वह तुरन्त हो जाता है। जिसे छोड़ना चाहते हो, उसे पूरा छोड़ो, तुरन्त छोड़ो। लोग आते है। कहते है, एक साल बाद से प्रवचन देना बंद कर दूंगा। इससे कोई लाभ नहीं।

 

            पूछा, ”आज से क्यों नहीं?“

            बोले, साल भर के कार्यक्रम तो बन चुके हैं।यह आधे गर्म, कुनकुने पानी  की कहानी है। दिल कहता है, बेकार की बात है। मन कहता है, यश मिलता है। यही उधेड़ बुन चला रखी है। तुम जोे भी चाहते हो, उसे अपने हृदय से पूछो। हृदय जो कहता है, वहाँ मस्तिष्क का कार्य अधिक नहीं होता है।

 

            मस्तिष्क मन नहीं है। मन का वहाँ अस्थाई निवास है और हृदय  में (यहाँ बायलोजिकल हार्ट नही ंहै) उसकी सत्ता है, उसका भाव है, वहाँ गहनता है, वहाँ मस्तिष्क का कोई दबाव नहीं है। मस्तिष्क की पूंजी  विचार है।विचार की ढृढ़ता या शुद्धता तर्क है। जितना बड़ा तार्किक होगा, वहाँ उतना ही उलझाव होगा। बुद्धि निश्चयात्मक हो ही नहीं सकती है।

 

            क्या किया जाए

            कुछ नहीं, ....रहा जाए। जैसे संगीतकार के साथ जो साजिंदे बैठते हैं, उनके वाद्य तो अलग-अलग होते है, पर वे उसके इशारे पर एक धुन के साथ, एक लय के  साथ बज उठते है, तब वहाँ संगीत पैदा होता है। यह शरीर भी उसी तरह कई प्रकार के वाद्य यंत्रों का घर है। ध्यान ही वह विधि है, जहाँ सारे यंत्र एक लय में बज उठते है। एक लय,एक प्रकाश  हमारे भीतर जन्मता है, यहाँ भटकाव नहीं होता। उस संगीतकार को हम पाना तो चाहते है, पर विश्वास नहीं है। मन उसके साथ पहचान बनने नहीं देता, तब क्योंकि उसी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, वह यह नहीं चाहता। हमारा केन्द्र ्रमस्तिष्क से हृदय तक जाए, यही करना है। यह संभव हो पाता है, निरन्तर वर्तमान में रहने से मन और प्राण की युति स्वाभाविक हो जाती है, यही सार है।

 

            उस दिन किसी ने कहा था, ”यहाँ किसी प्रकार का अनुशासन नहीं  है। एक प्रकार की अराजकता भी है।

           

            यहाँ कोई बंधन नहीं है। नियम जो सौपे जाते हैं, वे बनावटी होते हैं, फिर नियम तोड़े जाते हैं। मैं पहले स्वेटर भी नहीं पहनता था। जब आयु बढ़ी तब लोगों ने कहा पहना। एक चादर के अलावा कोई वस्त्र नहीं रखा। भोजन एक बार करता था, ग्यारह बजे। समय गया, तब भूख है, इसका पता भी नहीं रहा। क्यों यहाँ तो तब कोई घड़ी भी नहीं थी। प्रकृति के साथ जब एकरुपता होती है, तब बायलोजिकल वाच अपनेे आप नियंत्रण संभाल लेती है। गाँव वाले आते है, वे घूम-फिरकर सो जाते है। कहते हैं, नींद अच्छी आई। आप चाहते है, वे नियम में रहे, आध्यात्मिक सवाल पूछंे। उन्हें इससे क्या मतलब? उनके लिए पानी कैसा बरसेगा? यह जानना जरुरी है।

 

            मैं आपके पिता के देहावसान पर आया था। आप सकुचा रहे थे। मैंने कहा, क्या भोजन नहीं बनेगा? कैसा नियम? नियम हमने ही बनाए हैं। क्या किसी की मृत्यु पर सब अपवित्र हो जाता है। यह सब ढाँचे हमने बनाए हैं। जितना पवित्र जन्म होता है, उतनी ही मृत्यु भी है। वहाँ भय या अपवित्रता कैसी? यहाँ गाँव वाले भोजन लाते थे। कई बार तो कांदा (प्याज) और रुखी रोटी भी लाते, वही खा ली। यह सब जाति-पाति के बखेड़े हमने बनाए है।मुख्य बात है, आहार जो लाया है, उसकी भावना कैसी है? और हमारे मन की अवस्था क्या है? यही नियमन है। नियम प्रकृति ने सौपा है, उसके साथ रहना ही निर्देश की पालना है। जहाँ ज्यादा नियम, कायदे होते हैं, वहाँ जड़ता जाती है। पानी सड़ने लगता है। इसीलिए मेरी कुटिया का दरवाजा सबके लिए खुला रहता है।

           

            भय ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है। भय का विरोधी अभय है। निर्भयता में दूसरे का सहारा होता है। पर जहाँ हृदय  हैं, वहाँ प्रेम  है। वहाँ भय नहीं रहता। भय का जन्म मस्तिष्क में होता है। वहीं वह फलताहै,फूलताहै।

           

                                                13  अन्तिम आज्ञा

           

प्रश्न था-”वह है ,यह कहना कठिन है, बस किताबी सूचनाएं है, वह नहीं है, यह पता नहीं, वर्षो  तक आपसे सवाल पूछते रहे हैं?“ गलती हमारी ही थी।

 

स्वामीजी कह रहे थे,-            पर किसी उत्तर से सहमत नहीं हुए। सहमत हो जाते तो फिर प्रश्न पूछना ही बंद हो जाता। मैंने कितनी बार कहा है-प्रश्न मत पूछो, उत्तर सोचो। मैं तो कहीं नहीं गया। खोज जारी रही। यह नहीं कहता, वह गलत था। आप जब मिले, मैं गुरुकुल छोड़ आया था। सब कुछ सरकार को सौंप दिया था। तभी आप मिले। मैं बकानी में सन पचास के बाद गया था। लगभग बाईस साल यहाँ रहा। तब आयु भी साठ के ऊपर हो गई थी।यह रिटायरमेंट की आयु होती है। इतने वर्षो में बहुत लोग आए, पर सबके सवाल उनकी गृहस्थी के थे। मोहन जोशी जो बाद में विश्व हिन्दू परिषद के अधिकारी बने,वे यहाँ पढ़ाते थे। पर  इस बारे में उनसे   कोई संवाद नहीं हुआ। क्यों? यह जो है, शायद इसीलिए गोपनीय रखा है। कारण था,   किसी की  कोई रुचि नहीं है। नहीं जिज्ञासा है। मैं चुप ही रहा।

           

जितना आवश्यक हो, उतना बोलो, उससे कम सोचो, विचारों के कम होते ही विकार गिर जाते हैं। संकल्प तभी बनता है। हमारी सारी साधना पद्धतियाँ कर्मकाण्ड में पड़ गई हैं। बाहरी जगत में भटकाती हैं। बहुत कम लोग हैं, जो इस तरफ आते हैं। जो आते हैं, सवाल पूछते हैं, ग्रन्थ पढ़ते हैं। बड़ी-बड़ी किताबंे लिख देते हैं, प्रवचन देते हैं, पर खुद भीतर-भीतर पोलेे रहते हैं। सारा माल उधार का है।

 

            जब भीतर से सवाल गिर जाएँ, उत्तर आना शुरु हो जाएँ, यहीं से शुरुआत होती है। सवाल मस्तिष्क पूछता है, उत्तर हमेशा हृदय से आता है। पतंजलि ने शब्द दिया है, समाधि। समाधि पत्थर हो जाना नहीं। जड़ हो जाना नहीं है। यहाँ समाधान होता है। समाधान हमेशा हृदय देता है। 

 

आप तब सवाल पूछते थे।तख्त के नीचे टेप रख देते थे।क्यों? मैंने मना भी किया था। जो कहा जा रहा है, उसे सुनो। पर आपका ध्यान सुनने पर नहीं था। दूसरों को सुनाने पर था। इतना समय इसीलिए चला गया। वह जाना भी था। जब तक भीतर का संग्रह ठसा- ठस बना रहता है, नई चीज को आने के लिए जगह नहीं होती है। हम पुराना संग्रह चाहे बहिर्जगत में हो या अन्तर्जगत में निकालना नहीं चाहते। हमारे घर भी सामान से ठसा ठस भरे रहते है। वही स्थिति हमारे मन की है। हमारे पास जन्म से लेकर आज तक की सारी बातें जमा है। कोई व्यक्ति के सामने आया ही नहीं कि भीतर से उसके बारे में  सारी सूचनाएं सतह पर जाती हैं। हम उसे नहीं, उन बातों के जरिए, उसे देखते हैं।

 

            सुनना भी एक साधना है, इसीलिए वेदांत में कहा जाता है।सुनो, श्रवण, फिर कहा है मनन। जब पूरी तरह से कोई बात सुनी जाती है, तब मनन होना स्वाभाविक होता है। पर हम सुनते ही कहाँ है? मैं जब तक  एक सवाल का उत्तर दे पाता था, आप तत्काल दूसरा सवाल पूछ लेते थे। मैं यही तो कहता था। मुझे अपनी बात तो पूरी कर लेने दो।

 

            क्यों मन बहुत चालाक है। वह कभी भी यह मानने को तैयार नहीं होता है कि जो कहा जा रहा है, वह सही भी है।

 

            आपको याद है, यहाँ चोयल, मेहरा आते थे। वे कृष्णमूर्ति के अनुयायी थे। वे जब भी भारत आते, ये उनके लैक्चर सुनने जाते। फिर मुझसे मिलने आते। वे मुझसे बात कर, यह जानने का प्रयास करते थे कि मेरे कितने विचार उनसे मिलते हैं।

 

            वे बस एक प्रकार का कन्फर्मेशन चाहते थे कि उनके गुरु महान हैं। लोगों की आदत है , वे बड़ेे लोगो के नाम  किताबों से दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं।

 

            आपने कहा है,  कुछ भी नहीं जानना है।

            तो चुप रहो, और जानते हो तो भी  चुप रहो। नहीं जाना है तो उसके बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है। जो तुम कहना चाह रहे हो, सबको पता है। बस तुम्हें अच्छी तरह से कहना आता है, बस वाक् चातुर्य है। जब तक  जो तुमने जाना है, तुम्हारा वह शब्द बने, खुद का अनुभव हो, चुप रहो। मौन में ही वह बोलता है, तब उनको सुनो। उस दिन आपने टेप लगाया था। मीरा बाई का भजन था।

 

            सुनि मैंने हरि आवन की आवाज

           

            तब तुम्हें उसकी आवाज सुनाई देगी। जब तक पता नहीं हो, चुप रहोे। पूरा ध्यान सुनने पर लगा दो। बहुत पहले नाद के बारे में कहा था। नाद यह कान नहीं सुनते। अंतःइन्द्रिय सुनती है। फिर यह आवाज जहाँ से उठती है, उसका पता लगता है। लहरों से सागर का पता लगता है, पर ध्वनियों के साथ, खोजी सागर तक  पहुँच जाता है।

 

            शास्त्र कहता है

            चरैवेतिः,चरैवेतिः।

            रुकना नहीं बस चलते रहो।

            और तब जानोगे, प्रकृति सबकी कामना पूरी करती है, यह रहस्य है। जो मांगता है, उसे मिलता है, पर जो नहीं माँगता, उसे ज्यादा मिलता है। इसीलिए माँगना बुरी बात है। निरन्तर प्रयत्नशील रहो, पुरुषार्थ मत छोड़ना। फिर जो होना है, होगा। पर पहले चुप रहना सीखो।

 

            जब आप मिले,आपने पूछा, तब स्वतः प्रेरणा हुई। कहा जाए, नहीं तो चुप रहा। सुनने वाला जब आता है, तभी कहा जाता है। मैंने यह नहीं कहा। सवाल पूछना व्यर्थ था। पर पूछने के साथ ही उत्तर पाने की भी कोशिश स्वयं करनी चाहिए। तब सवाल पूछने वाला ही नहीं रहता है। 

 

            आपको उस पंडित की कहानी सुनाई थी, जो राजा के पास भागवत की कथा सुनाने गया था। राजा ने कहा, , अभी आपने भागवत पूरी नही पढ़ी है। एक बार और पढं़े। उसे बुरा लगा। वह महीने भर कमरे में कैद रहा। फिर राजा के पास गया। राजा ने कहा, अभी पंडितजी कुछ कमी है।

 

वह सब कुछ छोड़कर जंगल में भागवत को लेकर चला गया। महिने बीत गए, वह नहीं आया। राजा ने पता लगवाया, पता लगा, वह तो जंगल में है। राजा उन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उनके पास पहुँचा। पंडित जी कुएँ की पाल पर बैठे थे, शांत।

            राजा ने प्रणाम किया।

            कौन?’

            मैं राजा हूँ, भागवत सुनने आया हूँ।

            क्या, कैसी भागवत?’ पंडित जी मौन थे।

           

            जो जानता है, चुप हो जाता है, जब तक नहीं जाना गया  है, चुप रहना ही बेहतर है।

मैं यहाँ कुटिया में था। कई बार तो पूरा दिन निकल जाता था। मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाता था। कई बारवीरमसुबह का काम कर चला जाता था। ग्यारह बजे बकानी से खाना आजाता था। फिर यहाँ कोई नहीं रहता था। तब टेलिफोन था, लाइट। पर मैं दिन भर कुटिया से बाहर कदम नहीं रखता था।

 

अब आपके सवाल  तो गिर गए है, पर भीतर भय है। वर्षो आप साथ रहे। इतना कोई नहीं, यह प्रारब्ध है। आपने ही कहा था, ”मैं ही समझ नहीं पाया हूँ, इतना आपके साथ क्यों रहा?“ इस चर्चा में पड़ना बेकार है। साथ रहे, यही महत्वपूर्ण है। कहा जाता है, आनन्द जो भाई था, गौतम बुद्ध के साथ रहा। गौतम जो शिष्य था, महावीर के साथ रहा। जो लिखा गया है, वह बहुत कुछ इनका ही है। साथ तो यही थे। पर जो साथ रहता है, वह एक बात चूक जाता है। वह गुरु की महानता देखता है, तो छोटापन भी देखता है। वह पाता है कि उसकी अपेक्षा पर गुरु खरा कभी उतरता है, कभी नहीं। उसके भीतर जो प्रतिमा है, वह बनती है, टूटती है। मैं जब बच्चा था, इंजीनियर साहब से प्रभावित था। उनसे ही एकांत में सवाल पूछा करता था। वे थियोसोफिस्ट  थे।       

 

उनके बारे में पहले कहा है। एक बार में उनके कमरे में गया। वे किसी के साथ बैठे शराब पी रहे थे, मैं चौंक गया। मैं तुरन्त कमरे से बाहर गया। वे मेरे आदर्श थे। उनके बारे में बहुत सारी बाते सुना करता था, पर मेरा उन पर ही  विश्वास था।

 

            मुझे जाता देखकर वे चौकें। फिर एक दिन मुझे समुद्र के किनारे ले गए। वहाँ वे समुद्र का पानी पी रहे थे। मैं चौक गया। वे बोले, ”क्या समझे?“ उनकी किसी वस्तु में आसक्ति नहीं थी।

 

हम अपनी छोटी बुद्धि से, जो सामान्यता हम में है, हम हमेशा दूसरे पर सौप देते है और संतुष्ट हो जाते है, पर जो प्रबुद्ध है, वहसियाराम  मय सब जग जानीमानता है। इतना सा ही भेद है। जब तक बुद्ध थे। आनंद  बस सूचनाएँ संग्रहित करता रहा। पर बुद्ध के जाते ही, उसके सवाल भी गिर गए थे। तब अचानक उसे लगाा, बुद्ध उससे क्या कह रहे थे।

 

           

उन्होंने अचानक पूछा थातुम टेप क्यों कर रहे थे?“

उत्तर था-       जो जाना गया है, वह  महत्वपूर्ण है, सुरक्षित रखा जाए , सबको बताया जाए?’

           

स्वामीजी कह रहे थे-   तुमने कहा था, आपके बारे में लोग नहीं जानते है।, जान जाएं? पर कभी सोचा था, यह भी मन ही है। मन में लोभ है। लोभ पैसे का ही नहीं  होता है। प्रशंसा पाने का भी लोभ होता है। लोग विद्वान मानंे, भेंट चढ़ाएँ। यहाँ कुटिया में पचास साल के आस पास रहा। कभी हाथ नहीं फैलाया। जो आया, वापिस समाज को सौप दिया। कहीं बैंक में खाता है, एफ.डी़ है। लोगों ने समझाया, जब बुढ़ापा आयेगा, तब जरुरत होगी, उनकी अभी  तक तो  जरूत नहीं, पड़ी।

 

            उस दिन आपसे कहा था, आपके पास आना है, विशेष कार्यक्रम होगा, तब आऊँगा। चंद्रेश छोड़ने आई थी। आपने कहा था, कोटा रुक जाओ, पर मैं बकानी गया। जन्मोत्सव का उत्सव था। आपने कोटा चलने को कहा, मैंने कहा, चार बजे बताऊँगा। गया। आपसे यही कहा था, यह कार्य आपके लिए रखा था, किसी से कोई पैसा मत लेना।

 

  एक दुकान बाहर होती है, एक भीतर। जाने के पहले, दोनों दुकाने खाली कर देनी होती हैं।

यह लोभ ही मन है। अपने लालच को कम कर दो। मन अपने आप नियंत्रण में आने लगेगा। बाहर का आकर्षण कम होना चाहिए। काम तो करना ही होगा। व्यक्ति को अपना खर्चा, परिवार का खर्चा निकालना होगा। प्रकृति पुरुषार्थ के अनुसार देती है। पर लोभ बढ़ गया है।जरुरत से ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति है। मैंने पढ़ा था, एक संत जो सब कुछ त्याग आए, वस्त्र भी। उनके चातुर्मास पर कई करोेड़ रुपया खर्च हुआ। यह भी छिपा हुआ लोभ है।

 

            सब खाली करते जाओ। अपने भीतर के खालीपन को जानना ही सार है। इसे समझो। जब मृत्यु आकर हटा ले, तब भी जगत छूट जाता है। उससे बेहतर है, हम स्वयं भीतर से खाली होते जाएँ। लोग गलत सवाल करते हैं। बाहर का जगत तो वैसा ही रहेगा। वस्तु जगत का परित्याग नहीं होता है। हमारे भीतर जो जगत है, जो लोभ है, जो चिपकने की आदत है, वह कम होती चली जानी चाहिए। होता उल्टा है, बुढ़ापे में आसक्ति बढ़ती जाती है। यही अज्ञान है। याद रखना, जहाँ तक मन है, वहाँ तक अज्ञान है। जहाँ मन गिरा, वही ज्ञान जन्मता है। इसीलिए बोलने से पहले सोचना, विचारना, जिस शब्द का प्रयोग कर रहे हो, वह सही तो है।ज्ञान मार्ग या ज्ञान का मार्ग,..... ज्ञान का मार्गवर्तमान में रहता है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ समझने के लिए नो माइंड  है। मैंने समझाने के लिए उसे अंतर्मन कहा है। समझ गए हो तोजानो,“ पर भाषण देने के लिए शब्दों से खिलवाड़ मत करना।

 

प्रश्न था - ”आप... इस अवस्था को क्या कहेंगे,“ ़़़़़़़़........(.पूछा ही  नहीं जाता)

 

            क्या?    बूंद सागर में मिल रही है, बस। कलकोकाकोला’, मंगवाया था, क्यों? अब उसका स्वाद रहा है, गले के नीचे उतरता है। जाना, इतना बूढ़ा शरीर है। इन्द्रियाँ एक-एक कर जाने को होती हैं। आप कहते है कि मैं कभी अस्वस्थ नहीं रहा। पर यह पंच महाभूत का शरीर है। इसको जितना भी बचाओ,विनाश होगा। चेतना है, जीवन है, यह अबाध है, जो दिखता है, वह कभी नहीं भी दिखता है। जब वह शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त हो जाता है, हम उसे जीवन कह देते है। पर जब वह अभिव्यक्त नहीं होता है, तो क्या जीवन नहीं है? नहीं है तो आया कहाँ से? एक प्रवाह है,जो आने के पहले भी था, शरीर छोड़ने के बाद भी रहेगा।

 

अचानक फिर प्रश्न उठ गया  -”तो क्या, यह मुक्ति नहीं है?“

 

मुक्ति किससे, बंधन कौनसा? यहाँ भगवान को भी  हमने तो अवतरित होना माना है। यह अवतारवाद क्या है? शरीर का अपना नियम है, वह हमेशा बना नहीं रहेगा। प्रकृति ने जब जिसे जो कार्य सौपा है, उसे करना है। यह रंगमंच है। विराट का सीरियल चल रहा है, बस। उसे देखते रहो। जो काम सौपा है, वह अच्छा हो जाए, यही सफलता है, इससे अधिक नहीं। हम  अपना खेल तो बढ़िया खेलना चाहते हैं, पर दूसरे का खेल बिगड़ जाए, यह भी चाहते हैं। यही प्रकृति की निगाह में बड़ा अपराध है। इसीलिए यही हमारा धर्म रहे, हम अपना काम करते रहें, जिसे छूटना है, वह छूटता चला जायेगा। जब बूंद सागर में मिल जायेगी, तब बताने वाला कहाँ से आयेगा।

 

अचानक कह उठा-    यही तो मुक्ति है?“

 

            फिर गलत बात, बूंद सागर से अलग कहाँ है, और सागर बूंद से अलग कहाँ है, जो आभास बीच में बना रहता है, वही हट जाता है। दोनों अवस्थाएँ एक ही हैं। पर बुद्धि से समझने की चीज नहीं है। उसे अनुभव करो। सत्य कोई अवधारणा नहीं है, जिसे हम परिभाषित कर सकें। यही जीवन है, जो अबाध है, बस।

 

जन्म और मृत्यु के पहले भी कुछ , और बाद में भी है, यही चेतना है।  उसकी अभिव्यक्ति के प्रकार अलग-अलग हैं। प्रगाढ़ निद्रा में और मृत्यु में क्या भेद है। अष्ट्रावक्रजी नेराजा जनकको उसे स्वप्नवत बनाया है। ड्रीमिंग, बस। यही प्रतिभासित सत्य है। जो सिर्फ  भासता है।   दार्शनिक तरह-तरह से ही व्याख्या कर सकते है। वह इन सबसे परे है।

 

            यहाँ कोईचॉइस’,  नहीं है। जो कहा जाता है, वहाँ शांत सजगता है। भीतर कोई विचार ही नहीं है। आप भूल गए  हैं, पर आपने कहा था , मैं सरकारी नौकरी करता हूँ, चाहता हूँ, जब आपका अन्तिम समय हो, मैं आपके पास रहूँ, आप भूल  गए, मुझे याद आया। मैं गया। आपसे मना किया, मेरा इलाज मत कराओ, आप नहीं माने, लोग गए। चिकित्सक गए। शब्द है, ‘जैसी उसकी इच्छामैंने मना नहीं किया। बस रहना है। उस दिन चंद्रधरजी पूछ रहे थे, ”आप प्रकृति से शरीर स्वस्थ हो जाए, इसके लिए प्रार्थना नहीं कर सकते।वे बहुत बडे़ दार्शनिक है, पर उनकी बात सुनकर मुझे हँसी गई।

 

            दार्शनिक होकर मृत्यु से भय। जन्म और मृत्यु एक ही तो है, मात्र अभिव्यक्ति का प्रकार अलग-अलग है।  कैरोल अमरीका से आई थी। वह जाग्रत पुरुषों की भारत में खोज कर रही थी। शिकागो मेंबसावड़ा ने  मेरे बारे में बताया था, यहाँ चली आई। मैंने कहा, ”पहले तुम जाग्रत पुरुष की पहचान तो बताओ।

           

            वह बोली, आप हैं।

            मैंने कहा, मुझे क्या पता, उसने क्या लिखा, मुझे पता नहीं। अमरीका जाने के बाद उससे सम्पर्क नहीं हो पाया। बाद में बसावड़ा भी चले गए। खैर, जो जागरुक है, वहाँ कोई विचार नहीं है, कोई आदर्श भी नहीं है। जो जैसा है, वहाँ है। कहना कठिन हो जाता है। इस उम्र में बाहर के लोगों का दबाव पड़ता है। मैं शांत जड़वत हो जाता हूँ कि, सब उठकर चले जाएंगे। शरीर की व्याधि का मुझसे सम्बन्ध नहीं है। मुझे पता है, भोग है, पर जाने के पहले, दुकान खाली हो जाएगी, इतना कह सकता हूँ।

           

            इसीलिए रहना सीखो और सारे प्रपंच छोड़ देना। जब जब जिम्मेदारियाँ पूरी हो जाएं, नई मत ओढ़ना। जितना समझा है, उसे प्रयोग में लाओ।

 

            सही कहा है, जो नहीं जाना है, नहीं पता है, चुप रहो। विद्वान बनने की चाह, लोभ की परमावस्था है। धन कमाना अधिक बुरा नहीं है। वहाँ मन दिखाई पड़ता है। यहाँ मन छिपा हुआ है। मन ही लोभ है। चुप रहना सीखो। प्रशंसा का बोझा वाकचातुर्य में है। पर निन्दा में है। आत्म प्रशंसा में है। चुप रहो। जब जान लो तो और चुप हो जाना। उस गहरी चुप्पी में, उस मौन में ही तुम जब जाओगे,  तब वह है या नही, तब सवाल सारे गिर जाएंगे, क्योंकि उठाने वाला मन ही जब नहीं होगा, तब मात्र एक गूंज रहेगी, जो तुम्हारी खुद की होगी।

 

                                                14 मम् माया दुरत्या

 

            सवाल क्यों पूछते हो?

            क्या जिज्ञासा है, पूछते रहो, सवाल कभी खत्म होने वाला नहीं है। सवालों की जड़ तुम्हारे मन में है। हाँ जब इससे पार चले जाओगे। तब सवाल पीले पत्तों की तरह अपने आप छूट जाते हैं। सवालों के उत्तर नहीं मिलते, पर सवाल उठने ही बंद हो जाते हैं।

 

            कारण है, सवाल मन पूछता है। मन और मस्तिष्क का गठजोड़ ,आसानी   से नहीं टूटता है। जब तक एक भी सवाल बचा है, यह गठजोड़ तो रहेगा। मैंने पहले भी कहा था, यहाँ सौ टका देना होता है। शत-प्रतिशत तभी यह गठजोड़ टूटता है। मन-मस्तिष्क से नीचे खिसकता हुआ हृदय पर आता है। यहाँ समाधान है। जब उत्तर स्वयं अपने आप आने लगे, यह हृदय का खुलना है। यह  बायलोजिकल हार्ट नहीं है।

 

            यह अनुभूति है।

            दर्शन  शब्द बहुत अच्छा था। पर सार था। दृश्य दृष्टा और दर्शन की जब त्रिपुटी समाप्त हो जाती है। बस एक दृष्टा ही शेष रह जाता है। तब दर्शन सहायक होता है। दर्शन मात्र जानने की विधि ही नहीं है।

 

            मैंने पहले ही कहा था, मैं ध्यान नहीं सिखाता।

            रमण महर्षि के यहाँ मूक सत्संग था। जाओ, चुप बैठ जाओ। चुप हो जाना ही साधन है। चुप होते ही सवाल गिर जाते हैं। उनसे सम्बन्ध टूट जाता है। वहाँ सवाल पूछने से क्या मिलेगा? तुम वहाँ इसीलिए जाते हो कि तुम्हें जो पता है, उसकी पुष्टि हो जाए। वही उत्तर नहीं मिलता तो तुम निराश हो जाते हो। दुबारा आते ही नहीं। ग्रन्थों ने बहुत उलझा रखा है। तथाकथित जो गुरु हैं, वे भी यही काम करते हैं।

 

            जो वास्तविक गुरु है, वहाँ शब्द ही नहीं है। वहाँ मौन में ही समाधान हो जाता है। वास्तविक सम्बन्ध मौन में होता है। जो गुरु है, वह वहाँ स्वयं उपस्थित हो जाता है।

 

            मन ही लोभी है। मन विचार है और विचार ही विकार है। यह सीधी सी समझने की बात है।

            मन चाहता है, वह अधिक से अधिक संग्रह रखे। उसे अधिक से अधिक खूंटिया चाहिए। समझाने के लिए जो कहा गया, वह भी सीढ़ी बन जाती है। क्योंकि जहाँ खाली मन आया, वहाँ मन नहीं रहता है। मन तो गति है, उर्जा है, उसका नाश तो नहीं होगा। पर वह गति अंतर्मुखी होकर अंतर्मन में विलीन हो जाती है। पर मन यह नहीं चाहता।

 

            आपने घर छोड़ दिया। सन्यास ले लिया। वहाँ आश्रम बन गया। वहाँ सामान गया। सम्पत्ति बन गई। खूब किताबंे लिख दीं। खूब विचार इकट्ठेे कर लिए, यह क्या है? यही लोभ है। वस्तु लोभ नहीं है। पर उससे चिपकाव लोभ है। यह जाता नहीं है। यह मन का स्वभाव है। जितना भीतर खालीपन होता जाता है, उतना बाहर का संग्रह भी कम होने लगता हे। पर हम यह नहीं चाहते। बाहर की हर वस्तु, हर विचार की छाप हमारे भीतर इकट्ठी होती रहती है।

 

            आपने मुझसे पूछा था, आप को याद होगा, ”मुझ में क्या परिवर्तन आया है?“ तब मैंने कहा था, अभी तो संग्रह बहुत जमा है, ठसा-ठस। संग्रह कम होता है, निरन्तर वर्तमान में रहने के अभ्यास से। पर यह बात समझने में नहीं आती। बाहर का दबाव निरन्तर हिलाता रहता है। कभी सोचने का समय नहीं मिलता। बस आए, कुछ सवाल पूछ लिए और प्रसन्न हो गए। यही तो अब तक किया है।

 

            भीतर से खालीपन हो, यह आदत हो गई है। पेट की भूख तो शांत हो जाती है। पर मन की भूख नहीं होती है। शास्त्र कहता हैप्रजहाति यदा कामनिजहाँ सब कामनाओं का क्षरण हो जाता है। यह कामनाएं ही तो भीतर भरी रहती है। हम निरन्तर जो बाहर का संग्रह करते है, वह अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। वह तो यहीं रह जाता है, पर भीतर जो संग्रह जमा करते जा रहे हैं, उस पर निगाह रहे। वह कम हो। कहा जाता है, बीज भुन गया। फिर उसकी अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। होना यही है। निरन्तर यही अभ्यास होना है, पर यही नहीं होता है।

 

आपको दो संतों की कहानी सुनाई थी। जो सब छोड़कर हिमालय में कुटिया बना कर रह रहे थे। अपनी लंगोटी  सुखाने के लिए रस्सी ले आए थे।बांध दी। फिर रस्सी पर झगड़ा हो गया। दोनों का आधा-आधा हिस्सा था। मारपीट तक हो गई।

 

            वस्तु में मोह नहीं है, लोभ वस्तु में नहीं है। लोभ मन में है, यही जानना महत्वपूर्ण है।

            चन्द्रधर जी ने बहुत बड़ी किताब लिखी है। भंेट करने आए थे। अद्वैत वेदान्त बुद्ध दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन है। मैंन देखा वे बहुत बड़े विद्वान हैं। आते है। मैंने उनकी ओर ध्यान से देखा। उनकी आंखों में झांका। वे सकपका गए। मैंने कुछ नहीं कहा। पूछा आपने क्या जाना? वे बोले, जानना क्या? किताबों का सार है।

 

            सार है, जाना क्या जाता है। सूचनाएं ज्ञान नहीं होती हैं। यहाँ जो भी आता है, गले तक  भरा हुआ आता है। लगातार बोलता रहता है। जब उसके होठ बंद हो जाते है, तब उसकी ओर ध्यान जाता है। सम्बन्ध सुनने का भी टूट जाता है। वह समझता है, बहुत ज्ञान की बातें कर रहा है। आत्मा परमात्मा की चर्चा ज्ञान की बात है।अरे! ये तो किताबी सूचना है, तुम्हारा अपना अनुभव क्या है? वह चुप हो जाता है।

 

            अधिकांश के सवाल किताबों के सवाल हैं। मैं कहता हूँ, प्रयोग करो, अनुभव में ले आओ, वह तुम्हारा अपना होगा। मेरी बात भी मन मानो। प्रकृति ने दो पत्तियाँ कभी एक सी नहीं बनाईं। हमें किसी की भी नकल नहीं करनी चाहिए।

 

            ज्ञानशब्द का अर्थ बाहर की दुनिया की जरुरत नहीं है। ये सूचनाएं निरन्तर बदलती रहती हैं। एक आदमी बाहर से बहुत विद्वान हो सकता है, पर भीतर से उतना ही रीता, किताबी जानकारी ज्ञान नहीं है। कबीरदास  कहीं पढ़ने नहीं गए। पर उनका कथन अविश्वसनीय नहीं है।

 

            यह जो आज का व्यक्ति है, यह पहले की अपेक्षा अधिक जानकार है। इसके पास सूचनाओं का  विशाल भंडार है,पर  यह अपने आप से उतना ही दूर है। जब हम निरन्तर वर्तमान में रहने लगते है, तब क्या होता हे। भीतर का संग्रह या तो खतम हो जाता है या भुनेे बीज की तरह अपनी अंकुरण क्षमता खो देता है। तब जो खालीपन है, वह अनुभव में आता है, वहाँ वह निरन्तर अंतर्मन जो विराट से जुड़ा  हुआ है, वह अचानक उसे भर देता है,उसे अपने अस्तित्व का बोध होता है। वह जान जाता है, वह अकेला नहीं है। यह अनुभूति ही ज्ञान है।

            पर यहाँ तक मन नहीं आने देता है?“

             क्योंकि वह स्वयं खोना नहीं चाहता। हम में इतना साहस होता है, हम उसके पार छलांग लगालें। मन ही लोभ है, मन ही अहंकार है। इसकी कोई अलग मूर्ति थोड़ी होती है। यह विचार रुप है। तुम यहाँ आए हो, कितने वर्षो से मेरे साथ रहे। तुम किसके साथ रहे, मेरे विचारों के साथ या मेरे साथ। तुम हर बार उलझते रहे। मेरे विचार जो आज हैं, कल बदल जाएं। यहाँ सब परिवर्तनशील है, पर मैं जो हूँ , जिसे गीता मेंमामकहा है। उसके साथ रहना ही सत्संग है।

 

            पर तुम्हारा मन, बुद्धि हमेशा तुम्हें भी बाहर ढकेलती रही। कभी विश्वास तो कभी अविश्वास। मैं यही कह सकता हूँ, जब जिम्मेदारियाँ खत्म हो जायेगी, तब तुम्हें भी वह प्राप्त होगा, जो तुम चाहते हो। पाना जैसी चीज कोई नहीं है, पर जो अस्तित्व है, उसका अहसास होगा, यही जीवन का उद्देश्य है। यहाँ पाना और खोने जैसी चीज कोई नहीं है।

 

जब तक विचारों से जुड़ो़गे, सवाल पूछते रहोगे, अपने आपको विशेष मानते रहोगेे,  भटकाव ही होगा।जैसे सब हैं, वैसे ही हम हैं। सब मिट्टी के भांडे है, इससे अधिक  नहीं।  धन के अहंकार से भी अधिक, इन झूठी सूचनाओं के संग्रह का अहंकार होता है।

 

दो पात्रों में पानी भर दो, नली से जोड़ दो। दोनों पात्रों में जल की ऊंचाई  बराबर हो जाती है। जहाँ गुरु है, वहाँ बस रहना है। कोई तर्क नहीं हो, वहाँ सहज चेतना का प्रवाह बन जाता है, पर अहंकार यही नही होने देता। बु(िमता का अधिक होना भी हानिकारक होता है। जब यह विचार भी गिर जाता है, तब भीतर से स्वतः अपने होने का अहसास होता है। पर यह विचार नहीं है।

 

 हमेशा भाषा में अपने आपको व्यक्त करने की कोशिश मत करना। अहंकार फिर आकर दबोच लेगा।मैं हूँ ही नहीं’, यह सोच ज्योति की तरह बना रहे। शास्त्र ने बहुत तरह से समझाने का प्रयास किया था। पर उनकी भी कमजोरी है। अनुभव, शब्द से परे है। वहाँ तुम्हें ही अपना रास्ता तलाश करना है। वहाँ किसी की जरुरत नहीं होगी। शास्त्र, गुरु सब बाहर ही रह जाते है। उस यात्रा में तुम्हें अकेला जाना है।गुरु बस उसके भीतर इसमैं नहीं हूँयह बोध एक चिन्गाारी की तरह छोड़कर अलग हो जाता है। इसीलिए मैंने कहा था, मैंने किसी को शिष्य नहीं बनाया। हाँ, जो तुम मानते हो, उसके लिए स्वतंत्र हो, पर मुझे भी ढोना नहीं। मैं भी एक साधारण-सा इन्सान हूँ। जो मैंने जाना है, कुछ भी छिपाया नहीं है।

 

तब कहा था-   आपके पांव में तकलीफ है, घाव  है, आपको दर्द तो बहुत होगा?“

           

            हूँ ,(;हंसते है) पर  जब मैंने कहा आपकी तरह मैं भी हूँ, तो आपको अच्छा लगा होगा। दर्द तो होगा, होता है, पर मुझे  अनुभव नहीं होता। मैं अपने आपको वहाँ से हटा लेता हूँ। डाक्टर आते हैं , चीरफाड़ करते हैं, पर मुझे पता नहीं लगता। मैं एनस्थीटिया नहीं लेता। बंबई  में आंख का आपरेशन था, उनसे मना कर दिया था। पर वे नहीं माने इंजेक्शन लगा दिया। मुझे होश था। उसने सहायक से पूछा था, ‘ क्या इंजेक्शन नहीं दिया मैंने कहा, ”दिया था आप अपना काम करंे।शरीर का जो धर्म है, वह यथावत रहता है। पर विषय, इन्द्रियाँ और मन का सम्बन्ध टूट जाता है। इस अवस्था में जहाँ मन क्रियाशील नहीं है। वह रहेगा तो पर एक कोने में में पड़ा रहेगा। जरुरत होगी तो जुड़ेगा, यह बात समझ में आने वाली नहीं है। अनुभव करो। निरन्तर वर्तमान में रहने से यह सम्भव होता है। यहाँ किसी प्रकार की तो धारणा रहती है, नहीं विचारणा। मन ही समय है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ भूत है, भविष्य है। बस बूंद है,  जो सागर से मिली नहीं है, वह जानती भी है, जा रही है, यही अनुभव  रहता है।

 

अचानक प्रश्न उठ गया था,  क्या यहाँ आकर भी पतन हो जाता है?“

 

            हाँ, शास्त्र में भी बहुत कहानियाँ है, इस जगह आकर भी संभलना रहता है। कांस्टेन्ट अवेयरनेस, जागरूकता    वह निरन्तर बनी रहे। रमण महर्षि के अंतिम दिनों में उनकी माँ वहाँ आकर रहने लग गईं थी। उनकी मृत्यु हुई। रमण ने उनके लिए समाधि बनवाई थी। वहाँ भी पूजा उनके ही सामने होने लग गई थीं।

ओशो भी पहुँच गये थे। फिर हीरे के मुकुट लगाने लग गए। सब चलता है, यह अंतिम अवस्था बस एक छलांग है, बहुत पास है, पर  जरूरत यहाँ दुकान पूरी खाली करने की होती है। कुछ भी नहीं, मात्र अस्तित्व, वह भी मिट रहा है।

           

            बूंद जब समुद्र में मिल जायेगी, वहाँ क्या  अनुभव होगा,“ ......

            कौन किसको बताएगा?  पूछो मत, चुप रहो।

            तुम्हें एकलव्य   की कहानी सुनाई थी। कहानी सबने सुनी है, पर अर्थ समझा नहीं है। जब गुरु के साथ एक लय बन जाती है, एक रसता,  तब उसी की  ही अनुगूंज सुनाई देती है। वही उसके भीतर प्रकट हो जाता है। पूरा अस्तित्व उसमें प्रकट हो जाता है। भीतर सब खाली कर देना। यही अभ्यास रहे। कुछ भी नहीं रहे। सुख-दुःख सब आएंगे। हिलना मत। डगमगाना मत। मुसीबतें आएंगी। छाती खोलकर सामना करना। हमें पोला नहीं होना है। प्रकृति पर भरोसा पूरा रहे। जितना भीतर खाली होता जाता है। भूत भविष्य, वहाँ बस वाह्यमन सिमटना चला जाएगा। फिर अंतर्मन ही सारे कार्य व्यवहार संभाल लेगा। वही विवेक है। वही गुरु है। सब जगह वही है, वही होगा, मौन में वही बोलेगा। कार्य-व्यवहार सभी सही होते वले जाएंगे।

 

            मेरे जाने के बाद मेरी बाते समझ में आयेगी। अभी व्यवहार में बहुत से  काम हैं, घर है, परिवार है, नौकरी है।सब जगह रहो,  बाहर की बात बाहर रहे, भीतर नहीं ले जाना है। रात को बिस्तर पर जाएँ। पर बाहर का सब छूट जाए। वर्तमान में रहने से पहली यही बात मिलती है। जीवन और जगत सें कटकर या काटकर कही नहीं जाना है। दूसरे क्या करते हैं, हमंे इससे कोई मतलब नहीं। हमें जो काम मिला है, उसे पूरा करना है। मन अधिक से अधिक वहीं रहे।

 

स्वाभाविक रुप से मन की गति कम होती है। उसकी शक्ति बढ़ जाती हैं। हमें रहने की कला आनी चाहिए। बाहर जो घट रहा है, वह हमारे संकल्पों से कम होने वाला नहीं है। अरबों मनुष्यों के संकल्प हैं। जो घट रहा है, जैसा घट रहा है, वहाँ रहना है। मैंने बहुत पहले कहा था, शराब, जुआ, यह कभी बंद नहीं होगा। यह प्रकृति चाहती है। हजारों सालों से इन्हें बंद करने का प्रयास हो रहा है। जितना समाज आगे बड़ रहा है, ये प्रवृत्तियाँ भी उतनी तेजी से आगे बढ़ी हैं। समझना कठिन है। जिसने हमको बनाया है , उसी ने उनको भी भेजा है।  अनावश्यक इस पचड़े में मत पड़ना। यहाँ कुछ अच्छा है, बुरा। चीजों को जैसे घटना है, वह घटेगीं पर हमें प्रभावित नहीं होना है। कहने का मतलब है अतीत में  झांकना है, भविष्य में कल्पना  करना है। दोनों ही मन के खेल है। यहाँ कुछ भी अच्छा है, बुरा है। नैतिकता हमारे ऐच्छिक कर्मो से आती है। जो माँस खाते है, वे माँस को अपने भगवान को अर्पित करते हैं, शाकाहारी फल-दूध अर्पित करते है, ये सब उनकी परम्पराएं हैं।

 

            हमें इस विवाद में नहीं पड़ना है। जो जहाँ जैसा है, वहाँ वह है। हम कौन बदलने वाले होते हैं। हाँ, हमारा ही यह कर्त्तव्य हो तो उत्कृष्टता के साथ कर्त्तव्य निभाना चाहिए। भागवत में कहानी है , उस मांस बेचने वाले को भी वही स्थिति प्राप्त होगई थी , जो उस संत को दुर्लभ थी। जो सवाल पूछने उस के पास गया था।

            मैंने आपको बहुत पहले कंवरलाल की लड़की की शादी की घटना बताई। उसकी मदद के लिए धन जमा किया। प्रकृति ने मना किया। कुतिया काट लेगी पता लगा। उसने काट भी लिया। धन उस तक पहुँच भी गया। पर उसके काम नहीं आया। कोई ले गया। प्रकृति के खेल में हम सहयोगी तो बन सकते है, पर उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य नहीं करना है, यह ध्यान रहे।

 

            हम जब अंतर्मुखी बनेंगे , भीतर से अंतः प्रेरणा अपने आप बतायेगी, क्या करना है, क्या नहीं  करना है। मैंने दीनदयाल जी को बताया था। मुझसे भी एक कार्य हो गया, जो नहीं होना था। मेरे मुँह से निकल गया, हो जाएगा। काम तो हो गया, पर प्रकृति के विरुद्ध था, उसका परिणाम भी मिला। यह अटूट सिद्धान्त है, याद रखना। शक्ति जरा सी आते ही बाहर का प्रलोभन बहुत जोर से आता है। मैंने भोग लिया, मेरा योग था। हाँ, अब दुकान खाली है। कुछ नहीं बचा है।

 

            एक बात हमेशा याद रहे, जो अंतःप्रेरणा उठे, वह कार्य करते रहना है। पर कोई अपना चयन नहीं हो, अपनी निजी मान्यता नहीं हो। जहाँ कामना है, वही मन है। मन का जाला, मकड़ी  के जाले से  भी महीन है। इससे निकलना कठिन है। शास्त्र ने इसी का माया कहा है, ‘मन माया दुरत्या, यह मेरी माया हैमेरी, भगवान कृष्ण की नहीं, तुम्हारी है।  निरन्तर वर्तमान में रहने से ही इससे पार जाया जा सकता है। वर्तमान में क्या होगा, क्रिया होगी, पर विचारणा का दबाव नहीं होगा। लोग पूछते हैं, क्या मन नहीं होगा। अरे! मन तो भूत और भविष्य में रहता है। वहाँ जो है, बहुत शक्तिशाली है, पता करो, वहाँ सजगता तो होगी। पर वहाँ मन का दबाव नहीं हैं, वहाँ स्वतः ही कामना नहीं है। यह कोई निठल्ले की अवस्था नहीं है। आज भी इस नब्बे साल की उम्र में शरीर थक गया है, फिर भी में निरन्तर क्रियारत हूँ।

 

 

 

 

                                    15 अघ्यात्म

 

 मैं कह रहा था-  मुझे याद है, आज सत्ताईस वर्ष पूर्व आपसे मिला था, तब लगता था, बहुत कुछ पाया है, बचपन से ही संस्कार थे। साधना जैसी भी मिली, करता गया। पर अब इतने वर्षो बाद लगता है, कुछ नहीं पाया है। मैं वैसा का वैसा ही रह गया हूँ। मात्र कुछ भावनाएं साथ रही, वे यहाँ आकर पूरी हो सकती है, यही उम्मीद बची रही। शुरु के वर्षो में जिज्ञासा थी, पर धीरे-धीरे लगा, मैं कही का नहीं रहा। आपनेअनंत यात्राके पृष्ठ भेजे थे, मैंने छपा दिए। पर लगता है , उस उपन्यास के नायकशिखिध्वज’,   से भी गई गुजरी मेरी हालत रही, मैं तो पूरी तरह  अपने आप जुड़ पाया, पूरी तरह संसार में ही पूरा उतरा। क्या कारण रहा?“

 

 

स्वामीजी कह रहे थे-  जाना कहाँ था, मैंने तो कभी कोई आश्वासन नहीं दिया। जब में ही हिमालय से उतरकर बकानी के इस गांव में गया, तो जाना कहाँ है? हम आशाएं लेकर ही कहीं जाते है। वो कहते है, जब तक हम है, आप यहाँ है, चिन्ता करे, ये सब पाखंड है। प्रकृति का अपना  एक नियम है, उससे हम सब बंधे है। उम्मीद किससे? यहाँ तुम्हारी या किसी की आशाओं को पूरा क्यों करना है? जो यह वादा करते है, वे अपने आपसे झूठ बोलते है। मैं तो कुछ नहीं करता, जानता भी नहीं, बाहर क्या हो जाता है। कुटिया में गांव वाले आते हैं, बस नहाये-धोये बाहर चबूतरे पर सो गए। जाते समय मिलने आते है, कहते हैं, अच्छी नींद आई। उनकी तो कोई आशा नहीं है। ही वे कुछ पाना चाहते हैं।

 

 

जो पाने के लिए आता है, उसकी कभी कोई तृप्ति नहीं होती है। जो जानता है, वह कुछ करना नहीं चाहता। आप इतने वर्षों से यहाँ है? मैंने तो कोई सवाल आपसे नहीं पूछा। आपसे यही कहा है, सवाल नहीं, उत्तर देना सीखो। सवाल मन करता है, उत्तर हृदय देता है।पर अभी जो कहा गया है, उस पर विश्वास नहीं हुआ। विश्वास तो अंधा होता है। जो माना गया है, वहाँ विश्वास तो पूरा करो। कमी यही रही। मैंने आपको पत्र में लिखा था, अभी आप में आत्मविश्वास की कमी है। मुझे उम्मीद है, भविष्य में आपका हर कदम सही ही होगा। मुझे तो उम्मीद है, पूरा विश्वास है। जो कहा है, उसे सुनो, उसे समझो, प्रयोग में लाओ। उम्मीद नहीं, आशा तो परम दुःख का कारण है। यहाँ तो बस एक सीरियल   चल रहा है, इससे  अधिक नहीं, जो काम प्रकृति ने सौपा है, उसे पूरा कर दो, बस ज्यादा उलझना बेकार है।

 

 

प्रश्न था - ”आपने अनंत यात्रा में कुंभ के द्वारा नीलकंठ को कहलाया है। मेरा कार्य तुम्हारा विवेक जाग्रत करना था। हो सकता है, इसके बाद मेरा शरीर भी रहे.यह क्यो”?

 

क्यों, बस एक कहानी  है, बस। प्रकृति हर एक को अपना कार्य करने भेजती है। यह भी कि एक ड्रामा चल रहा है। इसका कोई कारण नहीं है। किसी ने कहा है,‘एब्सर्ड ड्रामा’, आपने ही बताया था। इसका कोई कारण नहीं है। बुद्धिमत्ता और विवेक में फर्क है। जब बुद्धि शत-प्रतिशत शुद्ध हो जाती है, तब विवेक जाग्रत होता है। नीलकंठ और  कुंभ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो मन संसार में भटकता है, वही मन अंतर्मुखी हो जाता है, तब वह अपने अस्तित्व को पाता है, पर मार्ग विवेक के द्वारा ही मिलता है। संसार में सफलता बुद्धि के द्वारा मिलती है।

शक्ति एक ही है। बुद्धिमत्ता जहाँ दुनिया में वैभवशाली बनाती है, वहीं विवेक भीतर की सम्पदा को सौपता है। पर जो विवेकी है, उसे इस बात की कोई चिन्ता नहीं है कि उसे लोग किस तरह देखते हैं। वह बाहर के दबाव में विचलित नहीं होता है। पवित्रता उसकी अपनी निजी होती है, वह बाहर के दबाव के आगे अपने आपको बदलता भी नहीं है। मैंने बकानी की घटना बताई थी, जब गुरुकुल शुरु हुआ, तब मेरे विरुद्ध बहुत ही गलत व्यवहार होता था। यहाँ तक कि मुझे मारने के लिएभी लोग आए थे। यहाँ तक कि जो गुरुकुल का सेवक था, वह भी यह ंजानता था, पर उसने भी मुझे नहीं बताया। वे लोग लाठियाँ लेकर आए, मैं कुए पर एक लंगोटी में नहा रहा था। वे लोग सामने आए और लाठी फेंककर नमस्कार करके चले गए। बाद में मैंने पूछा क्या बात थी। तब मुझे बताया गया था कि मुझे पीटकर भगाने के लिए कोई षडयंत्र था। बात बताने की है कि मुझे पता हो जाता तो क्या होता? मैं भी कुछ सोचता? पर नहीं, प्रकृति ने हमें साधारण मनुष्य बनाकर ही भेजा है।हमें, हम कुछ विशिष्ट हैं, ज्यादा जानते है, इस भ्रम से दूर रहना होगा। जो वास्तविक ब्रह्मनिष्ठ गुरु होते है, वे अपनी किसी भी विशिष्टता से अवगत भी नहीं होते। जो कुछ बाहर अप्रत्याशित घट जाता है, वह स्वतः हो जाता है, वे इस बारे में किसी भी प्रकार की कामना भी नहीं करते।           

 

 

यहाँ बहुत से लोग आए। आए और चले गए, साधारण सी कुटिया में उन्हें कुछ नहीं मिला। वे कुछ पाने आए थे,  चले गए, कुछ रुक गए कुछ ठहर गए। कई लोग हैं, क्यों रुक गए उन्हें पता नहीं, डॉ. बसावड़ा आए थें। शिकागो में अपना क्लिनिक चलाते थे।  दरवाजे से मुझे एकटक देखते रहे, फिर पास आकर बोले, जो आपने पाया, मुझे दे दें। मैंने कहा मुझे पता नहीं, क्या है। यहाँ तो नदी बह रही है,  वह सभी की है।आपका पात्र जितना बड़ा है , ले जाएँ मुझे कुछ पता नहीं है। यह जल सबका है, किसी एक का नहीं है।

आप अपने सवाल का उत्तर खुद पता करें, उत्तर मिलेगा।

 

 

 

 

16 साधन तत्व

 

आप ही क्या, यहाँ जो भी आता है,शार्टकट चाहता है। यह दुनिया का कायदा है, दुनिया में सफलता पाने के लिए शार्टकट चल पड़ा है। परयहाँ का नियम दूसरा है।यहाँ कोई शार्टकट नहीं है। मुझे साठ साल से अधिक का समय लग गया था। बचपन में एक बार बैठा था। तब अचानक विचारों की श्रृंखला रुक गई थी। कुछ समझ नहीं पाया। फिर इंजीनियर साहब से पूछा, उन्होंने सब समझाया, पर फिर मैं भी परम्परागत साधनाओं में चला गया। धीरे-धीरे सब छूटता गया, आपनेअनाम यात्रीभी लिखा है। जब मुझे इतने वर्ष लग गए। आप चाहते है, कुछ दिनों में कुछ घंटों में हो जाए। आप जाग्रत हो जाएं।अनन्त यात्रामें कहा है, लगन महत्वपूर्ण है, एक दिन लक्ष्य तक ले जाती है। शास्त्रों ने इसीलिए इसे साधना माना है।

 

            मैंने बहुत बार समझाया है, शरीर और उसके द्वारा की गई साधनाओं से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। यह मानसिक क्रिया है। गीता में दो शब्द आए है।ममऔरमाम,’ एक व्यक्तिगत  मन है, दूसरा अंतर्मन है। मैंने कभी आत्मा शब्द का प्रयोग नहीं किया। यह रुढ़ हो गया है। फिर इसकी व्याख्या करो। ईश्वर शब्द भी रुढ़ हो गया है। सबके अपने-अपने ईश्वर है। जैसे कागज की दो परतें होती हैं, उसी तरह इस मन की दो परत हैं। एक बाहर की ओर है, एक भीतर की ओर है। बाहर की ओर जो जाता है, वह आपका बाहरी मन है, जो भीतर की ओर हो रहा है, वह आपका अंतर्मन है। है वह शक्ति एक ही। एक की पहचान बुद्धिमता से होती है, दूसरी की पहचान विवेक से होती है।

 

सबसे कठिन होता है मन और मस्तिष्क का गठजोड़ टूटना। मन का यह अस्वाभाविक निवास स्थान है। मन का मूल स्थान नाभि में है। इसे आपकॉस्मिक माइन्डयानो माइन्ड“, भी कह सकते हैं। मैंने इसे अंतर्मन कहा है। यह विराट से जुड़ा रहने कारण अत्यधिक शक्तिशाली है। पर यह जो कुछ कहा है, यह बुद्धिगत विवेचन नहीं है। यह उससे परे है, यह अनुभव है। पहले आपको अपने मन को नियंत्रण  में ले जाना होगा।

 

मैंने बार-बार कहा, मन की मृत्यु नहीं होगी। मन का नाश नहीं होगा। पंतजलिजी ने निरोध शब्द को सही तरह से समझाया होगा। चित्त की वृत्तियाँ जो तरंगों की तरह हैं, जब शांत हो जाती हैं, तब क्या होता है। योग मन और प्राण दोनों शक्तियों का एक हो जाना है। यह स्वाभाविक अवस्था है। अनन्त यात्रा मेंरानी चूड़ालाराजा शिखिध्वज को यही समझाती है, आसन, प्रणायाम आदि बहिर्मुखी निरर्थक साधनाओं सेकोई लाभ होने वाला नहीं है।

 

बाह्य मन जब नीचे उतरता है, तब इसकी अनुभूति स्वयं को होती है। विचारों की संख्या कम होने लगती है। कुछ दिव्य अनुभव भी होते हैं। अनवरत नाद सुनाई पड़ता है। पूर्वभास सा होने लगता है। फिर मन धीरे-धीरे कंठ पर होता हुआ हृदय तक आता है। यहाँ पर आकर प्रेमानुभूति उठती है। रविन्द्रनाथ टेगोर का संस्मरण पढ़ा था।अचानक उन्हें तालाब में, रास्ते के पोखर में, छोटे डबरेमें एक ही प्रकाश दिखाई पड़ा था, यह बात गीतांजलि लिखने के बहुत बाद की है। मन जब हृदय पर आता है, तब बाहर का बहुत कुछ छूट जाता है। यहाँ पर आकर बूंद निर्मल तो हो जाती है, पर तभी भीतर का भी अनुभव होता है और बाहर भी आना-जाना बना रहता है।

 

पर हमारा मन अहंकारी है, वह बाहर अपनी पहचान चाहता है। संत लोग कितनी मालाएं पहनते हैं, भभूत लगाते हैं, इससे क्या होगा? जो नहीं है, क्या वह प्रकट हो जाएगा। वह तो तभी प्रकट होगा। जब मन, अंर्तमन में लय होगा। तब अंतर्मन सारे कार्य व्यवहार संभाल लेता है। बुद्धि विवेक में डूब जाती है। यहाँ पर आकर राग-द्वेष विलीन होने लगते हैं। हम कहते है, दर्पण हो जाओ। वह यहाँ घटता है, पर यहाँ आओगे कैसे?

 

बहुत पहले जब आप मिले थे। मूलचंद जी आते थे। डाह्याभाई आते थे। पोस्टमास्टर कन्हैयालाल जी थे। वे लोग आते गुरुकुल में थे। पर इनका अधिक समय आसन, प्रणायाम, शास्त्र अध्ययन तथा बातों मे बीतता था।मैंने एक-दो बार इशारा भी किया पर समझ नहीं पाए। वे बहुत भले सेवा भावी थे।निर्मल चरित्र के थे। पर मन जो एक बार परम्परागत विचारों में बंध जाता है, वह छूट नहीं पाता है। मन तो किसी किसी एक खूंटे में बंधा रहना चाहता है। कन्हैयालाल जी विपश्यना सीखकर आए थे।  वे वहाँ कुछ बन भी गए थे। चोयल साहब कहते थे, ध्यान सिखाओ, वे कृष्णमूर्ति के अनुयायी है, वे अवेयरनेस की बात करते है। जब कृष्णमूर्ति आते वे और उनके मित्र उनके लैक्चर सुनने पहुंच जाते।फिर मुझे सुनाने आते। मुझे उस आधार पर परखते। अगर मैं उन जैसी बात कर रहा हूॅं, तो ठीक है, नहीं तो,  क्या कहा जाए?

 

चाहे मंत्र जपो, किसी मूर्ति का ध्यान लगाओ, विपश्यना  में जाओ, सब बाहर ही भटकाते रहेंगे। यह बात ध्यान रखना। जब स्वाभाविक साधन उपलब्ध है, तब बाह्य साधनों में जाकर मन को भटकाने की क्या जरुरत है?

 

मैंनेअनंत यात्रामें कहा है, आपको समझाया है, जो भी कार्य प्रकृति ने सौपा है, मन को पूरी तरह उस में लगा दो। किसी भी हालत में उसे विपरीत जाने से रोकना होगा, मन की यह स्वाभाविक अवस्था हो जायेगी। वह हर जगह एकाग्र होने लगेगा। किसी एक ही मुकाम पर एकाग्र करने से उसकी दासता शुरु हो जाती है। ये सारेे, पंथ मत, मनुष्य को गुलाम बनाए रखने की परम्परा में ही है। ये सब व्यर्थ हैं। जो भी साधन है, उसमें मन लगाए रखना ही सार है।

 

दूसरी महत्वपूर्ण बात है, मन जब क्रिया में हो, तब उसे बलपूर्वक क्रिया में लगाना बेकार है। यह सब सम्भव होता है, खाली समय मिलते ही अपने मन को विचार रहित लाने का प्रयास करना। यह सामान्य विधि है। इसे अवलोकन कहदो। धीरे-धीरे दो विचारों का गैप अनुभवन में आता है, इसे आप  वर्तमान कह सकते है, यह समय नहीं है। विचार ही भूत और भविष्य में रहता है। जहाँ विचार नहीं है, वही वर्तमान घटता है। भले ही यह क्षण भर का  हो, साधना यही है। यह अन्तराल धीरे-धीरे बढ़ता जावे। वर्तमान में विचार अपने आप गिर जाता है। वर्तमान ही, इस      अनंत का दरवाजा है।अनंत यात्रामें इसी बात को स्पष्ट किया है।

 

बात होती भी है, लोग आते हैं, पूछते हैं। मैं कहता हूँ, वर्तमान में रहो। वो कहते है, यह कैसे सम्भव है। मैं कहता हूँ, आप यहाँ आए हैं, अकेले आए हैं या और भी साथ है? वे हँसते है, कहते है, अकेले है, फिर मैं चुप हो जाता हूँ। कैसे समझााऊँ, कि वे अकेले नहीं आए,अपने साथ बहुत बड़ी भीड़ साथ लेकर आए हैं। रात को सपने आते है, कितने लोग दिखाई पड़ते हैं। ये शाम तक तो साथ नहीं थे, रात को कहाँ से गए। सुबह उठते ही कहाँ चले गए? इन सभी की विदाई हो, तब जागृति, विचारणा और स्वप्न में चेतना की एक धारा का अनुभव होता है।

 

तब प्रश्न था-  आपने आत्मकृपा की बात कही थी?“

हाँ आपने किताब भी लिखी, पर आत्मकृपा आपसे ही गायब हो गई।मैंऔरआत्म“, में भेद है, मैं और माम में भेद है।मम“, की कृपा, जब मैं इसमाममें विलीन हो जाती है, तबमामही सारे कार्य व्यवहार को संभाल लेता है। तब यह पता लगता है कि यह मेरी ही माया है। यह बाहर और भी भीतरका जगत मैंने ही बनाया है। बाह्य जगत से अधिक कष्टकारी मनोजगत होता है। बाह्य का जगत तो निरन्तर परिवर्तनशील है, पर भीतर का जगत तो संस्कार में ढलता जाता है। खाली हो तो संग्रह ही कारण बनता चला जाता है।

 

यह कैसे कम हो?“

फिर वही बात, बाह्य में किया गया कोई भी प्रयास अन्तर्मुखी बनने में सहायक नहीं होगा।

इसके लिए एक ही उपाय है, निरन्तर वर्तमान में रहा जाए। वर्तमान का यह क्षण समय की सबसे छोटी इकाई मानलो। जहाँ समय है, वहाँ मन है, वहीं भूत है, वहीं भविष्य है। भूत का कोई अस्तित्व नहीं है। वह तो गया, हम उसे स्मृति के द्वारा वर्तमान में लाते हैं। भविष्य है वह एक सम्भावना है। जहाँ वर्तमान है, वहाँ निरन्तर सजग रहो तो पता लगता है।

 

हम वर्तमान में हैं, वहाँ विचार नहीं हैं। यह निर्विचारता ही हमारा लक्ष्य है, जो हमें सदा से उपलब्ध है, पर हमें इसका ध्यान नहीं  है। यहाँ जानना कुछ भी नहीं है, मात्र जिसे  हम भूल गए थे, उसकी याद है। गीता में कहा गया , ‘माम अनुस्मर युद्धच’, मेरा निरन्तर स्मरण। यह स्मरण जप करना नहीं है। सुमिरन शब्द यहीं से बना है। काम तो करना ही होगा। मैंने यहाँ कुटिया पर लिख दिया था, ‘आलसी मत बनो,कार्यरत रहो।

 

 

इसीलिए मैंने ध्यान शब्द का भी प्रयोग नहीं किया। ध्यान शब्द एकाग्रता के साधनों के लिए रुढ़ हो गया है। जितना हम वर्तमान में रहेंगे, एकाग्रता सहज ही प्राप्त होती जाएगी। मन स्वतः नियंत्रण में रहना सीखता जाएगा। मन बहुत चतुर है, याद रखना। ज्यांे ही तुम भीतर उतारोगे,यह तुम्हारे अनुभव को शब्द देने लगेगा। तुम अपने आप को असाधरण मानने लगोगे। गुरु बनना चाहोगे, बचना। यह काम तो तुमने  पहले ही बहुत किया है। इसीलिए बार-बार यहाँ आते हो, बचना, बाहर के दुश्मन इतने बुरे नहीं हैं, जितने भीतर के होते हैं। यह मन बहुत चतुर है। अनुभूति बुद्धि से परे है। जहाँ तक बुद्धि है, वहाँ तक सब मन की कपोल कल्पनाएँ है, हम सत्य को कल्पनाओं से ढक देते हैं। वहाँ निरन्तर सजगता ही उपाय है। मन ज्यांे ही कल्पना लोक में ले जाना चाहे, तब सजग हो जाना। सजगता आग की तरह है, घास-फूस को तुरन्त जला देती है।

 

प्रश्न था-         गीता में कहा गया है,‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’, इसका क्या आशय रहा होगा?“

 

            आशय क्या, वह धर्मात्मा तुरन्त हो जाता है। कहानियाँ हैं। इसके पहले श्लोक में आया है, ‘कोई कितना भी बुरा क्यों हो। स्त्री, पाप योनी, शुद्ध सभी धर्मात्मा हो सकते हैं।

 

इसमें क्या गलत है, धार्मिकता, कर्मकांड से परे है। इसे अध्यात्म भी कहा जाता है। यह जीवन जीने की शैली है। एक वाक्य में कहा जा सकता है, वर्तामान में रहो। ज्योंही हम यह सीख जाते हैं,यह हमारे जीवन जीने की शैली बन जाती है।हम धर्मात्मा हो जाते हैं। जहाँ तक मन है , वहीं तक समय है। वहीँ तक अतीत है और भविष्य है, वहीं तक पाप और पुण्य है। स्वर्ग और नर्क है। सब मन ही तो है, मन के खेल हैं। जब मन ही नहीं रहा तब क्या,...... क्षिप्रं, रस्सी जब कुएं में बाल्टी उतारती है, तब निरन्तर वह कार्य करती  है, पर धीरे-धीरे वह घिसती जाती है, फिर अचानक टूट जाती है। परन्तु इस अचानक तक आते-आते उसे समय तो लगा था। यह हम क्यों भूल जाते है?

 

            जब पहली बार आप मिले थे, आप व्रत, उपवास करते थे। मुझे देखकर आप चौके थे। मैंने कभी व्रत के लिए नहीं कहा। स्वयं मेरा भोजन इतना अल्प रहा है कि लोग आश्चर्य करते हैं। व्रत-उपवास से जाग्रत पुरुष का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह परम्परागत रुढ़ी है। हाँ, भोजन स्वास्थ्य के  लिए अनुकूल हो। आहार-विहार में संतुलन हो। आपको दो कहानियाँ  कहीं थीं। पहली ब्राह्मण बालक मूर्ति बनाता है और सिर काट देता है। पिता जाकर वणिक जिसने अनुष्ठान करवाया था ,उससेे पूछता है, धन वहाँ से आया था। वह बताता है कि उसका संकल्प था जो धन कसाई के यहाँ डूब गया है, मिल जाएगा तो कथा कराएगा। वह जाकर वणिक को उसका धन दे आता है। दूसरी कहानी थी कि संत जो भोजन करने गए थे, वे सेठानी का हार चुरा लाते है। फिर सोचते हैं, यह क्यों हुआ। वापिस लौटते हैं, पूछते हैं, तब पता लगता है कि जिस सेविका ने भोजन बनाया था, उसकी हार चुराने की भावना ढ्ढ़ हो चुकी थी। वही भावना अन्न ग्रहण के साथ उन्हें पराजित कर गई। संत हार वहाँ रख कर लौटते हैं।

 

कहानी, कहानी होती है। सार जानना चाहिए। अन्ना से मन बनता है। मन का पोषण होता है। अन्न की शुद्धि अपरिहार्य है। इससे मन की गति कम होती है। पर यह छोड़कर अनीति से धन कमाओ, व्रत-उपवास करो, सब व्यर्थ है। 

पर कितना समझाओ, कोई मानने वाला नहीं है। सबके पास अपने- अपने तर्क हैं।

 

सभी आसन सबके लिए नहीं हैं। हठ योग का जागृति से कोई सम्बन्ध नहीं है। आध्यात्म के नाम पर बजार  में सभी कुछ परोसा जाता है। रास्ता मन से ही है। मन से ही उसके पार जाया जा सकता है। मन को देखना है। गहरी सतर्कता के साथ, हर पल साथ रहता है। मन एक साथ दो कार्य कर सकता है। वह देखता भी है और दिखता भी है। वही दृष्टा है, वही दृश्य है। देखते-देखते दृश्य सिमटने लग जाता है। बातें सुनने के लिए नहीं है, प्रयोग में लाओ।

 

तुमने पूछा था, पच्चीस सालों से मेरे साथ रहे, क्या पाया?“   पूछा, अपने आप से पूछो, अगर कुछ पाने के लिए ही आए थे, तो समय व्यर्थ गया। पानी में पड़ा पत्थर भी सौ साल तक भी वैसा ही रहता है, परिवर्तन वहीं आता है, जहाँ उसके लिए जगह हो।

 

गीता में जो कहा गया है, वह प्रवचन के लिए नहीं है। तुरन्त, और यह भी कहा गया है, मन पर नियन्त्रण पाना कठिन है। अगर तुम यह समझ गए कि मन ही समय है। वे पच्चीस साल तुम्हारे मन  पर अंकित छाप  की तरह हैं,तो और वर्ष लग जाऐगेे। समझ गए कि मन ही समय है। मन जिन्दा रहता है, अतीत में या भविष्य में। जहाँ दोनों नहीं है, वही मन भी नहीं है। वहाँ समय कहाँ होगा? मात्र वर्तमान है, वर्तमान का द्वार ही भीतर का दरवाजा खोल देता है। जहाँ उस जगह जाना सम्भव है। परिवर्तन बाहर कुछ नहीं होगा, पर भीतर कुछ-कुुछ बदलनेे लगता है। विचारों के कम होते ही , विकार भी कम होने लगते है। पर जो लोग एक बाहर की ओर लक्ष्य बनाकर कुछ पाने के लिए निकलते हैं, वे वैसे के वैसे ही रह जाते हैं। बाहर जो आज सही दिख रहा है, वह कल गलत भी हो सकता है। बाहर कहाँ तक जाना है, परम्परागत साधनाएं पद्धतियाँ बाहर ही भटकाती हैं।

 

            यहाँ समय महत्वपूर्ण नहीं है। समझो, यह भटकाने वाली बातें हैं। हमारे ग्रन्थ यही करते रहे हैं। वे बाहर कोई लक्ष्य बनाते है। हम जब तक उस तक आते है, दूसरा हमारे सामनेे जाता है। मन को जरा सी छूट मिलती है, सतर्कता हटती है, वह पचासों सपने ले आता है, वह तुरन्त भविष्य में दौड़ जाता हैं। समझ यही है कि रास्ता भी यही है। इसलिए कृष्णमूर्ति कहते थे पाथ लैस लैंड , पर उनके अनुयायी  समाज से कटकर रास्ता तलाश कर रहे थे। मेरी बातें उन लोगों के समझने में नही आतीं थीं। जाना मन से ही है। व्रत, उपवास, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, तंत्र- मंत्र , ये सब परम्परागत उपाय हैं। जड़ तो मन मे ंहै, वहीं से शुरुआत हो।  सही आहार और व्यायाम शरीर के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। बस इतना ही इनका महत्व है। मन से हटकर क्रियाएं करो तथा वर्षो बाद मन पर आओ। यह सब व्यर्थ के उपाय है। दूसरे जो अपने ऊपर किसी नाम पर, किसी चित्र पर, एकाग्रता करना बताते है, वे भी धोखा ही देते है।

 

मन ही तुम्हें नियंत्रित कर रहा है, अभी तक तुम मन से ही नियंत्रित हो रहे हो। मन तुम्हारे भीतर कोई एक लक्ष्य बना देता है। तुम उनके पीछे चल देते हो। बार-बार कहा है, मन से ही मन के पार तुम्हें जाना है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। मन ही कल्पनाओं से तुम्हें अनुभव भी दिखा देता है। जो भावतीत ध्यान की बात करते हैं, वह भी एक प्रकार की कल्पना ही है। यह हमारा मन ही हमें मुक्ति दिलाता है। यह बंधन में बांधता जाता है। जब जो चाहते हैं, वही दिखना शुरु हो जाता है। मन की शक्ति अपरम्पार है। पर उसके परे जो है, जो अंतर्मन है, वह विराट से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक शक्तिशाली है।

 

जो समझदार हैं, वे इसी मन को एक उपाय देकर तुम्हें उलझा देते हैं। उस दिन तांत्रिक आए थे। वे भूत-प्रेतों की, सीद्धियों की चर्चा कर रहे थे। उनको भैरव दिखाई पड़ते हैं। मुझ से भी कहलाना चाह रहे थे, यह भी मन का ही प्रोजेक्शन  है। मन जैसा चाहता है, बाहर वैसा ही दिखना शुरु हो जाता है। हम जो भी कल्पनाएं करते हैं, वे हमें सच दिखाई देती हैं। क्योंकि उन्हें हम ही ताकत देते है। देवी-देवताओं के दर्शन के पीछे यही धारणा है। हमारी ही शक्ति उन्हें प्रकट कर देती है। वे भी यही कहते हैं। शक्ति तुम्हारी ही है,जिसने मुझे प्रकट किया है। स्वर्ग और नर्क हमने ही बनाए हैं हमारा लोभ और भय इन्हंे बना देता है।

 

आपने सवाल किया था, हम लोग वृन्दावन गए थे। स्वामी शरणानन्दजी के आश्रम में ठहरे थे। वहाँ के लगभग सभी मंदिरों में आप गए थे। मैं बाहर ही   गााड़ी  में रहा। आप बार-बार पूछते थे, मैं भीतर क्यों नहीं जा रहा हूँ? गुरुकुल मंे मुकेश भाई    अखण्ड रामायण कराते थे, यज्ञ होता था, मैं  उधर नहीं गया। वे भी पूछते थे, क्यों? क्या उत्तर होगा, आपने मुझे अपने साथ जैसा आप चाहते हैं, करने को क्यों कहते हैं? हम ही तो मूर्तियाँ बना रहे हैं, और हम ही पूजा कर रहे हैं, उनसे मांगते भी हैं, यह सब मन का ही प्रपंच है, इससे अधिक कुछ भी नहीं है। एक दिन मेरी बातें समझ में आएंगी।

 

            मैं क्या साथ लेकर आया था। एक झोला था, यह शरीर, गुरुकुल कभी का छोड़ दिया। जिस दिन सरकार को सोंपा ,सब छोड़ दिया। शरीर को  भी अब जाना है, यह प्रकृति का नियम है। पर यह याद रखना है कि यह कभी हमारा रहा ही नहीं। यह सम्पत्ति भी हमारी नहीं है शास्त्र की पहली पंक्ति थी-”तेन त्यक्तेन भुंजीथा,“ त्याग करते हुए भोग कर।

           

पर जो हम चाहते हैं, जो पाना चाहते हैं, वह हमारी पूंजी निरन्तर हमारे साथ है, पर हमें उसका ध्यान नहीं है। यह ध्यान ही सजगता है। अवेयरनेस है। उसका स्मरण निरन्तर रहे, यही ध्यान है। पर जो हमारा नहीं है, वह हमेशा हमारा बना रहे, हम इसी प्रयास में सारा जीवन गवॉं देते हैं।। यही संसार है। यही हमारी मृग-मरीचिका है,  जो हमारा हमेशा है, उसकी कोई खोज-खबर नहीं है।जो हमारा है, उसे क्या पाना है, उसे जो भूल गए है, उसकी स्मृति ही साधना है। यही सुमिरन है।

 

प्रश्न था,-        आपका सिद्धान्त तो बहुत छोटा सा है?“

 

            पर आपने पूछ-पूछ कर इतना बड़ा कर दिया है। मौन ही सत्संग है। वही साधन है, वही साधना है। वहाँ मन अपने स्वाभाविक रुप को पाने लगता है। पर जहाँ शब्द आए, वहीं बुद्धि जाती है। विचार-बुद्धि की पहचान है। हस पथ पर चलने के लिए दो ही बाते मैंने बताई है, स्वाद पर नियंत्रण रखना और बोलने पर। यही एक इंद्रिय दो-दो काम एक साथ करती है। इस पर नियंत्रण सबसे कठिन होता है।जितना नियंत्रण होता जाए, उतना बेहतर है।

 

            आखिरी बात, शांत बैठ जाना और कुछ करना,मैंने कभी नहीं कहा।

योगः कर्मसु कौशलम, और माम अनुस्मर युद्ध , जो भी काम आए , उसमें पूरा अपने आपको लगा देना , पर मन शांत रहे। मन की शांति की खोज में मत जाना।  प्राण के साथ जो मन को लगाने की विधि है, वह आंशिक  सफलता देती हे। महत्वपूर्ण है, मन जो संस्कारों के वेग से जो निरंत गतिशील रहता है, वहॉं , विकारों के वेग को कम करने का प्रयास, वह सधता है। विचारों के कम होने से, पर इसके लिए , कहीं चुप होकर बैठना नहीं हे। निरंतर कर्मरत रहो, पर भीतर चिन्तन हो। निरंतर वर्तमान ें रहने से यह सधने लग जाता है।।

 

चोयल और मेहरा ने पूछाथा, पैसिव अवेयरनैस,  चॉइस लैस अवेयर नैस, यह मेरी मान्यता नहीं  है। ध्यान  जिसे अंग्रेजी में ममैडीेशन कहा जाता है, मात्र एकाग्रता ही हे।  होना चाहिए यानि निरंतर अवेयरनैस,   निरन्तर वर्तमान में  रहना, जीवन की शैली है। प्रकृति ने हमें एक निश्चित कार्य से यहाँ भेजा है। उसका पता तभी लगता है, जब हम अन्तर्मुखी होते हैं। और अन्तर्मुखता में प्रवेश तभी होता है, जब हम वर्तमान में रहने लगते हैं। पर हम जीवन का उद्देश्य ध्न, प्रभुता , यश पाने में लगा देते है। आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति करती है, सहयोग देती है, पर हम इसी जाल में फॅंस जाते हैं।

 

 यहाँ जो भी घटता है, जो भी होता है, वहाँ लोभ है, भय है। स्वर्ग की चाह है, नरक का भय है। जो कृत्य होता है, वह स्वतः सेवा में ढल जाता है। ध्यान इसीलिए नहीं सिखाया जा सकता। जो ध्यान सिखाने की बात करते है वे समाज से  भागकर कहीं ओर ले जाने की बात करते हैं। प्रकृति ने शांत होकर जड़ हो जाने के लिए नहीं भेजा है। हम शांत रहें , निरन्तर सजग रहें और कर्मरत रहें। सब प्रकृति का है, वह निरन्तर दे रही है,” तेरा तुझको साैंपत, क्या लागे मेरा,“ यही भावना बनी रहे। मेरे जाने के बाद यह शरीर भी किसी के काम आए तो अच्छा होगा। इसे किसी अस्पताल में दे देना, वैसे बहुत कृश हो गया है।   

 

 

 

 

 

 

 

 

17 ”सरलता क्या है,

 

 

प्रश्न था -”सरलता क्या है, क्या साधारण जीवन जीना ही आध्यात्मिक है? आज जबकि हर जगह धर्म के साथ वैभव जमा हो रहा है?“

           

स्वामीजी कह रहे थे- ”सरलता और साधारण जीवन एक-दूसरे के पूरक नहीं हैं। जब मैं गुरुकुल को छोड़कर बाहर आया था, तब आप मिले थे। चातुर्मास पहले उदयपुर के पास एक लिंगजी में किया था, उसके बाद डॉ. भाटिया के यहाँ किया।

 

आप तो उनके बारे में सब जानते है। वे निरामिष थे। साथ ही उनका कुछ व्यवहार असंगत भी था। भाटिया को लेकर समाज में अच्छी चर्चा नहीं थी। आप या माणकजी  दो ही परिवारों में आना-जाना था। समाज के लोग कहते थे, यह आपने क्या किया?

 

            जो जागृत है, वह समाज की अपेक्षा में नहीं रहता है। उसका व्यवहार सामान्य लोगों की बुद्धि की अपेक्षा नहीं करता है। मुझे याद है, जब विश्व हिन्दू परिषद के लोग मेरे पास आए थे। पास में एक साधु था, वेशधारी। वे उसके साथ मेरे विरुद्ध अनर्गल प्रचार करते थे। पाटन में मुझे जोधराज जी ने बताया। मैं हंँसा, ”आप क्या कहते है? मुझे क्या करना,“ वे उत्तेजित हो गए थे। बात सामान्य है। सरलता का अंग्रेजी में शब्द इनोसेन्स है। गीता के दूसरे अध्याय में भी इस शब्द की सही वर्णना है। उसका हृदय शांत रहता है, बुद्धि शुद्ध होती है, वह प्रसाद पाता है। यह प्रसाद क्या है, उसका हृदय निर्मल है। साथ ही उसके भीतर प्रसन्नाता है। सबसे शुद्ध बुद्धि बालक की होती है। पुराने जमाने में गुरुकुल में जब बालक का प्रवेश होता था, तभी उसका उपनयन संस्कार भी होता था। उसकी बुद्धि जहाँ शुद्ध होती है, वहीं हृदय भी शुद्ध होता है।

 

यह निर्मलता आन्तरिक है।अबोध शब्द भी उस पवित्रता को थोड़ा बहुत बताता है। निर्दोेषता, शब्द भी है, पर यहाँ उसके चित्त में कोई स्पंदन नहीं है। कोई उफान होने की क्षमता नहीं  है। वह क्षण में नाराज है,  अगले ही क्षण प्रसन्न है, उसका मन अभी अतीत में जाना शुरु नहीं हुआ है। साधना भी मन की यह निर्मलता प्रदान करती है। साधु वही है, जो भीतर से अत्यन्त सरल है। धागे को तो दस गांठे लगा दे, उतना ही वजन रहेगा।

 

            पर गांठे धांगे की सरलता को दबा जाती है। वही हमारे साथ होता है। हमारे भीतर क्या है, हमें क्या पता, कितना संग्रह जमा कर रखना है? मेरे पास सामान कम से कम है। पर इसका कारण है, मेरी आवश्यकताएं भी कम से कम हैं। एक साधारण काश्तकार की झौंपड़ी में भी, मैं रहा हूँ। शुरु-शुरु में घास के पूलों पर चारा बिछाकर भी रहा हूँ। बहुत सर्दी जब होती थी, तब शरीर को ताप भी उनसे मिल जाता था। कोड़क्या में तब पुरोहित जी की स्थिति साधारण थी। वहाँ रहा, उनके घर के पास यही व्यवस्था हुई थी।

जहाँ विचारणा का आदर नहीं रहता। भीतर कुछ है ही नहीं। जो तुलना करे, संग्रह करे। जहाँ निर्विचरता में रहना है, वहाँ सजगता है, एक चौकन्नापन, बस दर्पण के आगे, चित्र आए और गए। वह तो अप्रभावित है। जो गया सो गया, उसकी छाप नहीं।

 

प्रश्न था- ”परन्तु आपकी स्मृति तो ठीक है, आपको तीन वर्ष की आयु से अब तक की सारी बातें याद है?“

            नहीं, याद कुछ भी नहीं है।

            फिर?“

           

तो क्या होता है, मन जो है, सक्रिय होते ही बंद कमरे से वह चीज निकल लाता है। आप याद रखते हैं, दस बार दोहराते है, पर जहाँ यह शांत निर्विचारता होती है, वहाँ स्मृति का दबाव नहीं होता है। जब सम्बन्ध जुड़ता है, तब वह वस्तु,  उसका परिप्रेक्ष्य उजागर हो जाता है। सोता हूँ, एक करवट सोता हूँ, सोते ही नींद जाती है। एक रोशनी की बीम सी, तेज रोशनी भोंहो के बीच में अनुभव होती है, और प्रगाढ़ निद्रा जाती है।

प्रश्न था- ”स्वप्न नहीं आते?“

           

सामान्यतः नहीं। जब किसी ने कोई प्रश्न पूछा है और भीतर से प्रेरणा उठी है। उसके बारे में बताया जाए। तब नींद में जाते समय उस पर सोचता हूँ, उसका उत्तर जाता है। आपको पहलेव्यावरा“, वाली घटना के बारे में बताया था।

 

प्रश्न था-         पर संतों का जीवन तो अब बहुत विलासी हो गया है?“

            यह अपने-अपने सोचने की बात है। ओशो हीरो का मुकुट लगाते हैं।राल्सरायकार रखते है। दीनदयाल जी आए थे, उन्होंने यह सवाल पूछा था। मैंने कहा था, रामकृष्ण परमहंस को तो मैंने नहीं देखा, पर वे जागृत थे। रमण महर्षि के पास रहा, वहाँ जाकर समय बिताया। वे जागृत थे। ओशो भी वर्तमान में जागृत पुरुष हैं।

 

            पर उनका वैभवशाली जीवन?“

           

वे इससे प्रभावित है, या नहीं, यह पता नहीं। आसक्ति अलग चीज है। वह तो एक कॉपीन से भी हो जाती है। पुरानी कहानी है, राजा के पास एक फकीर आकर रुके थे, उनके पास एक कॉपीन और एक कमंडल था। वे राजा को ब्रह्मज्ञान देने आए थे। दोनों बात कर रहे थे कि तभी एक सेवक ने आकर सूचना दी कि नगर के पूर्व कोने में आग लग गई है। राजा ने कहा, आग बुझाओ।

           

थोड़ी देर बाद फिर प्रहरी आया, आग बुझ नहीं पा रही हैं। आगे बढ़ती हुई, बाजार तक पहुँची है।

            राजा ने कहा, सेनापति से कहो, जाएं उसे रोकें।

 

            कुछ देर बाद प्रहरी ने कहा,आग रुकी नहीं है, अतिथि शाला तक गई है।

            राजा ने कहा, अरे, मंत्री जी को बोलो, जाएं।

           

            तब तक देखा, संत जी उठ रहे थे।

            राजा ने पूछा, आप कहाँ चले?

            वे बोले,” मेरा कमंडल वहाँ रह गया है?“

            राजा हँसा, बोला, ”महाराज, मेरा तो नगर ही जल गया है। आपको अपने कमंडल की याद है।

 

कहानी, कहानी होती है। सार एक ही है। सरलता और साधारण जीवन दोनों एक नहीं है। जहाँ निर्विचारता है, वहाँ वर्तमान है, वहाँ चित की सरलता है। उनके लिए साधारण जीवन हो या वैभवशाली जीवन हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

 हमारे यहाँ इसीलिए राजा जनक का उदाहरण दिया जाता है। राजा होना कोई अभिशाप नहीं है। और अकिंचन होना कोई वरदान नहीं है। दोनों के बीच का सेतु आसक्ति है। आसक्तिका रहना हमेशा अतीत में है। हम उसे बुद्धिमता से मजबूत करते हैं। चित्त की सरलता का संपत्ति होने या होने से फर्क नहीं पड़ता है।  फ़र्क पड़ता है, मजबूती से उसे पकड़ने में।

 

 जो अनासक्त है, वह कीचड़ में तो रहेगा, पर अप्रभावित है। उसके भीतर किसी प्रकार द्वन्द्व नहीं है। उसे पश्चाताप है, प्रायश्चित है वह तो अपने भीतर स्वाभाविक प्रसन्नता में है। उसका किसी के साथ किसी प्रकार का अलगाव   ही नहीं है। जहाँ वर्तमान है, जो वर्तमान में है, वहाँ सरलता का आना स्वाभाविक है। गांँठे हमेशा धागे में अतीत के आग्रह से बनती है। वर्तमान में तो गांँठ खुल जाती है। जो धागा है, वही चेतना की सहज परिभाषा है। हमेशा सीधा पर मुड़ा हुआ भी,  उसकी अपनी कोई पहचान नहीं है। जैसे चाहो, मोड़ लो, जितना चाहो, मोड़ लो, सरलता वहीं है।

                                               

18 अंत में-

            स्वामीजी का अंतिम संस्कार कैसे होगा?“ समय आचुका है, यह आभास सबको होचुकाथा।पर प्रश्न पूछने का साहस नहीं हो पारहा था।

           

            अचानक स्वामीजी खुद ही बता रहे थें आप मेरे लिए जानना चाहते हैं।। पुरानी प्रथा थी, पानी में शरीर बहा देते थे। पर इससे पर्यावरण संकट खड़ा होता है। फिर गड्डा खोदकर  उसमें पानी भर के शरीर को रखने की प्रथा आयी। जमीन में सन्यासी को मुसलमानो की तरह रख देते है। सामान्य जीवन में अंतिम संस्कार शवदाह गृह में होता है। शरीर तो मिट्टी है। मरने के बाद किस काम का। आप तो उसे अस्पताल में दे देना, शायद कोई अंग किसी के काम जाए।

 

            सब चुप थे।

            वे कह रहे थे- ”मैंने बहुत पहले कहा था, मैं एक अंग्रेजी की कविता जो बचपन में पढ़ी थी, आपको सुनाई थी। मुझे यहाँ शांत अकेला पड़े रहने दो। मेरे जाने के बाद एक पत्थर भी यहाँ रहे, जो किसी को मेरी पहचान भी बताया करे।

 

            मैंने कहा- ”पर यह तो संभव नहीं है।

            क्यों,“

            मैं कहूँगा भी तो क्या लोग मेरी बात सुनेंगे। वे मेरे प्रति क्रोध से भर जाएंगे। जो वो चाहेंगे वही करना पड़ेगा।

 

            जाने के बाद क्या होगा, किसे पता। पर कालीबाड़ीगया था। वहाँ देखा, परमहंस की और माँ शारदा की    पूजा होती है। बनारस में देखा, जिस कबीर ने सारे कर्मकांड की बुराई की, वहाँ उसकी मूर्ति की पूजा, भोग लगता है। और तो कुछ सीखा नहीं जाता, यह पुराणवाद वहाँ पहुँच जाता है। मैं तो यह भी नहीं चाहता कोई फूल तोडे़। मैं माला पहनना पसन्द नहीं करता। मैं अपने अंगूठे में गुलाल लगाना पसन्द नहीं करता। मैंने किसी प्रकार के गुरुडम को यहाँ जगह नहीं दी। कुटिया है, जिसका मन है, जाए, चला जाए।   मैंने यहाँ मेरी या किसी और की तस्वीर  कभी लगवाई। लोग आते थे, पूछते थे। यहाँ यह खुशबू कहाँ से आती है? वे ढूँढ़ते, पर कोई अगरबत्ती नहीं पाकर चुप हो जाते।

 

मैंने इसीलिए कुटिया छोड़ दी। स्कूल तक सरकार को दे दिया। सारा सामान सौप दिया। जब जीवन में संग्रह नहीं करना, तब बाद में क्यों?“

 

पर लोग चाहते हैं-,सभी के कहने का आशय यही था। च्रंद्रधर जी थे, चोयल थे, पार्वती बाई, मेनकाजी, क्षमा, उम्मेदसिंह ,सभी की राय थी,         

            पर लोग प्रेम करते है। वे चाहते हैं, उनकी भावना का भी आदर होना चाहिए।

            तो रहे, पर होता क्या है, बाद में मूर्ति लग जाती है। पूजा-पाठ शुरु हो जाता है। जो कहा गया है, वह तो कोई सुनता नहीं। उनका मन और अधिक जटिल हो जाता है। वे हर बात की गली निकाल लाते है। हिन्दू धर्म का यही पुराणवाद प्रभावी है। जहाँ हर विचार को हम गलत विचार में बदल देते है।

 

            मैं आपके साथ वृन्दावन गया था।स्वामीजी कह रहे थे,

            हरे राम हरे कृष्ण मंदिर में आप लोग गए थे। क्या देखा? गुरु की प्रतिमा लगाकर उसकी पूजा होती  है।भीतर भगवान की पूजा हो रही है।

 

            हम लोग स्वामी शरणानंदजी के आश्रम में रुके थे। उनका साहित्य ही मैंने आपको पढ़ने को दिया था।

            वहाँ उनके शिष्य जो आश्रम चलाते है, मिलने को आए थे।

           

            वहाँ क्या देखा।         

            उनके विचार, उन पर विचार करता हुआ कोई नहीं मिला। आप उनकी समाधि पर भी गए थे। उस स्थान पर शांति यथावत थी। पुराने लोग आते नहीं है। नए जुड़ नहीं पा रहे है। यह चर्चा का विषय था। क्यों? जो सम्प्रदाय के विरुद्ध खड़ा होता है, उसके जाने के बाद उसके अनुयायी सबसे पहले उसे सम्प्रदाय में ही डाल देते है। भीड़ जब तक वह जीवित होता है, उसकी उपेक्षा रखती है, पर जाने के बाद सबसे पहले वे ही उसकी मूर्ति पर माला पहनाते है। कुछ अपराध भावना होती है। जो कभी नहीं आते, वे सबसे आगे आकर अपना चेहरा दिखाना चाहते हैं। 

 

            तो क्या किया जाए?“ हम सभी का यही सवाल था।

            मुझे क्या कहना। मेरे विचार हैं, आपको सही लगें तो इन पर विचार करें, प्रयोग में लाएँ। मैं नहीं कहता, ये ही सही हैं। हर युग में  विचारक आते है। यहाँ हर चीज बदल रही है। विचार भी बदलते है। जो विचारों को स्थाई मानकर उनकी गतिशीलता का विरोध करता है, वही साम्प्रदायिक हो जाता है। महत्वपूर्ण है, खाली सोचते मत रहो, जो जाना है,उसका आदर हो, वह प्रयोग में आए।

 

दुनिया का अपना सोचने का तरीका है, वह अपनी अपेक्षा सें, अपनी जरुरत में चीजे गढ़ लेती है। जाने के बाद, जो नहीं सुना है, वह सुनती है, जो नहीं देखा है, वह देखती है। वह अपने आदर्श को महान से महान बनाना चाहती है। मैं भी आपकी तरह साधारण इन्सान हूँ, .....बस।

यह तो सच नहीं,  हम सब उदास थे, क्या सचमुच हम जिनके साथ वर्षों से हैं, जो एक पिता की तरह हम सभी का एक परिवार मानते हुए पालन करते रहे, क्या वे साधारण हैं?“यह प्रश्न सबके मन में था।

            क्यों, इससे अधिक क्या होगा। मैं आपके यहाँ हूँ। जैसे घर का सदस्य बीमार होता है, वैसे ही बीमार हूँ। आप लोग देख रहे है, मुझे भी रोग हुआ है, चिकित्सक आते है,शरीर तो एक ही है।

 

चंद्रधर जी उदास थे, बोले ,” आप एकबार स्वस्थ हो जाएं, प्रकृति से ही प्रार्थना करलें।

            क्या?“ स्वामीजी हँसे, अरे! आप तो दार्शनिक हैं, वेदांत के आचार्य हैं।

            परन्तु!“....... वे अटकते हुए बोले।

            यही जानने का प्रयास करो। प्रकृति के नियमों का कोई उल्लघंन नहीं कर सकता। हाँ, शांत सागर में विलीन होती हुई एक लहर की तरह रहना यहाँ सम्भव है। बाकी अब कुछ कहना कठिन है।

 

यह सच है,  हम  उनकी इस बात को  नहीं मान पाए। हमारी भावनाएं प्रभावी होती चली गईं। हम उनकी निर्वाणी देह के साथ गुरुकुल आए। जहाँ हजारों की भीड़ थी। जहाँ स्वामीजी एक बड़े परिवार के मुखिया की तरह लगभग पचास साल से रह रहे थे। कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि वे हमारे बीच  में नहीं हैं।

यही भावना आज भी बलवती है, उनकी कुटिया, उनका ट्रान्जिस्टर, उनके दो जोड़ी कपड़े, चार नंबर के कपड़े के जूते और कुटिया का ख्ुला दरवाजा, समाधि -स्थल पर  दूर से आने वाले अतिथि से यही कहता है, वे हैं तो यहीं, शायद कुछ देर के लिए कहीं  बाहर गए हुए हैं।