जीवन भाष्य
(स्वामी श्री रामेश्वराश्रमजी महाराज से बातचीत)
डाॅ. नरेन्द्र नाथ
अनुक्रमणिका
1. जीवन का उद्देश्य 7
2. सहज 11
3. करना और रहना 17
4. मन और अन्तर्मन 22
5. खोज का प्रारंभ 24
6. उत्सुकता और लग्न 27
7. साधरणता और विशिष्टता 30
8. खेल खेल में 33
9. सहज समाधि भली 36
10. मरना और मरना 38
11. स्वप्न और विचारणा 43
12. आत्मकृपा 47
13. कर्म 50
14. मृत्यु के पार 52
15. प्रयत्न 54
16. आपका का मन 60
17. ध्यान और अवलोकन 62
18. अन्तर्मुखता 65
19. सामथ्र्य और साधना 71
20. अनुभव 73
21. कारण रहित कारण 75
22 सत्संग और स्मृति 78
जीवन का उद्देश्य 1
क्योंकि जब मुझे सफलता मिल गई। तब ओरों को क्यों नहीं मिल सकती ? मेरे अपने जीवन का प्रारम्भ ही बड़ी कठिनाई से बीता था। मुझे परिवार से किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिली। बिना किसी सुविधा के यहां तक आया तब जिन्हें सुविधाएं प्राप्त है, वे तो थोड़ी सी लगन से लक्ष्य तक अवश्य ही पहुंच सकते हैं।
जीवन का उद्देश्य, बाहर तलाश करने पर मनुष्य को नहीं मिलेगा। जब तक हम अंतर्मुखी नहीं होंगे । हमें नहीं मिलेगा नदी बह रही है, बाहर बहती जा रही है, कहां किसे पकड़ोगे, अन्तर्मुखी होने के बाद ही जीवन का उद्देश्य प्राप्त होगा।
चैबीस घंटे मनुष्य इतनी अनर्गल बातें करता है, इतना व्यवहार करता है। बस यही मानकर चलता है कि यही करना उन्नत्ति है, यदि मानसिक शांति प्राप्त नहीं हुई है तो उन्नति नहीं हुई। जब तक शांति मिली नहीं तब तक पता ही नहीं चलेगा कि आप चाहते क्या हैं?
हममें से अधिकांश को जीवन का उद्दंश्य क्या है, यही पता नहीं है, संसार में एक दौड़ है, कितना दौड़ेगो को स की कोई सीमा नहीं है।
धर्म के नाम पर शुरू ही से जप, जाप, पाठ आडम्बर भर दिये हैं, ये बहिर्मुखी क्रियायें हैं, इनसे कोई सफलता नहीं मिलेगी। रूढ़ियां हैं, करते जाओ...करते जाओ ये ही उपलब्धि हो गई है। ये बहिर्मुखी क्रियाएॅं हैं, इनका आध्यात्म से कोई संबंध नही ंहै। कर्मकांड से कोई लाभ मिलने वाला नहीं है।
परन्तु जीवन का मुख्य उद्देश्य शांति है और निरन्तर शान्ति में रहने से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, यही सरल रास्ता है, इसी मे जाना हो, रास्ता यही है।
जीना तो वैसे ही है, परन्तु सुख दुःख भोगते हुए शांति से जीना ही साध्य होना चाहिए।
एक बहुत बड़े पेड़ की छाया में पशु-पक्षी छाया पाकर शांति पा सकते है। इसी प्रकार इस व्यक्ति के सम्पर्क में आकर अन्य को भी शांति मिलती है। प्रकृति उसका स्वयं इन्तजाम करती है।
जब तक शांति नहीं हैं, तब तक अपना विश्वास ही नहीं होता। बाहर शांति है ही नहीं, वहां संसार, निरन्तर परिवर्तनशील है। बाहर से तो यही संबंध रखना है कि वर्तमान में रहो, अन्दर से जो प्रेरणा आये, वही करो।
विवेक जागृत होने के बाद, सही कार्य स्वतः चलता रहेगा।
कत्र्तव्य पालन होता रहेगा।
इससे अधिक कुछ भी नहीं है।
प्रश्न ः क्या हम इस तरह रहने से असामाजिक नहीं होंगे ?
उत्तर ः नहीं, समाज को अधिक लाभ होगा। हममें शक्ति होगी तो समाज को लाभ ही होगा। असामाजिक वह है, जिससे दुनिया को हानि पहुंचेगी।
यहाँ दुनियां के प्रति हमारा संबंध तटस्थता का रहेगा, जो जितना निकट आता जावेगा, वह लाभ लेता जावेगा।
छाया के स्वतः जाने की कहीं कोई जरूरत नहीं होगी। जो छाया में आता जायेगा, वह लाभ लेता जायेगा। बात समझने की है, दूसरों को जब तक प्रभावित करने की इच्छा है, बर्हिमुखता बनी रहेगी। भटकते रहोगे। यही पतन हो जाता हे। कमाई एक रुपये की होती नहीं है, बाॅंटने हजार चल देते हो। जब उससे संबंध जुड़ जाता है, फिर कोई कमी नहीं। हजार बल्ब जलें , लाख कोई फर्क नहीं पड़ता, पर पहले पावर हाउस से जुड़ाव तो हो। शक्ति उस पावर हाउस में है, उससे संबंध जुड़ा रहे यही साधना है।
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प्रश्न ः आप आत्मा, परमात्मा, इन शब्दों का प्रयोग नहीं करते हैं ?
उत्तर ः शब्दों को भी किसी ने दिया है, समझाने के लिए किया था, अब शब्द ही रूढ़ होगए हैं। शब्दों की चर्चा छोड़ो ? इससे क्या होगा?
जो शक्ति है, उससे ही गति है। वही पैदा करती है, वही रखती है, वही मिटा देती है। हम सब उसी से जुड़े हुए हैं।, उसी से सब होता है, उसी से हम जुड़े हुए है। शरीर में वही मन और प्राण में विभाजित होकर कार्य करती है।
जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड है।
उन्होंने उसे समझाने के लिए भाषा में अलग- अलग शब्दों का चयन किया जो शक्तियांे को समझ नहीं पाये उन्होंने देवी देवताओं तथा धर्म गुरूओं का सहारा लिया। देवी देवताओं के प्रचार से पूर्व प्रणव का जप होता था। ओम क्या है, यह जो नाद है, उसके प्रतीक का स्वरूप वही चिन्ह बन गया, उसका ही जप प्रारम्भ हो गया।फिर देवी देवता आये तो उनकी पूजा शुरू हो गई। उन्होंने माना कि इससे कुछ लाभ होता है....लोग भी यही चाहते है, यह सब चलता रहा। शक्ति का कुछ नाम नहीं है, वहां मात्र उर्जा हैं। उन्होंने इस ध्वनि के आधार पर उसका नाम ओम दे दिया यह भी तो कल्पना ही रही।
यही प्रणव साधना है।
प्रश्न ः फिर जीव क्या है ?
उत्तर ः विकार सहित मन ही है। यह सुख दुःख भोगने के लिये ही है। यह भी व्याख्या ग्रन्थों के लिये ही है।
प्रश्न ः फिर आप क्या नाम देंगे ?
उत्तर ः यहां नाम की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य शरीर ही पर्याप्त है। अन्दर रहने से बाहर भीतर की सभी क्रियाओं का निरन्तर ज्ञान होता है, सीमित शक्ति है। इसका अहसास होता है। यदि कुछ होना है तो अन्दर से प्रेरणा आती है। यदि किसी शरीर के द्वारा प्रकृति को कार्य करवाना है, तो वह करवा लेती है।
प्रश्न ः फिर विकारों से मुक्ति नहीं होगी ?
उत्तर ः मृत्यु के समय ही मुक्ति हो पायेगी। वह तो निरन्तर है जैसे सांस की क्रिया है। सांस रूक गई तब मनुष्य शरीर छूट जाएगा। लहरों से ही विकार उत्पन्न होते है।
लहरें भी आएगी और विकार भी उत्पन्न होगें। लेकिन वर्तमान में रहने से इन्हें सहन करने की शक्ति रहेगी। यह किसी अन्य साधन से प्राप्त नहीं होगा। ‘तान तितिशस्व भारतः’ यहीं गीता में कहा गया है। तितिक्षा याने सहन करने की शक्ति यह तुम्हारे अन्दर उत्पन्न होनी चाहिये। यह केवल वर्तमान में रहने से ही उत्पन्न होती है। तितिक्षा , बाहर के संवेदन से प्रभावित होकर अपनी ओर से जो निरंतर प्रवाह पैदा होजाता है, उसे रोकना है।
प्रश्न ः मन तो जो विचार आ रहे हैं, उनके स्थान पर अन्य किसी जगह लगाने से भी रुक जाते हैं, क्या इसमें लाभ नहीं होगा ?
उत्तर ः यह तो बहिर्मुखी क्रिया है। बहते जाओगे प्रवाह में। जो क्षण है, उससे दूर हटते जाओगे। जहां करने का सवाल आया हम दूर हट गये। जो कुछ हम कर रहे है, माया में ही तो कर रहे है। बाहर का सहारा रहा तो हम अपने मूल स्थान से हट जाऐगे। वर्तमान में रहने में न तो कोई क्रिया है, न ही स्थान से हटने का कोई कारण है।
वह जो महान शक्ति है....वहां गति है....तेज गति....लहरे ही लहरें यहां लहरें आयेगी......अन्तर्मन से टकरायंेगी।
वही संस्कार है।
विकार तो उत्पन्न होंगे। विचार ही विकार है। विकारों को रोकना कठिन है। हाॅं, आप बार-बार चिंतन करके उसे संस्कार बनने से रोक सकते हैं। यही संस्कार को बनने से रोकने की साधना है।
लेकिन तितिक्षा होने के कारण विकारों की भी अनुभूति होती है। लहरों की भी होती है। मालूम होता है कि किसी ने आकर धक्का दिया, हम तो अपने स्थान से नहीं हटे। यही कूटस्थ रहना कहा जाता है। गीता में यही अनित्य है, जो कहीं क्षणिक है, यही मात्रा -स्पर्श है, पर आप इनसे बचकर कहीं नहीं जासकते, इनके वेग से हिलो मत।
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प्रश्न ः हमें हमारा तो अनुभव होता है, हमारे भीतर विकार ही विकार है आपको देखकर लगता है कि आप वास्तव में मुक्त है ?
उत्तर ः मुझे क्या होता है, यह आप कैसे जान सकते हैं ? जो आप अनुभव कर रहे है, वो आपके शरीर में भी है, जब तक मेरा शरीर है, मेरे भी रहेगा।
जैसे शरीर है तो इसमें हड्डियां भी है, मांस भी है, खून भी है। यह नहीं रहेगा तो क्या शरीर जीवित रहेगा, इसी के साथ मन भी है, विकार भी है। सब कुछ है, लहरें जो टकरा रही है, वे उन्हीं विकारों को उत्तेजित करने के लिये ही है। यह मात्र कल्पना ही है कि उच्च कोटि के व्यक्ति के भीतर यह नहीं होगा। उसको भी लहरें टकरायेगी उसे अनुभूति होगी।
मात्र सहनशीलता ही वर्तमान में रहने से मात्र हो सकती है।
प्रश्न ः आपने एक बार कहा था, यह उसी प्रकार से है, बीज पड़े रहे, और अंकुरित नहीं हो पाए ?
उत्तर ः अंकुरित नहीं होना माने विचलित नहीं होना। विकार कोई वस्तु नहीं है। न ही कोई परिभाषा हो सकती है।
परन्तु लहरें टकराती है, एकदम क्रोध आता है। काम उठता है। यह कोई वस्तु है क्या बीज है क्या ?
बीज तो कोई वस्तु होती है, यहां तो ये मात्र लहरें है। चैतन्य के कंपन हैं।इस प्रकार से विकार उत्पन्न होकर शरीर से काम करवाते है।
बीज का उदाहरण इसलिये दिया था, समझाने के लिए न तो बीज होता है न ही वह सड़ता है।
प्रकृति का कार्य है, लहरे उठाना शरीर का कार्य होता है विकारों में प्रभावित होकर क्रिया करना...जैसे कठपुतलियों को नचाते है, लहरें नचा रही है।
मनुष्य मात्र एक ही है, न तो वह साधारण है न वह असाधारण है। प्रयास करने पर वह अन्तर्मुखी हो सकता है।
जैसे साधारण मनुष्य के शरीर में कष्ट होता है, उस का मन व्यथित होता है। उसका भी होता है। मन का नाश नहीं होता। मन का नाश होगया तो सभी समाप्त हो जाएगा।
हाँ, वह जानता है, भोग से बचता नहीं, उन्हें ंभी शांत होकर भोगता है।
समर्थ रामदास का उदाहरण पहले भी दिया था, शिवाजी जब मिलने पहुंचे जब उन्हें बुखार आरहा था। शिवाजी पहुंचे तो उन्हों ने देखा पास में रखा कंबल कांप रहा है। वे देख कर चैंक गए, समर्थ रामदास बोले, तुम्हारे आने से पहले मुझे बुखार था। तुम जरूरी काम से आए हो, बात करनी है, तबतक के लिए बुखार इस कंबल को देदिया हैं तुम जाओगे ?फिर बुखार ले लूंगा। भोगना मुझे ही है।
परमहंस का उदाहरण दिया था, उन्हें आखिरी रात गले में बहुत तकलीफ थी। शिश्यों ने कहा माॅं से प्रार्थना करलें , वे हॅंसे इस शरीर के लिए, अरे वही तो हजार मुंह से भोजन करा रही है।
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प्रश्न विकार की देह मंे उपस्थिति कब तक रहेगी ?
उत्तर शरीर नष्ट होगा तब विकार समाप्त हो जावेंगे। सभी समाप्त होगा।
शरीर ही नहीं होगा तब विकार कहां होंगे ?
शरीर के साथ ही सब पैदा होता है उसी के साथ ही नष्ट होता है।
बचती तो मात्र शक्ति है।
वह शक्ति नए नए शरीर पैदा कर खेल खेला करती है।
प्रश्न ः जिसे आप संग्रह कहते है, वह इस शरीर में आता कहां से है ?
उत्तर ः संग्रह तो प्रकृति ने बना रखा है, पंच महाभूत उसने बना रखे है। वह तो अपनी गति के साथ नए-नए बनाती जाती है, मिटाती जाती है। कुम्हार का चाक चलता हुआ देखा है, वह क्या नहीं बनाता है।।
यह जो पंचमहाभूत है, यही नाटक की सामग्री है। यह सब चीजें है जिससे मनुष्य बना है। यहां अच्छा बुरा कुछ नहीं होता.....। खाली जमीन पड़ी रहती है.....। वर्षा होते ही इतने पौधे-जीव जन्तु कहां से आ जाते हैं कहां चले जाते हैं.....। जब तक मनुष्य सुख दुःख से जुड़ा हुआ है, तब तक उसे शांति नहीं मिलेगी। कोई घटना होगी वह विचलित हो जाएगा। शान्ति वह है जो निरन्तर बनी रहे.....
मन मात्र गति है। जब तक बाहर की गति भीतर नहीं आती तब तक शांति का अनुभव नहीं होता। परन्तु अन्तर्मुखी होने के बाद ही उसका अहसास होगा।
बाहर के विषयों में रस आता है, इसलिये मन बाहर खिंचता रहता है।
वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक प्रयास होना चाहिये। उसके लिए लगन आवश्यक है.....।
सहज
हम जुड़े हुए हैं, अलग हैं ही कहां ?
वह शक्ति जो है, घूम रही है। वो हमारे अन्दर भी है। इसीलिए हमारा शरीर घूम रहा है, चल रहा है निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। पत्थर में परिवर्तन नहीं होता। हजारों वर्षों तक एक ही स्थान पर खड़ा रहे एक जैसा ही रहता है। पर शरीर जुड़ा रहता है, अलग नहीं होता है उसमें परिवर्तन उसी कारण से होता है।
प्रश्न ः हम शक्ति के साथ जुड़े हुए हैं, फिर यह अलगाव क्या है ?
उत्तर ः वह मन से भासता है। परन्तु मन जबर्दस्ती खींचता है। वह खींच खींचकर कहता है कि तुम अलग हो। और हर विषय में उलझता है।
प्रश्न ः ”योग” तो अलग मानता है ?
उत्तर ः उन्होने उस समय गहराई से नहीं सोचा होगा। उन्होेने इस बात को माना कि हम तो अलग है ही। हमें मनुष्य से भगवान बनना है। प्रक्रिया जो उन्होंने बनाई उसे पतंजलि ने बाद में लिपिबद्ध करके साधना रूप दे दिया। भक्ति का भी लक्ष्य रहा था। मनुष्य को मनुष्य से परमात्मा बनना है। मनुष्य अलग है परमात्मा अलग है। उस समय यदि वे गहरे चिन्तन में जाते तो कह पाते कि अलगाव है ही नहीं।
परन्तु वे सही क्रिया नहीं बता पाए कि यह अलगाव क्यो है ?
योग वशिष्ठ ने अवश्य समझाया है....उदाहरण भी दिए हैं, सीपी में जिस प्रकार चमक है,....आदि।
प्रश्न ः फिर सही रूप में किसे माना जाए ?
उत्तर ः एक ही है,
पुराने ग्रन्थों के आधार पर जो बताते हैं वेही सही नहीं है वर्तमान मे रहना, मार्ग यही है।
कहीं कुछ सही रास्ता भी निकल सकता था तो उनका सही आचरण नहीं हैं। मन भटकता रहता है, क्रियाएं चलती रहती है। माला फेरने का उद्देश्य क्या था....पर होता क्या है, मन वहां है नहीं। क्रोध भी आ रहा है, मुंह से नाराजगी प्रकट कर रहे है। मन में विकार भी आ रहे है। पर हाथ से माला फिराते जा रहे है।
शिवलिंग पर हजार विल्वपत्र चढ़ा रहे है। शिव सहस्त्र नाम लेकर के। उद्देश्य था, एकाग्रता हो लेकिन मन लगता नहीं है। घंटो साधना करते हैं, हवन भी करते है पर कोई क्रिया सही नहीं है। थोड़ी देर के लिए क्या है....क्रिया वही है, जिसमें निरन्तरता बनी रहे।
प्रश्न ः कर्मयोग, राजयोग, भक्तियोग...... की जो साधनाऐं हैं, क्या ये सही नहीं है ?
उत्तर ः कह तो दिया, गलत है। उसमें कैसे जोड़ सकते हैं। यहां जो अपने आपको अधूरा माना है यह गलत है। किसी के न तो सही समझ में आती है, न हीं उसका आचरण होता है।
प्रश्न ः वह जो अधूरा समझता है, क्या कल्पना है ?
उत्तर ः जन्म से ही हमारे भीतर चेतना होती है। यही शक्ति है। चेतना होते हुए भी वह अपने आपको अपूर्ण समझता है।
प्रश्न ः वह कठपुतली की तरह असहाय क्यों समझता है ?
उत्तर ः मन करने नहीं देता। उसका संग्रह उसे निरन्तर भगाता रहता है। मन इसमें यह अच्छा है, बुरा है दुनिया भर के झगडे मन में खड़ा करता है, उससे उसका आभास ही नहीं होने देता।
प्रश्न ः क्या शक्ति का अहसास हो सकता है ?
उत्तर ः मनुष्य शरीर में रहकर कुछ हद तक हो सकता है। बूंद दूर है जितनी निकट आएगी, उतनी शक्ति तो पायेगी। लेकिन मिलने के बाद तो अस्तित्व ही खो देगी।
कुछ अनुभव उस शक्ति का हो सकता है। प्राचीन ऋषि मुनि इस बात तक तो पहुंच गये थे। उन्हें शक्ति का आभास हो गया था।
योग की शक्तियां, चमत्कार उसी का परिणाम है। भक्तों को भी बताया गया था कि भगवान रूप धारण कर सहायता करते है। वे यह नहीं बता पाए कि अपनी ही शक्तियां अपनी ही सहायता करती है। उन्होंने भगवान को माना था, इसीलिए भगवान को लाए। नरसिंह जी गाड़ी हांकना आदि, लेकिन यह सब प्रलोभन ही है। भक्तों के लिए।
प्रश्न ः शक्ति तो प्राप्त होती है ?
उत्तर ः जो मैं कहता हूं, वही होती है। सहनशीलता बढ़ती है। इसका आभास होता है।
ज्ञान बढ़ता है। अपना व्यवहार किस प्रकार करें इसका ज्ञान होता है। वो करने से हमारे इर्द-गिर्द का जो वातावरण प्रतिकूल होता है वह सही होता है।
बस इतनी ही सीमित शक्ति है, मनुष्य में। किसी चीज को परिवर्तन करें,..... फल फूल में बदल देना.....वह नहीं करेगा। वह प्रकृति के विरूद्ध नहीं जाएगा। हां शक्ति तो सबसे पहले आएगी ही।
प्रश्न ः फिर योग सूत्र की प्रासंगिकता क्या है ?
उत्तर ः वह अब अप्रांसगिक हो गया है। आज से हजार साल बाद, आज जैसी बात रहेगी क्या ? पचास साल पहले जो साईकिल की कद्र थी वह आज है क्या ?
उस रूप में उन्होंने उसे सही माना, वह कहते गए।
आज जैसे जैसे बुद्धि का विकास हो गया है, पुराने जितने भी ग्रन्थ हैं, शास्त्र है,.....अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे है। लोग वेदों की झूठी तारीफ करते है।
देखो तो उसमें कुछ भी नहीं है, जिसका महत्व हो। लोग शोध पर शोध किए जा रहे है।
हां, उपनिषदों में ज्ञान की बातें है।
वेदों में मात्र देवताओं की तारीफ है, मांगने वाले और देने वाले अलग है।
वेदों में क्या लिखा है, उसमें चिन्तन के लिए क्या है, कोई कुछ नहीं जानता।
अगर सार भी था तो वह अलग निकल गया।
उपनिषद वही है।
उपनिषदों का सार गीता में लिया गया।
और गीता में भी सात सौ श्लोक है।
पच्चीस या तीस महत्व के है।
जिसमें अठारह श्लोक तो दूसरे अध्याय के हैं बाकी इधर उधर बिखरे हुए हैं।
विस्तार बहुत लम्बा सा कर रखा है, जिसमें आदमी उलझ जाता है।
प्रश्न ः आपकी साधना पद्धति को शब्द क्या दिया जाये ?
उत्तर ः आभास हटाना है, उसके लिए शब्द क्या दूं ?
यहां क्रिया है ही नहीं, जिसकी वर्णना हो।
मैं तो यही कह सकता हूं कि वर्तमान में रहना है।
जुड़े तो हम है, अलग है ही कहीं।
प्रश्न ः कृष्णमूर्ति जी ने साक्षी होना तरीका बताया है, कुछ कहते हैं कि विचार को ही न आने दें इन दोनों तरीकों में क्या अंतर है ?
उत्तर ः क्या फर्क है इसमें। इन्होंने यह नाम दिया है, उन्होंने यह नाम दिया है। मूल बात तो यह है कि अनावश्यक विचार जो मन में आते हैं, वे नहीं आना चाहिए।
आप जो चाहे नाम दें।
प्रश्न ः विचार तो आते हैं, वे कैसे नहीं आवेंगे ?
उत्तर ः प्रत्यक्ष जब मुझे देख रहे हो, और जब मैने यह कार्य कर रखा है तब दूसरों के लिए असंभव कुछ है ही नहीं। हरेक यह मानता है कि असंभव है। इसीलिए असंभव है।
पहले से मन में यह धारणा कर रखी है, क्योंकि लगन के साथ तो करते ही नहीं है। यदि आप सब कुछ छोड़कर लगन के साथ करो तो धीरे धीरे यह हो जाता है। थोड़ी देर एक मिनट दो मिनट के लिए मन रूक जाता है तो फिर दो घंटे के लिए भी रूक सकता है। मैं समझााया था, यह तो गति है, साइकिल और सवार सहित साइकिल में अंतर है। सवार साइकिल को अपनी तरह से चलाता है। बस यह निरंतर चलने वाली साइकिल है। जो संग्रह है, वही संस्कार है। वहींगुण रहते हैं।इसीलिए सबका व्यवहार एक ही घटना पर अलग- अलग होजाता है। हाॅु, जिना इस संग्रह से जो निरंतर हमारे चिंतन से जमा होता रहता है, इससे हट जाएॅं, तो यह कम हो रहा है, इसका पता लगने लगता है।
उस स्थिति में रहने का प्रयास किया जाए तो, मन जो कहा है, वह धीरे धीरे नीचे उतरने लग जाता है। उसकी बहिर्मुखी गति बदलती है।
उसका आभास होने लग जाता है।
शब्द अलग अलग है।
किसी ने कहा है देखें, किसी ने कहा है रोक दें, किसी ने कहा है, आने मत दो।
मतलब तो सभी का एक ही है। कि यह बाधक है। यह किसी प्रकार हटनी चाहिए। वे मसे ही लड़ने की बात करते हैं। यही कहना सही नहीं है।
इसे समझो और सही बात को अपनाने का प्रयास करो।
जो बात समझ में आई, उसका तुरंत आचरण होना चाहिए।
जिसे अवलोकन कहते हैं,.....उसमें यही होता है।.....
जैसे देखना शुरू करते है।
एक विचार आता है, भान होता है, वह रूक जाता है।
दूसरा आता है।
भान होता है, वह रूक जाता है।
थोड़ी देर बाद यह होगा कि वह आते-आते रूक जाता है।
पता करो मन ही तो राक रहा है, वह जो संग्रह है, उस पर निगाह जाते ही उसका काम रुक जाता हे।
प्रश्न ः क्या यह क्रिया नहीं है ?
उत्तर ः इसमें क्रिया नहीं। क्रिया का मतलब है कि जो किया जाता है। क्रिया में शरीर का योगदान रहता है। यहां स्वाभाविक स्थिति में रहना है। शरीर का कोई योगदान नहीं है। सब कुछ इस मन को ही करना है। आप तो शरीर को तंग करके मन को नियंत्रित करना चाहते हैं।
इसीलिए इसको हम क्रिया नहीं कहते।
क्रिया वह है जो साधन है, जो किया जाता है।
यह स्वाभाविक स्थिति, सहजावस्था कह सकते है। जहां भी साधन आपने किया, वहां आपने बाहर कदम रखा।
जब बच्चा पैदा होता है,
उसकी वह स्वाभाविक स्थिति होती है।
उस वक्त मन सक्रिय नहीं होता।
बच्चा पैदा होते समय, वह बाहर का कुछ नहीं जानता।
वह हमारे मन की स्वाभाविक स्थिति होती है। वह अपने साथ कुछ नहीं लाता। वह रोता भी है, चिल्लाता भी है। धीरे धीरे उसका मन विकसित होता है। वह सारी क्रियाएं करता है अपने आप करता है।
प्रश्न ः क्या यहंा क्रिया नहीं है ?
उत्तर ः मन में जो विचार आते हैं, वह क्रिया है। विचार हमारे संग्रह से आते हैं। हम निरंतर चिंतन से हर संवेदन को जमा करते हुए विचारो ंमें रखते जाते हैं।
हम अपनी वास्तविक स्थिति में नहीं है हम अपनी स्वाभाविक स्थिति मंे नहीं है।
कल्पना करते हैं, सुखी हैं, सुखी नहीं है।
पर हम अपनी वास्तविक स्थिति में आऐंगे,.....यहां क्रिया नहीं होगी। वहां करना होता है, निष्क्रिय हो जाना.....उसके लिए कोई साधना नहीं होती है।
साधना तो सक्रिय होने के लिए होती है।
हम को तो यही कहना है कि वर्तमान में रहो।
वर्तमान में रहेंगे तो विचार नहीं आऐंगे। पह हम क्रियाशील भी रहेंगे।
प्रश्न ः वर्तमान में रहने पर भी दुःख का अनुभव होता है ?
उत्तर ः दुःखी आदमी वर्तमान में रह ही नहीं सकता। उसका ध्यान वहीं जाएगा, जहां दुःख का कारण है।
किसी को देखकर आप दुःखी होते है, तो यह कमजोरी है। उससे अपना बाहर से संबंध क्या है,.....सिनेमा के पर्दे पर किसी को दुःखी देखकर आदमी रोता क्यों है,.....उसका कोई कारण है क्या...वह उसकी अपनी कमजोरी ही है। पहले तो लोग सिनेमा में रोने के लिए ही जाते थे। महिलाएॅं घर से रूमाल लेकर जातीं थीं।
प्रश्न ः क्या यह वर्तमान में रहना नहीं है ?
उत्तर ः यह तो बाहर जो घट रहा है, उससे प्रभावित है। वर्तमान में रहने का अर्थ है कि जो बाहर घट रहा है, उससे हम प्रभावित नहीं होते हैं।
प्रश्न ः यह तो आपने अलग सिद्धान्त बताया है ?
उत्तर ः मैं तो यही बताता आ रहा हूं। हमंे वर्तमान में रहना चाहिए इसका अर्थ यही है कि बाहर की स्थिति का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़े। रामतीर्थ का उदाहरण दिया था कि नाव में इतना शोर हो गया था, आंधी आ गई थी। नाव हिचकोले खाने लग गई थी। उन्होने कहा था। आंधी तो है, पर बाहर है, भीतर नहीं है। मैं इससे विचलित नहीं हूं।
यदि आंधी भी अंदर पहुंच जाएगी तो मैं भी रोने लग जांऊगा।
हमें वर्तमान में रहना है तो हमें बाहर की स्थिति से क्या लेना क्या देना ?
बाहर यह आंधी तूफान ऐसे ही आते रहेंगे। मार काट भी होती रहेगी। जलते भी रहेगें। हंसते भी रहेंगे। इस कार्य को कोई रोक नहीं सकता है।
आप केवल इस स्थिति को फिल्म की तरह देखते जाओ। अपना शरीर भी इसी में है। अतः स्वाभाविक कर्म करते जाओ। क्या कार्य करना है, इसकी स्वाभाविक प्रेरणा आती रहेगी। करते जाओ जैसे नट को पता है स्टेज पर कि मुझे कार्य करना है करता जाता है। उसी तरह अपने को भी पता लग जाता है कि स्टेज पर यह करना है, वह करता है वह उससे प्रभावित नहीं होता।
सही एक्टर वही है, जो अपनी एक्टिंग से प्रभावित नहीं होता।
उसे यह पता लग जावे कि सामने कोई है तो वह एक्टिंग ही नहंी कर पाता है।
इसी तरह से हमे अंदर से अपने कार्य की प्रेरणा होती है। वह करते जाना है और मन को निष्क्रिय बनाने से ही यह स्थिति प्राप्त होती है। मन की निष्क्रियता ही मन की शक्ति है।
प्रश्न ः इसका अर्थ यह हुआ कि हमें अपने सही स्वरूप का भान रखना है, यही वर्तमान में रहना है ?
उत्तर ः हां ।
करना और रहना
बुद्ध ने संसार को दुःखमय कहा है...
स्वामीजी ः उनके मन ने यह मान लिया था कि हम दुःखी है। दृश्य भी जो उन्होंने देखे, दुःख के ही देखे। जिन्होंने उन्हें प्रभावित किना। इससे धारणाएं भी उसी तरह की बन गई। यह जो संसार है, इससे सभी प्रकार की चीजें रहेगी। तभी तो यह संसार है।
यहां अच्छा ही अच्छा हो, यह हो नहीं सकता।
इसमें सभी प्रकार का मेल है।
ग्यारहवें अध्याय में गीता में विराट स्वरूप का जो वर्णन है, उसे ध्यान में रखना होगा। जहां बड़े बड़े ऋषि मुनि..... और देवलोक दिखाए..... वहीं युद्ध महामारी भी दिखाई।
अर्जुन घबड़ा गया।
यहां अच्छा और बुरा सब ही रहेगा।
प्रश्न ः फिर हमें करना क्या है ?
उत्तर ः हमें हर स्थिति में सामना करते हुए प्रसन्न रहना है। घर छोड़कर भागना नहीं। यहां पर आने वाली हर परिस्थिति का सामना करना है। जूझना है। हमें हर परिस्थिति का मुकाबला करना चाहिए। यहां से भागकर कहां जाओगे? हमने जो झूठी धारणा बना रखी है कि हम दुःखी है, और हमें सुख की तलाश करनी है, यही दुःख है। वास्तव में कहीं दुःख नहीं है।
प्रश्न ः ऐसा कैसे कह सकते हैं.....बाहर इतनी गरीबी है भूख है, अन्याय है.....आप इसे दुःख नहीं कहेंगे ?
उत्तर ः संसार, सब इसी का ही नाम है। सब समृद्ध नहीं हो सकते। यहाँ निरन्तर परिवर्तन है। विषमता ही संसार है। बुद्ध ने ही तो इसे अनित्य और क्षणिक कहा है।
कर्म से ही परिवर्तन संभव है।
समस्याएं ये नई नहीं है। अनादिकाल से चली आ रही है।
समानता कहीं संभव नहीं है। समता प्रकृति के ही विरुद्ध है। जब साम्य होगा तो विकास भी रुक जाएगा।
अंगुलिया इतनी बड़ी छोटी क्यों हैं ? अगर एक समान हो तो कोई भी चीज पकड़ ही नहीं सकती थी। हथेली का निर्माण कितनी कुशलता से किया गया है। अगर एक ही समान होती तो सभी मनुष्य एक जैसे नहीं हो सकते....। सबक अंगूठे की छाप ही अलग है।
जो पार्ट जिसको मिला है, उसे करना है। आप जो स्वयं कर सकते हैं....वह यही है, अपना कार्य सुंदर करो, दूसरे का खराब न हो , यह ध्यान रहे।.तटस्थ बनो।
इस तरह रहना सीखो।
बाहर का परिवर्तन कोई नहीं कर सकता है।
अत्याचार, गरीबी, बेराजगारी कभी नहीं मिटेगी.....न कभी शराबबन्दी होगी, न कभी जुए खाने बन्द होंगे.....। यह संसार है। यहां बनने, बिगड़ने का खेल लगातार चलता रहता है। जो इन्हें हटाकर कुछ नया लाने की बात करते हैं, ये राजनीतिक चालें है। विषमता ही संसार का आधार है, विषमता जिस दिन समाप्त हो जाएगी, संसार समाप्त हो जाएगा।
प्रश्न ः फिर समरसता कहां होगी ?
उत्तर ः व्यक्ति में आ सकती है.....। अगर उसमें लगन हो...
प्रश्न ः मनुष्य जीवन का उद्देश्य ?
उत्तर ः मनुष्य का उद्देश्य यही है कि वह सुख शांति से रहे। अपनी विचारधारा को सही रखे।
प्रश्न ः उसके लिए आप कहते हैं कि अन्तर्मुखी होना चाहिए ?
स्वामीजी ः हां, पर यह बुद्धि के स्तर पर समझने वाली चीज नहीं है। व्यवहार में इसे लाना होगा।
जो वर्तमान में रहता है, वही अन्तर्मुखी है। जो वर्तमान में नहीं रहता है, वह या तो भूत में रहता है या भविष्य में रहेगा।
जो वत्र्तमान में रहता हे, वह अनावश्यक विचारों में डूबा नहीं रहता है।
जो भी कार्य चल रहा है, मन उसी में रहे। कार्य तो एक जगह होता है, मन कहीं और कहीं चिन्तन में डूबा रहता है। विषय के साथ जुड़े रहने से वह वर्तमान में रहता है। जरा सा हटते ही वह भूत और भविष्य में चला जाता है। इसमें चिन्तन नहीं रहेगा वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ जाए तो मन फिर आगे पीछे जाता ही नहीं।
नहीं तो बैठे बैठे पचास बातें करते रहते है। जो वर्तमान में रहता है, वह भूत और भविष्य की चिंता करता ही नहीं है।
मन का स्वभाव गति है।
जो भी विचार आया है, उसी के साथ चला जाता है। बाहर की चीज जुड़ते ही वह चला जाता है। बहने लग जाता है। फिर उसका आभास होता है कि हम तो यहां बैठे थे। वह कहां चला गया। वर्तमान में रहने का अभ्यास हो जाए तो सबकुछ सध जाए। वह तो फिरकनी की तरह है। एक चीज पकड़ में आती है तो वह जुड़ जाती है। दूसरी आती है, पहली छूटती है। दूसरी चिपक जाती है।
गति मन है,.....अंदर जो विकार है उसके कारण से कभी लोभ में कभी क्रोध में, आदि विकारों में जाता रहता है...।
प्रश्न ः क्या विकार मन में नहीं है ?
स्वामीजी ः मन कभी विकारी नहीं है।
मन मात्र गति है। गुण जो है नाभि में है। जड़ में है। वहां लहरें टकराती है। मन के द्वारा वह सब कार्य कराती है।
वर्तमान में रहने से मन आगे पीछे नहीं भटकता।
उसके आगे की स्थिति मन के नीचे उतरने की है।
वह अनुभव की चीज है।
बुद्धि से उसकी विवेचना नहीं हो सकती है।
प्रश्न ः यह नीचे कब और किस प्रकार आता है ?
स्वामीजी ः बहुत देर तक एक ही कार्य के साथ जब मन जुड़ा रहता है और इसमें सब व्यवहार सुचारू रूप से चालू रहते है, तब अपने आप मालूम पड़ जाता है कि पहले की अपेक्षा अपनी स्थिति में सुधार है। यह स्वयं को अनुभव होगा। दूसरा नहीं जान सकता है।
हम स्वयं ही इसे जान सकते है।
प्रश्न ः क्या चित्त की शुद्धि इससे प्राप्त होती है ?
स्वामीजी ः यह जो गुण बताए जाते है,.....यह भी मन के विकार है।..... मन जब नीचे आता है, तब हृदय की उदारता आनी चाहिए। उसे कहीं भी आकर्षण नहीं रहता। किसी से द्वेष नहीं रहता चित्त की शुद्धि स्वतः प्राप्त होती है। उसे कहीं भी बुराई नजर नहीं आती। क्रोध लोभ नहीं रहता। आज तो किसी का गलत कार्य दिखा क्रोध आ जाता है। हृदय शुद्ध रहा ही कहां है ?
विकारों से भरा हुआ है।
विकार क्या है, वर्तमान में रहने का अभ्यास नहीं है।
प्रकाश आते ही अंधकार अपने आप चला जाता है।
वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही, सब बातें अपने आप समाप्त हो जाती है।
प्रश्न ः क्या यही सहजावस्था है ?
स्वामीजी ः यही बनी रहनी चाहिए। पर रहती नहीं हैं। जिनकी सही लगन है, उनकी रहेगी।
प्रायः उत्सुकता ही रहती है। वहां यह नहीं रहती। यहां शारीरिक प्रयास तो है नहीं, यहां मन के द्वारा मन की निगरानी है। छोटा सा सफल उपाय है। पर लगन नहीं हैं, दृढ़ विश्वास नहीं है। यह मैने कितनी बार कहा है, रास्ते सभी अप्रासंगिक है। यहां लगन ही महत्वपूर्ण है। रास्ते सभी मनुष्य ने ही बनाए है उसी ने तय किए है।
प्रश्न ः जो सहज की परिभाषा है, वह गीता के दूसरे अध्याय के आधार पर दी जा सकती है ?
स्वामीजी ः हां, यह भी शाब्दिक कसरत ही है। स्थित प्रज्ञ के लक्षण वही हैं। बुद्धि स्थिर मात्र वर्तमान में ही हो सकती है।
यह अनुभव का विषय है। हम घंटो चर्चा करते रहें उसे कुछ लाभ होने वाला नहीं है।
वर्णना और स्वाद में अंतर है। स्वाद तो चखने पर ही पता लगता है। यह अनुभव का क्षेत्र है, चर्चा का विषय नहीं है।
आज जो हमारी स्थिति है, वह विपरीत है।
यह स्वाभविक स्थिति नहीं है। इसीलिए हमें वर्तमान का सहारा लेना है।
हम अवास्तविकता में जी रहे है। हमें वास्तविकता में रहना है।
किसी भी तरीके से लाओ।
हाथ अगर लगातार हिलने लग जाए तो बीमारी हीं कहीं जाएगी मन जो निरन्तर हिल रहा है, यह बीमारी ही है। पहले इस बात को समझाा ही जाए। उसकी बीमारी दूर करना उसको अपने स्थान पर रखना, जब कार्य हो तो काम लेना, अन्यथा उसे पड़ा रहने दें। यही अस्वाभाविक स्थिति है।
यही प्रयोग आपको रखना है।
यहां मन निष्क्रिय भी रहेगा और सजग भी।
चैबीस धंटे सक्रिय नहीं होगा। जब उसे काम में लेना है, तब आकर काम करेगा।
आपने पच्चीस साल पहले किसी घटना पर कोई प्रश्न पूछा - तो मन क्षण भर में वहीं जाकर के तुरन्त आकर के उत्तर देगा। यह नहीं होगा कि कहीं भटक जाएगा। वहां जाकर उलझेगा नहीं।
मात्र जो प्रश्न पूछा है, उसका उत्तर देगा।
मन की गति इतनी तेज है कि उसकी शक्ति वहां से सही उत्तर ले जाएगी।
इस साधन से लाभ यह है कि मनुष्य जो अशांति का अनुभव करता है, वह नहीं करेगा।
परमात्मा ने मनुष्य को सुख व शांति में ही रखा है। कोई भी पिता अपने बच्चों के लिए दुःख की कामना नहीं करता है। सृष्टि उस परमात्मा ने ठीक ही बनाई है। बच्चे हैं उद्दडता करते है। अपने लिए नई-नई समस्याएं खड़ी कर देते हैं। कहना ही नहीं मानते इसीलिए सारी गड़बड़ी है।
सुख तो पहले होगा। सुख से ही शांति में जाऐंगे। दुःख से वह शांति में नहीं जायेगा। भले ही सुख क्षणिक है।
हां, समरसता इस स्थिति में रहनी चाहिए।
निरन्तर शांति ही आनन्द है।
बाहर जो घट रहा है, वह घटता ही रहेगा।
हम मात्र अप्रभावित रहते चले आऐंगे। बाहर का जो है।
वह अनादि काल से चला आ रहा है, चलता रहेगा।
यह कभी रूकेगा नहीं। इसे रोकना, बदलना किसी के बस की बात नहीं है।
प्रश्न ः क्या यह पलायन नहीं है ?
स्वामीजी ः जो बाहर है उसका मुकाबला करो। उसको भोगो। उससे भागो मत।
पलायन किसे कहते है? मैं तुम्हें सन्यासी बनाने नहीं आया। तुम से तुम्हारे विवाह के बाद ही मिला हूॅं। तुम तो इस शहर में तीन साल पहले आगए थे। गंभीर साहब से जो तुम्हारे पड़ौसी थे, तुम्हारे समाचार मिल जाते थे। मैं सन्यासी रहा, पर यहाॅं आने के बाद गृहस्थों के घर ही ठहरा हूं। क्यों? उत्तर तलाश करो। सन्यास की रूढ़ी अब मूल्य खो चुकी है। न भिक्षा मिलती है, न सन्यास सधता है। पहले मिल जाते, तुम सन्यासी बन जाते? प्रकृति का विरोध हो जाता। अब जो स्थितियां है, उसका मुकाबला करो।
यहां जंगल में भागना नहीं है। भागकर कहीं मत जाना।
आंधी और तूफान तो वहां भी आऐंगे।
खुद ऐसे रहो जैसा गीता में कहा है, कछुए की तरह रहो।
कछुआ कहीं भागता तो नहीं है। जरूरत न होने पर ,अंगों को समेट लेता है। पर जरूरत होने पर विषय और इन्द्रियों के संयोग से क्रियाशील हो जाता है।
यही जीवन जीने की कला है।
मन और अन्तर्मन
स्वामीजी मेरे विचार स्वयं के अनुभवों पर आधारित है।
मैं चिन्तनशील रहता हूं।
बाहर से मेरा संबंध टूटा सा रहता है, मैं अंदर ही अंदर जो कुछ करना होता है, मैं करता रहता हूं उसी का परिणाम मेरी विचार धारा है।
उसी का व्यवहार देख लेता हूं, प्रत्यक्ष करता हूं, प्रयोग करके देख लेता हूं। गलतियां हो तो सुधार करके देख लेता हूं।
इसीलिए हुआ है, कभी दोहराव भी आया है, तो कभी जो पहले कहा है उससे हटकर भी कहना होता है। क्योंकि मैं सदा प्रयोगशील रहा हूं।
प्रश्न ः हमें तो मन का स्थान नहीं मिलता.....?
स्वामीजी ः मन का स्थान मिलने जैसी स्थितियां अभी कहाँ आई है? अभी भी मन विषयों और इन्द्रियों के साथ है, जब तक इन्द्रियों और विषयों के साथ ही, मन हो तब तक उसका स्थान कैसे मिलेगा ? विषय और इन्द्रियां यह तो बाहर की ओर निरन्तर ले जाती हैं। तथा जाना अन्दर है इनको छोड़कर ही जाना होगा जब तक छोडा़ नहीं जाएगा, तब तक उस स्थान का पता नहीं लगेगा।
प्रश्न ः आपको मन का स्थान कहां मिला ?
स्वामीजी ः नाभि में।
परन्तु साधारण मनुष्य मन को अनुभूति दिमाग में करता है, वह वहीं विचार करता है, वहीं से विषयों और इन्द्रियों से जुड़ा है, परन्तु यहां से वह जैसे नीचे उतरता है, संबंध टूट सा जाता है। जब तक संबंध टूटेगा नहीं, नीचे नहीं उतरेगा तब मन की गति, धीरे धीरे तेज गति, की अनुभूति शुरू होती है, तब अनुभव होता है कि यह मन है। उसकी गति अनुभव होती है, वह कोई वस्तु तो है ही नहीं।
प्रश्न ः ये जो नाभि पर लहरें टकराती है, ये ब्रह्म की है, या प्रकृति की.........
स्वामीजी ः प्रकृति और ब्रह्म में क्या फर्क है, प्रकृति ब्रह्म की ही शक्ति है, काम करने की। ब्रह्म और माया इन दो शब्दों का प्रयोग होता है। ब्रह्म जो इस तमाम को करने वाली शक्ति ही है और इसके लिये कार्य करने की जो शक्ति है उसके लिये प्रकृति कहा है यानि क्रियाशीलता।
वह स्वयं क्रिया नहीं करता, वह तो केवल घूमता है परन्तु घूमने के साथ, सबको उत्पन्न करना, बढ़ाना और उनमें विचार पैदा करना, इससे सृष्टि का निर्माण करना, जो यह क्रिया शक्ति है, वह प्रकृति है, वह उससे अलग नहीं है, दोनों एक ही है।
समुद्र और लहरें अलग थोड़े ही है समुद्र से जैसे लहरें उठती है, उसी प्रकार उस शक्ति में यह लहरें उठती है, यही है प्रकृति।
प्रश्न ः क्या अन्तर्मन नाभि के नजदीक है ?
स्वामीजी ः यह जो बाते कही है, वे मात्र समझाने के लिये होती है। जैसे सिक्के के दो पहलू होते है, एक नीचे एक ऊपर नीचे, का पहलू होता है, अन्तर्मन उसे ही कहा जा सकता है। वही संस्कार है।
क्योंकि लहरें टकराती है, तो वहीं टकराती है।
और ऊपरी मन को सक्रिय बनाकर के वह व्यवहार करने लग जाता है। इसीलिए कहा था कि वह नजदीक है।
लेकिन यहां कोई नजदीक कोई दूर, कोई मशीनरी जैसा कुछ भी नहीं है, मात्र गति है। जो कुछ कहा जा रहा है, समझाने के लिए ही है। जो बुद्धि से परे है, उसे भाषा में कैसे लाया जाए? हम जो बाहर का संवेदन लेते हैं, वह बुद्धि के जरिए ही अपने सांचों में ढल जाता है। यही संग्रह निरन्तर संस्कार में ढलता रहता है। यही उन चैतन्य के स्पंदनों से जिसे समझााने का लहरें कहा है, निरन्तर स्पंदित होता रहता है।
प्रश्न ः क्या विकार लहरों से पैदा होते हैं ?
स्वामीजी ः लहरों में विकार नहीं है। विकार तो संस्कार मे है जहां संग्रह है, स्मृतियां का, इसके टकराने से उत्पन्न होता है, विकार।
लहरें केवल एक गति है।
प्रश्न ः मस्तिष्क का योग नहीं है ?
स्वामीजी ः प्रत्यक्ष मन, बाह्य मन , मन की दूसरी क्रियाशील परत हमेशा मस्तिष्कसे ही जुड़ी रहती है। मस्तिष्क है, जो इन्द्रियों को जोड़ करके, विषयों का चिन्तन और विषयों का योग कराता है, यह करना काम मस्तिष्क का है। अपना संबंध मन से है, जो मन चिन्तन करता है। मन की जब शक्ति बढ़ती है, स्वाभाविक रूप से मसितष्क भी अधिक क्रियाशील बन जाता है। जिसका मस्तिष्क संतुलित है, उसका शरीर भी स्वस्थ रहने लग जाता है।
प्रश्न ः आपका मन अब कहां रहता है ?
स्वामीजी ः वह तो रहेगा। पर नियंत्रित है। यहां तो संबंध रखता ही नहीं हूं, कोई प्रश्न करता है, तब सक्रियता आती है। इसीलिए सक्रियता नहीं है, जब कोई बाहर से संबंध जुड़ जाता है, तब जुड़ पाता है, नहीं तो टूट गया।
प्रश्न- यह अवस्था क्या है?
स्वामीजी सहज, स्वाभाविक
प्रश्न क्या इसे ही (एन्लाइटेंउ) जाग्रत कह जाता है?
स्वामीजी यह शब्द भी बनाया हुआ है, वह अत्यधिक सामान्य हो जाता है।कुछ भी विशिष्ट नही है। बस सहज। प्रकृति जो कार्य कराना चाहती है, उसकी अंतःप्रेरणा उठती है। नहीं तो शांत। हमेशा एक रस। जब दूसरा ही नहीं रहता, तब? परमहंस ने यही कहा था, वह माॅं मुझे हजारो ंसे मुंह से खिला रही है, इस एक मुंह से नही खाया तो क्या?, वह एक ही रह जाता है। जो आभास है, वही हट जाता है। क्या तुम यह नहीं चाहते हो? जब तक दूसरे के लिए हो, दूसरा है, संसार दुखमय ही रहेगा।
प्रश्न ः अन्तर्मन का स्वरूप ?
स्वामीजी ः सिक्के के दो पहलू होते हैं, वही है। जैसे पानी को ऊपरी सतह और नीचे की सतह होती है, बताओ, इसमें क्या फर्क है ? वह तो समझाने के लिये इन शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है, कोई शब्दों से ही समझना चाहे तो क्या किया जाए। असली बात समझो, शब्दों पर मत जाओ, प्रयोग करो। कब तक पूछते रहोगे?
खोज का प्रारम्भ
स्वामीजी - राजा जनक को सपना आया था,.....वे पलंग पर भोजन कर सुन्दर शैय्या पर विश्राम कर रहे थे। वे स्वप्न में क्या देखते हैं कि वे एक दरिद्र भिखारी हो गए है। भूख लगी है,.....वे भिखारियों की पंक्ति में बैठे है। तभी कोई धक्का देकर बाहर कर देता है। तभी उनकी नींद खुल जाती है। यह सपना था , या सच है? वे तो राजा हैं, वे, यह स्वप्न सबसे पूछते है। पर उत्तर नहीं मिलता। तब अष्टावक्र उन्हें बताते है, राजन, जितना यह सच है। उतना ही वह भी सच है।
प्रश्न ः तो क्या यह जगत असार है, मिथ्या है ......?
स्वामीजी ः आपको क्या लगता है।
प्रश्न ः मुझे तो यह सच ही लगता है ?
स्वामीजी ः और स्वप्न में जो देखा जाता है।
प्रश्न ः वह तो मात्र सपना है, उसका क्या मूल्य है ?
स्वामीजी ः फिर उस सपने में इस दुनिया का क्या मूल्य रहता है? जब आंख बन्द होती है, तब वह सच होता है, जब आंख खुलती है, तब यह सच होता......जितना यह सच है।
उतना ही वह सच है.......अर्थात सभी परिवर्तनशील है, सदा टिकने वाला नहीं है।
प्रश्न ः तो हम क्या है ?
स्वामीजी ः अपने आप से पता करो ....
प्रश्न ः मुझे तो यह पता लगता है, कि मैं यह शरीर हूं।
मेरी आदते हैं, स्वभाव है, रूचियां है, इच्छाएं हैं, मेरे कर्म है, मेरा सम्मान है, मेरी संपत्ति है, यह सब कुछ मेरा है।
स्वामीजी ः यह तो आप नहीं है, इच्छाएं आपकी है, इच्छाएं आप नहीं है, रूचियां आप की हैं, आप रूचि नहीं है, स्मृतियां आपकी हैं, आप स्मृति नहीं है, आप शरीर है, आप शरीर नहीं है। शरीर के माध्यम से आपकी अभिव्यक्ति होती है।
प्रश्न ः तो फिर मैं क्या हूं ?
स्वामीजी ः यही तो आप जानना चाहते हैं, आपको ही पता लगाना होगा, खोज आपको ही करनी है, मेरे बताने से क्या होगा ?
प्रश्न कर्ता ः यह संभव हैं ?
स्वामीजी ः जहां भी आप हैं शुरूआत वहीं से हो सकती है क्रिया में कौन क्रिया कर रहा है, विचारणा में कौन विचार कर रहा है।
स्वप्न में कौन स्वप्न देख रहा है, वह सब में जो एक ही है। वह कौन है? वही एक है। उस एक का पता उसके प्रति होश में आते ही होता है।
प्रश्न कर्ता ः यह कैसे ?
स्वामीजी ः मात्र वर्तमान में रहने से। क्रिया के साथ रहने का जब अभ्यास बढ़ता जाता है। तब जो वर्तमान में रहने नहीं देता जो आका संग्रह है, जा ेआपके बुद्धि विकल्प हैं, जो मन की सहायता से मन ही बनकर आपको दिखता है, आप को बहाकर ले जाता है। वही मन अब,...वह निष्क्रिय होने लगता है। हमने जिन आदतों से, जिन स्मृतियों से, जिन कल्पनाओं से अपने आपको जोड़ रखा उनके महत्ता नहीं पाने से, जो एक वह है, वह प्रकट होने लगता है।
है तो वह पहले से ही , मानो वह स्क्रीन है, जहाॅं चित्र आरहे हैं, जा रहे हैं, चित्रों की इस श्रृंखला में स्क्रीन ही खे जाती है।
प्रश्न कर्ता ः क्या यही अन्तर्मन है ?
स्वामीजी ः शब्द मात्र समझाने के लिए है। वह तो मात्र प्रचन्ड ऊर्जा है। हम जिन अलग-अलग अवस्थाओं में अपने आपको देखते हैं, वहां अनुभवकर्ता वह एक ही होता है। पर होता क्या है, इन तीनों अवस्थाओं में अपने आपको खण्ड-खण्ड देखने का स्वभाव हो गया है। इन तीनों अवस्थाओं में साम्य पाना ही योग है।
प्रश्न कर्ता ः आपने अनन्तयात्रा में यही कहा है ?
स्वामीजी ः हां, सोचा था कथा के माध्यम से लोग सरलता से समझ सकेंगे, इन तीनों अवस्थाओं में समता पाना क्या है ? वह जो अनुभव कर्ता है, उसका अहसास होना ही है। उसके लिए करना यही है कि यहां करना कुछ भी नहीं है। मात्र रहना है रहने से क्या होता है, जो अवास्तविक है, वह हटने लग जाता है, तथा जो वास्तव है, वह प्रकट हो जाता है। समझाने के लिए कहा जाता है कि बाह्मा मन निष्क्रिय हो जाता है। निष्क्रियता से मतलब उसका जो आगे पीछे का भटकाव है। वह दूर होता है। मन तो गति है। उसे तो मात्र बहना है। जब वह बाहर नहीं बहता है, तब उसका बहाव भीतर की और हो जाता है। इन तीनों अवस्थाओं में जो निरन्तरता है, वह मात्र स्मृति के आधार पर ही है। वही यह भ्रम बनाए रखती है कि यही सच है। जब स्मृति से असहयोग होना प्रारम्भ हो जाता है। तभी अनुभव कर्ता, जो सबमें है, और ‘जो है, ’.....उसका अनुभव शेष रह जाता है।
तब जो ‘वास्तव है’ वह प्रकट हो जाता है। वही ‘वास्तव’ है, वही यथार्थ है। उसे मैं आपको दिखा नहीं सकता हूं। पर यह जरूर है, जब जो वास्तव नहीं है, जब वह हटता है, तब जो वास्तव, वह प्रकट होता है उसे ही समझाने के लिए अन्तर्मन कहा है।
पर वहां मात्र गति है। तब मात्र अनुभव ही शेष रह जाता है। समस्त फूलों में जो खुशबू है, जो समस्त रंगो का रंग है, वही एकत्व है। मात्र स्मृति ही पाप है, जो इन तीनो अवस्थाओं, जागृति, स्वप्न और विचारणा को पृथकत्व देती है तथा निरन्तरता बनाए रखती है।
स्मृति का असहयोग ही वर्तमान में रहना है। तब जो मात्र शेष रह जाता है, वह प्रेम ही है। पर यहां उत्सुक तो सभी है, पर पाने कोई नहीं आता है। जब तक स्वार्थ है, तब तक कोई रूपांतरण संभव नहीं है।
उत्सुकता और लगन
प्रश्न ः आपने यह बार बार कहा है कि वर्तमान में रहना ही सरल साधना है, पर हम तो यही जानते हैं कि यही सबसे कठिन है, क्यों ?
स्वामीजी ः इसीलिए कि कभी रहने का अभ्यास ही नहीं रहा...या तो भूत में रहते हैं या भविष्य में अभी यहां बैठे बैठे क्या कर रहे हो, दुनिया भर की बातें...कभी..सोचा है, यहां उनकी क्या जरूरत थी....यहां तो चुप होने आए थे।
प्रश्न ः मै तो यूं ही कह रहा था.....?
स्वामीजी ः पर क्यों...वर्तमान में सजकता है...वहां मूच्र्छा नहीं हैं कभी सोचा है, हमें कभी यह याद भी रहता है, हमने क्या बोला है, इतना अनर्गल बोलते हैं कि क्या उचित है, क्या अनुचित यह ध्यान ही नहीं रहता है।
प्रश्न ः तो फिर चुप रहा जाए.....?
स्वामीजी ः जहां हैं, वहीं पर रहा जाए...जहां जो भी क्रिया हो कैसा भी काम हो, कोई भी काम न तो अच्छा है, न बुरा, न छोटा है, न बड़ा, न घर का काम छोटा है, न माला फिराना बड़ा है, मन को उस काम में अधिक से अधिक रखना चाहिए, किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए और जब कुछ सोच रहे हो तो मन वहीं रहे..... एक ही जगह पर अधिक से अधिक से रहना चाहिए, इससे स्वतः वर्तमान में रहना प्राप्त होता है।
प्रश्न ः क्या ध्यान की जरूरत नहीं हैं ?
स्वामीजी ः ध्यान की बात यहां कहां से आ गई, मैने तो कभी इस शब्द का प्रयोग ही नहीं किया। मैं ध्यान सीखने सिखाने की बात कभी करता ही नहीं। ध्यान का मतलब दस जगह से किसी एक जगह पर आकर मन का रहना होता है। यह स्वाभाविक होना होता है। जहां भी क्रिया होगी, बहिर्मुखी होगी, जो माया में होगी।
प्रश्न ः लोग तो कहते हैं कि ध्यान से बहुत लाभ होता है ?
स्वामीजी ः तो उनसे सीख लो (हंसते हैं) मैं तो नहीं मानता हूं।
प्रश्न ः तो फिर करना कुछ भी नहीं है ?
स्वामीजी ः बिना किए कोई रह सकता है क्या,? जब शरीर प्रकृति ने बनाया है और वह भी निरन्तर क्रियाशील है, तब जो शरीर उसका ही हिस्सा है वह बिना किए कैसे रह सकता है। वह तो कार्य करेगा ही।
प्रकृति कार्य करवाती है, उसे तो मात्र करना है।
प्रश्न ः फिर वर्तमान में रहने से क्या लाभ हुआ ?
स्वामीजी ः लाभ, लाभ यहां कहां से आ गया पहले कार्य हो रहा था, उचित अनुचित का भेद नहीं था। पर अब होश है, जागृति है। सजगता है। जो होना है वही होगा अनावश्यक नहीं होगा।
प्रायः हमारी दिनचर्या क्या है। हम रात- दिन इधर से उधर दौड़ते रहते हैं। चाहा, अनचाहा सोचते है। संकल्प करते हैं काम करते हैं अच्छा है या बुरा कुछ पता नहीं। फिर हाथ में क्या आता है अच्छा है या बुरा कुछ पता नहीं। फिर हाथ में रह जाती है मात्र अशान्ति ही। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही, जिसे छूटना है वह छूटने लग जाता है। यह बोध स्वतः होने लगता है कि यह व्यर्थ है। जैसे वृक्ष के पत्ते झड़ते हैं उसी तरह जो व्यर्थ है वह भी झड़ जाता है। फिर जो स्वाभाविक है वही होने लगता है। अंदर से प्रेरणा आती है अब बाहर का दबाव नहीं होता है।
प्रश्न ः प्रेरणा तो बाहर से आती है ?
स्वामीजी ः क्रिया बाहर घटती है। भीतर से प्रतिक्रिया होती है। मन उस वस्तु, विचार संवेग से त्वरित जुड़ जाता है बार बार चिंतन होते ही अन्न के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण जो उर्जा में बदलते रहते है उनके सहारे यह संवेग एक प्रवाह में बदल जाता है और भीतर चला जाता है। चिन्तन ही संग्रह कत्र्ता है।
जहां संस्कार है वहां तक चला जाता है। वहां बीज है। वहां से अन्तर्मन से उठने वाली लहरों का संस्पर्श होकर संस्कार से विकारों का प्रवाह होता रहता है। मात्र लहरें ही लहरें है। ये लहरें अत्यन्त सूक्ष्म है, चैतन्य स्पंदन हैं। इनका स्थूल रूप विचारणा है जहां बुद्धिचयन करती है। बार बार चिन्तन से फिर संकल्प बन जाता है और वह क्रिया में ढल जाता है। ये दो प्रवाह है। भीतर का बाहर व बाहर का भीतर धन, चक्र वृद्धि ब्याज पाकर बढ़ता रहता चढ़ता है। यही माया है।
विचारणा को आधार भाषा देती है।वाक का विचार से सीधा संबंध है। वाक पर नियंत्रण जरूरी है, इससे विचारणा पर नियंत्रण रहता है।
प्रश्न ः तो फिर क्या किया जाए ?
स्वामीजी ः वर्तमान में रहा जाए। वर्तमान में रहने से नया संग्रह नहीं बनता है वह पुराना खर्च होना शुरू हो जाता है यही स्वभाव है। यही तो हम चाहते हैं तभी शांति प्राप्त होती है। यह मात्र सुनने की बात नहीं है। अमल करने की है। सुनते तो वर्र्षांे से रहे हो पर अगर समझ लिया है तो रहना सीखो। कोरी उत्सुकता से कुछ नहीं होगा।
साधारणता और विशिष्टता
तुम्हारा यह मानना व्यर्थ है कि मैं तुमसे श्रेष्ठ हूं। तुम्हें क्या पता मेरे भीतर क्या हो रहा है। मैने पहले भी कहा है कि विकार अंत तक यथावत रहेंगे बस तुम उनके साथ बहते हो मैं उनसे अप्रभावित हूं।
प्रश्न कर्ता ः यह भेद बहुत बड़ा है हम तो साधारण है और आप असाधारण है ?
स्वामीजी ः पहले भी कहा है, यहां असाधारण कोई नहीं है। जब तक बाह्म की दासता है, गुलामी है विशिष्टता रहेगी। यहां तो जो बाहर का है वह बिल्कुल ही प्रभावित नहीं करता है तब तो मात्र स्वभाव ही रहेगा। विशिष्ट वह है जो दुनिया में कुछ करना चाहता है जिसे दुनिया से कुछ पाना है।
प्रश्न ः बाहर का प्रभाव नहीं पड़ता है ?
स्वामीजी ः पड़ता है, आपने सवाल पूछा है तो उत्तर यहां आया है। एक बार जब कोई पूछता है तब कनेक्शन जुड़ नहीं पाता। पर दुबारा पूछता है तो तत्काल मन जाता है, उत्तर तत्क्षण आ जाता है। सोचना नहीं पड़ता, जो सोचता है वह तो निष्क्रिय है फिर सवाल के बाद कुछ नहीं रहता।
प्रश्न ः तब क्या रहता है ?
स्वामीजी ः मौन
प्रश्न ःऔर ?
स्वामीजी ः वहां कुछ नहीं मात्र प्रेम रहता है। जिसकी पहचान मात्र आकर्षण है, उसकी परिभाषा नहीं है।
प्रश्न ः तो यह संसार किस प्रकार दिखता है ?
स्वामीजी ः जैसे सिनेमा में पर्दे पर लोग आते जाते दिखते है। ये आते है, जाते है। प्रभाव नहीं छोड़ पाते, पर्दा वैसा ही रहता है। कितने रंग आते है।, लड़ाई होती है, मारकाट होती है पर जब तक रील चलती है लगता है सब सच है। पर रील खत्म होते ही पर्दा रह जाता है।
प्रश्न ः यहां पर्दा कहां है ?
स्वामीजी ः चेतना की धारा है, उस पर विचारों की धूल जमा है। यही माया है। यह मन का भटकाव है। जितना यह दूर होता जाता है तुम्हारा दर्पण उतना ही साफ होता जाता है।
प्रश्न ः पर यह तो होता नहीं ?
स्वामीजी ः वर्तमान में रहने से यह होता है। वर्तमान में रहने का अभ्यास जितना होता जाएगा उतनी ही धूल हटती जाएगी।
प्रश्न ः आपने यह कैसे जाना ?
स्वामीजी ः बचपन में इंजीनियर साहब ने बताया था उस पर अमल किया फिर सारी परम्परागत साधना की। धीरे धीरे उसकी व्यर्थता को जाना। फिर जाना रास्ता यही है। फिर जो जाना उस पर अमल किया। पहले भी कहा है यहां जो होना है सौ टका होना है। जो भी जाना गया उस पर मैं अमल करता गया। जब यहां गुरूकुल में आया, तब न तो यहां की भाषा ही आती थी न ही कोई परिचय था पर यह विश्वास था कि जो जाना है उस पर अमल होना है तथा प्रयोग करके देखना है।
प्रश्न ः अमल सौ टका से मतलब क्या है ?
स्वामीजी ः यही जो जाना गया है उसे व्यवहार में लाओ, हम बातें तो बड़ी बड़ी करते हैं पर अमल रत्ती भर भी नहीं करते है। आपका मन तो यहां वहां सब जगह बिखरा हुआ है। क्षण भर भी अपने भीतर नहीं झांक पाते है। हम चाहते क्या है, किस रूप में हम कार्य करते हैं ? हमारा व्यवहार कैसा है। दूसरों को मत देखो, देखना है तो अपने आप को देखो। अपने व्यवहार को देखो, परिधि पर देखना शुरू हो, तो एक दिन केन्द्र तक अवश्य पहुंच जाओगे।
न तो किसी को स्वीकारना है और न ही अस्वीकारना है। यहां देखने का एकमात्र तरीका तटस्थता है। मात्र तटस्थता। यही तितिक्षा है। अप्रभावित होने की क्षमता। तब जो मन है वह सिमटना शुरू होता है। जो अनुभव है, उसकी कोई व्याख्या नहीं होती है। जहां तक शरीर है वहां तक भाषा है। जो शरीर व मन से परे हैं वहां भाषा नहीं जाती है, इतना ही कह सकता हूं मात्र अनुभव है।
मैंने उसे पाया है, तुम भी पास करते हो वहीं शान्ति है, आनन्द है और है समरसता।
प्रश्न ः यहीं तो आप में और हम में भेद हैं ?
स्वामीजी ः (हंसते हुए) यही तो कोई करना नहीं चाहता। यहां करना कुछ भी नहीं है। मात्र रहना है, लहरें आती है, टकराती है पर टकराकर लौट जाती है। वे बहा कर नहीं ले जा पाती, मैं मात्र सजग हूं यही अवेयरनेस कहलाती है। आप जब कि घटनाओं, व्यक्तियों, विचारों से चिपके हुए हैं, बस। वरना आपकी और मेरी आवश्यकताएं एक जैसी ही हैं। कोई अन्तर नहीं है। यहां किसी प्रकार की विशिष्टता नहीं होती है। मात्र जो साधारण है उसका और अधिक साधारण होता जाना है।
खेल खेल में
प्रश्न ः क्या शारीरिक दुःख, मानसिक दुःख जन्म से ही साथ आते हैं?
उत्तर ः हां, वैसे ही शिशु जब माता के गर्भ से बाहर आता है, जब तक अन्दर रहता है माता के विचारों से प्रभावित होता है। बाहर आने के बाद शुरू-शुरू में उसकी स्वतन्त्र शक्ति नहीं होती है। थोड़े समय बाद वह बड़ा होने लगता है उसके अन्दर थोड़ा मन का विकास होना शुरू हो जाता है।
उसका बाह्य सृष्टि से परिचय होता है।
वह सुख दुःख भोगने लग जाता है।
तीन महिने के बाद वह धीरे-धीरे एक-एक चीज को समझने लग जाता है।
पहले जहंा पैदा होते ही उसे कुछ भी ज्ञान नहीं था। आठ दस दिन बाद वह थोड़ा हंसने लगता है, क्रियाएं करने लग जाता है। दो तीन महिने के बाद जब ग्रहण करने की शक्ति प्रारम्भ हो जाती है मन का विकास उतना ही प्रारम्भ हो जाता है।
प्रश्न ः प्रतिभा का विकास कब प्रारम्भ होता है ?
उत्तर ः यह तो अनवरत चलता रहता है। संसार की हर क्रिया अनवरत ही है। बनना, टिकाना और बिगाड़ना यह अनवरत ही है।
हम सोचते हैं, यह रुक सकती है, बदल सकती है, यह मानसिक उहापोह ही है। शरीर भी अनेक रूप धारण करता है फिर जन्म लेता है फिर मरता है, फिर उत्पन्न होता है। वहां यह अलग-अलग तत्व नहीं है और पांच तत्वों की सृष्टि है। इन पंाच तत्वों का अपना कोई गुण नहीं है। वे तो घूमते-घूमते अपने आप ही आकार व गुण ग्रहण करने लग जाते है। बनते जाते हैं, बिगड़ते जाते हैं, स्वयं उनका कोई आकार या गुण नहीं है। वह तो बाद में जब धीरे धीरे मन का विकास होने लग जाता है तो वह प्रकृति में से अच्छा बुरा अपनी कल्पनाओं से यह निर्णय कर लेता है। वह स्वयं अपनी बुद्धि से तैयार करता है। बुद्धि ही संग्रह करती है, वही संस्कार बनाती है।
प्रश्न ः फिर अन्तर क्यों हैं ?
उत्तर ः यह भेद तो प्रकृति का है। कोई बलवान, कोई कमजोर कोई अपंग होता है। यह तो स्वाभाविक क्रिया है। कोई अपंग ही पैदा हो, इसके लिए कोई विशेष अभिप्राय नहीं है। लेकिन समझ होने के बाद जब उस, प्रयत्न और पुरूषार्थ का आभास होने लग जाता है वह प्रयोग कर आगे बढ़ सकता है। सांसारिक सफलता के लिए किया गया प्रयास प्रयत्न कहलाता है। पुरुषार्थ वही है जो अपने आपको जानने के लिए किया जाता है।
प्रश्न ः विकार कब आते है ं?
उत्तर ः विचार ही विकार हैं। विकार मन के साथ ही आते हैं। मन विकारी नहीं है। लेकिन सब जड़ मन ही है। मन में विकार नहीं होंगे तो, वह विषयों के लिए प्रेरित नहीं होगा। विषय भाव है। ये कोई वस्तु नहीं है। आकर्षित करने के लिए सुख दुःख भावनाएं हैं। ये सब इन्द्रियों के कारण से है। इन्द्रियां ही विषयों से जुड़ती हैं। देश, काल और कार्य- कारण का संज्ञान , बुद्धिके साथ ही है। बुद्धि ही चिंतन से बाहर के हर संवेदन को भीतर ले जाती है। जैसे कुम्हार के पास सांचा होता है। उसी प्रकार बु िके अपने सांचे हैं, वहां संग्रह जमा होता रहता है।
प्रश्न ः फिर स्मृति कहां रहती है ?
उत्तर ः स्मृति याने संग्रह वह संस्कार में हैं। स्मृति का संग्रह संस्कार ही है। जैसे जैसे अन्दर से लहरें उठती है, वे टकराती है तो जो एक- दम उभर जाता है, वे हैं वृतियां ।वृतियां जो संग्रह है उसे धक्का देती है, मन ही इस प्रवाह को निरंतर मस्तिष्क से जोड़े रखता है। वह संज्ञान को इन्द्रियों की ओर धकेल देता है। जो विषयों की ओर लालायित रहती है।
प्रश्न ः साधना की अंतिम पहुंच क्या हृदय तक ही है ?
उत्तर ः हृदय से सब सृष्टि का विस्तार है, जाना तो उससे भी परे है। जितने भी साधक है, प्राचीन काल के वे हृदय से नीचे नहीं उतरे हृदय तक को सबने मान लिया।
कोई उत्तर भी। होगा तो उसका प्रमाण नहीं मिलता।
हृदय को सबने मान लिया था इसलिए श्रद्धा भक्ति सब हृदय के विषय है परन्तु जड़ जमीन मंे होती है वह नजर नहीं आती है वही तो जीवन देती है।
प्रश्न ः गुरू का यहां महत्व है ?
उत्तर ः गुरू की कल्पना है, गुणों से भी परे हैं द्वंदों से परे, तीनो गुणों से रहित होना चाहिए। आज जितने भी गुरु हैं।वें गुण और द्वंद से भरे हुए हैं जब तक इनसे परे नहीं आया जावे, तब तक इसका अनुभव नहीं होता। हृदय तक द्वन्द है।
प्रश्न ः मनुष्य जीवन का अभिप्राय क्या है ?
उत्तर ः वह सबके साथ एक साथ जुड़ा हुआ है, फिर भी उसका अस्तित्व है। उसमें उसे रहना है, खाना है, पीना हैं, इन्द्रियां है इन्द्रियों को भोगना है। परन्तु आत्म हत्या नहीं करनी है।
इसलिए संसार से जुड़े रहते हुए व्यवहार करना है। तथा यह ध्यान रखना है कि हमारे इसमें बाधा नहीं पड़े। सुख शांति बनी रहे। मनुष्य को पुरूषार्थ जन्म से ही प्राप्त है। यहां जन्म होने के बाद जैसे जैसे विषयों को पकड़ने लगता है उसे अनुकूल वातावरण एक तरफ तथा प्रयास दूसरी तरफ मिलते है। कुछ को अनुकूल साधन मिलते हैं, वहां पुरूषार्थ नहीं होता। कहीं पुरुषार्थ होता है तो साधन नहीं मिलता। हां, पर देखा गया है कि जहां पुरूषार्थ है, वहां साधन प्रकृति स्वयं उपलब्ध करा देती है। परन्तु जहां मात्र साधन है वहां पुरूषार्थ नहीं है तो साधन कुछ भी नहीं कर पाते है। मनुष्य में आवश्यकता दोनों की ही है। समाज व्यवस्था जैसी है, वैसी ही चलती रहती है। बाहर इसमे गड़बड़ी नहीं करती है।तटस्थता से देखना है, यह आवश्यक होगा कि प्रेरणा अपने आप आए वही करना है। जो गलत होगा, वहां अन्दर से प्रेरणा होगी, वह अपने आप छूट जाएगा। फिर धीरे धीरे पहचान होने लगती है कि किस प्रकार व्यवहार करना है, ऐसा व्यक्ति जीवन की छोटी से छोटी बात के प्रति भी सावधान रहता है। सजग रहता है। सतर्क रहता है। वह बिगाड़ नहीं होने देता। हालांकि वह जानता है कि हर चीज बिगड़ेगी ही पर जहां तक उसका संबंध है वह हर चीज की रक्षा करेगा। परन्तु उसकी आसक्ति उसमें नहीं होगी। लेकिन वह अपने व्यवहार से या किसी प्रकार से उसमें व्यवधान नहीं आने देगा। अपना जो कार्य है वह अच्छी तरह से करेगा परन्तु दूसरे के कार्य में बाधा नहीं पहुंचे, इसका ध्यान रहेगा।
सहज समाधि भली
प्रश्न ः क्या समाधि का कोई महत्व है ?
उत्तर ः जैसे कर्मकाण्ड से साधना नहीं हो सकती। उपासना से साधना नहीं हो सकती। ये तरीके है जिन्होंने इनको ठीक समझा, उन्होंने अपनी अपनी तरफ से उनका तरीका ढूंढ लिया। परन्तु समाधि नाम की स्थिति का कोई महत्व नहीं है। वह तो पत्थर बनना है, हम तो बराबर सक्रिय रहना चाहते है। संसार का चैबीस घंटे का जो क्रिया कलाप है, उसमें यथायोग्य सहयोग देना है। उससे अलग छिटक कर पत्थर हो जाना नहीं है।
समाधि शब्द साधना में नहीं आता है। यह शब्द योगिक है, उसमें वृत्तियों को जड़ करना, निश्चल करना होता है।
शरीर को भी आसन लगाकर रखना है, यह जो सब बातें हैं, यह साधना नहीं है। जहां करने का सवाल आता है, वही वह असाधन हो जाता है।
यहां स्वाभाविक स्थिति में रहना है। समाधि लगाने के लिए प्रयास करना होता है। याने वो मायावी क्रिया होगी।
माया में बहना है। समाधि अवस्था है ही नहीं। समाधि याने वह पत्थर बन गया। यह संसार निरन्तर परिवर्तनशील और गतिशील है। समाधि के लिए आसन लगाकर बैठो, ध्यान लगाओं और समाधि में प्रविष्ठ हो जाओ। इस साधना में समाधि को मान्यता नहीं है। मॅं यह शुरू से ही कह रहा हूं -
समाधि के लिए जो भी क्रिया की जावेगी, माया के अन्दर ही होगी। बैठना, ध्यान लगाना, सभी माया में होगा। इसीलिए हमारा व्यवहार स्वाभाविक रहे, यह ध्यान रखना है। यह तो यौगिक, हठयौगिक क्रियाएं हैं, समाधि के लिए ध्यान धारणा.....। पहले ध्यान लगाओ, धारणा रखिए फिर समाधि में पहुंचों ये क्रियाएं हैं, उससे जुड़ी हुयी। परन्तु यहां क्रियाएं नाम की कोई चीज नहीं है।
प्रश्न ः क्या यही सहज समाधि है ?
उत्तर ः हां। इसे सहज समाधि क्यों माना है। इसमें वो क्रियाएं नहीं है। इसमें यौगिक क्रियाएं के द्वारा जो समाधि है, उसे संत कबीर ने नहीं माना है। सहज माने स्वाभाविक।
स्वाभाविक का मतलब होता है, शरीर को सक्रिय रखना है जब तक वह जीवित है। यदि वह सोता रहेगा तो भी सजग रहेगा और मन निष्क्रिय रहेगा। यही स्वाभाविक स्थिति है।
यही सहज समाधि है। यहां साधना में क्रिया नहीं आती है।
क्रिया का यहां कोई महत्व नहीं है। जो स्वाभाविक क्रिया चल रही है वहां आती है, वही यहां होती है। मनुष्य जो अपने आपको अलग मानकर जो क्रिया करता है उसके लिए यहां कोई स्थान नहीं है। बाहर क्रिया करने के लिए मन चाहिए।
यहां बाहर के लिए कोई जगह नहीं है।
प्रश्न ः पर यह संभव कैसे होगा ? मन भीतर कैसे आएगा ?
उत्तर ः कैसे लाना, बाहर से सब वृत्तियों को जो विषयों से जुड़ी हुई है, उनसे अलग करके। वो अलग होता है चिन्तन न करने से।
चिन्तन होता है, मन के द्वारा। इन्द्रियां विषयों को भोगती है, लेकिन इन्द्रियां मन से जुड़ी हुयी है। मन जब धीरे धीरे विचार रहित स्थिति में आ जाता है, तब स्थिर होता है।
तब उसका संबंध इन्द्रियों से विषयों से छूट जाता है। विषयों से इन्द्रियां जब संबंध तोड़ लेगी, तब मन से भी टूटेगा। मन से संबंध जुड़ता है, वृत्तियों के उठने से, मन में जो वृत्तियां उठती है, वे विषयों के लिए प्रेरित करती है। वृत्तियों को न उठने देना है। चित्त वृत्तियों का निरोध योग है। चित्त के अन्दर, मन के अन्दर उठने वाली वृत्तियों का निरोध। निरोध रोकने से, जबर्दस्ती से नहीं होगा।
उसके लिए प्रारम्भिक कुछ प्रयास है, वह है उसके उपर निगरानी रखना। वृत्तियां जो उठ रही है, उन्हें देखा करो। वह देखने से मन में वृत्तियां उठना अपने आप समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो स्थिति आती है सहज समाधि कहो, चाहे जीवन मुक्त अवस्था कहो। चाहे कुछ भी नाम दे दो। यही खास महत्व की बात है। इसका लंबा चैड़ा जो कथन होता है, उसकी जरूरत नहीं है।
मरना और मरना
प्रश्न ः मृत्यु के नाम से ही भय उपस्थिति हो जाता है, क्या वास्तव में मृत्यु दुःखदायी है ?
उत्तर ः स्वप्न में कई बार-बाहर की एक भी चीज की स्मृति नहीं रहती। दूसरी दुनिया में चले जाते है, वहां का अनुभव होता है। यहां का छूट जाता है। वहां से नया संबंध मिल जाता है।
इसी प्रकार आंखे खुलने के बाद स्वप्न का सब छूट जाता है। स्वप्न से जागृत अवस्था में आने पर क्या कोई दुःख का अनुभव होता है ? उस वक्त क्षण भर भी दुःख नहीं होता। हां, इतना अन्तर अवश्य होता है कि यह संसार जिसे हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं आंखे खुलने के बाद वही वही चीजें सामने आती है, जबकि स्वप्न में बदलती रहती है।
यदि अन्तिम समय बीमारी में बीत जाता है, एक्सीडेन्ट हुआ है, उस समय कोई बिस्तर पर है, तो वह दुःख का अनुभव करता है। यदि तुरन्त मृत्यु हो जाए तो उसका कोई दुःख अनुभव नहीं होता। जैसे आंखे खुलते ही स्वप्न टूट जाता है। वहां मृत्यु के बाद कोई दुःख नहीं होता है...यह जो कहा जाता है कि मृत्यु के समय इतनी कठिनाई होती है, पीड़ा होती है, ये कल्पनाएं गलत है। हां बीमारी मे तो शरीर दुःख भोगता है। पर बाद में नहीं होता।
हम मर रहे हैं, कट रहे हैं, इसकी जानकारी नहीं होती है। जब तक जानकारी है, तभी दुःख होता है। परन्तु दुःख, वह तो मानसिक है, क्योंकि वह छोड़ना नहीं चाहता। गरीब से गरीब आदमी भी अपने परिवार, सम्पत्ति, किसी भी चीज को छोड़ना नहीं चाहता। आसक्ति के कारण से ही दुःख है।
प्रश्न ः क्या यहां दुःख नहीं है ?
उत्तर ः वही स्थिति है।
जब किसी को आपरेशन के समय बेहोश किया जाता है, शल्य क्रिया की जाती है, तो उसे मालूम नहीं होता। उसका नाड़ी संस्थान सुन्न हो जाता है। कई बार एक्सीडेन्ट में आदमी बेहोश हो जाता है, उस अवस्था में मृत्यु हो जाएगी तो पता भी नहीं लगता, मृत्यु एक सुखद स्थिति है। परन्तु यहां से छोड़ा नहीं जाता, जैसे किसी अच्छे घर में जाना हो और वहां सारी सुविधाएं मिले तो उसको छोड़ते समय दुःख होता है।
परन्तु अगर आसक्ति नहीं है, तो वह छोड़कर चल देगा। हमारी आसक्तियां दुःखदायी है। आसक्तियां जुड़ी है, इन्द्रियों के द्वारा। इन्द्रियों से मन के द्वारा।
यदि मन वर्तमान में रहता है तो उसका संबंध उस विषय में ही रहेगा जिससे काम है। जैसे मैं बोल रहा हूं तो मेरा केवल एक ही इन्द्रिय से संबंध जुड़ा हुआ है। मुझे प्रवचन के समय एक भी आदमी नजर नहीं आता आंखे खुली रहती है। बिल्कुल सामने कोई है भी नजर नहीं आता।
आपने देखा होेगा चाय सामने आती है। जब आप प्याले में भरते हैं पता नहीं होता।आंखे देखती है तब भी नहीं। जब आप कहते हैं, चाय ले लो, तब हाथ बढ़ जाता है। हां, यह जरूर है, आज से साल भर पहले यह स्थिति नहीं थी - कारण है - इन्द्रियों से संबंध छूटने लग जाता है। वह इसी प्रकार हटता जाना है। इसी प्रकार जब पांचों इन्द्रियों से संबंध छूट जाता है तो कहा जाता है कि मन बिल्कुल निष्क्रिय हो गया है।
प्रश्न ः क्या यही ब्राह्मी स्थिति है ?
उत्तर ः हां,
जैसे आपने पूछा - तो आवाज अन्दर गई। कोई प्रश्न पूछता है तो पूछना पड़ता है, क्योंकि संबंध टूटा हुआ है। कई बार तो दो दो बाद पूछना पड़ता है, क्या पूछा है। वह मतलब नहीं है कि कान में डिफेक्ट है पर संबंध टूटा हुआ है।
साधना का अर्थ यह है कि इन्द्रियों का संबंध विषयों से जो चैबीस घंटे जुड़ा रहता है, तोड़कर रखना है। डिसकनेक्ट किया जाए। जहां जिस समय जिसकी आवश्यकता है, वहीं संबंध जोड़ा जाए। यही वर्तमान में रहने की स्थिति है। इस अभ्यास से दुःख किसी प्रकार का नहंी होता। हां, शारीरिक प्रकार का कष्ट आना यह तो स्वाभाविक बात है। हां, ऐसे दुःखों में जहां और लोग, बहुत विचलित हो जाते हैं, इस स्थिति में वह नहीं होगा। दुःख है तो शरीर को, वहां तटस्थता की दृष्टि रहेगी। यह स्थिति वहां होती है, जो कहा जाता है कि एक कपड़ा उतारकर, दूसरा कपड़ा पहनने जैसा कहा जाता है।
प्रश्न ः क्या आपको मृत्यु का अनुभव हुआ है ?
उत्तर ः हां,
मेरी मां का स्वर्गवास जब हुआ तब मैं दूर था। उसके आधा घंटे बाद घर पहुंचा। वह पलंग पर लेटी थी। जब हाथ रखा तो पाया शरीर गर्म था। आंखे खुली हुई थी। मैने आवाज दी, हाथ हिलाया।
तब भाभी जी पास बैठी थी, उन्होंने कहा - यह तो मर चुकी है।
तब ध्यान में आया था - मैं अगर पास होता, तब पता लगता कि अंतिम घड़ी कैसे आती है ? यह अनुभव संपतराज की मृत्यु के समय हुआ था। यानी वो बोल रहे थे। बोलते बोलते रूक गए, और वो गिरे....उनका सिर मेरी गोदी में था। उन्होंने दो तीन बार गहरी सांस ली। उसी स्थिति में उनका देहान्त हो गया। वह जो मेरा संकल्प था कि मैं अगर मां की मृत्यु के समय होता तो उस स्थिति का अनुभव करता...वह मुझे हुआ।
तुकाराम का अभंग है.....‘अपुले मारण पहले में डुआ’ अपनी आंखों से मैने अपनी मृत्यु को देखा। हमारी जिन्दगी किससे है इन्द्रियों और विषयों के संयोग से है। अपनी जीवित अवस्था में ही इन्द्रियों और विषयों से संबंध छूट जाता है तो वही मृत्यु है.....तो इसका प्रत्यक्ष मैने वहां देखा। किस प्रकार उन्होंने संबंध तोड़ा।
प्रश्न ः क्या निर्विचार स्थिति में यह अनुभव है ?
उत्तर ः उसी में मृत्यु का अनुभव है। इसीलिए जो मरने से डरते हैं, जो अगर इस स्थिति का साक्षात्कार कर लें तो उन्हें कोई भय नहीं होगा। मृत्यु में यही भावना रहती है कि यह जो अपना है छूट जाएगा...क्योंकि आसक्ति निज से नहीं, दूसरे से होती है। दूसरे में होती है।
प्रश्न ः उसके लिए क्या किया जाए ?
उत्तर ः हां, बचने का एक ही उपाय है।
वर्तमान में रहना, इससे प्रेम तो कम नहीं होगा, हां आसक्ति अवश्य कम हो जाएगी।
जो मेरे परिचित है, उनके प्रति मेरे प्रेम मे तो किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है, वह तो निरन्तर एक जैसा है। हां, आसक्ति का अभाव है। प्रेम और आसक्ति में अन्तर है। आसक्ति विषयों के रूप में होती है। मोह स्वार्थी होता है। हम दुःखी नहीं हो इसीलिए दूसरे को दुःखी नहीं देखना चाहते।
व्यवहारिक प्रेम, वह इन दोनो से श्रेष्ठ है। वास्तविक प्रेम जिसे आकर्षण कहा जाता है। जिसे अंग्रेजी में ”गाड इज लव” कहते है। यहां तो प्रेम के लिए प्रेम है। इसमें किसी प्रकार की किसी से अपेक्षा नहीं होती है। केवल त्याग की भावना होती है। यह भौतिक वस्तुओं का भी त्याग कर देता है। यदि उसके पास होती है। वह अपनी आध्यात्मिक साधना का भी त्याग कर सकता है। यही सच्ची साधना है।
वर्तमान में रहने से हमारी पांचों इन्द्रियों को ट्रेनिंग मिल जाती है। जिस समय जिस विषय में हमें रहना है, उसी में जुड़े रहो फिर वो कार्य अच्छा है या बुरा यह संबंध नहीं है। कुछ को व्यवहार में अच्छा माना है, कुछ को बुरा माना है। वर्तमान में रहने से अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं होता। क्षण भर बाद कुछ भी याद नहीं रहता। स्मृति ही पाप है। अच्छे कार्य की भी याद आती है तो वहां भी स्मृति है वह भी पाप है जब जब भी मौका आएगा,..... स्मृति उसे कार्य को करने के लिए प्रेरित करेगी, उलझाती रहेगी। अच्छे कार्य करने की आसक्ति भी बुरी है। कोई अच्छा कार्य करता है तो तारीफ होती है, उससे अंहभाव जगता है। आसक्ति दृढ़ हो जाती है हम बार-बार उसी कार्य को करने के लिए प्रेरित होते हैं।
इन्द्रियां उसी में उलझती रहती हंै।
मै यह नहीं कहता कि अच्छा काम मत करो.....पर उसका भान नहीं रहे,.....उसे स्मृति का हिस्सा मत बनने दो।
व्यवहारिक दृष्टि से पाप और पुण्य को माना जाता है, पर आध्यात्मिक दृष्टि से एक ही समान है।
अच्छे कार्य की भी आसक्ति बुरी है। आसक्तियां, अच्छे कार्य का र्भी अिभमान पैदा कर देती है।
इन दोनों स्थितियों से परे होना है......परे जाना है।
प्रश्न ः प्रेम और काम में क्या संबंध है ? क्या विकारों से छुटकारा पाया जा सकता है ?
स्वामीजी ः प्रेम जो है सबसे श्रेष्ठ है परमात्मा का स्वरूप है।
वो जैसे चुम्बक का गुण है। वह लोहे को खींचता है, परन्तु चुम्बक वास्तव में लोहे को खींचता नहीं है।
परन्तु वह तो यहां उत्तरी ध्रुव है, जो वहां दक्षिणी ध्रुव को तैयार कर उसे खींचता है। इसीलिए लोहा खींचा जाता है।
यदि दक्षिणी ध्रुव नहीं हो तो वह नहीं खींच सकता।
यदि अपने में प्रेम है तो हम प्रेम के आधार पर खींच सकते हैं काम और प्रेम में अटूट संबंध है।हां काम विपरीत काम को ही खींचता है। खींच सकता है। यह स्वाभाविक क्रिया है। निरन्तर होने वाली क्रिया है। अपने में वासनाएं तो कम हो सकती है। पर अंतिम समय तक स्वाद और सैक्स इनसे कोई छुटकारा नहीं पा
सकता। इससे बचने के लिए एक ही स्थिति है। ‘तान तितिशस्व भारत’ अर्जुन से भी यही कहा है - इसे सहन करो। उससे यह नहीं कहा कि छुटकारा पाओ। तुम उसे सहन करो। उस वेग को सहन करो। इस संसार में रहकर के, वृत्तियों के जो आघात हैं, वे अनिवार्य है। इन्द्रियां भी कमजोर है। और लहरों के आघात विश्वव्यापी है। प्रतिक्षण उठने वाली लहरें। अनवरत धक्का दे रही है और उन्हें उभार रही है जिसमे जितनी क्षमता है वह उतना ही भोगता है।
एक ही बात अनेकों को अनेक प्रकार से विचलित करती है। ये लहरें अनवरत प्रेरित करती है। ये लहरें काम, क्रोध.....आदि विकारों को प्रतिक्षण धक्का दे रही है। यह तो अनादिकाल से चला आ रहा है। हमें उन्हें सहन करने की शक्ति बढ़ाना चाहिए। यह चाहो कि उन्हे छोड़ दो वह नहीं छूट सकते क्यांेकि हम पृथक नहीं है। सबसे जुड़े हुए हैं। इसी तरह से जो अपनी सहन शक्ति है, उसे बढ़ाना है।
इसीलिए मैं बार बार यही कहता हूं कि वर्तमान में रहने से जो लाभ होता है वह यह है कि शारीरिक और मानसिक सहनशीलता बढ़ जाती है। इससे शांति मिलती है। विकारों से धीरे धीरे छुटकारा पाया जा सकता है।
लहरें.....नाभि पर टकराने वाली लहरें अनवरत टकरा रही है। एक लहर आती है। क्रोध जगाती है, दूसरी मोह की, तीसरी लोभ की, अनवरत उठ रही है। एक के बाद एक लहरें निरन्तर उठती रहती है। और हरेक की नाभि से टकराती है। वहीं से वृत्तियां जगती है। जब क्रोध की लहर टकराती है तो लाखों करोड़ों विकार को एक साथ उछालती है। हम अपने आपको अलग शरीर मानते हैं। पर वहां तो पूरी सृष्टि ही एक है।
जैसे हमारे शरीर में, खून के रक्ताणु विद्यमान हैं वे अलग अलग हैं पर सब मिलकर, एक हो जाते है।
एक इंच में दो लाख होते हैं....ऐसा बताते है। प्रत्येक कीटाणु एक स्वतन्त्र जीव है। परन्तु शरीर में है,.....तो शरीर एक ही है इसीलिए यह सृष्टि एक ही है। इन सबको पोषण वहीं से मिलता है। उसी के कारण से हम इसे अलग समझते है। जिस प्रकार शरीर में बुखार हो जावे जहर फैल जावे तो पूरे शरीर पर एक साथ प्रभाव होता है। तो जो भी लहरें टकराती है हमारे अन्दर उनका प्रभाव एक साथ होता है। एक साथ विकारों को जागृत करती है वो तो जिनके और जितनी भावना होती है, इतना उन्हें प्रभावित करती है।
प्रश्न ः और जहां विकार नहीं है ?
उत्तर ः वहां लहरें उठती रहेगी,..... टकराएगी,.....और टकरा टकराकर लौटत.....रहेगी.....रहेगी तितिक्षा,.....सहनशीलता।
स्वप्न और विचारणा
प्रश्न ः क्या यह सच है कि विचार ही ”जो” शुद्ध आता है उसे प्रदूषित कर देता है ?
स्वामीजी ः हाँ,
वर्तमान में रहने से विचार बाधा नहीं डालते। विचार अच्छे हों या बुरे दोनों बाधक बन जाते है। समाज ने माना है कि अच्छे विचार अच्छे हैं उनसे कल्याण होता है। लेकिन यहां ऐसा नहीं है, उल्टा होता है। जहां अच्छे आवेंगे वहां बुरे भी आवेंगे, वे भी उसी की छाया है इसीलिए दोनों से परे ही जाना है। दोनो से परे होकर ही जीवन जीना है।
प्रश्न ः स्वप्न से अनुभव होता है कि कितना संग्रह एकत्रित कर रखा है इसको कम करने का कोई साधन भी है ? हृदय में कचरा ही कचरा है।
वामीजी ः हमने अपने हृदय को बहुत संकुचित माना है, यह मेरा ही हृदय है, पर ऐसा नहीं है। यह ह्नदय उस विशाल हृदय से जुड़ा हुआ भी तो है। हृदय को हमने शरीर की एक छोटी सी इकाई माना है, पर ऐसी बात नहीं है। जैसा मन हमारा सभी से जुड़ा हुआ है, शरीर संसार से जुड़ा है, हमने हृदय को छोटा माना है जबकि वह जुड़ा हुआ है। कई बार स्वप्न में ऐसा कुछ देखते हैं कि जिसकी कल्पना भी नहीं है कि सोचा भी नहीं था, हृदय जो तुम्हारा छोटा है, वह ऐसा नहीं है वहां वह उस विराट से जुड़ा हुआ है। वह भी तो तुम्हारा ही तो अनुभव है। इससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है। वर्तमान में रहो। दूसरे व्यक्ति के अनुभव भी हमारे ही अनुभव हैं हम पृथक किसी से कहीं पर भी नहीं है।
शरीर से पृथ्वी तत्व से जुड़े हैं मन से मन के स्तर पर जुड़े हैं, हृदय से हृदय के स्तर पर जुडे है। इसीलिए होना यही चाहिए-हम इकाई हैं या जुड़े हुए इसकी गहराई में न जाकर अपने ह्नदय को ही शुद्ध करने का प्रयास होना चाहिए। बस धीरे-धीरे उस संग्रह से संबंध अपना कम होता जाता है।
प्रश्न ः कभी-कभी लगता है, इतना क्रोध इतना आवेश,.....जिसकी हमें जागृत में पहचान भी नहीं होती है,.....स्वप्न में फूट पड़ता है।
स्वामीजी ः आदत पड़ चुकी है। कभी कोई बात ऐसी होती है कि सुनते ही क्रोध आ जाता है। किसी के प्रति घृणा पैदा हो जाती है। ईष्र्या पैदा होती है। आदत पड़ी हुई है। यहां तक कि जिससे हमारा मतलब भी नहीं है। उसकी भी बाते चलते ही आवेश आ जाता है। कभी सोचा है। क्या जरूरत पड़ी थी पर आदत जो पड़ी हुयी है। वह मजबूत है। इसीलिए कहते है कि एक तो कम बोलो, कम सोचों, इससे जो गलत होता है, जो संग्रह बनता है उससे तुम जुड़े नहीं रहोगे।
प्रश्न ः क्या स्वप्न से सहायता मिलती है ?
स्वामीजी ः हां, संग्रह कम होने लगता है, तब स्वप्नों की संख्या कम पड़ने लग जाती है। फिर बाद मैं जैसा मे कहता हूं सोचो जो सोचोगे उसी का स्वप्न आएगा। इसका मतलब यही होता है कि वहां संग्रह रहा ही नहीं। आपने सोचकर पैदा किया उसी के संबंध में वह सामने आएगा उसका तारतम्य क्या है।
संबंध क्या है, वह समझ में आ जाएगा। कभी किसी चीज का मार्गदर्शन चाहिए तो वह प्राप्त हो जाएगा आप इससे अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न ः यहां यह साधना क्या वेदान्त के आधार पर है ?
पूज्य स्वामीजी ः हां, पहले जो दर्शन की विभिन्न शाखाएं थी....वे पीछे छूटती चली गयी। हां, वेदान्त चिन्तन ही आगे बढ़ता हुआ यहां तक आया है।
वही शक्ति सब का आधार है। चाहे अनवरत कहिए। वही सबको बनाती बिगाड़ती है। स्वतन्त्र अस्तित्व पंच महाभूतों का नहीं है। वह उसी शक्ति से बने है।
प्रश्न ः दुःख से मुक्ति का क्या उपाय है ?
पूज्य स्वामीजी ः दुःख,?
जब तक शरीर है भोगना ही पड़ेगा, इसीलिए आसक्ति से मत भोगों, अनासक्ति से भोगो। यह आने जाने वाले है उन्हे सहन करो वो रहेगे तो सही, तुम्हें सहन करना है प्रतिकार नहीं करना है हटाने का, बदलने का प्रयास नहीं करना है धक्के तो लगेंगे, उन्हें सहन करना है। दुःख से मुक्ति का उपाय मात्र सहनशीलता ही है। इससे दुःख सुख में परिवर्तित हो जाता है। वह उसे विचलित नहीं होता। संसार में रहना है तो सब आऐंगे ही। नाश किसी चीज का नहीं होता। इसीलिए मनुष्य का अधिकार, मात्र जीने का है। सुख शांति से जीए बस इतना ही, प्रकृति के आगे किसी का कोई अधिकार नहीं है।
प्रश्न ः स्वप्न निद्रा, जाग्रत क्या हम तीनों अवस्थाओं की एक ही अनुभूति पा सकते हैं ?
पूज्य स्वामीजी ः साधारण अवस्था में नहीं होती।
क्योंकि हम अपने आपको सम्भाल नहीं पाते, इतने अधिक डूबे हुए हैं कि तीनो मे एक अनुभूति एक साथ नहीं कर पाते है। जागृत अवस्था मे स्वप्न झूठा मालूम होता है, स्वप्न अवस्था में भास नहीं होता। यह इसलिए होता है कि संग्रह का हृदय में इतना दबाव होता है कि इससे छुटकारा नहीं होता है।
प्रश्न ः क्या आपकी अनुभूति एक सी सदा रहती है ?
पूज्य स्वामीजी ः हाँ,
परन्तु जिस समय स्चप्न आता है, उसी समय मालूम होता है फिर मालूम नहीं पड़ता। कोई निद्रा में जरा सा खटका होता है तुरन्त नींद खुल जाती है, मन सचेत हो जाता है, यह अनुभव की बात है। इससे सच्ची शांति मिलती है। अनुभूति होती है, वर्णन करने के लिए यहां कुछ नहीं है, भाषा आपके पास है, आप जो चाहें शब्द दे दें, लहरें जो उठती है.....नाभि पर आकर टकराती है। वहां गति है आगे लहरें नहीं है, नाभि के आगे लहरें नहीं हैं मात्र मन की गति है, यह मेरा अनुभव है, जो ठोस है, वर्षों के प्रयास का अनुभव है।
प्रश्न ः स्वप्न जो उठते हैं ? क्या कारण है ?
पूज्य स्वामीजी ः वो हृदय से उठ रहे हैं वो हृदय का प्रतिलम्ब है। वो जो संग्रह है उसको धक्के लग जाते है। वह उफान खाकर ऊपर आता है।
वो जो संग्रह है, उसमे नियमितता नहीं है। कोई कहां पड़ा था,.....कोई कहां रखा था। उसमें जो जिसको जिस तरह का मौका मिलता है, वह एक दम उपर आ जाता है। इसीलिए स्वप्न में कोई संगति नहीं होती है। जैसे कोई चलते-चलते गाड़ी में बैठ जाता है, फिर उड़ने लग जाता है। जैसे संसार में एक नियमितता नजर आती है। स्वप्न सृष्टि में नियमितता नजर नहीं आती है। क्योंकि स्मृतियां ऊटपटांग पड़ी है, पहले उन्हें नियमित करना होता है, नियमित होने के बाद धीरे-धीरे स्वप्न सृष्टि में,..... कि यह स्वप्न कैसे प्रारम्भ होता है, कैसे समाप्त होता है,यह पता लगने लग जाता है। इससे मार्गदर्शन मिल सकता है। इसके लिए स्वयं को तैयार करना होता है। इससे बाद में भविष्य का भान होना, आभास होना, प्रेरणा मिलनी शुरू हो जाती है।
प्रश्न ः इन्हें नियमित कैसे करें ?
पूज्य स्वामीजी ः वो ही पहले विचारों को नियमित करना होता है पहले विचार कम करते जाओ निगरानी करते-करते,स्वप्न स्वतः कम....होते चले जाते है।
प्रश्न ः आपको अब स्वप्न नहीं आते ?
पूज्य स्वामीजी ः स्वप्न आते ही नहीं। एक ही निद्रा आती है। क्योंकि चिंतनके लिए क्रिया है ही नहीं। एक दम नींद आ जाती है फिर दो बजे की आवाज सुनता हूं। इसके बाद नींद नहीं आती है सोने के बाद पता ही नहीं चलता कई बार तो लगता है कि अभी सोया था दो कैसे बज गए।
प्रश्न ः स्वप्न रंगीन भी तो आते हैं ?
पूज्य स्वामीजी ः कोई खास मतलब तो है नहीं, जैसे रंग देखते हैं, वैसे ही दिखते हैं। हां शुरू-शुरू में नहीं दिखते। कभी तो गहरे रंग नजर आते हैं रंगीन दिखते है इसका मतलब है कि विचारों की संगति बढ़ती जा रही है। विचार नियमित होने लग गए है।
प्रश्न ः विचार कम होने लगे हैं, यह स्वप्न से पता लग जाता है ?
पूज्य स्वामीजी ः हां, स्वप्न कम आवेंगे। नाद स्पष्ट सुनाई देगा। उसकी निरंतरता लम्बे समय तक बनी रहेगी। हां, उसके अनुसार विचारधारा बननी चाहिए परन्तु उसके लिए आवश्यक है कि व्यवहार में भी सुधार होना जरूरी है।
आत्मकृपा
प्रश्न कर्ता ः मुझे तो यही पता है कि मेरे जीवन में दुःख और भय है, क्या इस प्रकार का जीवन भी संभव है जहां न दुःख हो न भय हो ?
पूज्य स्वामीजी ः हां,
प्रश्न कर्ता ः वह कैसे ?
पूज्य स्वामीजी ः दुःख क्या है पहले पता करो। जो कामना है उसकी पूर्ति न होना ही दुःख है। शारीरिक तकलीफ भी है, आर्थिक भी है। यह अभाव है। भय क्या है ? भय मात्र असुरक्षा ही है। जो है वह छिन न जाए। सबसे बड़ा भय मृत्यु का है, वह जीवन जो है उसको उसी रूप में स्वीकार न कर किसी एक विशिष्ट प्रकार के रहने पर ही तनाव होता है। उसकेे हटने में दुःख होता है। और जब तक यह छिन नहीं जाता, छूट नहीं जाता भय होता है। हां, जीवन जिस रूप में आया है उसे भोगना है, भागना नहीं। जो घट रहा है यह आप नहीं है जो दिख रहा है वह भी आप नहीं है। जब जो देख रहा है वह निर्मल होता जाता है, अप्रभावित होता जाता है तब जो ”वास्तव” है, वही प्रकट होता है अभी वहां न दुःख है न भय है।
प्रश्नकर्ता ः मैं समझा नहीं....मन जो है वह तो सदा अशांत और चंचल रहता है ?
पूज्यस्वामीजी ः वह तो झुंड है बादलों का वह जो ”वास्तव” है उसे ढककर रखता है। उसका हटना ही तो मन की निष्क्रियता है तब शरीर के साथ मन भी शक्तिशाली हो जाता है क्योंकि जो ”वास्तव“ है तब उसका नियन्त्रण होता है।
प्रश्नकर्ता ः पर क्या यह संभव है ?
पूज्यस्वामीजी ः हां क्यों नहीं ”वर्तमान में रहना“, यही तो है। यहां एक भी घटना अपनी निरंतरता में नहीं है। घटना से घटना पैदा नहीं होती। विचारों को तटस्थता से देखो। विचारणा के छोर पर जो अखिरी विचार है, वहां अगर देखने की क्षमता आ जाए तो वह अगले विचारों को पैदा करने में असमर्थ हो जाता है। वहां मात्र खालीपन आ जाता है। जो वास्तव है। वहीं द्वार है। तब जाना जाता है यहां न स्मृति का दबाव है, न भविष्य की कामना है। वर्तमान अपने आप में अनूठा क्षण है। यही वास्तव है। हम पुरानी बातों को याद करते हैं, जब करते है तो वे वर्तमान में आती है सहारा दिया तो ठहरती है। वरना चली जाती है। इन बुद्धि गत विकल्पों को सहारा मन देता है। वर्तमान में इस मन का सहारा नहीं होता मात्र क्रिया होती है। कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।
प्रश्न ः क्या यह व्यवहारिक जीवन में संभव है ?
पूज्य स्वामीजी ः हां, क्यांे नहीं, जब मैने किया है तो संभव है। यहां गुरूकुल में अठारह अठारह घंटे कार्य किया। छात्रों को पढ़ाया, निर्माण कार्य किया। पर जब कुटिया में आकर सोया तो कुछ याद नहीं कोई स्वप्न तक नहीं। कोरी सलेट की तरह यही है। यहां मन का सहारा नहीं है। क्रिया को स्मृति का अंग नहीं बनने देना है। यह होता है अनावश्यक चिंतन से। क्रिया में पूर्ण सजगता न होने से। सुख की स्मृति ही कामना पैदा करती है और दुःख की स्मृति भय। इसीलिए कहा है, यहां पाप ही स्मृति है। स्मृति संस्कार में संग्रहित होती है। वहां अत्यन्त प्रवहमान उर्जा है। समझाने के लिए शब्द है। शरीर को काटो तो कुछ ऐसा नहीं मिलेगा। जहां मन इस स्मृति के दबाव से मुक्त हो, वहीं वह वर्तमान में है। वहां जहां वह निष्क्रिय होता जाता है वहीं अन्तर्मन, सजग होता जाता हे।
यह अन्तर्मन भी समझाने के लिए ही है। जैसे पानी की दो सतह हों। कागज की दो सतह हों। भाषा की अपनी सीमा है, यह जब जगता है, तब प्रारम्भ में यह बाह्म का आकर्षण खोता है। बाह्मा मन में संसार है, बहिर्मुखता है। वह जाती है तब आता है, पहले निराश्रय। जहां अचानक लगता है कि सब कुछ छूट गया एक हताशा सी जगती है। फिर आता है स्वाश्रय, यहीं आत्मकृपा जगती है जो हृदय है, वह सुगंध से भर जाता है उसकी सुगन्ध प्रेम है। स्वाश्रय पैदा होता है, पहले परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भय था, पीड़ा थी। उनसे लड़ने की क्षमता आई। तब अनुकूलता व प्रतिकूलता की प्रासंगिकता चली गई। अब परिस्थिति का सहज साक्षात्कार होता है। प्रतिकूलता में उत्कृष्टतापूर्वक कार्य सम्पादन है। और अब जगता है प्रेम। जो हृदय को स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। अगर मन के द्वारा किये गये इस अंधकार के पार जाना है तो वह शुद्ध हृदय ही पार ले जा सकता है।
इसीलिए कहा है आत्म कृपा ही साध्य है। आत्म कृपा तभी जगती है जब हृदय खुलता है। हृदय के खुलते ही चित्त दर्पण हो जाता है। अब किसी किनारे पर अटकता नहीं है जीवन एक प्रवाह है, वह तो बहता रहता है। न सुख के किनारे पर अटकता है, न दुःख के किनारे पर अटकता है। उत्कृष्टतापूर्वक कार्य सम्पादन ही साध्य है। हृदय तब शुद्ध होने लग जाता है। संग्रह नया नहीं बनता है। क्यांेकि जो बना रहा था, जो मन था, वह अब निष्क्रिय हो उठा है। संग्रह जो प्रभावी था,उसका सम्मान जाता रहा है। वह उपेक्षित हो चला है। तब बादलों का झुंड हटने लगा है। और जो सूर्य था वह अब प्रकाशित हो उठा है। वही अन्तर्मन है। यही शुद्ध हृदय है, जहां विकारो से प्रभावित होने की क्षमता जा चुकी है। यही प्रेम की किरण फूट पड़ती है। प्रेम जहां आकर्षण है। हृदय का खुलना ही आत्मकृपा है।
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प्रश्न ः स्वामीजी आपने कहा था कि यह जो जगत है इसके पीछे कोई कारण नहीं है जबकि विज्ञान यह कहता है कि पदार्थ के जो नियम है, वह जगत पर लागू होते हैं और यहां कारण स्पष्ट है। क्या हम जो भोगते हैं यह जो दुःख है इसके पीछे कोई कारण है ?
पूज्य स्वामीजी ः पहले क्या था, अब क्या पता है ? जहां तक मन है वहंा तक तो कारण है...मन, पदार्थ के सूक्ष्माति सूक्ष्म कण जो है, उनसे अपनी निर्मिति लेता है। मन तो ऊर्जा है, कोई स्थिर इकाई तो है नहीं। इसलिए जो नियम है वे यहां होंगे। संस्कार है, वह भी इनसे ही रंग लेता है। वहां से उछाल आता है और शरीर के माध्यम से प्रवाह बहता है तो नियम तो है ही। जहाॅँ तक बुद्धि का क्षेत्र है, वहाॅं तक काल, देश और कार्य-कारण संबंध रहेंगे।
प्रश्न ः और जगत ?
पूज्य स्वामीजी ः कुम्भकार का चाक चल रहा है कोई कैसा है, कोई कैसा है इसका कोई कारण नहीं है। एक गिलास कांच का गिरकर टूट गया। एक टूकड़ा कैसा है, दूसरा कैसा है, इसका कोई कारण है क्या ? वहां कोई कारण नहीं है, यहां तो लहरें है जो सब जगह व्याप्त है। सब प्राणियों में निरन्तर उनका प्रवाह है, एक उछाल आता है सब बह जाते हैं, जिसका जितना संग्रह है जितनी बनावट है, वह उतना प्रभावित हो जाता है। देखा होगा एक ही घटना हो तो सब प्राणियों में उसकी अलग अलग प्रतिक्रिया होती है। यह जो उनका संस्कार है वह उसकी क्रिया का कारण है।
प्रश्न ः फिर कर्मफल कुछ नहीं है ?
पूज्य स्वामीजी ः दोनों बातें जोड़ो मत। इस सृष्टि के पीछे कोई कारण नहीं है। हम, यह किस प्रकार कार्य कर रहा है इसका पता लगा सकते है। पर यह ऐसा क्यांे करता है इसका कोई कारण नहीं है। यह तो प्रकृति है, जो पंचमहाभूतों से बनाती मिटाती जा रही है। उस महानशक्ति के निरन्तर घूमने से जो क्रियाशीलता है, जो गति है उससे पैदा होता है। नाश होता है। जड़ जगत के नियम हैं, ये सार्वकालिक हैं, पर उसके परे कारणरहित कारण है। तुम कारण का ज्ञान बुद्धि के प्रत्यय से ही करते हो, पर उसके परे जो है, वहाॅं तर्क प्रभावी नहीं है। और उसका कोई कारण नहीं होता, हां, तुम्हारा जो निजि संसार है उसका कारण है उसकी बनावट व बुनावट के तुम जिम्मेदार हो। जैसी फसल बोते हो वैसी ही काटनी पड़ती है।
प्रश्न ः तो फिर हर कर्म के पीछे कोई अभिप्राय ?
पूज्यस्वामीजी ः तुम्हें इस चक्कर में पड़ने की क्या जरूरत है, सर्दी के मौसम में ध्यान नहीं रखोगे तो सर्दी लगेगी और बुखार आयेगा ही। चलती रेल के सामने खड़े हो जाओगे तो जान जायेगी ही। यहां कोई छुटकारा नहीं है, कोई चमत्कार नहीं है। हां, वर्तमान में रहने से एक लाभ यही होता है कि कर्म जो होता है वह स्वतः ही निष्काम हो जाता है। यहां कर्मफल से मुक्त हो जाता है, क्योंकि फल चिन्तन से आता है। हां, निरन्तरता में जब मन क्रिया से संयुक्त होता है, तब क्रिया जो पूरी होती है, वह स्वतःकाल और समय से मुक्त हो जाती है। तब तुम कार्य-कारण की श्रृंखला के परे कुछ है, यह जान सकते हो।
मृत्यु के पार
स्वामी जी पुनर्जन्म नहीं मानते हैं। वे यही कहा करते है ं कि जो पैदा होता है वह स्वतःनाश होगा। जो मरता है, वह पैदा नहीं हो सकता यह प्राकृतिक नियम है। जब जन्म होता है तब पंचमहाभूत, मन-प्राणों से संयुक्त होकर एक नया जीवन दे देते है। तब सवाल पैदा होता है कि,पैदा क्या होता है, कौन पैदा होता है। वह कहते हैं पैदा होने की इच्छा चेतना में है, जब वर्षा होती तब धरती पर इतने पौधे कहां से आ जाते हैं, फिर कहां चले जाते है। यह तो प्रकृति का कार्य है वह जो जीवनेच्छा है, वह पंच महाभूतों के सहयोग से पैदा होती है।
प्राण उर्जा शरीर का पोषण करती है तथा मन क्रमशः क्रमशः शिशु के पैदा होने के साथ ही बनता चला जाता है ऊर्जा एक ही है, प्रकार दो है। जन्म के साथ, यह उर्जा दोनो रूपों में बंट जाती है। और जब जाना होता है तब दोनों उर्जा स्वतःजो एक ही हैं, एक हीं हो पाती है।
परन्तु जीवन का लक्ष्य यही है कि इसी जीवन में दोनो उर्जा एक हो जाए योग है, प्राण और मन का एक होना है। यह योग है।
मृत्यु, यह योग नहीं है। यह तो मात्र देहांत है। प्राण उर्जा शरीर छोड़ जाती है। हां, जीव मन सहित आत्मा ही तो है। शरीर पृथक हो जाता है। शरीर पंच महाभूतों से मिलता है, वह इन्हें मिल जाता है जो शक्ति में चली जाती है। शक्ति कहां नहीं है, यह तो प्रचण्ड उर्जा है। प्राण ही शरीर का संचालन करते है।
प्राण चले जाते हैं शरीर वहीं रह जाता है। हां जो मरता है वह पैदा नहीं होता है जो शेष रह जाता है उसे फिर एक माध्यम चाहिए और माध्यम एक शरीर है जो फिर उसे मिल जाता है। जो कारण है। कारण उसी उर्जा का हिस्सा है। पर वहां संस्कार है। जब तक वह है, वह पैदा होता रहेगा। और हर बार रहेगा। और हर बार आता रहेगा। देहांत में मात्र शरीर का जाना होगा जो पैदा होता है वह नहीं मरता है।
हां मृत्यु.... जो पैदा होता है, उसका फिर नहीं होना है। और दह होता है जब बाहय मन पूरी तरह अन्तर्मन में लीन हो जाता है यही लय है।
जहां लय है, वहां देहांत और मृत्यु दोनो एक ही है। पूज्य स्वामीजी मुक्ति को नहंी मानते। वे कहते है कि हम अलग है कहां ? जहां खालीपन होता है, वहां बाहर की हवाएं दौड़-दौड़ कर आती है। बादल ले आती है। हां, अगर मुक्ति होगी तो सबकी एक साथ ही होगी।
इसलिए करना है तो यही कि जो बार बार पैदा होता है बार बार मरता है उसे जानना होगा। और उसे भी जो कभी मरता नहीं है। उसे जाना जाता है जब जागृति स्वप्न और विचारणा तीनों अवस्थाओं में साम्य पाया जाता है।
जो तीनों अवस्थाओं में रहता है वो न जगता है न सोता है, जब उसका अनुभव न होता है तब मात्र मृत्यु होती है। और उसे जानने के लिए चाहिए तीव्र अभीप्सा....जो यह बार बार भटकता है उसकी गहरी पहचान और जब उसका प्रभाव तीव्रता से चेतना पर अपना प्रभाव डाल जाता है तब उससे बचने की प्रक्रिया शुरू होती है। तब जब जाना जाता है, बाह्य मन की दौड़ ही दुःख है। वही तनाव है, विक्षोभ हैं, और उससे छुटकारा मात्र वर्तमान में रहना है। और इसके लिए चाहिए एक गहरी अभीप्सा, तीव्र लगन, तब जो लक्ष्य है इसकी सहज प्राप्ति होती है।
प्रश्न ः क्या मैं शांति पा सकता हूं, जबकि मेरे आस पास का वातावरण इतना अशांत है कि एक पल का भी वहां चैन नहीं है ?
स्वामीजी ः वातावरण तो सदा ही ऐसा रहेगा....उसे कोई नहीं बदल सकता है।
प्रश्न ः क्यांे ? क्या हमारी शक्ति नहीं ?
स्वामीजी ः शक्ति बहुत सीमित है...यह बहुतों के संकल्पों का परिणाम है। आप अकेले कहां हैं ?
प्रश्न ः फिर ?
स्वामीजी ः उससे अप्रभावित रहना होगा....हम अपना कार्य यथावत करते रहें.....
प्रश्न ः वह कहां संभव है ? नौकरी करना ही मुश्किल हो गया है,
स्वामीजी ः नौकरी आपने ही माॅंगी थी।चाही थी। यह आपका संकल्प है, उसे पूरा करना होगा हां दो तरीके हैं, अशांति के साथ अपना कार्य करो, या शांति के साथ अपना कार्य करांे.... हमंे तो अपना पार्ट अदा करना है, यह याद रहे अपना पार्ट ठीक करने में दूसरे का पार्ट खराब न हो उसे नहीं बिगाड़ देना बस।
प्रश्न ः पर दूसरे तो बिगाड़ते हैं हमने तो उनका कुछ नहीं बिगाड़ा वे हमें इतनी तकलीफ पहुंचाते है।
स्वामीजी ः अगर आप प्रतिक्रिया में नहीं है....तो वे स्वतः एक दिन शांत हो जावेंगे। जो हम चाहते है, वही तो प्राप्त होता है। केवल अपने सामने जो घट रहा है। उसमें शरीक होते जाना है। स्वाभाविकता के साथ रहना है। होता क्या है, मन जो उपद्रवी है, वह सदा उधेड़बुन में रहता है, जब वह अशांत है, तब शांति कहां आ सकती है।
प्रश्न ः प्रश्न मेरा यही था ?
स्वामीजी ः तो फिर उसे सीधा देखो, जब हाथ लगातार हिलता हो उससे किसी चीज को सरलता से पकड़ा जा सकता है क्या चीज में दोष नहीं है, दोष तो हाथ का है, बीमार तो हाथ है। हाथ का संतुलन सही होगा वस्तु ठीक से पकड़ी जावेगी गत्यात्मक मन जहां भी जाएगा, वहां टिकेगा नहीं....वह उपद्रव ही करेगा, जो अशांत है, वह अशांति ही देगा। लगातार विचारणा का दबाब बना रहता है, एक पल की भी स्थिरता नहीं है, इलाज अपनी इस तमोगुणी बुद्धि का रिना है। मन तो वाहक है, जैसा संग्रह रखा होगा, उसको वह समत पर लेआएगा।
प्रश्न ः यह किस प्रकार संभव है ?
स्वामीजी ः उसके साथ रहकर,ही, वह तो शक्ति है। जो भी वर्तमान क्रिया हो उसके साथ मन को पूर्ण रूपेण एकाग्र रखना चाहिए। किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने देना चाहिए। होता क्या है, चाय पीने में मुश्किल से दो मिनट लगाये हैं, पर उतनी देर भी मन वहां नहीं रहता। उसके लिए कोई लंबी चैड़ी साधना नहीं है।
राजा जनक ने अष्टावक्र से कहा था मैं घोड़े पर सवार हो रहा हूं, क्या इतनी देर में आप आत्मज्ञान का रास्ता बता सकते हैं ? अष्टावक्र बोले थे तुम्हारा मन मुझे दे दो। क्रिया के साथ यहां मन को संयुक्त करना है। मन वहीं रहे। मन स्वतः शांत होता जाएगा। तथा जो अनावश्यक है, वह छूटता जावेगा। एक बार आप शांत होते जाऐंगे, तब यह स्वभाव का अंब बनता जाएगा।
प्रश्न ः परन्तु मेरे साथ तो यह होता नहीं है, मैं यहां हूं तो मन नौकरी मे है, वहां होता हूं तो कहीं ओर है, बार बार लड़ना पड़ता है। पहले पढ़ा था, फालतू विचारों को हटाओं, तो एक लड़ाई सी बनी रहती है....
स्वामीजी ः मैने तो लड़ने के लिए नहीं कहा। मन को कोई स्थिर नहीं कर सकता है। मन कोई वस्तु नहीं है, यह तो उर्जा है। अत्यन्त गत्यात्मक। हां, अन्तर्मुखी हो सकते हैं। यह जो स्रग्रह दबाब बनाए रखता है, इसकी आप उपेक्षा कर सकते हैं। यह जो इसका बहाव निरन्तर बाहर की ओर हो रहा है, उसे विपरीत कर अन्तर्मुखी कर सकते हो। इसलिए मैं लड़ने के लिए नहीं कहता हां, जो भी कार्य हो वहां इसे टिकाए रखना चाहिए, वही प्रयास हो। हुआ क्या है, हमने सांसारिक कार्यों को छोटा तथा माला जपने, पोथी पढ़ने आदि कर्मकांड को बड़ा काम, आध्यात्मिक काम मान लिया है। मैं तो यही कहता हूं कि उसकी कोई जरूरत ही नहीं है। आप जो भी कार्य कर रहे हैं, वही मन को रखें। कार्य बहुत सरल है। इसमें कोई खर्चा नहीं है स्त्री, पुरूष, बच्चें सब कर सकते है। अधिक से अधिक देर तक रखें, हां उसे विपरीत नहीं होने देना चाहिए।
प्रश्न ः वही तो नहीं रह पाता ?
स्वामीजी ः हां, शुरू शुरू में वही होगा, उसका जो इतने वर्षों का स्वभाव है, वह एक दम तो कम नहीं होगा, तब सतर्कता को कायम रखो, निगरानी करो.....,कुछ क्षण ठहरेगा,फिर कहीं जाएगा, ध्यान रखो,
जब जावे,तब पुनः कार्य के साथ लाओ, एक दिन मे तो कुछ विशेष घटने वाला नहीं है। पर प्रयत्न यही होना चाहिए।
प्रश्न ः इसमें मेरा पारिवारिक जीवन बाधा तो नहीं है ?
पूज्यस्वामीजी ः कैसा सवाल किया है। मै तो सदा ही गृहस्थियों के बीच में रहता हूं। वर्षों से मेरा गृहस्थियों से ही संबंध है। शांति की आज परिवार को जरूरत है। आप जहां भी रहंे जो भी कार्य हो, वहीं अगर मन रहेगा तो स्वतः वर्तमान में रहने का अभ्यास होगा। अशांति, मन के आगे पीछे के भटकाव में आती है। आप इतना सा ही करके देखिए प्रसन्नता स्वतः आपको प्राप्त होगी।
प्रश्न ः मै भी तो यही चाहता हूं ?
पूज्यस्वामीजी ः खाली चाहते ही है, करते कुछ भी नहीं है। सच्चा सुख, इन संसार के साधनोे से प्राप्त नहीं हो सकता है। मै यह भी नहीं कहता हूं कि ये व्यर्थ है। ये परमात्मा ने सुख देने के लिए सुविधाएँं दी है। इनकी गुलामी मत करो, बस ! ये सब नाशवान है। जो नाशवान नहीं है, उसे पाओ, ‘उद्धरेेत आत्मन, आत्मनाम न आत्मानम अवसादयेत्,’ अपनी आत्मा से अपनी आत्मा का उद्धार करो।
प्रश्न ः जब मैं मूल रूप में ही आत्मा हूं, तब इतनी अशांति क्यों हैं ?
पूज्यस्वामीजी ः कहा न........मन के कारण से। मन अशांत है। और उसका कारण है कि वह जिस संस्कार से निरन्तर प्रभावित है, वहां संग्रह विकारों का है। जब तक विकारों का प्रभाव रहेगा। मन विचलित होकर बहिर्मुखी बहता रहेगा। हां, मात्र वर्तमान में रहने से, विकार तो उठेंगे, पर वे वहां प्रभावित नहीं कर पायेंगे। ज्योहि मन वर्तमान से हटता है, वह आगे पीछे के चिंतन में चला जाता है, बह जाता है। वही वह नया संकल्प कर लेता है। और ब्याज कमाकर ले आता है। यह ब्याज और संग्रह बन जाता है। संग्रह और विचलित करता जाता है।
प्रश्न ः कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं’ आत्मा हूं, यह विचार दृढ़ होने से शांति स्वतः प्राप्त होती है ?
स्वामीजी ः आपने यह किया।
प्रश्न ः नहीं ? पढ़ा था।
पूज्य स्वामीजी ः फिर फायदा क्या हुआ, तोते की तरह रटने से मैं आत्मा हँ, क्या फर्क पड़ने वाला है?
जब आप क्रिया में नहीं हो, तब आप अपने मन को खुला छोड़ दें। विचारणा को बहने दें। तब अपने आपको देखें , पता करें आप क्या हैं? तब तटस्थ अवलोकन से आपको एक सतर्कता प्राप्त होगी। इस सतर्कता का पूरे जीवन में प्रयोग करो। जीवन को जिस रूप में प्राप्त हो रहा है, बहने दो मात्र सतर्कता रहे। घटनाएं, जिस रूप में आ रही है, उन्हें आने दो कोई आसक्ति न हो...तो जो घट रहा है वह घट जाएगा तथा आप परिधि से सीधे केन्द्र की ओर आने लग जावेंगे। जो परिधि है, वहीं आपका व्यवहार है। वह क्रिया का क्षणिक छोर है। वहां से पकड़ो वहां रखी सतर्कता से, भोग तो होगा, पर नया आग्रह नहीं होने से नया चयन नहीं होगा। होता क्या है, निवृति के समय प्रवृति की आकांक्षा दृढ़ हो जाती है। तब कोई आकांक्षा नहीं मन भीतर लौटने लगेगा। पहली सतर्कता भाषा के प्रति होती है। जितना अनर्गल बोलते हैं, वह रूक जाता है, भाषा के सिमटते ही क्रियाएं जो निरर्थक हैं वे कम होने लगती है।
प्रश्न ः बात तो आपकी ठीक है, परन्तु मैं तो बहुत ही परेशान हूं जो चाहता हूं वह मिला नहीं, जो मिला है उससे परेशान हूं ?
पूज्य स्वामीजी ः जो मिला है वहीं से प्रारम्भ करो। जो खिड़की खुली है, उससे बाहर तो देखो।
प्रश्न ः पर यही तो होता नहीं है, मुझे तो रह रहकर वही दरवाजा याद आता है। जो अब तक नहीं खुला है।
स्वामीजी ः यही तो आसक्ति है। यही दुःख है,े जो मिला है उसे चाहो, स्वागत करो, भागकर कहाँ जाओगे। जिसे आना था, वही तो आया है। क्योंकि वह तुम्हारे चाहने से ही तो आज आ गया है। जो तुम चाहते हो, वही तो तुम्हें मिला है इसीलिए जो आज आया है, वही तुम्हारा वर्तमान है उसे चाहो। जब पूरी तरह चाहोगे वह छूट जाएगा। थोड़ा सा भी बचाकर रखा तो वही लौटकर आयेगा। दुख पूरा स्वागत करने पर ,न आने के लिए सोचकर चल देता है। वह तभीतक भयभीत करता है, जब तक उससे भयभीत रहा जाता है।
प्रश्न ः पर मै तो वही चाहता हूं जो सुखद हो, वह आ तो सही।पर यहां तो जो आया है क्या बतांऊ आपको......?
पूज्य स्वामीजी ः यह भी तुमने चाहा था। तुम शांति चाहते हो, इसीलिए इसको भी आना था। सुख दुःख जब तक है और यह तुम्हें प्रभावित करते रहेंगे। शांति नहीं आयेगी और प्रसन्नता कोसों दूर रहेगी। सुख व दुःख का भोक्ता यही मन तो है जब यही अशांत है तब शांति कहां से होगी। तुम जिस सुख में रहते हो वह इसी दुःख से पैदा होता है और दुःख में ही डूब जाता है। इसका कारण क्या है ? मात्र बुद्धि चातुर्य, यही वह भ्रम है जो यह कहता है कि ऐसा हो सकता है कि दुःख हट जाएगा व सुख लगातार बना रहेगा। आज सारा प्रयास यही हो रहा है। सारी सुविधाओं का आधार वही है। पर होगा क्या है ? यह जो भोक्ता है यह जो मन है यह तो विचलित है। बुद्धि का सही आदर यही करता है। इसे अप्रासंगिक बनाओं। बुद्धि चातुर्य का सहारा मत लो। विवेक का आदर करो। जब स्मृति का आदर नहीं होता है तब मन जो है, वह अन्तर्मुखी नहीं होता है। वह बाहर ही बाहर उलझता रहता है।
प्रश्न ः तब मैं क्या करूं ?
पूज्य स्वामीजी ः इस भ्रम को समझो। इससेे बाहर आओ। दुःख से मत लड़ो। तकलीफ से मत लड़ो। दुःख से लड़कर सुख चाहते हो। यह ठीक नहीं, उसी क्षण बदलने का प्रयास करते हो, थोड़े दिन बाद वहां भी परेशान हो जाते हो क्योंकि जो अभी सुख है वह कल दुःख में ढल जाएगा। लड़ना है तो इस चक्र से लड़ो जो उलझाता है। चक्र कामना का नहीं है। चक्र बुद्धिचातुर्य का है। आज का आदमी बुद्धि की दासता कर रहा है। विवेक का अनादर करता है बुद्धिचातुर्य से हर गलत बात को न्यायोचित ठहराता है, तर्क आता है वह अपने आपको, अपने कृत्य को सही ही मानता है। दूसरों को अपनाने को कहता है। यही आज दुःख का कारण है। इस चक्र को समझो और इस जाल से बाहर आओ।
प्रश्नकर्ता ः क्या वह धीरे धीरे होता है....या...................
स्वामीजी ः यहां देना है तो सौ टका देना है। बस एक छलांग। जब जान लिया है, तो उसका पालन करो। अमल में लाओ। वर्तमान में रहने का अभ्यास जितना बढ़ जायेगा, उतना ही यह जाल हटता जायेगा यही बस करना है।
प्रश्नकर्ता ः तो जिन चीजों से मन अशांत रहता है जिन चीजों से शांति भंग होती है उनसे अपने आपको हटाया जाए।
स्वामीजी ः यह शाब्दिक कसरत है, तुम हटा सकते हो ?फिर बेकार की बात ले आए। वे सब आस्थाएं, वे सब घटनाएं, वे व्यक्ति जो तुम्हारे मन को अशांत कर रहे हैं ? क्या वे वास्तव में कर भी सकते हैं? तुम चाहते हो तब वे वैसा कर पाते हैं।जो ऐसा कहते हैं वे मात्र कहने के लिए करते है। यह सब ऐसा ही रहेगा, इसमें कोई परिवर्तन नहीं ला सकता है। हां, तुम अप्रभावित होने की कला सीख सकते हो, और यह कला है वर्तमान में रहना।
इसी से शांति प्राप्त होती है। और प्राप्त होती है, अंतःकरण की प्रसन्नता। यहां जाना कहीं नहीं है, छोड़ना किसी को भी नहीं है। जिसे छूटना है वह स्वतः छूटता चला जाएगा। मन को वर्तमान में रखना है। तब जो बीमार मन है वह धीरे धीरे अन्तर्मुखी होता हुआ शांत होता जाता है और तब स्वतः प्राप्त होता है प्रेम।
प्रेम, अलौकिक है, दिव्य है। मन जितने रास्ते में अवरोधक खड़े करता जाता है, वहीं हृदय, पुल बनाता है। निरन्तर वर्तमान में रहने से हृदय की शुद्धि होती है। यह तुम्हारा बायलोजिकल हृदय नहीं है। यह वह है जहां अनुभव है और तभी सुख भी मिलता है और शांति भी प्राप्त होती है।
आपका मन
स्वामी जी को देखा है, वे घंटों कुटिया में चुप बैठे रहते हैं। सामने कुर्सी है, उसका मुंह भी सब की तरफ नहीं है। हां, यह जरूर है जब कोई सामने आता है, तब उनके सामने होकर जाता है। क्योंकि पास ही रास्ता है।
सामने कोई आया, उसने प्रणाम किया, तो हाथ उठा,..... देखते ही मानो चित्र खिंच गया हो। पूछते हैं कैसे आए........नहीं बताने पर भी स्वयं आगे बात करते है। मानो जो उसके भीतर का है, वह बाहर आने को ही है, तब धीरे से उसने कुछ पूछा तो उत्तर दिया, और वही कुछ कहता रहा तो सुनते रहे। दूसरा आया, तीसरा आया,.....हजार की भीड़ में भी देखा....मानों सभी के साथ जुड़े हुए हों, जो सामने आया.....तत्क्षण है स्मृति वही गयी। यह क्या है ? यही जानना था।
”तो बोले.....यही वर्तमान में रहना है।
तुम्हारे संसार में स्मृति है। मेरे पास वह नहीं है। पर तथ्यात्मक ही होगी।
‘हां, वह है, दाढ़ी बनाता हूं, कट..लगता है, हाथ कांपने लग गया है, पर अपना काम कर लेता हूं। वह तो रहेगी। आदत भी रहेगी।
फिर ?
तुम्हारा संसार मेरा नहीं है। तुम्हारे संसार में स्मृति है। वहंा भूत है, भविष्य है। कल्पना है, अतीत है, आग्रह है। दुराग्रह है, हर पल दबाव है। और यहां कुछ नहीं है, मात्र सहज है।
चेतना तो वहीं होगी ?
जहां मन है, वहां परतन्त्रता है। वहां सीमा है, आकाश नहीं है। तुम किताबों से सवाल लाते हो, जब व्यवहार में उतरोगे तो सवाल ही नहीं होगा। सीमा बुद्धि की है। जहां यह नहीं है, वहां मात्र आकाश है। मात्र खालीपन और जो चेतना है वह शुद्ध है। उसे ही अवेयरनेस कह सकते है।’
‘यों समझो, दो मंजिल का मकान है, कोई नीचे आकर आवाज लगाता है, तब जीने से नीचे आना पड़ता है, फिर उससे बात की और ऊपर चले गए। नीचे आना कांशियननेस और ऊपर जाना अवेयरनेस है। इन दोनो ध्रुवों पर रहना होता है।
जब पूछा तो मन वहां जाता है वरना निष्क्रिय सा पड़ा रहता है।
जबकि तुम्हारा मन हमेशा सक्रिय रहता है। होना यही चाहिए कि वह निष्क्रिय हो।
हां, मात्र वर्तमान में रहने से ही यह हो जाता है क्योंकि जहां मैं हूं, वहां मात्र वर्तमान है।
जहां, भूत है, भविष्य है, वही मन है।
वही संसार है। रहना तो यही है, यहां से भगकर कहीं जाना नहीं है। पर वर्तमान में जो रहता है,वहां पर मात्र अनन्त होता है, वहां सीमा नहीं है, बंधन नहीं है। बंधन तो रूचि व अरूचि का है।
वहां तो केवल स्वभाव है। और उसमंे रहना है।
यहां पर मनोवैज्ञानिक मन नहीं होता है।
तुम जिसे चेतन व अचेतन मन कहते हो। वह यहां का बाह्य मन ही है। जहां तक विचार है वह मन है।
जहां तक स्वप्न है, वह मन है। जहंा बोध है वहां तक मन है।
इन सबसे परे ही मात्र अनुभव है उस अनुभव मार्ग को ही अन्तर्मन कहा है।“
प्रश्न - जहां आप रहते हैं इस अवस्था को क्या कहेंगे ? पूछने पर स्वामीजी यही कहते है। कोई नाम नहीं है आप इसे ‘सहज’ कह सकते है।
जो यह नहीं, वह असहज है। सहज की कोई परिभाषा नहीं है। परिभाषा मन करता है।
प्रश्न- क्या यही अन्तिम अवस्था है ?
स्वामीजी इस पर हंसते हुए कहते हैं, ‘मुझे क्या पता ? मुझे तो यही पता है, मैं शांत हूं, पूर्ण सुखी हूं और आनन्द में हूं। जिस प्रकार एक बड़े वृक्ष के नीचे आकर यात्रियों को ग्रीष्म ऋतु में छाया पाकर शांति मिलती है वही मैं पाता हूं कि लोग यहां आते हैं, वे शांति अनुभव करते हैं। और इससे अधिक क्या होता है ?
प्रकृति के विरूद्ध नया कुछ पैदा करने का संकल्प नहीं आता है।
ध्यान और अवलोकन
प्रश्नकर्ता ः स्वामीजी आप ध्यान का प्रयोग बिल्कुल ही नहीं करते, जबकि अन्य सभी जगह ध्यान के लिए कहा जाता है ?
स्वामीजी ः हां, मैं ध्यान शब्द का प्रयोग नहीं करता। मैं तो मात्र वर्तमान में रहने को कहता हूं। ध्यान करना, यह भी तो बहिर्मुखी क्रिया हुई जहां करना हुआ वहां वही होता है। ध्यान से जो अर्थ है वह है किसी नाम, रूप, मंत्र पर अपने विचारों को एकाग्र करना, यह भी तो कल्पना है।
प्रश्नकर्ता ः पर जो भीतर भी विचारणीय है, उसके प्रति सजग होना जो अवलोकन वह भी तो ध्यान है।
स्वामीजी ः वह मात्र देखना है, अवलोकन है..... उससे भीतर की विचार धारा के प्रति सजगता आती है वहां पर होने का साधन सतर्कता है जो भीतर का है पर दर्पण पर आकर प्रकट होने लगता है तथा वहां पर वरण नहीं है। यह अच्छा है या बुरा। तब उर्जा जो छिपी है वह प्रकट होने लगती है, जो भीतर का है, जब बाहर आकर मात्र विसर्जित होने लगता है, न तो दबाव हो न उसे बार बार दोहराने की इच्छा हो तब उर्जा बाहर आकर बिखर जाती है उसमें एक खालीपन आता है, मन शांत होने लगता है।
प्रश्नकर्ता ः आपने अनन्तयात्रा में कहा है यह जब कोई क्रिया न हो तो करना चाहिए।
स्वामीजी ः हाँ, यह मात्र अवलोकन है। यह बहिर्मुखी क्रिया नहीं है। यह तो मात्र अपने भीतर उतरना है तब जो भीतर का है वह खुलता है मन इससे अपने दवाबों, अपने अभिप्रायों से मुक्त होने लगता है।
प्रश्नकर्ता ः इससे क्या लाभ होगा ?
पूज्य स्वामीजी ः शांत मन ही तो आप चाहते है तब जो देखना है वह प्रारम्भ हो जाता है पहले तो आप मात्र बह रहे थे , जो होना नहीं था,वह अब कम से कम देखने तो लग गए हो। यह साक्षी होने का प्रारम्भ है। साक्षी होना क्या होता.है?.... जो आप हैं उससे पहचान होना ही तो है।
प्रश्नकर्ता ः आप गुणों को नहीं मानते हैं क्या इससे सतोगुण पैदा नहीं होगा ?
पूज्य स्वामीजी ः गुण ये भी तो मान्यताऐं हैं आपकी यह मान्यता है कि एक ऐसी अवस्था आवेगी जब तमोगुण चला जावेगा और सतोगुण ही रहेगा, यह असंभव है प्रकृति के कार्य को कोई नहीं बदल सकता। वहां तो लहरें हैं और आप पृथक तो है ही नहीं। हां जैसा कहा है, आप अप्रभावित होने लग जावेंगे। होता क्या है अवलोकन से, अवलोकनकर्ता धीरे धीरे अवलोकन के बढ़ने से तथा किसी प्रकार की मान्यता से प्रभावित न होने से उसका चित्त, स्वच्छ होता जाता है। जितना वह स्वच्छ व संवेदनशील होता जाता है, उतना ही अवलोकन निर्मल व तटस्थ होता जाता है। तब जो बाहर आ रहा है, जो भीतर का संग्रह है वह खुलता जाता है। भीेतर तो तुरन्त प्रभावित ही नहीं, बस तुरन्त बह जाने की क्षमता होती जाती है और प्राप्त होती है तितिक्षा वो जो गीता में कछुए का उदाहरण दिया जाता है, वह स्वभाव बनता जाता है।
अवलोकन से तमोगुण दूर होकर सतोगुण पैदा होगा। ऐसी मान्यताएं मत रखो। जो दिख रहा है, उसे देखने वाला और देखने की क्रिया, यहां बाहर नहीं है। तब मन ही तो कर रहा है। जब चेतन धरातल पर अचेतन खुलता है, तब वह अपने साथ उर्जा लाता है। जो उर्जा बंटी हुई भी वह अब संग्रहित होने लग जाती है। यह उसी प्रकार से है तुमने अपने एक रूपये को एक एक पैसा कर सौ जगह बांट लिया है, अब जब एक एक पैसा आता जाता है तब रूपया फिर इकðा हो जाता है। अनावश्यक विचारों की श्रंखला के कम होते ही धीरे धीरे निःसंकल्पना आती है और यही शांति है, जहां शांति है वहीं।
प्रश्न ः क्या इससे हमारी पहचान नहीं खोएगी ?
स्वामीजी ः हूं (हंसते हैं) सबसे बड़ा भय यही है। बूंद समुद्र में खोना में खोना नहीं चाहती। जब तक बूंद है तभी तक तो पहचान है, होता क्या है ? अवलोकन जितना निर्मल होता जाता है, उतनी ही तीष्णता बढ़ती जाती है यही चित्त शुद्धि का मार्ग है। अब जो देख रहा है वह जितना स्वच्छ देखता जाता है उतना ही स्वच्छ होता जाता है। तथा देखने की क्रिया उतनी ही तीक्ष्ण होती जाती है यह बिल्कुल एक्स रे की तरह होता जाता है, अब ज्योंही वह दबा हुआ बाहर आकर बिखरता है, वही तो हमारी पहचान है, वह बाहर आकर बिखर जाती है।
प्रश्न ः क्या यही अंहकार है ?
स्वामीजी ः अंहकार की परिभाषा कहां से करोगे वह कोई स्थिर इकाई तो नहीं है। वह तो रोज बनती बिगड़ती है। यह जो अपने आपको किसी पहचान से एक रूप करने का स्वभाव है, वही अंहकार है। ज्यों ज्यों पहचान खोती जाती है, यह अंहकार बिखरता जाता है। यह हमारी मान्यताओं, स्वभाव, कामनाओं रूचियों से बनता है। अवलोकन इसे ही खोलने की कला है, बाहर तुम मिट नहीं जाओगे, वह तो वही रहोगे। मेरा नाम जो है, वही रहेगा मेरा पता वही रहेगा, पर जो भीतरी बनावट है वह बदल जाती है। रूपान्तर भीतर आता है, बाहर तो मात्र प्रतीत होता है। बाहर की फिकर मत करो। बाहर की किसी भी क्रिया से भीतर कोई परिवर्तन नहीं आएगा, परिवर्तन लाना है तो भीतरी ही लाना होगा।
प्रश्न ः क्या यही सत्संग है ?
स्वामीजी ः हां कह सकते हो। ग्रंथ पढ़ना बाहर की बहिर्मुखी क्रियाएं करना सत्संग नहीं है। यही वह कला है जो वर्तमान में रहने से जोड़ती है। मन की उथल पुथल ही वर्तमान में रहने नहीं देती है। जब यह कम होती जाती है, तब वर्तमान ने रहना स्वतः प्रारम्भ हो जाता है, तब प्राप्त होता है मौन......।
प्रश्न ः और तब अभिव्यक्ति क्या होगी ?
स्वामीजी ः किस........की......?
प्रश्न शरीर की साधक की
स्वामीजी ः मात्र प्रेम.,।.... विचारणा, बाधाएं खड़ी करती है और हृदय रास्ता बनाता है निर्विचारता में ही हृदय खुलता है और वहां रह जाता है,मात्र प्रेम ।
प्रश्न ः मैं तो जानता हूं मै यह नहीं कर पाता हूं मैं क्या क्रूं?
स्वामीजी ः पहले अपने व्यवहार को देखो.....मात्र, कितना गलत कर रहे हो, वहां देखो...जो गलत जब वह दिखेगा तब जो देख रहा है वह ताकत लेगा, जब उसकी बात मानोगे तब गलत के हटते ही सही होना शुरू होगा। प्रारम्भ व्यवहार से करो.........तब अवलोकन स्वतः प्रारम्भ हो जावेगा।
अन्तर्मुखता
पिण्ड पिण्ड में बुद्धि का कार्य तो समान है परन्तु सोचने का तरीका अलग अलग है। लहरें तो एक सी टकराती है। पर अंदर मजबूती होती है, पत्थर की तरह वह अप्रभावित रहता है। संसार मात्र वृतियों की लहरों पर आधारित है। जैसे जैसे लहरें टकरा-टकरा कर वृत्तियां उठाती रहेगी, वैसे-वैसे व्यवहार होता जाएगा, वैसे-वैसे ही हम सोचेंगे और वैसे वैसे ही निर्णय होंगे।
अगर वर्तमान में रहो तो लहरें टकरा टकराकर वापिस लौटती जायेगी वे प्रभावित नहीं कर पायेगी। एक लहर आती है तो भूतकाल की याद आती है दूसरी लहर आती है तो भविष्य में ले जाती है, एक लहर संग्रह को और आगे बढ़ा देती है, दूसरी ईष्र्या उत्पन्न करा देती है। कार्य उसी के अनुसार चला जाता है।
हमें लहरों के वेग को सहन करना है। लहरों को उठने से कोई रोक नहीं सकता है। वो लहरें उठती रहंे और यदि हमारा हृदय इतना शांत स्थिर रहे कि वह टकराती जायें और वृत्तियां भी नहीं उठे, यही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। यह सब कुछ वर्तमान में रहने से ही संभव है।
अभी वर्तमान में रहने का अभ्यास दृढ़ नहीं हुआ। जिस स्थिति में आगे बढ़ना है, वह अभी दृढ़ नहीं हुई। अभी तो जो चल रहा है, वही कार्य हो रहा है इसलिए जो सोचते हैं, उसी के अनुरूप कार्य किया जाता है। फिर जैसे जैसे छोटी बातों पर ध्यान रखते हुए वर्तमान में रहने का प्रयास बढ़ता जायेगा तब यह अनुभव होता जायेगा कि स्वतःजिसे होना है, वह होने लग गया है।
इसीलिए कहा है कि अगर प्रयास भी करना है तो रात को करो। रात को करने में आवश्यक सहयोग मिलता है।
स्वतः कार्य का अर्थ होता है जैसे अभी हम बातचीत कर रहे हैं और स्नान के लिए जाना है तो स्नान की ही याद आयेगी जो भी कार्य करना है उसी की ही स्मृति रहेगी। यह नहीं होगा कि घंटा भर सोचते रहे संकल्प विकल्प आते रह जाते हैं और कार्य का प्रारम्भ ही नहीं हो। धीरे-धीरे सब कुछ कम होता जायेगा।
अभी हमारे जितने भी विचार हैं, ये पुराने तरीके पर है, इसके लिये हमें बदलाव लाना है, उसके लिए सोचना है। यहां लहरें उठ रही है। नाभि पर हमारे मूल संस्कार है। वही बीज है। ये लहरें वहीं टकराती है। ये बीज सूक्ष्म है। वे जरा से आघात से उफन जाते हैं किसी पर जल्दी प्रभाव पड़ता है वह जल्दी उत्तेजित हो जाता है और किसी पर प्रभाव धीरे धीरे पड़ता है।
चार बच्चे सो रहे हैं, कोई आकर आवाज लगाता है, तो एक बच्चा एक ही आवाज से उठ जाता है, किसी को दस आवाजें लगाओ तो भी वह उठता ही नहीं है और उठ भी जाता है तो फिर सो जाता है। इसी तरह से संस्कार है। आवाज देने वाला तो एक ही है, लहरें एक ही तरह से टकरा रही है, किसी के अनवरत टकराने से भी कोई असर नहीं होता है और कोई तुरन्त उफान खा जाता है। यहां कार्य इसी तरह से हो रहा है धीरे-धीरे यह अनुभव होने लग जाता है कि हमारा कार्य इन लहरों के वेग को सहन करना है।
इसके लिए हमें हमारे स्थान पर स्थिर होकर रहना है। यदि हम वर्तमान में थोड़ा सा भी भटक गए तो एक बार टक्कर लगते ही मन इधर से उधर चला जायेगा। एक बहाव जायेगा और हम बहते चले जायेंगे।
यदि इस समय मन को सरकने की जगह नहीं मिली। मन इन लहरों के बहाव में बहा नहीं तो लहरें टकरा टकरा कर लौट जायेगी करना यही है यही अभ्यास है।
प्रश्न ः इन लहरों के टकराने से वासनाएं किस प्रकार उठती है ?
उत्तर ः ये लहरें अंदर संस्कारों को धक्का देती है। यही वासनाएं हैं, वो पनपती है, वो इच्छा करती रहती है। वही विषयों के लिए लालायित रहती है। फिर एक सिलसिला शुरू हो जाता है, जो अनवरत चलता रहता है। वर्तमान में रहने से क्या होता है कि लहरों के टकराने से संस्कारों में उफान तो आता है, वृत्तियां उठ जाती है लेकिन उनको फैलने के लिए न भूत में जगह होती है न भविष्य में जगह रहती है और इसीलिए वह सिलसिला आगे बढ़ नहीं पाता है।
प्रश्न ः स्वभाव जो हमारा है, क्या उसमें परिवर्तन है ?
उत्तर ः स्वभाव यानि व्यवहार। वृत्तियों के उठते ही जो व्यवहार होता है वह स्वभाव कहलाता है। यदि पहले हमारा क्रोधी स्वभाव है, और सामान्य अवस्था है तो लहरों के उठते क्रोध की जो वृत्तियां है वे उफान खाती रहेगी। और इसी स्वभाव का बार बार पोषण होता रहेगा। यदि वर्तमान में रहने का अभ्यास हुआ तो क्रोध की लहरें उठते हुए भी उनका प्रभाव नहीं होगा। वे लहरें टकरा- टकरा कर लौट जाएगी। जैसे पत्थर पर टकरा कर सागर की लहर चुपचाप लौट जाती है। जो अन्तर्मुखी है, उन्हें अंदर उठती हुई लहरों का पता होगा। उन्हें अनुभव होगा लेकिन लहरें उन्हें प्रभावित नहीं कर पायेगी। धीरे धीरे से यह पता लग जाता है कि हम किस प्रकार के विकारों से भरे हुए हैं, और वे हमें किस प्रकार बाह्म क्रिया करने के लिए प्रवृत कर रहे है।
प्रश्न ः जो वर्तमान में हैं, उसका स्वभाव कैसा होगा ?
उत्तर ः स्वभाव तो बाद की स्थिति है। हम शांत बैठे हैं तो हमारे स्वभाव का आपको पता कैसे लगेगा। जब क्रिया होगी तो तभी स्वभाव का पता लगेगा। स्वभाव माने आचार विचार का तरीका। वर्तमान में रहने वाले का स्वभाव समझ में नहीं आता है। चूंकि उसकी क्रिया तो वही समाप्त हो जाती है, जहां संकल्प पूरा हुआ है। बोलने चालने या अन्य बात का उसका प्रभाव नहीं होता।
उसका साधारण स्वभाव रहता है। हां प्रकृति को जो कार्य कराना है, वह करता रहेगा। आपने प्रश्न पूछा है तो मैं उत्तर दूंगा। क्रिया की यहां प्रतिक्रिया होगी। वरना मैं चुप ही रहूंगा। लेकिन अगर में उत्तर नहीं देता हूं तो जो मेरा उद्देश्य है। कत्र्तव्य है, उसकी अवहेलना होगी। वर्तमान में रहने से यही लाभ होता है। कि व्यवहार सही और संतुलित हो जाता है।
जब मैं कभी- कभी प्रवचन देता हूं तब मालूम ही नहीं होता कि मैं बोल रहा हूं क्या बोल रहा हूं, अन्तर्मन अपने आप कार्य करता रहता है। बाह्म मन शांति से पड़ा रहता है। उसका वहां कोई दखल नहीं होता है। जब समाप्त होता है तब मालूम हो जाता है कि बोलना रूक गया है।
इसी प्रकार न तो कोई दबाव होता है न तनाव होता है, न थकावट आती है। थकावट मानसिक होती है। जब वर्तमान में रहते है तो कार्य अन्तर्मन के द्वारा किया जाता है और इस अवस्था में बाह्म मन शांत रहता है।
प्रश्न ः हमें तो यही लगता है कि हमारा स्वभाव तो रूचि अरूचि पर ही टिका हुआ है, विचार भी उसी तरह आते हैं, क्या उन्हंे हटा दें ?
उत्तर ः यह पूर्व आदत के कारण है। वर्तमान में रहने का अभ्यास यदि रहना शुरू हो जाता है तो यह स्थिति नहीं आती है, यह स्थिति बदलती जाती है। वर्तमान में रहने पर जिसे आप यह कर रहे हैं कि आने वाले विचार को हटाना पड़ता है, वह नहीं करना पड़ता है अगर अवलोकन का प्रयास किया जाये तो अवलोकन करते करते धीरे धीरे आने वाला विचार स्वतः ही हट जाता है।
हां, किसी के प्रति किसी प्रकार की पूर्व धारणा नहीं रहनी चाहिए। कोई व्यक्ति सामने उपस्थिति होता है तो उसका पूर्व का जो अच्छा व्यवहार है, जो बुरा व्यवहार है, उसकी एक स्मृति बन जाती है और जब यह स्मृति प्रभावशाली बन जाती है। तब उस व्यक्ति के सामने आते ही उसका जो भूत हमारी धारणा में बना हुआ है वह सामने आ जाता है। इस प्रकार जो अवलोकन किया जा रहा है वह प्रदूषित हो जाता है इसीलिए किसी तरह की पूर्व धारणा कभी भी नहीं रखनी चाहिए। वर्तमान में रहने में सबसे अधिक बाधक यही है।
प्रश्न ः नाम जप आदि जो क्रियाएं हैं क्या वे सहायक होगंी ?
उत्तर ः हां, नामजप का उद्देश्य ही यही था। यह प्रतिस्थापन का ही तरीका है। होता क्या है मन नाम की तरफ टिक ही नहीं पाता है। वृत्तियां प्रबल होती है। वे भटकाती है। प्रकृति किसी को चुप नहीं बैठने देती है। वह अपना खेल खेलती रहती है। कठपुतली का खेल होता है, वे जो नचाने वाला है, उसकी दसों उंगलियों में डोरे बंधे हुए रहते हैं और वह उंगलिया, उसकी हिलती डुलती रहती है। और कठपुतलियां नाचने लग जाती है। ये अनवरत उठने वाली लहरें उस सूत्रधार की उंगलियों की तरह ही है, इस प्रकार से कठपुतलियां नचा रही है, उसी प्रकार से हम नाच रहे हैं। यह संसार इसी प्रकार से कठपुतली का खेल है। यह लहरें बस नचाती रहती है।
इसीलिए कहा गया कि पूर्व में नामजप का यही उद्देश्य था लेकिन सफल कौन हुआ ऋषि वाल्मिकी हुए या वर्तमान में रमण महर्षि हुए। रमण महर्षि का मन अंतर्मुखी हो गया था। उनकी बाह्म की सत्ता ही लुप्त हो गई थी। लेकिन नाम जप से या प्राणायाम से या ध्यान करने से अंतर्मुखता प्राप्त नहीं हो सकती। रमण महर्षि अपवाद है। उनके बारे में कहा जाता है कि उनका मन इतना अंतर्मुखी हो गया था कि बाहर का शरीर लगभग सुन्न हो गया था। उनके जीवन चरित्र में यह पूरी घटना है। सामान्यतः नामजप से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलती है। ये सब बहिर्मुखी क्रियाएं है। उनसे मात्र संघर्ष ही होता है। बाहर की क्रियाओं से कोई सहायता नहीं मिलती। इसीलिए मै कहता हूं कि बाहर की सभी क्रियाएं छोड़ दें, सो जाओ, लेट जाओ, शरीर तो शांत हो जायेगा बाहर की क्रियाएं समाप्त हो जायेगी।
अब रहेगा केवल मन। मन को रोकने के जितने भी बाह्म उपाय होंगे चाहे जाप करो, चाहे प्राण साधना करो, जितने भी उपाय करोेगे ये सब बहिर्मुखी है और ये कल्पित है। उसके लिये क्रिया होनी ही नहीं चाहिए। उसके लिए साधन होगा जो मन के द्वारा मन के लिए ही हो। बाहर का सहारा नहीं हो।
मन क्या है मात्र गति है। विकार उठते ही वह चलायमान हो जाता है। और विकारों को रोकने के लिए अगर प्रयास किया गया तो क्रिया हो जाती है। इसीलिए यहां केवल अगर लहरों को रोकने का प्रयास किया गया तो वह क्रिया होगी और जब क्रिया होगी तो उसकी प्रतिक्रिया भी होगी और इससे मन जटिल और तनाव मय हो जायेगा।
अतः एक उपाय है कि यहां बस तटस्थ हो जाओं केवल अवलोकन। न तो उनको रोको न उनके साथ रहो। वहां केवल एकमात्र स्थिति यही है कि लहरें जिस प्रकार चित्त वृत्तियों को उठा रही है प्रवाह आ रहा है, मात्र उसे देखा जाए। धीरे-धीरे इन लहरों का उठना कम होता जाता है। और इन लहरों का वेग अनुभव होने लग जाता है। एक सहनशीलता बढ़ जाती है। बाह्म मन इन वृत्तियों के बहाव में बहता नहीं है।
इस स्थिति में आकर बाह्म मन अंतर्मुखी होकर धीरे-धीरे नीचे उतरना प्रारम्भ हो जाता है।
बाहर का सहारा लिया तो कोई लाभ नहीं होगा। प्रकृति की महान शक्ति है। और लहरें इतनी तेजी के साथ धक्का देगी कि मन कहीं टिक नहीं पायेगा। और बार बार बाहर उछालती रहेगी। लेकिन जैसे धीरे- धीरे मन का अंदर जाना शुरू होता है, त्यों-त्यों ही सहनशीलता बढ़ जाती है, और बाहृा मन इस वेग से विचलित नहीं होता है। यहां आकर के असाधारण शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति बढ़ती जाती है। यही अन्तर्यात्रा है। इससे अधिक बताया नहीं जाता। आगे कुछ जानना हो तो स्वयं अनुभव किया जाये। किसी के पास जाओ, वह यही कहता है, साधना करो, प्राणायाम करो, ध्यान करो कोई भी यह नहीं कहता है कि कुछ मत करो। करना यही है कि मन को बाहर उलझाना नहीं है।
हां मन धीरे धीरे नीचे उतरना प्रारम्भ होता है। मन कोई पदार्थ नहीं है। वह तेज गति से घूमने वाली एक गति है। और तब उसका अनुभव होना प्रारम्भ हो जाता है। कम्पन्न अनुभव होती है। हृदय तक आते आते मन शांत हो जाता है।
रामकृष्ण परमहंस के अनुभव बहुत ही स्पष्ट है। नीला आकाश देखते हुए उसका मन भाव विहल हो जाता था। उनकी यात्रा प्रामाणिक है।
यहां पर आते स्वप्न नहीं होते।
स्वप्न वहीं तक है जहां तक मन दिमाग में टिका रहता है नीचे आने पर जरूरत होने पर स्वप्न आ सकता है।
माया बहुत शक्तिशाली है। अंतर्मुखी होने के बाद भी कभी-कभी माया गलत रास्ते पर ले जाती है। उससे बचने का एक ही उपाय है कि यह ध्यान रहे कि बाह्म सृष्टि में व्यवहार निरन्तर रखना है। यह कला जिसे आयेगी वही इसके पार जा सकता है।
इसी स्थिति में ही शरीर के बाकी कार्य या पूर्व संस्कर उसे करना है। अंतर्मुखी होने के बाद व्यवहार में उससे गलतियां नहीं होती है यह ऐसी स्थिति है, जैसी जागृति की होती है।
यहां साधना के साथ साथ जिम्मेदारियां भी निभानी है। यह बात बहुत कम लोगों के समझ में आती है कि हम अकेले नहीं है, और न हमारी अलग कोई सत्ता है। माया तो प्रतिक्षण चक्कर देती है। यह नहीं चाहती कि कोई उससे दूर जाय।
लेकिन अगर वर्तमान में रहने का अभ्यास निरन्तर बना रहे तो अन्तर्मुखता बनी रहती है। और यहां व्यवहारिक कर्म में भी अपने आप सुन्दर होता चला जाता है।
सामथ्र्य और साधना
ध्यान व एकाग्रता का उद्देश्य अन्तर्मुखता के लिए ही था। किसी एक जगह मन को केन्द्रित करना, यही था।
वास्तविक लक्ष्य तो इससे परे जाना है, इसका उन्हें ध्यान नहीं रहा। वो समझ ही नहीं पाए, जब उन्होंने यह प्रयोग किए होंगे तो उन्होंने यही जाना होगा कि मन को एकाग्र करने से शक्ति बढ़ जाती है। इसीलिए त्राटक का प्रयोग भी हुआ। त्राटक से आज तक किसी को लाभ होते देखा नहीं गया। ये सारे प्रयोग बहिर्मुखी ही हुए। उदाहरण तो बहुत देते हैं। पर किसे लाभ हुआ यह नहीं मिलता। फिर भी यही कहते रहे कि यह सिद्धि मिल गई, वह मिल गई। वह किसे कब कहां मिलती है, इसका उन्हें पता तक नहीं था।
अन्तर्मुखी होने पर ही मानसिक शक्ति जागृत होती है। बहिर्मुखी व्यक्ति को इसकी उपलब्धि नहीं होगी। देवता को भी बाहर ही तलाश होती रही। उन्हें अन्तर्मुखी होने का पता ही नहीं था। तांत्रिकों का प्रयोग बहिर्मुखी ही रहा।
प्रश्न ः तांत्रिको को तो शक्ति मिली ?
उत्तर ः हां तांत्रिकों को शक्ति तो मिली। शक्ति तो क्रोध में भी होती है। वह जो चाहे कर डालेगा। पर क्रोध उतरते ही उसे पछतावा होता है। अतःउनका रास्ता ऊपरी ही रहा उसका साधना से कोई संबंध नहीं रहा।
लहरों के धक्के लगने से विकार उठते है। विकारों का अनुभव होगा। परन्तु सहनशीलता होने के कारण वह विकारों से बहेगा नहीं। आंखे देखती है तो दिखेगा, परन्तु वह दृश्य से प्रभावित होकर बहेगा नहीं। जैसे एक चट्टान है, लहरें आती है टकराकर लौटती है।
पत्थर वैसे ही पड़ा रहता है। शक्ति तो एक ही है।
सभी कार्य उसी से हो रहा है। वहां गति भी है, ऊर्जा भी है, विकारों को जागृत करने को - मुझे भी होता है।
आस पास बैठे हुए व्यक्तियों को वह किस प्रकार प्रभावित करेगी। मैं जान पाता हूं। किसी को दो मिनट बाद क्रोध आएगा, इसका पता लग पाता है। यह मैं जान पाता हूं। भाप लेता हूं।
विकार किस प्रकार उठ रहे हैं, जान लेता हूं।
लहरें.........................................
वह तो निरन्तर धक्के दे रही है।
अभी आपने कितना अभ्यास किया है ? अन्तर्मुखी होने पर अपने आप पता लगेगा। अभी आपको उसकी कल्पना भी नहीं है। मेरा समझना भी व्यर्थ है। मैं सच कह रहा हूं, या झूंठ,.... मै जो कुछ कह रहा हूं, उस पर आपका विश्वास भी नहीं होगा, कि यह सच भी है ? यह तो अनुभव की जगह है।
लहरें................
वह तो निरन्तर उठ रही है,
अगर वह रूक जाए तो सृष्टि का विनाश हो जाए। विकार उत्तेजित हो जाते हैं, वे उठकर कार्य करवाते है। संग्रह कभी नाश नहीं होगा। शरीर है, मन है, तब तक संग्रह रहेगा। जब तक शरीर है, तब तक कार्य करने के लिए संग्रह रहेगा क्योंकि संग्रह मन के साथ है। संग्रह कभी नाश नहीं होगा। मन समष्टि है। शरीर के अन्दर तो व्यष्टि है। सामूहिक मन समष्टि है। इसीलिए शरीर से बाहर वह समष्टि ही है। व्यष्टिमन का संग्रह व समष्टि मन का संग्रह कोई अलग-अलग नहीं है। व्यष्टिमन समष्टिमन का ही हिस्सा है। उससे जुड़े रहने से वह संग्रह रहेगा। सृष्टि जब तक है, तब तक संग्रह रहेगा। सृष्टि अनन्त अतः यह संग्रह समाप्त कैसे होगा ?
कोई चीज किसी से अलग नहीं हो सकती है। अलग है ही कहां। मन सबके जुड़े हुए है। परन्तु हर व्यक्ति अपने मन इतना शक्तिहीन है दुर्बल है कि वह दूसरे के मन को जान ही नहीं पाता है।
अनुभव
प्रश्न ः नाद श्रवण आपको कब और कहां पहली बार हुआ ?
पूज्य स्वामीजी ः नाद श्रवण मुझे बम्बई में हुआ। तब पढ़ता ही था, तब ही हुआ था। इसके पहले भी सुनाई तो दिया था, पर उसका अहसास नहीं था। पर जब पहली बार सुनाई दिया - एक बार बैठे-बैठे मन के व्यवहार रूक से गए। मन स्थिर हो गया। तब डर भी लगा। तब उसकी पूरी जानकारी नहीं थी। डर भी लगा.........अगर कुछ हो गया तो क्योंकि इस विषय के जानकारी लोग नहीं है, किसी से कुछ पूछो तो अपने..... मन से बताते हैं। गलत रास्ते पर जाने का डर भी बना रहता है।
अभ्यास क्या रहा:-
अभ्यास यही। जब मौका मिले। अनावश्यक विचारों को मन में स्थान नहीं देना है। जिस समय जो कार्य कर रहे है। मन उसी में लगा रहे। प्रयास यही करना है। मन को इधर-उधर भटकने नहीं देना है। सतर्क रखना हैं कि बाहर का विचार अन्दर नहीं आए कहीं की घटना याद आते ही..... किसी की याद आती है बचपन में किसी के घर जाते थे..... वहां की याद आती थी चार आदमी बातें कर रहे हैं, तो उसमे मन को जाने से रोकना था, मन वहां डोल जाता था। उन दिनों इतना अभ्यास नहीं था।
फिर जैसे जैसे सतर्कता आई कि अरे, अपन कहां बैठे हैं, मन वहीं रूक गया। बस यही अभ्यास था। इसमें अधिक कुछ हो ही नहीं सकता। यही करते-करते अभ्यास बना रहा। फिर तो बाते सुनते हुए भी वो बाते अन्दर नहीं पहंुचने लगी। यह समझ में आने लगा कि विचार चक्र तभी शुरू होता है जब वे बाते अंदर पहुंचने लगती है। वो अंदर नहीं पहुंचे तो कुछ भी नहीं होता। फिर तो यही सबके बीच में बैठे हैं, बात अंदर भी नहीं पहुंचती। देख भी रहे हैं पर जो देखा गया है, उसे अंदर नहीं पहुंचने दिया। यही गीता का एक संदेश है।
”मात्रा स्पर्शस्तु कोन्तेय शीतोष्ण सुख दुःखदा।” विषय और इन्द्रियों का संयोग होते ही सुख दुःख होता है। जब तक विषय और इन्द्रियों के बीच जरा सा भी अन्तर रह गया तो इसकी अनुभूति नहीं होती है। उसका अभ्यास करना है।
प्रश्न- और प्रथम बार ,”औरा“ कब दिखा।
मैने पहले कहा था-बचपन में चैपाटी पर शाम को घूम रहे थे, वहीं, देखा। उस वक्त यह भी पता नहीं था कि यह औरा ही होगा। बम्बई गये हो वहाँं-चैपाटी है, चैपाटी पर भीड़ रहती है। शाम को लोग घूमने आते हैं, कुछ बैठे रहते हैं, कुछ किनारे किनारे घूमते हैं। उस वक्त सूर्यास्त होने वाला था। अंधेरा होने लगा था। अंधेरे में एक दम दस बीस लोगों के पीछे गोल-गोल घेरा सा दिखा.....तभी ध्यान गया..... और जिज्ञासा जगी, यह क्या, तभी ध्यान आया इंजीनियर साहब ने बताया था। उस वक्त बस लकीरें सी दिखी। और क्लोयर जब होता है, तो गोल घेरा बन जाता है। अब इन बातों को इतने वर्ष हो गये हैं कि कब क्या देखा, कब क्या अनुभव हुआ, कुछ पता नहीं है।
प्रश्नकर्ता ः यह अनुभव आपको बचपन में ही हो गये थे ?
पूज्यस्वामीजी ः हां जो कुछ जाना, ग्यारह वर्ष की अवस्था में ही होने लग गया था। सतरह अठारह तक विचार निश्चित होने लग गये थे। फिर नौकरी की। मां बाप की मृत्यु हो गई फिर शिवानन्द जी के पास गया। बद्रीनाथ गया। वहां से इन्दौर आया। फिर जज साहब के यहां जाकर रहा। फिर स्वामी राम से सम्पर्क हुआ। फिर अमरनाथ की यात्रा की। वहां से धीरे धीरे प्रयोग भी शुरू किये। अध्ययन भी किया। वहीं रमण साहित्य भी पढ़ा।
हां इन्दौर की ही बात है। मैं भंडारी मिल में तब स्टोरकीपर था। वहां एक स्टोरकीपर आया था। उसके हाथ में एक किताब थी। वह रख गया। वह सामान देखने अंदर गया था। ”मेसेज ‘फ्राम अरूनाचल’ यह किताब थी, मैने 5 -7 मिनट उसे देखा। मेरी पढ़ने की इच्छा हुई। मैने उससे कहा-किताब मत ले जाना। फिर इसके बाद ‘सर्च इन सेक्रेट इन्द्रिया’ पाल ब्रन्टन को देखा। फिर वहां जाने का मन हुआ वहंा गया। तब उन्हें प्रत्यक्ष देखा था।
कारण रहित कारण
जब उस महान शक्ति ने इच्छा की कि मैं अकेला हूं। अनेक हो जांऊ। इसीलिए कहा जाता है- कारण रहित कारण। हजारों सालों का इतिहास हमारे सामने है, क्या उपलब्धि रही, और आज की दुनिया कैसी है। इतने पैगम्बर हुए,..... संत हुए..... क्या परिवर्तन आया है ? जो अनादिकाल से चला आ रहा है,..... वही आज चल रहा है क्या उपलब्धि रही है, जो आज चल रहा है, वैसा ही हजारों साल तक चलेगा।..... इसका कोई कारण है। हमारी छोटी बुद्धि है। वह इतना महान है। इसीलिए वेदों को भी यही कहना पड़ा नेति-नेति........
प्रश्नकर्ता ः ज्ञानी का स्वभाव कैसा होगा ?
स्वामीजी ः शरीर और मन, जब तक शरीर है और आपको नजर आता है। ज्ञानी को भी अनुभव होता है।..... यह कांशीयसनेस की अवस्था है.....चेतनावस्था है। जब तक यह अवेयरनेस में विलीन नहीं हो जाता....., यही रहता है। जब तक अवेयरनेस चाहता है इस शरीर को बनाये रखने के लिए तब तक दोनो स्थितियां साथ-साथ चलेगी। जैसे कोई ऊपर की मंजिल से नीचे आकर मिलकर वापस ऊपर चला जाता है। वह अवेयरनेस से कांशीयसनेस में आकर बात करेगा। व्यवहार करेगा, जहां आवश्यकता होगी काम करेगा। कभी वह स्वयं अवेयरनेस के द्वारा भी अपनी इच्छा होने पर, कभी दूसरे व्यक्तियों की आवश्यकतानुसार भी करेगा। क्योंकि संसार एक है। भेद नहीं है। वो भी इसी अवेयरनेस के ही अंग है।
प्रश्नकर्ता ः क्या यह अवस्था ही शून्य कहलाती है:- इसमें आदत क्या छूट जाती है।
पूज्य स्वामीजी ः शब्दों पर मत जाओ,.....
शून्य का अर्थ खाली हो जाना नहीं है। हां, इस अवस्था में आवश्यकतानुसार वह क्रिया करता है। वहीं जाकर लहरों का पता चलता है। इसके बाद कोई स्थिति नहीं रहती क्योंकि वह अवेयरनेस में विलीन हो जाता है। जहां तक आदतों का प्रश्न है, शरीर के साथ रहती है। वो तो जब तक शरीर में है साथ रहेगी। इसमें पहुंचे और नहीं पहुंचे का अन्तर नहीं होगा। निसर्गदत्त महाराज के बारे में उस दिन पूछा था, यो अन्तिम अवस्था तक (चेन स्मोकर) धुम्रपान करते रहते थे। जब तक शरीर रहेगा, स्वभाव रहेगा। उसे भूख भी लगेगी, प्यास भी लगेगी। पर उसका मन उसमें नहीं रहेगा। अपनी जिम्मेदारियों को वह पूरा करेगा। कोई भी किसी उद्देश्य से आता है तो उसके उद्देश्य की पूर्ति भी करेगा। बस यही ध्यान रखना होगा कि यह प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल नहीं है।
प्रश्न- सब कांशियस में रहने के बाद जो अवेयरनेस की स्थिति है- उसमें क्या किया जा सकता है?
उत्तर- करने का सामथ्र्य उसको रहता है। वह अपने सामथ्र्य के बाहर भी कर सकता है, पर वहां करने के बाद उसका परिणाम भोगना भी होगा,.....वह जानता है। इसका पता रहता है सुख, शान्ति यह स्थिति मन की है। किन्तु आनन्द की स्थिति में भी वह धीरे-धीरे इस स्थिति से पहुंच जाता है, जहां वर्णन नहीं है।
आनन्द की स्थिति तभी आती है, जब मन नाभि में पहुंच जाता है। छोटे बच्चे की गुदगुदी करते ही वह खिलखिला पड़ता है। उसे गुदगुदी सहन नहीं होती है,.....वह हंसता है, प्रसन्न होता है। वह जो स्थिति होती है,.....वह इसी प्रकार की अनुभूति होती है। यह स्थिति आने के बाद भी मन वहां टिक नहीं सकता। क्षणिक होती है। अन्तर्मन वहां से धक्का देकर उछाल देता है। मन वहीं टिकता नहीं है। बाहर का रास्ता बंद होता है। अतः वह फिर नीचे आ जाता है, वहीं चक्कर लगाता रहता है।
प्रश्नकर्ता ः इस अवस्था में बाहर की स्थिति कैसी होती है ?
पूज्य स्वामीजी ः जो कि हमेशा रहती है। कोई खास नहीं होती है। मन की स्थिति, वह निश्चल हो जाती है। निष्क्रिय हो जाता है। जैसे पानी का बर्फ बन जान ा, जो उदाहरण दिया था। उसका अर्थ यही था कि यहां अब कोई हलचल नहीं है। यह इसी प्रकार एक जगह पड़ा रहता है, आवश्यकता हो तो काम आयेगा,.....नहीं तो पड़ा रहेगा।
प्रश्नकर्ता ः क्या आपकी यही स्थिति है ?
पूज्यस्वामीजी ः मैं कहां हूं मुझे क्या पता,..... इससे आपको क्या मतलब ? जब आवश्यकता होती। तभी कार्य होता है। जब बाहर की दुनिया से सम्पर्क होता है, तब ही सम्पर्क जोड़ा जाता है। बाहर की दुनिया से सम्पर्क जोड़ना पड़ता है। अनावश्यक रूप से भटकता नहीं हैं। साधारण मनुष्य का मन भटकता है। यह वह स्थिति नहीं है। जरूरी है तब काम लिया। मन को मारना यहां नहीं है। मन मर नहीं सकता बाहर का संबंध फिर किस तरह जुड़ेगा। बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है। उसके लिए भी उसकी आवश्यकता है। इस अवस्था में न तो बंधन है, न मोक्ष है,..... क्योंकि यहां यह अवस्था है ही नहीं....
प्रश्नकर्ता ः तो क्या मुक्ति नहीं होती है ?
पूज्यस्वामीजी ः मुक्ति,..... है ही नहीं व्यक्तिगत मोक्ष है कहां ? स्वप्न में हजारों चित्र नजर आते हैं, मिटेंगे तो पचास एक साथ मिटेंगे..... पूरा चित्र, पूरा फ्रेम एक साथ मिटता है। कभी देखा है, स्वप्न में एक चित्र कभी अलग नहीं हो सकता जब मिटेगा,..... तो एक साथ मिटेगा,..... मुक्ति एक की नहीं सबकी एक साथ होगी।
सत्संग
अरविन्दाश्रम की श्री मां के बारे में चर्चा हो रही थी। यह बताया जाता है कि उन्हें विदेश में ही स्वप्न में श्री अरविन्द के दर्शन हुए थे,..... फिर उन्हीं की तलाश में वे भारत आई तथा पांडिचेरी जाने के बाद वही की होकर रह गई, यह सब मात्र कल्पना है,..... यह कुछ और?
स्वामीजी- माताजी कहां से आई थी, और उन्होंने आने के बाद जो कुछ अरविन्द के बारे में कहा, लोग सन्देह करते है। कुछ कहते, कपोल कल्पित है, ऐसा कुछ नहीं है। अवेयरनेस की स्थिति में जब अन्तर्मन से सब व्यवहार शरीर का चलता है। अन्तर्मन महान शक्तिशाली है। वहां से उठने वाले संकल्प जिस व्यक्ति के लिए उठाए जाते हैं, वहीं टकराते है। अवेयरनेस इस अन्तर्मन को प्रेरणा देता है। यह जो मार्ग चल रहा है। माया में ही है, आश्रम भी माया मे ही है। इसको चलाने के लिए जिस किसी योग्य व्यक्ति की जरूरत है, उस व्यक्ति के अन्तर्मन का संबंध जुड़ जाता है। यहां आकर उस व्यक्ति के मन में जहां जाना है उसका चित्र अंकित हो जाता है।
दूसरा उदाहरण: निसर्गत्त जी की पुस्तक पाइन्टर से समझा जा सकता है। उस पुस्तक में एक कनेडियन के बारे में है। वह तो बम्बई में वापस जाना चाह रहा था। फिर वह न जाने कैसे घूमता हुआ ”चेतना“ बुकस्टोर तक पहुंच गया। वहीं उसने पुस्तक खरीदी ”आई एम देट” उसने उसे दिन रात मिलाकर पूरा किया।
वह इसको पूरा करने उनसे मिलने चला गया। पुस्तक में इसका पूरा वृतान्त है। यह अन्तर्मन का खेल है। महत्व कुछ नहीं है। जो व्यक्ति इस प्रकार की विचारधारा से जुड़े हुए हैं, उनका मार्गदर्शन हो जाता है। निसर्गदत्त जो कभी बाहर नहीं गए। न हीं कोई इच्छा रही। उनके शरीर यही उपयोग था। ‘लाईट’ हाऊस की तरह,..... पुराना स्तम्भ.....जहां से लोगों का मार्गदर्शन मिल जाता है।
कृष्ण मूर्ति की ‘पाथ लैस लैण्ड’ की चर्चा हो रही थी। प्रश्न उठा था हमारी तो प्रगति नहीं होती है, क्यों ?
स्वामी जी- हमारे जितने भी ग्रन्थ है। चिन्तक है। साधु सन्यासी हों, धर्म प्रचारक है, वे सभी दावा करते हैं, कि जो मार्ग उन्होंने बताया है उसी से मनुष्य का कल्याण होगा। वे बताते हैं, रास्ता दिखाते है। उसके लिए ग्रन्थ है। पथ विहिन जगह का मतलब यही है कि वहां जाने का कोई निश्चित मार्ग निश्चित तरीका नहीं है तुम जहां भी हो, जिस स्थिति में हो, यदि तुम्हारी दृढ़ भावना है और सही तरीका है तो तुम किसी प्रकार से वहां पहुंच सकते हो। अपने यहां भक्ति में नवधा भक्ति बताई गई है। क्यों,..... तुम किसी को भी अपना लो,..... लगन तुम्हारी दृढ़ होनी चाहिए।
अब सत्संग को ही ला, े सत्संग के बारे मन की अवधारणा है कि यही करने से सत्संग होता है- सत्संग का तात्पर्य है कि, सत याने श्रेष्ठ। श्रेष्ठ के साथ अपने भी जोड़ना आप घंटे भर से मेरे पास बैठे हो सब प्रकार की बातें हो रही है। पारिवारिक भी है, नौकरी की भी है, सिनेमा की भी है.....भी बाते कर रहा हूं। घंटे भर क्या रहा है आपका मन मेरे मन के साथ जुड़ जाता है। सत्संग का तात्पर्य है अपने मन को अपने से श्रेष्ठ के साथ जोड़ना।
क्योंकि संसार का कारण मन है। मन को ऊंचा उठना है। चुम्बक के साथ लोहा खिंच जाता है। जितना अधिक वह साथ रहेगा,..... उतना ही गुण लेगा इसी प्रकार जिसकी श्रेष्ठ विचारधारा है, उसके साथ जोड़ने का तरीका निश्चित है। किसी प्रकार किसी भी रूप मे, किसी भी सांसारिक स्थिति में आप है जो भी साधन है, उस साधन का उपयोग करलें उसे आप अपने साथ जोड़ दें।
कृष्णमूर्ति जी की सीख यही है कि आप पूर्वगत किसी भी प्रकार की अवधारणा (कन्डीशनिंग) को हटाकर जावें। जिस भी मार्ग से आओ, लेकिन उसमें लगन रहें,.....उसे अपना लो। रमण महर्षि का मौन सत्संग था। उनके पास बैठने से जो उनमें अंतर्मन से जो तरंगे निकलती थी, लोगों को उनसे शांति मिलती थी प्रेरणा मिलती थी। यही सच्चा सत्संग है।
स्मृति
स्वामीजी की मान्यता है कि विकार कभी समाप्त नहीं होते हैं वे तो जब जब तक शरीर है, रहेंगे, हां यह हो सकता है कि हम उनसे अप्रभावित रहना सीख लें। और यह प्राप्त होता है, निरन्तर वर्तमान में रहने से। वे कहा करते हैं कि स्मृति ही पाप है।
स्मृति क्या है ?
यही मन का कार्य है....मन स्मृति के कारण से ही निरन्तर अस्थिर रहता है। देखना, सुनना, संचय करना, कल्पना, आशा, अन्दाजा करना, आदि जो भी तरह तरह की क्रियाएं पैदा होती है। वह यही स्मृति करती है।
क्या स्मृति मस्तिष्क में हैं ?
उसका व्यवहारिक कार्य करने का स्थान मस्तिष्क है। पर उसका मूल स्थान नाभि है यहीं संस्कार है। संस्कार कोई स्थूल चीज नहीं है। वह ऊर्जा का एक खण्ड है। जहां सब संग्रहित है लहरें जो उठती है, वहां धक्का देती है। उस धक्के से ही उफान आता है। विकारों के स्पन्द तरंगो में आगे बढ़ती है। हां, बुद्धि के धरातल पर आकर विचारणा दिखाई पड़ती है। अन्यथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्पन्दन ही नीचे रहते हैं। जितना मन नीचे आ जाता है, स्मृति से असहयोग होना शुरू होता है। पर जहां है, वहां स्मृति है। स्मृति के बिना एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता है। वह तो गति है, कोई स्थिर इकाई नहीं है कि उसे आप हटाकर अलग कर दें। स्मृति आपका संसार है। ज्यों ही आप स्मृति से असहयोग करते है। आपका संसार सीमित नहीं होता है, बड़ा हो जाता है। सीमा तो आपकी स्मृति है वही अयथार्थ है। जो वास्तव है, वहंा कोई सीमा नहीं है। हां, हृदय वही है। जहां सीमा हे वहां हृदय नहीं हैं, वहां मात्र मन है। जहंा मन निष्क्रिय होता है, वहां हृदय खुलता है। मन का स्वभाव है, वह अंतर्मुखी नहीं होना चाहता है। वह तो हर पल लड़ता है, उसके नाना रूप है। मान्यताएं हैं, अंहकार है, कल्पनाएं इच्छाएं हैं, रूचियां हैं..... वह हर जगह अटकना चाहता हैं। ध्यान भी उसे अटकाने का नाम है। ध्यान से वह अंतर्मुखी नहीं होगा एकाग्रता से उसकी सक्रियता बढ़ेगी। मन का बहना, और तेजी से बहना, उसकी शक्ति नहीं है। मन जितना निष्क्रय होता है, उतना ही उसकी उसकी शक्ति बढ़ती जाती है। हम रात दिन जो भी कार्य करते हैं, उससे शक्ति घटती है। मन की निष्क्रियता से अर्थ होता है उसकी उथल पुथल का कम होना। तब मन शक्तिशाली बनना शुरू होता है। जितना मन शक्तिशाली होता जाता है, उतना ही वह अंतर्मुखी होता जाता है।
स्मृति को इसलिए पाप कहा है, कि यही एक वह आधार है। वह कारण है जो मन को अंतर्मुखी नहीं होने देती है। मन कोई वस्तु तो है नहीं, जिसे आप पकड़ कर स्थित कर दें।
यह तो अत्यन्त प्रवहमान उर्जा है। इसे संग्रहित कर सकते हैं। और इसका एक मात्र उपाय है, वर्तमान में रहना। तब मन, जहां जो है, वहीं रहना सीख जाता है। तब जब क्रिया के साथ होना है, तो क्रिया में रहता है। तब यह विचार नहीं होता है कि कार्य यह साधारण है या असाधारण कार्य न तो कोई छोटा है, न बड़ा है। यह स्मृति ही तो बताती है। यही रूचि,अरूचि, कहती है। यह विचारणा से आता है। जब विचारणा नहीं है, उथल पुथल नहीं है, तब जो क्रिया होती है, तब सम्पूर्ण ऊर्जा उस के साथ हो जाती है। यही निष्काम कर्मयोग हुआ। इसका सीधा तरीका हुआ, कर्म के साथ क्रिया के साथ, जो मन की उधेड़ न रहती है, वह नहीं रही। हां, मन अगर दौड़ता रहा तो वह निष्काम नहीं हुआ। वह तो कर्मफल लाएगा। उस भ्रम को फिर बना रखेगा। और यही तो हम नहीं चाहते है। वहीं नहीं करते है। चाहते हैं, शांति पाना पर सारे कर्म अशांति के करते है। पूरे दिन भर में एक भी क्रिया शांति के लिए नहीं करते हैं नींद भी गोलियों के सहारे लेते है। तथा मन को बलपूर्वक निष्क्रय करना चाहते है। स्वाभाविक नींद तक खो बैठे है।
यह कमजोर मन की निशानी है। जितनी स्मृति होगी, जितना उसका आदर होगा, मन उतना ही सक्रिय होगा, तथा तब उतनी ही उथल पुथल होगी।
समझना है तो यही समझना है कि यह पाप है। हम होता क्या है, परिस्थिति से लड़ते हैं उसे बदलना चाहते हैं, उससे क्या होगा ? कल आप प्राध्यापक थे, फिर वहां असंतुष्ट थे। फिर प्रशासन मे आ गए, यहंा भी असंतुष्ट है। शहर अच्छा नहीं तो कहीं अफसर अच्छा नहीं। कहीं कोई सुविधा मिली तो कहीं कोई दूसरी सुविधा मिली, पर बैचेनी यथावत रही। फिर यहां भी चैन नहीं। कभी जमीन खरीदी, तो कभी खान लेने चल दिए। कभी पता लगाया, क्यों ? यह बैचेनी क्यों ? आप चाहते क्या थे, और आज क्या चाहते हैं ? मैं तो बरसों से आपको देख रहा हूं। यहां शांति के लिए कोई नहीं आता है। इतने लोग है, कोई प्रेम पाने के लिए नहीं आता है। कोई नहीं पूछता है, प्रेम का पंथ ? वहां कैसे जाया जाए ? सब कहते हैं, तरक्की कब होगी ? व्यापार में लाभ कब होगा ? मकान का उद्धाटन करना है, आपको वहां आना है, बेटे की शादी करनी है, आपको आना है ? यह क्या है ? यही भ्रम है। जुड़ना अपने आपसे है, लड़ना है तो इसी भ्रम से लड़ना है। यह भ्रम पैदा होता है। आपकी स्मृति से कुछ आते हैं। वे अपने शाद्धिक ज्ञान की वर्षा करते है। उन्होंने जो पढ़ा है, वे बताने आते हैं। मुझे बताने की क्या जरूरत है ? तुम्हें अच्छा लगा है, आचरण में लाओ मैं, उनसे यही कहता हूं, मुझे नहीं सुनना, आपको अच्छा लगा है आप करें,, वे समझ ही नहीं पाते हैं, कि चाहते या हैं। और करना क्या है ?
हां, भय जरूर होता है। जो अज्ञात है वहां का पता किसी को नहीं है, जो तुम्हारा है, तुम्हें ही उसका पूरा पता, पता है। और तुम जो जितना पता है, उससे ही चिपटे हो। जब स्मृति का सहयोग हटता है, तब सारा ज्ञात छूटने लगता है। वह फालतू हो जाता है। जिसे लाखों का हीरा समझा जाता है, वह तो मामूली पत्थर जब निकलता है। तब उसे फैंकना पड़ता है। तब जो कल तक अज्ञात था आज अपने ही समीप दिखाई देता है।
हमारी स्मृति ऐसी ही है। जब सतर्कता बढ़ती है, तब लगता है, यही हमें वर्तमान में रहने नहीं देती। तब पता लगता है कि यही सबसे बड़ी कमजोरी है यही तंग करती है स्मृति का अन्त नहीं है। इसे समाप्त आप नहीं कर सकते हो। घनीभूत ऊर्जा है, जहां सबकुछ संग्रहित हो रहा है। हां, एक मात्र उपाय यही है कि इसका आदर न करें। लहरें उठेगी पर वे टकरा-टकरा कर लौटने लगंेगी। यही तितिक्षा है। और जितना वर्तमान में रहना होता जाता है उतनी ही यह स्मृति उपेक्षित होती जाती है। तथा निष्क्रिय होने लग जाती है। तब मन संलग्न होने की कला सीख जाता है। यही वास्तविक योग है। कुशलता से किया जाने वाला कर्म यही होता है।
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