अमृतपथ
नरेन्द्र नाथ
भूमिका
ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री
रामेश्वराश्रम जी महाराज दिनांक 26 फरवरी, 2000 को संक्षिप्त बीमारी के बाद
89 वर्ष की अवस्था में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।
28 जनवरी, 1911 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में रेडी गांव में आपका जन्म हुआ था। बचपन से सतत् आत्मानुंसधान में आप लगे रहे।
सन् 1952 में आपने राजस्थान के सुदूर
बकानी ग्राम में
‘गुरुकुल’ की स्थापना की थी। लगभग
25 वर्ष तक संन्यास लेने के बाद भी आप स्वतः
शिक्षा कार्य में लगे रहे। सन्
1972 में संस्था को सरकार को सौंप
दिया, आज जहां
माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है।
निरंतर चिंतनरत स्वामी जी ‘सहज साधना’ का अमृत संदेश साधारण जन तक पहुंचाते रहे। न तो विधिवत कोई आश्रम
वहां था न ही कहीं विशिष्ट परंपरा के निर्वाह की प्रक्रिया थी, एक साधारण सी कुटिया, और झोले
के साथ स्वामीजी अंचल के सामान्य अकिंचन घर तक आध्यात्मिक का संदेश
देते रहे। न अमीर न गरीब
किसी प्रकार का कोई भेद वहां
नहीं था। सभी के लिए कुटिया का द्वार सदा खुला रहता था। अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा के बावजूद स्वामी सरल व सहज ही रहें।
आपके निरन्तर सान्निध्य में कुछ प्रश्न उभरते
रहे, उन्हें दो दशक पूर्व लिपिबद्ध कर ‘अन्तर्यात्रा’ के रूप में प्रकाशित किया था।‘‘ यह पुस्तक तब सभी के आकर्षण का केन्द्र बन गई थी। फरवरी 2000 में पूज्य स्वामी जी ने अस्वस्थता की स्थिति में कोटा
में प्रवास किया,
साधक दूर-दूर से आते रहे,पूज्य स्वामी जी उस स्थिति में साधकों की जिज्ञासा का समाधान करते
रहे। उनकी लीला
संवरण का अंतिम
अध्याय प्रारम्भ होचुका था।प्रश्नकर्त्ता का मन कभी का अनजाने भविष्य की कल्पना में चुप हो गया था।स्वामीजी अपने मौन से जब बाहर आते सहज चर्चा में व्यस्त हो जाते।तब स्वभाववश फुटकर कागजों में उन चर्चाओं को लिखने की आदत होगयी थी। उधर उनका स्वास्थ्य भी धीरे -धीरे गिरता
जारहा था।मेरा स्थानानान्तरण भी बीकानेर होगया था।में लम्बे अवकाश पर था। लग रहा था ,जो ज्योति लगभग तीस वर्षों से मार्गदर्शन कर रही है ,अब बुझने को ही है।मुझे लगा मेरे
भीतर की सीपी
अचानक खुलगई है, मैं बस हर बूद को समेटने के लिए व्याकुल हूं !
परंपरा से अलग, स्वामीजी की अपनी ही पहचान थी। सभी प्रकार की औपचारिकताओ, परंपराओं से परे स्वामीजी सुधी पाठक
होते हुए भी धार्मिक-ग्रन्थों, उपदेशों, प्रवचन परंपराओं से मुक्त मिले।
जमा पूंजी बस एक थैला और हर प्रश्न का उत्तर स्वयं के अनुभव से ही, यही स्वामीजी की विशेषता हमें खींचती ले गई।
तब से एक लंबा
अरसा हो गया है, साथ रहने
का,जिसे सत्संग कहा जाता है। हम सवाल पूछते
रहे, अपने आपको
समझते रहे, और स्वामीजी कुशल बागवान की तरह हमारे
भीतर अंकुरित पौधे
को सम्हालते रहे, अपनी कृपा वाणी
से पल्लवित करते
रहे।
यह पुस्तक इन्हीं औपचारिक बातचीत का संग्रह है। स्वामीजी ने कहीं सिलसिलेवार वार्ता नहीं की,न हीं यह प्रचलन माला है, वरन्
एक साधक की डायरी के अंश हैं, जो स्वामीजी से इतने वर्षों के सानिध्य में जिज्ञासा वश प्राप्त होते रहे।वर्षों से साधक मन जिन सवालों से जूझता
रहा और प्रश्न पाता रहा, यहां
उन्हीं का समाधान जो पाया गया है, अभिव्यक्त हुआ है। जैसा कि पहले निवेदन किया-
स्वामीजी शास्त्र चर्चा
से प्रायः अप्रभावित ही रहे हैं।
उनकी यात्रा निज की यात्रा है। अतः समाधान वहीं
से है। यह यात्रा सहज की ओर है। हो सकता है कहीं
दुहराव भी आ गया हो। स्वामीजी के स्वयं के व्यक्तित्व में ”मौन”
ही प्रमुखता पाया है। शब्द के साथ अधिक खिलवाड़ नहीं है। प्रायः प्रश्नों का उत्तर
वे सरलता से, अत्यन्त संक्षिप्तता के साथ देते हैं।
उनकी ”समास” शैली
ही यहां व्यक्त हुई है। कहीं
कहीं उनसे जो बातचीत हुई, उसे उसी तरह से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
कहीं बातचीत ”प्रस्तोता” की भाषा पा गई है। पर प्रयास यही रहा है, जो स्वामीजी का कथन है, वही प्रस्तुत हो सके।
स्वामीजी परंपरा से हटकर हैं। जहां
योग, भक्ति, कर्मकाण्ड तथाकथित ध्यान परंपराएं अपना अर्थ खो देती हैं। यात्रा उनकी साधक की यात्रा है, और प्रयोेग, जो प्राप्त हुआ है, शरीर
और जगत उसके
साथ है। इसीलिए यहां कहीं शास्त्र की आवृत्ति नहीं
है।वेदान्त की जो दार्शनिक पृष्ठभूमि है, उसकी आचरण में अभिव्यक्ति स्वामीजी के सानिध्य में पाई जा सकती है। जहां यात्रा तो है, उसकी वास्तविक पहचान भी है, पर न स्वीकृति न अस्वीकृति, वरन उसके साथ तटस्थ
साहचर्य है। आध्यात्मिक मानववाद की चरम निष्पत्ति कर्म में सेवा, आचरण में त्याग और अभिव्यक्ति में प्रेम है। यही स्वामीजी की पॅंूजी है, जिसे
वे राजस्थान के पिछड़े इलाके बकानी
के गांव मोलक्या में गरीब जनता
के बीच मुफ्त
प्रसारित कर रहे हैं। याज्ञवल्क्य, अष्टावक्र, जनक,
रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि, ओशो,स्वामीजी की चर्चा के विषय रहेे हैं।
स्वामीजी अपने आपको
उसी परंपरा में स्वीकारते हैं, जो प्रयोगधर्मी हैं, सहज हैं।यह पुस्तक इसी प्रयोगधर्मिता को कहां
तक अभिव्यक्त करने में सफल रही है, इसका आकलन
सुधी साधकगण ही कर पायेंगे। मैं मात्र प्रस्तोता हूं। कहंीं कुछ कमी रह गई हो तो वह मेरी
है, उसे में स्वीकारता हूँ। ।वे ही अमृतकण संकलित कर सुधि साधकों की सेवार्थ प्रस्तुत हैं।
अनुक्रमणिका
1. अमृत पथ
2. प्रयास
3. दुख का प्रभाव
4. प्रेम
5. अन्तर्यात्रा
6. अवलोकन
7 यात्रा
8. सत्संग
9. अनुभव
10. साधना
11. अनुभव-2
12. प्रसंग
13. साधन सूत्र
14. सजगता
15. लगन
16. यात्रा -2
17 धर्म
18. ध्यान
19. योग
20 सेवा
21 कर्म
22 स्मृति और अवधारणा
23 विश्वास
24 साधना
सार
25 अर्तयात्रा
1. अमृथ पथः-
प्रश्न था- पूज्य स्वामी जी हमारा तो मन ठहरता ही नहीं है।भटकता ही रहता है ,क्या
किया जाए?
स्वामीजी ने कहा थाः-
”आपने सवाल किया
है, मन ठहरता
ही नही है, एकाग्र ही नही हो पाता
है।
आपको पहले
भी बताया था कि किसी बाहरी
क्रिया से या किसी अन्य
उपाय की सहायता लेने की कोई आवश्यकता ही नही है। मन का स्वभाव है कि जिसका भी आप चिन्तन करेंगे, उसी के अनरूप यह ढल जाएगा। यह जो बाह्य क्रियाओ का सहारा लिया
जाता है। उनसे
शुरु-शुरु में तो सहायता मिलती
है। फिर मन उन्हीं का दासत्व ले लेता है। जब तक पूजा
रही ध्यान रहा,
मन एकाग्र हुआ,
उठते ही फिर वही विचार आ गए। मन भटकने
लगा। लोगों को देखा है, चेहरा
खिंचा- खिंचा रहता
है। कहते है, ध्यान लगाकर आये है, उसमें भी इतनी कठिनाई, इतना
कष्ट, यह तो विश्राम के लिए था? पूछो उनसे?
तभी मुझे अपने मित्र
की स्मृति आई्र
, वे ध्यान मार्गी हैं , अपने सत्संग में सीखकर आए थे । ध्यान
में भीतर का आसुरी प्रभाव तेजी
के साथ अवलोकित होता है, उसे विरेचन की क्रिया से बाहर करदो।
वे कमरा बंद कर शेर की तरह दहाड़ रहे थे।
घर के लोग सहमे हुए थे ।, कुछ देर बाद वे कक्ष
से बाहर आए ,
पसीने से लथपथ
थे मैंने पूछा
, क्या ध्यान इतना
तकलीफदेह होता है?
वे बोले , आप क्या समझेंगे।
एक अन्य जगह अतिथि
था , उन मेजबान का पड़ौसी से विवाद होगया था ,
बात कोर्ट - कचहरी
तक जाने की होगई थी। घर की गृहणी ने बताया , पड़ौसी ने जो बाहर दीवार
बनाई है , वह एक इंच आगे सरकादी हें । मैंने कहा कि आपकी दबाई तो नहीं ।
वह बोले ,पर यहतो
अतिक्रमण है?
उसकी वह जाने , नगर निगम उस पर कार्यवाही कर लेगा पर आप क्यों, v”kkar
है।? आप क्यों कार्टे और’ कवहरी की बात कर रहे हैं
?
आप उससे बात तो करलें।
बात की थी , बोला
, जब आपकी टूटे
आप भी एक इंच बढ़ा देना
, यहॉं किसी को कोई आपत्ति नहीं।
वे
बोले , वह मुझे , जानता नहीं , मैं दो धंटे घ्यान
लगाता हूं, संकल्प साध लिया तो अस्पतालो के चक्कर लगाता मिलेगा
में अवाक था , क्या
यही ध्यान रह गया हेै?
शांत होना कोई कष्टकारी साधना नहीं है। नहीं शरीर को कष्ट देना आवश्यक है। एक परिपाटी चल गई है। आप करते रहो इससे मन जो शक्तिशाली है। वह शक्तिहीन हो जाता
है। जड़ बना देता है। मन की उर्जा कुंद
हो जाती हे। इसका कोई मूल्य
नहीं है।
अब आप विचार करें, मन किन-किन विचारों में रहता है। आपने ही बताया
है, भय है, लोभ है,क्रोध
हैे।
रात- दिन आप किसी भी प्रकार से धन आ जाए, इस चिन्तन में डूबे
रहते हैं। हर व्यक्ति , हर परिवार, समाज लोभ की दिशा में ही दौड़ रहा है, कहने को त्याग
की बातें होती
हैं, पर जो त्यागी है, उनसे
बड़ा लोभी कोई नही है। नाम वे परमात्मा का लेते है, ईश्वर
चर्चा की बातें
करते हैं। पर गृहस्थ से भी अधिक उन्हें धन व यश की चिन्ता रहती है। साधन सुविधा की उन्हें अधिक तलाश
है। उनके रहने
के तरीके देखो।
आज आश्रम भी होटलों की तरह हो गए हैं।
साधु, महात्मा, मैनेजर बन गए हैं ज्ञान
वार्ता करेगें, ग्रन्थ सुना देगें, मीठी-
मीठी लोभ लुभावनी बाते करंेगे, पर उनकी दृष्टि साधारण जनता की जेब पर रहती है।
आज सारा समाज इसी प्रदूषण से युक्त
हो गया है। चित्त ही प्रदूषित है। चेहरा देखो,
वहाँ से लोभ ही झांकता है। धन का लोभ हटता हैतो प्रशंसा का लोभ पैदा हो जाता
हैं लोभ और प्रशंसा में दो ही नावें हैं,
जिन पर सवार
होकर संसार सागर
में लोग यात्रा करते हैं।
और यही कारण है कि लोभी को जो भी प्राप्त है, उसके छिन जाने
का भय हमेशा
रहता है।
धन संग्रह किया है, उसे चोर- डाकू नही ले जाएं, यही भय है। समाज
में प्रतिष्ठा बनाई है, वह छिन न जाए, पद से जो सम्मान- सुविधा प्राप्त है, वह छिन न पाए उसी का भय है।
जब हमारी
प्रसन्नता दूसरे पर निर्भर हो जाती
है, तब हमारे
भीतर भय और लोभ उत्पन्न होता
है।
गीता में कहा गया है, जो व्यक्ति दुःख मे अनुद्विग्न है, सुख में जिसकी लालसा नहीं है, वही रागसे, भय से, क्रोध से परे जा सकता है।
पुरानी कहावत है ,
चाह गर्इ्र चिन्ता गई मनुआ बेपर वाह
जिसको कछु नहीं चाहिए
, वही शंहशाह।
सतं कबीर कह गए 7
आए थे हरि भजन को औटन लगे कपास
हम यहॉं आए क्यों
हैं, यही पता नहीं, दूसरोंसे अपना भविष्य पूछते फिरते हैं।
जब कि प्राकृतिक विधानयही है ,
उस परमात्मा ने मा के गर्भ
में हमारा ध्यान
रखा , बाहर कर्तव्य कर्म
की पूरी शक्ति
देकर भेजा है। पर हम उन शक्तियों का दुरुपयोग कर अपने जीवन
को नारकीय ही बना लेते हैं।
दूसरा ही दुःख का कारण
है, वही सुख का कारण है, यही वह सबसे
बड़ी भूल है ,
जो अपने आपको
अपने से ही दूर ले जाती
है।
है।
प्रीति जब कम होने
लगती है, तब दूसरे पर आश्रित होने का भाव हटने लगता है।
यहीं पर वर्त्तमान में रहना
प्राप्त होता है।
ऐसा क्यो
होता है, उस पर विचार करो।
हमारी संसार
पर उसके क्रिया कलापों पर ममता
है। मैने कभी भी छोड़ने को नहीं कहा। छूट जाना ही सार है, यह ममता हमारी बढ़ती
जाती है। संतान
के प्रति हममें
कर्तव्य परायणता का भाव नहीं होकर
ममता का भाव रहता है। ममता
में आसक्ति होती
है। वह पूरी
नही होने पर, दूसरे के द्वारा आपके राग की पूर्ति नहीं होने
पर आपको क्रोध
आता है। निरंतर दूसरों का चिन्तन, और उसका या उसके द्वारा अहित
न हो जाए यही कल्पना आपको
भयभीत करती रहती
है।
जब आप ईश्वर को मानते
हैं, कर्मफल को मानते है, गुरु
को मानते हैं,
तो कहीं पर तो आपको विश्वास होना चाहिए। आपको
न अपने ऊपर विश्वास है, न किसी और पर। यही
परंपरा
आप बच्चों को सौंप जाते हैं।
आपको एक कहानी उस फकीर
की सुनाई थी।
वह दिन भर मेहनत मजदूरी करता था। सुबह
उठता किसी भी दरवाजे पर खड़ा होकर काम मांगता। काम मिलने पर काम मिला है, पूरे मन से उसे करता, बदले
में बस भोजन
लेता रात को मस्जिद में जाकर
सो जाता ।
एक रात वहॉं फरिश्ता आया,
वह लालटेन की रोशनी में कुछ लिख रहा था
फकीर ने पूछा, ”क्या कर रहे हो?“
उसने कहा,
”जो परमात्मा को प्यार करते है, उनका नाम लिख रहा हूँ।“
”उसने अपना
नाम बताया पूछा,
मेरा नाम तो नही है?“
फरिश्ते ने सूची पढ़ी, बोला,
”तुम्हारा नाम तो नही है।“
वह कुछ देर उदास रहा,
फिर जाकर अपनी
जगह सो गया।
कुछ दिनों
बाद उसने देखा
फिर फरिश्ता आया और सूची बना रहा है। वह उधर गया, बोला,
”अब क्या कर रहे हो?“
उसने कहा,
”सूची बना रहूँ।“
‘किसकी’
”जिन्हें अल्लाह प्यार करता है।“
वह मुड़ गया, बोला, ”इसमें
मेरा नाम तो नही होगा!“
‘उसने कहा
- ”अपना नाम तो बताओ।“
उसने नाम बताया।
उसने सूची
पढ़ी, बोला, ”तुम्हारा नाम तो सबसे
ऊपर है।“
कहानी, कहानी
होती है। पर उसका अभिप्राय होता है। हम जहाँ
भी विश्वास करें,
वहीं विश्वास पूरा
होना चाहिए।
परमात्मा ने यहॉं हमें
कर्म करने के लिए भेजा है ,
इसीलिए उसकी स्मृति सदा बनी रहे और हम अपना
कार्य बेहतर से बेहतर करते रहें।
प्रायः हम इस्लामिक साधना की चर्चा से कतराते हैं।
,इस्लामिक साधना का मूल मंत्र है ,
अल्लाह पर , परमात्मा पर नाम आप जो चाहे देदें। पूरा भरोसा , उसके
बाद किसी काम से परहेज नहीं।
सब काम उसका
ही है खुदा के दरबार में सबबराबर , यहॉं
तो दो संत आमने- सामने आजाएं तोपहले कौन नमस्कार करेगा , किसका
आसन कितना ऊॅंचा
रहेगा , यही विवाद का विषयबन जाता
हे।
मैं एक सरकारी नौकरी मे बड़े पद पर था , एक संत के कुछ शिष्य आए , बोले वे है
हम आपको निमंत्रण देने आए हे। मैं गया , वे , कक्ष में ऊॅंचे तक्ष्त पर बैठे थे , मुझे जमीन पर बैठने को कहा गया ,
मैंने कहा, मैं जमीन
पर नहीं बैठ पाता , जो संत जी की समस्या है , वही मेरी समस्या है , आप सामने कुर्सी लगवादें।
यही आज की धार्मिक यात्रा बन गई है। अहंकार प्रदर्शन ही बस हमारी
पूंजी बन गई है।
,
हमारे पास दो ही बातेंहैं।
पहली बुद्धि चातुर्य है, हम उसके ही सहारे
चलते हैं। जहाँ
से दो पैसे
का लाभ मिले,
वही काम करना
अपना उद्देश्य हो गया है। हम गलत को सही,
सही को गलत अपनी अक्ल से ठहराते आए हैं।जो सही है, उसकी
पहचान सभी को हैं। सही की आवाज हमारे भीतर
से आती है, पर हम उसे नही सुनते हैं वही आवाज विवेक
की है। परमात्मा ने हर प्राणी को विवेक सोंपा
हैं पर वह उसका आदर नही करता है, हर गलत कार्य को सही ठहराने का प्रयास करता है।
अपना आचरण
कोई नही देखता। अपना खुद का आचरण देखो। कितना
आपने सही किया
है, गलत किया
है। यह व्यक्ति को खुद पता है।यह जो चित्त
है, दर्पण की तरह है।यहॉं भुक्त,अभुक्त वासनाओं का प्रभाव अंकित रहता
है। पर हम उसे दबा कर रखते हैं। बाहर
आते ही उपद्रव खड़े होने की आशंका बनी रहती
है।
ध्यान इस संग्रह के दबाव
का कम होते
जाना है।
आप चाहते
हैं, शांति, आप चाहते हैं अभय और आप यह भी जानते हैं,
आपने अब तक विवेक विरोधी कार्य
ही तो किया
है।
जो आपके
पास किसी आशा से आया था, आपने उसका कार्य
किया अथवा नहीं
यह महत्च पूर्ण
नहीं है, पर आपने उसके साथ गलत भाषा का प्रयोग किया झूठा
आश्वासन दिया, क्या
यह विवेक का अनादर नहीं है?
सच बोलने
में आपका क्या
जाता , पर आपको लगता है, आपका
मान सम्मान घट जाएगा, प्रलोभन से भी काम करना
विवेक विरोधी ही है, पर उसे कौन मानता है?
आज समाचार पत्र, ज्योतिषियों, वास्तुविदों के लेखों से भरे होते है। तंत्रिक उपचार भी बताते हैं कोई उनसे पूछे हजार-पांच सौ सालपहले इन्ही ग्रन्थों की ,
और इन्ही लोगों
की ,राजाओं के राज में भरमार
थी.... क्या वे बच पाए, इतनी
गुलामी और इतना
अत्याचार समाज ने भोगा, इनसे कोई लाभ होने वाला
नही है। इनकी
फालतू बाते मनोरंजन के लिए हैं।
इनसे अधिक इनका
कोई मूल्य नही है।
जब तक मनुष्य अपने विवेक
का अनादर करता
रहेगा, वह भय और प्रलोभन से युक्त होकर कार्य
करेगा, उसके जीवन
में अभय और शांति नही रहेगी।
यहॉं संसार
में सभी वस्तुएं सदुपयोग के लिए प्राप्त हैं ये जीवन के लिए अनिवार्य है। परन्तु उसमें लालसा नही रखनी है।
स्वामीजी कहते थे- मैं, धोती में छेद होते ही उसे हटा देता
हूॅं। एक धोती
के दो टुकड़े
हैं, दो कुर्ते बस। यह एक झोला है,जब इतने कम सामान
में मेरा काम चल जाता है, तब आपने मुझे
देखकर क्या समझा?
हम अपनी आवश्यकताओं को
अनावश्यक रूप से बढ़ाते चले जा रहे है। हमारी
जरुरतों को प्रकृति हमेशा पूरा करती
है। परन्तु हम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाते ही चले जा रहे हैं। क्या चाहते
हैं, हमें भी नही पता है? वस्तुओं के संग्रह में सुख नही है। सुख तो वस्तु के उपभोग
व उपयोग में है। यह हमेशा
ध्यान रखना चाहिए।
परन्तु यही नही होता है।
हम जिसे
मानते हैं, उस पर हमारा विश्वास नही है और जो जानते हैं,
वह हमारा व्यवहार नहीं है। जब हम अपने जीवन
में विवेक का आदर करते हैं।
तब हमारा विश्वास भी, वस्तुओं से, इनके प्रभाव से, हटने लग जाता
है। विश्वास एक बार आने के बाद जाता नहीं
है, विकल्प रहित
विश्वास जब अपने
भीतर घना होने
लगता है, तब वहाँ भय नही रहता।
जो होना
है, वह तो होगा ही, प्राकृतिक विधान से होना
निर्धारित है, व्यक्ति तो मात्र दृष्टा है, देख रहा है, उसके शरीर
के द्वारा मन के द्वारा जो भोगा जाना है, वह उसके लिए तैयार रहता है।
स्वामीजी बता रहे थे- आपको
कंवर लाल की लड़की की शादी
के बारे में बताया था। वह आया था, उसने
कार्ड दिया ।
पूछा तो बताया, कुछ हजार
रुपयों की जरुरत
होगी।
मैने संकल्प लिया आज से जो भी भेंट
आएगी, उसमें जो रुपये आएंगें, सब उसे दे दूंगा। तब सो पचास
रोज आ पाते
थे। उसी रात सपना आया मैं जा रहा हूँ,
रास्ते में कुतिया आई, उसने मेरा
पांव काट लिया,
मैं लहूलुहान हो गया हूँ।
सुबह उठा,
मैं समझ गया,
संकेत मिला है। पर मेरा संकल्प था, सहायता करनी
है, जो होगा
देखा जाएगा।
अगले ही दिन से भेंट
पूजा ही कम हो गई। जो सौ-पचास 3पये भेंट देते थ,े उन्होंने आना बन्द कर दिया।
बड़ी मुश्किल से कुछ हजार
हो पाए। तभी पास से कथा का बुलावा आया।
वो जो कभी इधर नहीं आता था, वह आया।
मैने सोचा वहां
से कुछ मिलेगा, उससे कमी पूरी
हो जाएगी।
उस रात फिर वही सपना
आया।
सुबह मै उठा, तैयार हुआ,उससे कहा था, कथा समाप्त होते-
होते मैं पहुँच
जाऊंगाा। पैदल- पैदल
गांव गया। दूर,
उधर खेतों से लाउड स्पीकर की आवाज आ रही थी। मैं पगडंडी पर जा रहा था। वहाँ कथा हो रही थी, वहाँ पहुँचने वाला
था कि अचानक
कहीं से काली
कुतिया निकली। उसने
मेरे टखने पर दांत गड़ा दिए।
मै खून से नहा गया। मैने
वहीं धोती फाड़ी
पट्टी बांधी। खून आना बंद हो गया। मैं चारपाई पर आकर लेट गया। वहीं खाना
खाया। जितना लेता
हूँ, उतना लिया।
फिर थाली नीचे
रख दी। वही कुतिया वहीं आकर नीचे चारपाई के नीचे बैठ गई। ये लैैटते समय लोग मोटर साइकिल लाए। मैने मना किया पैदल ही आ गया। बाद मै बकानी वाले
डॉक्टर को लेकर
आए। ड्रेसिंग तो मैने करवाली, पर इंजेक्शन नही लगाए।
.. यह घटना
क्यों बताई,सोचो।
हर घटना
का अभिप्राय होता है।
बाद में कंवर लाल से पूछा रुपयों का क्या हुआ?
उसने बताया,
शादी तो अच्छी
होगयी, पर रुपये
उसका कोई परिजन
ले गया।
यह सही है , यही प्राकृतिक विधान है न हम किसी
को सुख पहुंचा सकते हैं न दुख , पर क्या प्रयत्न नहीं करें?
नहीं कर्तव्य करना
, मदद करना हमारा
फर्ज है , इससे
उसे लाभ होगा
या नहीं , यह उसका अपना विधान
हें
विश्वास स्वयं
के प्रति होना
चाहिए। हमारा कार्य
विवेक जन्य हो। कठिनाई तो आयगी,
तो हम उसे भोगेंगे, भागंेगें नहीं। वहीं आत्म विश्वास पैदा होता है।यह
हमेषा सोच बना रहे , इससे बड़ा कोई जादुई ताबीज
नहीं है, कि कोई भी परिस्थिति है, वह स्थायी नहीं है।
आज है कल नहीं रहेगी।
..यहाँ तो सब परिवर्तनशील है। हम थोड़ा सा भी परिस्थिति बदली , अनुकूल नहीं रही , घबड़ा
जाते हैं , आत्महत्या तक कर लेते
हैं, क्यों? न अपने ऊपर, भरोसा
है न किसी
और पर।
यही हमारी समझ , हमारा
मार्गदर्शक बनी रहे
, हमारी प्रसन्नता दूसरे पर आश्रित नहीं है। हम पर ही है। तब सारा सोच बदल जाता है। जागृति में जब आनावश्यक विचारणा का प्रवाह रुक जाता
है। हम अधिक
से अधिक क्रिया के साथ रहने
लग जाते है, तब हम स्वतः
ही हम शांत
अवस्था में रहने
लग जाते हैं।
इस अवस्था में रहने के बाद, अनावश्यक संकल्प विकल्पों के उठने
की जो प्रक्रिया है, वह रुक जाती है। आवश्यक संकल्प स्वतः ही पूरे होने लग जाते है। अंतः
प्रेरणा सजग हो जाती है।
2.प्रयास
प्रश्न थाः- स्वामीजी ,प्रयास, यहॉं क्या करना
है?
तब स्वामीजीः ने समझाया था-
”जो होना
है, मानसिक ही है। शरीर के द्वारा की गई हर क्रिया शरीर तक ही रह जाती
है।
यह बात दूसरी है कि शरीर का और मन का गहरा
संबंध है।
अन्न के सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों से ही मन को पोषण मिलता है। प्राण का भी अन्न से ही संबंध है।
शक्ति तो एक ही है, परन्तु वह शरीर
में आकर दो भागों में विभाजित हो जाती है।
प्राण शक्ति
पोषण देती है।
मन, स्मृति, कल्पना,... विचार को आश्रय देता है।
संस्कार निर्मिति और उनके क्षय
का अन्न से गहरा संबंध है। वो पहले उस बच्चे का दृष्टान्त दिया था।
ब्राह्मण दंपत्ति का बालक था, जो खेल रहा था, खेल में मिट्टी की मूर्ति बनाता
था तथा फिर छुरी से उसका
शरीर काट देता
था। वह यह खेल, खेल रहा था। पिता उसे देख कर चौंक
गया। उसने पत्नि
को बुलाया, वह भी यह देखकर
चौंकी।
दोनो ही पति- पत्नि, नेक निष्ट दंपत्ति थे। उसे कुछ याद आया। वह तत्काल सेठ के पास गया, जिसने उससे
एक माह की पूजा कराई
थी, तथा यज्ञ
करवाया था।
उसने पूछा-
आपने मुझसे वह पूजा करवाई थी, दक्षिणा भी दी थी। तब मेरी
पत्नी गर्भवती थी। घटना को तीन वर्ष हो गए हैं, क्या आप मुझे उसका कारण
बता सकते हैं?“
सेठ, चौंका,
‘बोला- क्या
हो गया।“
”फिर भी!“
वह बोला,
”दूर देश के एक कसाई मे पास मेरा काफी
रुपया उलझ गया था। डूब ही गया था। मैने
संकल्प किया था, वह धन मिल पाएगा तो मै भगवान शिव का अभिषेक करवाऊंगा, मैने वही पूजा करवाई
थी। सौभाग्य से मेरा धन वापिस
मुझेे मिल गया।
”वह ब्राह्यम्ण घर लौटा... फिर दक्षिणा से प्राप्त समस्त राशी लेकर
सेठ को सौंप
आया।
अन्न संस्कारो कों किस प्रकार प्रभावित करता है, उसका दृष्टान्त है। गर्भ में जो अन्न गया, उससे
भी संस्कार प्रभावित होते हैं।अन्न और मन का गहरा
संबंध है।
अन्न का संग्रह, अन्न
को पकाने वाले
की भावना, और भोजन लेते समय आपकी भाव दशा तीनों महत्वपूर्ण हैं।
उस संत का भी दृष्टांत दिया था।
”उन्हें एक सेठ के यहॉं
भोजन का निमंत्रण था।...अच्छा भला परिवार था। वे वहाँ गए, भोजन
बाद वहीं विश्राम की व्यवस्था हो गई। वे वहीं
विश्राम करने लगे।
अचानक निगाह सामने
मेज पर रखे हार पर गई। उठते समय उन्होंने हार उठाया और भीतर धोती में उसे खोंस लिया।
चादर ओढ़ रखी थी। सब छिप गया। सबने बहुत
आदर से विदा
किया।
थोड़ी दूर जब आगे बढ़े...तो चांेके, यह मैने क्या किया...
उल्टे पांव
वापिस लौटे’
उन्हें वापिस
आता देखकर, सब चौंक गए।
वे अंदर
उसी कमरे में गए, सबको बैठने
को कहा।
फिर पूछा..
भोजन किसने बनाया
था?
डरत- डरते
सेविका सामने आयी।
बोले डर मत,सच बताना,
जब तू भोजन
बना रही थी, तब क्या सोच रही थी?
वह बोली
महाराज जैसा हार सेठानी जी के पास है, मेरे
पास होता तो कितना अच्छा होता,
मैने उसे मेज पर रखा देखा
था..
वह हंसे,जा, फिर हार निकाला और मेज पर रख दिया।
बोले, उस अन्न ने मेरा
मन भी खराब
कर दिया...
हमारे संस्कार ही हमारी विचार
धारा को बनाते
है। बाहर एक ही घटना घटती
है, पर उसका
प्रभाव सब पर अलग अलग होता
है। विचारों में जो मत विभिन्नता होती हैं, उसका
कारण यही है। रंग,गुण मन में नही है। वह तो शक्ति
,संस्कार से जुड़कर
जिस रुप में इंन्द्रियों को धक्का
देती है, उसे हम उस रुप में जान पाते
हैं। एक ही विचार को बार बार दोहराने से वह संकल्प बन जाता है। फिर संकल्प से कर्म,
कर्म से भोग,भोग से भावना,
और भावना संस्कार पर नयी छाप छोड़ देती है।
मन और इस संस्कार की एकरसता से ही मन को सतोगुणी, रजोगुणी, तमो गुणी
माना जाता है।और
यह संसकार क्या
हैं? ये हमारी
भुक्त -अभुक्त वासनाओं की स्मृृृतियो ंकी छापंें ही हेैंं।
मन तो ऊर्जा है, वहां
गति है, हॉं उसकी पहली पहचान
विचार के रुप में होती है। धक्का लगते ही जो लहर उठती
है, वह विचार
में ढल पाती
है। वह तुरन्त इन्द्रियों को घक्का
देती है, हम क्रियारत हो जाते
हैं। विचार के उठते ही क्षण
भर उसे देखो,
उस पर चिन्तन नहीं
होना चाहिए। तत्क्षण प्रतिक्रिया नहीं।उसके साथ बहना नहीं है।पर
हमारी आदत है ,
हमें बचपनसे बुद्धिगत ही प्रशिक्षण दिया गया हे। हम तत्काल प्रतिक्रिया देते हें अगर संकोच
हुआ तो लहर बाहर नहीं जा पाती , भीतर उसी वेग को ले आती हैे। यही हमारे भीतर अनेक
विकारो ंको जन्म
देदेती हेैंं पर अगर आपवर्तमान मे ंहैं तो जैसे
चट्टान से टकराकर पानी की लहर लौट जाती हेैं,
वैसे ही वह वेग प्रभावित नहीं कर पाएगा।
हां अगर निरंतर वर्तमान में रहने का लक्ष्य बना रहता
है, तो हम बहुत सारी समस्याओं से बच सकते
हैं।
वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही हमे पता लगता है, कि हमें क्या
करना है, क्या
करना नहीं है।
हम निरंतर निरर्थक बातचीत करते
रहते है। न जाने क्या क्या
बोलते रहते है। दूसरे की बुराई
और अपनी प्रशंसा में ही समय लगा देते हैं।
यह अपनी शक्ति का दुरुपयोग ही है। वर्तमान में रहने का अभ्यास बढ़ते ही विवेक जगता है। जो सही है, उसकी सूचना विवेक
दे देता है।
इसीलिए पहले
कहा था हर क्रिया की प्रतिक्रिया नही होनी चाहिए। प्र्रकृति का कोई भी कर्म निरुउद्देश्य नही है। उसके पीछे, कोई न कोई अभिप्राय है। उस पर विचारो, जो सही है, अतः प्रेरणा से उठे वह कार्य
करो। हर जगह तुरंत बिना, सोचे
समझे आग में कूदना उवित नहीं।
करना न करना
यह हमारे हाथ में हे। हमारा
पथ प्रदर्शक हर जगह , हर समय विवेक ही हैें
जो हमेशा जागा
रहता हे।
इससे जो सामर्थ्य मिला है, उसका सदुपयोग होना
शुरु हो जाता
है।
हर इन्द्रिय का अपना उपयोग
है।
सामर्थ्य का सदुपयोग होने पर, स्वाभाविक रुप से हिंसा गिरने लग जाती है। हिंसा
की पहचान होती
है, हमारे भीतर
संग्रहित क्रोध, घृणा,
ईर्ष्या आदि विकारांे से ये अगर कम होने लगते
हं,ै पता लगता है कि हम सही रास्ते पर हैं।
इस साधना पद्धति से पहली मिली षक्ति
यही है कि जहॉं हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है , वही हम अनावश्यक मानसिक तनावों से बाहर
आने लगते हैं।ें जिससे हमे ंशारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
यह हमेशा ध्यान रहे,
जो भी शक्ति
हमारे पास है वह हमारी स्वयं
की नही हैं जो मिली है, परिवार से, समाज
से, परमात्मा से,उसका सदुपयोग होना
है। दुरुपयोग होने पर, मन की मलिनता बढ़ जाती
है। मन भी मलिनता का जो भान जो शक्ति
कराती है, वही इसे भी दूर भी कर सकती
हैं, उस प्राप्त ज्ञान का आदर ही, विवेक का आदर है। शक्ति
का दुरुपयोग होते ही, शक्ति जाने
लग जाती है। सदुपयोग,ही शक्ति
का आधार है।
फिर क्या
होता है-
जिन संकल्पो को पूरा होना
होता है, प्रकृति उन्हें पूरा होने
का अवसर देती
है। वे अपने
आप पूरा होने
लग जाते हैं।
पर यहाँ
भी यह हमेशा
याद रहना चाहिए
कि इस अवस्था में भी संकल्प पूर्ति का जो सुख मिला है, उसमें हम डूबें
नहीं, लालसा न रहे। उसका भी सुख मिला है, उस वेग को हर्ष पूर्वक वहन करना चाहिए। दुख के वेग को हम सहन कर लेते है। परन्तु सुख के वेग को सहन करना कठिन है। यहीं अहंकार पैदा
हो जाता हैं हम दूसरो से अच्छे हैं, बेहतर
हैं, यह बोध पैदा हो जाता
है। अगर इस अवस्था में साम्य
बना रहा, हम अप्रभावी रहने लगे,
विचलित नहीं हुए तो परिस्थितियांे के दबाव
से मुक्त हो जाते हैं। फिर परिस्थितियों का महत्व
घट
जाता है। परिस्थितियो के इस प्रभाव से अलग होते
जाना ही साधना
है।
इसीलिए यह हमेशा ध्यान रखना
चाहिए कि इतनी
पद्धतियॉं अनेकों साधकों के लिए,
हजारों वर्षो से निर्मित होती चर्ली
आइं हैं। कोई एक पद्धति सब के लिए हितकर
नहीं है।
समान योग्यता,समान रुचि,समान
परिस्थिति कभी भी दो व्यकित्यों की एक सी नही होती। इसीलिए कभी किसी की पद्धति की आलोचना नहीं करनी चाहिए। जो चल पड़ा है, चल रहा है, वह मुकाम
पर आएगा ही यही प्राकृतिक विधान है।“
3. दुख का प्रभाव
प्रश्नः-स्वामीजी जीवन में दुख ही अधिक
मिलता है,भगवान
बुद्ध ने भी जीवन को दुखमय
माना है।
तब स्वामीजी ने कहा था - सुख से ही रास्ता शांति
की ओर जाता
है।
दुख से कभी शांति नहीं
मिल सकती।
अनावश्यक शरीर को दुःख पहुँचाना, व्रत, उपवास, यह परंपरागत तरीके थे, इनसे कोई लाभ नहीं हुआ।
बुद्ध ने अपने समय में ही इनकी अप्रसांगिता स्वीकार करली थी तथा साधकों को मन के द्वारा मन को साधने
की, पद्धति सोंपी
थी, विपश्यना तभी की है।
महावीर का रास्ता परंपरागत था। उन्होंने सभी प्रकार की साधना
कीं,
पर आज उनके
मार्ग पर चलकर
सभी परंपराओं को दोहराना क्या आवश्यक है? सोचना चाहिए। इसीलिए इनके यहां
भी बाद में अनेक पद्धतियां चलीं। बाद मे ंतेरापंथ्रा संप्रदाय में सारी
साधना मन के ही निग्रह पर आगई है। ं अनावश्यक शरीर को यातना देना अब वहॉं नहीं हें उनके यहॉं से एक एक संत भीलवाडा मे ंमिले
थे , उनसे बाते ंहुई थीं। वहॉं
भी बहुत परिवर्तन आगया है।
मूल लक्ष्य विकारों के संग्रह का खुल जाना
है। सारा संग्रह खुल जाए, फिर नया नहीं बने,
तब साम्य अवस्था आती है।
सुख से ही शांति का मार्ग जाता है पर उपलब्ध नहीं
होता है। क्या
कारण है?
जब सुख मिलता है, तब उसकी लालसा उत्पन्न हो जाती है। देहाभिमान हो जाता
है। हम विशिष्ट हैं, यह हमारी
योग्यता से आया है। इससे अहंकार उत्पन्न हो जाता
है। अहंकार आते ही, ईर्ष्या, द्वेष,
घृणा आदि विकार
आ जाते हैं।
हम दूसरों से श्रेष्ठ हैं,, यह भावना बड़ी हो जाती है।
इससे क्या
होता है, व्यक्ति और समाज में दो व्यक्तियों में, दो वर्गों में,
सम्बन्धियों में, पिता-पुत्र में, पति-पत्नी में भेद उत्पन्न हो जाता
है। गुण जो हम अपने भीतर
देखते हैं। वे आए कहां से हैं, क्या हमारे
भीतर वास्तव में है, या कल्पित हैं।
जब हम अपने भीतर कोई कमी देखते हैं,
बुराई देखते हैं,
तब उसे प्रकट
करने के स्थान
पर, उसे दबाते
है। न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते
हैं। तब व्यक्ति अपने भीतर, अहंकार से, सीमित गुणों
को आरोपित कर लेता है। वह कहता है, इन परिस्थितियों में तो ऐसा होना ही था। अच्छा-अच्छा
मेरा, बुरा-बुरा
तेरा।
आज समाज
में क्या हो रहा है? हर व्यक्ति, हर दल, हर नेता, दोषों
की दृष्टि दूसरों पर कर रहा है। अपने दोष तो देखता ही नहीं है, क्योंकि अपने दोष देखते
ही अहंकार गल जाता है। वह अपने अहंकार की बुराई को भी देखता है, पर छोड़ना नहीं चाहता। इससे क्या होता
है कि उसके
दोष तो मिटते
नहीं हैं, वह अपने भीतर गुणों
की कल्पना कर, अपने आपको सुखी
मानकर जो मिथ्याभिमान होता है, उसमें
बंध जाता है।
यही वह बंधन है, जिसे
उसे छोड़ना है।
वह स्वयं
यह जानता है कि वह वह नहीं है, जो कल्पित कर रहा है। उसे अपने
भीतर यह विरोधाभास पता रहता है। इससे उसके हृदय
तथा मस्तिष्क में विरोधाभास हो जाता
है। सामंजस्य नहीं रहता। एक इधर खींचता है, दूसरा
उधर खींचता है। इससे मन की एकाग्रता चली जाती
है।
अशांति ही अशांति रहती है।
जब मन की एकाग्रता चली जाती है, तब व्यवहार में असंगता आ जाती है। इससे क्या होता
है।
अचानक लहरें
जो टकराती हैं,
वे भीतर से वासना जनित संग्रह है,उसे सतह पर लाकर
उछाल जाती हैं।
जब जो न करना होता
है,वह हो जाता है। जो करना चाहते
है वह नही होता
है।विकारों का जो अचानक दबाव आता है, उस पर
अपना नियंत्रण नहीं होता
है, क्रिया प्रदूषित हो जाती है।
साधक आत्मग्लानि में चला जाता है। वह अपने आपको दीन-हीन
मानने लगता है। उसका
आत्मविश्वास चला जाता
है। वह अपने
आपको जीवन में असफल
मानने लगता है।
जो दबे हुए दोष हैं, जैसे धरती
पर अनुकूल वातावरण होने से अंकुर
फूट पड़ते हैं, उसी प्रकार विकार प्रकट
हो जाते हैं,
उनका प्रकट होना
स्वाभाविक ही है वास्तविक गलती हमारी होती
है। हमने गुणों
को
ओढ़ रखा है। गुण तो प्राकृतिक धर्म है, न्याय है, जो हमें प्राप्त होना
है। ओढ़ा हुआ आदर्श
कभी काम नहीं
आता है।
हां, जब सचमुच हमारे
भीतर गुणों का विकास होता है, तो साधक को उसका भान नहीं
होता है, जैसे
फूल खिलने पर पर उसकी जो सुगंध है। उसे उसका अनुभव नहीं
होता है, सुगंध
का अनुभव दूसरो
को होता है।
इसीलिए-
यह हमेशा
याद रहे कि अहंकार ही मुख्य
कारण है, जो भेद करता है। अपने भीतर गुणों
का अभिमान ही अहंकार का जनक है। इससे भेद बढ़ता है। घर-घर में जो अशांति है, उसका
कारण यही है। पति, अपने भीतर
मिथ्या अभिमान कर गुणों की कल्पना कर, दोष पत्नि
पर देता है, पत्नि-पति को दोषी मानती है। संकल्प अपूर्ति पर उपजा क्षोभ दूसरों को क्षोभित करने
के लिए तत्पर
हो जाता है। वस्तु की प्राप्ति, अप्राप्ति, प्रयत्न का अधूरा पन, उसका
दोष, तत्काल हमारे
मस्तिस्क पर अंकित
हो जाता है।
और जब अंहकार होता है, वहॉं वर्ग भेद का होना स्वाभाविक ही है। अंहकार ही मनोवृति मंे,
क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, पेदा करता है। जो सुखी है वह तत्क्षण संकल्प-पूर्ति के साथ दूसरों पर अपना
प्रभाव, प्रभुता अंकित
करने का प्रयास करता है।
उसकी प्रसन्नता दूसरे पर निर्भर हो जाती है।
उसने उसके
संकल्प की पूर्ति करदी तो राग और नहीं करी तो क्रोध का पैदा होना स्वाभाविक है।
गीता में एक ही श्लोक
में पूरी प्रक्रिया को बताया है। सुख में लालसा
रहित, स्पृहा रहित
होना जरूरी है।
क्रोध से तभी छुटकारा संभव
है, जब यह वेग सहन करने
की क्षमता बढ़ जाए। दुख में तो इस वेग को सहन करना
मजबूरी होती है। करना ही पड़ता
है। पर सुख में नहीं होता,
एक प्रकार का प्रदर्शन शुरू हो जाता है। यही अंशाति का जनक है।
इसीलिए आवश्यक है कि साधक
को चाहिए कि वह अपने भीतर
झांके, चिंतन करे,
अपने भीतर जो गुणों का अभिमान दिखाई पड़ता है, उसे समझे, उसकी
अवास्तविकता को समझे।
यह तभी संभव है जब वह दोष दर्शन
से मुक्त होने
का प्रयास करे।
अभी तो हालत
यह है कि हम अपने अलावा
दूसरे के दोष दर्शन में रात-दिन लगे रहते
हैं।
अपना रोज दोष भी देखते
हैं तो अहंकार की आँख से देखते हैं। भई! यह दोष तो सबमें हैं, हम में भी है, तुरंत न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते
हैं।कभी भूलकर दूसरे
से तुलना मत करो , जो अपना सामर्थ्य है , शारीरिक बल, आर्थिक बल ,
मानसिक बल उसका
ही सदुपयोग करो तब विवेक मार्गदर्शन देना शुरु कर देता हेै।
अतः जरूरी
यही है कि हम दोष दर्शन
की आदत को ही छोड़ दें।
चलो, मान लें,
उनमें दोष है। पर अगर हमने
यह बार- बार सोचा तो वह हमारे ही भीतर
कब जगह बना लेगा कठिन है? शास्त्र का कथन है , दूसरे के बारेमें सोचते- सोचते
हम उनके ही गुलाम बन जाते
हें जैसे दर्पण
के सामने लोग आए , और गए , वह एक भी छाप संग्रहित नहीं करता
, ऐसा ही मन को बनाना हेैं
।
इसीलिए कहा था , स्मृति ही पाप हें
धक्का लगे , बस उस तरंग को देखो
, बस ऐखे , उसके
साथ बहना नहीं।
वह जहॉं से जैसे आई है ,
वहीं लौट जाएगी।
तो क्या
हमारे दोष-दर्शन
से, आलोचना से वे अपने दोष छोड़ देंगे। फिर लौट फिरकर हम दूसरों को ही उपदेष देने चल देते हें पहले
तो हम तो समण् ले ं, अगर रास्ता सही हे। तो हम चलें , पर हम तो चलते नहीं
, अपनी पुरानी परंपरागत आदतों को छोडत्रते नहीं , पर विद्वान बनने
का शौक है, गुरु बनना चाहते
हे। भीतर बस लोभ से भरी
हुई कामना ही मुंह बाए फिरती
है।
हम यह भूल जाते हैं कि हम जो देखते हैं, चिंतन
करते हैं, वही तो स्वाभाविक रूप से हमारे चित में जहां संग्रह संग्रहित है, वहां
अंकित होता जाता
है। वह गलती
जो हम दूसरों में देखते है, वह हममें आने लग जाती है।
इसीलिए ऐसा है तो अपनी
गलती देखो।
अवलोकन से क्या होता है।
ज्यों ही प्रवाह खुलता है भीतर का दबा हुआ संग्रह बाहर
आने को मचल उठता है।
उसे देखकर
यही मैं हूँ,
मेरा वास्तविक रूप यही है, साधक
घबड़ा जाता है। यह दोष प्रकट
होकर जिसके लिए बाहर आता है, उसे आने दे, वरना दबा दिया,
तो व्यवहार में असंगतता लाकर, अशांति पैदा करेगा।
चाहे विपश्यना हो, या ध्यान
या अन्य पद्दति हो, उसकी उपयोगिता यही है, यह चित्त की मलिनता को कम करने
का प्रयास है।
जब हमारी
आंख बाहर से भीतर की ओर मुड़ती है। हम बाहर देखना बंद करते हैं। तब भीतर देखना शुरू
हो जाता है। यहीं अन्तर्मुखता का प्रारंभ होता है। अपनी गलतियां दिखाई
देने लग जाती
हैं। हम जिसे
अपनी पूंजी मानते
थे, हीरे-जवाहरात, वे काँच के टुकड़े दिखाई पड़ते
हैं। तब वे फिंक पाते हैं।
निज का दोष दिखते ही और समझ के द्वारा उसे यथावत
स्वीकार करते ही दूसरों के दोष देखने की प्रवृति चली जाती है।
जब भीतर अपना घर अव्यवस्थित मिलता है तो उसे सही करने की इच्छा हो जाती
है।
बाहर के प्रति आकर्षण का कम होता जाना,
उदासीनता ही वैराग्य है। यहाँ पर छोड़कर कहीं जाना
नहीं होता है।
निज के दोषों की स्वीकृति होते ही, मिथ्या गुणा जो अपने
भीतर स्थापित कर रखे थे, वे हटने लग जाते
है। उनके हटते
ही अपने दोष भी कम होने
लग जाते है।
हमने अपने
दोषों को छिपाने के लिए ही तो मिथ्या गुणों की अपने
भीतर कल्पना कर रखी थी।
इसीलिए आवश्यक है कि -
1. साधक अपनी
ही दृष्टि में आदर योग्य बने।
जो है, उसका
ही प्रकटी करण हो। भेष बदलने
से, छापातिलक लगाने से, मुद्रााएं धारण करने से, शांति
में प्रवेश नही होता। शंाति तो आचरण की पहचान
है। यह सुगंध
है, अपने आप प्रकट होती हैं।
यही कारण
है कि हम दोहरी जिंदगी जीते
है। भीतर के खोखलेपन से परिचित रहते है। हममें
आत्म विश्वास नहीं
रहता। इसीलिए जब तितिक्षा साधन बन जाती है, हम दोष दर्शन से मुक्त होते जाते
हैं। जो अपनी
ही दृष्टि में आदर योग्य नहीं
होता है, उसका
कहीं सम्मान नही होता है। नहीं
आत्मविश्वास आता है। नहीं उसे शंाति
प्राप्त होती है। यह तभी संभव
है, जब वह अपनी जानी हुयी
गलतियांे को स्वीकार करे। दोषों की स्वीकृति, शांति की और बढ़ने वाला
पहला कदम होता
है।
लोग बार-
बार उचित- अनुचित कर्म के बारे
में पूछते है। सबके पास इसका
उत्तर है। अंतःकरण कार्य करने से पहले बता देता
है, कि यह कार्य उचित है या अनुचित। विवेक
सबके पास है, पर उसका आदर नहीं होता। हम बुद्धि चातुर्य से अनुचित को उचित
ठहराने का प्रयास करते हैं। जिन कार्यो से किसी
का अहित होता
है,वे दोष हैं।
हम यह सोचते हैं,कि हम जिन कार्यो को करते हैं,
जिनके के द्वारा दूसरो का अहित
होता है, उनसे
हमारे अहंकार की तुृष्टि होती है। पर यह उतना ही सच है कि जितना
हम दूसरों के अहित का प्रयास करते हैं, उतना
ही हमारा भी अमंगल होता है।
जब तक हमारे अंतःकरण में अशांति दबी रहेगी,
तब तक हमारे
कार्य प्रदूषित ही होते रहेंगे। अशांति को बाहर आना ही होगा, हां,
गहरी समझ से, हां, निरंतर बनी रहने वाली साधना
से यह अशांति प्रकट होगी, तब उससे किसी का नुकसान नही होगा।
विकार अवलोकन से प्रकट हो जाते
हैं, अंतःकरण शुद्ध
होने लगता है।
फिर धीर-
धीरे वास्तविक शांति प्रकट होने लगती
है। शांति का भेष धारण करना,
बिना स्वभाव के लाए हुए उसकी
चर्चा करना, भीतर
तूफान का उठते
रहना, उसके प्रकट
होने के उपाय
नहीं करते हुए,
भीतर दबाना, अपराध
होता हैं।
पर जब क्षोभ भीतर दबा हुआ रह जाता
है, तब वह भीतर अनेक प्रकार की व्यवहार में असंगतियां तथा शरीर
में दोष उत्पन्न करता है। इसी सें भय तथा शरीर में अनेक
प्रकार की व्याधियां आ जाती है। क्षोभ भीतर रस की सृष्टि करता
है, वही रक्त
में मिलकर अनेक
प्रकार के उपद्रव करता है।
भीतर के क्षोभ को, जो संग्रह अंतःकरण में जमा रहता है, उसे सावधानी पूर्वक हटाना चाहिए। किसी
भी प्रकार का बल लगाना,शारीरिक रुप में हठयोग
की क्रियाओ का प्रभाव गलत ही होता जाता है। यह बात दूसरी
है कि जो बल हमंे मिला
है, चाहे शारीरिक हो या मानसिक, इसका जब सदुपयोग होने लगता है, तब यह क्षोभ,यह संग्रह कम होने लगता है। शरीर के बल का सदुपयोग होते
ही क्रिया सेवा
में बदल जाती
है, धन का सदुपयोग होते ही क्रिया में प्राप्त पूर्णता शंाति प्रदान करती है।
जब कहा जाता है कि सहन शील होना
है, तो इसका
अर्थ दब्बूपन नहीं
है। सुख और दुख के वेग को सहन करना
है। सामने जो चित्र आया,वो गया. हमें प्रभावित नही होना है। क्रिया करनी है, सोचो..करना हे तो करदो..नही तो जाने दो। हम तो यहाँ
अखबार की खबर पढ़कर मरने- मारने
पर उतारु हो जाते है। कोई भी घटना घटे,
उस पर सोचो,
फिर निर्णय लो। क्रिया की प्रतिक्रिया के बीच में अंतराल होना चाहिए। वह होगा, तो विवेक का होगा।
हम उसके
लिए तैयार ही नही होते है।
अगर अपने
भीतर यह समझ यह आ जाए जो हम न तो बाहर की घटनाओं से प्रभावित होगे, और न बाहर हम किसी
को अनावश्यक क्षोभित करना
चाहेंगे। जो हम दूसरो से अपने
प्रति चाहते है, वह हमे दूसरो
को देने के लिए तैयार होना
चाहिए।
एक गलती
हमसे और होती
है, हम अपनी
छवि, अपने रुप को लेकर बहुत
चिंतित रहते है। अगर हमने सच उसके सामने बोल दिया तो वह जो छवि हमारे
बारे में बनाए
बैठा है, उसे कितना बुरा लगेगा,
हम इस भय से भयभीत रहते
है। यह भी अशांति ही है। शांत मन, भय ,क्रोध से परे है। वह इन्हें छोड़ता नही है, ये तो अपने
आप छूटने लग जाते हैं। हां,वहां चिन्तन नहीं
रखना है।
मन के शांत रहने की यह स्थिति है। यहाँ वह नियंत्रण आने लग जाता
है। भय रहित
शांति ही वास्तविक शांति है। अब अनुकूलता तथा प्रतिकूलता का भय चला जाता है। जो अच्छा या बुरा
आता है, उसे आना ही है। उससे भागना कहाँ,
उसे शांत मन से उत्तेजना रहित भोगना है। बहुत
से लोगो के मन में भले ठहराने का प्रलोभन रहता है। वे समाज की सेवा
भी करते है, लोगो की मदद भी करते है। पर उसके भीतर
यह भाव छिपा
रहता है, कि सब उनकी प्रशंसा करे। जरा भी कहीं कोई बुराई
न करे, बुराई
का भय, दुनिया आपसी तारीफ करे,
यह प्रलोभन जब तक बना रहता
है, तब तब क्रिया गलत ही होती रहेगी।
यही राग है।
जब तक राग है, द्वेष
भी रहेगा।
बात साधारण है,
हमंे जो भी कुछ करना
है, स्वयं के लिए करना है। अपनी ही आत्मा
से अपना उद्धार करना है। जितने
हम पराश्रय से मुक्त होते जाते
हैं। उतना ही हम स्वाश्रय पाते जाते हैं। यहीं
आत्म कृपा मिलती
है।
इसकी पहचान
होती है, हमारे
स्वभाव में बिना
आडम्बर के स्वाभाविक रुप से सरलता
आ जाती है। यहॉं न बाह्यके प्रति आकर्षण रहता
है,न विकर्षण।
जो छूुटना है, वह स्वाभाविक क्रम में स्वतः
छूटता चला जाता
है। यहीं भराव
होता है, खालीपन ज्यादा देर नहीं
रहता हैै, यहॉं
प्रकृति स्वाभाविक प्राकृतिक नियम
से पूर्णता देती
जाती है।
4.प्रेम
प्रश्नः- स्वामीजी क्या यही प्रेम है? आपको
देखकर लगता है आपके पास कुछ विशिष्ठता है जो हमारे पास नहीं
है।
तब स्वामीजीःने समणया था-
यहां क्या
है,... आप पता करें, मुझे तो कुछ भी पता नहीं रहता, एक जैसी स्थिति रहती
है। कोई आया उसका पता भी नहीं रहता जब तक वह बोलता
नहीं है,... या आंखों के सामने
नहीं आता,... आपने
देखा है जब मैं घूमता था, निगाह नीचे तीन फीट तक ही रहती थी। क्या
सामने से आकर निकल गया है, मुझे पता नहीं
रहता, जब तक वह स्वयं सामने
आकर रोकता नहीं
था।
यहां विचार
तो है ही नहीं, जब विचार
नहीं होता, मन भी नहीं होता।
मन ही तो विचार है, वह रहता है जब कोई क्रियाहुयी
तब वह जाता है, फिर मुकाम पर आकर ठहर जाता
है। स्मृति भी है, वहां तो भंडार है, आवश्यकता होने पर वह वहाँ से सूचना
ले आता है।
जब मन शांत होने लगता
है, तब संग्रह साथ नहीं रखना
पड़ता। ग्रन्थों की तभी तक आवश्यकता रहती है। जब तक आपके भीतर
जो उत्तर देता
है, वह उपेक्षित है जब उत्तर
भीतर से अपने
आप आने लगते
हैं। तब ग्रन्थों की जरूरत नहीं
होती। उस खालीपन से भय नहीं
होता है। यह स्मृति लोप नहीं
है। आप जो चौबीस घंटे सोचते
रहते हैं वह विचारणा हैं, आप विचारक नहीं है। विचार जो आएगा,
वह मौलिक होगा।
वर्तमान में होगा।
जब यह विचारणा ही रुक जाती है तब उस शांति का पता लगता है, आप एक ही विचार या एक ही क्रिया में अधिक से अधिक
रहने का प्रयास करें। मन वहीं
रहे... तब मन स्वतः अन्तर्मुखी होने लगता है। वहीं
शांति है। इस शांति की अवस्था में अधिक से अधिक रहने पर स्वाभाविक प्रेम का उदय होता है।
जहां प्रेम
है वहां राग-द्वेष नहीं होगा।
यही चित्त की शुद्धि है। क्योंकि विचार ही विकार
है, जब विचार
आने रुक जाते हैं तो हम विकारों से भी मुक्त होने
लग जाते हैं।
सभी के प्रति
एक रस एक भाव रह जाता
है। आचरण में धर्म स्वाभाविक रूप से आ जाता
है।
‘आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेषु हितेरतः’, यह भावना जितनी दृढ़ होती जाती है, उतना ही हम प्रेम भी पाते
जाते हैं। यहां
आने पर आप भी होंगे, परिवार भी होगा, जो भी कार्य कर रहे हैं, वह भी होगा। पर अब क्रम विपरीत हो जाता है। बहाव अपने मूल स्थान पर लौटने
लगता है। अभी तक बहाव बाहर
की ओर था। बाहर की छोटी
से छोटी घटना भी आपको
बाहर भटकाती चली जाती थी। आप तिनके की तरह भटक रहे थे। पर अब, विषय
भी रहेगा, इंद्रियाँ भी रहंेगी, मन भी रहेगा पर सबंध नहीं जुड़ेगा। संबंध मन जोड़ता
है। मन के न रहने पर स्वाभाविक क्रम में कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्दिय में तथा ज्ञानेन्द्रिय, अंतःकरण में डूब जाती है। वहां तीनों का एकीकरण हो जाता
है। यह बलपूर्वक नहीं होता, स्वाभाविक क्रम में होता
है।
इस स्थिति में बुद्धि जो है वह ‘सम’ हो जाती है। समता यहीं आती है। बुद्धि का कार्य है, निरंतर परीक्षण करते रहना,
जितना बुद्धिमान होगा उतना ही वह विचारणा का दास होगा। उसकी मान्यता होगी, हम नहीं
सोचेंगे, नहीं बोलंेगे तो मूर्ख माने
जायेंगे। विवेकी चुप रहेगा।
बुद्धि जब स्थिर होती
है, तब वह विवेक में ढल पाती है। अतः कर्मेेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय तथा अंतःकरण जब एकीकृत हो पाते हैं। तब ये बुद्धि में,
तथा बुद्धि विवेक
में लीन हो जाती है। इसके
पहले बताया गया था कि अब अंतर्मन आकर हमारे
कार्य व्यवहार संभाल
लेता है। वह विराट के समीप
होने के कारण
से अत्यंत शक्तिशाली है, और सच तो यही है कि जहां शांति
है, वहीं प्रेम
है, और शक्ति
भी।
यह प्रेम
जो है, इसकी
स्वाभाविक पहचान ‘आकर्षण’ है, जैसे पूर्णमासी का चांद, ज्वार
आने पर लहरों
को अपनी तरफ खींच लेता है उसी प्रकार प्रेम
का उदय होने
पर, स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर
आकर्षण शक्ति पढ़ने
लगती है। प्राणिमात्र के प्रति, कल्याणकारी भावना रहती है, कर्म तब सेवा
में ढल जाता
है। तुम्हारा सोच है, तुम्हें कुछ ना कुछ हमेशा
करना चाहिए और जब तक सफलता नहीं मिल,
निरंतर प्रयास करना
चाहिए।
मैंने प्रयत्न के लिए कभी मना नहीं
किया। सामर्थ्य जो तुम्हें मिला है, उसका सदुपयोग पूरा
करना चाहिए, साथ ही विवेक विरोधी कार्य नहीं करना
चाहिए। कोई भी कर्म, भय तथा प्रलोभन से नहीं
करना चाहिए। कर्म
के बिना कोई नहीं रह सकता
है,अतःप्राकृतिक विधान से जो भी कार्य उपस्थित हो वहां मन को पूरी तरह लगाए
रखना चाहिए। पर कर्म का फल क्या होगा? इस पर अधिक नहीं
सोचना चाहिए। कर्त्ता ही निष्काम होता
है, कर्म नहीं,
हम जब स्वधर्म का पालन करते
हुए अपने कर्तव्य कर्म का पालन
करते हैं तब किया हुआ कर्म
स्वाभाविक यप से निष्काम होता है। क्योंकि वहां मन वर्तमान में रहता
है।
वर्तमान में किया गया कर्म निष्काम होता
है। वर्तमान का क्षण वह है, जहाँ मन, भूत और भविष्य की विचारणा में नहीं
है। सरल भाषा
में जो भी क्रिया है, मन वहीं है, किंचित मात्र भी विपरीत दिशा में नहीं
है।
बस यही स्वतंत्रता है, इसलिए
निरंतर बिना उत्तेजना केे शांत मन से कर्मरत रहना
चाहिए।
रहा सवाल,
प्राप्ति का, अप्राप्ति का,- वस्तु तो प्राकृतिक विधान के अनुसार ही मिलेगी। जिसको जो मिलना
है वह उसके
पूर्व संकल्पों के अनुसार मिलेगा ही, जिसके द्वारा जो अच्छा या बुरा
किया जाता है वह उसके ही काम आता है, कई गुणा होकर
लौटता है, उसे ही मिलता है।
प्राकृतिक नियम की अवहेलना कभी नहीं होती है। इसीलिए किसी वस्तु
को देना देने
वाले के हाथ में नहीं हैं।
हम जिसे देना
चाहते हैं उसे नहीं मिलता, जिसे
नहीं देना चाहते
हैं, उसे मिल जाता है। प्रकृ्रति में कर्तुम, अकर्तुम अन्थथाकर्तुम, सदा से रहा है। होगा,
नहीं होगा या तीसरा कुछ होगा।यह एक विधान है।
इसलिए पहले
बताया था, जो कार्य कर सकते
हें उसे तत्काल पूरा करने का प्र्रयास होना चाहिए,
जो विवेक विरोधी है, उसे छोड़ देना चाहिए जो आपके सामर्थ्य की सीमा से बाहर
है, उसे प्रकृति पर छोड़ देना
चाहिए।
5. अन्तर्यात्रा’
उस दिन स्वामीजी सीरियल का उदाहरण देते
हुए कह रहे थेः-
आप जब फिल्म देखते
हैं, टी.वी. देखते हैं तो क्या होता है?
आप वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं। उस दृश्यों की शृंखला में आप इतने
डूब जाते हैं कि वे वास्तविक दुनिया का अहसास
देते हैं। आप पात्रों के साथ बह जाते हैं,
क्यों?
अर्थचेतन अवस्था सी चित्त की आ पाती है। वहां आधा सत्य,
आधी कल्पना से प्रसूत दृश्यांकन आपको बहा ले जाता
है। अच्छे उपन्यास की सफलता का भी यही रहस्य
है। वह अपनी
काल्पनिक दुनिया को जिस सच्चाई के साथ लाता है, हम उस काल्पनिक दुनिया कोे सच मानकर उसमें डूब जाते हैं।
हां, ‘ध्यान’
की प्रारंभिक अवस्था में सफलता का यही रहस्य है। हम जिस ‘सत्य’
का संधान पाने
के लिए जिस तस्वीर का प्रयोग करते हैं, वह हमें ‘जीवन सत्य’
से हटाकर एक आकर्षक ‘इन्द्रजाल’ में ले आती है।
‘सत्संग’ समारोह की सफलता का भी यही रहस्य है।
यह दृश्यीकरण एक तकनीक है। मानसिक पूजा
में इसी का सहारा लिया जाता
है।
पर हम गहराई से विचार
करें, तो पाते
हैं कि वहां
से आने के बाद चित्त की दशा में कोई परिवर्तन नहीं होता
है। यह एक मनोहारी नशे की अवस्था हो जाती
है।
इस पर गहराई से विचार
किया,... वर्षों तक लोग जाते हैं, प्रयोग करते हैं, वे अपनी कल्पना की दुनिया में जिन अनुभवों और अनुभूतियां की कल्पना को सुरिक्षत रख लेते
हैं। उन्हें ही इस ‘एकाग्रता’ में या ‘स्वयं सम्मोहन’ की अवस्था में पाकर प्रसन्न हो जाते हैं। कुछ समय बाद, वापिस
अपनी पुरानी अवस्था में आकर यथावत
हो जाते है। उनकी आंतरिकता में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं आता है।
हमारे व्यक्तित्व में, हमारे इस आंतरिक आलोचक का, निंदक का जोे हमारे ही मन का एक हिस्सा है, बनाने-बिगाड़ने में बहुत बड़ा हाथ है। वह हमारी स्मृति, अवधारणा से खाद-बीज की तरह पोषण
लेता है, निरंतर बढ़ने वाली अनावश्यक विचारणा उसका कलेवर
है।
आध्यात्मिक शब्दावली में उसे संस्कार कहा जाता है।
हां, इसी मन का एक भाग और भी है जो निरंतर महाशक्ति से जुड़ा
रहता है, हम उसे अन्तर्मन भी कह सकते हैं।
उसे ही ”आत्म“
कहा जाता है। यह यात्रा इतनी
अभूर्त है, कि शब्द अपनी सीमा
में उसे व्यक्त नहीं कर पाते
हैं।
संक्षेप में चित्त, इन बाहर
व भीतर के जो सागर है, इनकी लहरों से निरंतर प्रभावित होता रहता है। लहरें
आती हैं, टकराती है, और बहाकर
ले जाती हैं।
होना यही चाहिए, लंहरें आऐं,
वे तो आवेंगी उनके बहाव को कोई नहीं रोक सकता है- हां,
हमारी प्रभावित होने की क्षमता कम से कम होती
चली जावे। यही साधना ‘तितिक्षा’ कहलाती है। आध्यात्मिक शब्दावली में इसे ‘कूटस्थ’ कहा जाता है।
ध्यान, मानसिक पूजा, प्रेक्षा ध्यान, अवलोकन, साक्षी भाव,
अनेक पद्दतियां हैं जो हमारी इस चित्त शुद्धि में सहायक होती है। वे वहां बाह्य
विचारों के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, वही भीतर के प्रभावों को निःशेष होने
में सहायक होती
हैं।
मुख्य बात आपकी मानसिक परिस्थिति की है।
पहले अशांत
थे।
सुख था......संपति थी, धन था, पद था......
दोनों ही नावों
पर, धन की तथा प्रतिष्ठा की पर निरंतर यात्रा कर रहे थे।
पर पाया,...
भीतर अशांति है, उद्वलन है, तनाव
है, मेरी प्रसन्नता गायब हो गई है।
तब इन शत्रुओं से पहचान
हुई, पाया यह तो जनम से ही साथ चल रहे हैं। स्मृति इन्हें निरंतर ताकत
देती है, अवधारणा सिंचित करती है, अनावश्यक विचारणा अधिकारिता सौंपती है।
आप स्वतंत्र न होकर परतंत्र हो गए हैं।
पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...
दृश्य का चिंतन ही पराधीनता है।
दृश्य तो जब तक दृष्टा है, रहेगा, पर निरंतर चिंतन ने आपकोे दृश्य का दासत्व ही सौंप
दिया।
ु वह पद्दति जहां आत्मविश्वास हो, आत्मज्ञान हो, स्वाभिमान हो और जहां
आत्मकृपा हों। जहां
आत्मकृपा होगी, वहां
स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर गरिमा,
सम्मान, श्रद्धा, निष्ठा, गुण होंगे।
दुख का पर्यवसान शीघ्र ही सुख में हो जाता है।
शास्त्र कहते
हैं, दोनों ही अनित्य है, क्षण
भंगुर हैं। सर्दी-गर्मी की तरह है, इनके वेग को सहन कर।
क्रूा आपनेे
इस प्रश्न पर गंभीरता से विवेचन किया है।
दुख से मार्ग, शांति की और नहीं जाता
है।
हां, आवश्यकता व चाहत के वीच का संतुलन पाना ही साध्य है।
यह प्राप्त होता है- विवेक
के आदर तथा तथा जो भी हमारा सामर्थ्य है उसके निरंतर सदुपयोग से।
इस अवस्था में सुख के स्थाई सुख में ढलने की शुरूआत हो जाती है।
शारीरिक दुख,
कष्ट होता है,इसका उपाय प्रयत्न,शरीर से सेवा,
औषध, धन की व्यवस्था से संभव
है।
मानसिक दुख-
इसका मुख्य कारण
आपका यह आहत द्रवित मन है, जो संस्कार है,...
जो आपका निंदक
है, जो आलोचक
है, जो नकारात्मक सोच है।
हाँ, जीवन
में इस संतुलन के आने से स्थाई सुख, शांति
में ढल जाता
है। शास्त्र कहते
हैं,... जो निरंतर इस शांति में रहने लग जाता
है-
”जिसका अंतःकरण राग द्वेष से रहित है, जो अपने वश में की की गई इन्द्रियों के द्वारा विषय भोग को प्राप्त करता है, उसे दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है।“
और जिसे
इस दिव्य प्रसाद की प्राप्ति होती है, उसके समस्त
दुख दूर हो जाते हैं तथा उसे अंतःकरण की दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती
ही है। यही प्रेम है यही मानव जीवन की
उपलब्धि है।
6.अवलोेकन
प्रश्नः- स्वामीजी यह अवलोकन की जो विधि
बताई जाती है ,वह क्या है?
स्वामीजी विभिन्न मतों की चर्चा करते हुए कह रहे थे
:-
”इतने सारे
मत है, पंथ है, रोज़ नए-नए बनते हैं,
पुराने हटते चले जाते हैं क्यों?
प्रकृति का यही रहस्य है, उसे हमेशा कुछ ना कुछ नया चाहिए।
वरन! इतने
देवी-देवता कहाँ
से आते, उनकी
पूजा, उनकी आराधना,... इतने ग्रन्थ कहां से आते,... सिलसिला चल रहा है।
रूचि, योग्यता, सामर्थ्य इस संार
में प्रत्येक प्राणी का अलग-अलग है। सब एक जैसे हों, यह हो नहीं सकता।
साधन और साधना
भेद का यही कारण है। नहीं
तो सबका एक ही रंग होता,
एक ही भाषा
होती।
सब अपने-अपने रास्ते पर चलंे, अपने ही अनुसार चलंे, यही सही बात है। मैंने कभी किसी
को मार्ग बदलने
का नहीं कहा,
हॉं, वह अपने
रास्ते पर सही कैसे चल सकता
है, उसे कोई दुविधा आ रही हो, आकर पूछे
तो बताओ, पर किसी का रास्ता खराब है, उसमें
कमी है, यह कहना गलत है।
जिसे कंन्वर्जन कहते हैं, धर्म
परिवर्तन, यह हमारे
यहां का शब्द
नहीं है। यह बाहर से आया है। उन्होंने कहा तुम्हारा रास्ता गलत है, हमारा ठीक है, सारा झगड़ा
यहीं से शुरू
हुआ है। हमने
तो उनको भी गलत नहीं कहा।
सब बात तो एक ही करते
है एक महान
सत्ता है, वही नियंत्रक है, उसे पाना है, उसे जानना है, उसकी
कृपा चाहो, फिर भेद कहां है? बस अहंकार ही बाधा देता है। उसके कारण से हम अपने आपको
श्रेष्ठ तथा दूसरे
को खराब कहते
हैं।
साधन भेद तो समय व स्थान भेद से ही बदल जाता
है। मनुष्य कोई जड़ तो है नहीं, जब पृथ्वी घूम रही है, गृह-नक्षत्र घूम रहे हैं, वहां
निरंतर गति ही सार है। वहां
एक मुकाम पर पड़े होकर बैठ जाना क्या सही है? यहां सब कुछ परिवर्तनशील है, जब सब-कुछ बदल रहा है तब एक निश्चित रूप व आधार
या तरीके पर कैसे टिका रहा जा सकता है।
हाँ, प्राणिमात्र को ध्यान से देखो।
कुछ बातें
उनकी एक ही है, उनकी मूलभूल आवश्यकताएं एक ही हैं। मनुष्यों को, उनकी विचारधारा को, उनकी साधना पद्दति को देखो सबका
ध्यान एक ही जगह पर रहता
है, हमारे जीवन
से व्यर्थ का चिंतन हट जावे।
वही हटाए नहीं
हटता।
मजेदार बात यह है कि न तो हम बलपर्वूक सार्थक चिन्तन कर सकते हैं।
नहीं व्यर्थ का चिन्तन हटा सकते
हैं।
लगता है, हम तो मात्र
तिनके हैं, हवा आई और हम उड़ गए। आप पता करो, यह बात कितनी सही है।
यहां लोग आते हैं, क्यांें आए उन्हें ही पता नहीं रहता।
बातें चलती रहती
हैं, उसमें बह जाते हैं।
मैं पूछता
हूं, कैसे आए?
कहता है, वह बात तो रह ही गयी,
अब में आऊंगा
तो बात करूंगा। यही तो होता
आया है।
जो करना
होता है, वह तो होता नहीं
है।
जो नहीं
करना होता है, वही होता जाता
है।
मैंने पहले
कहा था-
जो करना
होता है, उसे एक बार सोचो,
अच्छी तरह सोचो
फिर जो तय किया है, करो,
सोचो मत। बार-बार सोचने से कार्य करने की शक्ति चली जाती
है। अंत में वह कार्य भी छूट जाता है।
इस आदत को कम करना
है।
इतने सारे
पूजा-विधान इसलिए
बनाए गए कि मन एकाग्र हो जाए। जितनी रुचि
होती है, उतने
ही विधान बनते
गए पर मुख्य
बात सब भूलते
गए।
हम जहां
भी हों, जो भी कार्य हो, मन को अधिक
से अधिक वहीं
रखा जाए। परमात्मा की इस सृष्टि का आदर यही है कि हर स्थान श्रेष्ट है। हर कार्य श्रेष्ट है। कोई छोटा
नहीं। कोई बड़ा नहीं। हमारा अस्तित्व ही महत्वपूर्ण है।
हम जो भी हैं, जिस जाति कुल में पैदा हुए हैं,
प्राकृतिक विधान से जो भी योग्यता हमें मिली है, वही हमारी साधन
सामग्री है। वही हमारे विकास में सहायक है।
हमें अपने
ही स्वधर्म का पालन करना चाहिए।
रास्ते अनेक
हैं, पर पहुंचते एक ही जगह हैं।
व्यर्थ का चिंतन हमारे जीवन
से हट जाए।
इसके लिए करना यही है-
जो भी प्राप्त परिस्थिति है, उसका स्वागत करो, उसे प्रिय
मानो, उससे प्रेम
करो, उससे भागो
मत। हमारे यहां
उपनिषद काल में यह भागना नहीं
था। बाद में आया। समाज से भागकर कहां जाओगे?
संसार कहॉं नहीं
है?
आपने पूछा
था- मैंने सन्यास क्यों लिया।
बचपन से ही मेरी रूचि,
इस सत्य को जानने की। बाहर
मेरी कोई रूचि
नहीं थी। परिवार की परिस्थितियां भी ऐसी ही बनती
गईं। हां, मां की मृत्यु के बाद फिर मेरे
पास कोई पारिवारिक कार्य नहीं बचा था, मैं स्वेच्छा से सन्यास लेने
गया पर वहां
भी कहा था- याचक नहीं बनूंगा। सन्यास के बाद निरंतर कार्य करता
रहा। सन्यासी की परंपरा तथा उसका
निर्वाह छूटता चला गया। गरीब से गरीब के घर भी गया। सादा
रोटी खाकर भी जीवन जिया। गृहस्थों के यहां ठहरता रहा। उनके
परिवार का हिस्सा बनकर, मार्गदर्शन किया ।
परंपरा में जाकर इसकी व्यर्थता को देखा। इसीलिए आपसे कहता हूं कि आपको कहीं
जाने की जरूरत
नहीं है। जो भी जैसा आया है, सामना करो।
वर्तमान में रहो।
कल जो होना
है, प्रकृति का कार्य निर्धारित है, वह होना है। आज में आपको
रहना है। यही सार है।
यह न होता तो क्या
होता, हमें बचपन
में सुविधाऐं नहीं मिली, यह कमी रही, वह कमी रही, यह सोच ही व्यर्थ है। जो जैसा प्राप्त हुआ है विधान
के अंतर्गत ही है। हमें उसका
आदर करना चाहिए। जब हम प्राप्त परिस्थिति को आदरपूर्वक सवीकार कर लेते
हैं, तो व्यर्थ के चिंतन से बच जाते हैं।
आप भगना
क्यों चाहते हैं,
पलायन क्यों चाहते
हैं, क्यों नहीं
प्राप्त परिस्थिति का आदर कर पाते
हैं, सोचें।
हमेशा नयी परिस्थिति से भय रहता है, पुरानी जगह पर प्राप्त सुख-सुविधाऐं पकड़ लेती हैं। यही सुख का प्रलोभन है। नई जगह जाने में संकोच
का यही कारण
है। सुविधा कम हो जाएगी। मान-सम्मान कम हो जाएगा। पैसा कम आएगा, बहुत सारी
बातें है।
अगर एक बार यह सोचो,
जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह ऐसा ही होना
था इसलिए हुआ है, इससे बेहतर
हमारे हित में नहीं था। हमने
जो चाहा था। जिन परिस्थितियों में हमारा विकास हो सकता है, जो हमारा प्राप्तव्य था, वही हमें प्राप्त हुआ है, तो आपकी दुनिया बदल जाएगी। अभाव पाकर,
व्यथित होना रुक जावेगा। जो भी परिस्थिति मिली है, उसमें प्रसन्नता आ जावेगी।
कहते सभी हैं, ईश्वर हैं,
पर उस पर विश्वास किसी को नहीं है।
उसे भी अपनी इच्छानुसार चलाना चाहते है।
साधन में सफलता मिले, इसके
लिए आवश्यक है कि जो भी प्राप्त हुआ है वह पूरी तरह स्वीकार हो। साथ ही उसके प्रति
प्रियता भी रहे।
वह कार्य बोझा
नहीं लगे। उसमें
उदासीनता नहीं आवे।
क्योंकि जो परिस्थिति आपको प्राप्त है, उसमें प्रियता नहीं होगी तो अनावश्यक चिंतन शुरू
हो जावेगा। आपसे
कहा था- प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल मानते हुए प्रेम
से भोगो, जल्दी
ही समाप्त हो जावेगी। जो है, सामना करो, आप जितना उसे बोझा
मानते रहेंगे, वह समय उतना ही बढ़ता जाऐगा। यह प्रकृति का नियम
है। अगर परमात्मा पर विश्वास हो तो सो टका हो, अपने ऊपर विश्वास हो तो सौ टका हो। बात एक ही है। हर परिस्थिति, एक विधान के अंतर्गत आती है, उसका स्वागत करो।
मीरा के लिये
गया जाता है, विष का प्याला भी उसके लिए अमृत हो गया।
तब व्यर्थ का चिंतन अपने
आप कम होने
लगता है।
पहले भी कहा है-
जो कर सकते हो, उसे तुरंत कर देना
चाहिए। पर होता
उसके विपरीत है-
जो कर सकते हो, वह तो होता नहीं
है, जो नहीं
कर सकते हो, उसके बारे में निरंतर सोचते रहते
हो। प्रयास से न तो कोई व्यक्ति व्यर्थ के चिंतन को हटा सकता है, नहीं
कोई सार्थक चिंतन
कर सकता है, मात्र गहरी समझ ही सहायक है। प्राप्त समझ का आदर ही साधना
है।
उस दिन आपने पूछा था-
मन में अशुभ व मलिन
विचार आ रहे हैं तो क्या
किया जाए?
उन्हें हटाओ
मत, प्रवाह को आने दो, देखते
रहो। परन्तु उन विचारों में रमण मत करो। न तो उनका समर्थन करो, न बुराई
करो। इससे क्या
होगा, जैसे जहॉं
काले रंग का धब्बा हो, वहॉं
पानी डाला जावे,
तो काला पानी
बाहर आता है। धब्बा धीरे-धीरे
अपना रंग खोता
है। उसी प्रकार बुराई भी अपने
आप समर्थन के न मिलने
से, कम होती
चली जाती है। जो विचार बुरे
हैं, वे अपने
भीतर संग्रहित बुराई के कारण से पैदा हो रहे हैं। उनका समर्थन न करने से बुराई जो जमा है वह कम होने लगती है। उन बुरे विचारों को पूरा करने
का मत सोचो।
बुराई अपने आप कम होती चली जावेगी। बुरे व अशुभ संकल्प अपने
आप कम होने
चले जाऐंगे।“7यात्रा
स्वामीजी से बार-बार सत्संग शिविर आयोजित करने के लिए कहा जाता था,इसी संदर्भ में उन्होंने एकबार कहा थाः-
मैंने कोई सत्संग शिविर
नहीं चलाया, ... लोग आते थे, मुझे
समझातेे थे, ... आप मुझसे जुड़े है, मेरे विचारों से जुड़े है, .. आपके
मन को इससे
लाभ होता है,
.. आप आते हैं,
आपका आना स्वाभाविक है।
मैं तो कुछ नहीं
करता, ... जो होता है, स्वाभाविक होता है, ... और जो होता है, वह आपको ही पता है, ... हाँ यहां में शांत हूं,
कोई उत्तेतना नहीं है, कुछ करना
नहीं है, ... उस शांति में आप आते हैं, ... आपको
शांति मिलती है,
.. बस। पर प्रवचन देकर, ... एक निर्धारित क्रम
बनाकर रखना, कहना
ज्यादती है। इससे
मैंने तो कोई लाभ होता देखा
नहीं, अहंकार ही बढ़ता है।
सन्यास भले ही हिमालय पर लिया, ... पर मेरा वहां मन नहीं लगा, ... प्रकृति यहां ले आई, यहां आकर, कार्य
किया, तब तो यह इलाका बहुत
पिछड़ा था, एक बस चलती थी, पैदल ही आता-जाता था, ... सत्य
हिमालय पर ही नहीं मिलता, वह तो हर जगह प्राप्त हो सकता
है।
हम क्या चाहते हैं,
हम ही निश्चित नहीं है।
जो सबका
कारण है, जोे शरीर, मन, बुद्धि, सबसे परे है,
... उसे क्या हम एक स्थान, एक व्यक्ति, एक वातावरण का सहारा लेकर
पा सकते हैं?
जो स्वयं
नाशवान है,... आप उसका लेते हैं।
व्यक्ति से जुड़ते
हैं, या विवेक
से। आपके पास भी विवेक है, पर उसका आदर न होने से वह सुप्त है,...
गुरु देह नहीं,
साक्षात विवेक होते
हैं?... जहा देह पूजा है, वहां
विवेक अनुपस्थित है। अनंत यात्रा में कुंभका कथन है- नीलकंठ से-‘अब तुम्हारा विवेक जागृत
हुआ है, हो सकता है, इसके
बाद मेरा शरीर
भी नहीं रहे’,
गुरु का कार्य
शिष्य का विवेक
जगाना है, पर आज तो अपहरण
ही होना रह गया है।
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, सभी परिवर्तनशील है, इनका
आश्रय मत लो, तुमने चाहा था,
... तुम्हे कब आत्म
ज्ञान होगा, ... जब तुम्हारा कर्तव्य कर्म
पूरा होगा और तुम्हे अपने होने
का अहसास जगेगा,
... विवेक ही सत्-असत् का भेद करता है, ... बस तुम्हे उसका आदर करना है, ... विवेक
विरोधी कार्यों को छोड़ते जाना है,
... सामर्थ्य से परे के कार्यों को भले ही वह सही हों, तुम करना चाहते हो, पर तुम्हारी पहुँच से बाहर के हो, उन्ह7छोड़ दो। जो कर सकते हो, उन्हें तुरंत करो, ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मां’,...
स्वतः कार्य की पूर्णता पर शांति उपलब्ध होने लगेगी।
विचार करो-
गुरु, आश्रम, चातुर्मास, सत्संग, शिविर, साधना, क्या
ये सब मनोरंजन के साधन होकर
नहीं रह गए। लोग कहते हैं,
सिनेमा देखने जाएं
उससे तो अच्छा
है, सत्संग में जाकर प्रवचन सुन आएं।
महत्वपूर्ण बात है, आप चाहते क्या हैं?
अगर आपके जीवन का उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है, तो ठीक है, यहां
लोग आते हैं,
गृहस्थी की परेशानियों से दुखी हैं,
सलाह मांगने आते हैं। आप गृहस्थ हैं, समस्या आपकी
है, ... आप सुलझाते क्यों
नहीं, क्यों उसे दीर्घकाल तक बनाए
रखते हैं, जो दिखता है वह नहीं देखते, जो देखना चाहते हैं,
वैसा देखते हैं,
मुझसे तो मात्र
सहमति लेने आते हो। मैं भी तो शरीर हूं,
मैं तो कहीं
नहीं गया, ... फिर आप में इतने
आत्मविश्वास की क्यों
कमी है? कि आप जरा सी परेशानी हुई, यहां
भाग आते हैं?
मन जब शांत
होकर,... जो भी कार्य उपस्थित है, उसमें उत्तेजना रहित लग जाता है,
... तब स्वतः आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।
लेकिन आप, ... जिस पर विश्वास रख सकते
हैं, ... कहते हैं, आप का ईश्वर
पर दृढ़ विश्वास है, ... उसके द्वारा सौंपे गए कार्य
पर पूरा मन नहीं लगाते, जो अप्राप्त है, उसके
चिंतन में डूबे
रहते हैं, वह कब मिलेगा, पूछने
आते हैं, मैं कहता हूं, विचार
करो, समझाता हूं,
जो प्राप्त हुआ है, उस काम को तो पूरा
करो, ... वहां तो मन नहीं लगता,
दूसरे का काम,
... उसका चिंतन लगातार बना रहता है।
हमरा दूसरे पर, जो भी हो, जो नित्य नहीं रहेगा,
... परिवर्तनशील है उस पर विश्वास करना
क्या उचित है?
दूसरे के साथ आपका
संबंध आत्मीयता का हो, ‘आत्मवत सर्व भूतेष’ू, की भावना
सदा बनी रहे,
... पर दूसरा सुख देगा,... दुख देगा, मानना व सोचना
व्यर्थ है।
हाँ, जो जीवन मिला
है, वह महत्वपूर्ण है।
मैंने कहा था- जीवन
जीना भी एक कला है, यह सीखी जा सकती
है।
जीवन एक पथिक की तरह जीयो। घूमा,
फिरा चल दिए,
न बांधा, न बंधे,। लोग आते हैं, बताते
हैं वे आजकल
आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं, सुबह
से शाम तक नियमित क्रम में मंदिर जाते हैं,
ग्रन्थ पढ़ते हैं,
टी.वी. पर धार्मिक चैनल देखते
हैं, वे आध्यात्मिक जीवन जी रहे हैं।
कहते हैं, जो कार्य
कर रहे हैं,
व्यवसाय या नौकरी
कर रहे हैं,
...रुपया कमाने की सोच रहे हैं,
वे भौतिकवादी हैं।
परन्तु वे इस प्रकार के जीवन
को छोड़ आए हैं।
जब तक देह है, संसार तो रहेगा
ही।
संसार सेे ही देह की सभी आवश्यकताएं पूरी होती है, भौतिकवादी का मतलब
है, जो कामना पूर्ति के लिए ही प्रयास करता है,
... फिर कामना का अंत होता नहीं,
... अनावश्यक और आवश्यक का अंतर धीरेे-धीरेे मिटता जाता
है, वहां बस कामना पूर्ति ही साध्य रह जाती
है, उसे भौतिकवादी कहते हैं। पर जो विवेक की रोशनी में कामना
निवृति के मार्ग
पर चलता है, वह आध्यात्मिक है, उसका सवाल, ... अपने
भीतर की कामनाओं का धीरे-धीरे
छोड़ने का होता
है।
सन्यासी का मुंडित होना,
भगवा पहनना, साधुओं का दिगम्बर हो जाना ये बस प्रतीक हैं। जितने
शीष पर केश हैं, उतनी ही कामनाएँ हैं, ... पर आज गृहस्थों की अपेक्षा सन्यासियों की चाहत ज्यादा बढ़ती
जा रही है। क्या वे आघ्यात्मिक हैं?
भई! कहीं मत जाओ,
जहां भी बाह्य
का सहारा लोगे,
जब तक वह शक्ति रहेगी फिरकनी घूमती रहेगी। बल हटा फिरनी रुक गई, यही सिद्धांत है। बाह्य से मात्र उद्वीपन होता
है, जो घटेगा
भीतर ही घटेगा,
... बाहर उसकी गूंज
हो, नहीं भी हो, क्या फर्क
पड़ता है।
आप जैसे भी है, जहां भी है, अपनी राह पर चलते रहो।
कहाँ जाना है, प्रकृति ने तय कर रखा है,
भूत था जो वह घट गया, उसका
परिणाम आज है, वर्तमान है, उससे
ही कल का रास्ता जाएगा।
‘कर्त्तुम, अकर्त्तुम’, अन्यथा कर्त्तुम, कुछ भी घट सकता है, तुम्हें मात्र वर्तमान में रहना है। हर स्थान, हर समय, हर घडी उस महान प्रकृति ने दी है। न वहां शुभ है, न अशुभ।
शुभ और अशुभ की परिकल्पना यह जो पाखंड चल पड़ा है, इसने कितना
नुकसान पहुंचाया है, यह सब बाद में पैदा हुआ हैं। मैंने पहले
भी कहा है, मन फिरकनी की तरह है, बाह्य
का बल लगाओ
तेजी से घूमती
जाती है, बल के हटते ही रुक जाती है। ऐसा मन धीरे-धीरे रुग्ण होता
जाता हैं उसी में निराशा आती हैं एक बार बाहर का सहारा
लिया, उसकी आदत होती जाती हैं यही दासता है, वहां स्वतंत्रता नहीं मिलती। इससे बचो,
मन को स्वतः
उत्साहित रखना सीखो।
याद रखना उत्साह उसी को मिलता
है, जो उत्साहित रहता है। जो प्रसन्न है, वहीं
प्रसन्नता रहती है। उत्साह कोई बाजार
में मिलने वाली
वस्तु नहीं है। यह तुम्हारा कर्म के प्रति निष्ठा है, लगन है। यह स्वतः होनी
चाहिए।
तुम्हारा कार्य है, जहां
भी हो, वहीं
रहो, तुम्हे कहीं
भागने की जरूरत
नहीं है, दूसरा
कोई तुम्हे न तो आनंदित कर सकता है, न ही उत्साहित। साधारण सा सूत्र है, जो कभी हार स्वीकार नहीं करता,
वही विजयी होता
है। तुम्हें तो मात्र निरंतर कर्तव्य पथ पर कर्मरत रहना है, जो तुमने जाना है, वही विवेक का मार्गदर्शन है। उसका
आदर करो उसे आचरण में लाओ,
व्यवहार में आते ही, पूर्व में गलत कर्मों का बोझ भी कम होने लगता है, जैसे आग में पुराना काट.-कबाड़,
सब जल जाता
है, उसी प्रकार विवेक की अग्नि
असत् के प्रभाव को उसके दोषों
के प्रभाव को भी जलाकर राख करने में समर्थ
है। यही साधना
है, यही सत्संग है, जो शांति
और शक्ति देनों
में समर्थ है।
7 सत्संग
मैंने कभी सत्संग नहीं
करवाया, ... न हीं किसी को इसलिए
यहां बुलाया, ... आपने
पहले भी यह सवाल पूछा था?
...
जो लोग सत्संग में जाते हैं, उनमें
क्या परिवर्तन दस या बीस साल में पाया है, बताओ? मैंने पहले
भी कहा था, साधना व्यक्तिगत होती है, सामूहिक नहीं,
होती है।, सद्चर्चा या वातावरण बनाना
सामूहिक होता है पर इससे विशेष
प्रभाव नहीं होता
है।
साधना के लिए, किसी
विशेष परिस्थिति, विशेष वातावरण, वेशभूषा की कोई जरूरत नहीं
होती है।
यह सब मनुष्य के मन ने अपने
आपको विशिष्ट बनाने
के लिए यह ढांचा बनाया है, दूसरे की निगाह
में आप अपने
आपको बड़ा समझते
रहो,पर भीतर
ही भीतर आप जानते है कि आप वहीं के वहीं है, आपकी
आंतरिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
सत्संग का भाषा में अर्थ होता है।
सत का संग, ... सत जो दिव्य जीवन
है, उसमें रहना।
आप जो, आपका अनुभव
है, आपने जाना
है, क्या वह आपके आचरण में आता है, व्यवहार में आता है, अगर नहीं, तो आप असत के साथरहतेे हैं। फिर कहीं जाकर आँख मींचने की कोई जरूरत नहीं है।हर
व्यक्ति अपनी बुराई
जानता है, अपनी
कमियों को जानता
है, पर हमेशा
बुद्धिचातुर्य से अपने
आपको सही ठहराने का प्रयास करता
है। वहवास्तव में अपनी बुराई संे प्रेम करता है। बुद्धिचातुर्य ही दुख का कारण है। बुद्धिचातुर्य से तात्पर्य है हर गलत कार्य को तर्क
आधार पर न्यायोचित ठहराने का प्रयास। हम गलती पर पर्दा लगाते चले जाते हैं। विभाजित जीवन जीने लग जाते हैं।
सच तो यह है कि जीवन निरंतर निर्दोषता की ओर बढ़ने लग जाए,
तो जोे जाना
गया है, आपका
अनुभव बनने लगता
है।, वह जीवन
में आने लग जावे तो बुराई
स्वतः हटने लग जाती है, यही सत्संग है।
सत्संग आँख मींचकर, किसी
नाम, रूप, वस्तुपर एकाग्र होना नहीं
है।नहीं धार्मिक ग्रन्थों का पाठ करना,
या पाठ सुनना
है। यह तो दोनों की ही अहंकार पूर्ति की व्यवस्था है। आप खुश होते हैं,
सत्संग में गए, वे खुश होते
हैं, इतने लोग आए, इतना बड़ा पांडाल लगा, उन्होंनेअच्छी-अच्छी
बातें बताई। भई, पहले पता करो,
आपके जीवन में उनमें से कितनी
अच्छभ् बातें आई हैं। जिस बुराई
को आपने बुराई
जाना है, वह आपके जीवन में नहीं रहनी चाहिए। रामायण में कहा है, ‘सियाराममय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी’
वहां गोस्वामी जी सबका ेसियाराम मय मानकर प्रणाम कर रहे हैं। पर हम दूसरे को अपने बराबर का इन्सान ही नहीं
मानते हैं।
जो हम दूसरों से अपने लिए चाहते
हैं, वही भावना
हमें दूसरों के प्रति रखनी चाहिए।
हम दूसरों से अपने
प्रति आदर चाहते
हैं।
पर हम दूसरों का आदर नहीं करते।
हम दूसरों से अपने
प्रति प्रेम चाहते
हैं।
पर हम दूसरों से नहीं करते।यह सच है, प्र्रकृति में गुणात्मक भेद हैं,
हर जाति दूसरी
जाति से पृथक
होती है। योग्यता, रुचि, परिस्थिति, ... गुणधर्म हर प्राणी का दूसरे
से भिन्न होता
है। इसलिए आप जितना दूसरों से चाहते हैं, उनके
लिए कर सकते
हैं, दूसरे नहीं
कर सकते।आपकोइसके लिए बुरा
नहीं मानना है। आपकी योग्यता दूसरोंसे अलग है, ... आपको
तो अपने सामर्थ्य का जो आपको
उस महा शक्ति
ने दिया है, अधिक से अधिक
सदुपयोग करना है, और वह होता
है, प्राणीमात्र की सेवा से। आपके
लिए जो आवश्यकता है, प्रकृति अपने
आप पूरी करेगी,
... आपको जो उसने
दिया है, उसे अधिक से अधिक
सबको देना हैं,
सबका हित ध्यान
में रखना है।
आपका ईश्वर में विश्वास है।बहुत अच्छी बात है,
फिर आपको उसके अलावा
अन्य से संबंध
नहीं रखना है, चाहे सुख हो या दुख हो, आपको उसे छोड़ना
नहीं है, वही एक मात्र संबंध
है जो आपको
बनाए रखना है।
आप मानते हैं, वह आपका हितैषी है,
तो दुख भी उसने
आपको आपके हित में दिया है।
उसे भी उसी प्रेम
से स्वीकारना है।
पर क्या यह संभव
हो पाता है?
क्या आप वास्तव में ईश्वरवादी है।
आपका मन हमेशा दूसरों में लगा रहता
है। आप हमेशा
दूसरों के बारे
में ही सोचते
हैं और जो आपने
जो जाना है, उसे कहीं काम में नहीं लाते।उसे व्यवहार में नहीं
लाते। आपने जाना
है, व्यभिचार बुराई है, पर क्या
आपका मन कभी स्त्री चिंतन से हट पाता है, आपने जाना
है, रिश्वतबुराई है, पर कभी आपका
मन दूसरों के धन से हट पाता है। आपने
जाना है, दूसरों की परनिंदा बुराई
है, पर आप कभी इससे बच पाते हैं, ..अनेक
बाते हैं। हम अपना जाना हुआ,...
अपना सोचा हुआ,
अपने काम में ही नहीं लाते
हैं।
कहीं चले जाओ, सब जगह धार्मिक लोगों
का मेला लगा है।मेरा सामान अच्छा
है, तुम्हारा खराब है,
हम धर्म का गुणगान चीख-चीखकर करते
हैं,
पर जीवन में लेशमात्र भी उसका पालन
नहीं करते।
उस दिन एक साहब
आए थे, पूजा
की विधि जानना
चाह रहे थे। जब तक चित्त
में अशुद्धि है, अशुद्ध कर्म होते
ही रहेंगे, और जब तक अशुद्ध कर्म होंगे, पूजा
हो नहीं सकती।
कह रहे थे, पूजा में व्यवधान आता है,मन ठहरता नहीं।मैंने कहा, पूजा मत करो,
उससे कोई फायदा
नहीं होगा, आप जहां भी हैं,
जो भी कार्य
हो, मन को उसी में रखो,..जितनी देर रखोगे,
पूजा अपने आप हो जाएगी। पूजा,
जीवन से हटकर
कहीं नहीं है। जीवन जैसा मिला
है, वही श्रेष्ठ है।
हाँ, हर छोटे से कर्म को हम सत्संग में बदल सकते हैं। शर्त
है मन उसीमें रहे, किंचित मात्र
भी विपरीत नहीं
जावे। वही कर्म
आहुति बनजाताहै,
प्रार्थना बन जाता है।आप
सत्चर्चाओं को सत्संग नाम देते हैं।
वह अलग है। यहॉं, जब जो भी कार्य होता
है, वह सही होने लगता है। सही की पहचान
सबको है। परमात्मा ने सबको विवेक
दिया है, उसका
आदर होते ही सही पथ पर चलना प्रारंभ हो जाता है।
सही काम होते रहने
से मन की चंचलता कम होने
लगती है, वह विकार रहित होने
लगता है। विकार
है, राग, जैसे
गीले वस्त्र पर धूल के कण चिपक जाते हैं।
उसी प्रकार राग सहित अंतकरण पर वासनाओं के कण चिपकने लगते हैं।सहीकार्य करनेसे से जब चित्त,
राग रहित होनेलगता है, उससे काम पूरा होते ही शांति प्राप्त होती
है।
सही काम करने के लिए, चित्त का शुद्ध होना अनिवार्य है। यह प्राप्तहोता है, इस सोच में, ‘मैं बुराई से दूर रहूंगा, जो भी कर्म
उपस्थित है। उसे कर्तव्य कर्म से पूरा करूंगा।
यह तभी संभव हो पाता है, जब जो सामर्थ्य आपको मिला है, उसका
सदुपयोग हो, जो मात्र सेवा से ही प्राप्त है। सेवा की पहचान
है सबके प्रति
सद्भाव बना रहे।
‘आत्मवत सर्वभूतेषु, सर्वभूतेष हितेरतः।’ यह भावना दृढ़होती जाती है, तब जो ज्ञान हमें
प्राप्त हुआ है, हम उसका जीवन
में आदर करने
लग जावंे,... उससे
ही हमें शांति
प्राप्त होती है, प्रसन्नता प्राप्त होती
है, और जो काम होना है,
... वही होने लग जाताहै। न करने
वाला काम अपने
आप छूटने लगता
है। जो नहीं
मिलना है, उससे
छुटकारा अपने आप होने लग जाता
है। इसीलिए, अगर आप सत्संगी हैं,
... सत्संग में आए हैं, .. तो यही ध्यान रहे, ... जिस काम को आप गलत मानते हैं,
जो नहीं करना
चाहिए, उसको नहीं
करे। जब भीकोई
गलती आप से हुई हो, तुरंत
उसे स्वीकार करें,
उसे छुपाए नहीं,बुद्धि चातुर्य के आधार पर तर्क
का सहारा लेते
हुए उसे सही ठहराने का प्रयास नहीं करें। इससे
जहां चत्त की शुद्धि प्राप्त होगी,
मन की मलिनता मिटेगी, मन की शक्ति बढ़ेगी तथा किए गए कार्य
की पूर्णता पर शांति-शक्ति भी स्वाभाविक रूप से प्राप्त होगी।
8 अनुभव
स्वामीजी साधना में प्राप्त अनुभवों की चर्चा
कर रहे थे, ओंकारेश्वर घटना का वृत्तांत ”अनाम यात्री नामक कृति में भी है।
”यह ओंकारेश्वर की घटना है।
मैंने आपको कहा था न, तब भंडारी मिल में काम कर रहा था। वहीं ‘पाल ब्रन्टन की पुस्तक, ‘रमण महर्षि के बारे
में पढी़ थी, जिसके बारे में पहले बताया था,
... मैंने पुस्तक पढ़कर
जब रखी तक स्वप्न में वही का सारा दृश्य
देख लिया था,-जब वहां गया तब रमण महर्षि वहांथे,-परउनकी अवस्था के यही अंतिम
दिन थे।
बहुत कम बोलते थ.े खाना भी उनके हाथ में रखकर जब कहा जाता था तब वे इन्द्रियगत संबध्ंा जोड़ पाते थे, ... पहाडी
की जब परिक्रमा की तब पाया,स्थान जैसे मैंने
स्वप्नमें देखे थे,
... वैसे ही थे।मैंने इस परज्यादा विचार नहीं किया। हाँ,
ओंकारेश्वर में तब पैदल चलना पड़ता
था। मैं नदी के इस पार से उस पार जा रहा था,
... रास्ता बहुत संकड़ा,
व पहाड़ी था। पत्थर भी उबड़-खाबड़ रखे थे,
... उतरना ही उतरना
आगे उतरा व चढ़ना पड़ता था,
... रात का वक्त
था। तभी अचानक
प्रकाश का एक गोल घेरा दिखाई
दिया, .. जो मेरे आगे आगे चल रहा थ, ... पहले
तो मैं मुड़ नहीं पाया। यह तो होता
था, जब सोता
था प्रकाशकी एक बीम सी आती थी, ... वह जो आज्ञा चक्र है, जहां बिंदी लगती
है; वहां पर आकर ठहर जाती
थी, ... और मैं गहरी नींद में सोे जाता था। पर वह प्रकाश भीतर से आकर इस प्रकार मार्गदर्शन करेगा, ... यह मुझे वहीं अनुभव हुआ।
भीतर का प्रकाश, ... बाहर
अंधेरे को पता नहीं लगने देता।
मेरी आँख की रोशनी बहुत कम हो चुकी है। एक आंख ग्लूकोकोमिया के बंबई आपरेशन से चली गई हैं; पर दूसरी
आँख में भी बहुत कम दिखाई
देता है। पर अखबार पढ़ लेता
हूं, मेरासारा काम यथावत हो जाता
है।
तभी आप टार्च नहीं
रखते...’
‘(हंसते हुए) हाँ,
जरूरत नहीं पड़ती।
रात को तीन बजे जगना पड़ता
है। हाथ से टटोलता चला जाता
हूं। बत्ती कहॉं
है, स्विच कहां
है,अंदाजा लग जाता है...’
या रोशनी... होती है,
‘कुछ भी मान लो,...’,उस दिन पिरामिडों की बात चल रही थी.......
स्वामी जी बोले-जिसे
पिरामिड कहते हैं,
अभी समझने में समय लगेगा। वहां
अंधेरा था, दीया
बत्ती का सबूत
नहीं है। मशालों कासबूत नही ंमिला
है।, ... अंदर कौनसा प्रकाश था, ...अभी इस पर खोज होनी है।।
तीर्थ जो आज है, वे धंधा बन गए हैं।
प्रश्न-आप तो चारों
घाम गए, ...हिमालय भी...
उत्तर- ‘हाँ,
अमरनाथ पैदल गया था, ... उसके उसके बाद जब लौटे
तब पॉव सुन्न
हो गए थे, वो बता रहा था,...’
‘तीर्थ यात्रा, भावना
से जुड़ी है। गंगाजल पवि़त्र करता
है?
उसे ही जोे यह मानता है,
हमारा आज न तो विश्वास रहा, न निष्ठा, न श्रद्धा, ... लगन भी नहीं है, इसीलिए हम जाते
हैं, जगह को छूकर
आ जाते हैं।
.हमारी मानसिक उर्जा
को वहीं जाकर
सहारा मिला है,
... जो दृढ विश्वास रखता है। वही अपनी बुराई में मुक्त भी हो जाता है, उसका
संकल्प इतना घना हो जाता है, वह उसे मार्गदर्शन देने लग जाता
है।
शक्ति तो हमारी जागृत
होती है, जो पिंड में है, वही ब्रह्यांड में है।
पर विश्वास नहीं है।
एक तीर्थ, पत्थर- मिट्टी,गाारे से बना है, , वहॉं मूर्तियॉं हैं।दूसरा तीर्थभाव लोकमें में बसता है, हमारी मान्यता में बसता है,और जो जिस रूप में देखता
है, वह उस रूप में पाता
भी है, यही सार है।एक का तीर्थ
बस एक बस्ती
है, एक शहर है, दूसरे का तीर्थ चिन्मय होता
है। जैसे विदेशी भी यहां आकर तीर्थ में रहते
हैं, उसे समझो,
वही उनका जीवन हो जाता
है।परिवर्तन भीतर ही होता है,... जहां
पहुंचकर हमारेे विचार
शांत हो गए...
शांति अनुभव हो,
... वहां हमें मार्गदर्शन भी मिलेगा, यह सच है।
9 साधना
प्रश्न था साधक किस प्रक्रिया का पालन
करे?
स्वामीजी कह रहे थे-
‘किसी का भी मन नहीं दुखाना चाहिए, रास्ते सभी अच्छे हैैं, फिर सबकी परिस्थ्ािित, और योग्यता अलग-अलग है, दो पक्तियाँ भी प्रकृति में एक सी नहीं होतीं, फिर एक जैसी व्यवस्था सबके लिए कैसे
ला सकते हो? यही बड़ी गलती
हो गई है। हम अपने शास्त्रों को सही दूसरे
को गलत बताते
हैं, उनकी मान्यताओं के परिवर्तन की कामना करते हैं।
यहां इसलिए मैंने कोई पद्दति नहीं बताई,
कहा जो तुम करते हो करते
रहो, तुम्हे छोड़ने
की जरूरत नहीं
है। तुम्हारी लगन सच्ची होनी चाहिए।
इसलिए बहिर्मुखी सत्संग नहीं
हो सकता है। हाँ मनोरंजन व सद् चर्चा इसमें
अवश्य होती है। क्योंकि सबकी मान्यताएं, रुचियॉं अलग - अलग हैैं, हम व्यक्ति विशेष की सहायता कर सकते हैं।
उसका मार्गदर्शन हो सकता है। पर सबको एक लाठी
से नहीं हॉका
जा सकता, ... यह उनको देखना है।,
... हमें नहीं, ... यहां
प्रकृति में सबको
खुली छूट है, एक वक्त ऐसा आता है, रास्ता बंद जाता है, तब वापिस लौटना
होता है। इससे
निराशा आ जाती
है।
कर्मकांड भी साधना है, सीढ़ी है, पर कब तक उस पर ठहरे रहोगे,
आगे जाना भी होगा। कर्मकांड का अर्थ होता है क्रिया तो होरही
है पर उसमें
मन नहीं है।जब
क्रिया और मन एक होजाता है वहा 1 उपासना बन जाती
है।हमेशा वहां खड़े नहीं रह सकते,
वह भी छूट जाएगा।... भक्ति की एक सीढ़ी है, जब वह छूटती
है तब निःसंकल्पता में प्रवेश होता
है। ... वहां ज्ञान है। ज्ञान है, संसार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं
कर सकता है। जो महान शक्ति
है उसके प्रति
जो जिज्ञासा शुरू में होती है, वह बाद में धीरे-धीरे रुचि
में, फिर स्वभाव में बदल जाती
है। रह जाती
है, मात्र सजगता...
रहना तो फिर भी पड़ेगा, कोई चमत्कार होने वाला नहीं है। बस इस रहने
में और उस रहने में भेेद
यह हो जाता
है,ै, यहाँ
सभी कार्य तो वही
होंगे, पर शांति
होगी, प्रेम होगा।
इसीलिए किसी की भी मान्यता पर अविश्वास मत करो, ...
प्रारंभ में मंदिर, और मूर्तिपूजा ही साधक
को मिलती है। यह
वह जगह होती
है, जहां जाकर
उसकी भावना दृढ़ हो जाती है। उसे अपनी मलिनता का बोध हो जाता है।
वह वहां क्यों जाता
है, इसका उसे पता नहीं रहता,
उसे अच्छा लगता
है, वह चाहता
है। मंदिर कोई पत्थर, ईंटों का भवन नहीं होता।
घोंसला तो चिड़िया भी बनाती है, पर यहां उसके
भीतर संस्कार है जो जोर मार रहे हैं; वह भगवान को कहीं
देखना चाहता है। लोग घरों पर इसी लिए मंदिर
बनाते हैं, पूजा
करते हैं।
पहले इन सबकी जरूरत
होती है, कोई लक्ष्य है, तो उसे इसे हटाना नहीं चाहिए। बाद में जो छूटना है, वह अपने आप छूट जाता है।
पहले बाह्य पूजा होती
है, अभिषेक होता
है, षेाड़षोेपचार होता है, विधि विधान
से होती है। बाद में धीरे
-धीरे मानसिक पूजा
रह जाती है।फिर एक दिन आता है, वह भी छूट जाती है। मंत्र भी पहले
स्थूल जपा जाता
है, फिर धीरे-धीरे मानसिक जप रह जाता है। यह सब एक प्रक्रिया है, ... जो हर परंपरा में मिलती है।
हजारों साल से इस प्रकार से मनुष्य यह रास्ता खोजता
आया है। मैंने
कभी भी, कहीं
भी, किसी की अवहेलना करने को नहीं कहा। चर्च
का भी विधान
है, मस्जिद का भी है, ... सब जगह अपनी- अपनी
परंपरा है, उसमें
जब साधक जाता
है तो उसका
मन कुछ देरके
लिए शांति पाता
है, सार यही है। वह कुछ देर स्मृति के दबाब से हट जाता है। घर में महिलाएॅं, तुलसी केे आगे दिया
जलाकर, उस महाशक्ति का सहारा पा लेतीं थीं।यह सब भावना और लगन पर टिका हुआ है।
मंदिर यहां के लोगों
के लिए इसी तरह की जगह थी।, जहां वे गए अपनी व्यथा
सुना आए, ... पुराने लोगों ने बहुत
काम किया है, तरह- तरह के उपाय बताए। दक्षिण में कितने बड़े विष्णु के मंदिर हैं,ं, विष्णु जितने बड़े हैं, उनके मंदिर
उतने ही बड़े हैं। मस्जिद, पूरी
खुली होती है। मंदिर ढका होता
है।यह सब अपना-
अपना सोच था। आज के मंदिरों में वह बात नहीं रही। सब पैसे कमाने का तरीका बन गया।
मंदिर वह हैै,
जहां जाते ही लगे, यह जगह शांत है, यहां जो विचार
उठता है, उस सवाल का उत्तर आता है। क्यों? वहां साधकों का मन शांत
हुआ है। पुराने मंदिर जागृत है, वे चैतन्य है आनंद है। मंदिर
कोई भवन नहीं
होता, मूर्ति तो जयपुर मंे बनती
है। फिर होता
क्या है, ... तुम्हारी भावना, तुम्हारी शक्ति उसे चैतन्य कर देती है। हरिद्वार गए थे, वहां क्या देखा,
इतने मंदिर हैं,
... वहां पूजा भी अब मशीन से होने लगी है, सब यांत्रिक। .
साधक के लिए आवश्यक है, उसकी मान्यता दृढ़ हो। और उसकी
लगन हो,। हमें कभी भी किसी की मान्यता पर दबाब नहीं
डालना चाहिए, इसीलिए ,मान्यताओं के परिवर्तन के लिए कभी मैंने नहीं कहा।
10 अनुभव 2
स्वामीजी अस्वस्थ थे,शाम के समय वे मिलने वालों के पश््रनों के उत्तर
दिया करते थे, यहाँ उन संवादों का सार संक्षेप हैः-
”हाँ, जो करना
था, वह तो बहुत पहले हो चुका था... कई बार विचार उठा कि जो करना
था, ... वह तो हो चुका, शरीर
को क्यों रखा जाए , क्या प्रयोजन है?
बहुत पहले
आपको बताया था ,
स्वप्न आया था , मैं समुद्र के किनारे खड़ा हँू, ... और सोच रहा हूं,
रामतीर्थ की तरह इहलीला समाप्त करें,
मैं समुद्र में चलने
लगा, धीरे-धीरे
बढ़ता रहा, ... कमर तक पानी आ गया,
... मैं आगे बढ़ता
रहा, गले तक आ गया,...
तभी अचानक लगा किसी
ने धक्का दिया...
पाया मैं बड़ी सी नाव के पास खड़ा हूं। सिपाही ने मुझेपकड़ लिया
है, वह कह रहा है, क्या
मरने चले थे...
तब लगा कि अभी वक्त नहीं आया है,
रहना है..।.
तब इस सेवा प्रतिष्ठान का कार्य प्रारम्भ किया, ... सेवा क्या है,
बड़े वृक्ष के नीचे
जो आ जाएगा,
उसे छाया देनी
है, उसने पूछा
,सुना
हो सकता है, संकेत कर दिया,
... शारीरिक सेवा तो इस उम्र में कहां हो सकती
है, हाँ, मानसिक सेवा सुबह से रात तक चल ही रही ह।.
फिर पता ही नहीं
चलता, .. कब कौन आया था, क्या
सोच रहा था, वही आकर बताता
है, कि वह कुछ सोचकर पहले
आया था, ... उसका
कार्य हो गया,
... वह यह बताने
आया है।
मैं तो कुछ करता
नहीं, ... मुझे मालूम भी नहीं होता,
जो होना है वही होना है, अपने आप हो जाता है, उसके
संकल्पों को दिशा
मिल जाती है। यहां तो कुछ है ही नहीं,
क्या करना है, यह भी नहीं
है।“
”एक ही सवाल
को कितनी बार आपने पूछा है,
- बात तो एक ही है,
आप घुमा फिरा कर बार बार पूछते
हो,
मन का जो अनावश्यक भटकाव
है, निरंतर विचारणा में जो लगा रहता है, वह रूक जाए, यही साधना है।
आज जो भी आता है, वह बर्हिमुखी है, उसका मन चंचल भी है, विकारी भी है, उसे अपनेऊपर विश्वास भी नहीं है, न ही वह कुछ करना चाहता
है, वह चाहता
है, उसे आशीर्वाद मिल जाए, और वह जागृत हो जाए, उसकी मनोकामना पूरी हो जाए,
.. लाभ और लोभ दोनों प्राप्त हो।“
”पूरे देश में एक करोड़ से ऊपर लोग होंगे,
जो आध्यात्म की दुकानें खोलकर बैठे
हैं। किताबों में कहानियां है, वो सुना देते हैं,
... सुना रहे हैं,
संगीत से सुनाते हैं, मनोरंजन हो रहा है। साधना
मनोरंजन नहीं है। वह पहले कहानी
उस पंडित की भी सुनाई थी ने, जो भागवत
बांचते थे, राजा
को सुनाने गए थे। राजा ने कहा पंडित जी फिर आना अभी आप में कुछ कमी है।उन्हें बुरा लगा, घर गए,दुबारा कठोर अभ्यास किया।, .. फिर दुबारा गए, राजा ने फिर वही कहा,
अंत मंे पंडित
जी घर छोड़कर
जंगल में चले गए। वहां जाकर
तैयारी करेंगे। फिर आकर राजा को सुनाएंगे। परन्तु वे आए ही नहीं,
फिर राजा उनकी
खोज में गया।
पंडित जी मिले,
राजा ने कहा-
वह कथा सुनने
आया है। तब पंडित जी हंसे,
बोले राजा अब कथा ही नहीं
रही, न सुनने
वाला रहा, न सुनाने वाला ाहा।
सार, अंतर्मुखता की प्राप्ति का होना है। वह होती है, निरंतरता वर्तमान में रहने
से। पर यही नहीं होता। आज सभी बाहिर्मुखी हैं। जो खुद कह रहे हैं, वह उनके आचरण में नहीं है। उनका
उस पर ही विश्वास नहीं है। अर्थ है, तो पालन करो, ... आचरण
में लाओ, ... फिर तुम्हे कहीं भागने
की जरूरत नहीं
होगी। ‘सियाराम मय सब जग जानी,
करहुं प्रणाम जोरी
जुग पानी,’ सब जगह वही है, तब मात्र सेवा
ही शेष रह जाती है। अपने
पॉंव छुआने का,,
रोली लगाने का, मालाएं पहनने का,,
ये जो स्वांग भरा जाता है, इसकी भी जरूरत
नहीं रहती।“
हम बाहर बैठे थे, पांव में जो घाव था उसकी
ड्रेसिंग हो चुकी
थी, ... बाहर हल्की धूप थी।स्वामीजी कह रहे थे,”जब नमक का पुतला
सागर की गहराई
नापने गया, तो खुद ही गलकर
एकाकार हो गया,...
वहां जाकर, कौन आया है, बताने, वहां
क्या शेष बचता
है,
पर इस अवस्था में जब देहांत होता
है, तब?प्रश्न था?
”जो सबका होता
है, वही होगा,
मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी, बस एक बूंद समुद्र में मिल गई, तब क्या होगा,
वह रही है कहां है, जो बताएगी, ।“...
”हाँ,, जब संस्कार ही नहीं बचा है, ... तब सब खाली हो गया तब..तो यह संभव है,.पर साधारण पुरुष का क्या अंत होगा?
प्रश्न था।..
”साधारण, असाधारण क्या,
... जो पैदा होता
है, ... वह मरता है, ... शरीर पंच महाभूतों से बना है, वह उनमें
मिल जाता है। संस्कार जो है, वह शेष रहता
है, गुण संस्कार में है, ... मन तो गति है। वही सूक्ष्म शरीर
है, ..वह तो रहेगा, ... अनुकूल वातावरण मिलने
पर जैसे बरसात
में न जाने
कितने कीट पतंगे,
वनस्पतियां उत्पन्न हो जाती है,... वह जन्म ले लेता
है, ... न भी ले,... जैसा उसका संस्कार है, ... मनुष्य जीवन का उद्देश्य, अंतर्मुखता प्राप्त होने
पर ही उसे पता लगता
है, ... बहिर्मुखी तो भटकता
रहता है। यही माया है।
हां, सब यहीं है, कुछ भी खाली
नहीं है। एक आलपिन की नौक पर सैकड़ों संस्कार रह सकते हैं।
मात्र बबूला,,... एक हवा, ... शरीर तो है नहीं, वह तो संस्कार को आकर मिलता है।
क्रिया के लिए इन्द्रियां चाहिए, ... बिना इन्द्रियों के सब व्यर्थ है। मनुष्य जीवन भी इसीलिए सर्वश्रेष्ठ कहा है। पशुओं के पास मस्तिष्क नहीं है। सोच-समझ नहीं है। प्रयास वे नहीं कर सकते। और जो मूक शरीर है, उसे भी गति के लिए, विकास
के लिए शक्ति
चाहिए, जो उसके
पास नहीं है।
बहस में पड़ना बेकार
है।“
तुम्हारा रास्ता ठीक है, या गलत है, इस सोच में पड़ना बेकार है।
जो रास्ता तुम्हे मिला
है। उस पर चलो,
मैंने कोई रास्ता नहीं
बताया, ... तुम चलोगे, और लगन सच्ची
है, तो तुम अंतर्मुखी हो जाओगे,
... यह सच है।
यहीं आकर सारे रास्ते अपनी पहचान खो देते हैं।
अतः इस भूल भुलैया में पड़ना बेकार
है,
इसीलिए मैंने कभी रास्तों की चर्चा ही नहीं की।
एक ही बात बताई,
सुबह बिस्तर से उठने
से पहले और रात को सोते
समय, ... थोड़ा अभ्यास नियमित करो और अभ्यास भी क्या,
... अपने विचारों को कम करने का प्रयास करो, ... रास्ता मात्र अवलोकन का है, ... इसमें धीरे-धीरे विचार और विचार के बीच में जो अन्तर
है, वह अनुभव
होगा। धीरे धीरे
बढ़ता जाएगा, ... उस अवस्था में नींद
भी आ जाए तो अच्छा है, हो सकता
है, शुरू में सपने बढ़ जाएॅं,
... पर घबराओ मत,
... यहीं अंतर्मुखता की चाबी है।“
”साधना जीवन और जगत को काटकर
नहीं हो सकती।
मैंने कभी भी अलग से बैठकर,
आँख भींचने को नहीं कहा। ये जो ध्यान सिखाते हैं, समाज और जीवन से काटकर
बात करते हैं।
सभी दिशाएं अच्छी
हैं, सारे कमरे
अच्छेे हैं, जीवन
और जगत में जो तनाव रहित,
शांत मन से जो भी क्रिया हो अधिक से अधिक मन को वहीं रखने का प्रयास करना चाहिए,
यही सुमिरन है। पर क्या कर रहे हैं, घर से भाग रहे हैं, कहीं अलग जगह ले जाते
हैं, कहते हैं यहां साधना शिविर
है। एक उलझन
पैदा करते हैं।
हर व्यक्ति हर परिवार उलझता जाता
है। जितने आदर्श
घड़ोगेे उतना ही पाखंड बनेगा। व्यक्ति का आत्मविश्वास टूट जाता है।“
”पुराना, ... जब प्रकृति ने ही नहीं रखा...
तुम क्यों पीछे पड़ते
हो।
यहां सब बदलता है। नित नई विचारधारा आती है। नहीं
हो तो प्रकृति अपना कार्य करना
बंद कर दे। यहां जो आज है, कल नहीं
रहेगा, जो कल था वह आज कहां है?
इसीलिए किसी एक बात पर चिपककर बैठ जाना उचित नहीं
है।
पुराने तरीके आज काम नहीं आ सकते।
हम जो पुराने ग्रन्थों को, लीक पकड़कर परिपाटी की तरह पढते चले आ रहे हैं,
वहां सवाल करना
चाहिए, इससे कुछ फायदा भी हो रहा है, क्या..?
जो छूटता है, छूट जाने दो, ...
जो तुम्हारा अनुभव बनेगा,
वह सच्चा होगा,
वह तुम्हारा है। सनातन धर्म का मतलब होता है, जो सदा है,
... कल भी था, आज भी है, कल भी रहेगा,
इसीलिए रास्ते को लेकर चलना उस पर बहस करना
अब बेकार है। बाहर तो मात्र
बहिर्मुखता है, ...उसके
बाहर आना है। फिर जो है, सदा से है,उसकी अनभूति होने
लगेगी, ... वहीं शांति है,, वहीं शक्ति भी है। समय के साथ भाषा
बदल जाती है, कहने का तरीका
बदल जाता है ।पर जोे कहा जाता है, ... जो शब्दों से भी परे हैं, वह महत्वपूर्ण है।
गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के जो लक्षण है, वे अंतर्मुखी व्यक्ति के है।, ... वहां पर सब रास्ते आकर मिल जाते हैं,
... वह सदा से है,। वह अनभूति है, व्याख्या नहीं है।शब्द बताते हैं कि ऐसा हो सकता
है।“
”धर्म की चर्चा
मैंने भी की है, क्योंकि वह तो रास्ता है, अध्यात्म उससे परे है, वह छत पर आने की सूचना है। वहां
आकर फिर बाहर
और भीतर आने की स्वतंत्रता रहती है। मैं तो जो भी आता है सवाल पूछता
है, उससे यही कहता हूं, तुम जो कर रहे हो उस पर विश्वास लाओ, करो,,
सोचो मत, चलो,
उसे व्यवहार में लाओ गलत होगा,
अपने आप छूट जाएगा, प्रकृति अपने
आप में सही बड़ी मार्गदर्शक है। अंतप्रेरणा अपने आप बता देती है। क्या सही है?, क्या गलत है? गलत छूट जाएगा। पर चलो तो सही। तुम्हारा धर्म, तुम्हारी मान्यताएॅं , सही हैं या गलत यह चर्चा का विषय नहीं है। मैं किसी की मान्यता को बदलने के पक्ष
में नहीं हूं।
बलपूर्वक या अन्य
किसी प्रकार से यह कार्य नहीं
करना चाहिए।“
अन्तर्मुखी अवस्था में संस्कार खुलना शुरू होता
है।
यही वास्तविक साधना है, पात्र का ढक्कन
सा खुल जाता
है, एक प्रवाह है, उसके खुलते
ही, जहां पर यात्रा बंद की थी, वह मुकाम
आ जाता है। जो जाना गया है, वह सब भीतर
है, बस वहां
पत्थर रखा हुआ ह।, ... वर्तमान में रहने
से क्या होता
है, बाहर का भटकाव बंद होते ही मन अंतर्मुखी होने लगता
है।
पहले बताया था न, अंतर्मन, मन का ही हिस्सा है।,
जो विराट से जुड़ा होता है, विराट अत्यंत शक्तिशाली है, वहॉं संबंध
जुड़ते ही सब प्रकट हो जाता
है, वही ज्ञान
है।
तब वास्तविक यात्रा शुरू
हो जाती हैं,े यही अध्यात्म है। अध्यात्म कोई ओढ़ने की चादर
नहीं हैं, जब ये स्मृतियां खुलती है, एक साथ प्रवाह सा खुल जाता है, साधक
बेचेन हो जाता
है। यहीं तितिक्षा है, वेग को सहन करो, तभी वास्तविक प्रगति होती
है।“
‘
”अनंत यात्रा’ एक उपन्यास ही नहीं है।
पता लगाओ, नीलकंठ कौन है?, उसकी यात्रा, साधक की यात्रा है, इन्हीं सारे
सवालों का जवाब
एक साथ यहां
दिया हैं,
मैंने कुछ भी नहीं
छिपाया है,
यह जो सत्य है, उसकी ही खोज,
नीलकंठ की है,,
तो शिखिघ्वज की भी है। मुझे
किसको बताना था, यह भी साफ ही था
अंत प्रेरणा उठी, और मैंने लिख कर तुम्हे भेज दिया।
जो भी कागज
मिला उस पर लिखकर तुम्हे भेज देता। एक साथ तो लिखा नहीं, पहले वाला
भी मेरे पास नहीं था। तुमने
जोड़कर किताब बना दी। अच्छा हुआ पर देखना, उसमें
जो प्रवाह है,
... एक साथ बैठकर,,
... एक जगह बैठकर
मैंने नहीं लिखा,
... सब स्वाभाविक है।“
”इसीलिए मेरे पास भीड़ नहीं थी।
... जो भाषा बनाता। मुझे किसे समझाना था, ... सामने कोई था नहीं। तुम्हारे आने के बाद तुमने सवाल पूछने
शुरु किए। उसके
पहले साठ साल तक कोई इस संबंध में पूछने
नहीं आया। नहीं
चर्चा की। मैं चुप रहा। गुरुकुल चलता था, ... उसी के संबंध में बात होती थी। कभी कोई कुएं
में पानी आजाएगा, शादी होजाएगी, यह बात पूछता। जब गुरुकुल में शुरू-शुरू में आया था, तब गीता
पर प्रवचन दिया।
मोहन जी भी यहीं गुरुकुल में पढ़ाते थे, ... पर कभी आध्यात्मिक चर्चा उनके साथ नहीं
हुई। श्री राम शर्मा भी आए, सत्यमित्रानंद जी भी आए, ... वे धर्म प्रचारक थे। । आपसे मिलने
के बाद सिलसिला शुरू हुआ। मेरे
सामने, मेरा उद्देश्य था, ... मैंने पाया। आज आप देखते
हैं, मैं घंटों
बैठा रहता हूं,
पता भी नहीं
रहता, क्या समय हुआ है, आप पानी के लिए पूछते हैं, ... तब दुबारा पूछने पर कनेक्शन जुड़ता है,
... हाथ उठता है,
... प्यास भी तभी अनुभव होती है। फिर बताओ, शब्द
और भाषा कहां
से आती। जो सत्य है,... वह जब व्यक्त होगा,
कम से कम शब्दों में ही होगा। जहां वह भी है, मात्र
उसकी वर्णना है, व्याख्या है, वहॉ।
घंटों चर्चा करते
रहो, कोई फर्क
पढ़ने वाला नहीं
है।“
”हां, मेरी कोई इच्छा ही नहीं
थी।
आपको बताया
था बचपन में कि एक बार वो बड़े लेखक
घर आए थे, मैंने उनकी सेवा
की, तब उन्होंने कहा था, कुछ मांगों तब मैंने
कहा था, कि किसी के सामने
हाथ नहीं पसारुॅंे।. वही बात मैंने
इंजीनियर साहब को बताई थी। इसीलिए संन्यास लेकर गुरुकुल खोला था। वही एक मात्र संकल्प था।
मुझे कहां जाना है,
... क्या पता...
शरीर जब छूट जाए,
तब गिद्धों के लिए डाल देना, ... शायद उनके काम आ जाए,
प्रकृति में हर वस्तु काम में आनी चाहिए।
‘यह आप क्या
कह रहे हैं?’प्रश्न उठ खड़ा हुआ था।
”क्यों, मिट्टी का क्या, ... मिट्टी तो मिट्टी में मिल जाएगी।
फिर क्या बचेगा, ... बूंद
के समुद्र में मिलने के बाद पूछने वाला भी नहीं मिलता।
अंगुली से छाती पर दिखाते हुए यहां कुछ भी शेष नहीं
रहा। कुछ भीनहीं। सब क्षय हो गया।“ (मुस्कराते हैं)
जिनके संस्कार शेष रह जाते हैं, वे लौटते हैं। आना पड़ता है। नहीं
भी आओ, जन्म
कोई साधारण चीज नहीं है। संस्कार भटकाते हैं। यही क्रम है। सिलसिला है, जो जारी
है। आज नहीं
कल, विज्ञान इधर भी हाथ बढ़ाएगा,
कुछ नहीं बस एक सपना होता है।
सपने में हम उठ जाते हैं, छूते
हैं, यह मेरे
हाथ है, पॉंव
है। वहां कोहनी
है। यह संस्कार भी एक सपना
है।“
”वहां स्वप्न है, बस एक गहरी नींद है। इंद्रिया है, नहीं,
... जो कह सके,
... व्यक्त कर सकें...
स्वप्न हमेशा सच लगते हैं, टूटने
के बाद पता लगता है, यह तो सपना था। वहां मात्र एक स्वप्न रहता है। उतना यथार्थ। स्वप्न में दुख कितना
गहरा लगता है। राजा जनक को स्वप्न आया था, वे स्वप्न में भिखारी है, दाने
-दाने के लिए मोहताज हैं।, उन्होंने जगते ही सवाल
पूछा था,... यह सत्य है या वह सत्य हैै।
तब अष्टावक्रजी ने उत्तर दिया, ... राजन
दोनों ही सत्य
हैं।
इस स्वप्न में भी दुख
होता है, सुख होता है, उतना
ही यथार्थ लगता
है, पर व्यक्त करने के लिए देह नहीं होती।
इस चर्चा में पड़ना
बेकार है, सच यह है कि मनुष्य देह बहुत
ही बहुमूल्य है। यह हमें हमारे
संस्कार को शुद्ध
करने के लिए मिलती है। यह जो संग्रह है जो स्मृतियां है, उन्हें खाली इसके
लिए मिलता है।।
इसको ठीक से समझा नहीं जाता
है। संग्रह कम हो, यही साधना
है। संग्रह जो है, विचारों को पैदा करता है, विचार ही विकार
है। विचार कम होंगे, संग्रह कम होता जाता है।
जो पुराना है वह खत्म हो ,नया संग्रह नहीं बने,
यही वर्त्तमान में रहने की कला है।“
सभी धर्म आत्मा की चर्चा करते हैं।
आत्मज्ञान, आत्मानुभव, ... यह क्या है?
शरीर तो दिखाई पड़ता
है, स्थूल है।
मन को देखा है क्या?
शास्त्र कहते हैं, मन विकारी है, सतोगुणी है, रजोगुणी है, तमोगुणी है, ... मन को तो किसी
ने देखा नहीं
है।
उसके क्रियाकलापों को हम जानते हैं, उसको
देखकर ही हम मन की व्याख्या करते हैं।
मन एक गति है।
मात्र गति जो कल्पना करती है, स्मृति रखती है,
और प्राण भी गति है,
शरीर में आते ही गति दो रूपों
में बंट जाती
है। मन चक्राकार गतिे हैं, प्राण
सीधी गति हैं,
यह नाभि से मस्तिष्क तक है, ऊर्ध्वाकार। योग, वास्तविक अर्थ में दोनों
दोनों गतियों का एक हो जाना
है। शक्ति, प्राण
में है, वही सृजन का कार्य
करती है, उसी से पोषण होता
है। विकास उसी से होता है। श्वास प्राण नहीं
है।
सूक्ष्म शरीर में, यह गति संस्कार सहित
रहती है, संस्कार का धरती पर नया जन्म लेना,
और देह का छोड़कर जाना सब उसी पर निर्भर करता है।
तो जब हम मन को ही नहीं
जानते, तब आत्मा
पर चर्चा कैसे
कर सकते हैं।
गीता में बहुत
समझाया है, ... पर वह जो मन से परे है, वहां मात्र अनुभव
तो होगा, वर्णन
नहीं।“
11 प्रसंग
स्वप्न किस प्रकार हमारा
मार्ग दर्शन कर सकते हैं,अचानक
परिस्थिति जब कठिन
आजाए तब क्या
किया जाए,प्रश्न यह था।स्वामीजी ने अपने अनुभव के आधार पर उत्तर
दिया थाः-
”जब गुरुकुल का कार्य शुरू ही किया था, कि एक बार अचानक
एक प्रसंग आ गया। रामस्नेही पंथ के धर्मगुरु झालरापाटन आए हुए थे। बकानी
के लोग आए, बोले उनका कार्यक्रम पास के गुरुकुल होते हुए बकानी
जाना है। वेे शाम को चार बजे यहॉं आएंगे। ... यहां भोजन व्यवस्था हो जाए तो अच्छा
है, ... उन्हें पता था, यहां कुछ भी नहीं था, ... ‘मैंने
कहा ठीक है’,
उन्होंने
कहा लगभग अस्सीसंत उनके साथ और हैं, ... सबका प्रबंध होना है।...
यहां तो टिकिट के पैसे भी पास नहीं थे।े, असनावर, तक पैदल ही जाता था,
... यहां सेे माचलपुर पैदल ही जाना
होता था, बस से जाना होता
तो लोग टिकिट
ले लेते, ... रात को सोचा, ... स्वप्न में देखा , स्टेशन पर खड़ा हूं,
लिखा, ‘ब्यावरा’ देखा, , सुबह
चार बजे उठा,,
ब्यावरा..चला गया।
वहाँ दोनों भाई, जो बड़े सेठ थे, उन्हीं की मान्यता मानने वाले
थे। उनकी दुकान
पर गया, ... वे चौंके, ... उन्होंने तुरन्त खाने
का इंतजाम किया।रात को जब चर्चा
हुई, तो मैंने
रामस्नेही महाराज के गुरुकुल आने की सूचना उन्हें दी।
... उन्होंने सारी बात पूछी।सुबह
उन्होंने तुरंत चार सौ रुपये निकाले मुझे दिए।
मैंने कहा,,’’ यह मेरे लिए किस कामके,...
उन्होंने पूछा, रसाई में क्या बनेगा।
मैंने कहा था, यही पूरी, सेव, वगैरहा
‘‘वो बोले नहीं,,दाल बाटी बाफले चूरमा बनावें। जो भी खर्चा होगा हम बाद में आकर देख लेंगे।, .. हम उस दिन आ जाएंगे, आज फिक्र
न करें, सब व्यवस्था हो जाएगी।
पर हुआ क्या, जिस दिन कार्यक्रम था, ... उस दिन पाटन वालों
ने उन्हें रोक लिया, ... मुझे फिर दिक्कतआई, उन्हे कैसे
खबर भेजूॅं, सोचा, जो होना
है, होगा, प्रकृति अपना कार्य करती
है।
यहां मैंने हलवाई लगा दिए थे, ... उनको
अगले दिन का बता दिया था।,
पर उनके पास कार थी, ... वो तो आ गए, बकानी में रुके,उन्होंने वहां पता लगा कि पाटन में ही रुकना हो गया है।
वो गुरुकुल आए और यहां से मुझे
भी साथ लेकर
पाटन ले गए। वहां उन्होंने महाराज के लिए शाल,
तथा संतों के लिए चादरें लीं,
... सबको भेंट दी,
... बोले स्वामीजी ऐसा कभी मौका पड़े हमें मत भूलना।“
अगले दिन सब लोग आए, बढ़िया भोजन
हुआ, यहां से भी महाराज को शाल अन्य भक्तों को चद्दरे, तथा रूपये भेंट दिए गए।
बहुत पहले की बात है, ...उन्होंने पांच हजार
रुपये
तब खर्च कर दिए..थे।.
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः
पर्यु पासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योग क्षेमं वहाम्यहम्।। 9(22)
‘‘जो मेरा अनन्य चिन्तन करते
हैं, बिना किसी
रूकावट के जो मेरा चिन्तन करता
है,, पर्युपासते--- उसके द्वारा मेरी भक्ति करता
है, उपासना करता
है, तेषांनित्याभियुक्तानांम्, भगवान ने कहा है, मेरे
ऐसे जो भी भक्त होते हैं,
उनका योग और क्षेम,योग माने
जोड़ना, उनकी इच्छा
को भौतिक चीजों
में जोड़ना, क्षेम
पूरा निभाना, यह कार्य में करता
हूँ।’’
मेरे लिए
जो परिस्थिति पैदा हुई, उस समय के अनुसार मैं तो अक्षम था।
, मुझे पांच आदमी
के भोजन के लिए भी कर्जा
करना पडत़ा। पर प्रकृति ने वह प्रसंग ही नहीं
आने दिया। इतना
पैसा खर्च करना,
मेरे बस की बात नहीं थी। सब खर्चा, परन्तु मेरी बात न बिगड़े, इसके लिए प्रकृति ने यह पूरा प्रबन्ध कर दिया।
वह एक जीवन का अनुभव था, आत्मविश्वास बढ़ गया। पर मैं विचलित नहीं होता था। समस्या आई, आते ही सोचता जरूर
था। रात की नींद खराब नहीं
की, सोचा, और छोड़ लिया।
आप लोग सबक ले लें।, इसीलिए बताया
है।
आप जब यह सोचते
हैं, मैं कर रहा हूं, यह आपका अहंकार है। प्रकृति सर्व शक्तिमान है।
और अर्जुन को युद्ध
का जो उपदेश
दिया है, भले ही वह कहानी
हो उसके पीछे
सिंद्धान्त यह है कि इसीलिए हमें
अगर कुछ भी कहीं भी विश्वास रखना हो तो दृढ़ विश्वास रखना
है, और कार्य
के प्रति ऐसी लगन होनी चाहिए।“अनंतयात्रा’ में वर्णना है, ... विराट का उल्लेख हुआ है। विराट का अनुभव
होता है। गीता
में भी आया है। वह मात्र
अनुभव है। स्थिरता और गति का जो विरोधाभास है, वह मात्र शाब्दिक रह जाता है। वह है सदा है, जो इन्द्रियों से परे है, मन से पीछे, वहां मात्र
कल्पना से चित्रित किया जा सकता
है। पदार्थ का सूक्ष्मतम कण जो होता है, वहां
भी वैज्ञानिक रहते हैं, वह कण भी है, तरंग
ही।
मैंने पहले भी कहा था, तरंगों के बारे में, ... लहरें
टकराती हैं।, , वे विकार साथ लाती
है, नाभि से टकराते ही, जहां
संस्कार रहता है, मन मस्तिष्क से उसे जोड़ देता
है। हमें इन लहरों के वेग को बर्दाश्त करना है। जैसे टी.वी. पर लहरंे
टकराकर चित्र व भाषा दोनों देती
हैं ,वही हमारी
दशा है, हम भी वैसे ही प्रभावित होते हैं।
”तो फिर जब जहां शरीर का प्रयोजन नहीं रहा है। ध्यान और मन वहॉं कुछ नहीं रहता। अनुभव
भी मानसिक होते
हैं।वहॉं मन होता
तो है। पर निष्क्रिय।जब जरुरत हुई वह आता है ,बात गई वह वापिस अपनी जगह पर चला जाता
है।एक अवेयरनेस रहती है। जब बाहर
आना हुआ कांशियसनेस हो जाती है। सब ऑटोमेटिक होता रहता है। यहॉं
प्रयास कुछ भी नहीं होता। जब कोई सामने आता है ,कुछ बोलता
है,फिर दुबारा कुछ कहता है ,तब सम्बन्ध अपने
आप जुड़ जाता
है।तब ऑंखें उसे पहचान लेती हैं
,कान सुन लेते
हैं। कुछ कहना
है तो अंदर
से प्रेरणा होती
है। नहीं तो सीरियल की तरह चित्र आते रहते
हैं जाते रहते
हैं।“ ऊपर विश्वास भी नहीं है, न ही वह कुछ करना चाहता
है, वह चाहता
है, उसे आशीर्वाद मिल जाए, और वह जागृत हो जाए, उसकी मनोकामना पूरी हो जाए,
.. लाभ और लोभ दोनों प्राप्त हो।“
”पूरे देश में एक करोड़ से ऊपर लोग होंगे,
जो आध्यात्म की दुकानें खोलकर बैठे
हैं। किताबों में कहानियां है, वो सुना देते हैं,
... सुना रहे हैं,
संगीत से सुनाते हैं, मनोरंजन हो रहा है। साधना
मनोरंजन नहीं है। वह पहले कहानी
उस पंडित की भी सुनाई थी ने, जो भागवत
बांचते थे, राजा
को सुनाने गए थे। राजा ने कहा पंडित जी फिर आना अभी आप में कुछ कमी है।उन्हें बुरा लगा, घर गए,दुबारा कठोर अभ्यास किया।, .. फिर दुबारा गए, राजा ने फिर वही कहा,
अंत मंे पंडित
जी घर छोड़कर
जंगल में चले गए। वहां जाकर
तैयारी करेंगे। फिर आकर राजा को सुनाएंगे। परन्तु वे आए ही नहीं,
फिर राजा उनकी
खोज में गया।
पंडित जी मिले,
राजा ने कहा-
वह कथा सुनने
आया है। तब पंडित जी हंसे,
बोले राजा अब कथा ही नहीं
रही, न सुनने
वाला रहा, न सुनाने वाला ाहा।
सार, अंतर्मुखता की प्राप्ति का होना है। वह होती है, निरंतरता वर्तमान में रहने
से। पर यही नहीं होता। आज सभी बाहिर्मुखी हैं। जो खुद कह रहे हैं, वह उनके आचरण में नहीं है। उनका
उस पर ही विश्वास नहीं है। अर्थ है, तो पालन करो, ... आचरण
में लाओ, ... फिर तुम्हे कहीं भागने
की जरूरत नहीं
होगी। ‘सियाराम मय सब जग जानी,
करहुं प्रणाम जोरी
जुग पानी,’ सब जगह वही है, तब मात्र सेवा
ही शेष रह जाती है। अपने
पॉंव छुआने का,,
रोली लगाने का, मालाएं पहनने का,,
ये जो स्वांग भरा जाता है, इसकी भी जरूरत
नहीं रहती।“
हम बाहर बैठे थे, पांव में जो घाव था उसकी
ड्रेसिंग हो चुकी
थी, ... बाहर हल्की धूप थी।स्वामीजी कह रहे थे,”जब नमक का पुतला
सागर की गहराई
नापने गया, तो खुद ही गलकर
एकाकार हो गया,...
वहां जाकर, कौन आया है, बताने, वहां
क्या शेष बचता
है,
पर इस अवस्था में जब देहांत होता
है, तब?प्रश्न था?
”जो सबका होता
है, वही होगा,
मिट्टी मिट्टी में मिल जाएगी, बस एक बूंद समुद्र में मिल गई, तब क्या होगा,
वह रही है कहां है, जो बताएगी, ।“...
”हाँ,, जब संस्कार ही नहीं बचा है, ... तब सब खाली हो गया तब..तो यह संभव है,.पर साधारण पुरुष का क्या अंत होगा?
प्रश्न था।..
”साधारण, असाधारण क्या,
... जो पैदा होता
है, ... वह मरता है, ... शरीर पंच महाभूतों से बना है, वह उनमें
मिल जाता है। संस्कार जो है, वह शेष रहता
है, गुण संस्कार में है, ... मन तो गति है। वही सूक्ष्म शरीर
है, ..वह तो रहेगा, ... अनुकूल वातावरण मिलने
पर जैसे बरसात
में न जाने
कितने कीट पतंगे,
वनस्पतियां उत्पन्न हो जाती है,... वह जन्म ले लेता
है, ... न भी ले,... जैसा उसका संस्कार है, ... मनुष्य जीवन का उद्देश्य, अंतर्मुखता प्राप्त होने
पर ही उसे पता लगता
है, ... बहिर्मुखी तो भटकता
रहता है। यही माया है।
हां, सब यहीं है, कुछ भी खाली
नहीं है। एक आलपिन की नौक पर सैकड़ों संस्कार रह सकते हैं।
मात्र बबूला,,... एक हवा, ... शरीर तो है नहीं, वह तो संस्कार को आकर मिलता है।
क्रिया के लिए इन्द्रियां चाहिए, ... बिना इन्द्रियों के सब व्यर्थ है। मनुष्य जीवन भी इसीलिए सर्वश्रेष्ठ कहा है। पशुओं के पास मस्तिष्क नहीं है। सोच-समझ नहीं है। प्रयास वे नहीं कर सकते। और जो मूक शरीर है, उसे भी गति के लिए, विकास
के लिए शक्ति
चाहिए, जो उसके
पास नहीं है।
बहस में पड़ना बेकार
है।“
तुम्हारा रास्ता ठीक है, या गलत है, इस सोच में पड़ना बेकार है।
जो रास्ता तुम्हे मिला
है। उस पर चलो,
मैंने कोई रास्ता नहीं
बताया, ... तुम चलोगे, और लगन सच्ची
है, तो तुम अंतर्मुखी हो जाओगे,
... यह सच है।
यहीं आकर सारे रास्ते अपनी पहचान खो देते हैं।
अतः इस भूल भुलैया में पड़ना बेकार
है,
इसीलिए मैंने कभी रास्तों की चर्चा ही नहीं की।
एक ही बात बताई,
सुबह बिस्तर से उठने
से पहले और रात को सोते
समय, ... थोड़ा अभ्यास नियमित करो और अभ्यास भी क्या,
... अपने विचारों को कम करने का प्रयास करो, ... रास्ता मात्र अवलोकन का है, ... इसमें धीरे-धीरे विचार और विचार के बीच में जो अन्तर
है, वह अनुभव
होगा। धीरे धीरे
बढ़ता जाएगा, ... उस अवस्था में नींद
भी आ जाए तो अच्छा है, हो सकता
है, शुरू में सपने बढ़ जाएॅं,
... पर घबराओ मत,
... यहीं अंतर्मुखता की चाबी है।“
”साधना जीवन और जगत को काटकर
नहीं हो सकती।
मैंने कभी भी अलग से बैठकर,
आँख भींचने को नहीं कहा। ये जो ध्यान सिखाते हैं, समाज और जीवन से काटकर
बात करते हैं।
सभी दिशाएं अच्छी
हैं, सारे कमरे
अच्छेे हैं, जीवन
और जगत में जो तनाव रहित,
शांत मन से जो भी क्रिया हो अधिक से अधिक मन को वहीं रखने का प्रयास करना चाहिए,
यही सुमिरन है। पर क्या कर रहे हैं, घर से भाग रहे हैं, कहीं अलग जगह ले जाते
हैं, कहते हैं यहां साधना शिविर
है। एक उलझन
पैदा करते हैं।
हर व्यक्ति हर परिवार उलझता जाता
है। जितने आदर्श
घड़ोगेे उतना ही पाखंड बनेगा। व्यक्ति का आत्मविश्वास टूट जाता है।“
”पुराना, ... जब प्रकृति ने ही नहीं रखा...
तुम क्यों पीछे पड़ते
हो।
यहां सब बदलता है। नित नई विचारधारा आती है। नहीं
हो तो प्रकृति अपना कार्य करना
बंद कर दे। यहां जो आज है, कल नहीं
रहेगा, जो कल था वह आज कहां है?
इसीलिए किसी एक बात पर चिपककर बैठ जाना उचित नहीं
है।
पुराने तरीके आज काम नहीं आ सकते।
हम जो पुराने ग्रन्थों को, लीक पकड़कर परिपाटी की तरह पढते चले आ रहे हैं,
वहां सवाल करना
चाहिए, इससे कुछ फायदा भी हो रहा है, क्या..?
जो छूटता है, छूट जाने दो, ...
जो तुम्हारा अनुभव बनेगा,
वह सच्चा होगा,
वह तुम्हारा है। सनातन धर्म का मतलब होता है, जो सदा है,
... कल भी था, आज भी है, कल भी रहेगा,
इसीलिए रास्ते को लेकर चलना उस पर बहस करना
अब बेकार है। बाहर तो मात्र
बहिर्मुखता है, ...उसके
बाहर आना है। फिर जो है, सदा से है,उसकी अनभूति होने
लगेगी, ... वहीं शांति है,, वहीं शक्ति भी है। समय के साथ भाषा
बदल जाती है, कहने का तरीका
बदल जाता है ।पर जोे कहा जाता है, ... जो शब्दों से भी परे हैं, वह महत्वपूर्ण है।
गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के जो लक्षण है, वे अंतर्मुखी व्यक्ति के है।, ... वहां पर सब रास्ते आकर मिल जाते हैं,
... वह सदा से है,। वह अनभूति है, व्याख्या नहीं है।शब्द बताते हैं कि ऐसा हो सकता
है।“
”धर्म की चर्चा
मैंने भी की है, क्योंकि वह तो रास्ता है, अध्यात्म उससे परे है, वह छत पर आने की सूचना है। वहां
आकर फिर बाहर
और भीतर आने की स्वतंत्रता रहती है। मैं तो जो भी आता है सवाल पूछता
है, उससे यही कहता हूं, तुम जो कर रहे हो उस पर विश्वास लाओ, करो,,
सोचो मत, चलो,
उसे व्यवहार में लाओ गलत होगा,
अपने आप छूट जाएगा, प्रकृति अपने
आप में सही बड़ी मार्गदर्शक है। अंतप्रेरणा अपने आप बता देती है। क्या सही है?, क्या गलत है? गलत छूट जाएगा। पर चलो तो सही। तुम्हारा धर्म, तुम्हारी मान्यताएॅं , सही हैं या गलत यह चर्चा का विषय नहीं है। मैं किसी की मान्यता को बदलने के पक्ष
में नहीं हूं।
बलपूर्वक या अन्य
किसी प्रकार से यह कार्य नहीं
करना चाहिए।“
”अन्तर्मुखी अवस्था में संस्कार खुलना शुरू
होता है।
यही वास्तविक साधना है, पात्र का ढक्कन
सा खुल जाता
है, एक प्रवाह है, उसके खुलते
ही, जहां पर यात्रा बंद की थी, वह मुकाम
आ जाता है। जो जाना गया है, वह सब भीतर
है, बस वहां
पत्थर रखा हुआ ह।, ... वर्तमान में रहने
से क्या होता
है, बाहर का भटकाव बंद होते ही मन अंतर्मुखी होने लगता
है।
पहले बताया था न, अंतर्मन, मन का ही हिस्सा है।,
जो विराट से जुड़ा होता है, विराट अत्यंत शक्तिशाली है, वहॉं संबंध
जुड़ते ही सब प्रकट हो जाता
है, वही ज्ञान
है।
तब वास्तविक यात्रा शुरू
हो जाती हैं,े यही अध्यात्म है। अध्यात्म कोई ओढ़ने की चादर
नहीं हैं, जब ये स्मृतियां खुलती है, एक साथ प्रवाह सा खुल जाता है, साधक
बेचेन हो जाता
है। यहीं तितिक्षा है, वेग को सहन करो, तभी वास्तविक प्रगति होती
है।“
‘
”अनंत यात्रा’ एक उपन्यास ही नहीं है।
पता लगाओ, नीलकंठ कौन है?, उसकी यात्रा, साधक की यात्रा है, इन्हीं सारे
सवालों का जवाब
एक साथ यहां
दिया हैं,
मैंने कुछ भी नहीं
छिपाया है,
यह जो सत्य है, उसकी ही खोज,
नीलकंठ की है,,
तो शिखिघ्वज की भी है। मुझे
किसको बताना था, यह भी साफ ही था
अंत प्रेरणा उठी, और मैंने लिख कर तुम्हे भेज दिया।
जो भी कागज
मिला उस पर लिखकर तुम्हे भेज देता। एक साथ तो लिखा नहीं, पहले वाला
भी मेरे पास नहीं था। तुमने
जोड़कर किताब बना दी। अच्छा हुआ पर देखना, उसमें
जो प्रवाह है,
... एक साथ बैठकर,,
... एक जगह बैठकर
मैंने नहीं लिखा,
... सब स्वाभाविक है।“
”इसीलिए मेरे पास भीड़ नहीं थी।
... जो भाषा बनाता। मुझे किसे समझाना था, ... सामने कोई था नहीं। तुम्हारे आने के बाद तुमने सवाल पूछने
शुरु किए। उसके
पहले साठ साल तक कोई इस संबंध में पूछने
नहीं आया। नहीं
चर्चा की। मैं चुप रहा। गुरुकुल चलता था, ... उसी के संबंध में बात होती थी। कभी कोई कुएं
में पानी आजाएगा, शादी होजाएगी, यह बात पूछता। जब गुरुकुल में शुरू-शुरू में आया था, तब गीता
पर प्रवचन दिया।
मोहन जी भी यहीं गुरुकुल में पढ़ाते थे, ... पर कभी आध्यात्मिक चर्चा उनके साथ नहीं
हुई। श्री राम शर्मा भी आए, सत्यमित्रानंद जी भी आए, ... वे धर्म प्रचारक थे। । आपसे मिलने
के बाद सिलसिला शुरू हुआ। मेरे
सामने, मेरा उद्देश्य था, ... मैंने पाया। आज आप देखते
हैं, मैं घंटों
बैठा रहता हूं,
पता भी नहीं
रहता, क्या समय हुआ है, आप पानी के लिए पूछते हैं, ... तब दुबारा पूछने पर कनेक्शन जुड़ता है,
... हाथ उठता है,
... प्यास भी तभी अनुभव होती है। फिर बताओ, शब्द
और भाषा कहां
से आती। जो सत्य है,... वह जब व्यक्त होगा,
कम से कम शब्दों में ही होगा। जहां वह भी है, मात्र
उसकी वर्णना है, व्याख्या है, वहॉ।
घंटों चर्चा करते
रहो, कोई फर्क
पढ़ने वाला नहीं
है।“
”हां, मेरी कोई इच्छा ही नहीं
थी।
आपको बताया
था बचपन में कि एक बार वो बड़े लेखक
घर आए थे, मैंने उनकी सेवा
की, तब उन्होंने कहा था, कुछ मांगों तब मैंने
कहा था, कि किसी के सामने
हाथ नहीं पसारुॅंे।. वही बात मैंने
इंजीनियर साहब को बताई थी। इसीलिए संन्यास लेकर गुरुकुल खोला था। वही एक मात्र संकल्प था।
”मुझे कहां जाना
है, ... क्या पता...
शरीर जब छूट जाए,
तब गिद्धों के लिए डाल देना, ... शायद उनके काम आ जाए,
प्रकृति में हर वस्तु काम में आनी चाहिए।
‘यह आप क्या
कह रहे हैं?’प्रश्न उठ खड़ा हुआ था।
”क्यों, मिट्टी का क्या, ... मिट्टी तो मिट्टी में मिल जाएगी।
फिर क्या बचेगा, ... बूंद
के समुद्र में मिलने के बाद पूछने वाला भी नहीं मिलता।
अंगुली से छाती पर दिखाते हुए यहां कुछ भी शेष नहीं
रहा। कुछ भीनहीं। सब क्षय हो गया।“ (मुस्कराते हैं)
”जिनके संस्कार शेष रह जाते हैं,
वे लौटते हैं।
आना पड़ता है। नहीं भी आओ, जन्म कोई साधारण चीज नहीं है। संस्कार भटकाते हैं।
यही क्रम है। सिलसिला है, जो जारी है। आज नहीं कल, विज्ञान इधर भी हाथ बढ़ाएगा,
कुछ नहीं बस एक सपना होता है।
सपने में हम उठ जाते हैं, छूते
हैं, यह मेरे
हाथ है, पॉंव
है। वहां कोहनी
है। यह संस्कार भी एक सपना
है।“
”वहां स्वप्न है, बस एक गहरी नींद है। इंद्रिया है, नहीं,
... जो कह सके,
... व्यक्त कर सकें...
स्वप्न हमेशा सच लगते हैं, टूटने
के बाद पता लगता है, यह तो सपना था। वहां मात्र एक स्वप्न रहता है। उतना यथार्थ। स्वप्न में दुख कितना
गहरा लगता है। राजा जनक को स्वप्न आया था, वे स्वप्न में भिखारी है, दाने
-दाने के लिए मोहताज हैं।, उन्होंने जगते ही सवाल
पूछा था,... यह सत्य है या वह सत्य हैै।
तब अष्टावक्रजी ने उत्तर दिया, ... राजन
दोनों ही सत्य
हैं।
इस स्वप्न में भी दुख
होता है, सुख होता है, उतना
ही यथार्थ लगता
है, पर व्यक्त करने के लिए देह नहीं होती।
इस चर्चा में पड़ना
बेकार है, सच यह है कि मनुष्य देह बहुत
ही बहुमूल्य है। यह हमें हमारे
संस्कार को शुद्ध
करने के लिए मिलती है। यह जो संग्रह है जो स्मृतियां है, उन्हें खाली इसके
लिए मिलता है।।
इसको ठीक से समझा नहीं जाता
है। संग्रह कम हो, यही साधना
है। संग्रह जो है, विचारों को पैदा करता है, विचार ही विकार
है। विचार कम होंगे, संग्रह कम होता जाता है।
जो पुराना है वह खत्म हो ,नया संग्रह नहीं बने,
यही वर्त्तमान में रहने की कला है।“
”सभी धर्म आत्मा
की चर्चा करते
हैं। आत्मज्ञान, आत्मानुभव, ... यह क्या है?
शरीर तो दिखाई पड़ता
है, स्थूल है।
मन को देखा है क्या?
शास्त्र कहते हैं, मन विकारी है, सतोगुणी है, रजोगुणी है, तमोगुणी है, ... मन को तो किसी
ने देखा नहीं
है।
उसके क्रियाकलापों को हम जानते हैं, उसको
देखकर ही हम मन की व्याख्या करते हैं।
मन एक गति है।
मात्र गति जो कल्पना करती है, स्मृति रखती है,
और प्राण भी गति है,
शरीर में आते ही गति दो रूपों
में बंट जाती
है। मन चक्राकार गतिे हैं, प्राण
सीधी गति हैं,
यह नाभि से मस्तिष्क तक है, ऊर्ध्वाकार। योग, वास्तविक अर्थ में दोनों
दोनों गतियों का एक हो जाना
है। शक्ति, प्राण
में है, वही सृजन का कार्य
करती है, उसी से पोषण होता
है। विकास उसी से होता है। श्वास प्राण नहीं
है।
सूक्ष्म शरीर में, यह गति संस्कार सहित
रहती है, संस्कार का धरती पर नया जन्म लेना,
और देह का छोड़कर जाना सब उसी पर निर्भर करता है।
तो जब हम मन को ही नहीं
जानते, तब आत्मा
पर चर्चा कैसे
कर सकते हैं।
गीता में बहुत
समझाया है, ... पर वह जो मन से परे है, वहां मात्र अनुभव
तो होगा, वर्णन
नहीं।“
13 साधना सूत्र
समय-समय पर स्वामीजी के साथहुए वार्त्तालाप का संक्षेप यहाँ
प्रस्तुत हैः-
बाहर की सब क्रियाऐं, यथावत चलती रहेंगी,
पर उनके कारण मन अपने स्थान
से नहीं हटेगा
न सुख को सुख
न दुख का दुख
और मन एक रस बना दिया-
कुंती ने भगवान से कहा था-
हमेशा दुख बना रहे तो हममें तुम्हारी स्मृति बनी रहेगी।
क्योंकि दुख में जो गति है वह सुख में नहीं
है।“
मन हमेशा सुख की चाहना करता है।
जैसे सुख में रस बढ़ जाता है
वह सबको भूल जाता
है
अहंकार बढ़ता जाता है
वह महान शक्ति से दूर होता जाता
है।
इसके लिए एकमात्र उपाय
है
वह भीतर से जुड़ा
रहे- एक रस
जो हो रहा है, होता रहे। उससे
विचलित नहीं होता
है।“
.हम उसके लिए जो प्रयास करते
हैं
हमारी विधि ठीक नहीं
है
जड़ों से जुड़ना, मतलब
यह है
मन को स्वाभाविक स्थिति में लाना
वहां विचार नहीं उठता
है, स्वाभाविक स्थिति में,
परन्तु इंद्रियॉं खींचती रहती
है।
यह भटकाव बाहर से अधिक आता है
उस में भी सूक्ष्म से सूक्ष्म विचार
कैसे पैदा होते
हैैंं
क्या होता है।इसका पता आपको तब तक नहीं लगेगा
जब तक आपका मन अंर्तमन के पास नहीं पहुंचेगा।
क्यों
कैसे,कहॉं सेे,यह समझने के लिए मन को थोड़ा नीचे उतारना पड़ेगा
प्रयास करना है,
वही
विचार आते ही हटाते
जाओ
एक समय ऐसा भी आएगा, मन बिल्कुल ही शांत रहेगा
कोई विचार नहीं आएगा
मन उसी स्थिति में लंबे समय तक रहने के बाद,तब मन की आदत बन जाएगी।
मन को स्वयं उससे
हटाना है।
हमारे प्रयास सब उपरी
हैं।“
बच्चे को देखा है,
कहना नहीं मानता है
समझाते हैं,फिर भी कहना नहीं मानता
है
पर जब वह स्वयं
सोचे मुझे करना
है
तब वह जो करता
है,
वह दूसरे के समझाने से नहीं हो सकता है।
तुकाराम का अभंग है
‘‘तेरा, तुम्हारे पास ही है
पर तुम जगह भूल गए हो’।’
जो कुछ हमें करना
है
अंदर से,बाहर से नहीं
वह भक्ति के नाम से आध्यात्म के नाम सेे जो प्रपंच करते हो उनकी कोई आवश्यकता नहीं,
विश्वास तो दृढ़ हुआ नहीं
करते हें क्यों
सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए
यह भगवत प्राप्ति के लिए तो कोई करता
नहीं।
जैसे ‘‘रामकृष्ण’’
ने किया
सब प्रकार के मोह छोड़कर परमात्मा के प्राप्ति के लिए किया।
यहॉं किसी न किसी
इच्छा पूर्ति के लिए करते हैं।
जब तक
भौतिकता की प्राप्ति के लिए उत्सुकता है
तब तक खींचतानी चलती रहेगी।“
्रह्मनिष्ठ गुरु
अंत होने के बाद वापस कुछ नहीं
बचता,संसार का कोई अंत नहीं
है।
शरीर का अंत है,परन्तु शरीर के अंत के बाद क्या होता है,जिस महान शक्ति
के द्वारा हमको
पैदा किया है,जो शक्ति संचालन करती है,वह हट जाती है।
परन्तु महान शक्ति ने पैदा किया है,भले ही यह माया है।
उस महान शक्ति का कोई उद्देश्य है,उद्देश्य की पूर्ति के लिए जब तक जीवित है,तब तक जीवित
है,हमारे सारे
कार्य यथावत चलते
रहने चाहिए।
हमने हमारे मन को धीरे धीरे निरन्तर नीचे लाना शुरू
किया,धीरे धीरे
अंतर्मन तक लाने
की कोशिश की,तब भीतर पता लगता है कि जीवन का क्या
उद्देश्य है?
क्या करना है?है तो
यहाँ सब नाटक
,पर हमारा पार्ट
भी तो है।
हमें अपना पार्ट अदा करना है,पर याद रखना है।
मैं राजा भी हूं,पर यहां राजा
का कार्य क्या
है?नाटक के लिए नाटक का पार्ट
करते हैं तो इसमें आत्मसंतोष होगा।
मन, अंतर्मन में लीन हो जाएगा, यह अंतिम अवस्था है।
पर्दा गिर गया,नाटक
समाप्त हो गया।“
”कुंभ ने नीलकंठ से कहा था
मेेरे जीवन का उद्देश्य तुम्हारा मार्गदर्शन करना है
जो ब्रह्मचारी गुरु हैं
वह भौतिक चक्कर में नहीं पड़ता
वह केवल मार्ग दर्शन
करता
है,
हो सकता है, उसके
बाद मेरा शरीर भी नहीं
रहे।’
वो है
जो अंगुली से इशारा
करदे
वह है
और फिर शिष्य का कर्त्तवय है कि वह आज्ञा
का पालन करते
रहे।
मैंने जो कहा है, लिखा है, वहां
ब्समत कहा है, संदेह की जगह नहीं रखी ह।ै
सुनने वाले भूल जाते
हैं। शंका करते
हैं।
मेरे मन में कोई विचार नहीं
है।
प्रश्न पूछा है, उसके
पहले उत्तर आ जाता है
कोई दुविधा नहीं है।“
”मन का ( भ्रकुटि में है
शेष नीचे
है
जो मन यहां है, उसका केवल कार्य
भौतिक सृष्टि में अपना कार्य करना
है।
इस मन के साथ विकार हैं।
विकार इसे प्रभावित करते हैं,
इसको यदि इसके साथ जोड़ दिया जाए
तो विकार
प्रभावित नहीं करते।
प्रकृति की इच्छानुसार कार्य अपने आप चलता
है।
इसीलिए इसको
नीचे लाना है।
और कोई उपाय नहीं है
इसका कार्य मात्र ंबजपदह है
ंबजपदह कर रहे हैं।
जो पार्ट दिया हैै,
वह कर रहे हैं,
तब न सुख होता
है न दुख
जब तक मन यहां
ऊपर रहेगा
सुख भी होगा, दुख भी होगा
नीचे आकर
अखंड शांति है,
जो होना है, हो रहा है।“
14 लगन
स्वामीजी ने ”लगन“ की महत्ता बताते हुए कहा थाः-
”कृष्ण, बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, बड़े लोग हैं, युग पुरुष
हैं, उन्होंने अपनी अपनी तरह से सत्य को जाना,
उस अनुभव को अपने समय की भाषा में कहा,
अपने तरीके से कहा, इसीलिए अंतर
होगा। सत्य तो एक है पर उसको कहने का ढंग अलग ही होगा, बाद में जानने वाले उस एक तरीके को ही सत्य
मानते हैं, ... यही विवाद का विषय
बन जाता है और किसे समझाओ,
अहंकार में डूबते
है, लड़ते हैं,
। बहुत खून खराबा हुआ है। हमारा रास्ता ठीक है, आपका गलत है। नहीं मानेंगे, इतिहास इन समस्याओं से भरा हुआ है।
कृष्ण कहीं नहीं गए, उनकी साधना कहीं
दिखाई नहीं पड़ती।
वो जहां है वहीं सिद्ध हैं, ... गीता का दूसरा अध्याय तथा कुछ श्लोक जो इधर उधर हैं,
तुम्हें बताए है, वे ही सार है, बाकी सब तो बाद का जोड़ लगता गया है, ... ।
पर उनको भी उस काल में कितनेे लोग समझ पाए,
अर्जुन, भीष्म, विदुर,
उनके भई बलराम
भी नहीं, क्यों, जहां शक्ति
का प्राकट्य होता हैै, वहां प्रकृति सबसे पहले अवरोध
खड़े कर देती
है,। वह रास्ता छिप जाता
है। कृष्ण का अनुभव, उनका ज्ञान,हमारे सामने है, हजारों साल होगए,
हमने उन्हें पूर्णावतार कहा है। राम को तो भी मर्यादा निभानी थी, पर उन्हें नहीं।
जब जो उचित
लगा कर दिया
या हो गया,
वे उसके पार हैं।
वे मात्र वर्तमान है, उन्हें कोई नहीं बांध पाया,
वे मुक्त हैं,
वे जहां है वहीं से अपनी
बात कहने में समर्थ हैं, चाहे
युद्ध का मैदान
हो!, या वृन्दावन में महारास होे,।महावीर को सारी परंपरा से गुजरना पड़ा,। लोग साधना
को तभी समझ पाने में सफल थे, जब वे किसी को सभी साधनाएं करते हुए देखें। महावीर पूरे
रास्ते से चले।
बुद्ध ने उपनिषद का रास्ता पकड़ा,
उनकी पद्दति उपनिषद से प्रभावित रही।
मुहम्मद के सामने
अपना समाज था, यहां की तरह वहां का समाज
इतना विकसित भी नहीं था, इतनी
बड़ी कोई परंपरा भीनहीं थी। सामाजिक रूढ़ियां बहुत थीं,
वहां जो रास्ता बना, वह अलग ढंग का था, यही हाल ईसाई
धर्म का रहा,
वहां भी बहुत
बड़े-बड़े संत हुए हैं।
प्रकृति कभी किसी को पूर्ण नहीं बनाती,
कुछ न कुछ अधूरापन रह जाता
है, ... इसलिए हर महपुरुष अपने मार्ग
चलता हुआ मंजिल
की तरफ इशारा
तो करता हैै,
पहुंचा भी देता
है। पर यहां
सब तेजी से बदल रहा है, जो आज है सत्य है, वह कल गलत मालूम
पड़ता है। धारणाएं तेजी से बदल रही हैं।
बहुत बड़ा वैचारिक परिवर्तन हो रहा है। हम पीछे मुड़कर
कब तक चलेंगे, चलना आगे ही है।
सबने अपनी अपनी तरफ से आदमी की बेहतरी के लिए प्रयास किया हैं।
रास्ता बताया, इशारा
दिया, कितना हम समझ पाए, कितना
हम चले यह अलग बात है। और तो और जो लिखा गया है,ै, वह तो बहुत बाद का है, सैकड़ों साल बाद का है, ... हमने जो अपनी बुद्धि से सोचा वह भी जुड़ गया है, यह याद रखना होगा।
इसीलिए किसी दूसरे के रास्ते की बुराई
करना, चर्चा करना
उचित नहीं है। उसे आप चलने
दीजिए, यहां मैंने
कोई एक रास्ता नहीं बताया, ... यह नहीं कहा, यह गलत है। अनंतयात्रा में चूड़ाला यही कती है कि कर्मकांड प्रधान साधनाएं
मौलिक परिवर्तन नहीं कर सकती हैं।
उनकी व्यर्थता का बोध तभी होता
है, ... जब वो करली जाती हैं।
तभी अंतर्मुखता प्राप्त होती
है।
यहां जो करना होता
है, मन के द्वारा होता है, मन से ही है।वहां शारीरिक प्रयोगों की जरूरत भी होती है। पर साधकों पहले यहीं
से ही आना होता है। फिर जितना उसका विकास
होता जाता है, वह उतना विवेक
का आदर कर,
... बुद्धि चातुर्य से बचता जाता है।
... यह अवस्था सभी ने बतायी है,
... फिर हम कैसे
कह सकते हैं कि यही मौलिक
है। यही एक मात्र पथ है। पहाड़ तक आने के लिए अनेक रास्ते हो सकते हैं, पर चढ़ाई के समय एक ही पगडंडी रह जाती है,...
और चोटी तो एक ही है। अंत का अनुभव
जिसको भी हुआ,
... वह उनका सत्य
था, और उन्होंने उस समय की भाषा में, उस उसय की समझ में कहा, अंतर
तो होगा ही। तुम, अंतर में क्यों पड़ते हो, व्यर्थ समय गंवाना है। जहां से भी हो, शुरू
करो और चलो,
लगन ही यहां
साधना है।
15 यात्रा 2
प्रश्नः- क्या जीव की यात्रा अनवरत हैः-
स्मृतियां ही यात्रा कराती
हैं। वे ही गर्भ
की तलाश करती
हैं, ... फिर वहां जन्म हो जाता
है,
ज्ञानी का भी अगर कुछ शेष रह जाता है,
... उसे भी आना पड़ जाता है। पर यहां बीवपबम रह जाती है,
... वह चाहे तो आए, ... अन्यथा नहीं। जहां
कामना है, वहां
बंधन रह जाता
है। कामना की डोर खींचती है वह खिंचता चला आता है। ये जन्म मजूबूरियों से होते हैं, आना ही होगा, ... ज्ञानी अपनी इच्छा से या प्रकृति की इच्छा से आता है, कुछ कार्य
होगा जो पूरा
करना होगा।
मुझे बचपन से ही मन की स्थिरता का पता लग गया था। कई बार बहुत देर तक मन, ... ठहर जाता था, ... अन्तर्मुखी अवस्था हो जाती
थी, पर इस बारे में पता नहीं था। फिर इंजीनियर साबह से मिलना हुआ, उन्होंने समझाया, ... परंपरागत साधनाए की थीं, ... पर यही सब पता लगता
गया
कि यही मंजिल
नहीं है।,...
यह चक्र है, चलता
रहता है, जब शरीर छूटता है,
... मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है, संस्कार भटकता है,
... वहां इन्द्रिय तो है नहीं, ... अनुभव
क्या होगा, ... एक भटकाव है।
पहले बताया था न,
... कुटिया में रात को, ... एक बीम सी गुजर जाती
थी, आत्माएं झुंड
में रहती है, जो ज्यादा शक्तिशाली होती है, वह चमकती है, तेज,
र्स्फुलिंग की तरह,
उसके पास एक घेरा बन जाता
है। हां, गलत भी होती है, उन्हें अपने कर्म
भोगने होते हैं,
वहां समय नहीं
है, ... समय तो शरीर को अनुभव
होता है, स्वप्न में समय कहां
चला जाता है, वहां स्थान भी नहीं होता है। योगवशिष्ठ में कहानियां आती है, पढ़ी होगी, यहां मात्र
स्वप्न होता है, वहां एक युग बीत जाता है।
वहां शक्ति नहीं होती
है, अनुभव वहां
भी है, सूक्ष्म देह रहती है,
... ज्ञानी को जन्म
की स्वतंत्रता है, और मृत्यु की भी, ... वह इच्छा मृत्यु प्राप्त कर लेता है, भीष्म
पितामह की कहानी
सुनी होगी।
जो ज्ञानी है, वहां
संबंध वासना का नहीं रहता, कामना
का नहीं रहता,
मात्र करुणा का रहता है, गृहस्थ के लिए कर्तव्य पालन, तुम्हें बस दे देना है, लेना
नहीं है,
जो लेता है, वह याचक है, याचक
का हर काम अहंकार में होता
है, जहां गृहस्थ हो या संन्यासी, ... मैंने कहा था न, जब संन्यास लिया
तब पहला संकल्प यही लिया था,
... भिक्षा नहीं लूंगा,
जब हरिद्वार में गुरुजी ने भेजा
तो मैंने मना कर दिया, ... भिक्षा नहीं, यही कारण
था जब बकानी
आया, ... तो छात्रों को पढ़ाना शुरू कर दिया, ... गुरुकुल चलाया, काम किया, अठारह- अठररह
घंटे
मैंने काम किया,
... कोई सन्यासी काम नहीं करता, ... पर क्यों ,संकल्प था भीख नहीं लेनी।
पहले के ऋषि भिक्षा को जाते थे, तो
कुछ देकर आते थे, ... वे वचन शास्त्र बन गए, उनके पास करुणा थी।
कई बार ऐसा होता
है, शक्ति आई, ज्ञान आया पर उसका उपयोग नहीं
हो पाता है, आयु या तो क्षीण हो जाती
है या वृद्धावथा आ जाती है,
... प्रकृति का अपना
नियम है...
तब भांडा फूटने के बाद भी, संकल्प शेष रह जाता
है, तो आना पड़ता है यही गुरु-भेद है, गुरु बनते नहीं
है, चार किताब
पढ़कर गुरु नहीं
बना जाता, .. ब्रह्मनिष्ठ गुरु की जो परंपरा है, वह सदा से चली आई है।
यहां गुरु की पढ़ाई
नहीं होती, ... वह तो स्वतः आता है, पूर्व का ज्ञान, ... उसकी संपदा का जब शिष्यों का मार्गदर्शन करना चाहती है, तो उसे आना पड़ता
है, यहां शिष्य
गुरु को तलाश
नहीं करते, गुरु
स्वयं शिष्य को ढूंढ़ता है, ... जो कार्य अधूरा रह गया था उसे पूरा करना होता
है।
हाँ,
तब साधना के दिन थे,... गुरुकुल सरकार को सौंप दिया था, जो प्रयोग करने
थे, उसका समय आ गया था,
...
यहां बस एकांत था,
... लाईट भी नहीं
थी लालटेन थी। लाइट तो आपके
आने के बाद आई।
हां, तब एक सांप
भी यहां आया करता था
‘‘हां, दरवाजे पर बैठा रहता था।’’
(स्वामी जी हंसे)
...तभी प्रयोग हुए थे, ... खुशबू जो आपने पूछी थी,,
अगरबत्ती मैंने तो कभी प्रयोग में नहीं लाई, जब लोग आते थे, यही कहते थे। अगरबत्तियां महक रही है।
मैं कहता, जाओ देखो
कौन लगा गया हे, वो कहते
हैं यहां अगरबत्तियां तो है नहीं,...
मैं क्या कहता...
जब परकाया प्रवेश का प्रयोग किया था, उसके बारे में अनंतयात्रा में लिखा
है, खतरनाक होता
है। ये सूक्ष्म शरीर के प्रयोग हैं,ै, ये भी तभी किए थे।
मन की प्राण की युति ही योग है। मन में स्मृति है, पर शक्ति प्राण में है। बिना प्राण
की शक्ति के मन काम नहीं
कर सकता है। पर इसके पूर्व,
निरंतर निर्विकारता में रहने का अभ्यास होना चाहिए। यह अवस्था जब निरंतर होने लगती है तब बाह्य स्मृतियों का दबाब भी हटने लग जाता
है।
तब जन्म और मृत्यु का रहस्य खुलता
है।
महाभारत,... मैंने महाभारत के दृश्य यहां मैदान
में देखे थे।,
... विजन आते थे,
... न जाने कहां-
कहा,ॅं हजारों साल की यात्रा यह मन कर लेता है, सब खुलता है, तब निर्विचरता में प्रवेश होता है।
जो है, जो था, सब का खुल जाना है,। चित्त की शुद्धि का यही रहस्य है। चित्त,
संस्कारों के साथ ही तो आता जाता है। एक आलपिन की नोक पर हजारों आत्माएं रह सकती है। मन सहित आत्मा
ही जीवात्मा है। यही आवागमन कारण
है। यही बंधन
है। यहीं मुक्ति का रहस्य है।
15 धर्म
हमारा धर्म क्या है? इसके क्या नाम दें?
इसे सनातन धर्म ही कहेंगे। जो शब्द
‘‘हिन्दू धम’र्’ प्रयोग में आया है, वह तो बाद का है। पहले जो हजारों साल से शब्द
प्रयोग में आता था, ... वह धर्म ही है। सनातन
इसीलिए कि यह ‘सदा’ से है,
... जो सदा से चला आया है। बाद के लोग आए, ... उन्होंने अपनी अपनी
साधना की... और पाया... अनुभव बताए... भाषा की भी सीमा
होती है, ... जहां
तक मन है,
... वहां तक भाषा
है, पर जो मन से परे हैं वहां भाषा
ही नहीं है,
.... उसकी वर्णन कैसे
करोगे। इसीलिए उन्होंने जो कहा, ... वह बहुत बाद में मानने वालों ने लिखा, ... जब लिखा तो ग्रन्थ तैयार
होने लगे, ... फिर अपने आपको अपनी
परंपरा को पुरानी बनाने की, बताने
की होड़ लग गई। जैन कहते
हैं, हम तो वेदों से भी पुराने हैं।
जो पुराना है, ... वहां
एक परंपरा है,...
जहां परंपरा होगी,
... वहां समय तो कभी एक सा रहा ही नहीं।
सदा बदलता रहा है। यहां हर चीज बदल रही है, तब स्थिरता कहां से होगी।
जब एक पत्ती
दूसरी पत्ती से पृथक है, जब हर इंसान दूसरे
इंसान से अलग है, वहां एक जैसा कभी नहीं
रह सकता है। इसीलिए हर मान्यता में परिवर्तन होगा। यह सोचना कि सब एक जैसे
हो जायेंगे, सब हर बात मानेंगे, सब एक जैसा
व्यवहार करेंगे, यह सोचना ही गलत है।
इसीलिए हर समय में ऋषि मुनियों ने अपने अनुभवों से जो रास्ता बताया
है, वह सही है। उस जमाने
के लोगों ने उसका पालन किया,
... साधना चर्चा का नियम नहीं होता
है। शास्त्र भी तो कहता है, चलते रहो। चलो तो सही। यहां
बस लगन ही महत्वपूर्ण है। चलते
चलते एक दिन मुकाम आता है कि, आगे रास्ता नहीं है। तब जो व्यर्थ का होता है छूटने
लग जाता है। कहा है न मििवतजे ंतम तमुनपतमक जव ादवू
मििवतजे ंतम दवज तमुनपतमकए प्रयास की यही स्थिति है। पर प्रयास शुरू
में ही छोड़ देना गलत है। कृष्ण मूर्ति जी जो सब परंपराओं का निषेध कर देते हैं,... उससे
साधकों को नुकसान ही पहुंचा है। उनके साधक अहंकारी और होगए।
उनका जो अनुभव है, वह साधारण जन के लिए नहीं
है। उसे तो कुछ करना है। जो प्राथमिक शाला का छात्र है, उसे तो बारहखड़ी पढ़ानी होगी। जब वह स्नातक हो जाता है, तब भी बारहखड़ी लेकर
पढ़े तो उसे लोग मूर्ख ही कहते हैं।
यहां लगन महत्वपूर्ण होती है।
अनंतयात्रा में बताया है। चूड़ाला शिखिध्वजको जब वह कठोर साधनाओं के बाद भी शांति न पाकर,
... हताशा में टूटता
हुआ आत्महत्या का संकल्प करता है तब चूड़ाला उसे समझाती है कि उसका यह संकल्प गलत है। साधना
में उसकी लगन महत्वपूर्ण रही है। वह उसे गुरू
रूप में उपस्थित होकर आगे की साधनाएं करवाती है।
यही प्रकृति का नियम
है, चलते रहो,
चलते रहो, जब ठहरोगे, प्रकृति आगे का मार्ग अपने
आप बता देगी।
यहां गुरु ढूंढे
नहीं जाते, गुरु
स्वतः प्राप्त होते
हैं। तुम्हारा काम जो भी पथ मिला है, उस पर पूरी निष्ठा से चलो। इसीलिए जब कोई आता है, साधना पूछता
है, मैं उससे
यही कहता हूं,
तुम्हें कुछ ढूंढने की जरूरत नहीं
है। जो भी कर रहे हो पूरी निष्ठा से करते रहो, जिसे
हटना है, अपने
आप हट जाएगा।
‘स्वधर्म का पालन
ही श्रेष्ठ है ,
हम एक निश्चित परिवार में पैदा
होते हैं, जो हमें जन्म से मिला है, वह हमारे संस्कारों की पूर्ति से है। हम चित्त में जो संस्कार लेकर
जाते हैं, उसी अनुरूप जन्म पाते
हैं। वही हमें
धर्म मिलता है, मान्यताऐं मिलती है। उसका पालन होना
चाहिए। मुसलमान को कहो, तुम्हारा धर्म गलत है, हमारा
ठीक है। ईसाई
कहे हिन्दू से कि तुम गलत हो, हमारा
ठीक है, यह कहां की बात हुई। कन्वर्जन शब्द ‘‘बाइबिल’’ में मान्यता परिवर्तन का नहीं है। यहां बाह्य से भटकाव बन्द कर, भीतर आने का है। बहिर्मुखता समाप्त कर, अंतर्मुखी होने से है। पर ईसाई धर्म परिवर्तन की बात करते
हैं। वे अपनी
जनसंख्या बढ़ाने में धर्म देखते हैं।
यह गलत है।
हर धर्म में बहिर्मुखता से अंतर्मुखता पर आने का तरीका
है। उसे ही साधना कहते हैं।
जो भी एक राह उसे मिली
है, उसने परखी
है, उसे उस पर चलना चाहिए। किसी दूसरे की मान्यता के खंडन-मंडन का प्रयास नहीं करना चाहिए। यह गलत है।
यहां जो भी आता है, ... उसे उसकी मान्यता में ही दृढ़ करने का उद्देश्य रहता है, वह आगे बढ़े,
सुख-शांति पाए।
कर्मकांड हर समाज
के हर संप्रदाय के अलग होते
हैं। ये मन को एकाग्र करने
की तरीके हैं,
बस इससे अधिक
कुछ भी नहीं।
इन्हें ज्यादा गंभीरता से भी नहीं
लेना चािहए।
धर्म, जब भी एक समय में किसी
महापुरुष के आचरण
में उतरा है,...
उनका अनुभव नया होता है। तब उनकी भाषा भी नयी होती है,
... जब पेड़ पर फूल लगते हैं,
... पत्ते आते हैं,
तब वे नए ही तो होते
हैं,... हम कहते हैं, नए पत्ते
आए हैं, कौपल
फूटी है, वृक्ष
तो पुराना था।
सत्य भी जब कहीं
पैदा होता है, तब वह नया सा लगता है, पर ऐसा नहीं
है, कि वह पहले था ही नहीं। इसके पहले
सब व्यर्थ था, सब खंडन-मंडन
योग्य है। मानने
वाले बाद में आते हैं, वे विचार ग्रहण नहीं
करते, वे विचारों को पूजने लग जाते हैं। इससे
उनका अहंकार बढ़ जाता है। तब वे प्रयास करते
हैं, और लोग आएं उनकी बात मानें। यही अहंकार, सम्प्रदाय बना देता
है। जहां सत्य
अनुभव होता है, वहां अहंकार नहीं
होता। पर बाद में मानने वालों
का अहंकार, संप्रदाय घड़ लेता है। वे सब कुछ तय कर देना
चाहते हैं। वहां
मार्ग बन जाता
है। जो मार्ग
बनता है, उस पर चलकर बैल की तरह आँखों
पर पट्टी बांधकर गोल गोल घूमते
रहो, बस जब पट्टी खुलती है, तब पता लगता
है, ... मैं तो वहीं हूं, प्रायः हर साधकों, में बुढ़ापे में आकर यह हताशा तंग करती है,...
क्यों, वे धर्म पर नहीं थे। धर्म
तो आचरण है। यहाँ कर्मकांड का कोई महत्व नहीं
है। जो धारण
किया है उसे मानो, वह तुम्हारे आचरण में आए,
... धर्म कोई व्याख्यान देने का विषय
नहीं है।18 ध्यान
क्या ध्यान सिखाया जासकता है? प्रश्न था।
स्वामीजीः-
”, मैंने कोई पद्दति नहीं बताई। जब होती ही नहीं
है, तो बताना
क्या,... पहले भी कहा था, साधना
सामूहिक नहीं हो सकती। ... यह तो व्यक्तिगत है,...
तुम्हें अपने बारे में पता है, ... कांपते हुए हाथ से पात्र नहीं पकड़ पाता था। हाथ जब स्थिर होता
है, तब पात्र
पकड़ा जाता है। यहाँ स्थिरता ही साध्य है,
तुम्हारी मान्यता है, कोई दूसरा आकर यह करेगा।
तुम्हारी कमजोरी है, तुम्हें पता लगे, यह क्यों है, यह तुम्हे ही दूर करनी होगी, ... गुरु
तो रास्ता होता
है, ... वह तुम्हे बता देगा, फिर
... तुम सोचते हो, यह काम भी उसका है, गए भेंट पूजा कर आए।
इससे क्या होगा।
अंधे अंधा ठेलिया, दोनों
कूप परंत...
सब एक दूसरे को धोखा देते हैं।
मैं यह नहीं कहता
कि यह गलत है, जब एक बार साधन का उपाय कहीं से भी जाना है, तो पहले उस पर विश्वास लाओे
तथा उसको सोंपकर अपने आपको देखो...
यही समर्पण कहलाता है। जो भी साधन लिया है, उस पर चलो,¬...
वही एक उपाय
है,... मैं तो यही रहता हूं,
वर्तमान में रहो,
... अंतर्मुखी बनो, बात एक ही है। करके देखो, तुम्हें अपनी साधना छोड़ने
की जरूरत नहीं
है, उस पर पूरा खरा उतरो,
रास्ता अपने आप तुम्हें मिलता जाएगा,
... जो छूटना है छूटता जाएगा, जो अप्रासंगिक है, तुम्हारी गहरी समझ उससेे उबर ही जाएगी। पर मैं यह नहीं कहता
कि यह अप्रासंगिक है हाँं, मंजिल
पर पहुंचने के लिए, ... तुम्हे चलना तो पड़ेगा, कोई न कोई रास्ता लेना
तो पड़ेगा।
मैंने कई बार कहा है, ध्यान कोई किया नहीं है,...
निर्विचारता एक अवस्था है,...
मन विचार और विचार
के बीच में जो गैप है, जब वह बढ़ता चला जाता
है,
या यूं कहें कि एक ही क्रिया के साथ जब मन बहुत दूर तक रहने का अभ्यस्त हो जाता
है,
तब मन मस्तिष्क के नीचे उतरने लगता
है,...
तब स्वाभाविक रूप से विचारों से जो चिपका हुआ था,
... वहॉं से खिसकना शुरू हो जाता
है।
तब यह अवस्था आने लगती है-
यह ध्यान है, ...
पर तुम्हारे लिए जहां
से तुम सवाल
पूछ रहे हो,
... ध्यान क्रिया है। क्रिया ही तो तुम्हे इस अवस्था तक लाएगी,। वरना तुम क्रिया ही छोड़ दोगे, हर परंपरा क्रिया से ही शुरू होती है। शुरू की सीढ़ियों को तोड़ने से बाद में कोई मंजिल तक नहीं
पहुंच सकता है। उस दिन मेहरा
बता रहे थे- कृष्णमूर्ति ने मैडीटेशन को भी व्यर्थ बता दिया है।,चोयल कह रहे थ,ेे ‘‘निसर्गदत्त महाराज ने कहा-
‘डीप मेडीटेशन करो,’ मुझसे पूछा था-‘मैंने
कहा-जो तुम्हें अच्छा लगता है वह करो, पर पूरा करो, वो मेरी राय जानना
चाह रहे थे-मैं क्या बताता?’
उससे कहा- उन्होंने कहा, छोड़ दो,.....
तुम उनकी बात को मानते हो और दूसरे सेे कहा, पूरा पकड़ोे,
गहराई में जाओ।
न वो छोड़ना
चाहते हैं, न वो पूरा पकड़ना
चाहते हैं।, सबकी
परेशानी यही है। किसी को भी न अपने आप पर, न किसी
और पर पूरा
विश्वास है।
साधना का प्रारंभ यहीं
से होता है, जो माना गया है, उस पर विश्वास करो, जो जाना गया है, उसका आदर करो।
पर यह होता
नहीं है।
तुम कुछ न करोगे
तो अहंकारी हो जाओगे। भुने हुए चने की तरह जो कहीं पर भी अंकुरित नहीं
हो सकता है। भई! छोड़ने की बात तो उससे
होगी, जिसका सब स्वतः ही छूटने
लग गया है, जो साधना की असारता का जानकर
आंतरिकता से जुड़ना
चाहता है। खुसरो
ने कहा था- छाप, तिलक
धर दीनी, सब स्वतः छूटने लग जाता है। तब ध्यान अवस्था रह जाती है।निर्विचारता, वह है, बस है, वहां
मात्र शांत सजगता
रह जाती है।19 योग
स्वामीजी कह रहे थेः-
”शारीरिक क्रियाएं योग नहीं हैं।
व्यायाम करते रहना चाहिए,
इससे शरीर सबल होता है। शरीर
ही अगर दुर्बल हो गया तो साधन कौन करेगा।
योग की उपलब्धि परिश्रम से नहीं होती।
यहां श्रम नहीं, विश्राम होता है,
उसकी प्राप्ति के लिए सभी समर्थ हैं।
मैंने पहले भी कहा-
मन और प्राण
की युति ही योग है।
योग से आप उससे
जुड़ जाते हैं,
... जिसे अपना अपना
मानते हैं,
अभी आप संसार से प्रतिपल जुड़े हुए हैं। यह योग-संयोग है, या वियोग भी हर पल रहता है,
मकान, देह, आजीविका, वस्तु,
कहीं से भी आप जुडं़े, सब विनाशशील है,
पर आपका अस्तित्व सनातन है,
उससे अभिन्न होते ही, फिर वियोग नहीं
होता
हम अपने स्वरूप में स्थित हो जाते
हैं
ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान की त्रिपुटी एक हो जाती है।
जब तक भोग की रुचि रहेगी,
योग नहीं होगा।
भोेग की मांग बढ़ती
जाएगी, आप योग से दूर होते
चले जाएंगे।
आपके भीतर योग की मांग बढ़नी चाहिए।
तब क्या होता है।
विषय जो आपको बाहर
खींच रहे थे, अपनी सत्ता के कमजोर पड़ते ही, इन्द्रियों में डूब जाते हैं, इन्द्रियां स्वतः मन में डूबती है, ... मन स्थिर होगा, बुद्धि में स्थित हो जाता है, ... समत्वं योग उच्यते, ... समता
प्राप्त होना ही है। भई! करना
यहां कुछ भी नहीं है।
येाग कोई शारीरिक क्रिया नहीं है,
निर्विकल्पता में ही मन और प्राण की युति संभव है।20.
सेवा
सेवा शरीर से भी होती है, धन से भी,
पर सबसे बड़ी सेवा,
अपनी बुराई का जानना है, ... जानकर
उसे छोड़ देना
है, वह सबसे
बड़ी सेवा होती
है।
बुराई को भीतर मत रखो,...
दिख गई हैै तो हटाओ। आम की टोकरी में एक आम भी सड़ा होगा तो धीरे-धीरे सारी टोकरी
के आम खराब
हो जाऐंगे।
वो जो 99 आम है, मिलकर भी एक आम को अच्छा
नहीं कर सकते,
व्यक्तित्व में एक बुराई भी आ गई है, आपने
भीतर जमा कर रखी है, वह आपकी सारी अच्छाइयों को समाप्त कर जावेगी।
फिर आप जो भी कार्य करेंगे, वह प्रदूषित ही होगा।
आप साधक हैं, ... विचारें, ... एक भी बुराई जो आप अपने भीतर
पाते हैं और आप उसे जानते
हैं, अपने भीतर
छिपाकर न रखे,
उसे तुरंत छोड़ दे, ... संकल्प इतना गहरा
ले जावें कि वह आपको पुनः
आकर्षित नहीं करे।
अपनी जानी हुई और छोड़ी गई बुराई
की स्वीकृति ही ध्यान है। ध्यान
का अर्थ होता
है आप टॉर्च
लेकर अंधेरे में उतरे है, जहां
भी रोशनी गई, वहां का हिस्सा उजाले में हो जाता है, तब भीतर का प्रकाश स्वयं प्रभावित होने लगता है।
प्रकाश की कितनी भी कल्पना करो, प्रकाश नहीं जगेगा।
वह तो तुम्हारे भीतर गंदगी से ढका रहता है।
उसके हटते ही वह स्वयं प्रकाशित हो जाता है।
आप की मान्यता होती
है
यह सब मेरा है,...
और मुझे यह भी चाहिए, वह भी चाहिए, आप अपनी योग्यता का अधिकतम उपयोग और- और भी चाहिए। इस संग्रह में लगा देते हैं।
जो भी योग्यता आपको
मिली है, वह तो परमात्मा की देन है, चलो परमात्मा को नहीं
माना, प्रकृति की देन है, जब तक आप उसका
सदुपयोग नहीं करेंगे,... आपकी समस्याओं का हल नहीं निकल पाएगा। इसीलिए आपको प्रयत्न अपने आप से करना है। यहां
दूसरों को उपदेश
देना, उनके लिए व्याख्यान देना सार नहीं है।
ईमानदार आपको होना है
न्यायप्रिय आपको होना है
आप स्वयं चाहते हैं,
समाज से बेईमानी दूर हो, भ्रष्टाचार मिटे, पर आप स्वयं अपने प्रति
कितने ईमानदार है, यह पता करें,
अपनी गलती हो तो उसे साहसपूर्वक स्वीकार करें, और उसे दूर करने
का प्रयास करे।
आपको जो सामर्थ्य मिला है, वह सदुपयोग के लिए है।
कितने अधिकारी है, जो राज्य ने उनको
सामर्थ्य व स्वतंत्रता सौंपी है, उसका
उपयोग राज्यहित में करते हैं?
वे अधिक से अधिक
धन कमाने में,
जमीन खरीदने में,
सरकारी सम्पत्ति व सुविधाओं का प्रयोग अपने लिए करने
में करते हैं,
फिर वे चाहते
हैं कि उनका
तथा उनके परिवार का विकास हो, कल्याण हो।
क्या मंदिरों में जाकर
माथा टेकने से, संत-महात्माओं को भंेट देकर, आशीर्वाद लेने से उनका
कल्याण हो जावेगा।
होता यह है कि एक सड़ा आम,..भरी हुयी टोकरी
को भी खराब
कर देता है।
यही कारण है कि भले लोग भी अब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।
ेजतना समाज को नहीं,
उतना संतों को अपनी बुराइयों से बचना है। जब आप अपनी योग्यता का अधिक से अधिक सदुपयोग करते
हैं, तब आपके
पुरुषार्थ की क्षमता भी बढ़ती है। आपकी कार्यकुशलता अपने आप बढ़ने लग जाती है,... आलस्य
ही सबसे बड़ा व्यक्ति का दुश्मन है।
एक किसान के दो बेटे हैं, एक तो पिता का नाम लेता है, उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाता है रहता है, दूसरा
उन्हें नमस्कार कर काम पर चला जाता है। शाम को खेत से आता है, फिर पिता को प्रणाम करता है, बताइए
पिता अपने किस पुत्र को प्यार
करेगा।
परमात्मा की सच्ची पूजा
तो परम पुरुषार्थ है। परमात्मा ने मनुष्य देह कार्य
करने के लिए सौंपी है, उसका
सदुपयोग जब आपकी
आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए तब सामर्थ्य का सदुपयोग सेवा है।
परन्तु आप बाहर का तो क्या अपने
भीतर के अनुशासन की भी नहीं
मानते हैं। प्राप्त स्वाधीनता का दुरुपयोग सबसे बड़ी गलती
है, वही पाप है। इसकी सजा सबको मिलती है। स्वाधीनता आपको सदुपयोग के लिए मिली
है। पर आप अपने को स्वच्छन्दता में ले जाते
हैं। आज समाज
में यही हो रहा है।
आप, अपने आपको देखें-,
क्या आप परिस्थिति के आश्रित तो नहीं है, आप पद से हटते
ही कितने व्याकुल हो गए, यहां
भागे चले आए, क्यांे,? परिवार की समस्याएंँ हैं, वे अपना
समाधान साथ लाती
है। पर उनके
लिए आप अधिक
परेशान नहीं है, आपका अहंकार टूटता
है, सुविधाएं कम हो जाती है, आप उनसे परेशान हैं।
सच तो यह है कि जब आप अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसार के आश्रित हो जाते हैं,
परिस्थितियों के आश्रित हो जाते हैं,
तब आप पराश्रय में डूट जाते
हैं। पराधीनता में लेश मात्र भी सुख नहीं है।
भोजन बनाने वाला नहीं
आया, ... बाई नहीं आई, ... आज लाइट नहीं आई, ... आप बैचेन हैं। यह सब क्या है? आप अपने ऊपर लेश मात्र भी टिके हुए नहीं
हैं?
कहांँ है आपका आत्मविश्वास? आपमें आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है। फिर कैसे विकास
होगा?
परिस्थितियांँ अनुकूल हों या प्रतिकूल,
वस्तु की प्राप्ति होती है अथवा नहीं
अवस्था प्रिय है अथवा
अप्रिय
आपको हर स्थिति में उत्तेजना रहित, शांत
रहते हुए आत्मवत सर्वभूतेषु सर्वभूतेषु हितेरतः की भावना से कार्य
करना चाहिए।
परिस्थितियों के आश्रित हो जाने पर, हमारे
भीतर हीनता आ जाती है, हम गुलाम हो जाते
हैं। क्यों, हम जरा सा भी कष्ट झेलने के आदी नहीं रहे,
क्या ऐसे समय में आपकी स्वतंत्रता सुरक्षित रह सकती
है?
इसीलिए, यह मत देखो,
दूसरों ने आपके
साथ क्या किया,
उन्होंने जो उस समय श्रेष्ठ था, वहीं किया होगा,
पर आपने उसमें
से जो भी खराब था, अप्रिय था, उसको सहेजकर अपने भीतर रख लिया है,... बार बार उसे याद कर, अपने आपको
अशांत कर लेते
हो। याद रखना
है तो यह याद रखें, दूसरों ने हमारे लिए क्या उपकार
किया।, ... परमात्मा कभी भी आपके नामजप, कीर्तन, ग्रन्थांे के पढ़ने
से प्रसन्न नहीं
होते, जितना उनकी
सृष्टि की, प्राणीजगत की सेवा से प्रसन्न होते
हैं।
जितना भी आप निर्दोष होते जाते हैं।
अपनी गलतियों को जानकर उन्हे दूर हटाने का प्रयत्न करते जाते हैं,
उतनी ही आपके
भीतर कर्तव्य परायणता बढ़ती जाती है। और जो व्यक्ति कर्तव्य परायण होता
है, उसका परिवार सुखी व प्रसन्न रहता है। क्या
यह आप नहीं
चाहते हैं? भगवान
शिव का परिवार इसका उदाहरण है, स्वयं शिव, पार्वती जी, गणेश जी, कार्तिकेय
सभी की पूजा
होती है। देवताओं में इतना सुखी
व प्रसिद्ध परिवार और कोई दूसरा
नहीं है।
17 कर्म
जीवन का उद्देश्य क्या है? प्रश्न था।
स्वामीजी कह रहे थेः-
आपने ‘साधन यात्रा’ लिखी,...
अच्छी है, और भी किताबें लिखीं
पर कभी जाना
कि आपका ‘साध्य’
क्या है?
साधक को सबसे पहले
यह पता होना
चाहिए कि उसने
जो रूप अपना
निर्धारित किया है, उसका दायित्व क्या
है? साधु का भेष धारण करते
ही उसका उत्तरदायित्व आ जाता है। गलती
यही होती है, लोग भेष तो धारण कर लेते
हैं, पर उसके
अनुकूल उनका व्यवहार नहीं होता है।
सबसे पहले यही जानना
चाहिए।
आप साधक हैं, बहुत
अच्छी बात है।
साधन क्या है, और उसके प्रति आपका
दायित्व क्या है?
महर्षि पतंजलि ने, योग सूत्र में जो क्रम बनाया
है, उसमें ‘यम और नियम’ उस साधक के लिए जो योगवित होना चाहता है, उसके दायित्व सौंपे
हैं।
इसी तरह आपने कहा है- ‘शांत जीवन’ आपका साध्य है। आप जीवन में शांति चाहते हैं,
... पर इस साध्य
के प्रति आपका
क्या प्रयास है? और क्या उत्तरदायित्व है, यह पता करो।
आपने सुबह प्रार्थना की, फिर पूजा की, ग्रन्थ पढ़े, किसी
मंदिर या आश्रम
मंे हो आए,
... और दिनचर्या समाप्त हो गई,... क्या
यही साधना है?
जो भी बाह्य का साधन है, आपने
जो बाहर का सहारा लिया है, वह आपको दासता
देगा। बहिर्मुखता सौंपेगा। जो हमसे अलग है, हमसे दूर है, हमारा ही नहीं
है, निरंतर परिवर्तनशील है,उसका सहारा
सहायक नहीं है। यह देह है या जगत है, दोनों एक दूसरे
के प्रतिरूप हैं, दूसरा सहारा जो भी है, वह शांति नहीं देगा।
आप कितने भंडारे कर आए, कितने
जप-तप कर आएं, शांति प्राप्त नहीं होगी।
जो आपके पास है, जिससे आपका नित्य
संबंध जुड़ा रहता
है, उसका अनुभव
ही वास्तविक खोज है। बुद्ध ने साधक को प्राण
साधना सौंपी। हम श्वास से निरंतर जुड़े रहते हैं,
जीवन और श्वास
एक ही है। श्वास का अनुभव
करो, वह उस सत्ता तक पहुंचाएगी, जो चैतन्य है।
चित्त आपने कहा मलिन
रहता है, ... उसको
अशुद्धि आपने ही सौंपी है। जो आपका ही नहीं
है, अपने लिए नहीं है, उसका
आप पर प्रभाव बढ़ता जाता है,।. यह जो संसार है, इसके
प्रति आपका जो संबंध है, मोह,
लोभ और कामना
का है। यही बाह्य का प्रभाव है। जो निरंतर पराश्रय सौंपता है।
जब आप नहीं थे, तब भी आपका
अस्तित्व था,... आप बालक थे आपका
अस्तित्व था, ... विवाह
पूर्व भी आप थे, ... पत्नी आई, बच्चे हुए। आपकी
देह, ... आज भी आप हैं
आपके भीतर कौन रहता
है?
देह ही तो रहती
है, जगत के संबंध रहते हैं।
लेकिन जो निरंतर अपरिवर्तनशील आपके
भीतर सब कुछ का भोक्ता भी है, और दृष्टा भी है, वह आपने देखा है?
जब आप बालक थे, तब भी था
और आज भी है,
वही आपका ‘आप’ है, जो निरंतर आपके
साथ है।
और उसके पाने के लिए किसी बाह्य
उपाय की आवश्यकता नहीं है
वही आपका साध्य है-
वह प्राप्त होता है, आत्मकृपा से, स्वाश्रय से-
जगत यथावत रहेगा,
देह यथावत रहेगन कुछ छोड़ना है न भागना है,
निरंतर वर्तमान में रहने
से कर्त्ता निष्काम होता चला जाता
है।
उस प्राप्त निर्लिप्तता में ही शांति है,
... वहीं अस्तित्वानुभूति है,
यही तो साध्य है-
तब भेष की चिंता
छोड़ो, ... वस्त्र मत बदलो,
भीतर जो अशुद्धि तुमने अनुभव की है, उसको बाहर
को भगाओ।
... निरंतर वर्तमान में रहने से, मन की मलिनता स्वतः
कम होती चली जाती है।
18 स्मृति और अवधारणा
”मैंने पहले भी कहा था,
यह शरीर एकात्म है,े एक इकाई
है। एक इंच नाड़ियां जो रक्त
ले जाती है वहां चोट लग जाए तो पूरे
शरीर पर प्रभाव होता है, ... हजारों जीवित कोशिकाएं वहां मर जाती हैं,
... शरीर एक इकाई
है। नाखून में चोट लग जाए तो सिर में दर्द हो जाता
है। उर्जा जो है, गोल घेर में बहती है।
सूर्य का प्रभाव हर प्राणी, पशु-पक्षी
पर पड़ता है। खेत में पडे़
बीज उसी की रोशनी में उग आते हैं। पशु,
पक्षी, ... यह संपूर्ण वातावरण एक इकाई में गुंथा हुआ है। एक का प्रभाव दूसरे पर पड़ता
है। जीवन और जगत से हम कहीं पर भी अलग नहीं है, न हीं अलग होकर रह सकते
हैं। यही पर्यावरण है। आज जो संकट है, हम अपनी अलग इकाई
मानकर सोचने लगे हैं।
यही दुख का कारण
है, ... प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं
बनाया है, ... हमारी
समझ सीमित है, बस इतना ही।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो विराट
स्वरूप का दर्शन
कराया था, ... वह क्या है, ... सारा
ब्रह्मांड एक माला
में गुंथा हुआ है, हमारी यह मान्यता है कि हम अलग है, विशेष है, ... यही गलत है।
संसार आजका नहीं है, आज
का जो इतिहास है, जो हमें
बताया जाता है। वह दो-तीन हजार साल पुराना है। ... तिलक महाराज ने वेदों की गणना कर, उसमें ज्योतिष संबंधी सूचना के आधार
पर,हजारों साल पुराना उन्हें बताया।हमारे ज्योतिष ्र ग्रन्थ भी
न जाने कितने
संवत्सरों की कल्पना करते हैं ।ं, नेति,,, नेति,, यह धरती न जाने
कितनी बार उजड़ी
बनी है, .. कोई हिसाब नहीं। ऐसा नहीं है जो आज है, पहले
नहीं था, ... और जो यहां है ,वह कहीं नहीं
है, ... हमारा ज्ञान सीमित हैं, हम देख नहीं पाते
हैं।
मन जब अंतर्मुखी होने लगता है, ... निरंतर वर्तमान में रहने
से,... तब अचानक वह मस्तिष्क के बीच खिसकता हुआ,
यह तो आज्ञाचक्र कहलाता है, जो दोनों भृकुटियों के बीच में है, वही आता है,
... वहां जो अनुभव
है, ... वह महत्वपूर्ण है। इस हीे तीसरी
आंख कहते हैं।
इस जगत के बाहर देखने की शक्ति यहां
आती है। विराट
का अनुभव यहीं
होता है।
अनंतयात्रा में कहा है,-
जो तीनों अवस्थाओं में रहने का अनुभव करने लगता
है, ... जाग्रत, स्वप्न, विचारणा, में यथावत रहने
लग जाता है,
... यही साधन का सार है, ... करना
कुछ भी नहीं
है, ... जितना हो सके, वर्तमान में रहने का है- जब
हमें अपनी गलती
पता लग जाती
है, और इसका
तीव्र अहसास होने
लगता है।तभी परिवर्त्तन की कामना उठती
है।
तभी दोष हमें
तंग करता है,
तब हमें उसके प्रति
आसक्ति नहीं रखनी
चाहिए। होता क्या
है हम जाने-अनजाने में अपनी
गलतियों से प्यार
करते हैं। उनके
प्रति राग रखते
हैं।कहते हैं,” मेरी
तो यह आदत ही हो गई है, अब यह शरीर के साथ ही जाएगी,“ ... यह उनका वाक्य बन जता है, फिर दोष कहां से दूर होगा,... उन्हें बताओ तो आग बबूला हो जाएंगे और चाहते हैं,
भय रहित जीवन
हो, ...सुखी जीवन हो कैसे?
दूसरे की गलती दिखाई
देते ही हम उसे तुरंत बताने
को तत्पर हो जाते हैं। चाहे
पत्नी हो, पुत्र
हो, मानो यही हमारा मुख्य काम है। क्या सचमुच
हम अपने साथ वही व्यवहार करते
हैं, जो हम दूसरों को उनकी
गलती करने पर देते हैं। हम अपने आपको तो बुद्धि चातुर्य से सही ठहराने का प्रयास करते हैं,
और दूसरे के दोष पाने पर उन्हें फांसी तक पर लटकाने को तैयार हो कर देते हैं। यही सबसे बड़ी भूल है। अपने प्रति
जब विवेक के आलोक में भूल दिखाई पड़ती हो, तो उसे स्वीकार कर छोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
पहला काम तो स्वीकार करने के साथ शुरू हो जाता
है दूसरा उसकी
भीतर अस्वीकृति से, ... वह भूल हटनी शुरू
हो जाती है। यही अपने साथ किया हुआ न्याय
होता है। क्योंकि न्याय वही है, जिससे न तो हिंसा होती
है न हीं कोई पाप। आज की न्याय पालिकाओं को देखकर न्याय-
अन्याय की परिभाषा नहीं हो सकती
है। न्याय, प्राकृतिक विधान है। सूरज
का प्रकाश सबको
बराबर मिलता है, सब जगह धूप होती है। वृक्ष
सभी के लिए फल देता है। प्रकृति का पूरा
विधान न्याय पर आधारित है। वहां
किसी प्रकार का राग-द्वेष नहीं
होता है।
अब आपको करना क्या
है,...
आप दूसरे के आते ही, उसके बोलने
से पहले, उसके
बारे में तो धारणा बना रखी है उसे ऊपर ले आते हैं,
... आपकी भाषा बदल जाती है, व्यवहार गलत हो जाता
है। जो हो गया सो हो गया, वर्तमान में वह जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वही महत्वपूर्ण है। हर घटना, हर वस्तु, हर परिस्थिति जब भी आती है, मौलिक आती है, स्वतंत्र आती है, उसका पुराने से अधिक गठजोड़
नही होता, गलती
यही होती है कि हम पूर्वाग्रहों के आधार पर निर्णय करनेे लग जाते
हैंे।
दोषी सामने आता है, उसके प्रति पुनः
वही भाषा, ... क्यों
किया, हमने तो ऐसा नहीं किया,
वाद विवाद होने
लगता है। परन्तु बदले में उसके
साथ सद्व्यवहार किया, ... तो लाभ किसका होगा,
... कभी इस बात को सोचा है। क्या इससे आपका
डरपोकपन सामने आएगा,
... या आप छोटे
हो जाएंगे। सद् व्यवहार, अच्छी भाषा
तो आपका सद्गुण है, जिसे आप दूसरे के भीतर
देखना चाह रहे हैं। फिर आपके
भीतर वह आ पाए तो बेहतर
ही है।
तो एक लाभ तो आपके सद्व्यवहार, विचार प्रतिक्रिया करने से यह होगा कि आपकी भाषा व्यवहार संतुलित होगा। आप तनाव में नहीं
होंगे।
अब सोचो, ... उसने बुरा व्यवहार क्यों किया?,...
आप से तो उसका
परिचय नहीं था,...
कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी। फिर भी उसने गलत काम किया, ... चलो पुरानी लड़ाई थी,
... उसने दोहराई, ... फिर आया गलत व्यवहार कर गया।
इसे सोचा,े
कहीं ना कहीं हमसे
भी तो गलती
हुई है। अगर गलती न होती
तो वह मेरे
साथ किसी प्रकार की बुराई क्यों
करता,...
मेरे द्वारा संबंध जोड़ने
से ही तो,
... यह स्थिति उत्पन्न हुई है। यह भी विचार करने
योग्य है वह क्यों मिला,... यही एक प्राकृतिक विधान है, ... जो प्रभावी है। प्रकृति के कोई भी कार्य अकारण
नहीं है, भले ही हम आज उसे नहीं जानते
हो, ... भूल से हम उससे आशा रख बैठे थे,
... पत्नी हो, पुत्र
हो, ... सभी रिश्ते हमें मुक्ति दिलाने के लिए हैं।
हमारे संकल्प से हमें प्राप्त होते
हैं, ... ये हमारा ही भोगा हुआ,
चाहा हुआ भोग है, जो हमें
मिला है। और इनके प्रति एक ही संबंध रखना
होता है वह है कर्तव्य परायणता का, ... पर यही नहीं होता, .. हम इनके लिए नित प्रतिदिन आशा का संचार करते रहते
हैं। यह संबंध
प्रेम के स्थान
पर, सेवा के स्थान पर, कर्तव्य पालन के स्थान
पर, ... कामना का हो जाता है। कामना पूर्ति में बाधा मिलते ही विक्षोभ पैदा हो जाता है।
सच तो यह है कि हर प्रकार का संबंध जो प्राकृतिक विधान से मिला है, ... मिलता
है, उसमें संबंधों में तटस्थता रखनी
है। तटस्थता पलायन
नहीं है, अनादर
नहीं है। यहां
प्रियता तो है, पर राग नहीं
है। कोई लाभ-लोभ का सौदा
नहीं है। किसी
से किसी प्रकार की आशा नहीं
है, संबंधों में जब कामना आ जाती है, लाभ-लोभ का दवाब
आ जाता है,
... वहीं स्थितियां बिगड़ने लगती है।
... गंभ्ीरता से इस तथ्य पर विचार
करना चाहिए।
आपने उस दिन पूछा
था आध्यात्म की अंतिम अवस्था क्या
है। ... मैंने कहा था-‘प्रेम’,... प्रेम
की पहचान स्वयं
को होती है, वहां निरंतर बनी रहने वाली शांति
होती है। जिसे
आनंद कहा जा सकता है, कोई घट बढ़ नहीं
तथा सभी के प्रति प्रियता, ... कोई आशा नहीं है। क्या चाहिए, प्रकृति प्राकृतिक विधान से पूर्व संकल्प के आधार पर जिन्हें पूरा होना है नियोजन स्वतः करती
है। परन्तु हमारा
उस पर विश्वास ही नहीं है। यही दैन्य और पराजय का कारण
है। हम हर किसी से तो लड़कर जीत नहीं
सकते, पर अपनी
गलती को पहचान
कर उसे दूर कर सकते हैं।
दूसरा जो भी है, वह न तो हमें सुख देने में समर्थ
है, न दुख देने में समर्थ
है, यही नहीं मानना भूल है।
होता क्या है, ... आपने
देखा है, आते ही बात शुरू
करने के लिए सबसे पहले जो आता है, प्रणाम करता है, फिर जो नहीं है, यहां का या उसके घर का, समाज का, उसी की बुराई लेकर
बैठ जाता है। पिता आते हैं,
वे अपने बेटों
का दुख बताते
हैं, ... बेटा आता है, उसको उसका
पिता ही सबसे
खराब लगता है वो दोनों मुझे
ही बताने आते हैं, ... मैं एक अच्छा श्रोता हूं,...
वे यहां आकर अपनी बात कहकर
हल्का हो जाते
हैं। ... होटल में देखा है, बाहर
जितना साफ सुधरा
होता है, पीछे
उतनी ही गंदगी
रहती है, सारा
कूड़ा कचरा पीछे
डालकर, होटल बाहर
से सजा रहता
है। ... लोग मुझे भी यही मानते
हैं, ... मुझसे पूछते ही नहीं है,
... भई! मुझे क्यों
सुना रहे हो।
... मैंने आपका क्या
बिगाड़ा है, ... पर है, भरे हुए आते हैं, उन्हें लगता है, मुझे
सुनाने से उन्हें राहत मिलती है।
क्यों, ... हम दूसरों के द्वारा अपने बारे
में तथा अन्य
के बारे में कही गई बात पर तुरंत भरोसा
कर लेते हैं।
जरा सा भी नहीं सोचते इसका
सच क्या है। और वह हमसे
क्यों कह रहा है।
किसी की सुनी हुई,
कही गई बात पर भरोसा कर किसी को बुरा
मान लेना उचित
नहीं है, ... उससे
जो मन में है वह भी दूषित हो जाता
है।
एक बात और है, हर परिस्थिति अपने आप में नवीन
होती है। जो नया घटता है, तो वह जो हो चुका है, घट चुका है, उसके विकास में है। पर वह घटना सर्वथा नवीन होती है फिर जो घट चुका है उसके
आधार पर उसे हमेशा के लिए बुरा माल लेना,
उसकी बुराई का चिंतन करना उचित
नहीं है।
इससे क्या होगा, उसका
नाम लेते ही, गुस्सा आ जाएगा,
भई क्यों वह तो वहां है नहीं। उसने दो साल पहले, छः महीने पहले कोई व्यवहार किया जो आपको गलत लगा,
... आज वह आया है, या उसका
जिक्र आया है, आज तो व्यवहार गलत है ही नहीं, पर उसका
नाम आते ही भीतर से घृणा
या क्रोध का ज्वार आता है, आप बह जाते
हैं, आग बबूला
हो जाते हैं,
क्या यह उचित
है?
अब प्राकृतिक न्याय से विचार करो, जो भी हम करते
हैं, वही तो लौटकर आता है। यह मान लो हमने कोई गलती
की होगी, उसका
ही वह फल था, ... उसके हर व्यवहार के पीछे
हमारी कोई गलती
हो तो पता करो, खोजो मिल जाए तो संकल्प लो, गलती दुबारा नहीं होगी, ... आज हम भला व्यवहार रखेंगे तो कल वही लौट- लौटकर
आएगा, बुराई का प्रतिकार बुराई नहीं
है, ... हर तरह से विचार करो,
भलाई ही है, यही हमारे लिए उचित है।
बुराई की पहचान जब होती है, ... तब विवेक की अग्नि
से जो संकल्प घना होता है, उसमें उसे हटाने
का सामर्थ्य आ जाता है। परन्तु जब उसे स्मृति में राग के आधार पर, न्यायोचित ठहराते हुए स्थापित कर लिया जाता
है, तब वह बुराई बार बार प्रकट होने लगती
है। हम रोज कहते हैं, मुझ में यह बुराई
है, मैं छोड़ना
चाहता हूंँ पर छूटती नहीं है। क्यों,...उसके प्रति हमारी आत्मीयता स्मृति में बसी रहती
है, इससे उसकी
बार बार पुनरावृत्ति होती रहती है।
अतः जब भी हमें
अपनी गलती दिखाई
पड़े,... उस पर गंभीरता से विचार
करो,... अपने आपको पापी ठहराकर, ... हीन भावना के गर्त
में जानेे की कोई जरूरत नहीं
है। स्मृति में उसका जो प्रभाव बन जाता है, वह लहरों के धक्के खाकर भीतर
संग्रह से स्वतः
उफान खाकर ऊपर टकराता रहेगा। इस क्षण सावधान रहने
की जरूरत है, हमें बहना नहीं
है। वहीं सजगता
रहे। उसे विवेक
का सहारा लेकर
न दुहराने का तीव्र संकल्प करना
चाहिए।
यहां स्थाई कुछ भी नहीं है। जो आज है कल नहीं रहेगा, सब बदलता रहता है, फिर इसमें स्थायित्व भी कहां तक रहेगा। जहां आज बड़ेे भवन है, वहां कल खंडहर
दिखाई पड़ता है, यह प्रकृति का नियम है। इसीलिए कहीं भी किसी
काल में, किसी
व्यक्ति में ,किसी
वस्तु में, सभी में बुराई नहीं
होती। न ही वह सदा भला होता है। यहां
प्रकृति में सब परिवर्तनशील है। हमें
मात्र जो वर्तमान में परिस्थिति है, वस्तु है, , विचार
मिला है, उसका
सदुपयोग करना चाहिए।
इसीलिए पहले भी कई बार कहा है, किसी के बारे
में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह रखना दुष्कर्म है। गलत है। किसी के प्रति किसी भी प्रकार की अवधारणा रखना, गलत है।
इसी तरह अपने प्रति
भी न्याय करना
चाहिए। ... अपनी जहां आत्म् प्रशंसा से बचना चाहिए, वहीं
अपने भीतर दोष दिखाई पड़ने पर, अपने को दोषी
ही मानते रहना
उचित नहीं है। दोष की स्वीकृति,, वह दोष था, ... मेरा
कर्म गलत था,
... यह स्वीकृति जितनी गहरी होती जाती
है, निर्दोषता व्यवहार में अपने आप आने लगती है। की गई भूल, भविष्य में नहीं होगी,
... यह संकल्प जब हम अपने भीतर
गहराई से लेते
हैं, वर्तमान में ही हम गलती
के बोझ से मुक्त हो जाते
हैं।
इसीलिए, अपने भीतर या दूसरों के भीतर,
कभी भी स्थाई
रूप से दोषारोपण कर पुख्ता नहीं
होना देना चाहिए। उससे वह प्रवाह निरंतर बना रहता
है और हम दोष मुक्त नहीं
रह पाते हैं।
अपने बारे में और दूसरों के बारे में हम जो अवधारणा बना कर रखते हैं,
उनका कोई औचित्य नहीं है। न ही उनका स्वतंत्र अस्तित्व है। और जिनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं
है, उसे स्वीकार करना, मानना, आदर करना क्या उचित
है? हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। आपके यहां जो भी आता है,उसे आने दें देखेंगे आपने
उसके बारे में पहले जो धारणा बना रखी है, वह उभरकर
ऊपर आ जाती
है। आप अपने
व्यवहार को निर्धारित कर लेते हैं।
यांत्रिक बना देते
हैं। कभी प्रयोग करंे,... पूर्व धारणा के वेग को वहन करंे, अपने
व्यवहार को संतुलित और स्वच्छ रूप में करे, कोई पूर्वाग्रह न रहे,
आप अपना ही नहीं दूसरे का भी व्यवहार बदलने
में समर्थ होने
लगेंगे। परिवार में रहने का यही तरीका है। ... पर हम इसे भूल गए हैं
23 विश्वास
स्वामीजी कह रहे थेः-
एक ही सवाल को बार-बार पूछते
हो क्यों, ...
जो यात्रा है, उस पर तुम्हारा विश्वास नहीं
है। हर बात को हर परिस्थिति को खकोल- खकोलकर देखते हो, चैन नहीं लेने देते,
इतना सोचते हो, इतनी कल्पना कर लेते हो कि,
... वो सत्तू वाली
कहानी बताई थी। उसने एक घड़ा सत्तू रख लिया,
मेहनत से बच गया, लगा सोचने
क्या करेगा? इसका,
झपकी लग गई। सपने में उसने
सत्तू बेचा, भुनाया हुआ, फिर और बनाया, ... उसे बेचा, ... और धन कमाया, ... फिर विवाह कर लिया,
... फिर बच्चा हुआ,
.. एक दिन बच्चे
से किसी बात पर नाराज हो गया, ... गुस्से में लात चलाई, घड़े के लगी, घड़ा टूट गया, ... यही हालत है, ... इतना क्यों सोचते हों...?
यही मन की दुर्बलता है, ... मन की गति मन की कमजोरी है। ... विश्वास स्वयं के प्रति
होना चाहिए, वह आप में नहीं
है।
चाहते हो, आत्मविश्वास रहे, ... उसके लिए यह अभ्यास है।
जो आपने माना है,
... उस पर विश्वास सौ टका होना
चाहिए। मैंने पहले
भी बताया था कि जो लोग कुछ नहीं जानते
हैं, कम पढ़े लिखे होते हैं,
जो धूनी रमाए
बैठे हैं, वो कुछ कह देते
हैं, ... वैसा हो जाता है, उनकी
मान्यता बढ़ती जाती
है, क्यों?
उनका जो भी माना
गया है, उस पर विश्वास सौ टका होता है, वो ज्यादा सवाल-जवाब करते ही नहीं हैं। आप जितना सोचोगे, उना ही आपका मन कमजोर होता जाएगा। संकल्प तो उठा नहीं, विकल्प पचास
आ जावेंगे। यह जो मन है, जो निरंतर कतर-बतर करता है रहता है, इससे
पूछो, ... इसने कहीं लाभ भी दिया
है, ... इसके पास सारी दुर्बलताओं का लेखा-जोखा रहता
है, ... इसके उठते ही जो विचार
आता हे, उसे देखों, ... शांत भाव से देखो। नहीं
दिखता है, जिसने
विचार उठाया है,
... जो उठा है, उसे देखो, इससे
क्या होगा, देखने
वाला जो है, वह ताकत ले लेगा। जो दिख रहा है वह धीरे धीरे दर्पण
से हटता चला जाएगा। वह आता तो बहाने के लिए है, पर आपको उसके साथ बहना नहीं है। उसका आदर नहीं
होते ही, बहना
भी कम होने
लगेगा।
इसके लिए व्यवहार में भी परिवर्तन लाओ,
इतने साल हो गए हैं, समझाते-समझाते, पर मुझे तो कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता। पुरुषार्थ है, लगन है, बस,...
पर होता क्या है, यहां बैठे हैं,
चार लोग आए है, आप बातों
में उलझ गए हैं। क्या कहना
है, क्या नहीं
कहना है, कुछ पता नहीं। अपनी
श्रेष्ठता सिद्ध करने
के लिए जिसे बता रहे थे, ... उन्हें बताने से क्या फायदा ,जो कुछ समझना चाहते
ही नहीं है, उनसे फालतू ािर खपाने से क्या
लाभ है? हर व्यक्ति की योग्यता अलग-अलग होती
है।यहां लोग अखबार
पढ़कर बहस करने
आते हैं। उसमें
उलझने से अपनी
शक्ति ही घटती
है। कभी सोचा
है, किता अनर्गल बोलते चले जाते
हैं।
जो वो कहते हैं,
सुन लो, बहस की कोई जरूरत
नहीं है।
लोग काम बताते हैं,
बिना मतलब के तो कोई नहीं
आता है।
उसे सुन लो, हो सकता है, रास्ता बता दो, इशारा
कर दो, उसके
भाग्य में होगा,
प्रकृति की इच्छा
होगी, हो जाएगा।
यही तो होना है, हो जाएगा, नहीं
होगा, कुछ और हो जाएगा, पर आप अनावश्यक उसमें पूरी ताकत लगा देते हो, क्यों?
अपनी प्रशंसा सुनने
के लिए क्या
फायदा?...
आपका प्रयास, सुझाव, संकल्प, निश्चित मात्रा है। प्रकृति की इच्छा
से और उसके
पूर्व संकल्पों पर पुरुषार्थ से उसे फल की प्राप्ति होगी, ... पर आप उसमें भी अटक जाते हैं,
प्रकृति की इच्छा
से ही आप करते हैं,
करन भी चाहिए, हानि-लाभ होगा या नहीं,
उस पर छोड़ देना चाहिए।
यही नहीं होता है,
आपको पता है यह कार्य विवेक विरोधी है, फिर भी करते हो, क्यों?
वह कार्य कभी भी नहीं करना चाहिए
जिसे कर नहीं
सकते, ... नहीं करना चाहिए, ... पर हम करते हैं, रुचि
से करते हैं।
जो भी कार्य हमें
प्राप्त हुआ है, उसके लिए परिस्थिति को वैसा ही होना था, ... ऐसा क्यों होता है,
... यह एक प्राकृतिक विधान है। हमें
हर परिस्थिति में कर्तव्य परायण होना
है। भागना नहीं
है। परिस्थिति का सदुपयोग करना है, वह मात्र होता
है, उस परिस्थिति के अनुसार जो भी कार्य निर्धारित हुआ है उसमें
अपने मन को पूरी तरह शांत
उत्तेजना रहित लगा देने से। हम कितना यह कर पाते हैं। सोचो।
उस दिन बताया
था, ... पहले नगर में एक अस्पताल होता था, तीन-चार डॉक्टर बस! आज डॉक्टर भी सैकड़ों होते हैं,
कई-कई अस्पताल खुले हुए हैं।
बीमारियां भी नई नई आती जा रही है। पहले
इनका नाम भी नहीं सुना था।क्यों?कभी विचार किया
है।
प्रकृति, जगन्नाथ है, देती
है, तो लेने
वाले के दो हाथ होते हैं,
कितना लेगा।
पर उसके तो हजारों हाथ हैं। अपने विराट स्वरूप में भगवान ने यही तो बताया
है,
वहाँ हजारों हाथों से छीन लिया जाता है।
मन जब तक चंचल
रहेगा, मलिन रहेगा,
... अनावश्यक विचारणा में और
भी विध्वंसात्मक बना रहेगा, जब तक कि जो माना
गया है, उस पर दृढ़ विश्वास नहीं होता है।विश्वास की कमी, मन को चंचल बना देती है।
विश्वास एक बार आने के बाद जाता
नहीं है। वह और गहरा होता
है। पहले गुरु-शिष्य संबंध जो होते थे, ... उनके
बीच में यही संबंध था। जो अटूट था, वैसा
आज नहीं है।
आज तो कोई बात मानने वाला ही नहीं है। इस कान से सुनी
दूसरे कान से निकाल दी। जो मतलब की बात हुई, ... जिससे आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति हुई उन्हें स्वीकार किया, जो नहीं
जॅची, यहीं छोड़ दी।
यहां कोई सुनने और समझने नहीं आता,
सब मुझे समझाने और बताने तथा अपनी विचारधारा की पुष्टि मुझसे करने
आते हैं।
जब विश्वास घना होने
लगता है, तब व्यवहार में अपने
आप परिवर्तन आने लगता है, उससे
जो जाना गया है, उसका आदर होने लगता है। जब सच, बोलने का स्वभाव बनने लगता है,,
पहले बोला कभी नहीं था... पर अब जब वह स्वभाव का अंग बनने
लग जाता है, भाषा में गलत व गंदा बोलना
कम होने लगता
है। पहले परिवर्तन भाषा में दिखाई
पड़ता हैं,... फिर व्यवहार में आता है। तब दोष कम होने
लगते हैं।“
24 साधना सार
”बचपन में एक ही बात चाही
थी, ... जब घर पर अतिथि आए थे तब ग्रीष्मावकाश था, वे लेखक थे, उनकी किताब बंबई
में छप रही थी। उन्हें कुछ दिन रूकना था,
... सब लोगों का गांव जाने का कार्यक्रम था, ... मैं ही रूक गया था, ... उन्होंने मुझसे पूछा
था, ... मांगों क्या चाहते
हो? तब मैंने
कहा था- मैं याचक नहीं बनू,
जब सन्यास लेने
का इरादा मैंने
इंजीनियर साहब को बताया था, ... तब उन्होंने भी सवाल
किया था, खर्च
कैसे चलेगा? मैंने
कहा था, ... सन्यास लेकर कार्य करूंगा पर याचक नहीं
बनूंगा।“
”हमारा आज स्वरूप क्या हो गया है।
हम याचक बनकर रह गए हैं।
बचपन से मांगना सिखाते हैं, सारी उम्र
मांगते रहते हैं।
परमात्मा अनंत हाथों में देता है।
हमारे दो ही हाथ हैं
पर जब वह लेता
है, उसके अनंत
हाथ है,...
यहां लगभग दो करोड़
लोग होंगे, ... जो पूरी तरह से भगवान की दुकान
खोले बैठे हैं,
... सबसे बड़ा व्यापार आज भगवान का ही हो रहा है। हर गांव
में दस-पांच
आदमी है, जो भगवान की दुकान
चलाते हैं। बड़े शहर में सैकड़ों मंदिर-मस्जिद होंगे,
... हजारों का काम यही है, ... जब इन सबसे ही पेट भर जाता
है, तब काम करने की क्या
जरूरत ह?“.
”हम हजार साल से रास्ता तलाश
कर रहे हैं,
... हममें मौलिक परिवर्तन नहीं होता। उपनिषदों की चर्चा करते
हैं, कबीर व तुलसी की साखी
व दोहे हमारी
जबान पर रहते
हैं, पर धर्म
व उपदेश दूसरों को देते हैं,
हमारे आचरण में नहीं हैं। क्योंकि हम धर्म के विक्रेता है, धर्म
बेचते हैं, पर हमारा स्वयं उस पर विश्वास ही नहीं है।यदि यह हमको अच्छा लगता,
हमें प्रिय होता,
तो हमें इसके
प्रति आत्मीयता होती, हमारा धर्माचरण होता, हममें परिवर्तन आता?“
”धर्म का यहां
फुलटाइम व्यापार है, सुबह से शाम तक की बिक्री है। अब आप ही सोचंे, घर का काम हम कितने मन से करते हैं, ... घर को तो हमने
नरक बना रखा है। हमारी मान्यता है यह तो बोझा है, कब उतरे कब हम, आध्यात्मिक लाभ लें।
आध्यात्मिक लाभ के लिए हम सुबह-शाम मंदिर हो आते हैं। ... तीर्थ कर आते हैं। थोड़ा
बहुत दान-पुण्य
कर देते हैं।
महात्माओं के पास जाकर उनके प्रवचन सुन आते हैं।
महात्मा भी जानते
हैं, कि कुछ होने वाला नहीं
है। ये लोग उनकी तड़क- भड़क देखकर आए हैं।
भारी प्रचार में खर्चा हुआ है, और उनका काम कथा के माध्यम से उनका मनोरंजन करना है। वे भी कथा-कहानी,
संगीत, गायन, वादन
से यह कार्य
निपुणता से कर रहे हैं। जिन मूल्यों की वे बात कर रहे हैं, वो तो स्वयं उनके पास नहीं है। तंबू
भी उनका है, प्रसाद भी उनका
है, किताबें उनकी
है, कैसट उनके
हैं, एकबड़ा व्यापार चल रहा है। फिर आप पूछते
हैं कि उनका
प्रभाव क्यों नहीं
है? गांधी ने अपनी धोती का आधा टुकड़ा फाड़कर
औरत को तन ढ़कने को दे दिया था, जो सोचा वह किया,
उनका हर कर्म
सेवा मय था।“
”कर्म का संबंध
सदा दूसरे से होता है।
जो भी क्रिया है, वहां आपका मन निरंतर लगा रहे,
... लेश मात्र भी विपरीत नहीं जाने
दिया जाए, ... यही सतर्कता, सजगता में ढल जाती है। ग्रंथ पढ़ना, ... घर में खाना बनाने
से श्रेष्ठ नहीं
है। दोनों ही कर्म बराबर के हैं।
हां, मन भटकता रहे तो वह कर्म
प्रदूषित हो जाता
है। यही वास्तविक क्रिया योग है। आपकी रुचि ध्यान
में है, ... तो ध्यान में मन को कहीं मत जाने दो, ... दृष्टा बनो। साक्षी भाव जब सघन होता
जाएगा, ध्यान सध जाएगा, पर इसके
लिए बाहर जाकर
उपद्रव करने की, ध्यान सीखने व सिखाने की क्या
जरूरत है। यह बहिर्मुखी क्रियाएं हैं, जो मात्र अहंकार दिखाने के लिए होती है।
क्रिया जब योग से जुड़ जाती है, तब सेवा होती
है। सेवा से जहां अहंकार कम होता है, वहीं
हमारे भीतर ‘सर्व
भूतेषु हिते रतः’
की भावना के जगने से प्रेम
की स्वाभाविक वृद्धि होने लगती है।
अभी मैंने कहा था, ज्ञान जो है, इसका संबंध अपने
आप से है, जो आपने जाना
है, वह आपका
ज्ञान है, पर ज्ञान को आदर न होने से जाना हुआ विस्मृत होने लग जाता
है।
जब जो जाना गया है, वह आचरण
में आने लगता
है, तो विवेक
की स्वाभाविक प्राप्ति होने
लगती है। और विवेक का आदर होने से, स्वाभाविक शांति प्राप्त होती
है। यहां विवेक
विरोधी कर्म अपने
आप छूटने लग जाते हैं। कल तक आप जिन कार्यों में रुचि
ले रहे थे। अब उनसे स्वाभाविक अरुचि हो जाती
है। यहां छोड़ना
कुछ भी नहीं
है, जिस छूटना
है, वह सहज होने लग जाता
है। ओर आपको
प्राप्त होता है आत्मविश्वास, ... आप की अन्तर्यात्रा प्रारंभ हो जाती है, ... आप अपने आपसे जुड़ने
लग जाते हैं,
जो आपके भीतर
प्रमाद था, अंधकार था, वह स्वतः
हटने लग जाता
है। यही तो आंतरिक सत्संग हैं,
... यही ध्यान है। निर्विचारता में रहना
ही ध्यान है।
... इसके लिए क्या
आपको कहीं बाहर
भटकने की जरूरत
है?
मौलिक परिवर्तन, हम सब चाहतेे हैं।
सबसे पहले दुनिया में,
समाज में, परिवार में, और सबसे
कम अपने भीतर
अपना आंतरिक विकास हम नहीं चाहते।
कभी अपनी तरफ झांकते नहीं है, ... बुराई
दिखती है तो ढ़क्कन लगा देते
हैं, परिस्थितियों को दोष देते हैं,
अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं।
पर पहला परिवर्तन तो स्वयं से ही होगा-
जिससे किसी को हानि
पहुंचती है, वह कार्य हम ना करें।
अपना कार्य करें, बेहतर
से बेहतर करें,
पर हम दूसरे का कार्य खराब करने
का प्रयास नहीं
करंे, यही ‘महारास’ की परंपरा है। परमात्मा सभी प्राणियों में सृजन रत है, वहां नृत्य
हो रहा है,
... जीवन आनंद रूप है, हम स्वयं
डांडिया करे, आनंद
मग्न हों पर दूसरे की गति,
उसकी लय हमारे
कारण से खराब
न हो, इसका
ध्यान रहे, यही ध्यान है।
ध्यान, आंख मींचकर एकांत
में बैठना नहीं
है।
यहां ध्यान निरंतर रहने
वाली शांत सजगता
है।
यह तभी संभव है जब हम बुराई
करना छोड़ दें,
और अगर समर्थ
हैं, समय है, तो दूसरों की भलाई करें। पर बुराई करना छोड़ना
तो हमारे बस की बात है।
इससे क्या होगा?
आपका अधिकांश समय तो दूसरों की बुराई
तथा अपनी प्रशंसा में चला जाता
है।उसमें आपको भी रस आता है, दूसरों को भी। पर कभी आपने
विचारा है, जो मनुष्य बुराई करना
छोड़ देता है, वह संसार के लिए उपयोगी हो जाता है। और अगर वह संसार
की भलाई करने
लग जाता है, तो संसार उसे सम्मान देने लग जाता है।
आप अपने चित्त से यह आदत दूर कर लें, बुराई
न करना ही परिवार की, संसार
की, सबसे बड़ी सेवा है।
पर यही नहीं होता
है-
मौलिक परिवर्तन आपसे ही शुरू होगा, आपके
परिवार से शुरू
होगा, आप इस नियम को सदा ध्यान रखंे कि, की गई बुराई
हजार गुना वापिस
होकर लौटती है,
... बुराई छोड़ना ही सेवा का मार्ग
है, जिससे प्रेम
प्राप्त होता है। हमंे समाज को अपनी खुराक नहीं
बनाना है, समाज
हमारे भोग की सामग्री नहीं है। हम सभी इसी दृष्टिकोण के हो जाएंगे, तब समाज
कैसे सुधरेगा, ... आज धार्मिक उपदेशक भी समाज को अपनी
खुराक बना रहे हैं। समाज को शब्ददेते हैं। धन लेते हैं, प्रमाद सौंपते हैं। पुरुषार्थ छीनते हैं, क्योंकि कर्म की बात करते ही, प्रश्न खड़ा हो जाता
है कि वे स्वयं कर्म क्यों
नहीं करते? जब यह माया है,तो वे इस माया से अपनी
उदरपूर्ति ही नहीं,
रईसों की तरह दैनिक दिनचर्या की मांग क्यों रखते
हैं?ैइसका उत्तर
उनके पास नहीं
है? सच तो यह है, हम सब समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है, हमें समाज की जरूरत को अपने
सामर्थ्य से अधिक
से अधिक पूरा
करने का प्रयास करना चाहिए। यही वास्तविक सच्चा पथ है, जो हमें
आत्मविश्वास सौंपता है, और जहां हमारा
रूपांतरण संभव है।
25 अन्तर्यात्रा
पूज्य स्वामीजी की यह अनंत कृपा ही थी कि वे अपनी अमृत वर्षा
के साथ सहज-
सुलभ होगए , सच तो यही है तब मेैंं इतना
योय नहीं था ,
उनके शब्दों को ग्रहण कर पाता
यह प्रकृति का आशीष ही रहा
,मैं
एक संग्रहक ही बनकर रह गया था , वह अभ्सास करते - करते , उनके शब्दों के गूढा़र्थ से मुखातिब होगया।
तब अंतर्यात्रा पुस्तक प्रकाशित हुई थी। इसकी
विवेकानंदजी की पत्रिका प्रबुद्ध भारत मे ंसमीक्षा आई थी। उस ममय इस कृति की नकल साधना और सिद्धि के नाम से पुस्तक ं कुंभ
के मेले में बहुत बिकी थीं।
पर यच यही हे ,
स्वामीजी जिस तल से संबोधित हो रहे थे , हमारे
परंपरागत मन से बहुत दूर ही थां
जीवन के उत्तरार्द्ध्र में कुछ मित्र उनके पास उनकी साधना पद्धति समझने गए थे ,
पर उनका परंपरागत मन अपनी बौद्धिक संपदा से अविभूत ही था।
स्वामीजी के एक अनुयायी अपने समय के सभी संतो ंसे मिलने जाया करते
थे , वे आकर स्वामीजी को उन संतों केे संसमरण बताते। जे़ कृष्णमूर्ति के अनुयायियों का सत्संग हर रविवार को होता था। वे अपने आपको
आधुनिक आध्यात्मिक चिन्तक ही मानते थे। उनके लैक्चर जब वे भारत
आते , सुने जाते , फिर आकर स्वामीजी को बताते।
स्वामीजी के कुछ अनुयायी तब आचार्य रजनीश
के सत्संग में जाते थे। वहॉं
से कैसेट और किताबे ंलाते, स्वामीजी ने कभी किसी
को मना नहीं
कियां ।
एक बार एक अनुयायी जो निार्गदत्त महाराज से प्रभाावित थे बंबई होकर आए थे , मिलने आए वे उनकी पुसतकें क्रय करके भी लाए थे , स्वामीजी को बता रहे थेे , कैसे
वे मिलने गए ,
उन्होंने उनसे कहा कि डीप मैडिटशन करो।
तब स्वामीजी मुसकराए , उन्हानेंपे सवामीजी से पूछा
, स्वामीजी ये डीप म्ेडीटेशन क्या होता
है?
तब स्वामीजी हॅंसे , बोले
मेैंने तो कभी इस शब्द के बारे
कहा नहीं , उन्होंने बताया है , उनसे
ही पूछ कर आते।
बाद में इसी प्रसंग में स्वामीजी ने समझाया था , हमारे
सारे कार्य कलाप
बुद्धि से ही होते हेैं। हमारा
व्यवहारिक मन बुद्धि में ही रहतरा
हें हॉं अगर वर्तमान मे ंरहने
की अवस्था बढ़ती
हें उसी क्रिया के साथ जब मन की लवलीनता बढ़े लगती है।ें
तब हर कार्य
मे ंस्वाभाविक रुचि और एकाग्रता अपने आप आने लगती
हेैं। यह बलपूर्वक ध्यान लगाना नहींहै, जो ीाी आपकी
स्वाभाविक क्र्रिया चल रही है , उसी में ही मन को लगाए रखना
हें जहॉं शरीर
है , वहीं मन रहे।
हमारी सारी परंपरागत साधनाएॅं हमेशा
बहिर्मुखी ही बनाए
रखती हेैंं। हम बाहर ही बाहर
भटकते रहते हें बाहर वृत्त की परिधि के चक्कर
ही लगाते रहो।
उससे कुछ नहीं
होगा । असनी
मुकाम तो आपके
पास आपका केन्द्र है।
पर वास्तव में हमारे
अस्त्विव का केन्द्र कहा है , उसके
बारे में हमारा
अपना कोई अनुभव
नहीं। बड़-े ब्ड़े संत महात्मा ग्रंथों े ंके उदाहरण देदेते हें कि उसे आत्मा
कहते हें वेदांत सूत्र समझा देते
हेैं। सब एक तोतारटंत में लगे रहते हेैं।
मेरा अपना अनुभव रहा
, मेैंने साठ साल के सतत प्रयास से , प्रयागे करके जाना
, तब आपसे कहा।
हमारे अस्त्तिव का केन्द है , वह नाभि
के पास हेै।
मन की साधना
में गति नीचे
की ओर होती
है।ें मन मसितष्क से , हृदय फिर हृदय से नीचे
नभिा तक आकर पहुंचता हें नाभि
ही उसका मूल स्थान हे। वहॉं
आकर मन , अंतर्मन में विलीन हो जाता हें इसे यो ंसमझो, बाहर
भ्टाकता हुआ मन ही ंतब अंतर्मन जाता है।
ें स्वामीजी बता रहे थे , कि उन्होंने आत्मा
शद का प्रयोग नहीं किया। जो शकित् है वह एक
ही है , दो नहीं। इसी मन का दूसरा छोर ंअंतर्मन हें और अंतर्मन का अंतिम
छोर विराट हें जहॉं वही परम है , इसी शरीर में तब उसकी
अनुभूति होती है।
वर्तमान में रहने से मन और प्राण की दोनेा गतियॉं, जो जन्म के साथ अलग हो जाी है , वे समीप आने लगती हैं मन की गति चक्राकार है , जबकि
प्राण की गति ऊर्ध्वा कार हेै।
जब षिशु मो के गर्भी में होता
है तब वह श्वास कहॉं से लतेा है , आहार
कहॉं से लेता
हेैं, उसके अंग कैसे बनते हैं
, वह गर्भ नाल से मा की नाभि से ही जुड़ा रहता हेैं।
नाभि ही पहले बनती
हे। नाभि ही सृजन का केन्द्र हेैं। वहीं मन का मूल स्थान
है।
इसीलिए मन जब नीचे
उतरता है , तब शांति के साथ
, शक्ति भी मिलती
हे। इसी बात को ही मेंने
आपको बार- बार समझाया है , क्यों?
यही मेरा अनुभव
हेै। मे।ने उसे अंतर्मन कहा है।
आप उसे कुछ भी कहे ं, वह इसी मन का दूसरा छोर हें जो विराट के समीप है।ें
हॉं मन का पहला
मुकाम , मस्तिष्क ही है।ें
हमारी सारी शिक्षा पद्धति बुद्धि के विकाास पर ही टिकी हें । जहॉं बुद्धि गत विकास ही लक्ष्य है , वहॉं अहंकार भी होगा और विनाश भी।
बुद्धि से ही बड़े-
बड़े विकास कर सकते हैं पहले
इतने सुख के साधन कहॉं थे ,
पर अब मनुष्य की अपनी शांति
भी होगई है ,
उसकी शक्त् िभी।
मन नीचे प्राण की सहायता से ही उतरता हे। जब दोनेा गतियॉं पास आती हे। तब कुछ शकितयों का जगना जरूरी है। प्रेम , दया , करुणा , उदारता , हृदय की संपदा
यहॉं मिलती हे।
स्वामीजी कह रहे थे ,
पुराने कुछ संत यहॉं तक पहुंच
गए थे। उन संतों के अनुभव
हे। मनुष्यता यहीं विकसित होती है।
दूसरा मुकाम हृदय हे ,
वहॉं प्रेम हें मध्यकाल मे ंसंत
वहॉं तक पहुंव
गए थो। पर हृदय तक भी द्वैत बना रहेगा। पतंजलिजी का योग शास्त्र शरीर
के विकास के लिए जहॉं जरूरी
है वहीं वह भी बहिर्मुखी बनाए रखता हें ।
अनंतयात्रा में इसी बात को समणया है, निरर्थक शारीरिक दमन की क्रियाओ ंसे कोई लाभ नहीं
मिलता । साधना
मानसिक होती हेैं।
कुंभ के माध्यम से नीलकंठ के विवेक
जागण की बात समझाई है। पर हम विवेक का अर्थ बुद्धि ही मानते हें
बहुत पहले आपसे कहा था , विचार ही विकार हे। वर्तमान मे ंरहने से स्वाभाविक तरीके से विचार अपने आप कम होने लगते
हे। तब मन का अपने आप निर्विचारता में प्रवेष हो जाता हें जब जरूरत हो तब यह बहिर्मुखी बनेगा अन्यथा शांत
अपने ही मुकाम
पर रहेगा।
मन जब हृदय पर ठहरता है तब स्वाभाविक रूप से हमं अपने भीतर
सहज प्रेम की प्राप्ति होती हे। तभी सेवा कार्य
प्रारम्भ होता है। अन्यथा , सेवा भी प्रचार और अहंकार की सूचक बन जाती हेै। ं
हॉं , जबमन हृदय पर आता है , तब हमारे भीतर सम्मोहन की शक्ति बढ़ जाती हे। विचार
, संकल्प में ढलने
लगता हें पर यहीं पर आकर पतन का मार्ग
ीाी खुल जाता
हे।
इसीलिए हमारी परंपरा में बुद्ध और महावीर के आने के पहले , सभी संत गृहस्थ ही थे। एक मात्र? ब्रह्मचारी होने का उदाकरण शुकदेव जी का मिलता हे।
ऋषि याज्ञवल्क्य जी की तो दो- दो पत्नियॉं थीं। ये दो वृत्तियों की सूचक थीं।
एक कहानी को सभी संत सुनाते हें।
। उनकी ही एक कहानी मुझे किसी न ेसुनाई थी , और मन का मूल स्थान कहॉं है ,
पूछा था,। एक राजा किसी
संत से मिलने
गयां वहॉं उसकी
पत्नी ही घर पर थी , वह बाहर खेत में काम कर रहा थां
उसने राजा से कहा
, आप जाएॅं संतजी
को बतादे ं, मैं आया हूूंआप बतादें। वह जाते
समय बोली आप यहॉं नीचे दरी पर बिराज जाए
, उसने कहा आप बुला लाओ , मेैं
घूम रहा हूॅं।
उसने लौटते समय अपने
पति से पूछा
, राजा भी अजीब
है , मेैंने कहा बैठ जाओ , वह बैठानहीं , तब से बाहर ही घूम रहा हें
तब उस संत ने कहा , यह बैठता तो हें मेैंने इसे बैठे भी देखा है , पर उसके यहॉं बैठने
की जगह नहीं
हे?
इस कहानी को सबने
अपने- अपने तरीके
से कहा हेै।
स्वामीजी ने तब समझाया था। मन को इन्द्र कहा जाता
हें इन्द्र राजा
हें वह क्भी
एक इन्द्रिय के साथ , कभी दूसरी के साथ, भोग को पा्रप्त होता हेैं। विषय
और इनिद्रयों का संबंध मन से ही जुड़ता है।ें
अगर मन वहीं
हो तो , विषय
भी
होगे , और इन्द्रियॉं भी, पर संबंध टूटा
ही रहेगा।
वर्तमान में रहने से क्या होगा , क्रिया तो होगी , पर विचारक नहीं रहता
। निरंतर सोचते
रहने की आदत पर प्रतिबन्ध अपने आप लग जाता
है।ं
तब मन अपनी स्वाभाविक गति में प्राण
के सहयोग से नीचे उतर कर हृदय तक आता हेैं। यहीं।,भक्ति
पैदा होती हें यहीं प्रेम जिसके
लिए कहा जाता
हेैं। लव इज गॉड,पर वह भी
मन का असली
मुकाम नहीं। अगर यही विधि रही तो मन एक दिन अपने आप अपने मूल निवास
स्थान नाभि पर आकर ठहर जाता
हेैं। इसी अवस्था का नाम ही स्थितप्रज्ञता है।
प्रज्ञा ही अब स्थिर
होगई है।
बहुत पहले आपको अंग्रेजी का एक वाक्य
समझाया था , जीपदा
ंदक पज ूपसस
ींचचमद ए यही तब संीाव
होने लगता हेै।
तब मे।ने कुछ स्वमीजी से किए थे ,
प्रश्न ः आपने
कहा था कि विचार की स्थिति नाभि में है, क्या इसका अनुभव
संभव है ? क्या
हम वहां तक पहुंच सकते हैं ?
स्वामीजी ः बिल्कुल पता लग जाता है कि विचार वहीं से आ रहे हैं।
किस प्रकार लहरें
टकराती हैं, वहीं
से किस प्रकार से
ऊपर उठ जाती हैं,
वासनाएं इच्छाए, इन सबकी अनुभूति हो जाती
है।
यह पता लग जाता
है कि इस प्रकार की लहरें
आयी, यह भावना
उठी
है, अच्छी उठ रही है या बुरी।
भेद यहां नहीं
है, परन्तु व्यवहार में
अच्छा-बुरा भेद होता
हैं।
जैसे इन्दिरा जी की मृत्यु का समाचार सुनते ही, यह प्रकृति की लहर आकर टकराते ही, अगर हमारी भावना
है, श्रद्धा है तो जिसने यह कार्य किया, उसके
प्रति क्रोध की भावना उत्पन्न होती
है। यदि मन स्थिर है, मजबूत
है तो लहर टकराते हुए भी भावना नहीं उठती
है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। इसी प्रकार हर बात का, साधारणतः कोई बात सुनते
ही इसका रिएक्शन मन में उठता
रहता है, परन्तु एकदम रिएक्शन मालूम
पड़ता है कि वह क्रिया किस प्रकार हुई, हरेक
को नहीं होता।
तो जितना हम गहराई में पहुंच
जाते हैं तो गहराई में क्रियाएं किस प्रकार होती
हैं, इसकी अनुभूति होती है, और इसके बाद फिर भी यह आभास
हो सकता है कि यह लहर किस प्रकार आयी,
दूसरी किस प्रकार की आयेगी, तीसरी
किस प्रकार की आयेगी। इससे क्या
हो जाता है कि भविष्य में क्या घटनायें होने
वाली है- उसका
आशय इन लहरों
के टकराव से होने लग जाता
है।
कोई एकदम यह पूछे
कि भविष्य में क्या होगा। यह एकदम तो कहना
कठिन है क्योंकि प्रकृति बड़ी विचित्र है। क्योंकि कोई एकदम यह कह दे कि ऐसा हो जायेगा तो एकदम उसका उल्टा
होगा। उसकी बात बिगड़ जायेगी। प्रकृति किसी की बात रहने नहीं देती
है। परन्तु इस प्रकार यह ज्ञान
होता है कि प्रकृति की स्वयं
जो क्रिया होती
है, एक के बाद दूसरे तीसरे,
लहरें किस प्रकार उठ रही हैं,
उनका परिणाम क्या
होगा, यह मालूम
हो जाता है।
प्रश्न ः विचार, उसकी क्रिया मस्तिष्क में प्रतीत होती है- इस विचार को नाभि
में ले जाना
क्या संभव है !
स्वामीजी ः इसीलिए तो यह क्रिया है कि विचार धीरे-धीरे
जैसा कि
मन का स्वभाव है, जो कि विचित्र है, जैसे कि अपन किसी चीज को
पकड़ने लगते हैं तो वह भाग जाता
है। तो इसी तरह से वर्तमान में हरेक
व्यक्ति का मस्तिष्क ही काम कर रहा है। वहीं से विचार उठते हैं।
हम
सोचते हैं कि दिमाग
से सोच रहें
है, परन्तु वहीं
उसके विचारों का
अवलोकन करना प्रारम्भ करते हैं, क्या हो जाता है कि जो विचार करने
की जो वहां क्रिया चलती है, उससे
वो नीचे सरकता
जाता है। वहां
उसे
पकड़ने की कितनी कोशिश
करो, पकड़ में नहीं आता है, वह धीरे-धीरे
नीचे सरकता जाता है। जितना विचार रहित
मन होता जायेगा उतना ही
वह धीरे-धीरे नीचे
सरकते-सरकते अन्त
में जाकर नाभि
में विलीन हो
जायेगा। जब जाकर उस मन की ऊपरी
सतह पर जो हमारा वर्तमान मन
है, उसका प्रयास समाप्त हो जाता है।
जो यह लहरें टकराने का सवाल है, वह अन्तर्मन से टकराती हैं। और यहीं से फिर वो ऊपर उठते-उठते वापिस दिमाग
में आ जाती
हैं, और यहां
आकर फिर क्रियाएं प्रारम्भ हो जाती
हैं। तो फिर वह किस प्रकार नीचे खिसकता जाता
है, इसका भी अनुभव हो जाता
है।
प्रश्न ः इसकी पहचान कैसे
होती है ?
स्वामीजी ः करने से होती
है, जैसा मेरा
अनुभव है, वह मैं कह
सकता हूं, पर आपको
अभ्यास करना होगा।
साधन वही है। कोई अलग
साधन नहीं है। रास्ता एक ही है। मेन रोड़ एक ही है। दूसरा
रास्ता नही
है। मेन रोड को पहुंचने वाले बाई पास होंगे।
हां, बाह्य मन नीचे
आते-आते समाप्त हो जाता है, अन्तर्मन जो हमेशा
जागृत रहता है, उसकी अनुभूति हो जाती है कि वहां प्रकृति किस प्रकार कार्य करती
है। उसका ज्ञान
हो जायेगा कि सूक्ष्म से सूक्ष्म दर्शन जो यन्त्र होता है, उसको
बारीक से बारीक
चीज नजर आती है। वहां जाकर
सूक्ष्म से सूक्ष्म लहरें किस प्रकार कार्य करती हैं,
इसकी अनुभूति होती
है। इसी से भविष्य का आभास
हो जाता है।
जब यह अभ्यास प्रारम्भ हो जाता है तो वहीं से यह आभास होता
है कि यह घटना होने वाली
है तो अपने
को देखना चाहिए
कि प्रयोग करके
सचमुच यह घटना
होती है या नहीं। यदि होती
है तो फिर अपना विश्वास दृढ हो जाता है, फिर और प्रयास करो, इस प्रकार प्रयास करो तो और भविष्य की धटनाएं पता हो जाएंगी। इस प्रकार बढ़ते जाओ तो कई बातें आगे कीता हो सकती
हैं।
फिर यह स्थिति आती है कि आज से आगे साल,
दो साल, पांच
साल बाद की घटनाओं का आभास
होने लग जाता
है ? परन्तु फिर उनका
प्रचार हुआ, कहने
की आदत हो गई तो प्रकृति को मौका मिलेगा। यन्त्र पकड़कर नीचे
फैंकने का। अतः कहना भी हो तो संकेत में,
ताकि और कोई नहंी समझे।
प्रश्न ः क्या हम इस मार्ग पर कुछ पा लेंगे ?
स्वामीजी ः आत्मविश्वास नहीं है तो क्या होगा
? प्रयास नाम से शून्य
हो कुछ किया नहीं
तो क्या होगा
! मैंने कई बार कहा- जबान पर जो
नियमन चाहिए वह तो होता नही। दवाई
भी खाते जाओ,
परहेज भी नहीं
करो। दैनिक जीवन में कितनी गड़बड़ करते
हैं, पता नही।
कभी सोचा
है, पहले परहेज करो,
तब दवा फायदा
करेगी।
जो बातें गलत होती
है, जबान से होती हैं, जबान
का मन का- गहरा संबंध है। जब तक जीभ पर काबू नहीं
है, तब तक मन पर काबू
पाना कठिन है।
हम दिनभर जो बातें
करते हैं, उसके
बारे में सोचना
चाहिए। हम जो वादे करते हैं,
वो कितने पूरे
करते हैं, सोचा
है ?
इससे संकल्प शक्ति कम होती है। ज्यादा बोलने से शक्ति
क्षीण हो जाती
है। अनावश्यक बोलना, ज्यादा बोलना, इसमें
तारीफ भी दूसरे
की करनी होती
है, बुराई भी होती है, बुराई
ज्यादा होती है, सच्ची कम, झूंठी
ज्यादा होती है। इस प्रकार की जो बातें हैं,
वे बाधक हैं।
बाधाएं पहले हटानी
चाहिए।
प्रयास यही है, प्रयास करो।
मैंने जो बाते कही हैं, वे पहले
जानने का प्रयास करो। जो बातें
कही है, उन्हें गहराई से सोचो,
तभी आगे जाकर
कुछ हो सकेगा।
स्वपामीजीी आपकी बात समण्
में भी आई है , मे। पूरी तरह सहमत भी हूॅं , पर मार्ग पर कैसे चला जाए, ?
तब स्वामीजी ने कहा था , प्र्रयोग तो करो ं, किसी भी काय्र में मन तीन घंअे से अधिक लगाा रहता
है , और दूसरे कोई विचार बीच में हस्त्क्षेप नहीं करते तब मन का और मस्तिष्क का गठजोड़ ढीला
पड़ना प्रारम्भ्ज्ञ हो जता हे।
आपको नाद के बारे
में समझाया था ,
विचारों की संख्या कम होते ही नाद सुनाई पड़ जाता हे , उससे
कार्य करते समय सुनने में कोई बाधा नहीं।
बहुत पहले आपको ऋषि वाल्मीकि की कहानी
सुनाई थी , पर लोग तात्तपर्य भूल जाते हैं। मूल बात है , अगर मन किसी ीाी क्रिया में निरंतरता में रहे , अन्य
कोई चिारणा नहीं
रहे तब मन का नीचे उतरना
अपने आप प्रारम्भ हो जाता हे।
जो गलती इमारे यहॉं
बुद्ध और महावीर के बाद आगई उसमें ब्रह्मचर्य को अनावश्यक बल देदिया , उसका इस अध्यात्म से कोई लेना देना
नहीं। पतंजलि ने ीाी समाधि के लिए इस रूढ़ि
पर बल देदिया।
परिणामतः शरीर ही दो भागो ंमें बंट गया। ऊपर का हिस्स भगवान के पास , नीचे का अंग पाप का अंग। शरीर तो एक ही हे। रक्त प्रवाह अगर एक इंच शरीर
में रुक गया तो कैंसर हो जाएगा। इस रूढ़ि
के कारण द्वैत
हमेशा बना रहा । हम हमेशा
विभाजित मन के साथ ही रहे।
विधि एक ही है ,
हमेशा वर्तमान में ही रहो। इससे
स्वाभाकि रूप से श्वास की गति सही होने लगती
हें । जब भी कोई सवाल
पूदता है , मे। उससे यही कहता
हूॅं , मेरे पास आकर रहो ,वह समण् ही नहीं
पाता , तुमहारे हर साल का उत्तर मेरा
आचरण ही तो हें ।
वर्तमान मे ंरहने से जहॉं शारीरिक सवास्थ्य ठीक रहता है ,
वहीं मानसिक सवास्थ्य भी। बलपूर्वक प्राणायाम के अपने फायदे हे। पर यहॉं प्राण
की गति सामान्य और सहज रहती
हें
आज की दुनिया में हम श्वास लेना
ही ीाूल गएं श्वास के साथ मन को ले आओ या मन के साथ श्वास
को एक ही बात हें
पर अगर जहॉं भी हम हे। , हमारा
शरीर है , हमारा
मन भी वहीं
है , और हमारी श्वास सामान्यत्ः वहीं होगी। पर अनर्गल विचार हे। तो श्वास की गति बदल जाएगीं विकारों की हालत में श्वास छोटी हो जाती हे। षांत
मन मे ंष्वास गहरी होती जाती
हें। मन जब बहुत देर तक विचार रहित अवस्थाा मे ंरहता है तब श्वास अपने
आप नाभितक आ जाती हें ।
नाीिाके पास ही देा अंगुल , अगर आड़ी रखा जाएॅं वही हमारे अंतर्मप का स्थान हें वहीं
संसकार है वही वह विराट से जुड़ा हुआ , अनंत
प्रकंपनो को लेता
रहता हें हमारा
मन उन लहरो
ंसे प्रकंपित होकर पुनः मसितष्क से जुडत्रकर हमेंबहिर्मुखी बहाव में धकेलता रहता हें हम वही सब कर देते हैं जो करना नहीं
चाहते। हम कहते
हैं , प्रकृति हमसे करवा
लेती हें
यह विधि हर सामानय व्यकित के लिए उपयोगी हेै उसका
मन स्थिर होता
हें उसे षांति
भी मिलती हें और शकित भी। वह दीन- हीन नहीं बना रहता।
उसके पास अपनी
ही संकल्प शकित्
होती है।
भगवान बुद्ध की देषना
को जब विधि
बनादी गई तब विपश्यपना संसार से काटकर अलग से विधि बन गई, हम जीवन- जगत से कअते चले गएं।
भगवान ने गीता में कहा है-
माम अनुसमर युध्यय च, पर हम उनके
ही
भजन कीर्तन गाने
लग गएं क्रिया , मन और प्राण जब एकान्विति में होगेे
्रं भी अद्वैत है। वहीं शरीर
और शक्ति देोनो
की एकता अनुभव
में होगी। मन ही इस युति
में बाधक हें और अंतर्मुखी मन ही सहायक हें सही प्राण शकित
का प्रयोग मन को अंतर्मुखी बनाए रखने में सहायक
हेैं।
स्वामीजी ने तब समझाया था े, स्थिति प्रज्ञ की स्थिति जो तुम देखते
हो, वही है। यहां सब सहज है। इस स्थिति में अन्तर्मन से ही सब कर्म
व्यवहार चलता है। अन्तर्मन महान शक्तिशाली है। जिस प्रकार वहां से आने वाली लहरें निरन्तर टकराती रहती हैं।
अन्तर्मन से उठने
वाले संकल्प जिस किसी के लिए आते हैं, सीधे
वहां जाकर टकरा
जाते हैं। इस स्थिति में जिस किसी के लिए अन्मर्तन में जो संकल्प आता है, वह उस व्यक्ति के मन तक पहुंच जाता है।
चर्चा अरविन्दाश्रम की मदर को लेकर
हो रही थी। प्रसंग यह था कि विदेश मंे रहते हुए उन्हें यह प्रेरणा किस प्रकार से हुई,
उन्हें भारत आना है और भारत
आ करके अरविन्द से मिलना है और अरविन्द के आध्यात्मिक यन्त्र में एक महत्वपूर्ण साथी बनना है। स्वामीजी इसी प्रसंग को तो समझा रहे थे, उन्होंने इसी प्रसंग में निसर्गदत्त महाराज की पुस्तक के लव एंड गॉड पाठ की ओर संकेत किया
कि किस प्रकार से वह व्यक्ति उन तक पहुंच
गया। उनका कथन था कि जो इस प्रकार की विचारधारा के साथ जुड़े हुए हैं,
उन्हें वह संकल्प उनके हृदय तक पहुंच जाता है।
यह बात तब समझ में आती है, जब व्यक्ति अन्तर्मुखी होकर अहर्निश मन तक टकराने वाली
इन लहरों को अत्यधिक जागरुकता के साथ देख पाता
है। चूंकि जो स्थिति प्रज्ञ की स्थिति में हैं,
जो सहज है, जो आत्मज्ञानी है, उनके जीवन का, उनके शरीर का बस, एक यही उपयोग रह जाता
है कि वे बस, मार्ग-दर्शन
करें। वह भी एक सहचर होकर,
एक साथी होकर
इससे अधिक जो जागृत है, उनकी
कोई अर्थवेत्ता नही है।
यही जीवन की शक्ति
है , मन की इस शक्ति के बिना , न तो हम अपना सांसारिक जीवन सही ढंग से जी पाते
हैं , न आध्यात्मिक पथ ही। यहीं आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है , यहॉं मन अहर्निश शांत रहता
है। वह स्थितिप्रज्ञ होकर
ही जीवन में रहता हेै। और उसे उसकी ही संपदा प्रेम की प्राप्ति होती है।
यही सनातन धर्म की देशना हे। यही हिन्दू धर्म का वह मधुरम संदेश
है , जो धर्म की अपनी पहचान
है। धर्म अपने भीतर की अंतर्निहित चेतना का अहसास पाना है। यहॉं जिसे छूटना
है , वह अपने आप हो जाता
है। सब मेरे
ही हैं , मैं ही सब में हूॅं , यही भावना रह जाती है।
अपनी महान कृति अनंतयात्रा में पूज्य स्वामीजी ने यही समझाने का प्रयास किया है-
राजा शिखिध्वज की समस्या है , वह परंपरागत मार्ग
से आया है ,
हठयोग की साधनाएॅं उसने की हैं
, अपना ही राज्य
, सुंदर पत्नी , सबको
छोड़क वह एकांत
वन में कुटिया बनाकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आया है।
उसके पास अपनी मान्यताओं का दबाब हेै।
उसके पास पुस्तकीय ज्ञान की पराकाष्ठा है , पर अपना आत्मानुभव नहीं हेै।
नीलकंठ , का चित्त कोमल
है , शुद्ध है , वहॉं मात्र जिज्ञासा है। वह मुमुक्षा के पथ पर है। उसकी संभावना उसकी
लगन है।
स्वामीजी कहा करते थेे
, गुरु की तलाश
सभी को है ,
जो मिले और उनकी अतृप्त वासनाओं की पूर्ति में सहायक हो सके।
जबकि गुरु हर एक एक के भीतर है। वही उसका आत्म है। पर उसे उसका
पता नहीं। परंपरागत मार्ग पर यही समझाया गया है ,
जीवन में एक गुरु करलो , वे आपके दुख का हरण कर देंगे। तथाकथित गुरु यही कहते हैं।
दूूसरी बात वे कहते थे , यह प्रकृति का नियम है , जिसको
जिसकी तलाश होती
है , प्रकृति उसी आधार
पर उसका मार्गदर्शन करा देती है।
अनंतयात्रा का प्रारम्भ एक काल्पनिक कथा से हुआ है। एक बारह वर्षीय बालक
को अचानक मूर्च्छा आजाती है , वह अपनी उस अवस्था में एक विचित्र घटनाक्रम में अपने
आपको पाता है। उस आयु में बालक की योगवशिष्ठ को पढ़कर , उस पर विवेचना करने
की शक्ति प्राप्त थी। उसका सोच था , जीवन का उद्देश्य क्या है? हम कयों, पैदा
हुए हैं?
दूसरी ओर शिखिध्वज पात्र है , जो राजा है , परंपरागत मार्ग का अनुसरण कर सन्यासी होगया है।
आध्यात्मिक यात्रा का निश्चित मुकाम होता है ,
साधक की अपनी
योग्यता का विकास
होता है , उसके
अंतकरण की शुद्धि उसे प्राप्त हो जाती है। उसके
पहले की पहली
शर्त है जब उसकी अनावश्यक भटकने की आदत छूट जाती है। उसका
मन अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होता हे। तब उसकी लगन, उसका
घैर्य , और सतत अभ्यास उसे अपने
संकल्प के प्रति
दृढ़ता प्रदान करता
है।
परंपरागत साधनाएॅं मन और बुद्धि से आगे नहीं ले जातीं। वे मन को ही और अधिक
सक्रिय करती हैं।
शरीर को बहुत
अधिक कष्ट दिया
जाता हेै। यही माना गया कि यह शरीर ही आत्मज्ञान में बाधक
है।
जबकि वासतविकता में बाधक
मन ही हे। शरीर तो उसी आत्म का विस्ताार हें और आत्मा
ही
शरीर का ही केन्द्र हेैं, केन्द्र से ही परिधि निर्मित होती
हेै।
हमारी परंपरागत साधनाएॅं शरीर
को ही दुश्मन मानकर चल रही हैंे। इयीलिए शरीर
को ही पाप का घर मान लिया हे। यही द्वैत हमारे दुखों
का कारण हैे।
स्वामीजी ने अपने
”अनंतयात्रा“ साधन ग्रंथ
में इन्हीं प्रश्नों
का समाधान दिया
हैं।यह एक ब्रह्मनिश्ठ गुरु की अपनी
महान देशना हेै।
यह बात दूसरी
है , प्रचार और प्रसार से स्वामीजी बहुत दूर थे , वे जहॉं जिस जगह अपने विचार रख रहे थे , वहॉं
की अधिकांश जनता
अपनी ही सांप्रदायिक जड़ता में अविभूत थी।
वे हमें,
परिवार के साथ , वृन्दावन की यात्रा पर लेगए
थे , वे मंदिरों में बाहर ही रहे।
हम बिहारी जी के मंदिर में गए। फिर हम हम हरे राम हरे कृश्ण मंदिर
में गए , वहॉं
से आनंदमयी माता
के मंदिर में गए। शाम को हम शरणानंद जी के आश्रम में आगए थे। रात्रि विश्राम वही ंकिया।
सुबह स्वामी शरणानंदजी
के दो शिष्य
जो उनके आश्रम
को संभालते है। मिलने आए , बातचीत हुई।
वे स्वामीजी से बोले
, लोग आते तो हैंे। पर युवा लोग नहीं
आते। , हम भी सत्संग कार्यक्रम आयोजित पहले की तरह करते हैं।ें जयपुर
में भी हमारा
आश्रम हेैं। पर अब लोगों में उतनी रुचि नहीं
रही। स्वामीजी के बाद देवकीजी थी। तब भी लोग जुड़े हुए थे ,
अब बहुत कम होते जारहे
हैं।
उन्होंने स्वामीजी की ओर देखा, स्वामीजी बोले , विचार अगर पुस्तकों में ही रह गए तब यही होगा , गुरु
का कार्य शिष्य
ही कर सकता
है , जिसके अंतस में स्वयं गुरुतत्व जग गया हों एक प्रज्वलित दीपक ही बाद में हजारों दीपक जला देगा।
वर्तमान में रहना ही वह अमृत पथ है जो हम सब के लिए श्रेयस्कर है , यह जाति , संप्रदाय विहीन आधुनिक मनुष्य के निर्माण का मूल मंत्र हैे।
आप जहॉं भी हैं , जिस भी सिथति में हैं
, वहीं से उसी क्रिया केसाथवर्तमान में रहते हुए अपनी
अंतर्निहित उर्जा का संधारण कर सकते
हे। क्या इसमें
किसी को आपत्ति होगी? एक समृद्ध सृजनशीन मन और शरीर पाना हर प्राणी कामौलिक अधिकार हे। यह पाना
, यहाॉं रहना हम सबका सवभाविक अधिकार है।
नरेन्द्र नाथ
‘
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