आंतरिक सत्संग
नरेन्द्र नाथ
ौ नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी
प्ण्ैण्ठण्एछ 978.81.903381.0.4
आनंद प्रकाशन
1ल1 दादा बाड़ी कोटा
324009
म्उंपस दंतमदकतंदंजीबींजनतअमकप/हउंपसण्बवउ
प्रस्तुति
ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी श्री रामेश्वराश्रम जी महाराज दिनांक 26 फरवरी, 2000 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 89 वर्ष की अवस्था में महानिर्वाण को प्राप्त हो गये।
28 जनवरी, 1911 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में रेडी गांव में आपका जन्म हुआ था। बचपन से सतत् आत्मानुंसधान में आप लगे रहे। सन् 1952 में आपने राजस्थान के सुदूर बकानी ग्राम में ‘गुरुकुल’ की स्थापना की थी। लगभग 25 वर्ष तक संन्यास लेने के बाद भी आप स्वतः शिक्षा कार्य में लगे रहे। सन् 1972 में संस्था को सरकार को सौंप दिया, आज जहां उच्च माध्यमिक विद्यालय कार्यरत है।
आप एक परिव्राजक की तरह आम-जन के भीतर अध्यात्म की वैज्ञज्ञ निक प्रक्रिया को जीपन- जगत से जोड़ कर एक मार्गदर्शक की तरह संदेश वाहक की भूमिका का सहज निर्वहन करते रहे।
स्न् 1995 में शिकागो अमेरिका से प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ बसावडा स्वामीजी से अपनी एक अमरिकी शिष्या के साथ गुरुकुल बकानी आए थे , उसके कुछ महीने बाद केलीफोर्निया से अमरीकी महिला केरोल नागले जो भारत में जाग्रत पुरुषों पर शोध कार्य कर रहीं थीं। वे दक्षिण में सत्य श्री सांईं बाबा , केरल से अम्मा जी से मिलकर गुरुकुल आईं थीं ।
स्वामीजी के पास न कोई विधिवत आश्रम ही था , न कोई विशाल प्रबंधन , उनकी कुटिया और एक रसोई , पास में एक अतिथियों के लिए कमरा। वे वहॉं तीन दिन रुकीं।
वे अवाक थीं , यह देखकर कैसे एक संत बिना सुचिधाओं के े इस प्रकार रह रहा हेै , और हमेशा वहॉं आने वालों का तांता भी लगा रहता हेै।
निरंतर चिंतनरत स्वामी जी ‘सहज साधना’ का अमृत संदेश साधारण जन तक पहुंचाते रहे। न तो विधिवत कोई आश्रम वहां था न ही कहीं विशिष्ट परंपरा के निर्वाह की प्रक्रिया थी, एक साधारण सी कुटिया, और झोले के साथ स्वामीजी अंचल के सामान्य अकिंचन घर तक आध्यात्मिक का संदेश देते रहे। न अमीर न गरीब किसी प्रकार का कोई भेद वहां नहीं था। सभी के लिए कुटिया का द्वार सदा खुला रहता था। अपनी अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति सम्पदा के बावजूद स्वामी सरल व सहज ही रहे।उनका यही आप्त वचन रहा , जब मैंने पायाहै, तुम भी पा सकते हो , जो मेैंने जाना है , तुम भी जान सकते हो। मेै तो बस गवाह हूूं , मार्ग भी कहना गलत है, छोटी सी बात है , निरंतर वर्तमान में रहने का प्रयास करो। तुम्हारा चिन्तन ही बाधा है। जाग्रत पुरुष ही उनकी अपनी पहचान थी।
मेैं 1972 में आपके सानिध्य में आया था , आपके निरन्तर सानिध्य में कुछ प्रश्न उभरते रहे, उन्हें
निरंतर लिपिबद्ध करता रहा । पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित हुईं।
कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न जो हमेशा उठते रहते हैं , उन्हें , इस पुस्तक के माध्यम से कि एक वैज्ञानिक की आत्म विज्ञान की खोजों को सुधी साधको ंसे परिचय कराया जाए , प्रेषित है।
नरेन्द्र नाथ
अनुक्रम
1. असत का स्वरूप
2 करना और न करना
3साधन की सार्थकता
4सुख- संतोष का रहस्य
5.जीवन तत्व
6सत्संग
7.कर्मयोग का रहस्य
8प्रेम
9आखिर साध्ना नही क्यों?
10 . अपने प्रयास की सार्थकता
11क्या यह पथ व्यवहारिक भी है?
12 हमारी आज की समस्याएॅं और धर्म
13.वर्तमान में रहना
14 वर्तमान की संपदा
1 असत का स्वरूप
हम जिस दुनिया में रहते हैं, उसे असत कहते हैं, कि वह निरंतर बदल रही हे। परन्तु उस की व्यावहारिक सत्ता को मानते हैं। इस दुनिया में हमारे रहने का तरीका इस प्रकार का है, कि हम जानते हैं, बहुत कुछ हमसे से ऐसा हो जाता है, जो हम नहीं चाहते हैं। जो सही हो जाता है, उस से हम प्रसन्न हो जाते हैं, जो गलत हो जाता है, उस से भीतर ही भीतर खिन्न तो होते हैं, पर अपने आप को न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं, दुनिया ही गलत कर रही है, हम ने किया तो कौन-सा गलत हो गया है। हम हमेशा अपने आपको बचाने का प्रयास करते मिलते हैं।यहीवह बुद्धि वातुर्य है , जो हमारे दुखेंा का कारण हेै।
एक ही प्राकृतिक नियम है , जिसे हम नहीं मानते , न कोई जानने की जिज्ञासा है , हम अंधकार से ही इस जगत में आते हैं और अंधकार में ही चले जाते हेैंं । यह अंधकार ही काल हेैं जिसमें हम रहना वसंद करते हे। काल की ही पहचान कल शब्द से होती हे। जो बीत गया वह कल में गया , जो आएगा कल से ही आएगा। और कल को ही अपना स्वतंत्र अस्त्वि ही नहीं है और सच यही है कि हम आज में भी रहना भूल गए। मन की तीनो शक्तियॉं स्मृति , विचारणा , कलपना हमेशा हमें अपने वर्तमान से ही काटती रहती हे। वर्तमान के हर अमूल्य क्षण में भी हम चिन्तन में ही रहते हे। हर अनुभव को ,वस्तु को बस स्मृति में नामांकित ही करते रहते हैं।
तभी हमारे सामने धर्म का आकर्षण आता है, हम मानते हैं कि जो अच्छा नहीं मिला है, हमारी इच्छानुसार नहीं हुआ है, वह किसी बाहरी सहायता से पूरा हो जाएगा। हम इस सहायता को पाने के लिए किसी गुरु की तलाश में जाते हैं, तीर्थ-यात्रा करते हैं, व्रत-उपवास करते हैं। टेलीवीजन पर इस प्रकार के उपाय बताने वालों की भीड़ जमा हो गई है। कर्मकांड का आधार भी यही है। हम जो भी कुछ कर रहे है, उसके प्रति हमारा अविश्वास बना रहता है। हम कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।
यह सही है कि धर्म के चार पड़ाव हेैं, सिद्धांत , पुराण , कर्मकांड और अध्यात्म। सिद्धांत तो सबसे पहले आते हैं , बाद में कथाएॅं बन जाती हे। फिर उनके आधार पर कर्मकांड विकसित हो जाता हेै , अधिकांश दुनिया कर्मकांड तक ही सीमित रह जाती हैे। आध्यात्मिकता अपने स्वरूप से परिचित होने की प्रयोगशाला है।
जहॉं भी हम अध्यात्म के नाम पर आकर्षित होते हैंे। वहॉं हमें बलपूर्वक नए साधन अपनाने को कहा जाता है। जिसे तप की संज्ञा भी दी जाती है। मन का सहारा लेना उपयुक्त समझा जाता है। कठोर व्रत, अपनाए जाते हैं। शरीर को पाप का घर मानते हुए कहीं- कहीं उसे कठोर सजा दी जाती है। तीर्थ यात्रा का प्रलोभन बना रहता है, उससे कोई लाभ मिल जाएगा।
ये सभी उपाय क्या वास्तव में साधन हैं?
इस प्रश्न पर विचार किया जाना उचित है।
क्या हम ने जिस ‘साधन’ को अपनाया है, वह कारगर है भी या नहीं? सब से बड़ी गलती यही हो रही है, हम जिसे साधन कहते हैं, या हमें ‘साधना’ के नाम पर समझाया जाता है, वह वास्तव में ‘असाधन’ ही रह जाता है। क्यों कि यहां हम बल पूर्वक जिस क्रियात्मक साधन को लेते हैं, वह हमारे द्वारा हो चुके या हो रहे, असाधन को दबाने या हटाने के लिए रह जाता है। हम अपने विकारों को उन की जड़ से ही प्रहार कर हटाने के स्थान पर उन्हें दबाने में लग जाते हैं। चालीस साल से साधन कर रहे लोगों में उनके विकार यथावत बने रहते हैं, उनमें कोई परिवर्तन नहीं आता, वृद्धावस्था में तथाकथित संतों के चेहरे पर यह थकान और निराशा स्पष्ट दिखाई पड़ती है। ”गए थे हरि भजन को औटन लगे कपास“।
इस का मुख्य कारण हमारे भीतर ‘सत’ की सही पहचान का नहीं होना है। दो बातें हैं, या तो वह है? या नहीं है?हम जिसे जानते हैं, वह यह जगत है, यह निरन्तर परिवर्तित हो रहा है। यहां जो भी है, वह शाश्वत नहीं है। सुख और दुख, रात और दिन की तरह निरन्तर आते-जाते हैं। तब फिर इस से परे ‘सत’ क्या है? जो हमेशा रहे, पर उसे हम जानते ही नहीं हैं। जानना, हमारी इन्द्रियगत क्षमता, तथा बुद्धि पर निर्भर करता है। बुद्धि की भी सीमा है, जो निरन्तर बदल रहा है, उस की पहचान तो यह बुद्धि कर लेती है। पर जो शाश्वत है, उसे बुद्धि नहीं जान सकती है। वह बु(ि से परे है।
‘सत’ जिसे ”वह“ कहा जाता है क्या उसे पाया भी जा सकता है?
सत और असत दोनों शब्द महत्वपूर्ण हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में दोनों शब्दों के अपने-अपने अर्थ हैं।
हर व्यक्ति, उस के बनाए हुए संसार से पूरी तरह परिचित है। वह अपने सामर्थ्य को जानता है। अपनी कामनाओं को पहचानता है। उस की कामनाएं ही उस का जगत बनाती हैं।
सत्तू वाली कहानी सुनाई जाती है, कथा का नायक एक हांडी में सत्तू ले आया था, वह सपना देखता है कि सत्तू को बेचने से उसे मुनाफा हुआ, उस ने और सत्तू खरीदा, उसे बेचा, और मुनाफा हुआ। वह बड़ा दुकानदार बन गया, उस की शादी हो गई, तभी उस का बेटा आया, वह उस सके किसी बात से नाराज हो गया, उस ने लात मार दी, वह सत्तू की हांडी फूट गई, टूटी हुई हांडी के साथ उस के सपने भी बिखर गए।
यही अपना ”असत“ है। जो है नहीं ,परन्तु भासता. है। एक सपना बन्द आंखों से देखा जाता है, दूसरा खुली आंखों से देखा जाता है। दोनों ही सपने हैं। एक प्रतिभासित सत्य है, जो काल्पनिक है। पर सच सा लगता हैं दूसरा निरन्तर परिवर्तनशील है। आध्यात्मिक दुनिया में यह ‘असत’ कहा जाता है। जो है तो सही पर निरन्तर परिवर्तनशील है।भगवान बुद्ध के क्षणिकवाद, अनित्यवाद का यही आधार है, सब जो प्रतीत हो रहा है, वह निरन्तर परिवर्तन शील है। यही ”आलय“ सिद्धांत है। अनित्य निरन्तर प्रवाहित लहरों का एक जोड़ है, यहां सत की कोई सत्ता नहीं है। परंतु वे कुछ अव्याकृत प्रश्नों पर चुप रह गए।
पर हम इसे सच मानते हैं। हम सांसारिक हैं। पर हमारी आध्यात्मिक यात्रा इसे मात्र प्रपंच ही समझाती है। भागो, पलायन, वैराग्य ,तप ,यम, नियम हमें बाहर से आकर्षित करते हैं, क्या उचित है, क्या अनुचित हम जीवन भर कोई निर्णय नहीं कर पाते हैं।
हम इस असत को असत मान लेने पर भी इस के साथ निरन्तर चिपके रहते हैं। हम कहते तो हैं, ‘सत्संग में जा रहे हैं’ पर हमेशा अपने सुने हुए, जाने हुए असत से ही चिपके रहते हैं। जो सिखाता है, वह और जो सीखने जारहा है,वह दोनो ही जिसे असत कहा जाता है, उससे चिपके रहते हैं।
यही हमारा दोष है, जो सारे दुखों का कारण है। हम जानते हैं यह असत है, निरन्तर परिवर्तनशील है, पर उसे ही सत मान कर, शाश्वत मान कर, उसी के संग में डूबे रहते हैं।
कहते हैं, ‘यह हम से छूटता नहीं है’।
यही हमारा वह दोष है, जो हमारे वास्तविक दुख का कारण है। इस दोष को दूसरा कौन मिटा सकता है, हम गुरु की तलाश करते हैं कि वे हमें स्वाधीनता दिला देंगे, छुटकारा दिला देंगे।
अरे, इस बन्धन केा तो हम ने ही बांधा है। अपने बनाए दोष को दूसरा कैसे हटाएगा?
जो जाल हम ने बुना है, उसे हम ही काट सकते हैं।
सत है या नहीं, यह बुद्धि का विषय नही है। वह कैसा है? यह जानना उतना जस्री नहीं है, जितना कि यह जाना कि असत से गहराई से चिपकाव, यह हमारा अपना ही बुना हुआ दोष है, जिसे हम ही दूर कर सकते हैं।
जिसे हम ने जाना है, वह व्यर्थ है, तब उसे छोड़ने में क्या दिक्कत है? क्या कठिनाई है? पर यही नहीं होता है। हम दूसरों को दोष देते हैं। दूसरों पर जिम्मेदारी सौंपते हैं।हजम कहते हैं संसार दुखमय हेै हम कहते हैं हम तो आनंद ही चाहते हे। फिर दुख क्यो ंआ जाता है?
हम जानते हैं , क्रोध बुरी बात है , वह बस उपरी सतह पर ही स्वीकृत हो पाता है। भीतर हम अपने क्रोध को बुद्धिचाातुर्य से आदर देकर अपनी छाती से चिपकाए रखते हेैं। हमारे विकार ही हमारे विचार ही हेैं, पर हम स्वयं छोड़ना नहीं चाहते । फिर हमारी अीमारी का इलाज कहॉं संभव होगा?
जब तक राग है, यह चिपका रहेगा। जब तक दोष दर्शन है, यह पर निंदा का रस पीकर और मजबूत होता रहेगा।
त्याग की पहली शर्त, उस की समझ तथा यह व्यर्थ है, इस बोध का गहराई में जानना आवश्यक है। यह कोई सूचना नहीं रहे, आपका अपना अनुभव बन जाए , यही ज्ञान का पहला कदम है।
अब आप पता करें, कि यह व्यर्थ है, यह तो परिवर्तनशील है, यह किस ने बनाया है, यही तो हमारा अनुभव बना है, जो हम ने जाना है। यह जिस उपकरण से हम ने जाना है, वही महत्वपूर्ण है। वही हमारा विवेक है।
उसी का आदर होते ही, हम जिसे असत कह रहे हैं, जिसे व्यर्थ मान रहे हैं, हम उस का त्याग कर सकते हैं?
पर त्याग करना, वीतरागता को प्राप्त होना ही हमारा लक्ष्य है? दो हजार साल से यही समझाया जा रहा है। छोड़ो, भागो, सन्यासी बनो, परन्तु हजार साल की गुलामी और सामाजिक अधःपतन ने यही समझाया है कि न तो बाहर कुछ बदला है, नहीं भीतर मौलिक परिवर्तन हो पाया, परन्तु स्वयं में खिन्नता और दीनता हीे मिल पाई।
तब विचार करें क्या ”असत से असहयोग ही सत के प्रवेश का द्वार है?“
या जीवन में असत का सदुपयोगही ”सत“ के साथ लाने में सहायक है।
असत के सदुपयोग पर ही जीवन में प्रयत्न और पुरुषार्थ दोनो ही सधते है।।
इस्लामी दर्शन और साधना के जिस आधार पर सूफी मत और भारतीय संत मत का विकास हुआ, उसका आधार असत का सदुपयोग ही है।
इस असत का छूटना, और सत में प्रवेश एक साथ होता है। असत , जो निरंतर बदल रहा है, यह जो जीवन है, यह जो जगत है, आप इसकी अवहेलना कर, असहयोग कर , त्याग कर, कहां जाएंगे? यह शरीर आपका नहीं है, आपको मिला है, इससे जुड़ी सब चीजें आपको मिली है, जो आपका है, उसे आप त्याग सकते हैं। आपका अपना क्या है? पता करें। हाँ, जो मिला है, उसका सदुपयोग , जहाँ सामर्थ्य के सदुपयोग से आपको जोड़ता है, वहीं जीवन और जगत के प्रति आपके दृष्टिकोण को बदलते हुए आपको ”सत“ के समीप ले आता है।
”सत“, जो सत्ता है। जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
पहली बात अपनी समझ का आदर कर व्यर्थ के परंपरागत बोझ को हटाकर अपने विवेक का आदर कर, अपना मार्ग सवयं तलाश करना है।
प्रातः उजाले का आना तथा अंधेरे का जाना एक साथ होता है।
स्वामी जी कहा करते थे, सांसारिक जीवन में सफलता प्रयत्न से मिलती है। यहां प्रयत्न कारगर है। तथा पुरुषार्थ तो ”सत“ का संग होना है। क्यों कि जितना ”असत“ का संग छूटता जाता है, उतना ही सत का संग होना शुरू हो जाता है। यहाँ, छोड़ने और छूटने पर उतना बल नहीं , जितना अपने प्राप्त विवेक का आदर होना है।
2.करना और न करना
अवलोकन की क्रिया बचपन में सिखाई गई थी।
मन के द्वारा मन की विचारणा को देखते रहो, जो दिख रहा है, उस में कोई रुचि मत लो, बस तटस्थता पूर्वक उस अवलोकन करते रहो, धीरे-धीरे आने वाले विचारों की संख्या कम होती चली जाएगी।
एक जगह जाना हुआ, वे बता रहे थे, किसी नाम का जप करो, तुम ने भगवान को देखा नहीं है, जिन्हों ने उन्हें जाना है, उन के रूप पर ध्यान करो, मन को वहां एकाग्र करो।
वर्षों तप किया, वर्षों यह अवलोकन की क्रिया दोहराई। पर जाना जो छूटना है, वह छूटता ही नहीं है। वह तो रसीदी टिकिट की तरह चिपक गया है।
श्वास पर जब मन एकाग्र रहता है, तब कुछ देर के लिए विचारणा स्थगित हो जाती है। अन्यथा फिर वह वेग और जोर से आता है।
उस दिन जाना, क्रोध में तरंगित हो गया था, होश को खो बैठा, तब अचानक वह जागा और बोला, ‘क्या इतना क्रोध करना उचित है?’, ‘क्या तुम अपनी इस अवस्था को प्यार करते हो?’, ‘क्या इसी में ही रहना चाहते हो?’
हमारा सारा साधना क्रम हमें जिस काल्पनिक व्यामोह में ले जारहा है, वहॉं मात्र भय ही है।
क्रोध भी प्रकृति का वरदान है, और अभिशाप भी हैं।
महत्वपूर्ण है, विवेक और अभय।
पुरानी कहानी है,श्री राम , पत्नी के हरण के बाद सागर से मार्ग चाह रहे थे। सागर मार्ग दे नहीं रहा था। निराला जी ने कविता लिखी है, ”राम की शक्ति पूजा,“ जहाँ वे देवी की पूजा कर रहे हैं, पर मार्ग सागर तभी देता है, जब सहनशीलता के पार हो जाने पर वे भी क्रोधित हो जाते हैं।
पर न जाने क्यों दो हजार साल की हमारी आध्यात्मिक साधनाओं को जोड़ पूरं समाज को प्रतिकार के विरुद्ध खड़ा करना ही रहा है। तितिक्षा का अर्थ सामना करना है के स्थान पर सहन करना ही रह गया , हम यही भूल गए गीता का उपदेश युद्ध के मैदान में दिया गया था। सामना करने और सहन करने में बड़ा भेद हे। एक प्रक्रिया अभय सौंपती हे। एक कापुरुषता ।
महाभारत में इस अहिंसा के मूल्य के बारे में बहुत कुछ कहा है। अहिंसा भी सार्वभौमिक मूल्य नहीं है।
सामने ही स्त्री को शोषण हो रहा है, उसे अपमानित किया जारहा है, क्या वहाँ आपका शांत रहना, नीति गत है। क्या दृष्टा बनकर इस दुष्कर्म को असत कहकर , परिवर्तनशील मानकर शांत बैठे रहेंगे?
हमारी हजार वर्ष की गुलामी का यही कारण रहा है।
शक्ति का मार्ग, सत्ता का मार्ग क्या भीख मांगने से ही प्राप्त होता है?
भगवान बुद्ध महापुरुष थे , उनका मार्ग प्रेम और करुणा का मार्ग था। पर उनके जाने के बाद उनके विचारो ंके आधार पर पुराण ही लिखे गए ,उनके अनुयायी घोर हिंसा में डूब गए। इन कहानियो ंके आधार पर वहॉं भी कर्मकांड ही विकसित होगया। जो मूल सिद्धांत था वह बाद में ध्यान जिसे ज़ेन साधना कहा गया है , वहॉं विकसित हुआ। कर्मकांड के बाद से पूरा समाज याचक ही तो बन गया है। जो समाज भिक्षा पर पलता है, वह कभी शक्तिशाली नहीं हो सकता है।
जाना, हम जिस का भी चिन्तन करते हैं, उसी के गुलाम हो जाते हैं, वही हमें कठपुतलियों की तरह नचाता है।जब अन्न से ही मन बनता है, तब दूसरों का अन्न क्यों मुफ्त में खया जाए?
‘मैं नाच्यो बहुत गोपाला....’ कौन नचा रहा था?
जिस ने यह बताया, जिस ने यह दिखाया, वही तो वास्तविक गुरु है, पर उसका आदर नहीं था। वह तो सब सोते हैं तब भी जागता रहता है। उसी ने कहा, ‘यह असत है, जो निरन्तर बदल रहा है, तुम एक छाया के पीछे कब तक दौड़ते रहोगे?’
बस, एक बार छोड़ दो, यहां तुम्हारा छोड़ना घर परिवार को छोड़ कर हिमालय जाना नहीं है। जो योगी हैं, वे तो असत में ही तो निरन्तर रह रहे हैं, लोभ और मोह में डूब गए हैं।
तुम उन की नहीं, खुद की बात सुनो। जो तुम्हें यह बताता है कि यही असत है, उस की ही बात मान कर तुम सत के समीप आ सकते हो। यहीं सत्संग शुरू होता है। जो निरंतर सोचता रहता हे। मन को निरंतर चलायमान रखता है , यही तो मूढ़ता हैे। गीता में कहा गया था , या निशा सर्वभूतानां जाग्रति संयमी , भगवाल बुद्ध ने कहा , होश मे ंरहना , भगवान महावीर ने कहा , अप्रमाद मे ंरहना। मन का भटकाव ही बेहोशी हे। यह हीमूढ़ता हेै। स्वामीजी कहते थे , निरंतर वर्तमान मे ंरहना , यही ध्यान है , यह सिखाया नहीं जासकता , यह तो आपकी स्वाभाविक अवस्था है जिसे भूल आए हैं।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ‘मैं किसी को ध्यान नहीं सिखाता, लोग आते हैं, कहते हैं, सत्संग कराएं., यह भी क्या सिखाने. की बात है?’
जब असत का आकर्षण गिरना शुरू होता है, तब साधन की प्राप्ति होती है, तब सत्संग में प्रवेश होता है।
असत शब्द भी संज्ञा मात्र है, अनेक शब्द जो ‘वह’ है उस के लिए कहे जाते हैं। उस दिन एक योग ऋषि प्रश्न कर रहे थे, ‘ क्या आत्मा भी अनेक प्रकार की होती है? चींटी की छोटी, हाथी की बड़ी होती है?’ एक दूसरे विचारक आए थे, बोले, ‘मैं तो नास्तिक हूं, आत्मा परमात्मा सब बकवास है।’
क्या आप विचार से विचारणा को कम कर सकते हैं?
क्या आप विषय से स्मृतियों के बोझ को हटा सकते हैं?
क्या आप विचार से अवधारणा के बोझ को हटा सकते हैं?
हम सभी अपने आप को विचारक कहते हैं। विचार का आधार तर्क है। यह हमारा बुद्धि जन्य ज्ञान है। इन्द्रिय जन्य ज्ञान का आधार विज्ञान है। विज्ञान वही है जिसे हम साबित कर सकते हैं।
पर जो ‘सत’ है सत जो अविनाशी है, जिस की सत्ता है, क्या हम उसे विचार से ढूंढ सकते हैं?
दर्शन की अपनी सीमा है, अद्वैत दर्शन भी बुद्धिगत प्रयत्न है। योग और सांख्य को भी दर्शन की सीमा में माना है। ये पगडण्डियां हैं। जहां अन्त में रास्ता अगोचर में विलीन हो जाता है।
कृष्णामूर्ति जी कह गए, ‘पाथ लैस लैंड,महर्षि अरविंद ने कहा, ‘वहां चैत्य पुरुष का उन्मीलन है।’
हां, मीरा बाई ने ठोक-पीट कर कहा, ‘पायो जी मैं ने राम-रतन धन पायो’
यह असत छूट नहीं पाया है, गिर नहीं पाता है, सत की किरण . जब उतरती है, वही अपनी रोशनी में बताती है, यह असत है। असत की पहचान यही है, कि जो निरंतर बदल रहा है, उसका आकर्षण यथावत बना हुआ है। उससे चिपकाव विचारणा केे स्तर पर रहता है। स्मृृृृृृतियां उसे संजोकर रखती हैं।
जीवन में विवेक का आदर होते ही, अपनी अवहेलना पा कर असत हटने लग जाता है। तभी उस विवेक की रोशनी में असत का अंधेरा हटने लग जाता है। इसे यों समझा जाए, सहयोग आप कर नहीं सकते , करेंगे तो आप गीता के अर्जुन की तरह क्लीवता के दोष से ग्रसित हो जाएंगे।
पूज्य स्वामी जी ने कहा है, ‘स्मृति पाप है’, तब यह बात समझ में नहीं आती थी। स्मृतियां नहीं रहेंगी, तब हम कहां रहेंगे? स्मृतियां बोझ की तरह लदी रहती हैं। जो हो गया, सो हो गया, उसे भूल जाओ, प्रकृति भी पुराने पत्तों को गिरा कर, उड़ा कर ले जाती है। पर हम हर पुराने से चिपटे रहते हैं। जो बीत गया, सो बीत गया, उसे जाने दो। तथ्यात्मक समृति तो रहेगी, पर यहां मनोवैज्ञनिक स्मृति को हटाना है। जो वर्तमान में है , वही तो युवा है वहीं सृजनशीलता ही रहती हेै।
जो गुजर गया वह समय लौट- लौट कर नहीं आता है , हम वर्तमान में उसी क्षण मे ंएक पल नहीं रह पाते , यहॉं तक कि कभी चाय भी बिना सोचे हुए नहीं पी पाते। कर्मसंलग्नता ही वर्तमान में रहने की पहली सीढ़ी है।
पर स्मृति के साथ, रहती है अवधारणा। हम जो दूसरे की आकृति अपने मन में बना कर रखते हैं, उसी से ही सम्बन्धित होते हैं। हर व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति के बारे में हमारे मन में पूर्वाग्रह है, वही हमारा अनुभावात्मक पूंजी है। जिसे हम बैंक में रखे लॉकर की तरह सुरक्षित रखते हैं।यह अवधारणा हटाए नहीं हटती। हमारी प्रसन्नता को यह सोख लेती है उस व्यकित का नाम आते ही , उस घटना की स्मृति आते ही हमार हृदय अमंगलकारी लहरो ंमें डूब जाता है । हम सोचते बाद में हैं , पर पहले कहा- अनकहा सब मुंह से निकल जाता है।
और इन दोनों के सहयोग से हमारा मन निरन्तर अनावश्यक विचारणाओं के दबाव में रहता है। एक पल भी हमारा मन नियन्त्रित नहीं हो पाता।
कभी गोरखनाथ जी ने कहा था-
‘सदा सुचेत रहे दिन-रात, सो दरवेश अलख की जात।’
जो सत है, वही अलख है, अलक्ष्य. है, अविनाशी है, जो सत्संगी है, वह उसी के परिवार का है, जब हम उस के साथ जुड़ जाते हैं, तब वह हमारा चौबीस घण्टे हमारा ध्यान रखता है।
पर हमारा कर्तव्य है, हमारा साधन हमारे साथ रहे, और साधन है, निरन्तर अपने ऊपर निगाह रहे, यह मार्ग, ‘.क्षुरस्य धारा’ का है, बहुत ही तीखा है, यहां जरा-सी भी फिसलन नहीं रहे, हम असत के जाल में न फंसें।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ‘निरन्तर वर्तमान में रहो!’
स्वामीजी समझाते थे कि , मन बहुत शक्तिशाली है , एक तलवार की तरह है , पर विजेता के लिए तलवार के साथ ढाल का भी होना आवश्यक हेै। ढाल आपकी विवकेे शक्ति है। निरंतर वर्तमान मे ंरहने से , जिसे निरंतर होश में रहना भी कहते हैं ,अब जिसे छूटना है , वह अपने आप होने लगता हे। आपकी बुद्धि अपने आप शुद्ध होने लगती हे। आपको विवके की शक्ति प्राप्त होती हेै।
निर्विचारता ही निर्विकारता है। विचार ही विकार है। तब वर्तमान में रहने का यही अर्थ जाना था कि जो भी कार्य हाथ में हो, मन वहां रहे, स्वामी जी कहते थे, ‘मन पूर्ण रूपेण वहीं रहे, किंचित मात्र भी विपरीत न हो।’ वे सरल से सरल भाषा का प्रयोग करते रहे। पर उतना ही हम सार-तत्व से दूर जाते रहे।
मन पूर्ण रूपेण, दैनिक जीवन के जब हर कार्य में रहता है, उस अवस्था में. मन में , न तो कोई प्रतिक्रिया पैदा होती है, न ही किसी अन्य प्रकार की स्मृति का दबाव आता है। न ही अनावश्यक विचारणा का आघात रहता है। पर यही नहीं हो पाता है। हमारा मन एक साथ दो कार्य करता है, हम लिखते हुए भी सोचते रहते हैं, बोलते हुए भी सोचते रहते हैं। हम बोल रहे हैं, हमारे पांव हिल रहे हैं। दर्शन के क्षेत्र में यही द्वैत है, जो निरन्तर बना रहता है। बस जहां हैं आप आप हैं।
नीत्शे ने कहा था, ‘द अदर इज हैल’,,;यह दूसरा ही नर्क है। यह दूसरा हमारे साथ हमेशा रहता है। हम इसे छोड़ नहीं पाते हैं।,
यही असत है, इस को असत समझना ही, साधना का प्रारम्भ है।जो निरंतर बदल रहा हे। आप महिने भर के अखबार रखलें आप पढ़ें, आप पाएंगे , जो घटना , घटी वह तो घट गई आज किसी को याद भी नहीं। जिस राजनेता का चेहरा दस दिन टी़वी पर नहीं आए उसे आप भूल जाते हैं। पर आप चिंतन के आधार पर उसे सजीव बनाए रखते हैंे। नियम यही है आप जिस के बारे में सोचते हैं , उसी के मानसिक गुलाम बन जाते हैंे।यही कारण है कि आज टैलीवीजन , मोबाइल , सेशल मीडिया ने आपको मानसिक गुलाम अधिक बना दिया हे। आप अपनी स्वतंत्र सोच , निर्णय क्षमता को ही खो बैठे हें।
जो कल घटा है, उस को ऐसा ही घटना था, घट गया, तब अचानक आज में प्रवेश होता है। हम तो निरन्तर शरीर को वर्तमान में रखते हैं, पर मन हमेशा भूत या भविष्य में घूमता है, तब जो आज उपस्थित हो रहा है, वह दिखाई नहीं पड़ता है। जो आज में रहता है, वहीं साक्षी हो जाता है। स्वामीजी समझाते थे , शरीर तो वर्तमान में ही रहता है,उसे संसार में ही रखना है , उसे हटाकर कहॉं किसी हिमालय की गुफा में ले जाना हेै। पर आपका मन जो निरंतर बाहर भटकता रहता हें उसे जहॉं शरीर जहॉं है , उस क्षण वही रखना है। यही वर्तमान में रहना है।
स्वामी जी कहा करते थे, ‘असत यह संसार है’, पर व्यावहारिक .सत्ता है, तुम इस को छोड़ कर कहां जाओगे? रहना तो यहीं है। यहां रहने की कला प्रयत्न है। प्रयत्न हमेशा करो, यहां आलसी के लिए कोई जगह नहीं है। यह कर्म-भूमि है। कर्तव्य भूमि है। यहाँ पुरुषार्थ का अर्थ ‘सत’ का संग पाना है। वे उसे ‘अन्तर्मन’ कहा करते थे। कहते थे, ‘जो है वहां शक्ति है, शान्ति है, वहां विराट है।’ उन की अपनी शब्दावली थी, जहां शब्द बहुत कम थे।
पुरुषार्थ तो वास्तव में वर्तमान में रहना है।
कहते थे, ‘मेरे पास तो कोई सुविधा नहंी थी, कोई सहारा नहीं था, पर जब मैंने इस अवस्था को जाना है, पाया है तो आप भी पा सकते हैं।’
पर तब उन की साधारण-सी बात भी समझ से बहुत दूर थी, क्यों कि हम चर्चा तो वर्तमान की कर रहे थे, पर उन का सहारा लेकर ,उन का आश्रयपाने की लालसा छिपी हुई थी। यह हम अपने असत को और मज्बूत करने के लिए कर रहे थे।
वे कहा करते थे, ‘संसार में सफलता प्रयत्न से मिलती है, हो सकता है, नहीं मिले, जो चाहा है, उस के विपरीत प्राप्त हो जाए, परन्तु प्रयत्न मत छोड़ो, फलासक्ति. अपने हाथ में नहीं है।’संसार मे ंजो मात्र एक खेल है , लीला है आपको जो रोल मिला है , उसे सुंदरता के साथ करो , लिससे नाटक कार अगले द1श्य में और ीाी बेती पार्ट करने को दे।
साधन, विवेक का मार्ग है। विवेक घर-बार छोड़कर किसी आश्रम में मिलने वाली उपलब्धि नहीं है। असत को असत समझरा जब असत का आकर्षण कम होने लग जाता है, तब असत से बाहर आना शुरु हो जाता हेै। विवेक ही यहाँ सहायक रहता है।
जिसे सत्संग कहा जाता है, इसमें सत्संग में जो जाते हैं, या उस के नाम से सीखते हैं, वे मात्र असत में रहने को ही और मज्बूत कर रहे हैं। असत वही है, जो निरन्तर बदल रहा है, जहां स्थाई कुछ भी नहीं है, उस को उसी रूप में जानो, त्याग अपने आप प्रारम्भ हो जाता है। त्याग असहयोग नहंी है, सदुपयोग है, यही प्रयत्न है, जो पुरुषार्थ की ओर लेजाता है।
स्वामी जी तो कहते थे, ‘यहां परम्परागत साधनाओं का उतना महत्व नहीं रहता है, ये तो एक प्रकार का बलपूर्वक दबाव अपनाना होता है, जो गलत छोड़ना है, उस को हम दबाने लग जाते हैं। हठयोग की कोई जरूरत नहीं है। ये साधनाएं, साधना के नाम पर जो की जाती हैं, शरीर को और जड़ और संवेदनहीन बना देती हैं।’
केवल यही जानना कि, जो निरन्तर बदल रहा है, या जा चुका है, अतीत में खो गया है, उसे बार-बार स्मृति से बाहर ला कर हरा करते रहना, क्या उचित है? विकार कभी भी दबाने से नहीं जाते, कुछ समय के लिए दब जाते हैं। ये बीज होते हैं, ये पुनः अनुकूल वातावरण पा कर पुनः अंकुरित हो जाते हैं। जो साधना के नाम पर, असाधन होता है, उस का दमन तो हो जाता है, पर वह मिट नहीं पाता है, हम विकारों से लड़ते हैं, हमारे सारे प्रयोग या विधियां दमन के आधार पर हैं। परन्तु जब हम इस को गहरी समझ के साथ छोड़ देते हैं, बार-बार उन का चिन्तन नहीं करते हैं, तब ये विकार भुने हुए चने के बीज की तरह अंकुरण क्षमता खो देते हैं।
तब साधन स्वतः सत के समीप आने लग जाता है। बलपूर्वक की गई साधनाओं का सब से बड़ा नुक्सान यह होता है कि ‘मिथ्या अहंकार’ हर साधक के चेहरे पर उभर जाता है। तरह-तरह की विद्रूप की मुद्राएं, वेश-भूषा, जिन की कोई जरूरत नहीं है। वह अपनाई जाती हैं। हम समाज में विशिष्ट हैं, हम त्यागी हैं। हम ने ब्रह्मचर्य अपनाया है, हम ने इतने व्रत-उपवास किए हैं। इतने देवी-देवता सिद्ध किए हैं। न जाने क्या-क्या, सब प्रकार की कल्पनाएं मूर्त हो कर व्यक्तित्व को अहंकारी बना देती हैं।
वह दूसरों को उपदेश देता है। शास्त्र के वचनों को बार-बार तोते की तरह दोहराता है। पर स्वयं इस सच से दूर चला जाता है।
सत्य का पथ सरल है। कवि घनानन्द ने कहा था- ‘अति सीधो सनेह को मारग है, यहां नेक सयानप. बांक नहीं’। यह तो बहुत सीधा मार्ग है, यहां जरा-सा भी टेढ़ापन नहीं है।
इस समस्या का हल भी यही है कि-
जो भी अपने आप को साधक मानता है, वह अपना स्वयं अध्ययन करे, उस का विवेक जिस की हम ने चर्चा पहले की है, उस का अपना निजी विवेक, जो हमेशा उसे सही मार्ग की तरफ संकेत करता है। उस का आदर रहे, और जो दुर्बलताएं उसे दिखती हैं। जो विकार हैं, उन्हें त्यागने का प्रयास करें। यह प्रयास घण्टे-दो घण्टे का नहीं होगा। यह तो अथक प्रयत्न कहा जाता है।
ध्यान कहीं जा कर, घण्टे-दो घण्टे के लिए किसी शान्त जगह में बैठने का नाम नहीं है, यह तो जीवन की प्रयोगशाला में निरन्तर अपनी निगरानी की यात्रा है,।यह तो जीवन जीने की कला है , आप हर जगह , हर क्रिया में सजग हेैं। , होश में हेै।। यही साधना हैे। यहॉं ध्यान चौबीस घंटे का हेै, आपको करने के लिए अलग से कोई विधि नहीं हेै। जहां सारा जोर, जो सही नहीं है, उसका छूटता जाना है। क्रोधावस्था में , सामने हो रहे अशुभ और अमंगल को देखकर उसका प्रतिकार करना तो सही है। परन्तु भाषा के स्तर पर अनर्गल बोलना उचित नहीं है। विवेक और मूर्खता के बीच की दूरी अधिक नहीं है। एक गहरी समझ और सावधानी ही बचा सकती है। अपनी जानी हुई मूर्खता को जानना,उसे तटस्थता से पहचान असत के सदुपयोग के पथ पर ले जाती है।जो असत के असहयोग से अधिक प्रभावी रहती है।
तब असत की पहचान स्वयं को होने लगती है। इससे असत का जब त्याग शुरू होने लगता है, तब वर्तमान की उपलब्धि स्वयं को होती है। उसे अपना स्वतन्त्र निजी आकाश दिखाई पड़ता है। जहां कोई दूसरा पक्षी नहीं उड़ रहा हो।
तब जो वास्तविक साधन है, जो सत के समीप लाता है। उस से योग होना स्वाभाविक रह जाता है।
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;3 साधन की सार्थकता
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, कि एक मुनि के आश्रम के पास एक सुन्दर वृक्ष था, उस पर बहुत ही सुन्दर फल लगे थे, वे सोच रहे थे कि इन्हें खाया जाए या नहीं। तभी एक पक्षी वहां आया, उस ने फल कुतरा, पर फल कुतरते ही वह पक्षी वहीं मर गया, वह नीचे धरती पर आ कर गिर गया।
तभी उधर से एक कुत्ता वहां से गुजरा, उस ने उस मरे हुए पक्षी को देखा, और वह उसे खाने को लपका, वे उसे देख पाते तब तक कुत्ते ने उस पक्षी को मुंह में रख लिया, थोड़ी देर में वह कुत्ता मर गया।
उस मुनि ने तुरन्त कुल्हाड़ी ली, और उस पेड़ को काट दिया, सारे फलों को गहरे गड्ढे में दबा दिया, वे खुश थे, उन्हों ने बहुत बड़ी अनहोनी से बचा लिया।
कुछ दिनों के बाद देखा, जहां वह वृक्ष था, उस जगह फिर छोटा-सा पौधा उग आया है। वह बढ़ भी रहा है।
तभी उन के गुरु का ध्यान उन की ओर गया। बोले, ‘क्या सोच रहे हो? तुम ने शाखाओं और तने को काट दिया, पर वृक्ष का मूल तो जड़ है, जब तक जड़ रहेगी, उस की अंकुरण क्षमता भी रहेगी। नाश ही करना है तो बीज का करो, वृक्ष का नहीं। जड़ पर प्रहार करो।’
यह सही है, सत्कार्यवाद दर्शन का एक सूत्र है। जहां कारण और कार्य की .अटूट श्रृंखला है। जब कारण का अभाव हो जाता है, तब कार्य भी नहीं होता है। पर अध्यात्म की दुनिया में, स्वामी जी कहा करते थे, ‘यहां बीज तो भुन गया है, उस की अंकुरण क्षमता भी समाप्त हो गई है। पर प्रकृति कहती है, अभी भी कुछ कार्य बचा है।’
तब उन की बात समझ में नहीं आती थी।
जाना, वृक्ष की जड़ कट जाने पर भी, कुछ साल तक हरियाली रहती है। पत्तियां या शाखाएं एक साथ समाप्त नहीं होती हैं। बहुत से पौधों की तो डालियां ही लग जाती हैं। अमृता जिसे गिलोय कहा जाता है, उस की टहनी को लगा दो, जड़ें अपने आप आ जाती हैं, लता फैल जाती है।
यही कारण है कि इस अवस्था में कभी-कभी आत्म विश्वास डगमगा जाता है। मूल कट जाने पर भी जिस प्रकार हरियाली बनी रहती है। इसी प्रकार असत का त्याग हो जाने पर भी असत का प्रभाव बना रहता है।
स्वामी जी कहा करते थे, ‘स्वयं साधक का भी आत्मविश्वास डगमगा जाता है, और उस के समीप रहने वाले भी धोखा खा जाते हैं।’
पर यह अवस्था उसी प्रकार की होती है, जैसे आप ऊपर की मंजिल पर रहते हैं, नीचे से किसी ने आवाज लगाई तो आप नीचे जाएंगे, उस से बात करेंगे, पर वह गया, आप फिर सीढ़ी चढ़ कर ऊपर चले आएंगे। अगर आप ने सीढ़ी चढ़ते समय सारी बातें याद रखीं तो आप चूक गए, उस के जाते ही सब साफहोगया तो आप मुकाम पर आ गए। यहीं गलती होजाती है।
शरीर तो आपका निरंतर संसार में ही रहेगा , पर मन को हर क्षण जो वह है , वहीं रखना हेै। यही अवस्था हमेशा होश में रहना कही जाती हे।
यह सही है, वर्तमान में असत का त्याग हो जाता है। इस काल के क्षण में न तो भूत है, न भविष्य है, वह मात्र ‘वह’ है। परन्तु यह कहना सरल है, करना कठिन है। हां, निरन्तर अभ्यास से इस अवस्था के पार जाया जा सकता है। पर उस के लिए अपने प्रति तीव्र विश्वास का होना आवश्यक है। अपने साधन के प्रति दूसरों को देखकर, विकल्प की बात करना, अपने आप को साधन से हटा देता है। यहां बहुत सावधानी से रहा जाता है।
एक ही गलती बार- बार दोहराई जाती है , थोड़ी सी सफलता मिलते ही दूसरों को उपदश्ष देने की कामना बलवती हो जाती हेै।
अपनी आत्म प्रशंसा, और पर निन्दा, जहां वाक के धरातल पर दोष है, वहीं प्राप्त शक्ति का दुरुपयोग भी असत का प्रभाव भी है। कभी भी भूलकर दूारे का चिन्तन नहीं। दूसरों को उपदेश देने की कामना उनकी ही मानसिक गुलामी है।
जब सत्संग प्रारम्भ होता है, तब अरविन्द के शब्दों में, ‘चैत्य पुरुष का उन्मीलन प्रारम्भ.होना है, यह एक प्रकार से सागर मंथन के समय अचानक शेषनाग का उपस्थित होना है।’ जब हम असत के त्याग से कुछ आगे बढ़ते हैं, हमारे मन में मात्र एकान्विति रह जाती है, तब सत की अभिव्यक्ति होती है। वह तो पहले से था, पर उस का हमें बोध नहीं था। ‘वह’ है, वह बुद्धि से परे है। बुद्धि की पहचान विचार है। विचार की पहचान विकार है, जब दोनों पीले पत्ते की तरह गिर जाते हैं, तब ‘वह’ है। उस की उपस्थिति का पता लगता है। यह वहां पैदा नहीं होता। वह तो अविनाशी है। उस की अभिव्यक्ति होती है। जो पैदा होता है उस का ही विनाश होगा, पर जो अविनाशी है, जिस की हमें मात्र अभिव्यक्ति रहती है, उस से हमारा नित्य सम्बन्ध है, यह संज्ञान प्रीतिकर रहता है।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ‘यहां करने के नाम पर कोई क्रिया नहीं है। यह तो मात्र रहने की कला है। कैसे रहा जाए? बस जो बोझा लाद रखा है, उसे उतार दो, और ट्रेन में बैठ जाओ, पर अगर गठरी को माथे पर रख कर बैठे रहे तो यात्रा व्यर्थ है।’ गलती यहीं होती है। हम चौबीस घण्टे बोझ को लादे रहते हैं। सपने में भी एक क्षण बोझा उतर नहीं पाता है। कहां से कहां चले जाते हैं? सुब्ह जब नींद खुलती है, तब पता लगता है, सारी रात करवट बदलते-बदलते चली गई। क्यों? विचार करो, यह भी तो सोने की कला है। बोझा उतार कर सोना सीखो। अपने साथ कोई विचार मत ले जाओ।
जब वर्तमान में रहना सधता है, तो पहली सफलता नींद में आती है। जल्दी प्रगाढ़ नींद आने लगती है। हमारे सपने जगत के लिए मार्गदर्शी होने लगते हैं। हम जहां एकाग्रता कर रहे थे, वे मन्त्र, देवता, स्वप्न में आने लगते हैं। पर यह भी इसी असत का अंग है।
निरन्तर वर्तमान में रहो, यही साधना का सूत्र है।
जब इस असत का त्याग हाने लगता है, तब स्वतः सत का अनुभव होने लगता है। वह तो था, है, रहेगा, पर हम उस से दूर चले गए थे। दूरी मन की है। विचारों की है। इन के हटते ही, सूर्य पुनः अनुभूत होने लगता है, बादल आते ही वह .ढक जाता है।
कबीर दास जी ने कहा है, ‘हरि रस पीया जानिए, कबहुं न जाए खुमार’। यहां जो उपलब्धि है, वह प्रेम है।
मीरा बाई ने कहा था, ‘पायो जी मैं ने राम-रतन धन पायो’।
हमारे यहां साधन पथ में अनेक मार्गों की कल्पना है। बताए गए हैं। जहां क्रिया है, करना है, वहां कर्म-योग है। आप कर्म से जुड़े रहने का अहसास पाएं, फिर क्या होगा?
जो शरीर से दुनिया छोड़ने का त्याग करते हैं। उन की संख्या बहुत ज्यादा है, वे त्यागी हैं। पर उन का मन पूरी तरह भरा हुआ है।
कबीर जी ने कहा है, ‘प्रेम गली अति सांकरी, या मैं दो न समायं’।
जहां तक बुद्धि है, वहां तक जोड़-तोड़ है। आलोचना है। तर्क है। दर्शन है। सत के मार्ग की चर्चा तो है, पर सत नहीं है। वह बहुत दूर है।
फिर कबीर जी की बात याद आती है, वे कहते हैं, ‘मो को कहॉ ढूंढे रे बन्दे! मैं तो तेरे पास’ में ।
हमारे सारे तथाकथित साधन असाधन ही बन जाते हैं। हम जिसे सत्संग कहते हैं, वह मात्र ‘लोभ और मोह’ पैदा करने वाली कथाओं की यात्रा रह जाती है। त्याग तो आंतरिक है। त्याग तो मन का है। जो अमूर्त है। आज तक मन को किसी ने नहीं देखा, हां अपने विचारों को हम देख सकते हैं। विचारों की शृंखला अनन्त है। पर इस का त्याग सम्भव है।
बीज जब भुन जाता है, तब उस की अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। और बीज हरा रहता है, बार-बार चिन्तन से। सिंचन होता है बार-बार चिन्तन से। बस, यहीं साधना का पथ खुलता है।
साधन की सफलता ‘स्वाधीनता’, ‘प्रेम’ और ‘शान्ति’ में है।
अपने विवेक से, अपने जाने हुए असत का त्याग ही साधन है। जिसे आप छोड़ना चाहते हैं, छोड़ दें, उस में किस बात का भय है? प्रलोभन है, दबाव है, उस के लिए आप स्वाधीन हैं।
जाना निरंतर वर्तमान में रहने से जो छूटना है , वह अपने आप संभव हो जाता है। हमारी दुर्बलता यही है कि हमारे भीतर भय है , वह बुरा मान जाएगा। हम इसी कारण निरंतर भयभीत रहते हैंे। हम आजीवन मूढ़ता को ही अपने माथे पर लादे रहते हैं।
यह हमारा मोह ही है, जो हमें जकड़े रहता है। दूसरा क्या सोचेगा? वह क्या कहेगा? बन्धन जिस दूसरे का है, वह भी जानता है कि अगर यह काम आ जाए तो ठीक है, नहीं तो वह कहीं और चल देगा। आप अपने चिन्तन से ही दूसरे की मानसिक गुलामी सहते रहते हे। उससे क्या पता क्या लाभ मिल जाए , आप मंदिर भी जाएंगे तो हर मूर्ति के आगे सिर झुकाते जाएंगे। हमारे इसी भय से ही हमारा शोषण सभी करते रहे । हम हजार साल गुलामी में जकड़े रहे।
लोभ और मोह, हमेशा दूसरे का इस्तेमाल करने के साधन होते हैं। गहरी समझ में, उपयोग, सदुपयोग और दुरुपयोग शब्दों के अर्थ खुल जाते हैं। जो कार्य प्रकृति के नीति के विरुद्ध है, उसे नहीं करें, जो कर सकते हैं, करें, तब कर्तव्य परायणता स्वतः आ जाती है। उस से स्वाधीनता पैदा होती है।
पराधीनता हमेशा दूसरों के चिन्तन से ही आती है। जब हम किसी भी दूसरे के बारे में सोचते हैं, तो हम उसी के गुलाम हो जाते हैं।
शारीरिक दासता से बुरी मानसिक दासता होती है। वहां भय हमारी चेतना को जकड़ लेता है। पर जहां वास्तविक साधन है, वहां उस की उपलब्धि, स्वाधीनता होती है। शान्ति में होती है। प्रेम में होती है।
तभी मीरा बाई का कथन, प्रीतिकर रहता है, ‘ माई री मैं ने लीयो गोविन्दा मोल’।
यह कोई बौद्धिक प्रत्यय नहीं है। यह अत्यन्त प्रीति रहस्य है। जहां साधन ने साधक को उस ‘अविनाशी’ से एक कर दिया है।
मीरा बाई ने कभी कहा था, ‘गिरधारी लाल चाकर राखो जी’।
यह साधारण रास्ता है। परन्तं हर बाह्य साधन में हर प्रणाली में गहरा द्वन्द्व है। उस के भीतर असाधन के प्रति, असत के प्रति गहरा मोह भी है। साथ ही उस के भीतर जो है, उस के प्रति असंतोष भी, वह न जाने क्यों, किस से छुटकारे की बात करता रहता है। उस के भीतर स्वतन्त्रता की उत्कट तलाश है। एक विक्षोभ सा उस के भीतर उठता रहता है। वह जान -बूझ कर अपने आप को जो असत है, उस में फंसाए चला जाता है। उसे लगता है, मानो वह कोई कठपुतली है, जिसें कोई दूसरा नचा रहा है। वह जानता है, यह उस का दोष है। पर वह इस के प्रति आसक्त है। महाभारत में धृतराष्ट्र की यही वेदना है, उस के भीतर, ‘स्वाधीनता’ की ललक भी उठती है। अन्त में जा कर जहां वह गांधारी के साथ सन्यास लेता है, उस के भीतर यह द्वन्द्व चरम सीमा पर है। पराधीनता में जीवन की आसक्ति तथा स्वाधीनता में प्रियता हर मनुष्य के जीवन का द्वन्द्व है। परन्तु यह सच है, पराधीनता, या जड़ ब(ता हमारी मानसिकता ही है। दूसरा कोई दोषी नहीं है। और इस गलित. मानसिकता से छुटकारा पाने के लिए किसी विशेष परिस्थिति की कोई जरूरत ही नहंी है। हम इसके लिए स्वतंत्र हैं।
यह हमारी मांग सर्वत्र पूरी हो सकती है। न इस के लिए किसी विशेष प्रयत्न या साधन सामग्री या आड़म्बर की जरूरत है, बस इस की दुखदायी तीव्रता का अहसास होना आवश्यक है।
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;4 सुख- सन्तोष का रहस्य
फिल्मी अभिनेता देवानन्द की एक फिल्म का गीत है।
‘ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहां,
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया’
यही गीता का सार-तत्व है। जब राग-द्वेष से अन्तःकरण रहित हो जाता है, तब उस स्थल पर दिव्य प्रसन्नता प्राप्त होती है।
एक ही सवाल सब पूछ रहे थे, ‘उन की इस विराट उर्जा का स्रोत क्या था, कि वे इतने लम्बे समय तक कार्य करते रहे।’
उन्होने अपने बारे में साक्षात्कार दिया था, ‘वे अतीत की छाया में नहीं रहना चाहते... वे असफलताओं पर अफ़्सोस करने के स्थान पर, उन का जश्न मनाते हुए निरन्तर कार्य करते रहे।’ उपरोक्त ग़ज़ल का ही दूसरा शैर है-
‘बर्बादियों का शोक मनाना फ़िज़्ाूल था,
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया।’
वे फिल्मी कलाकार थे, जिन्हों ने दर्शन को जीवन की यात्रा से जोड़ लिया था।
शास्त्र का कथन है, ‘जो हमें नहंी करना है, जो हमारा कर्तव्य नहीं है, हम जब उस के साथ जुड़ जाते हैं, तो हम स्वाभाविक रूप से दुखों के जाल में फंसते चले जाते हैं।’
जो निरन्तर बदल रहा है, जो हमें अपने प्रति लोभ या भय से खींच रहा है। मन से प्रेरित हो कर जब हम काम करते हैं, तो वह कार्य ‘कर्तव्य’ की श्रेणी में नहीं आता। हम न करने वाले कार्य को भी करने लग जाते हैं। वह धन देगा, पर धन की जरूरत है क्या? कभी सोचा भी है? आज जिसको देखो याचक बना हुआ ही फिर रहा हे। मांग हमेशा वर्तमान में होती है। भूख और प्यास हमेशा वर्तमान में होती है। तृष्णा हमेशा भविष्य के लिए रहती है। आज राजनेताओं के पीछे भेड़ों की जमात की तरह हम इसीलिए चलना पसंद करते हैं कि हमें इससे कुछ लाभ होगा। यही अनपेक्षित कामना हमें भिखारी बनाए रखती हैे।
अमरीकन सभ्यता में सुखी- सन्तोषी व्यक्तियों की सूची नहीं बनती। कितना धन किसके पास है , वही उतना महत्वपूर्ण माना जाता हैे। हमारेयहॉं भी अब धनाढ्य ही आदर का पात्र रह गया है।
जब हम कर्तव्य से जुड़ते हैं, कर्तव्य पालन करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हम विवेक विरोधी कार्य करने से बच जाते हैं। यही असत से असहयोग का हमारा पहला कदम होता है। यही सदुपयोग का पथ है।
कर्मयोग शब्द का हम बहुत उपयोग करते हैं। योग, सत्संग की उपलब्धि है। जब हम अपने स्वरूप से, अपने आत्म से संयुक्त रहने का अहसास पा लेते हैं, जुड़े तो हम पहले भी थे। पर उस का अहसास नहीं था। उस की विस्मृति थी। हम उसे भूल गए थे। बाहर की चकाचौंध में विवेक का अनादर कर, बुद्धिजन्य ज्ञान के आकर्षण में खोए थे। विस्मृति, शब्द बहुत बहुमूल्य है। बुद्ध ने सम्यक स्मृति पर बल दिया है। गीता में ‘माम अनुस्मर. युघ्य च’ सन्देश है। ‘स्मर, स्मरण, महत्वपूर्ण है।’
हम जो नहीं करना है, वही करते हैं, करते जाते हैं, कोई कहता है, तब हम अपने बुद्धि चातुर्य का प्रयोग कर, किए हुए गलत को सही साबित करने का प्रयास करते हैं। उसे न्यायोचित ठहराते हैं। यही वह भूल है, जो सारे दोषों की जनक. है।
विवेक विरोधी कार्य को हम जानते हैं, वही कार्य वे हैं, जो हमारे लिए करने योग्य नहीं थे। यही अकर्तव्य है। जो हमारे सामर्थ्य के विपरीत तो था ही, हमारे करने के लिए भी उपयुक्त नहीं था।
महाभारत में अनुगीता मेें कहा गया है, ‘समस्त दुखों का कारण लोभ है, लोभ से तृष्णा पैदा होती है, और तृष्णा से चिन्ता पैदा होती है। तृष्णा ही मानसिक खुजली है जो एक पल तन को शांति से नहीं रहने देती।’
भगवान बुद्ध ने दुख का कारण ‘तृष्णा’ कहा था। आज के समाज का सर्वाधिक प्रभावी दुर्गंण यह लोभ ही हैे। जिसके पास बहुत है , उसे दूसरे की अपेक्षा अपने पास कम दिखाई पड़ता हेै। वो संत हों , या उपदेशक सब महान सिंकंदर का उदाहरण देते हैं , उसने इतना लूटा जब गया खाली हाथ था, पर हम तो जन्नत में भी अपना महल आवंटन कराने की सोचते रहते हैं।
गीता के दूसरे अध्याय में, ‘प्रजहाति यदा कामान्,.सर्वान पार्थ मनोगतान’ कहा है। कामनाओं का परित्याग साधना-सूत्र है। सार तत्व यही है, विवेक विरोधी कार्य ही, हमारा अपना चाहा हुआ, जाना हुआ, असत है, इस असत का त्याग होते ही, सत का संग स्वाभाविक है। हम जिसे छोड़ने की बात कहते हैं, वह .इन्द्रियों का दमन नहीं है। आप ने रुपया रखना छोड़ दिया, आप त्यागी हो गए हैं। पर अब आप के रुपए कोई दूसरा रख रहा है। आप हाथ में ले कर भोजन करते हैं, या थाली में ले कर इस से क्या फर्क पड़ता है। आप ने सात दिन खाना नहीं खाया, या सर्दी में नंगे बदन रहते हैं। यह तो सारे पशु करते. हैं। हर पशु वस्त्र विहीन रहता है, इस में क्या त्याग है?
जो न करने योग्य है, जिसे नहीं करना है, जब वह छूटता है, तब जो करने योग्य है वह स्वतः होने लगा है। यह प्राकृतिक नियम है।
और जब हम न करने योग्य कर्म में ही अपनी उर्जा लगा देते हैं तब जो करने योग्य है, वह हम से दूर होता चला जाता है।
करना क्या है? जिसे हम विवेक विरोधी मानते हैं, उस कार्य से दूर रहना शुरू करना है। तब जो कर्तव्य है, उस से अपने आप जुड़ना शुरू हो जाता है।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, यहां सौ टका देना होता है। कुनकुने पानी में कभी चाय नहीं बनती। थोड़ा कर्तव्य पालन किया, थोड़ा विवेक विरोधी किया, जैसा हम रोज करते हैं। कुछ करने योग्य करते हैं, कुछ न करने योग्य करते हैं। बेटी का विवाह करना है, हमारा कर्तव्य है, पर घूस रिश्वत से, लूट-खसोट कर लाए हैं, यह कहां का न्याय है? आप अपने कर्तव्य पालन में जिस को दिखा रहे हैं। परिणामतः अहंकार. और पैदा हो जाता है। हम ने इतना खर्च किया, क्या प्रभाव रहा?
हम कहते हैं हम तो अपनी संतान का पालन ही कर रहे हे। पर हम यह नहीं जानते , आहार दोष ही तो हमारे संस्कारों का निर्माण करेगा , पाप की कमाई से एकत्रित धन जिससे हम अपनी संतान का भरण पोषण ही नहीं कर रहे , उन्हे ंराजकुमार - राजकुमारी बनारहे हे। , वही एक दिन आपके लिए ही और्रगजेब बन जाएंगे।आज बढ़ रही सामाजिक दुर्दशा का अहुत बड़ा कारण हमारा बढ़ता हुआ कदाचार ही है।
परिणामतः और गहरे जाल में फंस जाते हैं, हमारा कर्तव्य पालन भी, अकर्तव्य में फंस जाता है। विवेक विरोधी कर्म, हमें और असत के काले जल में डुबो देता है।
पूज्य गांधी जी को समझने में उन के अनुयायियों ने भूल की है। वे साधन की पवित्रता पर बल देते थे।पर सबसे अधिक गांधीजी के साथ दुर्व्यव्यवहार उनके ही अनुयायियों ने बाद में किया।
क्यों? जो गलत है, उस का त्याग किए बिना, आप का कर्तव्य पालन भी अकर्तव्य की दलदल में फंस जाता है। हमेशा कार्य करने से पहले, जो न करने योग्य है, उस पर विचार कर उस को छोड़ देना उचित है।
विवेक विरोधी कार्यों से छुटकारा ही हमें सच्चे साधन में स्वयं जोड़ देता है। यही कर्मयोग का रहस्य है।
कबीर दास ने कहा था, ‘मो को कहां ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में।’
जब हम विवेक विरोधी कार्यों का त्याग करते हैं, तब स्वाभाविक रूप से जो करने योग्य है, वह हम से होने लगता है। इसे ही कर्तव्यपरायणता कहते हैं। तब जो उर्जा का स्रोत है, उस से हम स्वतः जुड़ जाते हैं।
यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जितना हम अपने ‘स्व’ के नजदीक आते हैं, उतनी ही हमारे जीवन में उस की अभिव्यक्ति होने लगती है, जो हम चाहते हैं।
5 जीवन तत्व
पूज्य स्वामी जी ने कहा है कि मनुष्य परोपकारी तथा अहिंसक वृत्ति अपना कर अपने जीवन के.उद्देश्य.को पा सकता है।
प्रारम्भ में उन के वचन पर बहुत सोचा, पर असहमति ही रही। क्या यह सम्भव है?
हम जीवन को किस रूप में लेना चाहते हैं? यह महत्वपूर्ण है। जीवन शब्द का अपना एक निश्चित अर्थ है। हम बातचीत में कहते हैं, मुझे यह जीवन मिला है, जीवन व्यर्थ गया, तब जीवन शब्द को समझने के प्रति आतुरता रहती है। जब प्रयत्न और पुरुषार्थ शब्द का निहित अर्थ जाना गया, तब जाना गया कि पुरुषार्थ जीवन से जोड़ता है। जो सार-तत्व हमारे पास बचा रहता है, वह जीवन ही है। जीवन की बाह्य में जो अभिव्यक्ति होती है, वह अवश्य ही बदलती-सी रहती है, वहां एक गत्यात्मक प्रवाह रहता है, पर जब भीतर की यात्रा शुरू होती है, तब यह अनुभव में आता है कि जो निरन्तर बदलता रहा है, वह जीवन नहीं है। जीवन ही प्रारम्भ है, वही अन्त में साथ रहता है। इसी लिए परम्परागत भाषा में ‘उसे’ ही ‘आत्म’ कहा गया है। वही गीता का ‘माम’ शब्द है। उस ‘माम’ की शरणागति में ही माया के बन्धन टूट जाते हैं।
विज्ञान ने कहा है, ‘क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।’
हम प्रायः दूसरों से ही कर्तव्य की अपेक्षा रखते हैं। स्वयं को कर्तव्य की परिधि से बाहर रखना चाहते हैं। दार्शनिक उहापोह से परे, यही साधारण सा नियम हमारे पास आता है कि जैसा हम बोते हैं, वैसी ही फसल हमें प्राप्त होती है। अगर हम दूसरों के प्रति उदासीन नहीं हैं, और अपने कर्तव्य के साथ ही उन से जुड़ते हैं तो हम इस का जो परिणाम होता है, उस का लाभ लौटकर हमें ही मिलता है। हम जो दूसरों के साथ कर रहे हैं, वह प्रकाश के नियमों के अनुरूप परिवर्तित हो कर दर्पण में किरणों से टकरा कर आने से वह प्रकाश हमारे ऊपर ही होता है।
इसी लिए जो हमारा सामर्थ्य है, बल है, जो हमें मिला है, जिस गुण को हम अपना मानते हैं, उस गुण का संपादन अपने लिए ही करते हैं, करना चाहते हैं, तब अनायास मोह और लोभ के जाल में फंसते चले जाते हैं। परन्तु जो बल हमें प्राप्त है, चाहे अर्जित हो, या पद का हो या जाति का हो, अगर इस का हम दूसरों के हित में सदुपयोग करते हैं, करना चाहते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हमें निर्विकारिता प्राप्त होने लगती है। यही सबसे बड़ी सेवा है।
कारण है, विचार ही विकार है।
हम जब अपने ही स्वार्थों की पूर्ति अधिक चाहते हैं, तब हमारा चिन्तन उस बैल की तरह जो घानी में तेल की पिराई में लगा रहता है, वहीं घूमता रहता है, पर जब हम दूसरों के हित में सुनियोजित होते हैं, तब हमारा चिन्तन भी अनावश्यक विचारणा के दबाव से मुक्त हो जाता है।
जहां लोभ है, वहां तृष्णा हैं, वहां चिन्ता है, वहां भय है, वहां प्रतिस्पर्द्धा है, वहां अनावश्यक विचारणा का दबाव है, वहां विकारों की श्रृंखला जन्म लेती है। पर जहां मात्र सदुपयोग की कामना है, वहां निर्विकारिता स्वतः आ जाती है। तब सदुपयोग स्वतः होने लगता है, और सदुपयोग के होते ही जो हमारा कर्तव्य है, वही पूरा होने लग जाता है। कर्तव्य के पालन में शान्ति मिलती है, यह हमारा निजी अनुभव है।
यहां पर सवाल उठ खड़ा होता है, जब हमें प्राप्त परिस्थिति, वस्तु-व्यक्ति से ममता ही नहीं रखनी है, फिर जीवन जीने का मतलब क्या है? क्या एक उदासीन बैरागी जीवन जीना ही जीवन है? जीवन में जहां स्वाधीनता है, प्रियता है, अभय है, वह क्या इस प्रकार के जीवन से मिलता है? भारतीय अध्यात्म जीवन की परीक्षा .दो हजार साल से हो रही हैं।
दर्शन का अर्थ, जानना है, बुद्धि से सत्यकी खोज है, धर्म वह आचरण है, जिस के धारण करने से हम सत्य के पथ पर चल सकते हैं। जिस का विशेषकर सम्बन्ध हमारे बाह्य आचरण से रहता है। मनुष्यों के द्वारा अपने मार्ग की स्थापना के लिए जो विचार संग्रहित हुए उन का फैलाव होता है। फिर अध्यात्म क्या है? क्या इस की जीवन में उपयोगिता भी है?
जीवन, तर्क ही नहीं है, वह तर्क से परे है।
यह सही है कि कामनाओं का त्याग होते ही, जब व्यक्ति अपनी ही आत्मा. में संतुष्ट रहता है तब वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
क्या यह जीवन मुक्ति मात्र उन्ही व्यक्तियों का आदर्श रहेगा, जो जीवन से पलायन कर किसी आश्रम में चले गए हैं? यह प्रश्न आज की तकनीकी दुनिया में भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इक्कीसवीं सदी अभूतपूर्व परिर्वतन की सदी है। जहां तकनीकी सभ्यता, वित्तीय प्रबन्धन के साथ गठजोड़ कर, पूरे विश्व पर आधिपत्य करने जा रही है। मनुष्य की गरिमा व उस की अस्मिता अब परिछिन्न होने को है।
वहां रास्ता और अधिक धूमिल व कुहासे में ढल गया है। यह सही है, हर व्यक्ति की कामाना कभी पूरी नहंी होती है। कामना पूर्ति ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। इस कामना पूर्ति में ही अपनी क्षमता को खो देना, अपना ही जाना हुआ भ्रम है। कामना का जन्म मन में होता है, कामना विचार के रूप में जागती है, तथा कर्म में ढल कर रूप लेती है। ओर यह भी सच है, हर कामना पूरी नहीं हो सकती। यही विषाद की जन्मदात्री है। यह भी सही है कि कामना का जन्म लोभ से होता है, कामना ही तृष्णा को पैदा करती है। उस से ही चिन्ता पैदा होती है, उस से भय पैदा होता है।
और हम चाहते हैं कि ऐसा जीवन हो, जहां अभाव नहीं हो।
हमारे जीवन की गतिविधियां अपने लिए अधिकतम सुख की प्राप्ति, वह बना रहे यही आशा है तथा दुख न आए इस का भय सताता रहता है। यही कारण रहता है कि हम प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग नहंी कर पाते हैं। कहा जाता है, वक्त जब दरवाजा खड़खड़ाता है, हम तब सोए रहतेे हैं, तथा उस के जाने के बाद दुखी हो जाते हैं, वह चला गया।
मात्र वर्तमान में रहना ही, जीवन की उपसम्पदा है। यहां मात्र परिस्थिति का सदुपयोग होता है।
गीता का आप्त वचन है- ‘माम अनुस्मर. युघ्य च’।
निरन्तर मेरा स्मरण तथा कर्म करते रहो। यह स्मरण, भजन-कीर्तन नहंी है, वह तो असाधन है। जहां ‘वह’ हैे तथा कर्म है, वहीं योग है। बीच का जो दलाल है, वह यहां हट गया है। वह हमारा निरन्तर विचारणा के दबाव में खोया मन है। तब हम सीधे ‘माम’ से जुड़ जाते हैं, जो ‘जीवन’ है।
जीवन तो शरीर में बहता है, रहता है। मृत्यु के बाद सब कुछ तो यथावत रहता है, पर जीवन चला जाता है।
जीवन जीने की कला यही है कि हम निरन्तर कर्मरत हों, निरन्तर, प्रसिद्ध कलाकार .देवानंद. के शब्दों में, ‘फिल्म, फिल्म, फिल्म, शब्दों ने उन्हें अन्तर्मुखता प्रदान कर दी थी, जो उन की उर्जा का रहस्य बनी।’ वे तथाकथित धर्म-प्रचारों से अधिक जीवन संगीत का स्पर्श पा गए। क्यों कि अनवरत कर्म करते रहने से उन का मन जहां एकोन्मुख हुआ, वहीं वह उस जीवन के स्रोत से भी मिल गया, वे तभी अन्य ‘असाधनों’ से दूर होते चले गए।
अगर आप ग्रंथों का आधार तलाश कर रहे हैं-तो गीता के अठारहवें अध्याय में यह सूत्र पा सकते हैंे। जहॉं भगवान कृष्णअपनी देशना का समाहार कर रहे हैं।
‘‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।। 45
अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य भगवत प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त होता है। परन्तु जिस प्रकार से अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू मेरे से सुन।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
‘‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्थ सिद्धि विच्दति मानवः 46
जिस परमात्मा से सर्व भूतों की उत्पत्ति हुई है।जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है।उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
हम गीता के देशना को भी अपनी ही सांप्रदायिक सोव के आधार पर निर्धारित करते हैं। पर जब हमारी चेतना बाह्य दबाबो ं से मुक्त हो जाती है , तब शब्द अपने आप अपना सही अर्थ व्यक्त कर जाते हैें।
यहां आवश्यक है कि सुख का प्रलोभन तथा दुख का भय वृक्ष के . पीले पत्ते की तरह गिर जाए।
जीवन के अनुभव ने यही बताया है कि सुख अपने आप चला जाता है, तथा दुख अपने आप आ जाता है, इस के लिए किसी प्रकार का निमन्त्रण नहीं दिया जाता है।
तब क्या किया जाए? जो अपने आप जाता है, उसे रोकने के लिए हर उपाय व्यर्थ है, यह ज्योतिष, तन्त्र, ..वास्तु का आकर्षण सब प्रमाद हैं, असाधन हैं, तीसरी आंख का आकर्षण,तरह -तरह के दरबार , ग्रह शांति. सब अनावश्यक प्रपंच हैं। ये आप के प्रलोभन को बनाए रखने के साधन मात्र हैं। जिसे आना है, उसे आना ही है, उसे आप नहीं रोक सकते हैं, फिर उस से भयभीत क्या होना है? जो सम्भव नहीं है, वह हमारा विवेक विरोधी विश्वास है। हां, इन दोनों के प्रभाव से मुक्त रह कर, वर्तमान में रहना सम्भव है, इस के लिए किसी अन्य की सहायता की कोई जरूरत नहीं है। और तभी हम प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग कर सकते हैं।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ‘चट्टान की तरह रहना सीखो, लहरें आएंगी, टकरा-. टकरा कर लौट जाएंगी, भीतर से लहरें होंगी, वहां बर्फ हो जाना है, यही तितिक्षा कहलाती है। वेग का सामना करना सीखो, .तान तितिशस्व भारतः. यहां पलायन नहीं, पोलापन नहीं, भागना नहीं, सामना करो... असत वस्तु में नहीं, परिस्थितियों में नहीं, वे तो यथावत रहेंगी, पर जब तुम अन्तर्मुखी हो जाओेगे, बाहर का तूफान तुम्हारा अहित नहीं कर पाएगा। पहले तुम भयभीत थे पर अब सामना करना सीख गए हो , अब जुम्हारा चित्त कंपायमान नहीं है।
क्यों कि तब मैं जिसे अन्तर्मन कहता हूं, तुम्हारा मन उस में विलीन हो जाता है, वही तुम्हारा जीवन है, वही सभी परिस्थितियों से अतीत, जिसे परम चैतन्य कहा जाता है, जिसे शास्त्र माम कहते हैं। जो तुम्हारा सेल्फ है, उस से तुम्हारी अभिन्नता हो जाती है।
अन्तर्मन तुम्हारे जीवन के कार्यकलाप स्वयं संभाल लेता है। इसी लिए प्रलोभन और भय, दोनों से दूर रहो। कोई भी कार्य प्रलोभन से मत करो, भय से कार्य छोड़ना या नहीं करना, श्रेयस्कर. नहीं। क्यों कि यह विवेक विरोधी कर्म है। क्यों कि यहां जेा न करने योग्य है, उसे हम साधन के रूप में अपनाए चले जाते हैं। फिर इस से छुटकारा अत्यन्त ही कठिन हो जाता है।
एक और कठिनाई यहां आती है, जो न करने योग्य है, जिसे हम असाधन कहते हैं, पर जब उसे अपना लेते हैं, तो उस से अहंकार पैदा होता है। मैं ने इतने यज्ञ लिए, इतने जप किए, यह किया, वह किया, यह सब कर्मकांड. अहंकार छोड़ जाता है। अहंकार के आते ही सारे विकार वहां जन्म लेते हैं। अभिमान हमेशा पराश्रय में ही जीवित रहता है। अभिमान उन परिस्थितियों की कामना. करता है, कल्पना करता है, जहां वह किसी वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति के स्वयं पराधीन हो जाता है।
सार तत्व यही है -
हम विवेक विरोधी विश्वास न रखें, तथा विवेक विरोधी कर्म न करें। विवेक हमारे पास हमारी ही शक्ति है। जो बस हमारे आदर करते ही हमारे भीतर जगह ले लेती है। बुद्धि हमेशा विवेक की विरोधी रहती है। हां, जब विचारों की संख्या कम होने लगती है, तब विकार भी कम होने लगते हैं। तब जहां निर्विचारता आती है, वहीं निर्विकारता में प्रवेश हो जाता है। तब जो जीवन है, उस का सामीप्य प्राप्त होने लगता है।
निरंतर वर्तमान में रहने की यही उपलब्धि है , इसकी परिणिति विवके जागरण में ही होती हैे।
;6 सत्संग
बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि यह जीवन क्या है?
हम बार-बार सवाल खड़ा करते हैं, जीवन का उद्देश्य क्या है?
अध्यात्म की परिभाषा में यहां जीवन जो हमें प्राप्त है, उस का अनुभव सत्संग जो शब्द प्रचलित है उसमें नहीं में ही हो पाता है। जब तक हम इस संसार के जाल में हैं, असत को ही सत मान कर जी रहे हैं। हम अपने वास्तविक जीवन से दूर ही रहते हैं। इसी लिए शास्त्र ने इसे माया कहा है। जो भासती. है, एक छाया मात्र है।
जो निरन्तर परिवर्तनशील है, हमारे भीतर मन के विभिन्न कार्यों के रूप में संग्रहित है। हम उन से जब अतीत में होते हैं, तब सत के समीप होने लगते हैं। तब यह सत्संग हमें अपने जीवन का अहसास कराता है। यहां सत्संग कहीं समूह में किसी गुरु के पास जाना नहीं है।
दरअस्ल साधन और असाधन दोनों शब्दों का अपना एक विशिष्ट अर्थ है। हम जब तक बर्हिजगत की यात्रा पर होते हैं, तब हम जो भी क्रिया कर रहे हैं, वह बाहर ही बाहर अपनी योग्यता के बढ़ाने के प्रयास में करते हैं। अध्यात्म की दृष्टि से , यह हमारे प्रयास , साधन नहीं है। मात्र मनोरंजन के साधन ही हैं।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ‘यहां करने के नाम पर कुछ भी करना नहीं है। हम जो भी योग, तन्त्र, या धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर जो कर रहे हैं, ये साधन नहीं हैं। यह तो क्रियाएं हैं, बस मन की एकाग्रता के लिए प्रयास हैंे। कुछ न कुछ करने से यही करना ठीक है। पर आप यह मान कर चलते हैं कि ये आध्यात्मिक साधनाएं हैं, आप कुछ महत्वपूर्ण कर रहे हैं। वे यह नहीं हैं। ये आप को बाहर ही बाहर उलझा कर रखेंगी। आप घानी के बैल की तरह चक्कर काटते रहेंगे।वर्षोके बाद भी आप यही पाएंगे कि आप ऑंखों पर पट्टी बॉंधे हुए घाणी के बैल की तरह ही रह गए हैं।
जब भी हम किसी भी प्रकार की साधना से जुड़ते हैं, तो पता करें आप .क्या. चाहते हैं। टेलीविजन पर आज कथा वाचकों के, बाबाओं के कार्यक्रम मात्र लोभ की वृद्धि कर रहे हैं। ऐसा करो, ऐसा मिलेगा, वे सुख पाने के उपाय बांटते नजर आते हैं।
सन्त कबीर ने कहा- ‘अन्धा, अन्धा ठेलिया, दोनों .कूप परंत.’
साधना का प्रारम्भ होता है-
1. जब हम अपनी वस्तुस्थिति से अवगत होते हैं, हम क्या चाहते हैं? क्या हम अशान्त हैं, दुखी हैं, असहाय हैं, भयभीत हैं, हमारी आन्तरिक दशा क्या है?
2. क्या हम धन चाहते हैं, प्रतिष्ठा चाहते हैं, परिवार का सुख चाहते हैं? तो उस से लिए प्रयास करें, प्रयास करें यह करना गलत नहीं है। यह याद रहे, यहां करने का अधिकार है, फल का नहीं। पर अकर्मण्य हो कर बैठे रहना उचित नहीं है।
3. अतः यहां अपनी मांग स्पष्ट हो जाती है। गरीबी का उपाय , उससे छुटकारा , प्रयत्न करने में है, अंध विश्वास में नहीं है। कर्मकांड में नहीं , सतत कर्म करने में है। अमीर होने में है, उसके लिए प्रयास की जरूरत है। यह अध्यात्म का पथ नहीं है। हम आध्यात्मिक रास्ते पर जा कर अपनी भौतिक समृद्धि चाहते हैं, यह उचित नहीं है। दोनों रास्ते अलग-अलग तो हैं। पर अगर आप आध्यात्मिक भी हैं , वर्तमान मे ंरहने की देशना से सहमति रखते हे। प्राप्त समझ का आदर कर निरंतर अपनी विचारणा का अवलोकन करते रहते हे। आप अपीे अनावश्यक विचारणा को छोड़ने सेसहमत हेैं। तब आप हर क्षण , हर समय जहॉं भी हैं अपने मन को लगाए रखाते हैं तब आपकी कार्यकुशलता मे ंवृद्धि अपने आप होती हेे। आपका मन शकितशाली होने लग जाता है।
4. तब अपनी मांग स्पष्ट हो जाती है। जो अशान्त है, दुखी है, भयभीत है, जो अपने जीवन के उद्देश्य को पाना चाहते हैं, उस की मांग स्पष्ट उसे होती है, तब वह वास्तविक साधन से जुड़ना चाहता है।
5. तब उस का मित्र या सहयोगी, उस का विवेक रहता है। हम जब तीसरी आंख की बात करते हैं, तब यह अलौकिक तत्व विवेक ही होता है। दोनों आंखों से जो दिखाई देता है, वह बुद्धि के पास जा कर निर्णय लेता है। पर विवेक की शक्ति हमें अवलोकन से प्राप्त होती है। जब हम अपने मन के क्रिया-व्यापारों को देखना शुरू करते हैं, तब जो .करण देखना है, वह हमारे मन का ही एक हिस्सा होता है। जो बह रहे, गतिशील मन को देखता है। शास्त्र में इसे ‘दृष्टा’ भी कहा गया है। यही साक्षी भाव कहलाता है।
6. तब हम विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखने में सफल हो जाते हैं। यहां अपने आप को न्यायोचित ठहराने की वृत्ति पर रोक लग जाती है। जो है, वह स्पष्ट हो जाता है।
तभी कवि कहता है, ‘मो सो कोन कुटिल खलकामी’। यह कोई दम्भ नहीं होता है। यही सहज स्वीकृति होती है, जो आगे का रास्ता खोल देती है।
7. और तब यह स्वीकृति ही घनी होने लगती है कि जो भी मुझ से गलतियां हुई हैं, मेरे दोष हैं, मेरी भूल है, वे यही हैं कि मैं ने इस ‘असत’ के प्रति विश्वास रखा,, इस के प्रति मोहासक्त रहा, अब उस का त्याग करना ही उचित है।
8. असत का त्याग घर छोड़ कर सन्यासी नहीं होना है। संसार में ऐसी कौन-सी जगह है, जहां इस असत का प्रभाव नहीं है। इसी लिए बाहर के परिवर्तन का कोई लाभ नहीं है। असत की सत्ता गहराई से मेरी मानसिकता से जुड़ी है। जहां स्मृति, विचारणा, तथा अवधारणा में निरन्तर जगत उद्वेलित है।
त्याग होना है तो इन का ही होना है।
9. इस असत के सदुपयोग होते ही, सही शब्दों में जिसे ‘साधन’ कहा जाता है, वह प्राप्त होता है। असाधन तथा साधन शब्द का यही भेद है। इम साधन के नाम पर जो कर रहे हैं, वह वास्तव में असाधन ही है।आपके पास दो ही मार्ग हैं, या तो इस असत के साथ सहयोग करे, जो सरल है, सुख का मार्ग है, या इस असत के साथ सदुपयोग करें , जो सुख और शांति दोनो का मार्ग है।
आप असत के साथ , जगत के साथ असहयोग नहीं कर सकते। आपको जगत में रहना है, अपने काम करने हैं। आप किसी भी धर्म गुरु का नाम लें , जब उनके समीप जाएंगे तो आप पाएंगे कि वे आप से अधिक इस संसार में डूबे हुए हैं। मात्र कपड़े बदल लेना त्याग नहीं है। उनके वस्त्र तथा आडंबर ही उन्हें पूज्य बनाते हैं। उनका आचरण साधारण जन से भी गया गुजरा है। यह इस असत का दुरुपयोग ही है। वहां लोभ, तृष्णा यथावत हैं, तब समझ ही यह बताती है कि असत का सदुपयोग ही सार है। जब हम प्राप्त विवेक का आदर कर अपने जीवन में प्रवेश करते हैं, तब प्रयत्न से सुख तथा पुरुषार्थ से शांति प्राप्त होती है।
शास्त्र में गुरु के लिए कहा गया है , द्वंद्वातीतम् ,त्रिगुण रहितम्,भावातीतम् क्या आज के गुरु ऐसे हैं, विवेेक का आदर करें।
10. पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, ‘अन्तर्मुखी बनो।’ अन्तर्मुखता की यही दहलीज है। यहीं से आन्तरिक यात्रा शुरू होती है। अन्तर्यात्रा का साक्षी यह साधन तत्व है। अंतर्मुखता किसी जंगल में जाकर प्राप्त होने वाली उपसंपदा नहीं हे। नहीं यह कायरता का मार्ग है। तितिक्षा हर प्रकार के संवेगों को मन के धरातल पर अप्रभावित रहने की क्षमता सोंपती है। क्रोध एक विकार है, स्वामीजी कहा करते थे, समर्थ रामदास के जीवन की घटना है, सामने स़्त्री के विरुद्ध हो रहे अत्यावार को देखकर उन्होंने हथियार उठा लिया था, तब उनके लिए कहा गया था ,यह संत का आचरण नहीं है। महत्वपूर्ण है, आप क्रोध में हैं, या आप स्वभाव से क्रोधी हैं, क्रोध अगर उस घटना के बाद भी आपके साथ, आपके मन में रह गया है, तो आप क्रोधी हैं। जहॉ आप वर्त्तमान में हैं, वहॉं उसकी छाप नहीं रहेगी। पर उस परिस्थिति में भी आप शांति के नाम पर चुप हैं, यह विवेक का आदर नही है, यह त्याग भी नहीं है, यह मात्र कायरता है। जहॉं वर्त्तमान है, वहीं विवेक का मार्ग है। वहॉं अभय है, वहॉं जो सही है, वही घट जाता है।
11. साधन तत्व, ही पुरुषार्थ का रास्ता है। बाह्य मन का यहां अन्तर्मन में विलीन हो जाना है। ‘वह’ है, उस की अभिन्नता ही जीवन की पहचान है। वही जीवन है। कठिन शब्दों के प्रयोग से यहॉं बचा जारहा है। आप समझने के लिए उसे आत्मतत्व कह सकते हैं।
उपरोक्त क्रम. से स्पष्ट हो जाता है कि सत्संग ही आधार है। सत्संग की प्राप्ति साधन में है। यहां जो जीवन है, उस का अनुभव रहता है। प्रायः जीवन और हमारे आत्म का जो विभाजन दिखाई पड़ता है, उस का आधार हमारे भीतर उस असत का आकर्षण ही रहता है। जब यह कम होना शुरू होता है, तब हमें जीवन और जीवनदाता के बीच का अन्तराल स्पष्ट दिखाई देता है। जो वास्तव में होता नहीं है।
साधन की भी अनिवार्यता तभी तक है, जब तक असत का संग रहता है। सत्संग होने पर साधन की प्राप्ति अपने आप हो जाती है। फिर कुछ करना शेष नहीं रहता। स्वामी जी कहा करते थे, ‘यहां कुछ भी कार्य बचा नहीं है। जो करता है, वह कुछ नहीं करता।’ तब यह सूत्र समझ से दूर रह जाते थे, पर बात सही है, यहां आने पर करना कुछ भी शेष नहीं रहता। जो साधन है, वह स्वतः अभिव्यक्त हो जाता है, यहां आ कर प्राप्त होता है, अभय, शान्ति तथा प्रेम।
हम शान्ति का त्याग नहीं कर सकते, हम अभय का त्याग नहीं कर सकते, जिस का त्याग नहीं हो सकता है, वही जीवन है।
इसी लिए साधना के नाम पर अगर कुछ करना है, तो अपने जाने हुए विवेक के प्रकाश में अपने भीतर के असत का त्याग करना है। सत के संग से सत्संग के साधन स्वतः शुरू हो जाता है। अगर कुछ करने की इच्छा है, तो यही याद रहे, अपने भीतर के इस कर्दमसे , गंदगी सेे असहयोग करते रहना है।
उस दिन सवाल पूछा गया था, ‘आप ने जिन दो शब्दों का प्रयोग किया है, सत और असत, क्या उन का जो दर्शन में प्रचलित अर्थ है, उस से अलग अर्थ भी है?’
असत का सामान्य अर्थ है, जो सत नहीं है। जो विनाश शील है। क्षण भंगुर है। अस्थाई है। पर जब हम व्यावहारिक जीवन में आते हैं तो यह असत, सत सा भासता है। विज्ञान इसे सत ही कहता है। इसी आधार पर गुण-सूत्रों की यात्रा होती है। एक विधान है, जो नियन्त्रित हो रहा है। वैज्ञानिक खोजें, पदार्थ की खोज में ‘क्वाण्टम’ तथा जैविक विज्ञान में ‘जीन्स’ के सैल तक पहुंच गई हैं। गुण-सूत्र की व्याख्या उपलब्धि है। फिर आप इसे असत कैसे कह रहे हैं?
बात तर्क सम्मत है। यह भासता ही नहीं स्पष्टतः प्रतीत होता है। हम सांस कल्पना में नहीं ले रहे हैं। यह जगत वास्तविक है, पर यह भी सही है, निरन्तर बदल रहा है। जो है, जो विनाशी से परे, अविनाशी भी है। नाम देने से विवादों की जटिलता पैदा होती है, जहां यह खुदी है, वहां वह खुदा भी है। पर खुदा की संज्ञा से या सांख्य के पुरुष से या वेदान्त के ब्रह्म से भ्रम पैदा हो जाता है। ‘वह’ है, वह अविनाशी है, वह सत है।
परन्तु हमारे लिए जो मेरा है, उस का अपना मानना असत है। जो मेरा अत्यन्त प्रिय था, वह नहंी रहा, मैं उसे जाने से नहीं रोक पाया, जाना वह विनाशी है। जब हम मिली हुई वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य, उस जगत की वस्तुओं, परिस्थितियों को अपना मान लेते हैं, तब यह अपना माना हुआ ही असत कहा जाता है।
‘तेरा और यह मेरा’ ही मोह का जनक होता है। महाभारत की कथा, मोह ग्रस्त लोभी व्यक्ति के पतन की गाथा है। जहां लोभ है, वहीं तृष्णा पैदा होती है। जहां तृष्णा है, वहीं चिन्ता है। इस असत से जो हमें प्राप्त हुआ है, अपना ही मान लेने में, स्थाई मान लेने में, हमेशा बना रहे, इस चाहत से विकारों की उत्पत्ति होती है।
जो विकारी है, वहां विकार स्वतः वस्तु का नाश. करने में समर्थ हो जाता है। जो विकारी. है, वह अपनी ही दृष्टि में धीरे-धीरे नीचे गिरता चला जाता है। उस की जरूरत अन्त में उस को भी नहीं रहती है।
इस लिए इस विकार से परे जाने की जरूरत रहती है। यह कोई बौद्धिक व्यायाम नहीं है। जब हम ने यह जान लिया है कि यह हमारे लिए अब उपयोगी नहीं है, तब उस से असहयोग रखना आवश्यक है।
आप से कोई मिलने आता है, आप का ध्यान ही उस में नहीं है, आप ने पहचाना नहीं, तो वह स्वयं उठ कर चल देगा। विकार हमेशा विचार के रूप में ही आते हैं। इन विचारों को धीरे-धीरे कम करते जाना एक क्रिया है। जो अन्तर्मुखी बनाने में सहयोग करती है। पर उस के लिए जो विधि बताई जाती है, वह उसी प्रकार है, जैसे सूई से कांटा निकालते हैं। कांटा निकालने के बाद सुई व्यर्थ हो जाती है। आप मन से ही मन की जब निगरानी करते हैं, तब विचारों की संख्या तो कम होती ही जाती है, जो फालतू है, वह छूटता चला जाता है।
प्रश्न था, ‘विवेक विरोधी कर्म तो होते हैं, परन्तु विवेक विरोधी विश्वास क्या है? जब कि हम ईश्वर पर विश्वास करते हैं, जाप, तप, पूजा, पाठ सब करते हैं, तो क्या वह विवेक विरोधी विश्वास है?’
यह सही है, विश्वास, अन्धा होता है। यहां स्वीकृति शत-प्रतिशत होती है। जो माना है, उस पर विश्वास रखो। मीरा का विश्वास सो टका था, उस ने सब छोड़ दिया था, या सब छूटता चला गया था। इस्लामिक साधना की पहली शर्त, सौ प्रतिशत विश्वास है, जहां उस पर विश्वास है, वहां फिर दूसरे पर विश्वास कैसे होगा? कैसे रहेगा?
कहा भी है, ‘हजरत मुहम्मद के जीवन की आखिरी रात थी। वे बीमार थे, उन का सोच था, वे अल्लाह पर पूरा यकीन रखते थे, जो भी धन आता था, वे उसे बांट देते थे। उस रात उन की पत्नी ने कुछ दीनारें बचा कर रख ली थीं। मुहम्मद की पीड़ा बढ़ रही थी। तभी दरवाजे पर हलचल हुई, कोई फकीर मांगने आया था, मुहम्मद ने कहा, अन्त समय में तू मेरा भरोसा उस पर से क्यों हटा रही है? वे दीनारें इस फकीर को दे दे।’
कहा जाता है कि पत्नी के द्वारा उन दीनारों को उस फकीर को देते ही, उन्हों ने प्राण छोड़ दिए थे। जब उस को सौंपा है तो पूरा सौंपा है।
इस के अतिरिक्त जो था, वह विवेक विरोधी विश्वास था।
विवेक विरोधी विश्वास का सरल अर्थ है, जो इस जगत की प्रतीति है, जो हमारे पास, वस्तु, पदार्थ, मनुष्य, परिस्थितियां, घटनाओं के रूप में आ रही हैं, उस की नित्यता के प्रति मोह रखना। यह ऐसा ही रहेगा, मान कर रहना। उसे बनाए रखने को प्रयास करना।
तब धीरे-धीरे यह विश्वास खड़ा होता है। यहां कुछ भी शाश्वत नहीं है। भगवान बुद्ध की शब्दावली में सब अनित्य है। क्षण भंगुर है। परिवर्तनशील है। दुख, इन पर विश्वास रखना ही है। यही असत है। इस के प्रति विश्वास रखना ही विवेक विरोधी विश्वास है।
और यही विश्वास हम से इस जगत के प्रति सम्बन्ध बनाए रखता है। यही कहा जाता है, जिस नदी के जल में आज पांव रखा है, वह जल कल वहां नहीं होगा। इस निरन्तरता के प्रवाह में कहीं ठहराव की वांछा रखना क्या उचित है? स्वप्न में हम ने जाने कितने सम्बन्धों को बना लेते हैं। उन के मिलने पर खुश होते हैं, बिछुड़ने पर दुखी होते हैं। वही कुछ अधिक देर के लिए इस जगत में घट जाता है। यहां ठहराव कुछ अधिक हो जाता है। परन्तु हमारा अनुभव कहता है, कि ये सम्बन्ध बदल जाते हैं। नित्य नहीं हैं। ‘दोस्त, दोस्त ना रहा, प्यार, प्यार ना रहा’ हम गुनगुनाते रहे हैं। यही वाक्य हमारे हाथ में रह जाता है। हम चाहते हैं, जो अनुभूत परिस्थितियां थीं, बनी रहें, पर वे चली जाती हैं। चाहते हैं, कुछ और, और कुछ ओर हो जाता है। तब हम खाली हाथ, ठगे से, निरुपाय रह जाते हैं। यही विवेक विरोधी सम्बन्ध है। विवेक विरोधी कर्म के साथ विवेक विरोधी विचार तुड़ जाते हैं, और उनके साथ ही विवेक विरोधी संबंधों से हम जुड़े रहते है।।
विवेक विरोधी विश्वास ,विवेक विरोधी सम्बन्ध तथा विवेक विरोधी विचारों से ही विवेक विरोधी कर्म का जन्म होता है। हम वही करना चाहते हैं, जिस में हमारी रुचि है, हमें लाभ है, भले ही वह करने योग्य नहीं हो।
बहुत पुरानी कहानी है, एक मरते हुए फकीर ने अपने बेटे से कहा था, मेरे पास तेरे को देने को कुछ भी नहीं है, पर एक सीख है, जो मुझे मेरे बाप ने दी थी, बेटा जो कर सकता है, करने योग्य है, कर देना, पर जिसे तू गलत मानता है, उसे कल पर छोड़ देना, और कल कभी आता नहीं है। हम जानते हैं, सही क्या है? सही की पहचान सब को है। सही वही है, जो गलत नहीं है। बस इतना ध्यान रहे, तो विवेक विरोधी कर्म होने से रुक जाते हैं। क्यों कि विवेक ही गुरु है, वही पथ-प्रदर्शक है, जब सब सोते रहते हैं, तब भी वही जागता है। वह स्वप्न में भी कह देता है, यह गलत है।
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7कर्मयोग का रहस्य
कल यह सवाल आया था, यह बात तो सही है, हम कर्तव्य परायण हों। अपने असाधन का त्याग करें, जो नहीं करना है, वह नहीं करें। अपने प्राप्त विवेक में, असत को समझें, जो निरन्तर बदल रहा है, उसके प्रति चिपकाव कम करे। विवेक विरोधी विश्वास, विवेक विरोधी सम्बन्ध और विवेक विरोधी कर्म को छोड़ देें। तो हम स्वतः ही अपने स्त्रोत की ओर स्व की ओर बढ़ जाएंगे। पर जहां हमारा अस्तित्व हमारे अहंकार पर ही जीवित है, क्या उस से परे जाया जा सकता है?
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल था, भारतीय आध्यात्म तो सन्यासियों की प्रयोगशाला है, एक कंट्रोल सिचुएशन की भी मांग रखता है। यह आज की दुनिया में क्या उपयोगी है? उधर आज टैक्नोलोजी बढ़ी है, जो सब के लिए ग्राह्य है।
बेपढ़ा-लिखा कारीगर, मशीन की बाइंडिंग कर लेता है। उस के लिए , यह दुनिया जिसे आप असत कह रहे हैं।इस जगत में जो असत है, इस के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। तब आप क्यों इस अध्यात्म विद्या के लिए कठिन और दुर्गम यात्रा की घोषणा कर रहे हैं?
वर्षों से यह सवाल जहन में उतरते रहे। बहुत भटकाया. गया। भगवान बुद्ध को समझने का प्रयास किया। ‘.प्रतीत्य समुत्पाद’ के दर्शन के साथ ‘नागार्जुन’ को समझा। जैन दर्शन के ‘समयसार’ को समझा, क्या सच की यात्रा इतनी बोझिल है। किस आवागमन से मुक्ति की यहां चर्चा है? निर्वाण क्या, जीवन की समाप्ति पर ही पाया जाएगा? जीवन तो अनन्त है, इस जीवन में कष्ट और दुख की यात्रा का पर्यावसान क्या अगले जीवन में ही होगा?
‘वैराग्य और अध्यात्म’ इस यात्रा के सहायक हैं। पर ये तो ‘विरागी’ के लिए हैं। हर सम्प्रदाय ने अपनी निश्चित परम्परा कायम कर ली है। वेश-भूषा से ले कर विधि-प्रक्रियाओं तक।
हम ने यह जाना कि यही असाधन है, असाधन वही है जो हमेशा ‘पर’ को ध्यान में रख कर रखा जाता है। साधन तो ‘स्व’ में ही विलीन हो जाता है। हम अपने आपको समझें, अपनी यात्रा को समझें,कितना चले हैं, और क्या पाया है? हर बड़ा प्रचारक आता है, दुनिया को बहुत कुछ देने का वादा करता है, अपने अहंकार का जाला फैलाता है, फिर उसी में डूब जाता है। कुछ भी मौलिक परिवर्तन नहीं आता है,।
कल कोई कह रहा था, एक सेण्टीमीटर की एक रेखा है, उस की यात्रा शून्य से एक तक है। हम शून्य से एक तक पहुंच जाते हैं। यहां आ कर पता लगता है कि बाह्य की भी कई सारी धारणाएं, साधनाएं, व्यर्थ चली गई हैं। वह प्राप्त एक का बिन्दु शून्य ही रह जाता है। जैसे जब चले थे, आज भी वैसे ही हैं, शरीर पर विज्ञापित आडंबर तो बढ़ जाता है, पर भ्ीतर पोलापन बढ़ता चला जाता हे। यहां जो कुछ किया, सब वैसा का वैसा ही है। सूक्ष्म अहंकार यह अवश्य रहता है, बहुत कुछ किया है। सारी उम्र रामायण का पाठ किया है, भागवत-कथा भी की है। सब को योगासन सिखाया है। भगवान पतंजलि की कथा कही है। पर भीतर का पोलापन यथावत रहता है।
न अभय है, न स्वाधीनता है, न रस. है, न प्रियता है, भीतर का रेगिस्तान यथावत है।
तब यह विक्षोभ अचानक वास्तविक योग की ओर ले जाता है। यही अन्तर्मुखा की दहलीज है। जिस का अन्त वर्तमान में रहने पर रहता है।
जहां ‘स्व’ है, या ‘आत्म’ है, या ‘वह’ है, या खुदा है, संज्ञाएं अनन्त हैं। पर वह आप का मूल स्रोत है। पूज्य स्वामी जी उसे ‘अन्तर्मन’ की संज्ञा देते थे। ताकि किसी अमूर्त प्रत्यय में मन नहीं ले जाए। जब तक तर्क रहता है, तब तक अन्तर्मुखता में प्रवेश नहीं होता।
बुद्धिजन्य ज्ञान की अन्तिम सीढ़ी अनुभव जन्य ज्ञान में खुलती है। अनुभव की दहलीज हृदय है।
फिल्मी गीत का बन्द है, ‘गम और खुशी में फर्क न महसूस हो जहां, मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया।’
यह वह प्रस्थान-बिन्दु रहता है, जहां बाह्य की सत्ता निःशेष होने लगती है। जहां तक ‘पर’ का आकर्षण है, वहां तक लोभ है। जहां लोभ है, वहां तृष्णा है, वहां चिन्ता है।
भगवान बुद्ध की ‘यात्रा.’ इस तृष्णा को दुख का मूल कारण मान कर अन्तुर्मुखता को प्राप्त हुई थी।
प्रश्न था, साधारण मनुष्य इस टैक्नोलोजी को क्यों प्राप्त करे?
कल हम ने चर्चा में धर्म की बात की थी। हम सब धार्मिक होना चाहते हैं। उस के पहले हम साम्प्रदायिक हैं। साम्प्रदायिकता कोई बुरा शब्द नहीं है, जो भी किसी गुरु ने कहा है, पन्थ में कहा है, मत ने कहा है। उस को सही मान कर चलना पंथिक क्रियाकलाप रहता है।
धर्म में हम अपने सहयोगी अन्य सम्प्रदायों को भी शामिल कर लेते हैं। पर सारा ध्यान बर्हिजगत पर ही होता है। धर्म का आधार बाह्याडंबर. ही अधिक है।
आध्यात्म की यात्रा उस आधे सेण्टीमीटर की होती है, जहां 0.5 से 1.0 तक लाना चाहते हैं। यह यात्रा दिखाई नहीं पड़ती है। यहां बाह्य का प्रदर्शन पूरा छूट जाता है। किसे- किस को समझाना है? यहां तो रूपान्तरण शुरू हो जाता है। वह जो है वह तो पारस है, अब लोहा लोहा नहीं रहा। वह तेजी से उस की ओर खिंचता चला जाता है। सोना तो वह स्वतः हो जाता है। यहां उस का अपना कोई प्रयास नहीं है, यह तो पारस का धर्म है, उसे सोना ही होना है।
तब हम क्या करें?
हमारी तो यात्रा अभी शून्य पर भी नहीं है। हम तो साधारण मनुष्य हैं। हम जानते हैं, हम भय में हैं, प्रमाद में हैं, दुख में हैं, असन्तोष में हैं, तनाव में हैं, हमारी कामनाएं अनन्त हैं, पूरी नहीं होती हैं, एक पूरी होती है, तो दूसरी उठ खड़ी होती है। निरन्तर खालीपन बना रहता है। असन्तोष है, जो हमें आत्मघात तक ले जाता है।
क्या यह ‘अध्यात्म’ इस का उत्तर दे सकता है?
कल कोई समझा रहा था, सब छोड़ जाओ, यह जगत ही असत है, जगत ही दुख है, टेलीवीजन पर देख रहा था, जो दूसरों को छुड़वा रहे थे, स्वयं वैभव की कुर्सी पर चमचमा रहे हैं। उनका प्रवचन स्थल ही लाखों का होता है।
प्रश्न था, यही मार्ग सही है तो वे स्वयं क्यों नहीं छोड़ पाए हैं। यही वह दोष है, जहां सत की मात्र चर्चा है, असत का आलिंगन है। वहां स्वयं तो धोखा होता ही है, साथ ही दूसरों का भी पथ खो जाता है।
गीता का आप्त वचन है-
‘जो मन में उत्पन्न हुई सभी कामनाओं का परित्याग कर देता है, तथा अपनी आत्मा में रहता हुआ, सन्तुष्ट रहता है’। क्या यह वाक्य मात्र एक उपदेश ही है, या जीने की कला का प्रारम्भ है?
सोचें-
जब चित्त में उत्पन्न हुए संकल्पों की पूर्ति नहीं होती है। तब हताशा पैदा हो जाती है, लगता है बस कठपुतली हैं, पराधीन हैं। तब यही पता लगता है कि हमारे संकल्प की पूर्ति दूसरों के सहयोग पर ही निर्भर है।
तो क्या दूसरों पर निरन्तर आश्रित रहना, उन का शारीरिक गुलामी हो, या मानसिक या बौद्धिक पराधीनता नहीं है?
तब यह स्वतः जाना जा सकता है कि, स्वाधीनता और पराधीनता का अपना स्वतन्त्र अर्थ है। मात्र राजनैतिक गुलामी का हट जाना, स्वाधीनता नहीं है। स्वाधीनता का अपना विशिष्ट अर्थ है कि यहां ‘पर’ का आश्रय, पर का चिन्तर उस की मानसिक दासता का उन्मूलन हो जाता है। जो स्वाधीन है, वह ‘स्व’ के आधीन है। जहां वह ‘मूल स्रोत’ से जुड़ कर स्वतन्त्र रहता है।
पराधीनता हमेशा हमें दूसरे के चिन्तन से जोड़ रखती है। तब जब हमारे संकल्पों की पूर्ति हो जाती है, तब उन की प्राप्ति से मिला सुख, अनायास ही हमें पराधीनता के मोह तथा दूसरे से प्राप्त सहायता से मिले सहयोग से हमारी स्वाधीनता की चाह को दबा देता है। हमें लगता है कि यही मार्ग बेहतर है।
शास्त्र कहते हैं, जिस मार्ग पर सब चलें वही बेहतर है।
पर होता यही है, यह कामना मिटती नहीं है। एक के पूरी होते ही दूसरी उठ जाती है। फिर कछ संकल्प पूरे होते हैं, कुछ नहीं होते, स्वामी जी कहा करते थे, ‘कर्तुम अकर्तुम, अन्यथा कर्तुम होगा, होगा, नहीं होगा, कुछ दूसरा ही हो जाएगा। संकल्प की पूर्ति हमारे प्रयत्न तथा प्राकृतिक विधान पर निर्भर है।’
इसी लिए गीता में कहा है, ‘कर्म करने का अधिकार है।’
पर हम इसे मानते नहीं हैं, हमारे यहां कहा जाता है, आकाश की कोई सीमा नहीं है, अरे, जो सपने नहीं देखता, वह उन्हें पाता भी नहीं है।
यही हमारा जाना हुआ, परखा हुआ ‘असत’ है।
हम जानते हैं, हमारे सब संकल्प पूरे नहीं हो सकते, फिर उन को प्राप्त करने के लिए अपने आप को पूरा झौंक देना, न्यायोचित नहीं है।
तो क्या हम संकल्प ही नहीं करें?
हम अपने आप को कंेद्र में. रखकर. इस का विचार करें। पहली बात तो यह है कि हमारे सभी संकल्प पूरे नहीं होते हैं, साथ ही संकल्प के पूरे न होने पर हम उसी स्थिति में आ जाते हैं, जहां संकल्प के पैदा होने के समय थे।
तब यह विचार उठना स्वाभाविक है, संकल्प की इस अपूर्ति का हम पर क्या प्रभाव रहा है? क्या हम ने इस संकल्प अपूर्ति के महत्व को जाना है? या संकल्प अपूर्ति के आधार पर पुनः संकल्प पूर्ति के लिए प्रयास करना बेहतर समझा है?
संकल्प अपूर्ति का महत्व तभी हम पर होता है, जब हम प्रभाव को मात्र एक तथ्य के रूप में देखने में समर्थ हो पाते हैं। यहां हम उस के प्रभाव को भीतर अपने मनोजगत में स्मृति तथा अनावश्यक विचारणा के संग्रह पर नहीं ले जाते हैं।
होता क्या है? हमारे भीतर सुख का प्रलोभन तथा दुख का भय अपनी जड़ें जमाए रहता है। हम बिना हानि-लाभ के अपने जीवन को महत्व ही नहीं दे पाते हैं। अकर्तव्य हमारा संगी रहता है। जब संकल्प अपूर्ति से अपना प्रभाव हमारे भीतर दुख का प्रभाव अंकित करने में असमर्थ रह जाता है। तब अनायास ही सुख के पीछे दौड़ने की चाहत भी कम हाने लगती है।
तब इस स्थिति में रहने के बाद जब सुख का प्रलोभन आप को दासता में जकड़ने नहीं देता, तब दुख को निमन्त्रण भेजो तब भी नहीं आता।
शायर की पंक्ति है-
‘मैं दिल को उस मुकाम पर लाता चला गया।’
यहां सुख की दासता, सुख का प्रलोभन गिर गया है, ”पर,“ की आसक्ति चली गई, तब ‘स्व’ जो है, वहां जो है, वहीं वह है।
अतः संकल्पों की अपूर्ति पर दुखी होना अपना ही बुना हुआ असत है। यही वह जाल है, जो मकड़ी की तरह हम ने ही बुना है। यह बाहर नहीं जाने देता। जकड़ लेता है।
हां, जब सूफी शब्दावली में ‘मालिक की रज़ा, मालिक का तवक़्क़ुल’ का यात्री बन जाता है, तब उस का संकल्प किसी और के संकल्प में, जिस पर उस का शत-प्रतिशत विश्वास है, विलीन हो जाता है। तब वह किसी अन्य की पराधीनता में नहीं जाता।
इस अवस्था में जो स्वाभाविक पूरे होने वाले संकल्प होते हैं, वे अपने आप पूरे होने लगते हैं। तथा जो भय और प्रलोभन से हम ने बनाए हैं, वे अपने आप गिरने लग जाते हैं। क्यों कि उस का अपना कोई संकल्प नहीं होता है।
हम जब सोचते हैं, यह करें, वह करें, तब वहॉं संकल्प नहीं हाता, बार-बार सोचने से हम जब दृढ़ हो जाते हैं, तब वह चिन्तन का रस. पा कर, वह सोच, वह विचार चिन्तन, संकल्प में ढल जाता है।
इसी लिए प्रारम्भ में ही विचार के आते ही यह विचार हो, यह स्वाभाविक है या अनुसरण में आया है। यह विचार विवेक विरोधी तो नहीं है। तब इन उत्पन्न होने वाले संकल्पों से असहयोग की भावना पैदा होने लगती है। तब क्रमशः धीरे-धीरे पूरे हों या न हों, उन के प्रति उत्सुकता चली जाती है। उस की पूर्ति, अपूर्ति में दुख-सुख में मन नहीं रहता है। इस के जाते ही उस के भीतर ‘पर’ की दासता कम होने लगती है, वह अपने आप से जुड़ने का अहसास पाने लगता है।
प्रश्न था, क्या यह मात्र अकेडमिक बातचीत ही है?
हॉं, प्रारम्भ में यह एकेडमिक ही है, धीरे-धीरे समझ बढ़ती है, तब यह व्यवहार में आने लगता है। यह उस जीवन का कीमीया है, रसायन है, जो वर्षों की साधना में ‘साधन’ रूप में जाना गया है। यह मनुष्य की जातीय परम्परा का वरदान है। जिसे हर मनुष्य अपने जीवनानुभव में पाता है। यह बात दूसरी है कि वह अपने जाने हुए का कितना आदर करता है।
अन्तर्मुखी होना और वर्तमान में रहना, यही साधन है, और साध्य है। हम जब अपने मूल स्रोत से जुड़ते हैं, जुड़े हुए .तो हैं,ं, पर उस का अहसास नहीं है, तब हम पाते हैं, अपने भीतर आत्म विश्वास, सन्तोष, और सामर्थ्य, यही तो वह कमी है, जो हमें जीवन में पग-पग पर निरुत्साहित करती है। उत्साह कोई बाजार से प्राप्त होने वाली सम्पदा नहीं है। यह तो वह उर्जा है, जो जीवन की उपसम्पदा है।
शायर की गजल की पंक्ति थी-
‘मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया।’
मैं अलग हूं, जिन्दगी अलग है, और साथ निभाना, जीवन जीने की वह कला है, जहां अपार उर्जा है। जीवन में यह उर्जा ही सफलता के द्वार खोल पाती है। और यहां का प्रवेश तभी होता है, जब हम यह समझ पाएं के पानी की छत पर कितनी बड़ी पानी की टंकी हो, पर अगर नीचे टोंटी के द्वारा जरा सा भी रिसाव हो तो रात भर में पानी से टंकी खाली हो जाती है।
इस हिसाब को समझना ही ज्ञान है। हल्का का सा भी असाधन हमें साधन तत्व से दूर ले जाता है। अहंकार बहुत ही सूक्ष्म है, यह कभी भी जो अत्यधिक प्रिय है, जानते हैं, यह उचित नहीं है, विवेक विरोधी है,पर उस विश्वास को, उस विचार को, उस क्रिया को, उसे छोड़ने नहीं देता।
यहां जिसे छोड़ना है, वह आप का अपना जानाहुआ असत है। उस की पहचान आप को है, वह मन का वह कुहासा है, जो स्मृति, अवधारणा, तथा अनावश्यक विचारणा के गहरे बादलों से आप के अन्तर्मन को ढक देता है। आप बाहर ही बाहर भटकते रहते हैं। घर में वापसी हो, तब वही संकल्प भी उठेंगे, जो पूरे भी होंगे, परन्तु प्राप्त सफलता, असफलता, आप को न व्यथित करेगी, न आह्लादित, तब वर्तमान में रहने की कला को हम समझ पाते हैं।
8. प्रेम
बार-बार यही सवाल आ रहा था, ‘यह प्रेम क्या है? हमारे भीतर हमेशा यह हताशा विपन्नता क्यों बनी रहती है?’
मीरा बाई का पद पढ़ रहा था, ‘सांवरा रे म्हारी प्रीत निभाजो जी।’
फिर पढ़ा हुआ याद आया, ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई।’
जायसी के पद्मावत में पद्मावती का विरह वर्णन आता है, सूफी मत में प्रेम ही साध्य है। हों रानी पद्मावती सात सरग पर वास , हाथ चढूं सो तेहिके प्रथम जो आपुहि नास।
पर वहां कैसे जाया जाए? उस दिन चर्चा हो रही थी, क्या विश्वास वास्तव में अन्धा होता है? तो अन्ध विश्वास क्या है?
विश्वास शब्द का बहुत दुरुपयोग हुआ है। हम सामान्यतः बातचीत में जिस विश्वास शब्द का भरोसा करते हैं, वहां अगले ही पल भरोसा उठ जाने की बात होती है। हम सोचते हैं, मानते हैं, वह ऐसा नहीं करेगा, पर वह तो बदल जाता है। यह विश्वास, मन के धरातल पर रहता है, विवेक के स्तर पर पैदा नहीं होता। हम बुद्धि से यह भरोसा करते हैं कि वह ऐसा नहीं करेगा।
यह भरोसा यह विश्वास हमारा अपना ही जाना हुआ है। यह विवेक का विरोधी विश्वास है। विवेक जिस प्रकार नित्य है, एक बार जागने पर जागा रहता है। वैसा ही विवेकी वह मनुष्य कहा जाता है, जिसका मार्ग दर्शन यह विवेक रहता है। विवेक के विरोध में जब हम विश्वास करते हैं, हम धोखा खाते हैं। हमें धोखा हमारी बुद्धि से उत्पन्न भरोसा दिला देता है। हमें कोई समझाा देता है, वह हमें दुगना ब्याज दिला देगा, हम मान लेते हैं, हम अपना धन भी लगा देते हैं। बाद में पता लगता है कि वह धोखा देकर भाग गया। परन्तु यह भी सच है, विवेेक ने हमें रोका था, धीरे से कहा था, वह दुगना ब्याज कहां से देगा? पर हम इस आवाज को दबा देते हैं। पर जब हम विवेक के अधीन होते हैं, वह हमारा मार्गदर्शन करता है, तब बुद्धि भी शुद्ध हो जाती है।
विवेक हम सबके पास है , वही हमारा गुरु है , वह हमेशा मार्गदर्शन ही करता है , हमारे दुखों का कारण विवेे की ही अवहेलना है।
परन्तु जब व्यक्ति विवेक विरोधी विश्वास, जो व्यक्ति, हर परिवर्तनशील वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों पर रखता है, वह गिर जाता है, निःशेष रह जाता है, तब जो विश्वास रहता है, पह अपरिवर्तनशील रहता है। उसे संत कबीर ने सत का अंग कहा है। वहां किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रहती है। वहां आत्मीयता रहती है।
‘इस्लाम’ में हज़रत मुहम्मद ने ऐसा विश्वास पाया था। पूरा ‘क़ुरआन’ इसी विश्वास पर उतरा है। वहां मात्र ‘ईश्वर’ पर विश्वास है। जहां आत्मीयता होती है, वहां नीरसता नहीं रहती। हमेशा एक रस बनी रहने वाली प्रियता ही रह जाती है। कामना तो बहुत पहले छूट गई थी। ”वह है, उस का सामीप्य है।
‘मैं देखूं जिस ओर सखी री! सामने मेरे सांवरिया।’
अंतर्मुखी अवस्था में कहा जाता है , मन तब नीचे उतरता है , मन जब हृदय पर आता है , तब राग- द्वेष गिर जाते हें। आत्मवत सर्वभूतेषु , सर्व भूतेषु हिते रतः यही भावना रह जाती है।ें । हृदय की शुद्धता ही प्रेम की पहचान हैे। तब चित्त इतना निर्मल हो जाता है , वहॉं मेैं कौन हूूं , उस अस्तित्व की पहचान मिनती हे। स्वयं को आनंद मिलता है , पर दूसरे के अंतः करण पर प्रेमकी धारा मिलती हैे। यही गुरुत्वाकर्षण की महान शक्ति होती हैे।
यहां जो शेष रह जाता है, वही तो प्रेम है। हम जब जिस मूल स्रोत की बात कर रहे हैं, जो अवस्था हमें अन्तर्मुखी होने पर वर्तमान के रूप में प्राप्त होती है, वहां वही है, वह है, वही इस का प्रियता का ;.सोर्स. स्रोत भी है। और यह प्रियता ही वह आत्मीयता है, जो उसे प्राप्त होती है, वह बस उस गुलाब जामुन सा रह जाता है, जो चाशनी में डूबा हुआ है। इय आत्मीयता का आधार उस नित्य विश्वास में है, उस के साथ नित्य सम्बन्ध में है।
ईसाइयत, इस्लाम., इसी गहन विस्तार और उस प्रियता के आधार पर है। यह प्रियता की मांग, बुद्धि जन्य ..ज्ञान के बाद आती है। तब विवेक विरोधी विचार स्वतः गिर जाता है।
बहुत किया, उम्र की इस दहलीज पर आते-आते साधना के नाम पर पूरी उम्र निकल गई। सभी परम्परागत साधनाएं कीं, पर कहीं संतोष प्राप्त नहीं हुआ। पूज्य स्वामी जी की बातें, समझ ही पैदा करती रहीं, पर बुद्धिगत प्रत्यय वहीं प्रश्नाकुल बनाते रहे। कारण था, परम्परागत साधनाओं के पालन में उपजी अहमन्यता तथा विवेक विरोधी विश्वास, और विवेक विरोधी सम्बन्धों से उत्पन्न विवेक विरोधी कर्मों का सिलसिला, यथावत रहा।
परम्परागत साधनाएं बाहर ही भटकाती रहीं, अनावश्यक विचारणा का बोझ हमेशा लदा रहा, इन से खिन्नता चित्त “तक में व्याप्त हो गई। भीतर का रस ही सूख गया। अचानक एक झटका सा लगा। बाहर तो सब वैसा का वैसा ही था, पर भीतर का केन्द्र मानो फिसल गया हो। जो जिस रूप में पहले देख रहा था, वह वहां वैसा नहीं था, जो बदल रहा है, जहां पहले उस को यथावत उसी रूप में देखने की अपेक्षा बलवती बनी हुई थी, वहां उस के गिरते ही, भीतर की दृष्टि, उस परिवर्तन को स्पष्ट देख रही थी। पाया, मैं उसे नहीं जानता हूं, नहीं ही उसे सत्यापित कर सकता हूं। पर ‘वह’ है, वह सभी विकल्पों से परे है। वह सभी संकल्पों से परे है।
जहां तक मैं अपनी बुद्धि से जा सकता था, गया, दर्शन का बोझ लाद लिया। तर्क सीखा, एक मिथ्या अहंकार पैदा होगया, जाना, सत्संग के नाम पर असाधन ही किया। बातचीत में मन रमा, दूसरों को देखकर तुलना होने लगी, वे हमसे आगे हैं, हम उनसे आग हैं।ं।जाना, दुनिया और बुद्धि जन्य ज्ञान में जिसे जाना जाता है, वहां मात्र सूचना ही अधिक रहती है,किताबी ज्ञान , ग्रंथों का बोझ, उस में विकल्प रहित विश्वास नहीं जागा, मन हमेशा संदेह में डूबा रहा। जब अचानक, निर्विचारता का कभी अहसास हुआ, तब जाना, विश्वास यहीं हो सकता है, क्यों कि इसे जाना नहीं है। जिसे अब अत तक जाना है, उस पर तो विश्वास नहीं हुआ, यही अनुभव रहा। मन हमेशा प्रश्नाकुल रहा। साथ ही जीवन में स्वाधीनता नहीं रही, दीनता ही रही। अहंकार भी आया, और साथ ही जाना, ”जो“ है,जो केन्द्र है, जो चिन्मय है, उस से दूरी बहुत ही हो गई। लगभग उस की विस्मृति ही हो गई।
तब एक मात्र सहारा रहा, जिसे जाना नहीं है, एक बार उस पर विश्वास तो लाया जाए, तब कुछ भी नहीं जाना गया था, न जानने की जिज्ञासा ही बची थी। तब चित्त में सरलता मिली, कोमलता मिली, खुलापन मिला। कितना शास्त्रों का बेझा बढ़ा, करने के नाम पर जो किया उसका अहंकार रहा। जो शब्द भीतर अनुगूंज पैदा कर रहे थे, उनसे उपजा मिथ्या अहंकार निरन्तर कठोरता देता रहा। जाना, अपने बचपन से ही जो जितना बचपन में था उससे बहुत दूर चला गया। तब यही जाना जिसे जाना ही नहीं जासकता है, जो बुद्धिगत प्रत्ययों से बहुत दूर है, उसपर ही भरोसा लाया जाए।
मीरा बाई कहती थीं-
”गिरधारी लाल चाकर राखो जी“ ...पर उन्हें अपने प्रिय पर भरोसा था, वे ही बोल रहीं हैं-, वे ही मानो पास आकर कह रही हों, जब जो तूने जाना उस पर विश्वास नही है, तो जो माना गया है, वह है, वहां ठहर जा, रुक तो जा,
”माई री मैं ने लियो गोविन्दा मोल“ यहां विश्वास पग-पग पर उन्हें अपने स्रोत पर लाता चला गया।
यह था अगाध विश्वास।
तब पाया, देखे हुए में विश्वास करना हितकर नहीं है। विश्वास तो अन्धा होता है, जो जाना गया है, वह बुद्धि का लक्ष्य है। बुद्धि स्वयं चंचल है। तर्क उस की सीमा है। वहां विश्वास कभी आ नहीं सकता। जब यह जो जाना गया है, जिस पर अहंकार खड़ा हो गया है। यह मैं हूं, यह मेरा ज्ञान है, यह मैं ने जाना है, जब यह गिर जाता है, या कहें यही ‘असत’ है, जो निरन्तर परिवर्तनशील है, क्षण भंगुर है, अनित्य है, इस के त्याग होते ही जहां निर्विचारता रह जाती है, वहीं निर्विकारता स्वतः आती है, साथ ही ‘वह’ है, उस के संसर्ग से ही प्रियता अपने आप चली आती है।
”रस“. जो आनन्द है, वह क्षण अचानक अद्वितीय हो जाता है। वह है, मात्र उस का स्पर्श तरंगित हो जाता है। जिस में विश्वास नहीं था, जब वह हट जाता है, या कहें जब उस से सम्बन्ध टूट जाता है, तब भय, जड़ता, परधीनता, दुख, कोलाहल, अभाव, सब का अन्त हो जाता है। था तो वही , पर भीतर बस सब कुछ जरंगित था। कहीं कुछ ठोस नहीं, सब कुछ पिघलता हुआ।
यही तो ”रास“,.है।
मीरा बाई कह रहीं थीं, ”सुनी मैं ने हरि आवन की आवाज“।
कबीर कह उठे थे, ”आज हमारे घर आए राजा राम भरतार, दुलहिन. गाओ मंगलचार“।
जब तक विवेक विरोधी सम्बन्धों में आसक्ति है, उन की सत्यता में विश्वास है, तब तक बाहर के प्रति आसक्ति नहीं जाती। वह बारम्बार लौट आती है। बाहर तो रहेगा, उस को बदलने की चेष्टा मत करो। पर जो भीतर यह बाहर की पकड़न है, उसे खुल जाने दो, ग्रन्थियों को खुल जाने दो, जोड़-तोड़ सभी भीतर का है। भीतर की इस पकड़ के छूटते ही, अनासक्ति अपने आप आ जाती है।
यह सही है, मित्र आए थे, कह रहे थे, वे ज्ञानी हैं, इस शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि की उत्पत्ति, जीन्स सैल, डी.एन.ए. सब का ज्ञान है, वे उस से परे भी कुछ है, नहीं मानते, कहते हैं .इसके बाद सोचना व्यर्थ है., पर क्या इस सवाल का उत्तर क्या दिया जा सकता है? क्या मनुष्य उस तकनीकी प्रबन्धन को ;ह्यूमन टैक्नालोजी जिसके द्वारा वह अपना उत्कृष्ट पा सकता है, जाना चाहता है?
बुुद्ध से कभी किसी ने कहा होगा, वे चुप रह गए, इन सब से अतीत का जो जीवन है, उस उत्पत्ति का बोध बुद्धि जन्य ज्ञान की सीमा के बाहर है।
‘वह’ है, क्यों कि यह मेरी अपनी मांग है। अभय, स्वाधीनता, स्वतन्त्रता, प्रसन्नता, यह मेरी मांग है। उसे मैं जानता हूं। मेरे पूरे प्रयास से मैं इसे नहीं पा सका हूं। जानता हूं, इसे मैं साधना से, प्रयास से नहीं पा सकता।
सांसारिक सुविधाओं को मैं नेअपने प्रयत्न से पाया है। पर जो अब मैं चाहता हूं, वह मेरे प्रयास से दूर है।
यह जीवन है, जो पैदा नहीं हुआ है। यही जीवन है।
कवि कहता है, ”मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया“।
मैं और मेरा जीवन दो अलग-अलग प्रत्यय हैं। मैं ही जीवन हूं, यही असत है। जाना, यह जीवन शाश्वत है, अविनाशी है, मुझे मात्र इस की विस्मृति है। जो मेरा अपना था, मैं ही उसे भूल गया था। यही मेरी विस्मृति है।
गीता कहती है, ”माम अनुस्मर युध्य च।“ मेरा स्मरण रहे, कर्म करो।
बुद्ध कहते हैं, ”सम्यक स्मृति“। यह स्मृति ही सार-तत्व है। जब यह जागती है, बाह्य की विस्मृति चली जाती है। वृक्ष के पीले पत्ते की तरह झड़ जाती है। और जब यह विस्मृति चली जाती है, तब स्मृति में ढल जाती है। उस का विश्वास जो है, प्रेम से ही अभिन्न कर देता है।
जीवन में कभी इतना दुख आएगा। सोचा भी नहीं था। वह आया शरीर को निचोड़ गया। जाना, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों में विश्वास जब टूटता है, तब विपन्नता रह जाती है। वहीं आसक्तियां ही शेष रह जाती हैं। आसक्तियां ही बाहर पूरी तरह जकड़ लेती हैं। जब उन का अभाव रह जाता है, तब प्रेम रस सूख जाता है।
”कोई हमदम न रहा, कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे, कोई हमारा न रहा“
खालीपन, नीरवता, रोम-रोम में व्याप्त हो जाती है। जाना, व्यक्ति के मोह से प्रबल, उस से उत्पन्न आसक्ति रह जाती है। जो उस अभाव की वेदना को हीे व्यथित करती रहती है।
आसक्तियों का त्याग ही, उस प्रेम की अभिव्यक्ति में एक मात्र सहायक है। यह आसक्ति बार-बार परिधि पर ले आती है।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, प्रार्थना क्यों? मांगते क्यों हो? क्या विश्वास नहीं है?
हम बाहर से घर क्यों आना चाहते हैं? वहां ऐसा क्या है? बाहर नहीं है। पता करो, घर पर मां है, क्या वह मांगने पर खाना देती है। यह तो उस का स्वभाव है, वह बच्चों के रोते ही दूध पिला देती है। क्यों? जानेा, जहां विश्वास रहता है, वहां तुम्हें कुछ नहीं करना, यह उस का कर्तव्य है। वह तुम्हारी मांग को पूरा करेगा।
बस तम्हारा एक ही काम है, जो तुम्हारा संबंध बना है, वह रहे। यहां विश्वास का दुरुपयोग ही विश्वास को खो देता है। अपनी छोटी-छोटी कामनाओं को ले कर, विश्वास का उपयोग करना, उस के महत्व को कम करना है।
सूफीयों में कहा जाता है, मालिक रज़ा, मालिक का तवक़्क़ुल, वह जिस हाल में रखेगा, रहना है, खुश रहना है।
गोरखनाथ कहा करते थे, ”रहनि रहे सो मित्र हमारा, हम रहता का साथी।“
यहां मात्र रहना है।
यहां तो जो प्रेम है, वह उपलब्धि है, यह कोई प्रयास से प्राप्त की गई कोई सफलता नहीं है। यहां मात्र कोई श्रम साध्य कार्य नहीं है। यह मार्ग तो सब के लिए खुला है, यहां कोई नियम-उपनियम नहीं है। नहीं ग्रंथों. का बोझा है। ग्रन्थ तो वहीं तक साथ थे, कि यहां कैसे आया जाए? जो जाना गया है, उस की प्राप्ति विवेक है। जो जाना गया है, उस की प्राप्ति यह विश्वास है। बस यहीं तक ग्रन्थ साथ रहते हैं।
जब मान लिया तब अन्य सारे विश्वास, जो विवेक विरोधी हैं, स्वतः छूट जाते हैं। यहां बस आत्मीयता शेष रह जाती है। जहां आत्मीयता वहीं मधुरता है, वहीं प्रीति है। इस के लिए बाहरी किसी सहायता की, क्षमता की कोई जरूरत नहीं है। ‘सन्यास और वैराग्य’ ज्ञान की प्राप्ति में सहायक थे। शास्त्र भी सहायक थे। पर यहां तो वे अब पीछे छूट जाते हैं। यह सही है कि अभ्यास का महत्व, प्रयास का महत्व कार्यकुशलता में है। एकाग्रता का प्रयास से गहन संबंध है। निर्विचारता सहज है, सजगता मात्र रहना है। प्रयास हमारे एकाग्रता के साथ रहते हैं। उन की जीवन में साधना के प्रारम्भ में जरूरत रहती है। हम स्मृति, अवधारणा, तथा अनावश्यक विचारणा के दबाव को अभ्यास से ही कम कर पाते हैं।
विवेक विरोधी कर्म को अभ्यास तथा जागरुकता से ही कम कर पाते हैं।
विवेक विरोधी सम्बन्धों को भी हम अभ्यास व जागरुकता से छोड़ पाते हैं। परन्तु विवेक विरोधी विश्वास का छूटना, उस से अप्रभावित होना, श्रम साध्य नहीं है।
यह विश्वास तो हमारी स्वयं की पूंजी है। जो हम भूल गए हैं। वही हमें मिल गया है। यहां विस्मृति का जागना किसी श्रम का परिणाम नहीं है।
यह तो यात्रा की सहज उपसम्पदा है। जो खोया हुआ था, वह मिल गया। यहां शरीर का प्रवेश नहंी होता, यह सच है। जब तक देह है, देहाभिमान है,. पर वह तो ओले की तरह इतनी शीघ्र जरा ताप पा कर पिघल गया। जब सारी मान्यताएं गिर जाती हैं, तभी वहां प्रवेश होता है।
रास पंचाध्यायी का यहीं प्रवेश द्वार है।
यहां आ कर देहाभिमान गल गया, तब इस शारदीया पूनो की रात को उस रास में प्रवेश मिला।
यहां समझने के लिए जाना, विषय, इन्द्रियों, मन, बुद्धि का संबंध टूट सा गया। विषय और इन्द्रियों का सम्बन्ध मन से जुड़ता है, पर अगर मन दोनों के बीच से हट जाए तब सम्बन्ध टूट जाता है। जब मन अन्तर्मुखी हो जाता है, तब उस वर्तमान की उपलब्धि में, जो अन्तर्मन है, जो विराट है, जो स्व है, जो अनित्य है, जो आत्महै, जो स्रोत है, वही तो जुड़ा रह जाता है।
यही तो वह स्मृति है, जो खो गई थी।
विस्मरण ही खोया हुआ जीवन है, स्मरण पाया हुआ जीवन है। जहां मात्र प्रेम रह जाता है। रास, जहां रस है, रस ही तो अनित्य है। पर हां, जाना, यह किसी श्रम से, प्रयास से नहीं पाया जाता।
हां, यह प्रियता बहुमूल्य है, यह तुम्हारी अपनी प्राप्ति है, पर इस प्रियता का प्रभाव, देह आदि, पर अन्य पर जानने का प्रयास मत करना पुनः तुम्हारी ममता, तुम्हारी आसक्ति चली आएगी। स्मृति बोझिल हो जाएगी। जहां ममता है, वहीं पराधीनता है, एक के गिरते ही दूसरी अपने आप गिर जाती है, जहां प्रेम है, वहीं सत्य है, वहीं शान्ति है, वहीं स्वाधीनता है, यही तो तुम ने चाहा है। तभी तो कहा गया है, सुमिरन करले मेरे मना तेरी बीती उमर हरि नाम बिना रे।“
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9 आखिर साधना ही क्यों?
मित्र का सवाल था, ‘क्या जो हम साधना के नाम पर करते हैं, उस का हमारे व्यवहारिक जीवन में कोई महत्व भी है?’ वर्तमान परिस्थितियों में क्या मात्र पलायन ही एक मार्ग है?
आप जिस साधन तत्व की चर्चा कर रहे हैं, उस की बुनियाद ‘असत’ के त्याग पर आधारित है। यही तो वह परम्परागत मार्ग है, जहां पिछले ढाई हजार साल से यह देश चला है, और हजार साल तक गुलाम रहा है।
इस परम्परागत मार्ग की अपेक्षाएं, आम जन के लिए नहीं हैं, उन के लिए तो यह बहिष्कृत मार्ग है।
इस संदर्भ में आपका क्या कहना है?
0 आपके सवाल सही हैं। इन के साथ ही उत्तर की तलाश करते हैं। इस तरह के अनन्त सवाल, बचपन से आज तक करते रहे, जिज्ञासा का कहीं अन्त नहीं होता है। पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, प्रश्न मत करो, एक सवाल करते हो, जब तक उत्तर आता है, दूसरा सवाल खड़ा कर देते हो। उत्तर स्वयं देना शुरू करो, एक दिन तुम्हारे सवाल ही गिरते चले जाएंगे। खुद उत्तर तलाश करो।
बहुत पहले एक पुस्तक पढ़ी थी, ‘अविनाशी के गांव में’ एक सन्त के जीवन चरित्र पर आधारित थी। सवाल उठ खड़ा हुआ, ‘अविनाशी का गांव कहां है?’
एक दूसरी पुस्तक पढ़ी थी, ‘आइ एम दैट’, मैं वही हूं। यह एक सन्त से लिए साक्षात्कारों पर आधारित थी। सन्त मत, ये मंदिर मत से अलग राह रखता है। वहां करना बहुत पीछे छूट जाता है। परन्तु जो अविनाशी है, वह बुद्ध की घोषणा से भी ‘जगत क्षण भंगुर है, अनित्य है, नश्वर है’ वहां से कहीं दूर है। वे इन सवालों को अव्याकृत प्रश्न कहा करते थे, ये तुम्हारे सवाल नहीं हैं। इन्हें मत पूछना। तुम्हारा सवाल तुम्हारे दुख का है, तुम्हारे अभय का है, तुम्हारी दासता का है, मुक्ति किस से? सारा धर्म-दर्शन मुक्ति के सवालों से ही जूझता रहा।
हम नास्तिक हैं, भौतिकवादी हैं, कार्य-कारण की अनवरत शृंखला में विश्वास करते हैं। यही सच है। हमारे लिए बहुमूल्य जीवन कर्तव्यपरायणता है। एक बेहतर दुनिया का, एक बेहतर इन्सान का सपना हम अवश्य देखते हैं। हम दूसरों से अपने प्रति बेहतर व्यवहार की उम्मीद रखते हैं।
हम जिज्ञासु हैं, हमें जो मिला है, उस से असन्तुष्ट हैं, हम जानते हैं, जीवन और जगत में लक्ष्य की प्राप्ति प्रयत्न से ही होती है, तथा ‘परम’ की ओर जाने का मार्ग पुरुषार्थ है। हम आध्यात्मिक हैं। हम वैराग्य और सन्यास पर आसक्त हैं। इस जीवन से हम अलगााव चाहते हैं। हम मुक्ति चाहते हैं।
हम भक्त हैं, हमारा उस पर अटूट विश्वास है, नाम या संज्ञा कोई भी हो, पर ‘वह’ है, वह नियन्ता है, हम उस के ही हैं, वह हमारा है, हमारा उस से नित्य सम्बन्ध है। हम उस की शरण में जाना चाहते हैं। हम शरणागति को ही बहुमूल्य मानते हैं।
सारा विवाद अपनी-अपनी मान्यताओं को ले कर है। पर सार-तत्व यही रहता है, कि हम जो हमें मिला है, उस से असन्तुष्ट हो जाते हैं। तब अपनी मांग की पूर्ति का प्रयास करते हैं।
कल हम ने जाना था, विश्वास जो होता है, वह सौ टका होता है। वहां सन्देह नहीं होता। सन्देह के लिए कोई जगह ही नहीं है। पर सवाल उठता है, कि हम विश्वास ही क्यों करें? चलो, अपने आप पर ही कर लें।
हम जानते हैं, हमारे भीतर निरन्तर उद्वेलन हो रहा है। हम कहीं पर भी टिक नहीं पाते हैं। या तो बाहर से या भीतर से अनवरत लहरों के जैसे थपेड़े लग रहे हों। शास्त्र का कथन है, जिस नदी में आज पांव रखा है, वहां कल वह पानी नहीं होगा। यही जीवन-तत्व सामने आता है। सब अनित्य है।
पर भौतिकवादी भी कर्तव्य परायणता चाहता है। वह चाहता है कि वह बेहतर अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। अपनी क्षमताओं का सही उपयोग कर सके। तब क्या उस के लिए यह जानना सही नहीं होगा, कि उस की शक्ति को किस ने सोख रखा है? वह उस के चित्त पर स्मृतियों का बोझा है। अनावश्यक विचारणा का दबाव है, और अवधारणाएं हैं। वह उन्हें ही अपनी पूंजी मानता है, पर जब वह इस दबाव से बाहर आता है। इन से सदुपयोग करता है। तब उस की ही उर्जा उस के माध्यम से पूरी क्षमता से अभिव्यक्ति पा जाती है।
हम ने ‘वर्तमान’ शब्द का प्रयोग किया है। जो यहां ‘अन्तर्मुखता’ की स्थिति में हमें प्राप्त होता है। वर्तमान में रहना ही यहां की सिद्धि है। जहां व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की पूर्णता पा सकता है।
वर्तमान को प्रायः एकाग्रता के रूप में देखा जाता है। जहंा हम किसी कार्य के करते समय जब मन को पूर्ण रूपेण वहीं ले आते हैं। तब कहा जाता है, वर्तमान है, या जो काम अभी हाथ में है, हम वह कार्य करते हुए कहते हैं, वर्तमान में हैं।
परन्तु वर्तमान वह उपसम्पदा है, जहां क्रिया है, या नहीं है, मन पूर्ण रूपेण विश्रान्ति में है। या यूं कहें, मन जिस की पहचान हमें विचारों में होती है, वह वहां अप्रभावित है। उस अवस्था में वहां ‘सृजनात्मकता’ रहती है। क्या हम अपने जीवन में यह नहीं चाहते हैं?वहॉं आप मात्र क्रिया ही रह जाती हेै। आपका कर्ता जो निरन्तर चिन्तन करता है , वह अपने आप अनुपस्थित हो जाता हें
जो नास्तिक है, या भौतिकवादी है, उस को जहां कर्तव्यपरायणता मिलती है। सृजनात्मकता मिलती है। अपने कार्य में पूर्णता मिलती है, व्यक्ति की यही तो मांग हेैं।
जो आध्यात्मिक हैं। वह अपने असत को जानते हैं। उस के प्रति निरन्तर रह रही, बढ़ रही अनासक्ति को जानते हैं। और वे जानते हैं, जिस प्रकार रेशम का कीड़ा अपने थूक से ही जाल बुन देता है, उसी प्रकार वे अपने मन की बुनी हुई चादर से जकड़े चले जा रहे हैं। अशांत. हैं।
आध्यात्मिकता, कर्म-काण्ड नहीं है। हर पन्थ की, हर सम्प्रदाय की अपनी विशिष्ट अवधारणाएं होती हैं। जो उन के धार्मिक क्रियाकलाप कहे जाते हैं। यह उनकी सांप्रदासिक भावना कही जाती है।
अध्यात्म, धर्म नहीं है। धर्म तो उन धार्मिक आचार-विचार के धारण करने की यात्रा है। यहां जो भी उस का अपना जाना गया था, वह अब निस्सार उसे लगता है। वह उस के पर जाना चाहता है। वह उस तत्व को पाना चाहता है, जहां विश्रान्ति है, अभय है, प्रेम है, जहां जिज्ञासाएं.समाप्त हो जाती हैं। वह उस अविनाशी को चाहता है। यह उसका विश्वास होता है।
और जो भक्त है, जो आस्तिक है, वह उसे मानता है, उस का प्रेम उस की शरणागति ही उस का लक्ष्य है।
अध्यात्म जो ‘वह’ है, उस को जानने की, उस को पाने की, उस से सान्निध्य की, या यूं कहें अपने जीवन के उद्देश्य को पाने की यात्रा है। और यह भी सच है, कि जब परम्परागत मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं, निष्फल हो जाते हैं, तब अपनी पूर्णता पाने की, अपने आप को जानने की लालसा उत्कट हो जाती है।
स्वामी जी कहा करते थे, वर्तमान में रहो, साथ ही प्रयत्न इसी लिए किए जाते हैं कि यह पता लग सके कि प्रयत्न की कोई आवश्यकता नहीं है, यहां करना छूट जाता है।
हम यह मानने के लिए यह मान सकते हैं, अपने आप को समझने के लिए, हम तो अनित्य हैं, नाशवान हैं, क्षण भंगुर हैं, असत हैं, पर जो ‘सत’ है, वही अविनाशी है। और जब उसे पाया जाता है, उस के समीप आया जाता है, तभी वह सत्संग कहा जाता है। सत को हम नही जानते, हमारी तो असत से ही पहचान है। पर जो असत नहीं है, उसे माना जासकता है।
दूसरे शब्दों में, जहां मन अन्तर्मुखी है, वह मन जहां अन्तर्मन में विलीन हो गया है। वहां ”जो“ है, वही वर्तमान है। वहां इन्द्रियां हैं, विषय है, परिस्थितियां हैं, पर अब कार्य-व्यवहार अर्न्तमन कर रहा है। यह भी मन का वह दूसरा छोर है, जिस को पहले हम ने अवलोकन के रूप में जाना था। जो देखता है, जो जानता है, जो निरन्तर सचेत करता रहता है, यहां हम आत्मा शब्द का प्रयोग नहंी कर रहे हैं, ‘वह’ आप का अपना ‘स्व’ है। मन की पहचान आप स्वयं अपने विचारों के आधार पर कते हैं।
उस स्व को पाने के लिए हम सब स्वतन्त्र हैं। वह था, वह है, वह रहेगा। पर उस की विस्मृति हो जाती है। वह अप्राप्त-सा प्रतीत होता है। वह अविनाशी है, वहीं जीवन है, उस की बस विस्मृति हो जाती है। हम उसे भूले रहते हैं।
सत की जिज्ञासा ही सत के प्रति उत्कट आत्मीयता ही, तथा अपने कर्तव्य के प्रति अत्यधिक आदर ही, हमें सत के समीप ले आता है। इस ‘सत’ से, ‘स्व’ से, ‘अविनाशी’ से हमारी कभी दूरी नहीं हो सकती है। पर हम उसे भी प्रयत्न से पाना चाहते हैं। हमारी सबसे बड़ी भूल यही है। इसीलिए समझाने के लिए इसे ”पाथलैस लैंड“, भी कहा जाता है। परन्तु ऐसी कोई जगह व्यवहार में नहीं है। बस यहॉं मन का कार्य व्यवहार बंद होगया है।
धर्म और कर्मकाण्ड हमें शरीर के लिए तथा वस्तुओं से उसे पाने के लिए, जानने के लिए प्रेरित करते हैं। मन ही उस का द्वार है। उस के सम्मुख भी यही मन ले जाता है, यही जब असत से जोड़ देता है, उस से प्रति आसक्तियां ले आता है, तब भी यही मन रहता है। यह मन जो उसे उसकी सक्रियता से मिल रहा है,
बहिर्मुखता तथा अन्तर्मुखता मन का अपना स्वभाव है। मन की अन्तर्मुखता श्रम साध्य नहीं है।
”प्रजहाति यदा् कामान्.सर्वान पार्थ मनोगतान..।“
यह कामना, जो तृष्णा बन जाती है, जो लोभ की जमीन पर पैदा होती है। जिस का विकास चिन्तन में होता है। यही काम है। हम सारे प्रयास, प्रयत्न, जो कुछ भी बाहर करना चाहते हैं, उन सब का मूल कारण यह ‘काम’ ही है। हमारे सारे प्रयत्न इस काम का ही परिणाम हैं और यह ‘काम’ जहां स्वाभाविक है, क्या यह दोष है? जिसे हम जीवन से हटा दें।
जिस प्रकार से कांटेे को निकालने के लिए सुई का सहारा लेना पड़ता है। बाद में वही सुई भी निष्फल रह जाती है। वही स्थिति यहां काम, हमारी भुक्त-अभुक्त वासनाओं का संग्रह है। जो निरन्तर श्रम के लिए, प्रयत्न के लिए हमें धक्का देता है।
हां, वर्तमान ही वह उपसम्पदा है, जहां यह काम स्वतः निःशेष हो जाता है। हम काम का त्याग नहीं कर सकते। क्यों कि यह जीवन का संगीत है, परन्तु यह ‘मधुर’ राग में सम्प्रेषित हो, यही आवश्यक है।
उस के लिए ध्यान रहे, आवश्यक कार्य जो वर्तमान में आया है, उस को पूरा करते समय मन पूरी तरह उस में रहे। किंचित मात्र भी मन विपरीत नहंी जावे, इस एकाग्रता में, नया बन्धन नहीं बनता है। उसे उत्क्ष्ट. करना लक्ष्य रहे। उसे करते समय, उस के फल की तरफ लेश मात्र भी आस्था न रहे। तब उस कार्य की पूर्णता पर जो विश्राम मिलता है, उस में भी किसी प्रकार की आसक्ति न हो। इसीलिए हमने असत के असहयोग के स्थान पर असत के सदुपयोग का रास्ता अपनाया है। हम तथाकथित अन्य धर्म को अनुपयोगी नहीं मानते हैं। पर उनकी बंधन कारी वृत्तियों के प्रति सतर्क हैं।
उस का कारण है कि इसी अवस्था में मन तुरन्त एक स्थान से दूसरे स्थान पर चला जाता है। तुरन्त ही अनावश्यक विचारणा का प्रवाह, संकल्प-विकल्पों के रूप में प्रकट हो जाता है। जो अभी-अभी प्राप्त विश्राम को भंग कर देता है। परन्तु आदर यहां सजगता का होना है, तब जो अनावश्यक वेग का आदर था, वह सहयोग न पा कर, आदर न पा कर, वहीं रुक जाता है। यही वेग हमें अनावश्यक कार्यों की ओर ले जाता है। अनावश्यक कार्य वही हैं, जो वर्तमान में नहीं हैं, वर्त्तमान के भी नहीं हैं। जो बाह्य के दबाव, प्रलोभन से, भय से हमारे पास चले आते हैं। जिन को करने के लिए न तो हमारे पास सामर्थ्य है, न ही हमारा विवेक उन का पक्षधर है। पर हम करते हैं, क्यों? यही विकार हम पर हावी हो जाते हैं। विकार ही विचार है। यह जो विचारों का दबाव है, हमें वह सब करने को प्रेरित कर देता है, जो हम करना नहीं चाहते हैं।
कर्तव्यपरायणता से हट कर जब हम लोभ, मोह वश कार्य का चयन कर अपने आप को झौंक देते हैं। तब स्वाभाविक रूप से स्वयं रेशम के कीड़े की तरह अपने ही थूक से उत्पन्न जाले में फंस जाते हैं। दूसरा कोई हमारे बन्धन का उत्तरदायी नहीं है। दूसरा कोई कठपुतली की तरह हम को नहीं नचाता है।
हम जानते हैं, न तो उस कार्य को करने का हमारा सामर्थ्य हमारे पास है, न ही हमारा विवेक उस के लिए गवाही देता है। हम विवेक विरोधी सम्बन्धों के दबाव में विवेक विरोधी कार्यों में लिप्त हो जाते हैं। जिस से उन कार्योंे को करे अथवा नहीं, वे पूर्ण हो जाएं या नहीं, उन का राग हमारे भीतर जमा हो जाता है। जो निरन्तर भुक्त-अभुक्त वासनाओं के रूप में तीव्रता में अनावश्यक विचारणा का दबाव उत्पन्न करता रहता है।
आवश्यक है- हम सावचेत रहें।
विवेक विरोधी कार्य करने से बचें। विवेक विरोधी कार्यों के त्याग से ही आवश्यक कार्योें को पूरा करने की शक्ति हमें प्राप्त होती है। हम जान जाते हैं, हमारा उत्तरदायित्व क्या रहे? साथ ही उन्हें बेहतर करने की क्षमता अनायास हमें प्राप्त हो जाती है। यह जो क्षमता हमें प्राप्त है तथा वर्तमान में हमारा जो कार्य है, विवेक जिस का पक्षधर है, उसे पूरा करने में किसी भी प्रकार की असमर्थता हमें नहीं मिलती है। और तब अनायास हमें प्राप्त हो जाता है, वह ‘विश्राम’ वह ‘शान्ति’, वह ‘शक्ति का भण्डार’ जो हम चाहते हैं।
परन्तु यहीं हमारी ‘असत’ के प्रति आसक्ति या लगाव हमें अपने स्थान से दूर ले जाता है। यह अवस्था हम से दूर हो जाती है। परन्तु जब हम सावचेत हैं, इस उत्पन्न हुए संकल्प-विकल्पों के प्रवाह से अपने सम्बन्धों को तोड़ लेते हैं। तब वे संकल्प निर्जीव हो जाते हैं। यहां दमन नहीं, बल पूर्वक सम्बन्ध तोड़ना नहीं है, हटाना नहीं है। क्यों कि तब जो हट गया है, वह ‘रक्त-बीज’ की तरह अनेक आवृत्तियों में ढल कर उपद्रव खड़ा कर जाता है। बार-बार ऊपर सतह पर आता है। मस्तिष्क की सारी शक्ति इस अवांछित को दबाने में चली जाती है।
तब सतर्कता ही सहायक रहती है। बस विवेक के सहारे से इस तादात्म्य को, इस एकरूपता को हटाना है।
स्वामी जी कहा करते थे, मन बन्दर की तरह है, वह आप की आंखों में देखता है, आप का ध्यान हटा वह सामान ले कर चल देगा, पर आप की आंखें सजग रहीं, वह स्वयं हट जाएगा। तब मात्र इस वेग को देखना है, अवलोकन ही इस एकरूपता को तोड़ने में सहायक रहेगा।
इसी लिए हमेशा वर्तमान में रहने की जो कला है, उस का आदर किया जाए। आवश्यक कार्य पूरा होते ही, विश्राम में जाया जाए, न कि अनावश्यक संकल्पों-विकल्पों का आदर कर, पुनः अनावश्यक कार्यों में उलझा जाए।यहाँ हमने जिस मार्ग की चर्चा की है, वह सार्वभौमिक है, सार्वकालिक है, सब के लिए उपयोगी है।
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;10 अपने प्रयास की सार्थकता
आपका प्रश्न है, ”बहुत पुराना आप्त वचन है- ‘.दाइ विल बी डन.’, तेरी इच्छा पूरी हो।“ क्या आप इससे सहमत हैं, क्या इस वचन की कोई व्यवहारिकता भी है?
0यह सही है, जब अपना निजी कोई संकल्प नहीं रहता है, तब वर्तमान में जो कार्य है, वह स्वाभाविक रूप से पूरा हो जाता है। उसे निश्चिन्तता मिलती है। यह निश्चिन्तता उस के सामर्थ्य में प्रतीत होती है। परन्तु सच यह भी है कि हमारा अपना संकल्प ही हमें स्वाधीन नहीं होने देता है।
आपका सवाल था, ‘यह कैसे पाया जाए?’
हां, संकल्प और वर्तमान कार्य में भेद है। वर्तमान कार्य, जो हो रहा है, संकल्प तो बार-बार चिन्तन करने के बाद कार्य में ढलेगा। संकल्प कल की बात है। भविष्य की बात है। जो कार्य है, हो रहा है, वह वर्तमान है, वहां संकल्प न हो, संकल्प विचारणा नहीं है। हम ने अपने राग से, अपनी आसक्ति से अचानक इस विचारण के वेग से तुरन्त कुछ चयन कर लिया है, उसे बार-बार दोहराते ही, चिन्तन करते ही, वह संकल्प में ढल जाता है। विचारणा के स्तर पर सजगता रहे , यही ध्यान है। कहीं हम गलत तो नहीं सोच रहे है? जैसा भीतर अंतःकरण की ऊपरी सतह पर रंग रहता है, उसी प्रकार तेज स्पंदनों का प्रवाह मन को धकेल देता है, वही विचारणा बन जाती है, बार-बार सोचने से संकल्प बन जाता है।
शास्त्र कहता है, ‘योगः कर्मसु कौशलम।’
पतंजलि कहते हैं, ‘चित्त वृत्तियों का निरोध योग है।’
यहां वृत्तियां निरोध में जाती ही नहीं हैं। एक बात पूरी हुई, दूसरी शुरू, तीसरी नई बात कानों में आ रही है। बाहर-भीतर शोर ही शोर है। संकल्प-विकल्पों का कोलाहल है, सामर्थ्य की प्रतीति ही नहीं हो पाती है।
क्यों? यहां कहा गया है, जब स्वयं का कोई संकल्प नहीं है, वहां जो कार्य है, वह निर्भयता पूर्वक पूरा हुआ है, तब निश्चिंतता प्राप्त होती है, यह सामर्थ्य की प्रतीक है। जिस की अभिव्यक्ति, कर्तव्यपरायणता में, भक्त के लिए शरणागति में तथा ध्यानी के लिए निःसंकल्पता. में होती है।
रामायण में कहा गया है - हानि लाभ , जीवन मरण , जस अपजस विधि हाथ,यही वह अवस्था है , दाई विल बी डन ,
पूज्य स्वामी जी कहा करते थे, सर्वाधिक ‘भ्रम’ समाधि शब्द का है। समाधि कोई जड़ता की स्थिति नहीं है।
यहां जो विश्रान्ति है, वर्तमान है, जो उपलब्धता है, वहां जहां कोई संकल्प नहीं है, उसे अनुभव करो, वह वर्णन से परे है।
तुम्हारा अपना संकल्प जो तुम्हारी दुर्बलता है, तुम जिसे अपनी शक्ति मानते हो, वही तुम्हें बहा कर ले जाता है। दूसरे का चिन्तन करते ही दासता आजाती है, हम जितना दूसरे का चिन्तन करते हैं, दूसरा हम पर हावी होता चला जाता है। ज्यों ही पराधीनता आती है, तभी व्यक्ति, परिस्थितियां, तुम्हें अपने साथ बहा ले जातीे हैं। हमारा संकल्प ही है, जो हमें अपनी स्वाधीनता से दूर कर लेता है। संकल्प की विशेषता है, कि उसे तो पूरा होना ही होगा। या तो व्यवहार में पूरा होगा, नहीं तो स्वप्न में पूरा होगा। यह संकल्प ही बंधन है। इसे समझना कठिन है। बाहर जो कुछ भी अच्छा या बुरा घटा है, या घट रहा है, उसके उत्तरदायी हम ही हैं।
”तब क्या हम अपनी रोजमर्रा. की जिन्दगी में सोचना बन्द कर दें? “
यह सवाल हर भौतिकतावादी को परेशान करता है। आपका यह सवाल महत्वपूर्ण है । पुराना आप्त वचन था, एक बार सोचो, निर्णय करो, पर उसी बात को बार-बार मत सोचो। आप चाय पी रहे हैं , आप सोच रहे हैं , आज भारत जोड़ो यात्रा कहॉं तक पहुंची , आप मोबाइल खोलकर न्यूज देख रहे हैं। सोचे ं, क्या अभी सोचना उचित है?जिस जगह सोचना ही कृत्य हो वहॉं सोचें , पूरा सोचे ं, ताकि कृत्य के समय कोई दुविधा सामने नहीं आए। पर आपकी आदत है , आप जीवन के हर छोटे- बड़े कृत्य के समय अन्यत्र ही सोचते रहते हेै। फिर अपनी विचारणा के स्तर पर निर्णर्य लेकर , उस पर बार-‘ बार सोचकर व्यर्थ के संकल्प दिन भर लेते रहते हें।
सोचने की विधि सामान्यतः यह भी है कि संकल्प आया, और दौड़ पड़े। पहले हम यह तय कर आए हैं कि विवेक विरोधी कर्म का त्याग श्रेयस्कर है। जो हमारे विवेक और सामर्थ्य के प्रतिकूल हो, अन्य की दासता हो, भय और प्रलोभन के अधीन हो, उन विकल्पों का उठते ही त्याग कर देना चाहिए।वहॉं निर्णय लेने से बचा जाए।
तब जो आवश्यक सोच हैं, जिन्हें प्रकृति पूरा करने का सामर्थ्य देती है, वे पूर्णता पा कर पूरा हो जाते हैं। यही वर्तमान की उपसम्पदा है।यहीवह पूर्ण बनेगा , तब जैसा सोचा वह अपने आप क्रिया में ढल गया। जिसे पा कर सामर्थ्य की प्रतीति होती है। स्वाधीनता का बोध जागता है।
परन्तु होता इस के विपरीत है, हम स्वयं अपने संकल्पों के अधीन हो कर कठपुतली की तरह नाचने लग जाते हैं। जो नहीं सोचना था, वही बार-बार सोचते हैं, संकल्प मंे ढाल देते हैं, फिर उसे पूरा करना चाहते हैं, भीतर से आवाज आती है, यह सही नहीं है, हमारे बूते से बाहर का है, हम बाहरी दबाब में आकर , बाबाओं, गुरुओं, ज्योतिषियों की शरण में चले जाते हैं। जो विवेक कह रहा है, उसकी बात न मानकर हजारों रुपया काल-सर्प दोष निवारण में लगा देते हैं। सामने खड्डा है, उसे नहीं देखते हैं, जो हमने सोचा है, जो चश्मा हमने लगाया ,उसी तरह बाहर देखते हैं, दूसरों को भी उसी तरह देखने को कहते हैं। फिर आपने उसकी इच्छा का कहां आदर किया है? उसकी इच्छा निर्विचारता में विवेक के धरातल से उठती है। जो होना है, जो घट सकता है, आप उसके गवाह रह जाते हैं।
‘तेरी इच्छा पूरी हो’ यह कहना सरल है। यह कोई एकैडमिक चर्चा नहीं है। यहां जो कार्य स्वभाव वश सामने आया है, उसे पूरा करने की चेष्टा हो, और कार्य करते समय अनावश्यक विचारणा का दबाव न हो, तब जो कार्य है, उस के सम्पादन में सृजनात्मकता का जन्म स्वयं हो जाता है। करने के धरातल पर यह पहला कदम है।और कार्य परा नहीं होना है , इसका भी प्रारम्भ में अहसाय हो जाता है , वर अगर हमारा सोचा- समझा निणर्यहै तब इस अवस्था मे ंयह जानते हुए भी सफलता नहीं मिलेगी , उसे पूरा करने के लिए प्रयत्न करना पड़ता हेै। इसीलिए महत्वपूर्ण यही है , सुबह से शाम तक अपनी विचारणा पर गहरी सतर्कता रहे । हम निरंतर अधिक से अधिक वर्तमान में ही रहें, अनावश्यक संकल्प लेने से बचें । मौन ही सहायक हे। अनावश्यक बोलने से बचें।
सवाल खड़ा हो गया था,” हम जिस प्रकार आइने के सामने खड़े हो कर अपने चेहरे को संवारते हैं, उसी प्रकार हम अपनी जांच-पड़ताल कर अपने आप को दूसरों के सामने श्रेयस्कर क्यों बताना चाहते हैं?क्या यह सही नहीं है?“
0उत्तर इसी सवाल में है। विवेक विरोधी सम्बन्धों का त्याग होने के बाद यह आदत छूटती चली जाती है। ...भय, मुद्रा , माला, आसन, भाषण, प्रवचन, यह सब असाधन ही हैं। पहला कदम है, हम स्वयं जिसे विवेक विरोधी विश्वास कहते हैं, उनके प्रति अविश्वास के जगते ही उन सबके साथ असहयोग किया जाए।
हम ने पहले कहा था, एकाग्रता बहुमूल्य है। यहां मन की शक्तियां किसी एक मुकाम पर संग्रहित हो जाती हैं। पर होता यह है कि इसी मुकाम पर प्रदर्शन की भावना जाग जाती है। पुरानी कहावत है, कली फूल बने, खिले, उस के पहले ही उठी हुई उत्सुकता, कि वह अभी खिली है या नहीं, यह जानने की उत्सुकता, कली को ही पंखुड़ी-पंखुड़ी कर तोड़ जाती है। यह निरीक्षण की आदत जड़ता दे जाती है। यहां तो मात्र असहयोग ही रखना है। यहां जो प्रवाह पैदा हो रहा है, वह बहुत ताकतवर होता है। उस से मात्र असहयोग रखना है। असहयोग होते ही यह प्रवाह धीरे-धीरे अपनी क्षमता खो देता है।
शास्त्र कहता है-
”जब राग-द्वेष छूट जाते हैं, और साधक अपने बस में की गई इन्द्रियों के माध्यम से विषयों को प्राप्त होता है। तब हमें शान्ति मिलती है। स्थाई प्रसन्नता मिलती है। क्या यह संभव है, यह तो सब कुछ छोड़कर पलायन पर ही संभव है? हमें तो पग-पग पर बाधाएं ही मिलती हैं।
यह राग-द्वेष संकल्प के रूप में ही प्रवाह में आते हैं। यही भुक्त-अभुक्त वासनाओं का प्रवाह है। यहां आ कर न तो भयभीव हुए, न ही सुख अनुभव हुआ, उन केा पकड़ने की चेष्टा ही नहीं रही, तब जो असहयोग रहता है, उस से यह वेग धीरे-धीरे अपने आप को अनुपयोगी मान कर स्वतः अपना महत्व खो देता है।एैसा कहा जाता है।
यह सामान्य सिद्धांत है, बीज जब भुनता है, तब उस की अंकुरण क्षमता समाप्त हो जाती है। बीज में अंकुरण क्षमता बार-बार चिन्तन से स्वतः रस मिलने से आ जाती है। चिन्तन का रस ही, हर संकल्प की फसल खड़ी कर देता है। यह हमारे बस का है, आप परिवार में हैं, आप अपने कर्त्तवय का पालन कर रहे हैं, आप शांत हैं, पर अन्य आपको उत्तेजित करना चाहते हैं, कर रहे हैं, उनकी अपनी सोच है, वे जानते हैं कि आप वह सब कुछ कर सकते हैं, जिनसे उन्हें लाभ मिलता है, वे आपका उपयोग करते हेैं, पर आदर ही नहीं देते, आपको न चाहते हुए भी घाणी के बैल की तरह भटकते रह जाते हैं।आपका सम्मान , प्रतिष्ठा की चाह आपको अपने मार्ग से भटकादेती हेै। आपके दस बार पांव छूए, आपकी प्रशंसा करी, आप बारिश के पानी की तरह हर गंदी नाली में बह जाते हैे।
हमेशा यह सतर्कता बनी रहे , स्वाति नक्षत्र मे ंपानी की बूंद ही सीपी मे ंप्रवेश कर मोती बन जाती है। आपका नियंत्रित मन एक तलवार की तरह हो जाता है , उसे विवेक रूपी ढाल की जरूरत हमेशा रहती है।
यह सही है, आपका सोच सही है, आप शांति चाहते हैं।
पहला मार्ग पलायन का था, जहां बुद्ध चले गए, महावीर गए, उनके अनुकरण में दो हजार साल से यह मार्ग प्रभावी है। तुलीदास की मनोरम कथा है। बुढ़ापे में रत्नावली मिली थी, पर उन्हों ने साथ रखने से मना कर दिया। चैतन्य महाप्रभु सुन्दर पत्नी को छोड़ गए। यह मार्ग भारतीय परम्परा में अत्यधिक प्रभावी है। एक करोड़ के ऊपर लोग शांति की खोज में घर छोड़ आए हैं।
दूसरा मार्ग कृष्ण का है। मजे की बात है, गीता के अधिकांश प्रवचनकर्त्ता स्वयं पलायनवादी हैं। शांकर भाष्य पलायन का पोथा है। कृष्ण के मार्ग का सफल प्रयोग मुहम्मद साहब में मिलता है। वहॉं पलायन नहीं संधर्ष था। संघर्ष भीतर भी और बाहर भी। जो सही है, उस की पहचान सब को है, वही ऋत है, उससे ही ”राइट“ शब्द बना है। आप जिसे गलत मानते हैं, उसका विरोध , असहयोग से कर सकते हैं। आसक्ति ही महाभारत की जनक है, आप उसे प्रारम्भ में ही रोक सकते हैं। तब आपके दुरुपयोग होने की संभावना कम होती चली जाती है। आचार्य रजनीश का उदाहरण अभी भी हमारे सामने है , वे अतिम सीढ़ी तक पहुंच गए , भगवान ही बन गए , फिर प्रशंसकों की भीड़ उन्हे ंरसातल तक ले गई।
प्रारम्भ में तनाव रहेगा। लोग आपके विरोधी हो जाएंगे। कल तक तो आप उनके इशारों पर नाच रहे थे , आज आपने नाचने से मना कर दिया, विरोध बढ़ेगा। दूसरे आपका अपमान भी करें। यही तितिक्षा है,आपको बस सामना करना है। अब आपको अपने भीतर स्थिरता प्राप्त होगी। यह जो शान्ति रहती है, यहां सामर्थ्य और सजगता इस की उपलब्धि के रूप में साथ आती हैं। और सामर्थ्य ही हम चाहते हैं, चाहे हम भौतिकवादी हों, या अध्यात्मवादी, हम सभी की सामान्य इच्छा ‘सामर्थ्य’ प्राप्ति की है। तब जो कार्य है, वह श्रेष्ठतम पूरा हो जाता है। शांति का आधार मस्तिष्क ही है। इस जटिल परिस्थिति में आपकी मित्र आपकी श्वास है। श्वास पर एकाग्रता रहे, मन भटक नहीं पाता है, अनावश्यक विचारणा ही आपको कमजोर बना देती है। यही कर्मयोग का रहस्य है।
शास्त्र का कथन है- ‘योगः कर्मसु. कौशलम।’
कुशलता, उस कार्य को सांगोपांग पूरा हो जाने में है। कोई बाधा न आवे। और यह तभी होता है, जब कार्य के प्रारम्भ में जो शान्ति है, वह अन्त तक बनी रहे। अशान्ति कार्य की परिधि में , कार्य करते समय ,उस संकल्प, विकल्प के प्रवाह से आती है, जो अचानक बाहर से या भीतर से तेज प्रवाह की तरह हमारे पास आता है। यहां उसे देख कर न तो भयभीत होना है, न ही प्रलोभन में आना है। यहां शान्ति अनवरत रहे। यह तभी सम्भव हो पाता है, जब किसी प्रकार की आसक्ति तथा फल की प्राप्ति के प्रति उत्सुकता न रहे। बस कार्य पूरा होना है, कोई राग न तो शेष रहे, न ही निर्मित हो, बस यही याद रहे, जो नवीन परिस्थिति आई है, वह नूतन है, श्रेष्ठतम. है, मेरे हाथ में तो बस जो सामर्थ्य है, उस का ही सदुपयोग होना है। जो काम हाथ में है, वह दूसरों के सहयोग या असहयोग, उनकी अभद्रता से प्रवाहित नहीं हो, यही योग है, प्रारम्भ में बहुत तकलीफ आती है, प्रकृति बहुत इम्तिहान लेती है, जब आप दूसरों के संगीत पर नाचना बंद करते हैं, तो साजिन्दे बहुत नाराज हो जाते हैं। तब आपके भीतर जो आपका ”आत्म“ है, जिसे आप सैल्फ भी कहते हैं, वह आपके साथ है, इसकी प्रतीती होती है। जो आप में आपका आत्मविश्वास पैदा करती है।
यहां यह महत्वपूर्ण है कि हम चाहते क्या हैं? समाधि शब्द के बारे में हम ने स्वामी जी का कथन बताया था। यह कोई किसी अदृश्य. में जा कर शिलावत नहीं होना है। यह तो अत्यन्त ही सजगता, संवेदनशीलता. की स्थिति है, जहां विश्रान्ति है। नया संकट भी खड़ा होता है, आप जो सामने आता है, उसके भीतर की किताब पढ़ लेते हैं, वह अचानक आपको अन्यथा विचारणा के प्रभाव में ले जाता है। क्या बोलेंगे? सही कोई सुनना नहीं चाहता। पग-पग पर विवाद खड़ा हो जाएगा। ” दाइ विल बी डन“ तब कहा गया है। हम जो घटने वाला है, उसे रोकने वाले कौन होते हैं। आप हितकर बोले, तो भीड़ आजाएगी, अहितकर बोले आप नैगेटिव कहे जाएंगे। शास्त्र का कथन चुप रहो, जो हो रहा है, उसे तुम नहीं रोक सकते। तब तुम्हारा विवेक जो कहे उसकी सुनो। विवेक जो सही है वही करने को कहेगा। हो सकता है, परिजन साथ छोड़ जाएॅं, जाने दें। जीवन में पतझड़ का आना आवश्यक है, उसके बाद नई कौंपलें आती है, तब वृक्ष को अपने होने का अहसास उसकी जड़ें सौप देती है।
तब जो भी कार्य हुआ है, हो रहा है, वह उस से असंग. होता चला जाता है। नए राग की कोई निर्मिति नहीं होती है। सामर्थ्य का सदुपयोग ही जब लक्ष्य रह जाता है, वह जान जाता है कि वह मात्र एक यन्त्र है, यन्त्री कोई और है, उस के द्वारा कार्य कराया जा रहा है। तब वह स्वतः ही संकल्पों-विकल्पों की धारा से पृथक रह जाता है।
शास्त्र का कथन है, ‘तान तितिशस्व भारतः।’
वह सुख-दुख के वेग से अप्रभावित रहना सीख जाता है। वह मात्र परिस्थितियों का सदुपयोग करता हुआ एक यन्त्र रह जाता है। तब वह बहुत ही सरलता से उस विश्रान्ति को उपलब्ध हो जाता है, जिसे हम जागृति कहते हैं।
विषय,इन्द्रियॉं, मन, बुद्धि का गठजोड़ हमें संसार में गतिशील रखता है। पर जब हम विवेक विरोधी कर्मों का त्याग कर देते हैं, विवेक विरोधी सम्बन्धों को छोड़ देते हैं, तब अचानक विवेक विरोधी विश्वास भी गिर जाते हैं।
तब जो वर्तमान उपलब्ध होता है, वहां मन में उत्पन्न हुई सभी कामनाओं का त्याग सहज हो जाता है। तब प्राप्त होती है, ‘जो है, जो ”वह“ है, उस से अभिन्नता।’ अपने ”सोर्स“ से जुड़ने का अहसास प्रीतिकर है। ”द्वा सुपर्णा सजुया सखाया“ , हम दोनो साथ- साथ हैं। अब अकेलापन ऊब नहीं देता है। न कोई खीझ है। गुलाबजामुन भी है, और चाशनी भी है, वह डूबा हुआ है। यही स्मृति बनी रहती है।
कबीर कह उठे थे, ”हरि रस पीया जानिए कबहुं न जाए खुमार ,“
यही अभिन्नता जो ”सत“ है, उसके साथ रहने को सत्संग भी कहा जा सकता है। जहां मन अन्तर्मुखी होता है, वहां मन, जो एक कागज की तरह है, जिस की दो परतें होती हैं, दोनों का मुंह दो तरफ है। पर.यूॅं.. समझा जाए, इस अवस्था में यह बाह्य मन अन्तर्मन में विलीन हो जाता है। असत का अस्तित्व इसी बाह्य मन से ही है। वह इस से जुडा़ रहता है। दूसरी ओर ही इस का मुंह है। मुंह के पीछे होते ही,.इसका मुंह, ”स्व“, की ओर हो जाता है। अब जो है, वही इस शरीर से सीधा जुड़ जाता है। विषय, इन्द्रियॉं, और अन्तर्मन यह जोड़ ही तो स्थितिप्रज्ञता है।
शास्त्र कहता है, तब वह अपनी आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, वह स्थितिप्रज्ञ कहलाता है।
यहां उस के सामर्थ्य की उसे प्रतीति होती है। यहां शान्ति और सजगता साथ रहते हैं। यह पलायन का मार्ग नहीं है। भारत के पतन का मुख्य कारण गीता के उपदेशों का आचरण में , अपने जीवन में उतार नही पाना ही रहा है। शास्त्र तो संकेत करते हैं, वे स्वयं ज्ञान नहीं हैं, ज्ञान का पथ वहाँ मिलता है। आपे प्रश्न का संक्षेप में उत्तर यही है, विवेक विरोधी विश्वासों के असहयोग पर प्राप्त कर्त्तव्यपरायणता आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचा सकती हैं
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11 क्या यह व्यवहारिक भी है?
”सिद्धांतः तो आपकी बात सही है, पर क्या व्यवहारिक जीवन में इस अवस्था को पाया जासकता है“?
यह सच है कि यहां किसी प्रयास से नहीं आया जा सकता है। यह पहले भी कहा गया है, प्रयत्न आवश्यक है, यह जानने के लिए कि यहां आने के लिए किसी प्रयत्न की कोई जरूरत नहीं है।
हम सारी उम्र प्रयास करते हैं। भौतिक जगत में प्रयत्न आवश्यक है। खेती नहीं करेंगे तो खाना कैसे खाएंगे? काम तो करता ही होगा।
परन्तु अपने आप से जुड़ने के लिए, अपने ‘स्व’ से जोड़ को पाने के लिए, बस उस विस्मृति को हटाना ही सार है, वही मार्ग है। उस के लिए किसी बाह्य उपाय की कोई जरूरत नहीं है।
पहले भी यह कहा जाचुका है, तकनीक वही है, जो सार्वकालिक हो, हमने सिद्धांत इतने बड़े बना दिए कि वहां तक पहुंचना कठिन? जो जितना बड़ा त्यागी है, उसमें प्रशंसा की भूख उतनी ही ज्यादा है। सामान्य जन इतनी बड़ी बातें सुनकर सम्मोहित होजाता है।
आखिर कमसे कम हम चाहते क्या हैं? हम सुख और शांति चाहते हैं। जिन्हें मोक्ष चाहिए, वे इस दुनिया में क्या कर रहे हैं? उनका एक दिन का उन पर खर्चा हजारों में है। संत चातुर्मास करते हैं, मोक्ष का प्रवचन बांटते हैं, करोड़ों रुपया खर्च होता है। आपके ग्रंथ कहते हैं, एकांतवास करो, जगत से दूर रहो, पर पानी में ही रहकर पानी की बुराई कररहे हैं। यह सब क्या है, हमारे प्रवचनकार हमें जीवन से जोड़ नहीं पारहे हैं।
शास्त्र का कथन है, ‘माम अनुस्मर युध्य च।’
मेरा स्मरण, जो मैं है, उस का स्मरण रहे, तथा कार्य भी होता रहे। यह पलायन का गीत नहीं है। न ही किसी जड़ता की ओर जाने का संकेत है। अब न तो स्मरण रहा है, न युद्ध ही बचा है, संत मत कर्म की उपेक्षा पर ही खड़ा होगया है।
हम .”स्मर“, शब्द को भूल गए हैं। हम उस ‘स्व’ के विस्मरण में ही रहते हैं। बुद्ध ने कहा था, ‘सम्यक स्मृति’ । सत्संग के लिए किसी बाह्य उपाय की, सहारे की जरूरत नहीं है। क्यों कि सत्संग किसी प्रयत्न से नहीं होता है। जहां भी आप सत्संग के नाम पर जा रहे है, वहां मात्र मनोविनोद ही है। अच्छी भाषा में आप उसे सामाजिक संवाद कह सकते हैं।
ध्यान का क्या अर्थ है, यह शब्द जहां भी गया है, वहां इस का अपना स्वतन्त्र अर्थ हो गया है। एकाग्रता से ले कर निर्विचारिता तक ध्यान शब्द का ही प्रयोग होता है। जो इस को सिखाने के सम्प्रदाय चल रहे हैं, वे अपने गुरु के छाया-चित्र या नाम,रूप या मन्त्र पर ही एकाग्रता को ध्यान कहते हैं। मन जब कहीं भी एकाग्र होता है, तब कुछ शान्ति, कुछ सामर्थ्य का बोध होता है। पर यह ध्यान प्रयत्न का ही एक प्रकार है। यह तो जब हम करते हैं, ध्यान से यह काम करो, वहां जो सावचेत रहने को कहा जाता है, वह भी यहां अभिप्रेत है।इन ध्यान माग्रियों का प्रयास जीपन- जगत से काटकर किसी आश्रम में अपनी ही व्यवस्थाको सौंप देना अधिक होगया हैे।
परन्तु इसी लिए स्वामी जी ने कभी ध्यान शब्द का प्रयोग नहीं किया। न ही वह सत्संग शब्द का प्रयोग करते थे। उन का प्रिय शब्द था, ‘वर्तमान में रहो’, वर्तमान में वही है, जहां अविनाशी का संग है। यहां किसी प्रयत्न से नहीं आया जाता। प्रयत्न तो गिर जाते हैं। भक्ति मार्ग में कहा जाता है, यह तो कृपा से मिलता है, यह कृपा शब्द का भी अपना अलग अर्थ हो गया है। आज के गुरु, जो अपने दरबार तक लगाने लग गए हैं, अपनी कृपा तक इस शब्द को ले गए हैं। पुरानी कहावत है, सोए हुए को तो जगाया जासकता है, पर जो मूढ़ता में जगा हुआ हो, उसे जगाने के लिए सोै विवेकानंद भी आजाएं , कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
महत्वपूर्ण शब्द है ‘आत्म-कृपा’। यह आत्म-कृपा जब सारे प्रयत्न छूट जाते हैं, दूसरे का आश्रय चला जाता है, तब स्वतः प्राप्त होती है। यहां पाने का मार्ग, अपने आप से जुड़कर पाया जासकता है। सरल भाषा में‘निर्विचारता’ में रहना है।
क्या यह निठल्लापन है? कहीं किसी आश्रम या हिमालय की कन्दरा में जा कर बैठ जाना है। जो योग शिविर. लगाते हैं, वे अपने साधकों को जीवन और जगत से काट कर कहीं एकान्त में ले जाने की बात कहते हैं। एक सत्संग से मित्र आए थे, वे वहां पदाधिकारी भी थे, बोले सात दिन का सत्संग था, मौन रखा गया। श्वास पर एकाग्रता का अभ्यास कराया गया था, पर सातवें दिन सब खूब बोले।
” क्या वहां से आने के बाद बोलना कम हुआ?“
वे बोले, आपको लगता नहीं ,” मैं पहले से अधिक बोलने लग गया हूं।“
कभी किसी मुसलमान को रेलवे स्टेशन पर नमाज पढ़ते देखा है?
वह उस भीषण शोर में भी वह अपनी बंदगी कर लेता है।
अविनाशी के साथ सत्संग सब जगह सम्भव है, बाहर तो कोलाहल यथावत रहेगा। भीतर का दिया ही जब जलता है, तब भीतर का अंधेरा तो कम होने लगता ही है, बाहर का अंधेरा अब प्रभावित नहीं कर पाता है। तब आत्म-कृपा प्राप्त होती है।
जहां कोई हवा नहीं है, वहां ही दिया जलता है। जब भीतर का कोलाहल समाप्त हो जाता है, बाहर के शोर से क्या घबड़ाना ,वह तो यथावत ही रहेगा। हजार साल हम बाहर के शोर को कम करने के प्रयास में लगे है। बुद्ध , महावीर , पतंजलि, शंकर नामों की लंबी श्रृंखला है, जो बाहर के कोलाहल से भागकर, आमजन को भगाकर किसी कल्पित मोक्ष, समाधि, की महान अवधारणा में समाज को नियोजित करते रहे।
बाहर के कोलाहल से क्या भयभीत होना। शास्त्र कहता है, कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं हो सकती है, हमारा सारा जोर इस पूंछ को सीधा करने में रहा। हां , भीतर मन अकंपित होता चला जाए। बुद्ध के जीवन का सार तत्व महत्वपूर्ण है। पतंजलि ने जो अंत में कहा वह महत्वपूर्ण है। चित्त अकंपित हो जाए, यही रहस्य है। महावीर का सारा जोर ”संवर“ अवस्था पर रहा। जहॉं चित्त कषायों से मुक्त है। बाहर भीतर के हर संवेग में अप्रभावित।
भीतर का दिया एक बार जल जाए, फिर वहाँ कोई कम्पन नहीं रहता।
छोड़ना और छूटना सब भीतर का है। किस ने किस को बांधा है? बाहर तो बेड़ियां नहीं हैं, हम ने ही अपने आप को जकड़ा दिया है। मुक्ति किससे? कभी विचारा है, मन ने ही बांधा है, वही खोल सकता है। यह खूंटा तुमने ही बांधा है, तुम ही उखाड़ सकत हो।
भीतर का उपद्रव हम ने ही खड़ा किया है। हम ही इस उपद्रव को कम कर सकते हैं। यहां करना कुछ भी नहीं है। कोई प्रयत्न नहीं है, बस जो हम चाहते हैं, वही हो जाना है। यह वर्तमान की ही उपज है। वर्तमान में ही पाया जा सकता है। यह पहले जाना था, जितना हम विवेक विरोधी कार्यों को कम करते जाते हैं, सामाजिक रूप से हमारे विवेक विरोधी सम्बन्ध छूटने लगते हैं। और यह संभव हो पाता है, विवेक विरोधी विश्वासों के कम हो जाने से।
बाबा, ज्योतिषी, वास्तु, ग्रह- गोचर, व्रत उपवास सभी कर्मकांड वृक्ष के पीले पत्तों की तरह स्वतः गिरने लग जाते हैं।
यही वह ‘वैराग्य’ है, जहां कपड़े नहीं बदलते। भगवा पहनकर अपने त्याग और वैराग्य की धोषणा नहीं करनी पड़ती। न ही कोई औपचारिक रीति-रिवाजों का पालन होता है। जिसे छूटना है, वह स्वतः होने लगता है। पकड़ा जिसने था, उसकी पकड़ कमजोर होते ही जिसे छूटना होता है, वह स्वतः छूटने लग जाता है।
तब विवेक विरोधी सम्बन्धों के शिथिल होने से सत्संग प्रारम्भ हो जाता है। यह सत्संग किसी पाठशाला में सिखाया नहीं जाता। न ही यह किसी बाह्य उपाय के अधीन है। न इसे सीखने के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत है।
यह त्याग तो विवेक के आदर से होता है, विवेक ही है, जो हमें हमेशा ‘सही’ की तरफ ले जाता है। वेद ने इसे ‘ऋत.’ कहा था। इस से ही अंग्रेजी का ‘राइट’ बना है। जिस की सामान्य परिभाषा है, जो गलत नहीं है। ज्यों ही हमारे भीतर इस विवेक का अनादर होता है, हम बुद्धि चातुर्य का सहारा लेते हैं, उसी समय जो असत है, उस की कामना उठ खड़ी होती है। हम बहिर्मुखी हो जाते हैं। फिर दुख का चयन कर लेते हैं। जो हमारी उपलब्ध शान्ति को भंग कर देती है। हमें लगता है, हम फिर किनारे पर आ कर गिर पड़े हैं।
न तो हम कल दूर थे, न हम आज दूर हैं। पर कभी जब कुछ गलत हो जाता है, तब स्वतः यह आभास हो जाता है कि हम आज दूर आ गिरे हैं, यह उसी ज्ञान का, विवेक का, सत का ही प्रभाव होता है, जो हमारे साथ रहता हुआ हमारा मार्ग दर्शन करता है। इस प्रभाव का आदर होते ही हम पुनः इस दूरी को कम कर देते हैं।
तब बात बहुत सरल हो जाती है। हम चाहते हैं, यह अवस्था बनी रहे, यह उसी प्रकार है, जैसे गुलाब जामुन चाशनी में रहा हो, बस। मार्ग एक ही है, वह है, हम वहां रहें, बस रहें, वह शान्ति ही बहुमूल्य है। जो बार-बार हमें धक्का देता है, उछालने का प्रयत्न करता है, उस वेग को सहन करें, उस से प्रभावित नहीं हों।
यह एक स्वाभाविक क्रम है। हम शान्ति में हैं, हम उस के समीप हैं, हम उस के समीप हैं, इस की पहचान है, हम शान्त हैं। शांति निठल्लापन नहीं है। यहाँ अकर्मण्यता नहीं है। प्रमाद नहीं है। अत्यधिक सक्रियता है। सृजनात्मकता है, जिसे हम चाहते हैं। हमने अघ्यात्म को भक्ति की सुमधुर निद्रा में सुलाने का जो प्रयास किया, उसने समाज का, परिवार का, व्यक्ति की अहित हा अधिक किया है।
होता क्या है? परम्परागत साधनाएं, दमन पर आधारित हैं, ये इस प्रभाव को, जो असत के आदर से बना है, हमारे भीतर संग्रहित है, उस के उछाल को दबाने का प्रयास करता है। जितना हम दबाएंगे, वह उतनी ही तीव्रता में, उछल कर आगे आएगा। हमारे व्यवहार में असंगतता आ जाती है। हमारा शरीर हमारा मन तथा हमारे व्यवहार इस संगति को भूल जाते हैं। हम सोचते हैं, जिस के भीतर इस प्रकार की अव्यवस्था है, वह उतना ही बड़ा योगी है। यही बहुत बड़ा भ्रम आज उपस्थित हो गया है। तथाकथित भक्ति के आचार्य पांच विकारों से लड़ रहे हैं, जिन्हें विकार कहा गया है, उसे मनुष्यता के साथ मोक्ष के पथ पर अहितकर माना गया। विकार का अर्थ होता है, विकसित होने का भाव, रूपांतरण, गति। यही प्राकृतिक विधान है। हमारा निष्कर्ष सामर्थ्य के सदुपयोग पर है, हम असत के असहयोग को स्वीकार नहीं करते। हम असत के सदुपयोग को जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं।
जब इस मार्ग पर चलकर हम विवेकाधीन होकर कर्त्तव्यनिष्ठ बनते हैं, तब स्वाभाविक रूप से हम जीवन के उद्देश्य से जुड़ जाते हैं। आपने खिलते हुए गुलाब को देखा होगा, उसकी हर पंखुड़ी खिल जाती है, बाद में वह झर जाता है। जीवन का उद्देश्य अपने सामर्थ्य का पूर्ण विकास पाना है। शास्त्र की आज्ञा है, वह पूर्ण है, उससे जो भी उत्पन्न हुआ है, वह भी उतना ही पूर्ण है, उसकी आज्ञा हमारे लिए अपनी पूर्णता पाना है। इमली ,कटहल नहीं होसकती । यही प्राकृतिक विधान है। परन्तु लधु से लघुतम भी अपनी पूर्णता पाने में समर्थ है।
जहां शान्ति है, वहीं सामर्थ्य है, वहां एक संगति है। सभी वाद्य एक साथ एक धुन में बजते हैं। शास्त्र कहता है, वहीं रस है, रस ही आनन्द है। यहाँ संगति दमन से प्राप्त नहीं है। भगवान बुद्ध अपनी निष्प्राण प्रतिमाओं में भी सजीव हैं, चिन्मय हैं। ‘ध्यान’ जहां इस मूक सत्संग की अभिव्यक्ति है, जहां भीतर का कोलाहल सब शान्त हो गया है। भीतर ‘आत्म-दीप’ जल उठा है। तब प्रमाद चला जाता है, अकम्पित लौ, दीपक जलता है। यह सामर्थ्य का, शान्ति का प्रतीक है। वहां निर्विकारता, निर्विचारता, अहर्निश. निवास करती है। बस करना यही है कि यहां सावचेत रहें।
गोरख कहा करते थे, ‘सदा सुचेत रहे दिन-रात, सो दरवेश अलख की जात।’
वह दरवेश है, वहां द्वार खुल जाता है। बस सावधानी रहे, इस उत्पन्न हुए प्रभाव के साथ कोई सहयोग नहंी करना है। यह .उठेगा फिर., अपने आप गिर जाएगा। इसे किसी भी प्रकार के दमन से दबाना नहीं है।
वर्तमान में रहना ही, ध्यान की उपलब्धि है। यही मूक सत्संग है। यही मौन है। मौन मात्र वाणी का चुप रह जाना नहीं है। महाभारत में, राजा जनक तथा एक योगिनी की कथा आती है, जहां राजा जनक को परास्त होना पड़ता है। सारांश में, कर्म जब जहां वाक में ढलता है, जब वाक का नियन्त्रण मन से होता है। तब वाक, विचार में लीन हो जाती है, विचार, निर्विचारता में। संत कबीर ने कहा है, ”कहत कबीर वा पलक की कलप न करियो कोय“, यही अपने घर में अपनी वापसी होती है।
जहां निर्विचारता है, वहीं निर्विकारता भी है। यहीं वास्तविक मौन है। यही मूक सत्संग है, यही ध्यान है, यही वह वर्तमान है, जो अन्तर्मुखता की उपलब्धि है।
स्वामी जी कहा करते थे, यहां किसी प्रकार से प्रयत्न की कोई जरूरत नहीं है। न ही यहां धन खर्च करना है। न ही कोई आडम्बर है। न ही प्रदर्शन की भावना है। यहां वह शान्ति है, जिस की उपसम्पदा सामर्थ्य और अभिव्यक्ति प्रेम है। यहां आने के लिए प्रयत्न की किसी प्रकार की आवश्यकता नहीं है।
स्वामी जी कहा करते थे, प्रयत्न इसी लिए किए जाते हैं, यह जाना जाए कि प्रयत्न की कोई आवश्यकता नहीं है।
हम काम क्यों करते हैं? हमारी मज्बूरी क्या है? इस का पता करें। प्रयत्न कुछ पाने के लिए किया जाता है। हमारी अपनी तो निजी आवश्यकता बहुत कम होती है। हम यह तो चाहते हैं कि जो भी काम हम कर रहे हैं, वह सही ढंग से पूरा हो जाए। पर अगर फल की आकांक्षा नहीं है, तो वह कार्य अपने आप प्राकृतिक विधान से पूरा हो जाता है। मन, कार्य में ही रहे, इस से इतर नहीं जाए। यह कठिन तो है, पर असम्भव नहीं है। तब सही काम अपने आप होने लग जाता है।
बहुत से लोग कहा करते हैं, यह तो आलसियों का दर्शन है। हम पहले ही प्रयत्न और पुरुषार्थ का भेद स्पष्ट कर आए हैं। कुछ न करने का अर्थ आलस्य नहीं है। परन्तु जो आप के पास है, आप की सम्पति है, आप का ही है, उसे प्राप्त करने के लिए, उस का संग सुनिश्चित करने के लिए किसी प्रयत्न की कोई आवश्यता नहीं है।
”जो “है, न तो उस से दूरी है, न वह पास है, मात्र उस का अहसास नहीं है। उस का अनुभव ही उस का सान्निध्य है। उस की अभिन्नता को पाना, जो बाधा है, बस उसे हटा देना है, और वह मात्र है, आप का ‘मन’। विचारों का, विचारणाओं का, स्मृतियों का, अवधारणाओं का वह संग्रह जो एक बादल की तरह निरन्तर छाया रहता है। उस के होने से वह बहुत दूर है, उस के हटते ही वह पास है। वह तो अभिन्न है, यही वर्तमान में रहना है।
वहां क्रिया यथावत होगी, विषय भी होंगे, पर अब ‘मन’ जो है, वह उस में, हम जिसे अन्तर्मन कह रहे हैं, शास्त्र जिसे ‘आत्मा’ कहते हैं, उस में विलीन हो गया है। वह अब शरीर के कार्य-व्यवहार को संभाल लेता है। दृष्टि बदल जाती है। शास्त्र कहता है, ‘योगः कर्मसु कौशलम्।’ यहां जो कृत्य है वही कुशलता से हो जाता है। क्या यह हम अपने जीवन में नहीं चाहते हैं?
और तभी कहा गया है-
”चाह गई, चिन्ता गई, मनुआ बेपरवाह।
जिस को कछु नहीं चाहिए, वो ही शहन्शाह।।“
वहां भिखारी चला जाता है। दाता का जन्म हो जाता है। जहां लोभ है, वहां चाह है, जहां चाह है, वहीं चिन्ता है। यह डोरी हम ने बनाई है, हम ही इसे तोड़ सकते हैं। इस के टूटते ही, हमें हमारा सामर्थ्य मिल जाता है।
भौतिकवादी मित्र कहते हैं, वे इस बुद्धि प्रत्यय से बाहर न तो कुछ चाहते हैं, न जानना चाहते हैं। जिन्हें आप कर्तव्यपरायणता चाहते हैं, वह कहां से आएगी? आप भीड़ में रहते हुए भीड़ को नहीं देख सकते, आप को कहीं ऊपर जा कर भीड़ को देखना होगा। आप स्वयं भीड़ का अंग हैं, वही चाहते हैं, जो सब चाहते हैं। दूसरा दाल-रोटी में खुश हो जाता है, आप की भूख पांच सितारों के भोजन से भी नहीं मिटती है। उस का छोटा-सा लोभ है, आप का बड़ा है। क्या राजा, क्या प्रजा, क्या साधु, क्या सन्त? सभी ने लोभ की कामना भी ओढ़ रखी है। कपड़े बदलने से, भेषभूषा बदलने से स्वभाव. नहीं बदलता।
सच है, जब अपने लिए कुछ नहंी चाहिए, तभी कर्तव्यपरायणता आती है। और बेहतर जिन्दगी जीने के लिए अपने आप को समाज में उपयोगी बनाए रखने के लिए यह वर्तमान में जीने की कला आनी चाहिए। और यह कला किसी प्रयत्न को प्राप्त नहीं होती है। यह तो अपने भीतर उतर कर जो असत है, जो अवांछनीय है, जो अनुपयुक्त है, उस का निरन्तर असहयोग करने की क्षमता का विकसित होना है।
हम ने यह तय किया कि हम यह नहीं करेंगे, यह वर्तमान में रहना नहीं है, यहां तो जो आप का सामर्थ्य है, उस का सदुपयोग है। जो न करने योग्य है, उसे आप पहले ही छोड़ आए हैं, अब जो होना है, आप वहां हैं। तब आप का सामर्थ्य सदुपयोग के होने से स्वाभाविक रूप से आप के जीवन में कर्तव्यपरायणता ले आता है। क्योंकि आप ने कहा, आप कुछ न करेंगे, यह तो संकल्प प्रमाद ही पैदा करेगा। यहां तो करने का त्याग नहीं है। काम तो जब तक जीवन है, आप को करना ही होगा। त्याग तो संकल्पों का होना है। आप काम करते समय जो आप निरन्तर सोचते रहते हैं, चिन्तन रत रहते हैं,इस वृत्ति का त्याग है।
तभी भगवान पतंजलि ने कहा था- ‘चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है।’
निरोध किसी नाश का नाम नहीं है। वृत्तियां जो उठ रही हैं, वे तो उठती रहेंगी , पर मन उनसे प्रभावित नहीं होगा। तब शान्ति का अनुभवन रहता है। ं, तब जो अवस्था है, वही योग है।
विषय तो रहेंगे, विषयों से दूर नहीं भागा जा सकता है। घर छोड़ आए हैं, आश्रम बना लिया, सन्तान छोड़ आए, शिवालय बना लिया। क्या यह त्याग है?
वृत्तियां भीतर उठ रही हैं, इन का त्याग, इन की समाहिति ही त्याग है। तब विषय रहेंगे, वृत्तियां भी रहेंगी, पर मन जो अन्तर्मन में, आत्म में, स्व में, संज्ञा आप जो भी दें, ‘सत’ में विलीन हो गया है। सत का सामीप्य पा गया है। वह अपने भीतर मौलिक परिवर्तन पा चुका है।
क्या यह अवस्था हमें अभीष्ट नहीं है?
आप जब भी कोई कार्य करते हैं, कार्य की पूर्णता पर जो शान्ति प्राप्त होती है, भले ही वह क्षणिक हो, अगर वहां उस का निरीक्षण नहीं किया जाए, उस आस्वाद को रखा जाए, जो स्थिति प्राप्त होती है, उसी को सुरक्षित रखा जाए तो इस वर्तमान में रहने की अवस्था का प्रारम्भ हो जाता है।
परन्तु होता इस के विपरीत है। कार्य के समय भी तथा कार्य के अन्त में भी यह आगे-पीछे का चिन्तन हावी हो जाता है। यह हमारे न चाहने पर भी होता है। इससे से छुटकारा पाने के लिए ही हम नशे की ओर बढ़ जाते हैं। हम इस प्रवाह को रोकना चाहते हैं, या अपने अभीष्ट सांचे के अनुसार चाहते हैं। यही प्रमाद है।
इस से बचने का, इस को हटाने का एक ही उपाय है कि इस के साथ असहयोग रखा जाए। इस अपने आप होने वाली स्थितियों को, वृत्तियों को बलपूर्वक हटाने का प्रयास व्यर्थ है। इन्हें किसी प्रकार भी बलपूर्वक नहीं दबाया जा सकता है। हठयोग, राजयोग, सभी बाह्य उपाय व्यर्थ की बाजीगरी. बन कर रह गए हैं। हां, जब हम इस अप्रभावित होने वाली अवस्थाओं से जब असहयोग प्रारम्भ कर देते हैं, तब इन का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लग जाता है।
‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’ यह शास्त्र की भाषा है। यह बात सही है, कुएं में जाती हुई डोरी अचानक टूटती है। पर उस का टूटना बहुत पहले से शुरू हो जाता है।
हमारी गलती इसी बुद्धिजन्य ज्ञान के आदर पर है। कहा जाता है, ‘जाग्रति’ अचानक होती है, पर यह ‘.......स्वे स्वे......... कर्मण...’ निरन्तर चलते रहो, चलते रहो, यहां चलने का अर्थ कोई बाह्य यात्रा नहीं है। हां, भीतर इन वृत्तियो से निरन्तर असहयोग करने की क्षमता बढ़ाते रहो, बढ़ाते रहो, यही कला है। जो हमें वर्तमान में रहने की कला सौंप जाती है। यहां सभी अवस्थाओं का प्रभाव अपनी उपयोगिता तथा प्रासंगिकता खो देता है।
12. हमारी आज की समस्याएॅं औेर धर्म
” हमारा सीधे सवाल है,क्या आज जो समस्याएं हैं, जो पूरा विश्व एक विचित्र प्रकार की अमानुषिक हिन्सा से व्यथित है, जहां पूंजी और टैकनोलोजी, प्रभुत्व वर्ग के हाथों में आ कर, पूरे समाज की स्वतन्त्रता को रोक रही है, वहां क्या यह विचार सहायक हो सकता है? आपने सुना होगा भारत के कुल छःहजार परिवारों के पास देश की सत्तर प्रतिशत से अधिक पूंजी है, भारी असमानता है, क्या धर्म गरीबों के लिए ही है?“
”क्या जो आप कह रहे हैं, यह शुद्ध विचार, आज की परिस्थितियों में प्रासंगिक भी है?
”आप किस प्रकार के आधुनिक मनुष्य की कल्पना कर रहे हैं? जहॉं सत्ता ,व्यवस्था अनैतिक हाथों में ही सिमट गई है?“
कई प्रकार के सवाल जो एक विशिष्ट प्रकार के संदेहों को ले कर हैं, इस यात्रा के दौरान आए हैं। आपसे ही मिले हैं। कुछ सवालों को हम ने हल कर लिया है। प्रयत्न और पुरुषार्थ के सम्बन्धों की नई विवेचना की है। जो असत है, वह भी इसी सत की ही छाया है। उस की व्यावहारिक सत्ता है। प्रयत्न वहां करना है। प्रयत्न ही साधन है। प्रमाद का कोई आदर नहीं है। आलस्य व अकर्मण्यता सहायक नहीं है। अभय और विवेक के दो पंख हर पक्षी को मुक्त आकाश में उड़ान भरने में सहायक हैं। गांधी का सत्याग्रह अभय का ही प्रयोग था, उनकी कमी पतंजलि और धर्म के प्रभाव में तथाकथित यम और नियम को उसी रूप में जो सन्यासी के लिए निर्धारित थे , आम जन को सोंपने में रहे थे। हमने असत के सदुपयोग पर पूर्व में विचार किया है।
‘माम अनुस्मर युध्य च’
यद्ध तो करना ही है, पर स्मरण हमेशा बना रहे। स्मरण रहे, यह किसी कल्पना का नाम, जप, ध्यान, पूजा नहीं है। स्मरण मेरा , किसी नाम ,रूप का नहीं है।
यही कहा गया है, ”मम माया दुरत्या.“, यह मेरी माया है। मेरी, ”माम“ और ”मम“ का भी भेद जानना आवश्यक है। माया मैंने बुनी है, लोभ मेरा है, क्रोध मेरा है, पर पार मुझे ही जाना है। अभय मुझे ही पाना है। स्वतन्त्रता मुझे ही पानी है। प्रेम मुझे ही पाना है। और यह कोई दूसरा नहीं देगा।
”माम,“ की शरणागति में ही सार. है।
”माम,“ जो कुहासे में छूट गया है। साथ है, पर उस का सान्निध्य प्राप्त नहीं है। यह जो विचारों का कुहासा है, स्मृतियां, अवधारणाएं, अनावश्यक विचारणा, यह दिखाई नहीं पड़ती। दूसरा क्या बताएगा? क्या सदा सहारा देगा?
यह तो मुझे ही पता है। यही मेरा आन्तरिक तथ्य है, इस को मैं ही जानता हूं। इस प्रवाह का असहयोग ही सहारा है। इस की निर्मूलता ही मेरी सफलता है। तब भय हट जाता है। प्रयत्न पूरा होता है, सौ टका होता है। अपने आपको पूरा झोंकना पड़ेगा। तब जो प्रयत्न है, वह सृजनात्मक होगा । मौलिक होगा। क्या सफलता मिलेगी, मिल भी सकती है, नहीं भी मिलेगी, कुछ और भी फल सामने आ सकता है, पर खिन्नता नही ंहोगी। हर अवस्था में शांति तथा मन की शक्ति बनी रहेगी। यहॉं आत्मविश्वास जगता है, जिसका आज अभाव होगया है, हर बाबा , धर्म प्रचारक तुम्हें दीन- हीन बनाकर लूट रहा है।
तब जो ‘माम’ है, जो स्व है, जो वर्तमान है, जो मेरा सत है, वह ,”है“। वहां ”मैं“ का विलीन हो जाना है। यह ”माम“, ही अन्तर्मन है, जो विराट से स्पन्दित है। जहाँ शक्ति है, वहॉं विपन्नता नहीं है।
जो ‘वह’ है, वह इस तथाकथित तुम्हारे मैं से बहुत दूर है। मैं बहुत दुखी है। मैं पराजित हूॅं, वह नहीं कहेगा । वह नया मनुष्य , जो शक्तिशाली है, जिस के पास समार्थ्य है, शान्ति है, स्वतन्त्रता है, वह आज के इस मनुष्य की तरह शक्तिहीन नहीं ं होगा। आज का मनुष्य बाबाओं के दरबार में जाकर भीख मांगता है। जो कुछ उसके पास है, उसे गवांकर आता है।
यह काई मात्र अवधारणा नहीं है। मात्र कपोल कल्पना नहीं है। यह फैण्टेसी स्पाइडर मैन की खोज नहीं है। यह हैरी पोर्टर की जादुई शक्ति नहीं है। यह वह सूत्र है, जहां उस आधुनिक मनुष्य की संरचना छिपी हुई है, जो हम सब का तथ्य है।
एक नया मानव, जो साम्प्रदायिक प्रवाह से मुक्त है, जो इस सम्पत्ति और टैक्नोलोजी से गलत गठजोड़ से जो अमानवीय प्रभुता पैदा हो गई है, उस का सामना करने में समर्थ है। यहां तथाकथित पलायन का गीत नहीं है। शान्ति किसी आश्रम में प्राप्त होने वाली उपसम्पदा नहीं है। यह तो इसी जीवन में जहां युद्ध है, जो युद्ध पाश्विक शक्तियों ने गठजोड़ कर सौंपा है। जो दूसरे को ‘एक इंच, सुई की नोक के बराबर जमीन’ भी नहीं देना चाहते हैं, उन के साथ खड़ी होने वाली ताकत है। महाभारत पॉंच पांडवों की मूर्खता की कहानी है, आज भी हमारी स्थिति वही है, तब कृष्ण उनके साथ थे, वे नही ंहोते , एक इंच सुई के बराबर जमीन भी नहीं मिलती और द्रोपदी भी चली जाती।
आज वे हमारे साथ नहीं हैं, पर उनकी सीख है, विवेक का आदर तथा सामर्थ्य का सदुपयोग उनकी देन है। जो अभय और कर्त्तव्यपरायणता सोंपती है।
धर्म वहीं असफल हो जाता है, जहां वह समाज से हट कर किसी अरण्य की तलाश करता है। जैसे पलायन का गीत गाता है। तभी समाज को शारीरिक, मानसिक , बौद्धिक , आर्थिक गुलामी झेलनी पड़ती है। यहां यह नया धर्म जिस की बुनियाद अध्यात्म है, प्रयत्न है। मनुष्य के अन्तःकरण में ही लड़ा जाता है। उसे अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर मजबूती के साथ खड़ा होना है। संसार असत तो है, निरन्तर बदल रहा है, पर स्वप्न नहीं है। इसकी व्यवहारिक सत्ता है। जीवन जीने के लिए मिला है, जीवन जीने की कल हमें आनी चाहिए।
‘सम्भवामि युगे-युगे’
हम अवतार की प्रतीक्षा में हैं, धर्म-अधर्म का द्वन्द्व हमारे भीतर ही हो रहा है। यह सनातन युद्ध है। क्या सही है, क्या गलत है? यह हमें पता है। जो गलत है, उस का छूटता जाना, सही के आदर करते ही शुरू हो जाता है। ‘असहयोग’ महात्मा गांधी का हथियार था। वह मात्र राजनैतिक हथियार ही नहीं है, यह तो मनुष्य के आन्तरिक परिवर्तन का हथियार है। हमें जो सही है, उसी के साथ सहयोग करना है। विवेक हमारे पास सही की सूचना ले कर आता है। वह ब्रह्मास्त्र.. है। जहां विवेक है, वहीं कृष्ण हैं, जहॉं प्रयत्ल है,वहीं धनुर्धर अर्जुन है। वहीं सुख है, शान्ति है, वहीं नीति है। वहीं अभय है। नया मनुष्य आत्म विश्वासी होगा। उसके भीतर पोलापन नहीं होगा। जिसे परम्परागत धर्म-सम्प्रदाय ने हमें सोंपा है।
यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जब हम वर्तमान को उपलब्ध होते हैं, वहां कोई वीतरागता नहीं होती, कोई पलायन नहीं होता। कर्म सन्यास नहीं होता। तथाकथित सन्यासी तो बहुत अधिक लोभी है, प्रशंसा का भी, और मोक्ष रूपी काल्पनिक अमर फल का भी।
यहां जो ”करना“ होता है, वह होने में, जो ”होना“, वह ”है“ में, खो जाता है। कृष्ण मूर्ति इन शब्दों को ‘स्टेट ऑफ डूइंग’, ‘स्टेट ऑफ बीइंग.’ तथा ‘स्टेट ऑफ लिविंग’ में समझाने का प्रयास करते थे। यही बात अन्य दार्शनिकों ने भी बताई। यहीं बहुत से लोग यहाँ, काल्पनिक शब्द, एन लाइटंेड शब्द, ‘जाग्रति’ की चर्चा करते रहे। लक्षणों के आधार पर वैसी ही नाटकीय मुद्रा अपना कर सन्तगीरी शुरू हो जाती है। जरा सा धक्का लगता है, मुलम्मा उतर जाता है।
करना, होना और रहना, यह कोई विसम्वादी स्वर नहीं हैं। हम जब भीतर से जुड़ते हैं, उस अहसास को पाते हैं, तो जो सदा चिपका रहता है, जिस की चर्चा हम ने विवेक विरोधी कर्म तथा विवेक विरोधी सम्बन्धों , विवेक विरोधी विश्वास के साथ बताई थी, वह स्वभाव, वह चिपकाव गिर जाता है। करना वहीं तक साथ रहता है, जब यह पता लगता है कि इस प्रकार के करने की कोई जरूरत ही नहीं थी। तब एक धक्का-सा लगता है। हम बस ”वह “,हो जाते हैं, क्या? यह हम भी नहीं जान पाते हैं। क्यों कि बाहर तो कुछ भी नहीं करना है। जो कपड़े कल थे, वहीं आज पहने हैं, जैसे कल रह रहे थे, वैसे आज रह रहे हैं। पर भीतर की देखने की आंख बदल जाती है। जो बहुत सा कीमती सोच रखा था, वह फालतू रह जाता है। इस अवस्था को आप पा सकते हैं, बस आप होगए। कल तक वह कन्या थी, रात को फेरे पड़े , वह विवाहिता होगई।वह कन्या से महिला बन गई। यह ”होने“, की अवस्था विचित्र है। बाहर कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ता , इसीलिए लड़की मॉंग भरती है, बिन्दी लगाती है, पता लगता है, विवाहिता होगई। पर यहाँ बाहर कुछ नहीं बदलता, बाबा तरह- तरह के विन्यास करता है, बह-रूप धारण करता है, पर भीतर सेवह बॉंझ ही रह जाता है। ”होने“ की अवस्था में आंतरिक परिवर्तन हो जाता है। वह मात्र साक्षी रह जाता है। गवाह बस।
संत कबीर ने कहा है-”बरसा बादल प्रेम का भीग गया सब अंग“
सूफियों में उर्स के समापन पर गुसल की रस्म होती है, फिर” रंग“,की महफिल होती है। यह उस ”होने“ की स्मृति की याद दिलाती है।
हमारे यहॉं , होलिका दहन हो जाता है, बस प्रहलाद बच जाता है। फिर हम रंग का त्यौहार मनाते हैं, एक नया दृष्टिकोण जाग जाता
भीतर- ”बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं।“ यही बस होना है। फिर जब तक ‘वह’ चाहे, रहना है। कभी-कभी भुक्त-अभुक्त वासनाओं का प्रवाह जोर मारता है, तब बस सावचेत रहना है। बदलना नहीं है। जो कार्य प्रकृति कराना चाहेगी, वह होना है। अपना संकल्प तो नहीं होता, दूसरे का संकल्प ही घटित हो जाता है।
क्या इस कर्तव्य परायणता को हम नहीं चाहते हैं? क्या इस योग्य व्यक्ति की जो कापुरुष नहीं है, जो पलायनवादी नहीं है, जो इस महाभारत में सामने खड़ा है, हर परिस्थिति का सामना कर सकता है, क्या हम ‘वह’ होना नहीं चाहते हैं।
अध्यात्म पलायन की पाठशाला नहीं है।
जिस का अपने ऊपर विश्वास नहीं होता, उस का कोई विश्वास नहीं करता। जब यह व्यक्ति जो हमारा लक्ष्य है, उपस्थित. होगा, तब उस की उपस्थिति निश्चितही, जो स्व है, जो वर्तमान है, वही तो अमरत्व है, उस की उस के साथ जो अभिन्नता होगी, वह अभिमन्यु की तरह वरेण्य रहेगी।
इसी लिए वर्तमान में रहना, माना एक परिकल्पना नहीं है, हम सबके लिए आवश्यक है। यह तो जीवन की वह कला है, जिस की विस्मृति होगई है। यही जीवन है, जीवन के साथ रहने की, जुड़े रहने की कला है।
यहां फिर बात को दोहराना उचित है, अभी तक परम्परागत साधनाओं से हम ने यही जाना है कि यहां कुछ करना होगा, कुछ त्याग करना होगा, वैराग्य लाना होगा, कहीं आश्रम में जाना होगा, सब प्रकार के उपाय बताए जाते हैं।
हम जानते हैं, हम जब कुछ करते हैं, तो यह करने का अहसास हम को हमेशा एक अहंकार में बांध लेता है।
अत्यन्त त्यागमय दर्शन, तथा धर्म के अनुयायी जब स्वयंभू, देवी-देवता बन जाते हैं, अपना पुजापा शुरु करा देते हैं,तब वे यह नहीं जानते कि उन्हें सौंपा गया, यह अहंकार उन्हें उन के साथ के उन के ही ”दर्शन,“ से कितनी दूर ले जा रहा है? यही वह अविवेक है, जो जकड़ लेता है। हर प्रकार का देह पर आधारित, श्रम, प्रयत्न, कर्मकाण्ड, मात्र अहंकार ही सौंपता है। जब तक देहाभिमान है, राग-द्वेष से पीछा नहीं छूटता है। सभी विकार यथावत रहते हैं। पराधनीता रहती है, अशान्ति रहती है, भय रहता है। आज हम व्यक्ति से भीड़ में बदल गए हैं। व्यक्ति बहुत दुर्बल है, तथा भीड़ संगठित हो गई है। इम ने स्वयं अपने आप को भीड़ के हाथों एक पुर्जा बना दिया है। यह कमजोर मनुष्य इस नए महाभारत में कैसे लड़ पाएगा?
हां, जितना हम वर्तमान में रहने लगते हैं, हम भीतर निर्विचारिता का आदर करते हैं, शान्त रहते हैं, उतना ही हम बाह्य जीवन में शक्तिशाली भी रहते हैं। कारण है, हम अपने ‘स्रोत’ से, अपने सामर्थ्य से जुड़ जाते हैं। तब जो अनावश्यक है, वह अपने आप छूटने लग जाता है।
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13 वर्तमान में रहना
”हम जहाँ भी जाते हैं, एक ही उत्तर सुनाई देता है, ”वर्त्तमान में रहो“, क्या यह मात्र एक परिकल्पना ही तो नहीं है, क्या कोई वास्तव में वर्त्तमान में रह सकता है? जो आज उपदेश दे रहे हैं, क्या वे स्वयं अपने भविष्य की चिन्ता में मशगूल नहीं हैं। चार महिने पहले से चातुर्मास की योजना बन जाती है। बड़े-बड़े आश्रम, कारें , हेलीकॉप्टर यह सब क्या है? आप क्या कहना चाहेंगे?“
उस दिन भी यह सवाल आप के मन में था, जब आप पूछ रहे थे, ” जिसे वर्तमान में रहना कहते हैं, क्या वह यही है? हम तो समझते थे कि जो काम चल रहा है, वहीं रहो।“
हां, सामान्यतः आशय यही रहता है। वर्तमान में रहना साध्य भी है, और साधन भी। इसे यों समझाा जाए, एक सीधी रेखा है, उसके तीन हिस्से हैं। एकाग्रता उस का पहला चरण है, निर्विचारिता दूसरा तथा सजगता तीसरा।
जब हम वर्तमान में रहने की उपलब्धि को पा लेते हैं, तब करना, होने में तथा होना, और होना, अस्तित्व में, ‘है’ में विलीन हो जाता है। यही तो हम सब की वांछा है। हम चाहते हैं। चाहे भौतिकवाद से आएं, या आध्यात्मवाद से या समर्पण से, हर पुरुषार्थ का स्वाभाविक अन्त इस ‘तत्व’ से अभिन्नता ही है।
यहीं प्रेम मिलता है, यहीं ज्ञान है, यहीं अमरत्व है, यहीं ‘वह’ है, जो ‘वह’ है उस की प्राप्ति है। यह कोई प्रत्यय नहीं है। कोई कन्सेप्ट नहीं है। हॉं, शास्त्र इस ओर संकेत करते हैं, हम अपनी बुद्धि से अपनामन चाहा अर्थ निकालकर
संतुष्ट हो लेते हैं
इसी लिए हमारा लक्ष्य निरन्तर वर्तमान में रहना ही है। वर्तमान में रहना ही सत्संग है। हमारे दैनिक जीवन में हम जो भी कार्य करते हैं, उस का प्रारम्भ और अन्त इसी वर्तमान में होना ही होता है। जो स्थिति कार्य के प्रारम्भ में है वही अन्त में भी वही रहे , वही रहे , यह सतर्कता अगर हम रख पाएं तो हम पाएंगे । वहीं आनन्द है। वही तो मुक्ति है, बचपन की प्रसन्नता, बुढ़ापे में आते -आते खिन्नतामें बदल जाती है। होता विपरीत है, हम कार्य की पूर्णता आने पर उदासीन हो जाते हैं। खिन्नता आजाती है। यह तो होना ही था, रस चला जाता है। आनंद तो मात्र वर्त्तमान की उपसंपदा है। अभ्यास यहीं ं और अभी से ही यही करना है। जो भी कार्य हम कर रहे हों, मन पूरी तरह उसी में रहे। किंचित मात्र भी विपरीत न हो पाए। मन तो जाएगा। पर सतर्कता रही, तो वहीं रुक जाएगा। अनावश्यक विचार का आना ही मन का भटकाव है। बंदर को देखा है, वह वस्तु पर झपट्टा मारने से पहले आपकी तरफ देखेगा। आपकी पलक झपक गई तो वह सामान उठाकर चल देगा। पर आपकी ऑख नही झपकी तो वह चल देगा। मन की यही हालत है। साक्षी भाव का यही रहस्य है। सतर्कता हमेशा रहे। यही सत्संग है। विवेक विरोधी विश्वास के कम होते ही विवेक विरोधी विचार कम होने लगते हैं।
प्रारम्भ में अभ्यास कराया जाता है कि जहां जो भी कार्य हो , मन को उसी कार्य में रखना है, वहीं जब क्रिया न हो, तब मन के भीतर उतरना है। वहां विचार और विचारक के बीच का जो अन्तराल है, वहां रहना है। संत कबीर ने कहा था,” लखत -लखत लखि रे कटे जम फंद है“, अवलोकन का सिद्धांत बड़ा पुराना है। उपनिषदों ने जगह-जगह संकेत दिए हैं।
यह जो अन्तराल है, जहां न आदि है, न अन्त है, वहीं विश्रान्ति है। वहीं हमारा वर्ततान है। जहां भीतर आनन्द है। वही अविनाशी है, वही जीवन की झलक है, इस जीवन की आवश्यकता ही यह वर्तमान है।
हम शरीर के माध्यम से जो भी उपाय करते हैं, वे एक सीमा तक जा कर निष्फल हो जाते हैं। साथ ही सूक्ष्म.. अहंकार और सौंप देता है। जहां तक अहंकार है, वहां तक सभी विकार भी यथावत रहेंगे। मूल लक्ष्य बीज का भुन जाना है। उस की अंकुरण क्षमता ही समाप्त हो जाए।
यह वर्तमान मेें रहना कोई श्रमसाध्य अभ्यास नहीं है। यह तो हमारा सहज स्वाभाविक कर्म ही है। जहां हम असत से असहयोग करते ही सत से जुड़ने लग जाते हैं।
श्रम और अभ्यास तो प्रयत्न के लिए हैं। जहां हम व्यवहारिक सत्ता से जुड़ते हैं, वहां की उपलब्धि प्रयत्न के आधार पर है। वहां श्रम और अभ्यास ही सहायक है। पर जहां पुरुषार्थ है, वहां प्रयास नहीं, अप्रयत्न की आवश्यकता है।
मन को अनावश्यक विचारों को हटाना या कम करते जाना, यह कोई प्रयत्न नहीं है। यह तो मात्र अविवेक के अनादर होते ही यह उपलब्धि प्राप्त हो जाती है। इस के लिए करना यहां कुछ भी नहीं है। पहले तो विवेक विरोधी विश्वासों के प्रति आसक्ति कम होनी चाहिए। हमारा कर्मकांड के प्रति मोह, परम्परागत साधना के प्रति मोह यह अविवेक ही है। जब जान गए हैं, कोई लाभ नहीं है, फिर भी भय बना रहता है, लोग क्या कहेंगे। घ्यान भी लगाना चाहते हैं, और कर्मकांड से भी चिपके हुए हैं। ध्यान भी किसका, संत कबीर ने कहा था,” अंधा-अंधा ठेलिया दोनो कूप परंत“, लोग गुरु बनकर के अपनी तस्वीर का घ्यान लगाना सिखाते हैं। इस्लाम में इसीलिए मोहम्मद साहब ने अपनी तस्वीर तक नहीं बनने दी। कभी विचारा है, क्यों? उस अलख के द्वार पर, अलक्ष्य के द्वार पर कोई शब्द नहीं लाएगा। वहाँ की भाषा, पश्यंती के पार है। उसे ”परा कहा है। उसका अहसास निठल्लापन नहीं है, भीतर वह शांत है, बाहर सक्रिय है। गीता का आखरी श्लोक जो संजय कह रहा है, वही वर्त्तमान में रहने की उपसंपदा है। वहाँ योगेश्वर कृष्ण भी हैं, और वहीं धनुर्धर अर्जुन है। वहीं वह सब कुछ है, जिसके लिए शास्त्र संकेत कर रहे हैं।
इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि जो तुम्हारा ही है, तुम्हारे पास है, नित्य है, उस से तुम्हारी दूरी मानी हुई है, तुम उसे भूल गए हो। शास्त्र का आप्त वचन है, ‘स्मर’, स्मरण, याद रखना, उस में अविचल आस्था, निष्ठा ही तुम्हें उस के पास ले आती है। नानक कह गए हैं, ”सुमिरन करले मेरे मना तेरी बीती उमर हरि नाम बिना रे“
यह बात समझ लो , हम जिन्हें बड़ा आदमी कहते हैं, उल्होने बहुत से नए शब्दो को फैलाकर असंगतता ही फैलाई है। बहुत ही भ्रामक शब्द है, जाग्रति, एन्लाइटेड,., जैसे कोई लालटेन की रोशनी कम हो गई हो, कोई उस की बत्ती को आगे कर दे, तेज रोशनी अचानक हो जाती है। यहां नया कुछ भी नहीं घटता, तुम्हारी बत्ती ही तेल का स्पर्श पा रही थी, यह अब ज्योतित हो गई। दिया तो तेल के अभाव में बुझ जाता है। पर यह ज्योति अखंड है। तभी भगवान बुद्ध ने कहा था, ”अप्पो दीपो भवः“, अपने दीपक खुद बनो। दूसरे का तेल या माचिस यहां काम नहीं आती है। बस अपने प्रति , अपने आत्म के प्रति एक निष्ठा तथा असत का असहयोग, तुम्हें ज्योतित कर देता है। जाना है असत का, अविवेक ही असत है। विवेक विरोधी विश्वास के हटते ही, विवेक विरोधी विचार कम हो जाते हैं, तब विवेक विरोधी भाषा अंतर्मुखी होजाती है।और तब विवेक विरोधी कर्म भी कम होने लगते हैं। सत का सान्निध्य विवेक के आदर से स्वतः प्राप्त हो जाता है।
विवेक का आदर न तो श्रम साध्य है, न ही प्रयत्न पर आधारित है। यह तो एक विश्वास है, जिस के प्रति तुम्हारी लगन महत्वपूर्ण है।
निष्ठा को सन्त कबीर ने ‘सती’ कहा है। जहां अविचल श्रद्धा है। श्रद्धा दूसरे के प्रति होती है, निष्ठा स्वयं के प्रति रहती है। यहां मन अनावश्यक विचारणा, अवधारणा, तथा स्मृतियों के दबाव से मुक्त हो गया है। वह आत्म्स्थ है, उसे आत्म कृपा प्राप्त होती है।
यह आत्म कृपा ही भक्ति की प्रभु कृपा में ढल जाती है। परन्तु सच यही है कि यह आत्म कृपा यहीं की उपसम्पदा है। उस का बाह्य का आकर्षण विसर्जित हो गया है।
जहां तक बाह्य का आकर्षण है, जैन दर्शन के आधार पर, ‘उस में आस्रव’ है, कषाय हैं। पर यहां आज वह बहाव ”निरुद्ध, हो गया है। सब शान्त है। बाहर-भीतर का कोलाहल हट गया है। रोका नहीं गया है। कोई श्रम नहीं है, यह .स्वाभाविक है,.बस मन. शान्त हो गया है। वह चीख-चीख कर भीड़ को आत्मज्ञान नहीं बॉंट रहा है। वह अपनी ही कुटिया में, कमरे में शांत है, पर निरन्तर कर्मरत है। कर्मरत क्यों? वह मात्र प्रकृति के हाथों का पुर्जा है। जो काम वह करा रही है, उसे करते जाना है। उकी क्षमता बढ़ जाती है। प्रसन्नता, आत्मविश्वास , और संतोष उसके अब साथी हैं। वह तो चाशनी में डूबे गुलाब जामुन की तरह रह गया है।
भगवान बुद्ध ने जहां दीपक के जलने की बात कही थी, वहां निर्वाण का अर्थ कहा गया है, बुझ जाना। अब वृत्तियां शान्त हैं, बुझ गई। महर्षि पतंजलि ने कहा था, वृत्तियों का निरोध हो गया है। भगवान महावीर ने इसी स्थिति को कैवल्य कहा हैे।
संज्ञाएं अनेक हैं। अनेकातवाद तत्वान्वेषी मार्ग है। हर प्रकार की अवधारणानाओं का अब आदर नहीं रहता है। जिस ेछूटना था, वह छूट जाता है। यहां छोड़ने और पकड़ने पर बल नहीं है। जहां बल है, वहां श्रम है, वहां प्रयत्न है।
तब स्वाभाविक रूप से आवश्यक शक्तियों का उन्मीलन हो जाता है। महर्षि अरविन्द कहते हैं, चैत्य पुरुष का उन्मीलन’। ‘वह’ अब .घने बादलों के भीतर से ज्योतित हो उठा है।
सन्त कबीर कह उठे थे- ‘घूंघट के पट खोल, तोहे पिया मिलेंगे।’
यह पट खोलना कोई प्रयत्न है? यह तो सहज और स्वाभाविक है। जाना, हमारी सब प्रकार की असमर्थताओं का अन्त इस वर्तमान में रहने में ही है। विचारकों ने इसे ही ध्यान कहा था, पर शब्द जब विकृत हो गया, तब यह अवस्था ही तिरोहित हो गई।
यहां आ कर हमारी हीनता, पराश्रय, भय सब छूट जाते हैं। जो हमें नहीं करना चाहिए, जो विवेक विरोधी है, वह स्वतः गिर जाता है। जो नहीं करना चाहिए उस संकल्प की उत्पत्ति ही नहीं होती है। जो हमें करना चाहिए, वह प्राकृतिक विधान से स्वतः होने लग जाता है। पर साथ ही करने का अहंकार भी तिरोहित हो जाता है। उस के न रहने पर आत्मीयता जो हमारी खो गई थी, उस की प्राप्ति अनायास हो जाती है।
‘जो कुछ नहीं करता है, वही कर सकता है।’ यह आप्त वचन है। यहां अपने लिए कुछ नहीं करना है।
प्रयत्न और पुरुषार्थ का भेद हम पहले बता आए हैं। जब हम यहां आते हैं। पुरुषार्थ शब्द का हम ने दुरुपयोग बहुत किया है। शास्त्र में पुरुषार्थ, संकल्प जनित सभी चेष्टाओं का सहज रूप से छूट जाना, तथा भीतर-बाहर शान्त रहना ही है। यही वर्तमान है। अब न यहां अप्राप्त की कामना है, जो हो रहा है, उस में दख्ल देने की कोई चेष्टा नहीं है। प्रकृति के साथ साहचर्य है। जो प्राप्त हुआ है, वह सामर्थ्य उसी का है, उस का सदुपयोग ही सार है। जो नाटक में रोल मिला है, उसे खूबसूरती से करना है, और ध्यान यही रहे , हमारे कारण से किसी दूसरे का अभिनय खराब न हो जाए, यही भागवत का सार है। जो भागवत की कथा बॉंचते हैं, उनसे क्या कहना, प्रकृति उन्हें पाकृतिक न्याय देने में समर्थ है। शास्त्र में इसके लिए मना किया है। यहीं ”रास शब्द“ की महिमा का संज्ञान होता है।
सन्त कबीर के शब्दों में- ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।’
ओढ़ते सभी हैं, ओढ़ना पड़ता ही है, पर ‘दास कबीर- जतन से ओढ़ी, यही जतन ही जीवन जीने की कला है। यहां जो मिला है, उस का सदुपयोग है। हम अपना मान कर दुरुपयोग में लग जाते हैं। बल प्रकृति हमें सदुपयोग के लिए देती है। जो भी आज मिला है, हमारा ही प्राप्तव्य है। न दुख न सुख, जिस का हम ने कभी वरण किया था, न उस से अधिक आता है, न कम। इसी लिए अविचल आस्था यहां रह जाती है। यही वर्तमान में रहने की उपसम्पदा है। तब यह बोध जग जाता है, दुःख अपने चाहने से नहीं जाता, और सुख भी अपने चाहने से रुक नहीं जाता, तब हम बु( की नकारात्मक भाषा संसार दुःख मय को भूलकर संसार रसमय है, इससे जुड़ जाते है।
तब हम जान जाते हैं, जो मिला है, वह अनित्य है। जैसे आया है, वैसा ही चला जाएगा। उस से हमारा कोई नित्य सम्बन्ध नहीं था, न है। जो मिला है, हमारा पद, सम्मान, धन, योग्यता, यह हमेशा बनी रहने वाली नहीं है। तब इस अप्राप्त के प्रति कामना स्वतः कम होने लग जाती है। और हम विवेक विरोधी विश्वासों से स्वतः ही दूर हो जाते है।
‘जो मिल गया, उसी को मुक़द्दर समझ लिया
बर्बादियों का शोक मनाना फ़िज़्ाूल था
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया।’
यह कोई गीत नहीं है। यह तो जीवन जीने की कला से उपजा गान है। जो मिल गया उस का सदुपयोग है, जो बर्बादियों का जश्न मना सकता है, वह मन स्वाभाविक रूप से शान्त हो गया है। यहां असत की कोई कामना नहीं है। तभी जो जीवन है, उस से अभिन्नता स्वतः प्राप्त हो जाती है।
यह सच है, जमीन के साधारण से टुकड़े पर कोई सा बीज अनुकूल वातावरण पा कर तुरन्त पुष्पित-पल्लवित हो जाता है, उसी प्रकार यह वर्तमान में रहने की उपसम्पदा, क्षणिक सी भी जीवन में आती है, तो जीवन की दशा व दिशा को बदलने में सहायक रहती है। तब आत्म का विस्मृत बीज पल्लवित और पुष्पित हो उठता है।
हम ने पूर्व में गोरखनाथ जी को याद किया था, वहां अन्तिम उपलब्धि सजगता है, जागरुकता है। यह सत्संग, यह वर्तमान में रहने की कला, अपने अल्पकाल में भी सजगता प्रदान कर देती है।
सजगता, हर क्षण, हर पल, विवेक को सम्मुख रख कर, जो अविवेक जन्य कर्म है, सम्बन्ध है, उन्हें शिथिल करती चली जाती है। यह सत्संग सभी के लिए है। सभी के लिए हितकर है।
यहां आप से कुछ भी छोड़ने को नहीं कहा जाता, न ग्रहण करने को कहा जा रहा है। आप किसी भी दार्शनिक परम्परा को मानते हैं, किसी भी साम्प्रदायिक अनुशासन से आप बंधे हों, यहां किसी प्रकार के परिवर्तन की कोई कामना नहीं है। यह साधन तो सभी के लिए उपयुक्त है, सभी इस के योग्य हैं।
एक नया मानव, जो संसार में प्रयत्नशील है, साथ ही वह आत्मस्थ. है, अपने आप से भीतर जुड़ा हुआ है , वह स्वाश्रय में है, जहां पराधीनता नहीं है, अशान्ति नहीं है, अभय है, वहीं तो हमें प्रिय है।
14 वर्तमान की संपदा
”हम जो चाहते हैं, वह हमें नहीं मिलता है, हम संत नहीं है, सांसारिक है, हमने पूरा प्रयास किया, पर जो बाहर की दुनिया का सिद्धांत हैं, या तो हम उसके अनुरूप हो जाएॅं, या हताशा में चले जाएॅं, हम रास्ता चाहते हैं, और इसीलिए ही भटकाव में चले जाते हैं, हमारा आत्मविश्वास चला जाता है। हम क्या कर“े?
”क्या वर्तमान में रहने से, हमारी आज की समस्याओं का हम सामना कर सकते हैं? हम सीधा उत्तर चाहते हैं।“
”हमारी इच्छा है, हमें ‘रस’ मिले, जीवन में जो अभाव प्रतीत होता है, वह न रहे, हमें आनंद मिले। पर बाहर से कोई भी आता है, पत्थर फेंककर चला जाता है, मानो हम कॉंच के पात्र ही रह गए हों।“
0 “अनेक सवाल आपके आए हैं। यह सवाल हमेशा मन में उत्पन्न होते रहते हैं। ‘अमृत’ और ‘पारस’, दो महान परिकल्पनाएं मनुष्य जाति को उस के आगमन के साथ ही मिली हैं। पारस लोहे को स्वर्ण में बदल देता है। स्वर्ण कीमती धातु है। अमृत अमरता देता है। देवासुर संग्राम में देवता अमृत पी कर अमर हो गए, कल्पनाएं मधुर हैं।
”वर्तमान“, शब्द बहुमूल्य है। प्रचलन में है। सब जगह इस शब्द की महिमा है, यह शब्द ब्रांड होगया है।
हम जिस वर्तमान की उपसम्पदा व्याख्यायित कर रहे हैं, वह विवेकी का अन्तिम पद है। परन्तु वह आपको विशिष्ट नहीं बनाता, अत्यंत सामान्य बना देता है। यहां शरीर है, दुनिया है, विषय है, पर जिसे हम मन मानते हैं, जो विचार रूप है, वह मन अनुपस्थित है। मन का नाश कभी होगा नहीं। परन्तु विचारणा का वेग नहीं है।यह निःशेष है। इसे यों समझाा जाए एक का इस तरफ की परत बाह्म मन है, कागज की दूसरी परत अन्तर्मन है, उस में मन विलीन हो गया है। वह नागार्जुन की शब्दावली में, शून्य में विसर्जित है। वह गीता की परिभाषा में जीवन्मुक्त है, वह बस ‘जो है, वह बस अवेयर है,’ है।
मन तो रहेगा, पर अब पराजित मन नहीं है। वह विराट से जुड़ा रहने से शक्तिशाली होगया है।वही मानो आत्मा की शक्ति है।
शब्दों की व्याख्या दर्शन में है। दर्शन का आधार तर्क है। तर्क वह प्यास है जो कभी बुझती नहीं है। जहां विश्रान्ति है, वहां तर्क गिर जाता है। यहां सवाल पैदा नहीं होते, उत्तर भी खो जाते हैं। यहॉं निरन्तर विचारणा में डूबा मन जब विचारणा में नहीं होगा तो कहॉं होगा, आप पता तो करो। वहीं वर्त्तमान है। अब तुम कॉंच के पात्र नहीं रहे। ग्रेनाइट की चट्टान से मजबूत हो, सारा पोलापन चलागया है।
अब देखो, तीन बातें ही होगी, तुमने प्रयत्न किया, जितनी ताकत थी लगादी, चलो काम बन गया , बधाई है। दूसरा विकल्प होगा, काम नहीं हुआ, बहुत दुःख हुआ। तुम निराश होगए। शांत भाव से सोचो, संभव है, प्रयत्ल में कमी हो, रणनीति में कमी हो, पर प्रयत्न नहीं छोड़ना, ऐसा होता ही रहता है।पचास लोग दौड़ लगाते हैं, नंबर एक तो एक ही आता है, पर हर दौड़ने वाले का अपना महत्व है। मानकर चलो ऐसा होता ही रहता है। दो मिनट भले ही सोच लो, एक क्षण के लिए पीछे मुड़कर देखो, फिर भूल जाओ। वाणी के स्तर पर कोई विवेक विरोधी प्रतिक्रिया नहीं हो। हो सकता है, कोई तीसरा ही फल सामने आजाए। इसी को नियति कहते हैं। यह नियत तो था, पर दिखाई नहीं पड़ रहा था। इसको ऐसा ही घटना था, घट गया। यह अच्छा या बुरा दोनो ही घट सकता है।
पर अगर तुम वर्त्तमान में रहने लग गए हो, तब!
तब जो करना होता है, वही वैसा होने लग जाता है। आवश्यक शक्तियां स्वतः आ जाती हैं। प्रयास तो बाह्य जीवन में होता है। यहां स्वतः है। यहां सब प्रकार की कमियों का अन्त हो जाता है। यहां अशान्ति नहीं है, कोलाहल नहीं है, भीतर कोई उपद्रव नहीं है, वहां ‘रस’ ही तो रह जाता है। रस ही आनन्द है। फिर जो नहीं करना चाहिए, वह अपने आप छूटता चला जाता है। कल तक जो बहुत महत्वपूर्ण लग रहा था, जो छाती पर कवच की तरह चिपका हुआ था, वह अपने आप, वृक्ष की छाल की तरह उतर जाता है। वहॅंा फिर जो करना होता है, वही होता है, और तब पूरी ताकत अपने आप लग जाती है। हॉं, यहॉं पलायन नहीं होता, अप्रिय और अशुभ को भी सहज भाव से सामना करने की ताकत बन जाती है।
तब तुम्हारे सवाल भी अपने आप उत्तर पाकर शांत हो जाएंगे।
किसी ज्योतिषी के वास तुम्हारे सवालों के उत्तर नहीं है, सवाल तुम्हारे हैं, इनके उत्तर तुम्हारे ही पास हैं।
”क्या तब हमारी जो समस्याएं जो हम ने ही बुनी हैं, वे हमें परेशान नहीं कर पाती हैं?“
”तुम्हारे प्रश्न में ही तुम्हारा उत्तर छुपा हुआ है। दूसरो से तुम अपेक्षा रखते हो , उन्हें ऐसा करना चाहिए था, नहीं किया अशांत हो। दूसरों पर विश्वास ही विवेक विरोधी विश्वास है। विश्वास अंधा होता हैं दूूसरे से किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं हो। तब उपेक्षा का मूल्य समझने में आजाता है। तब विवेक विरोधी भाषा के प्रति स्वयं में ही उत्सुकता चली जाती है। भाषा संतुलित होने लगती है। विवेक विरोधी कर्मों के छूटते ही, अपने घर की वापसी का अहसास होने लगता हे। जब तक बाहर भटकते रहेंगे , बाहर की हर चीज कीमती नजर आएगी। घर वापसी पर , बाहर का आकर्षण बहुत कुछ कम होने लग जाता है। अपने पास ही तो कोहनूर हीरा था , उसकी ही विस्मृति अब तक रही थी। अब जगते ही होश में आते ही , हम कह उठते हैं , पायो जी पायो , मेैने रामरतन धन पायो।यहीवह सम्पदा है जो वर्तमान मे ंरहने पर स्वतः समीप आजाती है।
”अपने सोर्स का अहसास पाने के लिए किस तरह रहा जाए?“
सवाल वही का वही आया है, आप चाहते हैं, दूसरा कोई आएगा आपमें परिवर्तन ले आएगा। किसी के चाहने और देने से आपकी चेतना में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। यह फिजूल का आडंबर चल रहा है। दोनो एक इूसरे को ठग रहे हैं। जो प्रयत्न है, वह जगत में है, वहाँ जगत के नियम लागू हैं। आपको धन कमाना है, शोहरत कमानी है, सम्मान लेना है। उसके अपने तरीके हैं। पर जब आप अपने घर की वापसी चाहते हैं, वहाँ यह प्रयत्न फिजूल है।
यह हमने कभी नहीं कहा, यह मत करो। घर- परिवार , जिम्म्ेादारियां पूरी करना आवश्यक है पर नया-नया जाला बुनते जाओ, उसी में फंस जाओ, यह अविवेक ही है। हाँ, इस मार्ग पर प्राकृतिक विधान से जो प्राप्त होना है, वह प्रकृति अपने आप देदेती है।
जीवन जीने की अपनी शैली है। लक्ष्य के प्रति सुबह से शाम तक याद रहे। यह चौबीस घंटे जीवन जीने की शैली है। जब लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है, तब फालतू का अपने आप छूट जाता है। मुस्लिम उसे कहा जाता है, जिसे अपने ईश्वर पर , अपने धर्म ग्रंथ पर , अपने पैगम्बर पर सौ टका भरोसा होता है। यह संकीर्णता नहीं है। यह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण है। पर आपतो पंचामृत चाहते हैं। सुबह से शाम तक यह भी करलूॅं ,वह भी करलूॅं , अंधानुकरण में किए चले जाते हैं, आपका लक्ष्य है, इसके करने से बाहर की दुनिया में और सफलता मिलेगी।
आप धोखा देने के लिए सोचते हैं, अपनी आत्मा का विकास करना है, अपने आत्म का अहसास पाना है, आप मानसिक शक्ति पाना चाहते हैं, पर आपके सारे कृत्य दूसरी दिशा में ही होते हैं। आप बाहर की दुनिया का सम्मोहन लेश मात्र भी कम करना नहीं चाहते। आपके लिए, सत्संग, ध्यान, स्वाध्याय,मनोरंजन ही है। चर्चा करने में , सुनने में रस आता है। अपने अहंकार की पूर्ति होती है। पचास लोग आपका सम्मान करते हैं, यही आपकी जीवन शैली है। जो आपको निरन्तर आपसे ही आपको दूर ले जारही है। आप दूसरों के चिन्तन में ही जीवन व्यर्थ किए जा रहे हैं, सपने भी आपको दूसरों के ही आते है। नींद में भी सीरियल ही देखते रहते हैं।
हमारे जीवन की अधिकांश बीमारियां, असमर्थताएं, हमारी बदलती जीवन शैली से ही पैदा हुई हैं। हम सवाल पूछते हैं, ऐसा क्यों होता है, पर दूसरे को सुनना नही चाहते , तुरन्त भाषा बिगड़ जाती है। हम वही करते है, जो हम करना चाहते हैं, और यही चाहते हैं, दूसरे हमारे साथ सहमति रखें, इसी को अविवेक का आदर यहां कहा गया हें
परन्तु जब हम अंतर्मुखी होते हैं। तब इन कमियों का ज्ञान ही, जो अपनी असमर्थताओं का ज्ञान है, इस का अन्त वर्तमान में रहते ही प्रारम्भ हो जाता है। तब जो नहीं करना चाहिए वह छूटना शुरू हो जाता है। जहां विवेक का आदर रहता है, वहां अहंकार को जगह नहीं मिलती। अपने सामर्थ्य के प्रति सदुपयोग प्रारम्भ होने लग जाता है।
महादेवी वर्माकी कविता है-
”बीन भी हूं, तुम्हारी रागिनी भी हूं...।“
हम गीता के निष्काम कर्मयोग की बहुत चर्चा करते हेैं कभी ध्यान से अपने द्वारा की गई किसी भी क्रिया को देखा है ? जब आपका अहंकार प्रभावी रहता हैं कि यह मेैंने किया ,या यह मुझसे होगया , कोई अज्ञात शक्ति ही यह कार्य करागई , आप पाएंगे दोनो ही कृत्यों में बहुत फ़र्क आ जाता हेै।
वर्तमान में हो रही क्रिया में मात्र क्रिया ही रहती है आपका अहंकार उसी क्रिया में ही विलीन हो जाता हैे।वहॉं मे। ही विलीन हो जाता है , आपका अंतर्मन ही मानो उस क्रिया का संपादन कर रहा हो। यही समझ सार है। ।
मैं नहीं करता, मेरे द्वारा कराया गया है। मैं तो निमित्त मात्र हूं। तब जो है, ”वह ह“ै, उसके प्रति अनन्य निष्ठा पैदा हो जाती है। वहीं तो ”स्व“, है। यहां स्वाश्रय पैदा होता है। वह अनन्त है, उस का ही आश्रय ही शेष रह जाता है। भक्ति की पहचान वर्तमान की दहलीज पर होती है। उस के प्रति प्रीति, असत से दूर ले जाती है। जिसे छूटना होता है, वह छूटता चला जाता है। तब बाहर-भीतर सब प्रकार की अनावश्यक विचारणा का अन्त हो जाता है।तब मन विभक्त नहीं होता , जिसे अखंड रस कीते हे। चही प्रेम अपने आप अभिव्यक्त होने लगता हैे।
न भीतर का उद्वेग धक्का देता है। न बाहर के संवेग प्रभावित कर रहे हैं। यहां भीतर में जहां विचारणा का दबाव है, वहां बर्फ है। जहां बाहर का वेग है, वहां वह चट्टान है।
प्राकृतिक नियम यही है जिसका प्रतीक शेषनाग की शैया पर सोए हुए भगवान विष्णु हैे। अनंत के आरहे स्पंदन कहे ंया लहरें कहें , जैसे भगवान विष्णु की नाभिपर कमल नाल में ब्रह्मा जी विराजित हैं , उसी प्रकार हमारी नाभि पर ये स्पंदन निरंतर टकराते हे। एक ही तत्व अपने आप पांच तत्वो ंमें विभाजित हाकेर हर देह में संचालन कार्य करता हे। एक शक्ति मन की है एक प्राण की हे। प्राण पोषण करता है। मनुष्य में प्राण के साथ उसका मन भी क्रियाशील रहता हेै। नाभिपर हमारा अव्यक्त मन जिसे हम अंतर्मन भी कह सकते है। वहॉं से ये लहरें अपने आप इस अंतर्मन से टकराकर वृŸिायॉं निरंतर उछलती रहती है , वहीं जिसे हृदय कह सकते है। वहीं संस्कार कहो या स्मृति उसका संग्रह रहता हें। वहॉं निरंतर वृŸिायॉं जो लहरों की तरह होती हे। निरंत उछलती रहती हे। ये मन के संयोग से बाहर आने को त
पूज्य स्वामीजी समझाते थे-
पर अगर आप वर्तमान मे ंहैं तो यहॉं आप अपने आप सतर्क रहेंगे । लहरें उछलेंगी , उनका अनुभव भी होगा , पर मन अगर इस स्थिति में भी अविचलित रहता है तब मानसिक शक्तियॉं अपने आप बढ़ने लगती है।
एक गहरी शांति तथा मानसिक शक्ति का अनुभवन होता हेै। बाहर के अप्रसांगिक होते ही आप अपने आप अब अपने ही नही सामाजिक रूपान्तरण के लिए भी समर्थ हो जाते हें।
गीता के शब्दों में, ‘तान तितिश्व भारतः’ वह बाहर-भीतर से अप्रभावित तथा शान्त है। यह शान्त होना ही, वर्तमान में रहना है। जो है जैसा है , वह उस क्षण वही है। न दैन्यं , न पलायनम!,एक प्रवचनकार महापुरुष समझा रहे थे, “अतीत का, भविष्य का चिन्तन छोढ़ो, वर्त्तमान का चिन्तन करो।“
वर्त्तमान तो वहीं है, जहाँ कोई चिन्तन ही नहीं है। यहॉं जो मिला है, मिलाथा , उसकी स्मृति गई। यहां अब जो नहीं मिला है, उस की कामना भी नहीं है। जो मिला था, बहुमूल्य था , जो मिला है, वह उसी दाता का ही था , उस का ही है। जो है, उस का सदुपयोग ही होना है। तथा जो है, वह प्रसाद है, जो मिला है, वहीं प्राप्तव्य था। यही बोध यहां होना सहायक है। यही यात्रा को अंतर्मुखता प्रदान करता है।
बहुत पहले एक पुस्तक पढ़ी थी, ‘अविनाशी के गांव में’ यह एक सन्त की कहानी थी। पुस्तक का शीषर्क आकषर्क था। पर जाना अविनाशी की तलाश बाहर किसी गांव में नहीं होती। ”मो को कहां ढूंढे रे बन्दे मै तो तेरे पास में“, इस अविनाशी के साथ, वह तो नित्य है, बस उधर देखा नहीं गया था। उसकी झलक ही दिखी, बस, वह है, विश्वास सौ टका घट गया। बस । प्रकृति का नियम है, जो आता है, वह जाता है। जो आज मिला, वह कल गया, यही असत है।
यही अनित्य है। उस की कामना में रत रहना, उसे कहीं दूर मानकर भटकना, यही विवेक विरोधी कर्म है। पर जो सत है, न वह आता है, न वह जाता है, उसका अहसास फिर दूसरे दरवाजे की ओर जाने की सारी लालसा खो देता है। तभी कभी उसने कहाथा, ”छाप तिलक धर दीनी रे, तो से नैना लगायके“, पर जहाँ बाहर का सब कुछ ज्यों का त्यों भीतर विराजमान है, वहाँ वह नहीं है। न उसकी छाप है, न सुगंध है, न रोशनी है। ”अंधा ,अंधा ठेलिया दोनो कूप परंत।“
इस अवस्था में जो न करना चाहिए, उस के स्वतः छूट जाने से असमर्थतता का अन्त हो जाता है। बाहर की दासता चली जाती है। हम बहुत सारे काम, अनुकरण में बाह्य दबावों से, लोभ और भय से या हमारी धारणओं के के दबाव से करते हैं। जानते हैं, नहंी करना चाहिए, पर करते चले जाते हैं। श्रेय ओर प्रेय, धन ओर प्रशंसा हमारी असमर्थता, लाचारी, हीनता को पैदा करते हैं।
परन्तु जब हम वर्तमान में रहते हैं, तब जिसे होना है, उसे पूरा करने का सामर्थ्य स्वतः आ जाता है। जो सम्भाव्य है, उसे पूरे करने का बल स्वतः प्राप्त होता है। यहां हीनता चली जाती है। दीनता चली जाती ह।। फिर जो नहीं करना चाहिए उस की इच्छा ही पेैदा नहीं होती है।
”सवाल था, हम जो कार्य करना चाहते हैं, क्या वर्तमान में रहने से सफलता मिलेगी?“
सच यही है, हम अघ्यात्म का प्रयोग एक विशिष्ट तकनीक की तरह करना चाहते हैं। हमें हमारे कार्य करने में , सफलता प्राप्त होने में सहायक हो। हम इसीलिए इस मार्ग पर आना चाहते हैं।
यह सही है, मनुष्य के पास उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसका अपना मन है। मन एक शक्ति है। बुद्धि इस शक्ति का विकास है। फिर वही बात, जब हम शान्ति मेें हैं, तब हमारा मस्तिष्क भी पूरी तरह सचेत होता है, जारूकता, उस की शक्ति महान है, हम बहुत कम ही उस की शक्ति का प्रयोग कर पाते हैं। शान्ति, मन, मस्तिष्क को सजीवता देती है। सजगता सौंपती है। तब हमारा नाड़ी-तन्त्र निर्देाषता को प्राप्त कर लेता है। हमारी सम्वेदनशीलता बढ़ जाती है। नाड़ीतंत्र का नियंत्रण हमारा मस्तिष्क करता है। नाड़ियॉं संवेगों को पूरे शरीर तक ले जाती हैं, वहॉं से प्राप्त सूचना को मस्तिष्क में ले आती हैं।
इस शान्ति की अवस्था में जो भी क्रिया प्रारम्भ होती है, वह उचित तरीके से पूरी हो जाती है। सक्रियता के साथ सृजन शीलता बढ़ जाती है। जब स्वाभापिक रूप से जो भी कर्म होता है, वह उत्कृष्ट ही होता है। और जब जिस कर्म का अन्त शान्ति में नहीं होता, बेचैनी में होता है। वहां वह पूर्णता निर्जीव रह जाती है। हम आनंद के द्वार में प्रवेश से चूक जाते है।।
शान्ति प्रत्येक क्रिया के प्रारम्भ व अन्त दोनों के लिए आवश्यक है। उत्तेजना में कार्य में सफलता नहीं मिलती है।सुनो,रस ही आनंद है, तुम्हें आनंद की तलाश है। हर छोटे से छोटा काम उसी प्रेम से करो, जो दशा प्रारम्भ में रहे वही अंत में भी, यह छोटी सी खुशी बड़े सुख का , महासुख का द्वार खोल देगी।
यहॉ,जब हम वर्तमान में हैं, वहां न बाह्य का दबाव है, न भीतर का। तब हमारी पूरी शक्ति, हमारा सामर्थ्य, उस क्रिया को सफलता पूर्वक पूरा कर देता है। शास्त्र ने दो नए शब्द दिए थे, ‘प्रवृत्ति’ और ‘निवृत्ति’। प्रवृत्ति कार्य को करना तथा निवृत्ति कार्य का पूरा हो जाना, या छूट जाना। आदि और अन्त। हम जब कार्य करते हैं, तब वह पूर्णता में निवृत्ति सौंपता है। एक पूर्णता का अहसास, ये तो पूरा हुआ, शान्ति आती है, उत्तेजना चली जाती है।
”पर यहॉं , हमारी परम्परा में जो जो हमारे पथ के अनुकूल नहीं है, उनके त्याग की चर्चा है, हमारे यहाँ बुद्ध, महावीर, शंकर , चैतन्य , तुलसी सभी उस विराट से तभी जुड़ पाए थे जब उन्होंने मार्ग का वरण परम त्याग में किया था। रामकृष्ण परम हंस, विवेकानंद, दयानंद एक बड़ी सूची है, क्या प्रवृत्ति मार्ग को छोड़े बिना निवृित्त आसकती है?यह आखिरी सवाल है।“
आपका सीधा सवाल पतंजलि के योग सूत्र को लेकर है, आप प्रारम्भ में ही इसकी चर्चा करलेते तो अच्छा था। भगवान पतंजलि ने योगसूत्र में जो अंत में कहा है, वह महत्वपूर्ण है। उसी में ही सारे सवालों के उत्तर हैं।
चित्त की वृत्तियों के निरोध का नीचे की सीढ़ियों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। ये तत्कालीन रूढ़ियॉं थीं जो एकत्रित हो गईं। बाद में जो भी आए वे अनुकरण में ही रहे। उन्हें लगा बेकार है, उन्होंने कहा भी पर अनुयायी अपनी बात ही कहते रहे। प्रवृत्ति और निवृत्ति मन की स्वाभाविक स्थितियॉं है। दोनो अवस्थाओं में उर्जा एक ही है। शक्ति है।
क्रिया के लिए दोनो ही उर्जाएं चाहिए। शरीर के लिए मन और प्राण दोनो जरूरी हैं।
प्रवृत्ति हमरी काइनेंटिक उर्जा है, क्रिया शील रखती है। निवृत्ति में भी हमारी ठहरी हुई उर्जा है।
पर साथ ही निवृत्ति के साथ ही, अब वह करना शेष है, प्रवृत्ति की लहर उठ जाती है। निवृत्ति हमेशा शक्ति देती है, यही ‘ध्यान’ का रहस्य है। तुम्हारा कहना सच है, कार्य पूरा होने के पहले ही यह विचार तुरंत आता है, अब इसके बाद यह करना है, अचानक ही दूसरे काम की सोच में मन ले आता है, यही घ्यान है, उसे पहले वाले काम का तो रस ले लें, वह छोटा सा सुख ही उस विराट के आनंद का एक क्षण है।
हम जब निर्विचारता में प्रवेश करते हैं, तब क्रिया करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। पर अगर हम तनाव में हैं, अशान्ति में हैं, तो सही कार्य भी हम से गलत हो जाता है। क्यों कि अहंकार वही देखता है, जो वह देखना चाहता है, जो दिखाई देता है, वह दिखाई नहीं देता। इसी को शास्त्र ने माया कहा है, दर्शन ने भ्रम कहा है, जहां रस्सी में सांप दिखाई देता है। दृष्टि और दृष्टिकोण में यही भेद है,दृष्टिकोण हमेशा अहंकार की जमीन पर खड़ा होता है। दृष्टि ,सम्यक है। तब वही दिखजाता है, जिसकी कल्पना कभी कवि जायसी ने की थी, ”नयन जो देखा कंवल ,........निरमल नीर सरीर“, सामान्य भाषा में तब वस्तु और हमारे बीच में कोई बिचोलिया नहीं होता।
वर्तमान में रहने की उपसम्पदा यही है कि यहां जिस कार्य को होना है, वह सफलता पूर्वक पूरा हो जाता है। जो न करने योग्य है, वह अपने आप छूट जाता है। हम भय और प्रलोभन के जाल में फंस नहीं पाते हैं। साथ ही यहां अन्य किसी आश्रय की आवश्यकता न रहने पर, किसी दूसरे की सहायता की जरूरत नहीं रहती है। न ही किसी विशेष परिस्थिति की जरूरत रहती है। आपको अपने मार्ग पर अपने लक्ष्य की प्रप्ति के लिए कहीं जाने की जरूात नहीं है।
तब सब प्रकार के विशेष प्रलोभन, तथा जड़ परम्पराओं का दबाव अपने आप छूटता चला जाता है।
फिर बताओ , इस बाह्य लोकाचार की , दिखावे के त्याग की क्या जरूरत रही। हम जिन महापुरुषों का नाम लेते है, वे प्रयोगशील थे उन्होंने प्रयोग किए , सफलता पाई , पर हम उनकी आज्ञाओं को छोड़कर जो कुछ उन्होंने जीवन में किया उसी तरीके पर चलना चाहते हैं। मुख्य बात तो भूल गए, वह थी अंर्तमुखता, प्राप्त विवेक का आदर, जिसने उन्हें विेवेकी बनाया।
ठीक है, जो आपके समीप हैं, वे आपके मार्ग के विरोधी है, या कर्मकांड के आधार पर जो सीख कर आए हैं, उसके विरोधी हैं। आप शांत रहना चाहते हैं, वे आपको उसी पुराने रूप में ही चाहते हैं, पता करें, बच्चनजी ने कहा है, ”राह पकड़ तू एक चलाचल पा जाएगा मघुशाला। शास्त्र की आज्ञा है, ”चरैवेति....चरैवेति , मीराबाई ले कहा है, ”मेहि लागी लगन हरि चरनन की“। इसीलिए यहाँ छोड़ने और छूटने की समस्या नहीं है। जहाँ आप बैठे हैं, वहीं क्ैलाश है, संत कबीर बहुत पहले कह गए हैं, ”घर में ही गंगा, घर में ही जमुना घर में धीर धरे“, शायद आपके सवाल का उत्तर आपको मिल गया होगा।
यहाँ न बाहर बाह्य प्रदर्शन की आवश्यकता रहती है, न उन से प्रभावित होने की इच्छा रहती है। आप शान्त हैं, वहीं शक्ति है, और आप अपने साधन में स्वतन्त्र हैं। यह अभ्यास नहीं है, बस जीवन जीने की कला है, जो आप के पास है। यहाँ जीवन का स्वाभाविक सहज निर्वहन है।
इस को हम ने ‘दिव्य सहज जीवन’ कहा है, दिव्य इस लिए कि यहां स्वाभाविक रूप से जो जीवन है, वह शान्ति में, सामर्थ्य में, स्वाधीनता में ढल जाता है। यही तो वह दिव्यता है, जो हम चाहते हैं।यही वर्तमान में रहने की अपनी संपदा है।
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