रविवार, 19 फ़रवरी 2023

 प्रस्तुति

ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री रामेश्वराश्रम जी महाराज दिनांक 26 फरवरी, 2000 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 89 वर्ष की अवस्था में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।

28 जनवरी, 1911 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में रेडी गांव में आपका जन्म हुआ था। बचपन से सतत् आत्मानुंसधान में आप लगे रहे। सन् 1952 में आपने राजस्थान के सुदूर बकानी ग्राम में ‘गुरुकुल’ की स्थापना की थी। लगभग 25 वर्ष तक संन्यास लेने के बाद भी आप स्वतः शिक्षा कार्य में लगे रहे। सन् 1972 में संस्था को सरकार को सौंप दिया, आज जहां उच्च माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है।

आप एक परिव्राजक की तरह आम-जन के भीतर अध्यात्म की वैज्ञज्ञ निक प्रक्रिया को जीपन- जगत से जोड़ कर एक मार्गदर्शक की तरह संदेश वाहक की भूमिका का सहज निर्वहन करते रहे।  

 

स्न् 1995 में शिकागो अमेरिका से प्रख्यात मनोवैज्ञानिक  डॉ बसावडा स्वामीजी से अपनी एक अमरीकी शिष्या के साथ गुरुकुल बकानी आए थे , उसके कुछ महीने बाद केलीफोर्निया से अमरीकी महिला केरोल नागले जो भारत में जाग्रत पुरुषों पर शोध कार्य कर रहीं थीं। वे दक्षिण में सत्य श्री सांईं बाबा , केरल से अम्मा जी से मिलकर गुरुकुल आईं थीं ।


स्वामीजी के पास न कोई विधिवत आश्रम ही था , न कोई विशाल प्रबंधन , उनकी कुटिया और एक रसोई , पास में एक अतिथियों के लिए कमरा। वे वहॉं तीन दिन रुकीं।


वे अवाक थीं , यह देखकर कैसे  एक संत बिना सुचिधाओं केे इस प्रकार रह रहा हेै , और हमेशा वहॉं आने वालों का तांता भी लगा रहता हेै। 


निरंतर चिंतनरत स्वामी जी ‘सहज साधना’ का अमृत संदेश साधारण जन तक पहुंचाते रहे। न तो विधिवत कोई आश्रम वहां था न ही कहीं विशिष्ट परंपरा के निर्वाह की प्रक्रिया थी, एक साधारण सी कुटिया, और झोले के साथ स्वामीजी अंचल के सामान्य अकिंचन घर तक आध्यात्मिक का संदेश देते रहे। न अमीर न गरीब किसी प्रकार का कोई भेद वहां नहीं था। सभी के लिए कुटिया का द्वार सदा खुला रहता था। अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा के बावजूद स्वामी सरल व सहज ही रहे।उनका यही आप्त वचन रहा , जब मैंने पायाहै, तुम भी पा सकते हो , जो मेैंने  जाना है , तुम भी जान सकते हो। मेै तो बस गवाह हूूं , मार्ग भी कहना गलत है, छोटी सी बात है , निरंतर वर्तमान में रहने का प्रयास करो। तुम्हारा चिन्तन ही बाधा है।  

 

मेैं 1972 में आपके सानिध्य में आया था ,  आपके निरन्तर सानिध्य में कुछ प्रश्न उभरते रहे, उन्हें 

निरंतर लिपिबद्ध करता रहा । लगभग तेरह पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुईं।   

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न जो हमेशा उठते रहते हैं , उन्हें , इस पुस्तक के माध्यम से कि एक वैज्ञानिक की आत्म विज्ञान की खोजों को सुधी साधको ंसे परिचय कराया जाए , प्रेषित है। 



नरेन्द्र नाथ


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