मुक्ति पथ
नरेन्द्र नाथ
अनुक्रम
1 रास्ता किधर से है?
2.यात्रा के चरण
3.लखत लखत लखि परे
4.अवलोकन
5.चयन की प्रासंगिकता
6.छोड़ना और छूटना
7.लौटकर आया आज मेैं द्वार पर
8. क्यांकि मैं जानता हंू
9. अवलोकन का रहस्य
10आत्मनिरीक्षण
11.सीढ़ी दर सीढ़ी
12.इस मोड़ पर
13.अभय
14.भय की पहचान
15.आलोचना कासुख
16.मौलिक परिवर्तन
17. संपत्ति और
संपदा
18 प्रेम
19 देखना और देखना
1 रास्ता किधर से है?
बहुत लिखा है, ... बहुत सोचा है, ... बहुत बोला है, पर जो अपना स्वयं का है, ... क्या वह कहा गया है?
एक वक्त आता है , जब लगता है , अपना भी समय आगया है। किससे, किसके लिए बोला और लिखा , कहना कठिन ही होता हे। सच तो यही है , वह दूसरा ही था जिसके लिए सोचते रहे। वह दूसरा इस नाटक में अनगिनत रूप लेकर आता हेै। कभी अपने बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिलता।
प्रशासन की नौकरी में गया , क्यो गया क्या नियति यही थी , या दूसरा ही कचोटता रहा?
कभी कुंभन दास ने कहा था ,
संतन कहां सीकरी सों काम
आवतजात पन्हैया टूटी
बिसर गयो हरिनाम।
पर सच तो यही है कि परमात्मा भी है या नहीं? हम कहॉं से आए हैं, कहांजाना है , यह सवाल कभी कौंधता ही नहीं है पूजा पाठ किया , धर्मस्थल पर भी गए तो कुछ मांगने ही गए।
यह बात दूसरी हे। प्रकृति की महान अनुकंपा ही रही , स्वामीजी जिन्दगी की शुरुआत में ही मिल गए। उन से वर्षों सानिध्य ही पाया। पर सच यही है , उनसे मिले सानिध्य पर ग्रंथ ही लिखते रहे पर कभी स्वयं पढ़ने का उत्साह नहीं जागा।
गुरु नानक यही कहते हैं , उसके निरंतर स्मरण और गुरुकृपा बिना मति नहीं मिलती। बुद्धि तो बहुत थी। पर वह गुरु कृपा बिना मति नहीं बन पायी।
कारण एक ही रहा, क्या जो अच्छा सोचा गया है, जो बोला गया है, उस पर स्वयं का विश्वास भी रहा है? सचमुच विश्वास की कमी अपने भीतर पाई है। प्रायः दूसरों की चिंता या दूसरों को ध्यान में रखकर ही जिया गया है, ... बोला गया है। यह जो दूसरा है, ... कभी चैन से नहीं रहने देता है। जहॉं विश्वास होता है। विश्वास सौ टका होना चाहिए। ं उसके पहले सौ संदेह होते हे। पर जब स्वयं में निष्ठा जगती है। तब उसी समय श्रद्धा पैदा होती हेै। यही गुरुतत्व की प्राप्ति हे।
ब्रह्म निष्ठ गुरु समीप ही रहे , पर दैहिक संबंध आत्म संवाद नहीं बन पाया। अंतः करण में संग्रह बहुत था।
बचपन से बहुत कुछ किया, ... क्यों किया? पता नहीं था, एक बैचेनी थी। सब करते हैं, ... मुझे भी करना है। एक परंपरागत मार्ग परिवार से मिला, ...सब चलते हैं, ... हम भी चलंे, ... वहां आश्वासन इस बात का है कि सब कुछ ठीक होता जाएगा।
बचपन में भय था, ... मृत्यु भय, ... बीमारी का भय, ... मन अशांत था, ... देवी-देवता आश्वस्त करते रहे। घंटों जप, ... यही सीखा था, ... करते रहे। पर एक स्थिरता का हमेशा अभाव रहा। यह नहीं तो कुछ और कुछ और, यही सिलसिला चलता रहा।’
... बहुत सोचा, ... यह जीवन मिला है, इसका कोई अर्थ भी है क्या? या यूंही चले जाना है। दूसरों को देखा, ... सत्संग, भंडारे, जप-तप, वृन्दावन वास एक दौड़ नजर आती थी। हां एक बात ही सुनने को मिलती थी। आस्था रखो, ... आस्था, विश्वास, ... फिर जो मार्ग बताया है, उस पर चलते रहो, ... यह भी प्रयास अंधेरे में एक छलांग सा था।
... जाना, जब हम किसी बाहर किसी आदर्श या व्यवस्था में आस्था रख लेते हैं तो जड़ हो जाते हैं। हमें वही इतना अच्छा लगता है कि दूसरा भी रास्ता हो सकता है, दूसरा भी कथन सही हो सकता है, ...हम भूल जाते हैं। यह भी देखा, जो लोग अनेक रास्तों की, अनेक कथनों की संभावना पर विचार करते हैं। दर्शन का सहारा लेते हैं, वे भी आचरण में अधिक कठोर पशुवत हो जाते हैं। उनके भीतर सहज और निर्मल धारा ही समाप्त हो जाती है। वे जड़वत हो जाते हैं। समाज में जितनी अनैतिकता तथा हिंसा आज विद्यमान है, उसका मुख्य कारण यह जड़ता ही है। यह संस्कार बद्ध आस्था ही है।
स्वामीजी ने सभी धर्र्मों की पुस्तकों को पढ़ाया। सभी संतों को समझने का अवसर दिया। दृष्टि का परिमार्जन ही करते रहे। जब भी कहीं , एक निश्चितता आई , वे कुछ दिन आद जब आते , उस विश्वास को समझ के स्तर पर जाने नहीं देतें। अष्टावक्र गीता उन्हे ंपसंद थी। इसके शुरु के दो अध्याय। गीता के कुल जमा पच्चीस श्लोक ही। योग वशिष्ठ खुद समझाया। पर न जाने क्यो ं, एक प्रमाद ही था कि तब में उनके साथ उस अनंत यात्रा पर चलने से रह गया। अंत में उन्होंने कृपा कर अनंतयात्रा ग्रंथ ही मार्ग दर्शन हेतु स्वयं लिखकर सौंप दिया।
सत्य एक ही है। सत्य ही आनंद है। सत्य ही परम चैतन्य हेै। वही सृष्टि का आदि है , वही धारण करता है। वही अपने भीतर विलीन कर लेता हेै। इस सत्य की खोज में ही उपनिषद आए। ऋषि आए। गीता में मार्ग बताया। बुद्ध आए , महावीर आए , कालांतर में उनके अनुयायी अलग धर्म में अपनी पहचान स्थापित करते रहेै, फिर इनके भी अलग संप्रदाय अलग बनते गए। इसी परंपरा में मध्यएशिया में इस्लाम और उससे पहले ईसाइयत आई , फिर अर्वाचीन सिक्ख धर्म आया। छोटे मेाटे अनके संप्रदाय आए। उस महातत्व को कैसे पाया जाए , जाना जाए। उसकी परमात्मा की कृपा प्राप्त की जाए , ताकि बेहतर इन्सान और इन्सानियत पैदा हो ,यही खोज आज तक जारी हे। पर चार हजार साल का इतिहास गवाह हैं इनकी मान्यताओं ने मनुष्यता का हनन और संहार ही अधिक किया है। अधिकांश युद्ध इन्हीं धर्मोके ही विस्तार की ही कहानी हैं।
हम बाहर से बहुत बड़ा आडंबर अपने साथ खड़ा कर लेते हैं। पर भीतर यथावत ही रह जाते हैं।हजारों वर्षों से हमारा मन यथावत ही है, बाहर का आवरण ही बदलता रहता है। जिन समाजों ने एक आदर्श व्यवस्था की खोज की, दुनिया को बेहतर बनाने का काम किया, चाहा लोग उसे एक आदर्श मानकर चले, वे दुनिया को और बदसूरती देते गए। साम्यवादी समाज एक आदर्श बना, ... शोषण विहीन समाज की खोज, परन्तु मनुष्य का सर्वाधिक शोषण वहीं हुआ।
धार्मिक समाजों ने भी मनुष्यता को रोंदा है। हमारा विचार ही सही है। मध्ययुगीन मुस्लिम आक्रांताओं ने नरमेध ही किए हैं। जब हम दूसरों के बनाए रास्ते पर चलना बिना किसी सतर्कता या सजगता या गहरी समझ के चलना शुरू कर देते हैं, तो हम मात्र एक भीड़ बन जाते हैं। भीड़... भेड़ चाल एक ही बात है। वहां हमारी बुद्धिमत्ता का हरण हो जाता है।
स्वामीजी की पहली सीख यही थी कि तुम्हें किसी भी भीड़ का हिस्सा नहीं बनना है। भीड़ अपने साथ चलने पर सम्मान देती है तुम्हे ंपहले अपने , शास्त्र.ीय बोझ को उतारना है। सभी ग्रंथ आधे- अधूरे हैं। मनुष्य के ही अनुभवों की वाणी हेै। परम सत्य को जब जिसने जानने को जो प्रयास किया , उनमें वो संकेत है।।
पर सभी ग्रंथ महापुरुषोके जाने के सैंकड़ो साल बाद लिखे गए। सबकी यही मान्यता यही है कि यही अंतिम सत्य हेै। तुम्हें अपनी बुद्धि को किसी कटघरे में ले जाने की जरूरत नहीं। प्रयोग करो , अपने अनुभव को विस्तार देना है। मेरा सत्य भी तुम्हारा नही होगा। न दूसरो ंके सत्य को ,न मेरे अनुभव को , यह मेरा अपना जाना है क्या पता कल कोई इसे असंगत साबित करदे। बुरा मानने की कोई जरूरत नहीं। सनातन धर्म इसीलिए कहा है, यहॉं कोई एक मत प्रवर्तक नहीं। न कोई एक विचार । जिसने जैसा देखा , पाया वह उतना ही सही हे। मनुष्य की सीमित शक्ति है। प्रकृति निरंतर परिवर्तशील है। पहले शादी में गॉंव में साईकिल आती थी तो पूरा गॉंव देखने जाता था , आज कार भी आती है। तो कोई बड़ी बात नहीं , हर गॉंव में दो चार जीप हैं। कार हैं। तब एक विचार कैसे हमेशा सही रहेगा। उसे ही सही मानकर दूसरों को गलत कहना , हिंसा कर देना , यही सांप्रदायिकता है।
अपनी धारणा को ही सत्य कहना ही सांप्रदायिकता है। अध्यात्म तो अपने ही भीतर ही अपने सत्य को पाना है। वह महान शक्ति हमसे अलग कहॉं है, वह हममें ही पर अलगाव भासता है। इसका कारण मन हेैं।अध्यात्म इस आभास को ही हटाना हैं यही मनुष्यत्व है। मनुष्य को उसकी स्वाभापिक अवस्था को पाना है उसमें रहना है। ।
... पर हम उसी प्रकार के परंपरागत मार्ग पर चलने के ही अभ्यस्त हैं। यह हमारी विवशता है। इसीलिए हमारा जीवन असंगत है। बाहर और भीतर का द्वैत है। हम संसार में जैसे आए है, ... वैसे ही चले जाते हैं, ... हमें मात्र अनुसरण करना है, या जैसा हमें हमारे परिवार या समाज ने बताया है, या जिस प्रकार की हमारी आदतें, हमारा स्वभाव बनता जा रहा है, हम एक रुचि बना लेते हैं, ... सोचते हैं, यही ठीक है, ... अहंकार हमारा और अधिक सख्त होता चला जाता हे। ै, अगर किसी ने तर्क दिया, बाधा उपस्थित की, तो हम लड़ने लग जाते हैं। क्रोधी हो जाते हैं।आज सभी पुराने संप्रदाय अपनी ही धारणाओं ही बंधन में चले गए हैं,ें जो सवाल खड़ा करता है , उसे हम नास्तिक कहकर निंदा का पात्र बना देते हे। उसकी हत्या तक कर देते हे।
आज विज्ञान और तकनीकी प्रगति हमारी धारणाओ ंपर निरंतर आघात कर रही हे। हम नए उत्पाद तो प्रयोग में लाने को उत्सक रहते हे। , पर वैज्ञानिक बोध का तिरस्कार करते हें।
हमारे भीतर सचमुच नया कभी आ नहीं पाता, ... बरसों बाद पाया वैसे के वैसे ही हम हैं। पचासों ग्रन्थ पढ़े, ... लिखे, ... पर सब शब्द बाहर ही रहे, ... भीतर अनुगूंज पैदा नहीं कर पाए। सच है, बाह्य अनुशासन व तरीकों से बंधा हुआ मन, बाहर की व्यवस्था के अनुरूप होने से आदर तो पाता है, लोगों के अनुसार व्रत, उपवास, पूजा पाठ होने से सम्मान भी पाता है, ... पर भीतर ही भीतर वह टूटता चला जाता है, वहां मात्र इन सांप्रदायिक आग्रहों के अनुसरण से प्राप्त जड़ता व अहंकार ही होता है।
2.यात्रा के चरण
... तब इस यात्रा पर विचार गया
चुपचाप दूर हटकर बैठना ही उचित लगा।
लगा मानो एक वृत्त है, उसका केन्द्र भी है, पर अगर परिधि पर घूमते रहो, तो लगता है, चलते चलते वहीं आ पहुंचे है, जहां से चले थे।
जप किया, मस्तिष्क निरंतर ध्वनियों की एकरसता से ... शांत हुआ, ... परन्तु कुछ समय बाद वहीं स्थिति मंद और मूढ़ और मूढ़ बना गई। वहां से बाहर आते ही फिर अशांति आई..
पाया... वहीं के वहीं है-
तब जाना बाहर नहीं, भीतर जाना है।
पर भीतर कहां है?
कहां है वह केन्द्र, जहां आना है...
बाहर समय था, ... आज नहीं कल, ... कल नहीं अगला जीवन भी होगा।
... पर क्या पाना है, ... कुछ स्पष्ट नहीं था, ... अजीब सी यह यात्रा होती है...
... हां परिधि की यात्रा पर बहुत लोग साथ थे। एक पहचान भी थी ।लोग मिलने आते थे... किताबों पर चर्चा, ... जो आदर्श वाक्य है, उन पर चर्चा, बौद्धिक उहापोह, ... हम दूसरों से ज्यादा जानते हैं, ... यह अहसास अपने विशिष्ट होने की सूचना देता है।
... पर जब बाहर का छूटने लगा।
लगा जो कल तक आ रहे थे, आने बंद हो गए।
सम्मान भी चला गया।
सम्मान उसी का होता है, जो हमारे पास है। हम पूजा पाठ करते हैं, भागवत सुनते हैं, मंदिरों में प्रसाद चढ़ाते हैं, जो हमारे जैसा है, ... हमारी भावना के अनुकूल है, हमें वही प्रिय होगा।’ जहां वह हमारे मार्ग से हटा हम उसका सम्मान करना बंद कर देते हैं।
कुछ मित्र आए, वे संगठन में सामाजिक कार्य करने की प्रेरणा दे रहे थे,, आपका वह मित्र भी है। वह दूसरा भी हेै, संगठन में ही शक्ति है। स्वामीजी का कथन था , न भीड़ में , न किसी पंक्ति में खड़ा रहना है। वहॉं मन और अधिक सक्रिय रहता हेै समाज में सभी पूंछ कटे चूहे की तरह ही रह जाएॅं , इसका बहुत बड़ा दबाब है।ं
कोई तुम्हे ंनहीं पहचाने, सम्मान , पद सब चला जाए , सब मन की ही दौड़ है। अपने घर वही लौटता है , जिसके सारे बोझ उतर जाते हैं। अपनी मानी हुई धारएााओं का ही बोझा सबसे भारी हैे। यह दिखता नहीं , यही जनम के साथ लदना शुरु हो जाता हेै, हम इस अदृश्य बोझे को ही अपना स्वरूप मान लते हें जबकि आध्यात्म अपने वास्तविक स्वरूप का बोध ही पाना है।
यहां भीतर आने के आग्रह के साथ ही, ... बाहर का ढांचा विपरीत होने लगता है। सबसे बड़ा भय अपनी पहचान और सुविधाओ ंके खोजाने का होता है।
इसीलिए सन्यासी, तथाकथित बाहर के प्रलोभन को छोड़ नहीं पाता है। उसकी स्थिति बहुत ही दयनीय होती है।अंतस में बाहर का प्रलोभन बना रहता है, समाज भी उसको उसी रूप में देखना चाहता है। वह समझता है , समाज उसका अनुयायी है , पर समाज ही उसके जीवन की दिशा को निर्धारित करता है। बाहर वह नाटक के पात्र की तरह अभिनय की चेष्टा दिखाने के प्रयास में लगा रहता है।
इस परम्परागत ढांचे को तोड़ पाना ही धर्म में प्रवेश हे।
... हां, यहीं पहला ‘अभय’ प्राप्त होता है।
बाहर के सम्मान को छोड़कर, बाहर के परंपरागत ढांचे को अस्वीकार कर अपने ‘बोध’ के आग्रह को स्वीकारना, अपने विवेक के आधार पर मार्ग बनाना, ... सच्चाई के मार्ग पर चलने का प्रारंभ होता है। सरलता यहीं से आती है। यह सरलता ओढ़ी हुई नहीं होती। जैसी हमारे धार्मिक आस्थाओं में होती है, ... बाहर से सरल भीतर से बहुत कुंठित, जड़, ... जहां सम्मान की भूख है, कुछ होने की संभावना जागृत है, वहां केन्द्र से दूरी बढ़ती ही जाती है।
मुझे न तो कहीं जाना है,
न हीं जो जाना गया है, उसका अनादर करना है।
मैंनें यही जाना, जो परंपरागत मार्ग था, ... वहां मैं बस कदमताल करता रहा, ... भीतर का असंतोष, जड़ता यथावत बनी रही।
स्वामीजी हर कदम पर मार्गदर्शन करते रहे। पर भीतर सामाजिक लोभ यथावत था। भय भी था। अपनी परंपरागत मान्यताएॅं भीतर कहीं ना कहीं , किसी आलंबन में सुरक्षा देती हैं। पर स्वामीजी जहॉं संकेत कर रहे थे, वहॉं अज्ञात में गहरी छलांग की तरह ही था।
पराश्रय का अपना सुख हेै। आपका मन दूसरें में समर्पित रहता हेै, उस अज्ञात से ही सुरक्षा मिलती हेै। मन अपने आप में अपनी धारणा में लीन और संतुष्ट रहता हेै पर यहॉं पराश्रय को छोड़ते हुए निराश्रय से स्वाश्रय में आने का संकेत था। कई वर्ष इसी भय में चले गए।
आप नदी तट पर आकर घाट पर उतरकर लोटे से स्नान करना चाहते हेैं, या डुबकी लगाकर बाहर आजाएॅं, या तैरते हुए दूसरे तट को छूकर आजाएॅं , यह आपका अपना निर्णय है। । पर उस अनंत भागीरथी में उसकी थाह को पाने को ही डूब जाएॅं , यह नया ही सोच हे। यहॉं अपना ही खोना पड़ता है। बाहर के वस्त्र घाट पर ही गिर जाते हें यही दिगम्बरत्व है। यही रासपंचाध्यायी का चीर हरण है।
... सोचा, नया रास्ता जो होगा, उसकी भी कोई व्यवस्था होगी। यही उधेड़बुन रही, ... पर जाना, क्रिया की यह भी प्रतिक्रिया है। हम जब परंपरा से विद्रोह कर, बाहर आते हैं। भीतर की मनोवैज्ञानिक जड़ता, पराधीनता को हटा देते हैं। या वह छूट जाती है, ... तब अनायास हम भी उसकी प्रतिक्रिया में अपने आपको ढालना शुरू कर देते हैं। फिर हम सांप्रदायिक हो जाते हैं। हम अपने ही विचारों के दास हो जाते हैं। हमारे विचार, हमारे आदर्श हो जाते हैं।
... तो फिर क्या किया जाए?
यही सवाल सामने था।
जो कुछ पुराना था, उसकी अस्वीकृति विवेक के आधार पर थी, अब किसी भी आग्रह को न्यायोचित ठहराने का या अस्वीकार करने का उत्साह नहीं रहा था’
पर मात्र ‘एक बोध’ जगा था। बाजार है, सामान से अटा पड़ा है, ... पर सामान की पहचान भी है, पर भीतर यह बोध था कि इनकी जरूरत अब नहीं है। घर में वैसे भी बहुत कबाड़ रखा है, जो इस साल काम नहीं आएगा, उसे पहले हटाना है।
... पहले आग्रह बाहर का जो कुछ था, जैसा है, खरीद लाओ यह आग्रह था, ...जरूरत का पता नहीं था, ... परन्तु एक मनोवैज्ञानिक दबाव था, ... भीतर एक खालीपन था, ... रीतापन .... जो बाहर चमक रहा है, सब सोना है, ले आओ, ... घर नहीं हुआ कबाड़ खाना हो गया, बस सारी उमर इस कबाड़ को संभालने में चली गई।
तब मात्र ‘बोध’ शेष रह जाता है।
बाहर, बाहर है, ... भीतर का पता नहीं है। वहां की मात्र हलचल आकर्षित करती है। पर बाहर का सम्मोहन अब कम होने लगता है।
... हां यहां आकर, यह ‘बोध जागता है, अब खरीदना नहीं है, कुछ, ... अब कोई इच्छा विशेष नहीं है। ... यह यात्रा का एक प्रस्थान बिन्दु है। जो बाहर परिधि पर घूम रहा था, जब वह केन्द्र की ओर आना चाहता हे, तब यह क्रमबद्ध नहीं घटता, ... बाहर जो घूम रहा था, ठहरेगा, फिर गति बदलेगा, ... फिर प्रवाह बदलता है।
यह ‘ठहराव’ का बिन्दु विलक्षण है।
यह ठहराव, समय की सीमा मंे नहीं है।
समय सापेक्ष नहीं है।
बहिर्मुखी मन जब अन्तर्मुखी होता है। तब ठहरता है.... एक क्षण फिर केन्द्र की ओर आता है।
परंपरागत मार्ग में, ‘तीसरी आंख’ का मनोहारी वर्णन है।
मस्तिष्क मंे मन जब तक रहता है, वह बाहर घूमता रहता है, पर जब वह दोनों भृकुटियों के बीच आता है, ... तब एक क्षण रूकता है फिर नीचे उतरना शुरू होता है’
... पर यह यात्रा ‘अगम व अगोचर’ है। वर्णनातीत है। संकेत ही सार है।
... अब आप ‘स्वयं ही साधक हैं, और मार्ग भी आपका ही है। यहां आने की पहचान यही है कि आपका ‘बोध’ ही आपके साथ है। आप मात्र विवेक के अनुगामी हैं। आप और विवेक एक ही हैं। विवेक जो ‘सही’ है, उस पथ पर ले जाता है। ... प्रश्न जो भी है, वह आपका है। अब आपको अपने विचारों पर, अपनी भाषा पर विश्वास होने लगता है। विश्वास भीतर ही रहता है।
दूसरा कोई निर्णायक नहीं है। न हीं दूसरों से आपको अपने मत की पुष्टि करनी है। आपका विवेक जो अविवेक पूर्ण कृत्य है, उसे हटा देगा, ... वह आपको गतिशील रखेगा।
‘आप स्वयं में, एक स्थिर इकाई नहीं हैं। आप स्वयं विचार करें क्या आप समय के अंतराल में नहीं है, जो पहले थे। आज भी निरंतर बदलते जा रहे हैं।
... आप जब समाज में रहते हैं। अपनी पहचान बनाते हैं। आपका एक नाम होता है। पहचान होती है। आप एक स्वतंत्र इकाई होते हैं। आपका सुख-दुख आपके लिए महत्वपूर्ण होता है।
... पर आपके भीतर, ... ‘आप का स्वयं भी रहता है, जो आपको इस व्यक्तित्व से बाहर आने का दबाव डालता रहता है। वह आपका मानव मन है।
आप मुसलमान है, आप हिन्दू हैं, आप ईसाई हैं , सिक्ख हैं, यह आपका व्यक्ति मन ,सामाजिक मन के दबाब में है। , जो अपने भीतर अपने संस्कारों या मान्यताओं का दबाव महसूस करता है। आप कभी अपने इस मन से संतुष्ट होते हैं।यह भीड़ का अंग है। यहॉं पहचान है। सम्मान है। आपका अहंकार तृप्त होता है। इसी में आप आते हैं , और रंगमंच पर अपना पार्ट अदाकर लौट जाते हैं।
पर कभी- कभी ं आपका व्यक्ति मन है , जो इस बाहरी सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच अपनी दीनता को देखता है। अपने अशांत मन को देखता हेैं।अपनी असमर्थता को देखता है ,वह कुछ नया हो जो उसका अपना ही हो , जहॉं सुख हो , शांति हो ऐसा अपना मन चाहता है , उसके अंतः करण में जिज्ञासा उठती है , वही मुमुक्षु बनजाता है। यह मोक्ष की कल्पना नहीं है। यह तो इसी वर्तमान में , इसी जगत में अपने स्वस्थ , स्वाभाविक आनंद दायी जीवन की खोज है।
तब आपका ,व्यक्तिमन अपने से बड़ेे ,विस्तृत मानव मन में अपने भीतर इस छोटी सी ‘कारा’ को तोड़ने को व्याकुल रहता है। कवि का मन कलाकार का मन, व्यक्तिमन से ‘मानव मन’ में बदल जाता है। वह दूसरे के मन को भी अपने काव्य के रसास्वादन से बदल देता है। यही साधारणीकरण कहलाता है। पर वह कुछ झलक पाकर ही संतुष्ट होकर अपने सामाजिक मन में जहॉं प्रतिष्ठा है , सम्मान है , लौट जाता है।
व्यक्तिमन, संस्कार की कुंठा से जड़ बना रहता है, ...पर मानव मन ... ऊँचाइयों को छूना चाहता है, वह सौंदर्य का पान करना चाहता है। वहां छोटापन नहीं रहता।वह सांप्रदायिक , धार्मिक दबाबों , राजन्ैतिक मतवादों से बाहर आकर अपने मन की मुक्ति देखता हे। , इसी लिए हम सृजनशील मनुष्यों को बेहतर मानते हे। , उन्हें आदर देते हे।
पर जो आध्यात्मिक है , वहॉं व्यक्ति मन अपने पैतृक निवास स्थान की ओर लौटना चाहता हे। जो उसका स्वाभाविक घर है। वह अपने अस्थायी निवास स्थान मस्ष्कि के चिपकाव से अलग होने लगता हें यही अलग होने की यात्रा , स्वयं की धारणाआंे से , मान्यताओं से मुक्ति , विचार और विकारों से अलगाव ही इस आध्ध्यात्मिक यात्रा की पहचान हेै, इसकी उपलब्धि , उस व्यक्तिमन का मानव मन में निवास हेै
स्वामीजी कहा करते थे, हमने ईश्वर शब्द को अपनी कल्पना में गढ़ लिया हेै। वह महान शक्ति जिसके कारण यह ब्रह्मांड हेै, जो निरंतर गतिशील हेै, उसकी गति से ही जीवन और जगत में परिवर्तन हो रहा है ,क्या वह हमारे व्यक्तिमन की आशाओ ं, अपेक्षाओ ंकी पूर्ति के लिए सहभागी है?सब हमारी मान्यताएॅं ही है।
विश्वास जब स्वयं के प्रति होगा , तब जिम्मेदारी खुद पर आती है। तभी बोध जगता हैं अपने सुख, दुख के लिए , हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। हमने उस परमात्मा की दी गर्इ्र शक्ति का दुरुपयोग ही चाहे व्यक्तिगत स्तर हो , या सामाजिक स्तर या राष्ट्रीय स्तर हो हम ही देाषी हेैं। हम नियति पर बोझा सौंपकर निरंतर प्रमाद में ही डूबे रहते हैं।
... इसीलिए जब हम परिधि पर घूमते हैं, हम मात्र व्यक्ति मन की कारा में रहते हैं। हम सांप्रदायिक होते हैं। हम जड़बद्ध संस्कार धर्मी विचारक होते हैं। हां, जब केन्द्र की ओर आना चाहते हैं, सहज ही हम ‘मानव मन’ के समीप होते हैं।
3 लखत लखत लखि परे
मैंने अपने आपको देखने का प्रयास किया।
पाया बचपन से दोनों विरोधाभास साथ चल रहे हैं।
भीतर जंगलीपन भी यथावत है, वही क्रोध है, वहीं हिंसा है,वही नफरत हैं,
लहरें उठती रहती है, भीतर से मानो सागर अशांत है, लहरें उछलती रहती है...
हां कभी कभी सदाशयता, प्रेम, करुणा का भी अहसास होता है।
न तो यह संयोग है, न ही मिश्रण है।
दोनों ही स्थितियां, ... आती है, जाती है।
यहॉं स्वामीजी संकेत करते थे , हमारी आदत अनावश्यक सोचते रहने , बोलने और सुनने की हेै। हम चाहा- अनचाहा सोचते हें बोलते हैं , सुनते हें हमारा हृदय पूरा ही विकारों से भरा रहता है। इसकी पहचान हमारे स्वपनो ंसे होती हेै। रात में भी अनर्गल स्वप्न जो असंगतता से भरे होते हें वही आते हें
पर अगर तुम अभ्यास रखोगे तो तुम्हारे स्वप्न कम होते जाएंगें बाद में एक सूत्रता में आएंगे। इसके बाद भविष्य की किसी कार्ययोजना को लेकर आएंगे। कार्य कैसे होगा , होगा या नहीं और उस स्थिति में कैसे रहना है। अपने आप पता लगता हे। यही मन की स्थिरता की सूचना है।
...पर आज मनुष्य का मन बहुत अधिक सूचनाओं के बोझे से लद गया हे। पिछले दस साल में उसके पास पचासों पासवर्ड आगए हैं। उनको संभालने के लिए अलग से पासवर्ड बनाना पड़ रहा हेैं आप कहीं जाएॅं , किसी के पास दो मिनिट का समय नहीं। संवाद समाप्त होगया हे। परिवार में भी जब मिलते हें अपना मोबाइल साथ रखते हे। अब तो आपसी बातचीत भी रिकार्ड हो जाती है। पति- पत्नी का , पिता- पुत्र का संवाद एक ही घर में व्हाट््स अप पर होता हे। बाहर औद्योगिक विरासत है, टेक्नोलोजी का प्रचुर इस्तेमाल रहता है, पर भीतर... बहुत कम भावात्मक बदलाव है।हॉं यहजरूर हुआ है, हम व्यक्तिमन से , भीड़का अंग बनते हुए यांत्रिक मानव में बदलने जारहे हैं।
न तो नया पूरा आ पाता है, न हीं पुराना जाता है...एक विरांधाभास सा है जो हर दम बना रहता हैं। यह सही है , जब परिधि पर रहते हैं, पहचान बनी रहती हे, मान-सम्मान रहता है, पर केन्द्र की ओर बढ़ते ही बहुत कुछ छूटना शुरु होजाता हे। इस स्थिति में अचानक , पलायन, तनाव , निराश्रय भी कभी-कभी उपजजाता है
अपने प्रति गहरा आत्मविश्वास पैदा अभी नहीं हुआ है।
... पुराना स्मृतियांे में मन यथावत बना रहता है, ... वह हर नए को अपने उसी पैमाने पर कसता है।
... भीतर भी जो है, वह अधिक सुखद नहीं है, वहां भी कटु स्मृतियों का दबाव है, ... वह तो सब चला गया, ... वर्षों पुरानी बात हो गई, ... पर उसकी पुनरावृति नहीं हो जाए, ... एक भय रहता है, अतीत भूत की तरह अंधेरे में खड़ा रहता है।
... क्या पता वास्तव में वह भूत लौट आए तो?
... जब हम जानते हैं, जो घट गया है, वह उसी रूप में नहीं आएगा।
स्वामीजी यहॉं संकेत कर रहे थे , पहले मन को बाहर से समेटेो , वाहर जो भी घट रहा है , अच्छा या बुरा , वह नित्य परिवर्तनशील हें वह ऐसा ही रहेगा , सोचना और मानना ही भूल हें और दूसरी बात हर व्यक्ति , वस्तु , परिस्थिति की स्पष्ट सीमा हेै। समय आने पर उसका वियोग निश्चित हेैं। पर हम वियोग के नाम से भयभीत हैं।
यही वर्तमान में रहने की कला हे। यहॉं सिर्फ वर्तमान है। उसका अधिकतम , उपयोग और उपभोग ही आपके पास हें अगर आज दुख में बीता है तो कल कैसे सुख आ पाएगा। यही चार्वाक दर्शन की सीख हे। अपने आज को अभी को अधिकतम सुख से ही जीना हें यही प्रसन्नता का रहस्य हेै। पर हमारे धार्मिक हो ंया राजनैतिक नेता हमेशा हमें या अतीत में भटकाते हैं या भविष्य के मनोहारी ख्वाब बेचते हैंे। तो, जैसे हम आज हैं वही तो कल में जाएंगे। पर आज का दिन तो हम पुरुषार्थ विहीन बिता रहे हे। और पंचांग में ज्योतिषीसे आने वाले सुखद भविष्य का सपना पूछ रहे हेैंं।
समय, काल, दिक्, ... तीनों क्रमवत, गत्यात्मक है। जिस घाट पर आज स्नान किया है, वहां पानी बदल रहा है। वही पानी फिर नहीं मिलेगा, पर हम उसी कल को , स्मृति के आधार पर जीवित करना चाहते हैं, ... यही त्रासदी है। अच्छा ही नहीं, अशुभ को भी मन बार-बार स्मृति पटल पर ले आता है, ... भय सौंप जाता है। भय जहां भविष्य भी सौंपता है, ... जो आज है, ... कल रहेगा कि नहीं, ... कल का गहराता अंधेरा आज भी भय सौंप जाता है। कल का जो अशुभ गया है, वह पूरा नहीं जा पाता, उसकी छाप अंकुर स्मृति पर छोड़ जाती है, जो चिंतन का एक हल्का स्पर्श पाकर पुनःजीर्वित हो जाती है।
गलती यही रही, जो इन्द्रियों का अनुभव है, उसके प्रति तो संदेह नहीं रहता, वही सही लगता है, पर बुद्धि जिस परिवर्तित अनुभव की सूचना देती है, जो ज्ञान बनकर सामने आता है, उस पर विश्वास ही नहीं होता। जब सब बदल रहा है, तब अतीत कहॉं से उपजेगा। पर स्मृति उसे यथावत ताजा बनाए रखती हेै।
... मात्र भय, ... भय ही तो साथ रहता है और उससे छुटकारा अपने आपको भुला देना होता है। मात्र पलायन। हम जो इधर-उधर भटकते हैं, ... बाबाओं के पास, किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए वह मात्र इस भय से छुटकारा पाना ही तो होता है। यह भी एक नशा होता है अपने आपको भुला देने के लिए। वर्तमान से हट जाने के लिए।
स्वमीजी ने समझाया था, दुनिया उसी महान शक्ति का सृजन हेै।ं पूरा ब्रह्मांड उसी की गति से क्रियाशील हेै। वेदांत इसे ही प्रपंच मानता हेै। एक महान नाटक है , चल रहा हें तुम्हारी शक्ति बहुत सीमित हें तुम समझते हो , तुम्हारे चाहनेे से बदल जाएगा , यही भ्रम हेै। किस्से कहानियॉं हैं,भगवान , भक्त के बुलाने पर दौड़े चले आए। तुम्हारे चाहने -नहीं चाहने से कुछ नहीं होगा। जब उस चलाने वाले को पसंद है , तब तुम्हारे चाहने से कुछ बदल सकता है , क्या? यह तुम उस सृजनहार पर ही संदेह करते हो, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था , उसी ने राम को पैदा किया , उसी ने ही रावण को पैदा किया , उसी ने कृष्ण को पैदा किया , उसी ने कंस को दुर्योधन को पैदा किया। हमारे यहॉं इसी लिए इन घटनाओं को लीला कहते है।
पहला सोच यही रहे, यही बोध बन जाए, प्रकृति को ही विषमता पसंद है यही उसका स्वभाव हेै। यही तथाता हेै, सब स्वीकार है मुझे ।दुनिया बदलने का आग्रह मेरा नहीं है।हॉं अगर बदलाव आ सकता है, तो मुझ में ही संभव हेै। जब मूढ़ता हटती है। भीतर की अवधारणाएॅं हटती हैं। स्मृतियों का बोझा उतरता है , अनावश्यक विचारणा के दबाब से बाहर आते हेैं। तब जो दिखता हे , वही रहता है जो दिखता हेै। तब देखना निर्मल हो जाता है।
मुझे अपनी सीमित शक्ति का अहसास है। मैं दूसरों को तो क्या अपने परिवार को भी नहीं बदल सकता हूं।अपने आप को भी नहीं। चाहता हूॅं , मन अधिक से अधिक सजगता में रहे। अप्रमाद में रहे। पर हथेली पर रखे पारे की तरह तुरंत फिसल जाता है अचानक विचारणा का धक्कासा लगता है , मन बहक जाता है।पहला अहसास, अपने ही असामर्थ्य बोध का होता है। अतीत की अशुभ घटनाओं की स्मृतियॉं स्मृति का हल्का सा स्पर्श पाकर, दंश , उसीक्षण मन को या तो अतीत में या कल्पनाओं में ले जाकर , वर्तमान के क्षण को ही विषाक्त करता रहता हे। वर्तमान में रहने की देशना यही है , हर क्षण वहीं रहा जाए , निरंतर होश बनारहे।
तब अपने सामर्थ्य का अहसास जगता है।
हां जितना हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर मानव होने का अभ्यास करते हैं, हम मानवीय होते हैं, हम एक सारगर्भित इकाई के रूप में अपने आपको पाने लगते हैं, जहां एक बिन्दु भी साथ लगकर दहाई बन जाता है। मै अपनी पहचान को तलाश करना चाह रहा था , अपने परिवार में ढूंढ़ा , जाति में तलाश किया , समाज में देखा , अपने धर्म में देखा , एक अदृश्य से बंधन ही मिले। सांप्रदायिक संगठन में देखा मैं, वहॉं भी प्रतिबद्ध मिला। मेरी निजता कहॉं है? मैं कौन हूॅं, इस सवाल का उत्तर भारतीय चिन्तन परंपरा ने सन्यासशब्द में तलाश किया था।पर वहॉं व्यक्ति समाज से ही पलायन कर गया था। यह जुड़ाव होता है, मन से , विचारणा के धरातल पर ।
पर अगर मन वर्तमान में है , तो वहॉं बाहर का जुड़ाव अपने आप छूटता चला जाता हेै। आप समाज में है , व्यवहार में हैं , पर मन आपके अपने ही पास हे। अपने स्वबोध में है। यही वर्तमान में रहने की देशना है , जो स्वामीजी के पास रहकर पाई थी।
मृत्यु ही आकर जब एक धक्के की तरह आती है , सब संपर्क तोड़ देती हे। पर अगर आप वर्तमान में हैं , तो यहीं सन्यस्त हेै, जहॉं शरीर तो जुड़ा हुआ है , मन संपर्क में रहे। वह संसार से कमल की तरह निर्लिप्त हे।
वृहत्तर मानवीय संबंधों की बेहतरी के लिए आवश्यक है कि हम एक सारगर्भित इकाई बन पाएं। ... ऐसा मन जो कमनीय हो, ... जहां संवेदनशीलता हो। संवेदना ही वृहत्तर समाज के द्वार खोलती है। साहित्य व कलाओं का मर्म यही है। वह मनुष्यत्व का पथ तलाशती है। .... यही मार्ग सत्यका है। यही मार्ग संस्कृति का है।
संस्कृति-अनुभवजन्य ज्ञान पर आश्रित है।
सभ्यता, बुद्धिजन्य ज्ञान पर है। सभ्यता के अनेक स्तर अनेक पड़ाव होते हैं। सभ्यता, खंड-खंड मनुष्तत्व को कर सकती है। क्योंकि उसका आधार बुद्धि होती है। बुद्धि का कार्य विश्लेषण करना होता है।
संस्कृति का जन्म अनुभवजन्यता में होता है। अनुभव अपने आप में समग्र है। संश्लिष्ट होता है। पूर्ण होता है। उसका विखंडन संभव नहीं है। संस्कृति-पूर्णता की ओर ले जाती है।
‘हम जब सत्य की चर्चा करते हैं, ... तब कहा जाता है, ‘राह पकड लू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला।’
‘रास्ते सभी कहां जाते हैं, यही खोज हजारों वर्षों से जारी है।
पता करें सच है, रास्ते चलने के लिए ही होते हैं, ... पर सत्य यह है कि रास्ते चलते-चलते अपनी अप्रासंगिकता का बोध करा देते हैं। प्रयास यह जानने के लिए आवश्यक है कि प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं है। पर यह अर्थहीनता का वास्तविक बोध है। ‘बोध’ के आकाश में यह जान पाना ही पहला कदम होता है।
हम मात्र ‘मार्गविहीन सत्य’ की अवधारणा बनाकर, मार्ग को नहीं छोड़ सकते। वरना हम कहीं के भी नहीं रहेंगे, ... मन जहां हमें अहंकार सौंपता रहेगा, वहीं वह अंधेरे में इधर उधर भटकने को भी प्रेरित करता रहेगा। रास्तों की अर्थहीनता का बोध, ... चलने के बाद ही होता है। यहां चलना भी लाजमी है। चलने वाला ही, ... चलते-चलते यह अहसास पाता है कि ‘प्रयत्न इसलिए महत्वपूर्ण था कि ‘लगन बनी रहे। तब यह बोध जगता है कि ‘सत्य का मार्ग वहीं है। सत्य क्रमबद्धता में प्राप्त कोई उपसंपदा नहीं है।
‘क्योंकि सत्य, अनुभूत्यात्मक है। संष्लिष्ठ है। वह क्रमागत नहीं है। वह मात्र सहज है।
... मैंने पाया कि मेरे भीतर अजीब सा मिश्रण है। सभी विकार यथावत हैं। संग्रह है, ... बहुत भरा हुआ है, ... कर्दम ही कर्दम है। मैं जिसे बहुमूल्य मानकर अपने भीतर संग्रहित करता रहता हूं, वह मात्र कर्दम है। दूसरों की बातें, अच्छी कम, बुरी ज्यादा, ... हल्का सा संवेदन हुआ, भीतर का प्रवाह फूटकर बाहर आ जाता है। क्या हूं मैं, ..?.
‘अपने आपको, निष्पक्ष, बिना किसी आग्रह या दुराग्रह के देखना ... अपने ही पात्र की सफाई का पहला कदम होता है।
दूसरा तो नर्क है।
दूसरे में नहीं झांकना। अपने भीतर उतरना। अपने भीतर जो दूसरों को मधुमक्खियों के छत्ते की तरह संजोकर रखा हैं, उसे हटानाहै। रस से ही वह कोष भरे रहते हैं। रस अपना ही है। रस को हटा लो, मात्र, मोम का छत्ता रह जाता है। निष्फल भीतर के इस संग्रह का निःशेष होते रहना ही, यात्रा है।और निज का अनावश्यक रीतता हुआ रस स्वयं में समाहित होजाता है।
अब न आप अपने आपकी निन्दा कर, आत्म हनन करने जा रहे हैं, न हीं दूसरों पर दोषारोपण करके अपने आपको न्यायोचित ठहरा रहे हैं। दूसरे अब अप्रसांगिक होने लग गए हैं।
तब कर्म के प्रति संलग्नता जगती है।
कर्म सजगता व संलग्नता ही सार है। यही ध्यान है। हम जो भी कर रहे हैं, करना चाहते हैं, उसके लिए हम ही जिम्मेदार है।... हम जब कर्म के प्रति संलग्न होते हैं। तब निष्ठा स्वयं अपने आप पैदा होती है। हम अपना आदर करना भी सीखते जाते हैं।
यहां किसी अन्य विचारधारा का अनुसरण नहीं होता है। आप किसी सांप्रदायिक अनुशासन में नहीं है।
क्योंकि आप हैं,... आप सीधे अपने आपसे जुड़ रहे हैं। आप अपने आपको व्यवहार करते हुए देख रहे हैं।
और आप हैं क्या...
मैंने अपने आपको देखा! बात सामन्य सी थी पर अचानक क्रोध आ गया, वह भी ... सीमा पर था। पाया भीतर का सरोवर जो अशांत था, पर अचानक सुनामी लहरों से सराबोर है,... यह मैं ही तो था, मेरी भाषा भी असंगत हो गई।
जो भीतर का था, वही तो बाहर अभिव्यक्त हो रहा था। जो अवरोधक समाज के दबाव, पारिवारिक दबाव, शिक्षा के दबाव के थे, वे़े टूट गए थे। तेज गति से बांध के दरवाजे खुलने पर जैसे पानी बहता है, वैसे विचार भाषा की लहरों पर तैर रहे थे।
और यह भीतर आया कहां से, यह इतना कर्दम कहां से आया?
मैं ही तो निरंतर,... अपनी संवेदनाओं के द्वार से बाहर से जो भी आ रहा था उसे भीतर ले जाता रहा,... बाहर से भीतर और भीतर से बाहर, यही तो प्रभाव है।
क्या ये दो प्रवाह है
... बुद्धिमत्ता, अलग-अलग, भंडार, सरोवर बनाती है। पर जाना .... यह सब एक ही है।
... मैं तो मात्र एक द्वार हूं।
... बाहर से भीतर ले जाता हूं और भीतर से बाहर ले आता हूं। एक विवशता है, यही तो दासत्व है। मैं एक कठपुतली ही हूं। जो बस नाचती रहती है।
बाहर का बदलाव व्यर्थ है। एक छù व्यवहार ही है। मुलम्मा है। बाहर से हम दिन रात पूजा पाठ करते रहें , पर मौका मिलते ही अच्छा - बुरा सब कर लेते हैं। परविर्तन अंतस में होना है। जो अंतस में है , वही तो बाहर अभिव्यक्त होता हेै। अंतस कोई आज का निर्मित नहीं हें वहॉं विकार की अंतहीन लहरें हें जाना अपने ही भीतर अप्रभावित रहने की क्षमता का संवर्द्धन ही तितिक्षा हेै। यही सहनशीलता है। सहनशीलता , पराजित मन की व्यथा नहीं है। यह अपने ही भीतर अपने ही संवेगों के धक्कों से अप्रभावित रहने की क्षमता है।सामना करना है , गीता का उपदेश युद्ध के मैदान में दिया गया था , किसी अरण्य में नहीं।
यही ध्यान का रहस्य हे। यही अवलोकन की शक्ति है।
... यह देखना जितना सहज और स्पष्ट होता जाता है, उतना ही जो ‘मैं’ है, वह एक प्याज के छिलकों की तरह उतरता जाता है। फिर किसको बदलना है।
क्या मैं दुनिया को बदल सकता हूं?
क्या मैं परिवार को बदल सकता हूं?
क्या मैं अपने आपको बदल पाने में समर्थ हूं?
4. अवलोकन
... हां, यहां आकर लगता है,... बाहर के सारे उपाय, साधन, जो भी व्यवस्था है, वह मुझे अपने आपसे परिचित होने में, अपने आपको स्पष्ट देखने में सहायक नहीं है। जब दूसरा कोई भी हो, ग्रन्थ हो, उपदेश हो, गुरु हो, उसकी सहायता ली जावेगी, तब पुनः बाहर के सागर से लहरों को भीतर आने का द्वार खोलना ही होगा, तब भीतर का प्रवाह फिर रुक जाएगा।
... यहां बाहर का दबाव, प्रभाव, अनुपस्थित होता चला जाता है।
बहुत ही सीधी चढ़ाई है।
कोई सहारा नहीं है। सीधे अपने आपको सरलता से, बिना किसी अवधारणा के देखना है।
देखना भी समाज से काटकर, किसी अरण्य में जाकर नहीं है। यहां पलायन नहीं है।
यहां तो जीवन संग्राम में खड़ा रहना है।
समस्त कार्य व्यवहार करते हुए सीधे अपने आपको देखते हुए, कर्म करते जाना है।
वहां मात्र आप होते हैं।
बोझ वस्तुओं से अधिक विचारों का होता है। विचारधारा का होता है। अनावश्यक विचारणा का अनादर होते ही, आप पाते हैं कि आपके भीतर उर्जा पर जो अवरोध था, वह हट गया है। आप अपने भीतर अधिक शक्ति महसूस करते हैं।
बस आप हैं,... अब कोई दूसरा उत्तरदायी नहीं रहा है। न अच्छा, न बुरा ,न किसी का आशीष आपको चला रहा है, न किसी का शाप आपको रोक रहा है। आपकी गति के आप ही जिम्मेदार हैं। यहां एक हल्का सा परिवर्तन आप महसूस करते हैं। भय थोड़ा कम होना शुरू होता है।
विचार ही विकार हैं।
भय जो विचारों में था, निरंतर दरवाजे पर बैठा दस्तक दे रहा था, अब आदर न मिलने से उपेक्षित सा हो जाता है। आपकी सृजनात्म्कता बढ़ने लगती है।
अब आप अपने प्रति अधिक सतर्क, होने लग जाते हैं। जिम्मेदार भी।
... हां, प्रकृति का नियम हैं, जहां खालीपन होता है,वहां चारों तरफ हवाएं आती है।
यहां जितना भय कम होता जाता है, उतनी ही स्वाभाविकता पैदा होती जाती है। हम इसे प्रेम भी कह पाते हैं। परिवार तो नहीं बदला, हां या तो बीच का सेतु था, मैं जिस पर सवार होकर उस तक पहुंचता था,... पहले वहां अंगार थे, पर वहीं अब पावों में शीतलता अनुभव होती है।
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों को आप नहीं बदल सकते, यही प्राकृतिक विधान है। परन्तु संबंधों का तरीका बदल जाता है।यही ईश्वरीय दुनिया है। जो उसको पसंद है। वह जो जैसा है , उसमें राजी है , तब मैं कौन उसकी कृति को बदलने का अनर्गल प्रयास कर रहा हूूॅ? सनातन धर्म सभी समाजों के के लिए उस काल में रहा। कालांतर में परिवर्तित हिन्दू धर्म संकुचित होता हुआ सवर्णोके बीच ही रह गया। हमने ही अपने अहंकार में एक बहुत बड़े सामाजिक क्रियाशील तबके को अपने ही धर में बहिष्कृत कर दिया । वे ही अन्य समाजो ंमें चले गए।
स्वामीजी समझाते थे ,जो वर्तमान में है , न उसकी कोई जाति है , न समुदाय , न धर्म , वही मानव है। मनुष्य है। वही उसका समाज है वही उसका धर्म हें वह निरंतर परमात्मा के सृजन के प्रति , श्रद्धा रखता है। समर्पित है।
यह व्यक्ति से मानव होने की ही यही यात्रा है।
यहां संबंध व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह पर नहीं होते, मात्र मानवीय होते हैं।
हम जितना मानवीय होते जाते हैं, उतना ही मनुष्यत्व का अनुभव करते हैं और मनुष्यत्व की पहचान मात्र ‘प्रेम’ है। प्रेम ही मुक्ति का द्वार है।
किसी परंपरागत मार्ग से, पद्धतियों से, मात्र अनुकरण के आधार पर हम मुक्ति की तलाश नहीं कर सकते। वहां मात्र करना ही रहता है। हां जब ‘करना’ अमहत्वपूर्ण हो जाता हैं तब हम लौटकर अपने ही पास आते हैं। और जब बिना किसी अन्य प्रकार के सीधे अपने अप से जुड़ते हैं, अपने आपको देखते हैं, वहीं से ‘दर्शन’ प्रारंभ होता है। यही वास्तविक यात्रा ‘होने’ की स्थिति होती है। आप जैसे हैं, वैसे हैं, हो गए हैं,
यहां बस आप हैं, दूसरा जो भी था,... है होगा वह अब अप्रासंगिक हो गया हैं।
5 चयन की प्रासंगिकता
मैंने जाना कि यह जो चयन करने की प्रक्रिया है, यह तो अनवरत है, कितना भी पढ़ लो, लिख लो, जो कर्ता है, वह सदा जगा रहता है, बाहर से निरंतर जो भीतर आ रहा है,... उसके वेग को, उसके प्रवाह को रोकना कठिन है। वह बाहर से ही प्रभावित रहता हे। बाहर की एक लहर आती है , बहाकर एक मिनिट में मीलों दूर ले जाती हें
घर- परिवार छोड़कर किसी अरण्य में जाना सरल हेै। पर आप वहॉं बल पूर्वक अपने मन को स्थिर तो कर सकते हें , पर समाज में आते ही विकारों की लहर आपको बहाकर ले जाती हेै। श्री मद्भागवत में तीन कहानियॉं हैं , जहॉं हिमालय से तपस्या कर आए उस युवा सन्यासी का अहंकार एक गृहस्थ महिला , एक गृहस्थ मांस विक्रेता द्वारा दूर किया जाता है। आप जहॉं हैं , जिस भी स्वाभाविक क्रिया में है।। वहॉं रहते हुए अपने मन को निरंतर वर्तमान में रहते हुए ही वर्तमान में रहने की यह छोटी सी विधि हें यहॉं करना कुछ नहीं , बस रहना है। यही उन कहानियों का संकेत रहा है।
.. इन्द्रियां द्वार है,... आंखें देख रही है, कान सुन रहे हैं, नासिका सूंघ रही है, रसना चख रही है। इन्द्रियां सतत बाह्य के अनुभव को ला रही है। भीतर की सत्ता पहले ही बलवान है,... वह और बलवान होती जा रही हैं। आप निरंतर सोचते भी जारहे हैं। उससे अधिक बोलते भी जारहे हैं।
जो देखता है,सुनता है, वही तो वह है, जो देख-देखकर और घना और मजबूत होता जाता है। दूसरा माना सचमुच हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं रहा, जब हम दूसरे का चिंतन करते हैं, अनुसरण करते हैं, उनकी बातों को आप्त वाक्य मानकर चलते हैं, तो सचमुच हम उनके ही बारे में जानने का प्रयास करते हैं। अपने बारे में चतुराई से कपाट लगा लेते हैं।
हमारा मन हमेशा , जाने‘ अनजाने दूसरों के ही बारे में सोचता रहता हेै।
जब भी कोई तीसरा आदमी आपके सामने आता है , आप टी़वी , अखबार की घटनाओं को अधपके खाद्यान्न की तरह वमन कर देते हें। लगता है , किसी कांच से ही बने हुए हैं , उत्पाद हैं , दूसरा आया पत्थर मार कर चला गया। आप बैचेन हो जाते है।
जब भी आप इस परंपरागत भीड़ से , पंक्ति से बाहर रहना चाह्रेंगे, आपके परिजन , आपके मित्र , आपका परिवार आपसे दूर चला जाएगा। उनकी मानसिकता है कि आप में कोई दोष आगया हे। आप बीमार हैं। भीड़ सबको अपने जैसा ही देखना चाहती है। तब अप्रभावित रहने की क्षमता रखनी है।
जब आपका विश्वास बनता है। तब आप दूसरें के चिंतन से अपने आपको मुक्त कर लेते हैं। दूसरे का चिन्तन ही नरक है। प्रायः हम परिवार में अपने ही घर के सदस्यो ंके , पड़ौसी के , रिश्तेदारों के व्यवहारों का ही चिन्तन करते रहते है।। यही चिन्तन पराधीनता है। यह आपको मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखता है। जितना आप दूसरां का चिन्तन करेंगे , उतनी ही आपकी, अपनी शक्ति क्षीण होती चली जाएगी। उनने कुछ कहा , आपको उचित लगा आपने कह दिया , बस बात समापत , अगले पल ही जो गया सो गया चिन्तन नहीं करना , उसका बोझा नहीं बनता।
उसने आपके साथ गलत व्यवहार किया , यह उसकी महान अनुकंपा ही थी।
आप उसकी महान अनुकंपा को , उसने प्रशंसा की या गाली दी , स्वीकार ही नहीं करें , वह अपने आप उपेक्षित हो जाता है, उसकी कीमत तो आप अपने चिंतन करके ही बढ़ा देते हें।
हम, अपने को अपनी ही अंधेरी दुनिया में रखना चाहते हैं। अपने सभी आग्रह-दुराग्रहों के साथ,... हमारा मन कभी भी अपने आपको अकेले में नहीं छोड़ पाता है,... उसे कोई न कोई आलंबन चाहिए, वह एक न एक खूंटी पकड़कर चिपक जाता है। बाहर कोई सहारा नहीं मिलता तो भीतर से मनोराज्य से कोई कल्पना ले आता है। आवश्यक नहीं है, यह कल्पना मनोहारी हो,... भीतर तो दुखों का, भय का, चिंता का कुंवा भरा हुआ है। सतह पर वे हैं, झट से ऊपर आ जाते हैं। भीतर का दबाव व प्रवाह बहुत तेज है। बहाकर ले जाता है।
आप अस्पताल में मरीज को देखने गए , वहॉं आपका मन सक्रिय हो जाता हे। कौन सी बीमारी है , क्या लक्षण हैं, यह तो मुझ में भी है। , मैं बीमार होगया तो? आप सोच- सोच कर बीमार हो जाते हेै।भय अपने आप आता है। आप का मन ही उस संवेग का पकड़ता है , वही विस्तार दे देता हैे आज मृत्यु से अधिक , बीमारियों का भय हे। बीमारियॉं पहले चिन्तन के आधार पर मन में आती हैं , फिर शरीर को पकड़ती हैं।
वृद्धावस्था में मन पर परिस्थितियों का और विचारों का प्रभाव पड़ता हैे। स्वामीजी यहॉं गरुड़ नाटक कंपनी के मालिक की कहानी सुनाते थे , जो बियासी साल की आयु में नाटक में हनुमान का रोल करता था , और छफीट ऊंचाई से कूद जाता था।बाद में लाठी पकउ़कर चलता हुआ उन्होंन उसे अगले दिन देखा।
अगर आप अधिक से अधिक वर्तमान में हैं तो आप का मन इन दबाबों से बहुत कुछ मुक्त रह सकता हें ऑंटो सजेशन , रैकी आदि चिकित्सा पद्धतियों का यही संकेत हेै। हमारा मन मजबूत रहे।
हमारा मन बहुत चतुर है। वह अपने भीतर के संग्रह के प्रति आश्वस्त है,े वह उसे अपनी संपत्ति मानता है। जब हम कहते हैं,... ‘मेरे विचार से... वह झट अतीत की किसी कब्र का ढक्कन उठा देता है। बस क्षण भर में ही पचासों बातें सतह पर आ जाती है। वाक पर धक्का लगते ही, वाणी मुखर हो जाती है।
... सबसे कठिन यही होता है, अपने आपको अस्वीकार करना।
हम जानते हैं, आश्वस्त भी हैं, हम मौन में हैं, चुप हैं।पर एक शांत ज्वालामुखी की तरह।
बाहर दिख रहा है, भीतर चयनकर्ता चिंतन करना चाहता है। उसके पास पूर्व की धारणा है, वह उसे नामांकित कर रहा है। यहां उसे,हर सूचना को , हर प्रभाव को , उसको पूरी जटिलता के साथ प्रासंगिक कर देना साध्य है। वह अपनी गणित निरन्तर चलाता रहता है।
परिणाम यह होता है कि हम कभी भी , नया स्वागत नहीं कर पाते हैं। नया सदा नया होता है। हम हमेशा पुराने होते हैं। देह साथ नहीं रहती है,यहीं रह जाती है। मन नहीं, इन्द्रियां उसमें समाहित हो जाती हैं। साथ नहीं जाती है, पर यह चयनकर्ता यंत्र चुपचाप चला जाता है। वह कबसे यह कर रहा है, कोई्र नहीं जानता। ।
यह तो हमेशा पुराना यथावत वही बना रहता है, ... जो सदियों का है। हम नहीं जानते, पर वह हमारे बारे में सब जानता है।
हमारी आदतें, हमारा स्वभाव, हमारे आदर्श, ... हमारे उस संस्कार का दिया हुआ है, जो निरंतर परिवर्तित होता है, अपनी पूंजी को निरंतर बढ़ाता रहता है।
उसे अस्वीकार करना, पहली और आखरी मुक्ति है।
फिर इसके बाद किसी और को छोड़ना और छूटना नहीं होता है।
स्वामीजी के आप्त वचन हैं, ... स्मृति पाप है, अवधारणा दुश्कर्म है तथा अनावश्यक विचरणा अभिशाप है।
... यह चयनकर्ता, हमारा संस्कार है, यह स्मृति में ही निवास करता है। ... अवधारणाएं इसको ‘रूप’ सौंपती है, तथा अनावश्यक विचारणाएं इसकी क्रिया है।
... यही हमारी भीतरी सत्ता है, जिसकी हमें पहला अनुभव होता है। यही मन है। ,स्मृति , चिंतन , कल्पना इसकी तीन शक्तियॉं हे। यही मन की शक्तियों का बिखराव हेै। इनका एकीकरण ही मन को पहले बाहर के बिखराव से समेटना होता है फिर मन की भीतरी वृत्तियो ंसे सिमिटना होता हेै। तब मन की शक्ति एकीकृत होती हेै। यहीं मन अंतर्मुखी होने लगता हेै। वर्तमान में रहने से मन अंतर्मुख्ी होता है , और अंतर्मुख्ी मन ही वर्तमान में रहता हेै। यह आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का अंतर्मुखी मन नहीं हेै। यह मन शक्ति का भंडार है। यहॉं मन की विपरीत दिशा प्रांरंभ होती हेै। जो उसे अनुभव से अनुभूति के स्तर पर ले आती हेै। जहॉं हृदय है। ...
पर यह हमारा ही मन है, जो बोझिल है, कुंठित है, बहुत सारे दबावों में है, जो कल घटा है, अभी अभी घटा है, वह भी वहां संग्रहित है और हजारों साल पहले घटा है, वह भी वहां है।
बुद्ध जो अनात्मवादी थे, वे भी इस संस्कार के अक्षय कोष को पाकर चकित थे। वहां पुनर्जन्म तो है, ... पर किसका है, ... पूरा दर्शन इसी उहापोह में है। हिन्दू मन आत्मा को मानता हैं, बौद्ध मन अनात्म को, पर पुनर्जन्म दोनों के पास है, ... यहां इस विवाद में उलझना नहीं है। हां, हमारा अनुभव बनता है जो कल घटा है, वह भी स्मृति में है, जो कभी पहले घटा था, हमें ज्ञात नहीं है, वह अज्ञात भी स्वप्न में जग जाता है। नाना चित्र बनते हैं, मिट जाते हैं। कहां से आते हैं, कहां चले जाते हैं। बड़ी पुरानी कहानी है-
राजा जनक को स्वप्न आया था, ... वे स्वप्न में भिखारी है, ... दाने दाने को मुहताज, अंत में जहां कचरा पड़ा था, वहां से कुछ तलाश करना चाहते हैं। तभी एक सांड आया उसने उठाकर उन्हें फेंक दिया...
‘स्वप्न में आए धक्केे से उनकी नींद खुल गई। उन्होंने पूछा’
स्वप्न का क्या अर्थ है?
तब अष्टावक्रजी ने कहा, राजा दोनों ही असत्य हैं। यह जागृत भी उतना ही असत्य है, जितनी यह स्वप्न सृष्टि होती है।स्वप्न का अभाव जाग्रत में हो जाता है।और जो जाग्रत है , वह निरंतर भासता है कि यह सत्य है। इसमें एक निरंतरता सी लगती हे। पर यह ीाी हर क्षण बदल रहा हैे।
... संस्कार वहां अपनेे संग्रह के साथ हमें चलाता है। वही हमारी भीतरी सत्ता है, वह मन है, हमारे विचारों, स्मृतियों, स्वभाव का पुंजीभूत रूप जिसकी विज्ञान आज ‘गुण सूत्र’ में परिभाषा करता है।
..
जब हम वर्तमान में रहने का प्रयास करेंगे तो हमारे विचार अपने आप कम होते जाएंगे। विचारों के कम होते ही अपने विकार भी कम होने लगत हें विचारों के कम होते ही रात के स्वप्न जो अनर्गल आते हैं , वे संतुलित क्रमब़द्ध होने लगते हैं। फिर स्वप्न कम हो जाते हें फिर, स्वप्न मार्गदर्शक बनने लगते हैं।
हम आज अपने आपको और दुनिया को, दूसरों से अपने संबंधों को इसी कल के आधार पर समझना चाहते हैं। यह जो ‘कल’ है, यही हमारी साधन सामग्री है।
”वर्तमान में रहना,“ आप्त वचन है
अपरिभाषित वचन, ... मात्र रहना
यहां जो कल है, पूरी तरह अनुपस्थित है। उसकी अप्रसांगिकता ही तो सार है। वर्तमान में रहने की पहली शर्त यही है कि आप भी आज में हैं। कल तो मरा हुआ है, मृत स्मृतियों का पिरामिड, जो बैताल, की तरह हर विक्रम के कांधे पर टंगा हुआ है। उसका उतर जाना ही सार है।
तब मात्र आप होते हैं, ... आप मात्र आप, और जो कुछ कल का था, वह विदा होने लगता है।
सवाल था , क्या वस्तु जगत में कल की उपयोगिता नहीं है? आप को रेलववे का रिजर्वेशन लेना तो क्या नहीं लें? पर जब सोचा हे। तय किया तो ले आए , बात समाप्त, पर आप यही सोचते रहें , वहॉं जाएंगे। मुसाफिर अच्छेे नहीं हुए तो , टैक्सी वाला ठीक नहीं मिला तो , यही अनावश्यक विचारणा है। मन उस समय वहीं रहे, कि आप सोचने लग जाएॅं कोई आपकी जेब काट जाए।
इसीलिए साधन में कहा जाता है- ‘अवलोकन मात्र अप्रदूषित हो, वहां कोई रंग नहीं, कोई चयन नहीं, मात्र देखना है, यह देखना सहज होने में बदल जाता है।
हां, जब आप पहले ‘हर दूसरे’ के दबाव से मुक्त होकर आए थे, ग्रन्थ, गुरु, ... उपदेश सभी दरवाजे पर ले आए, जो आपका पट खोल रहा है, तब वे कल कितने ही महत्वपूर्ण थे पर आज वे अप्रसांगिक हो गए है।शास्त्रों का बोझा हटना ही , निर्भार रहने की सूचना है , यही आपका वर्तमान में बढ़ता पहला कदम है।
संत कबीर का पद है
”प्रीतम गली अति सांकरी या मैं दो न समाय“
परमात्मा तो आना चाहता है , पर हमारे पास उसके लिए जगह ही नहीं हेै। प्रतीक्षा , लगन , धैर्य और प्रयास ही वर्तमान में रहने में सहायक हेै।
मुझसे होगा नहीं , यह तो कठिन है , जब मैं स्वामीजी से कहता था , वे डॉंट देते थे , कहते थे , यह आलसियों का लक्षण हैं। जब मैंने रहना सीखा है तो आप भी कर सकते हो। इसमें कोई अलग क्रिया तो है नहीं जो भी स्वाभाविक क्रिया है , उसी में पूरा रहना हे।
तब जिसे छूटना है , वह स्वतः होता जाता है।
उनकी आवश्यकता और अर्थवत्ता नहीं रही।
6छोड़ना और छूटना
उनका छूटना ही सार है, आपकी आगे की यात्रा के लिए आवश्यक है। पर आज, आपकी स्वयं की ‘सत्ता’ जो आपकी भीतरी शासक है जो आपका अहंकार हे। आप कहते हैं , यह मेरा विचार हे। मैं यह नहीं मानता हूॅं। आपकी मान्यताएॅं जब आपको जकड़ लेती हैं। , तब हम फिर बाहर ही भटक जाते हैं। उनकी भी अस्वीकृति होनी है, वह आपकी जमीन है, आका जमा किया हुआ संचित कोष है, आप उसे मजबूत करते हैं, आप और वह दोनों ही एक हैं। और सच यही है , उम्र के आखरी पड़ाव तक अपने इस ”मै“ को ही मजबूत करते रहते है।
जब आप उसकी सत्ता को अप्रसांगिक बनाने लगते हैं। तब अचानक बहुत बड़ा खतरा उपस्थित होता है, ... एक गहरा अंधेरा, ... यह भले ही एक क्षण को हो, एक दिवस का हो, एक वर्ष का हो, ... यह अपने आपको ‘निराश्रय’ पाने का होता है।
पर जिस क्षण आप इस अनुभव से गुजर जाते हैं। वहां आपका विश्वास अचानक जग जाता है।
विश्वास स्वयं के प्रति होता है।
आप है, आप अपने ऊपर आश्रित हैं, अपनी इस तथाकथित मनोवैज्ञानिक सत्ता के ऊपर आश्रित नहीं हैं।
और उसकी अप्रसांगिकता का अनुभव होते ही, आप पाते हैं अपने भीतर सृजनात्मकता, ... जहां बाह्य उत्तेजना नहीं है, आप शांत तो हैं, पर सतर्क और क्रियात्मक। यहां प्रतिक्रिया नहीं होती है।
... तब मात्र एक सजगता अपने आप पैदा होती है। बादल सूर्य को ढंक रहे थे, वे हट गए, ... कुहासा अनावश्यक विचारणा का था, जो स्पष्ट देखने से रोक रही थी, वहां एक रंगीन चश्मा था- अब अवलोकन स्पष्ट व सहज होने लगता है।
यहां ही सबसे अधिक खतरा होता है। क्योंकि जो भीतर की सत्ता है। वह हटना नहीं चाहती है।
स्वभाव ही ऐसा हो गया है, वहां हर क्षण चयन व नामांकन की प्रक्रिया होती रहती है
वहां चयन नहीं होना है, नामांकन नहीं करना है।
मात्र जो घट रहा है, वहां ‘होश’ रखना है।
‘जागृति संयमी, ... जहां सब सोते हैं, वहां वह योगी जागता है। यह रात भर जागरण की बात नहीं है।
यह मात्र अपनी विचारणा के प्रति अपने व्यवहार के प्रति, अपनी क्रिया के प्रति अप्रदूषित अवलोकन है। इसे ऐसे ही घटना चाहिए.था,.यह नहीं सोचना है। इसके ऐसा सोचते ही वह ‘मन’ फिर चिपक जाता है, वही शैतान है, वही माया है, वह अनेक है, उसके नाना रूप है, इसके दबाव से बाहर आना है।
‘मनोराज्य’ में भटकाव, सुखद होता है।
इससे बाहर आने का द्वार, बहुत संकरा है, कबीरदास कहा करते थे- ‘रपटीली गैल है, शास्त्र कहते हैं- क्षुरस्यधार है।
‘क्यों, सजगता जिस क्षण गई, ... उसी क्षण भीतर का दबाव अचानक बन जाता है, वह सब कुछ तहस-नहस कर जाता है।
इसीलिए कहा है- ‘स्मृति पाप है, अवधारणा दुष्कर्म है, अनावश्यक विचारणा अभिशाप है,
बचो, ... इस दबाव से बचो, क्यों?
इस यात्रा में मात्र आप ‘गवाह है, जो भीतर घट रहा है, हो रहा है, उसके दृष्टा भी आप हैं, और दृश्य भी आप ही हैं। यह एक तर्क या दार्शनिक उक्ति नहीं है। वरन सहज सामान्य प्रथम अनुभव यही है कि आप ही अपने आपको नाचते हुए देख रहे हैं, ... करते हुए देख रहे हैं।
हां, यहां चयन नहीं हो, बस आप हैं, बस आप, यही दिगम्बर बोध होता है।
वस्त्र उतारना ‘दिगम्बर नहीं है।
धारणाओं का उतर जाना ही दिगम्बरत्व है।
शास्त्र मात्र अनुकरण कराते हैं क्योंकि शास्त्र का अनुकरण आदर देता है। सम्मान देता है।
इसीलिए आधुनिक तथाकथित गुरु , संत विचारों के लबादे से ढके रहते हैं। धारणाओं के वस्त्र पहनते हैं।
वास्तविक दिगम्बरत्व इस बोझ का उतर जाना है।
फिर अपने अंतस में उतरना है...
बिना बोझ के, बिना दबाव के, यहां रूपांतरण की भी चाह नहीं है। जहां चाह है, वही मन अपने सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में पुनः उपस्थित है।
उसको समझना है, समझकर ही उससे पार जाया जा सकता है।
... वहां मार्ग, ... बहुत कठिन है, ... जटिल है, वहां बोझा लेकर चला ही नहीं जा सकता है।
... जो कुछ कल का अभी तक का अर्जित था, वह निस्सार है इससे हताशा पैदा नहीं होती, ... निराशा नहीं आती। स्वामी जी कहा करते थे- ‘मैं किसी का गुरु नहीं हूं, मैंने किसी को शिष्य नहीं बनाया, सत्य वाक्य था।
क्योंकि यात्रा विपरीत दिशा से आती हें पहले शिष्य होना लाजिमी है। जहॉं शिष्यत्व है , वहॉं अहंकार गिर जाता है। मैं जानता हूूं , इस बोझ के उतरते ही उस अंतस के खालीपन में गुरु तत्व अपने आप उतर आता हेै। तब गुरु उसी क्षण आपको शिष्य स्वीकारते हेैं। उनकी यही दीेक्षा है , वे स्वयं उस शिष्य के अंतः करण में विसर्जित हो जाते हैं।
स्वामीजी ब्रह्मनिष्ठ गुरु थे , वे हमारा मार्ग दर्शन के लिए ही आए थै। परमात्मा की शक्तियो ंपर उनका प्रबल विश्वास था। वे अद्वैत दशर््न की व्यवहारिक युक्तियों को अपने आचरण से ध्वनित कर रहे थे। हम ही प्रमाद में थे , नहीं समझ पाए , यह उनका ही अनंत प्रेम था , जो हमारे हृदय को निरंतर संवेदित करता रहा।
‘वे कहा करते थे- प्रयास इसीलिए आवश्यक हैं , यह समझ में आजाए कि कि प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं, यही जानना होता है-
‘फिर अचानक हंसी अपने ऊपर आती है-
मात्र खुला आकाश है
और है शेष दिगम्बरत्व, सब उतर गया, ...छाल उतर गई, पत्ते झड़ गए हैं-
अचानक सब गिरते ही तो नया रस, धरती सौंपती है।
‘यह नया दिन, ... नई सुबह ही ‘सार’ है, जहां यह बोध ज्योतित रहता है, तुम्हारे अकेलेपन के तुम्ही सहचर हो, ... दूसरा कोई नहीं,यही स्वामीजी समझा रहे थे
, यही आत्मकृपा है , तब अपने ऊपर विश्वास जगता है। ...
... दूसरा कोई नहीं,
.. तभी यात्रा प्रारंभ होती है।
7 लौटकर आया आज मेैं द्वार पर
यहां तक तो इस यात्रा में, मैं सहभागी हो चुका था कि प्रवेश द्वार मैं ही हूं, मुझे ही अपने आपको जानना है, मैं ही प्रारंभ हूं और मैं ही अंत हूं।
बाहर का जो भी आश्रय था सब टूट सा गया था। भीड़ कम होती चली गई थी। पहले व्यक्ति कम हुए फिर उनके विचार भी कम हुए। बाहर व्यक्ति शरीर के साथ आता है, पर भीतर उसकी स्मृति विचारों के साथ रहती है, ... पर वह जब चाहे, उछलकर सतह पर आ जाती है। कल्पना चित्रण कर देती है। ... बहुत भीड़ थी, ठसाठस, ... धीरे-धीरे भीड़ कम होने लगी। कुछ की पहचान भी खो गई, ... पर अचानक जैसे पारदर्शी जल में तल पर पड़ी सुई भी दिख जाती है, वैसे ही पुरानी बातें जो विस्मृति के कगार पर थीं, अचानक सतह पर आने लग गई, सिलसिला अनवरत बन गया। पहले जो सतह पर था, वही कूद कर बाहर आता था। पर अब भीतर का, ... पचास साल पुराना वह भी अचानक सतह पर आ जाता, ... स्मृति की तीक्ष्णता का अहसास और आहत कर जाता।
... यही जाना था, तुम्हें बस अकेले होना है। ... बस, वहीं वर्तमान है- बाहर भीतर कोई दबाव नहीं, ...इस यात्रा में तुम अकेले हो, और साथ ही कहीं जंगल में जाकर, जगत से कटकर पलायन नहीं करना है। सबके साथ रहते हुए, सारे कार्य करते हुए भीतर से नितांत अकेले...़
बाहर कहीं कोई सत्ता नहीं है, जिसका अब सहारा लेना है, सारी खंूटिया उखड़ जाने दो, वे तुमने ही तो निर्मित की हैं, ... तुम रस वहीं दे रहे हो, चिंतन का रस उसे मजबूत करता है, रस के हटते ही वह निर्मूल हो जाती है। उसे उखड़ जाने दो, बाहर के जब भटकाव के रास्ते बंद होते हैं, तब मन, अतर्मुखी होने लगता है, यही वर्तमान में होने की पहल है।
हां, जब अकेलापन होता है,
जब कोई दूसरा आलंबन ही नहीं होता है, तब अपने आपसे परिचय होता है। पाया, भीतर मूढ़ता है, अंधकार है, लोभ है, छोटापन है, दूसरे का धन हड़पने की चाहत शेष है, चिंता में हैं, ... जो गलत हुआ उसका अपराध बोध है, अपने सही रूप की पहचान तभी होती है।
हम अपने आपको सात तालो में छिपाकर रखते हैं। कोई देख ना ले। अपनी सही तस्वीर को किसी के सामने नहीं आने देते।
इस कटु वास्तविकता से कि आपकी सही सूरत यही है, आप पलायन करना चाहते हैं। यह आश्रमों में बढ़ती भीड़, ... ये सत्संगियों का मेला, ये नशा, ... सब इसी पलायन का प्रतीक है। हम अपनी वास्तविकता का सामना ही नहीं कर पाते हैं।
‘हम जो हैं, यह स्वीकारना, बिना किसी सहारे,के,... जब हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का प्रयास भी बंद कर देते हैं, तब अपने सही स्वरूप से परिचित होते हैं।
प्रश्न यहां मौलिक रूपांतरण का नहीं है।
प्रश्न यहां मात्र अपनी वास्तविकता का ज्ञान होना है।
मैंने पाया, इतना पढ़ने लिखने के बाद वर्षों ध्यान पर चर्चा व प्रयोग करने के बाद, भीतर की असंगतता में कभी नहीं आई,... भाषा जब भी उछाल आया,... बदतर हो गई।
दूसरा आया, उसने उत्तेजना दी,... उसने बात काटी,... उसने अभद्रता दी,... मन अशांत हो गया,... आखिर मालिक कौन था? जाना वह दूसरा ही था, जो इतना ताकतवर है, जब चाहे वह आता है,... अपने साथ बहाकर ले जाता है।
मैं क्यों नहीं, स्थिर रह पाया? क्यों नहीं शांत रहा,... भीतर का गंदलाया जल हल्की हवा के इशारे से इतना क्यों उछल जाता है?
... सच है, मैं अपनी वास्तविकता का सामना नहीं कर पाया,... मैं अपनी कुरूपता पर ‘मेकअप’ ही करता रहा।
‘जो है, उसकी स्पष्ट प्रतीति, न तो उसकी निंदा न उसकी प्रशंसा, न उसके लिए अन्य पर दोषारोपण, जब हट जाता है, तब अचानक वह स्वच्छ दृष्टि बन जाती है, जो बाहर-भीतर साफ-साफ देखने में समर्थ हो जाती है।जैसे वह आया , उसका अच्छा या बुरा विचार असया , उसे उसके साथ ही जाने दिया जाए , अपने अंतस में उसकी छाप ही नहीं ली जाए , यही सजगता हे। यही वर्तमान में रहने की देशना है।
हां, मेरी यह खोज कहीं अलग जाकर पृथकता में नहीं होनी है। मुझे कहीं नहीं जाना है। मेरा हिमालय तो यहीं है। यहीं मेरी गंगा बहती है। जहां मैं हंू, जिन परिस्थितियों में हू,ं यह प्रकृति ने दी है, इन्हीं में कार्य करते हुए, जीवंतता में अपने जीवित मन की खोज होनी है।
यही तो मेरे मालिक की मुझ पर असीम कृपा है , वही तो बस अब मेरे साथ रह गया है।
वह खोज होती है, मेरी अपनी प्रतिक्रियाओं से, अभी तक तो मैंने पाया, मैं वही का वहीं हूं, जो पहले था, कुछ भी नहीं बदला है,... संग्रह भीतर का यथावत है,... बाहर की हल्की हवा भी भीतर तूफान लाने में समर्थ है।
क्या मैं मात्र एक तिनका हूं,... यही अहसास निरंतर रहता है। ... मेरा ज्ञान,... मात्र मेरी स्मृतियों का भंडार है,... उसकी अर्थवत्ता है,... वह सहायक कम होता है, अहितकर अधिक ।वह वर्तमान की हर समस्या पर अपना प्रक्षेपण करके, सूचना को दिग्भ्रमित कर देता है। उसे उसी रूप में नहीं देखने देता। यह अहसास स्पष्ट होने लगा है। तब जो अर्जित था, उसकी निस्सारता का बोध भी हताशा देता है। पर हां, जाना, अपने आपको जानने के लिए, अपने आपको जानने की कला को सीखने के लिए, इस स्मृति पर आधारित जो ज्ञान है, उसकी कोई आवश्यकता नहीं है।
‘मैं हूं,, वह यह हूं,... यह प्रतीति मात्र वर्तमान में होती है,... यहां मन जो इस मन को ही देख रहा है, साफ साफ देख रहा है। क्योंकि इस आंख पर कोई चश्मा नहीं है। कोई आग्रह-दुराग्रह नहीं है, विचारधारा का दबाव, हर बार देखने को प्रदूषित कर देता है। सच है, शायद ही कोई क्षण आया हो जब अप्रदूषित मन ने देखा हो, चाहे बाहर या भीतर, सब जगह यही पाया,... अचानक कोई आता है, वह देखने को भी प्रदूषित कर जाता है। यह विचार ही है। और विचार स्मृति में निवास करता है, वह हटाए नहीं हटता है।
... तब जाना, उस एकांत में,... उस अकेलेपन में, बस ज्वालामुखी ही फटते रहते हैं, अहर्निश लावा बहता है। अशांत, अत्यधिक सक्रियता हैं वहां,... कोई ठहराव नहीं है।
इस गति के साथ रहना तभी संभव हो पाता है, जब मन भी बोझिल न हो, जहां, कोई दबाव नहीं हो। विचार रहित हो, तभी उस जीवंतता को हम अनुभव कर पाते है।
तभी जाना, बाहर स्थिर होकर, जड़ होकर बैठ जाना, साधन नहीं है। ... साधन तो मन की, निष्क्रियता है, जब वह विचार के साथ बहता नहीं है, तब उसकी शक्ति बढ़ती है। उसकी शक्ति है, उसका स्मृति व कल्पना के दबाब से हटना। तभी वह इतना संवेदनशील हो जाता है कि वह भीतर की गति को, जीवंतता को अनुभव कर पाए।
... इसीलिए जाना, साधना मात्र, इस मन को मुक्त ही करना है। यह जितना विचार रहित रहेगा,... उतना ही तीक्ष्ण व एकीकृत होगा, शक्तिशाली होगा।
हां, प्याज के छिलके की तरह,... जब उतारते जाओ, तब क्या बचता है? यही यहां महत्वपूर्ण है।
हजार परतें, जो विचारों की जड़ीभूत इकाई हो जाती हैं,... वे इतनी सघन हो जाती हैं कि वे ही हमारा स्वरूप बन जाती है। मैं जानता हूं, मेरा यह विचार है, मेरी यह राय है, यह जो मैं हूं, यह मात्र एक हमारी बनाई प्रतिमा है, जिसकी हम रात-दिन पूजा करते हैं, और यह फिर हमारी शास्ता बन जाती है।
... हम नहीं देखते, हम नहीं सुनते, यही प्रतिमा देखती है, सुनती है,... यह जाना। मैं क्रोधित हो गया,... जाना, मैं तो शांत था,... पर मेरी प्रतिमा एक अहंकारी पिता की थी, मेरे अहंकार को चोट पहुंचते ही मैं तिलमिला गया। आहत हो गया। ... क्रोधित हो गया। क्यों? मैं अपनी बनाई ‘प्रतिमा’ से, उसके रूप से संतुष्ट था, उसे चाहता था... मैं और मेरा बनाया गया ‘रूप’ दोनों ही तो एक है। ... जब हम ध्यान में गहरे उतरते हैं, एकांत में अपने साथ होते हैं। बिना किसी प्रदूषण के अपने आपको स्पष्ट देखते हैं, तब मन की इस तीष्णता से, उसके ताप से यह प्रतिमा पिघलने लगती है। हमारी वैचारिक संपत्ति घटने लगती है, तब अपने आपसे जानने की कला, विकसित होती है।
8. क्योंकि मेैं जानता हूॅं
पहले ‘अवधारणा’ शब्द को समझा था।
यह हमारी दूसरों के बारे में बनी बनायी पुख्ता राय होती है।
हम उससे चिपक जाते हैं। यह हमारी स्मृतियों को मजबूत करती रहती है।
सच तो यह है कि हमारे व्यक्ति और मनुष्य होने के बीच सबसे बड़ी बाधा यही है। यह हमेशा हमें व्यक्ति तो बनाए ही रखती है हमें धक्का देती हुई भीड़ का ही अंग बना देती है।
सारा यांत्रिक कौशल, टेलीविजन, प्रचार सामग्री, तथा धर्मोपदेश हमारी अवधारणा को मजबूत करते रहते हैं।
... ये हमारे चित्त में सबसे नीचे, पैंदे में अपना अधिकार कर लेती है। यही हमारी ‘संस्कारबद्धता होती है।
संस्कारों से चिपक जाना।
हमने जो कुछ भी बाहर देखा, सुना। इन्द्रियों ने जो अनुभव किए, वे स्मृति में आकर ठहर जाते हैं। फिर बार-बार चिंतन होने से, ये पुख्ता हो जाते हैं। फिर ये ही अनुभव, बीज बनकर हमारे चित्त मे पैंदे में जमा हो जाते हैं। जो उछाल पाकर सतह पाकर, अनावश्यक विचारणा का प्रवाह पैदा कर देते हैं।
हम इसी संस्कार के अधीन होते हैं।
इन जड़ीभूत वैचारिक संस्कार को जब हम परिमार्जित कर मनुष्यत्व में बदलते है, तब संस्कृति पैदा होती हैं। संस्कृति व्यक्ति की, मानव होने की यात्रा है। संस्कृति मानवीय मूल्यों की रचना करती है। सभ्यता वैचारिक मूल्यों की पक्षधर होती है।
यह एक बुनियादी फर्क है। आज संस्कृति की परिभाषा औरउसकी अर्थवता पर ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिना, अनेक मत है। परन्तु बुनियादी सार तत्व एक ही है।
इस संस्कार बद्धता को जो हमें जड़, कूपमंडूक बना देती है, समझना हमारी इस यात्रा का पहला पड़ाव होता है।
स्पष्ट देखते ही, हम सबसे पहले इसी से परिचित होते हैं। परन्तु होता यही है। हम इससे भयभीत होकर, बचाव की मुद्रा अपना लेते हैं। हम अपने आपको न्यायोचित ठहराने का उपाय ढूंढते हैं। समस्या का आकलन हमारा वैयक्तिक है या मानवीय,... यह दृष्टिकोण ही हमारी संस्कारबद्धता की सूचना देता है।
टेलीविजन पर जितने ‘विमर्ष विद्वानों के सुनाए जाते हैं, उनमें यह कूपमंडूकता स्पष्ट दिखाई देती है। वे अपने आग्रह-दुराग्रह के साथ आते हैं। उनके स्थिति, वस्तु को देखने का नजरिया ही दोषी होता है।
... तो हम जब अपनी संस्कार धर्मिता से परिचित होते हैं, अपनी जड़ता को देख पाने में समर्थ होते हैं। तभी भीतर के इस कूड़े-करकट को देखकर, जो हमारी ‘मैं’, ’की प्रतिमा का निर्माण करता है, वह व्यथित हो उठते हैं।
वही तो हमारी पूंजी है।
हमारी व्यक्तिगत सत्ता है।
हमारा सारा प्रयास उसी के संवर्द्धन का होता हे, और उससे असहयोग करना, अपना ही अहंकार विसर्जन करना होता है।”मैं यहॉं टूटने लग जाता है।“
इस व्यक्तित्व के, इस ”मैं“के विसर्जन के बाद ही ‘मनुष्यत्व’ पैदा होता है।
जब पुराना जाता है, तभी नया पैदा होता है। पुराना हमारे संस्कार का दबाव है,... सवाल यह नहीं है कि वह अच्छा है या बुरा,... वह हमारे अतीत का भंडार है, ... जो हमारी प्रतिमा का निर्माण करता है, और हम वर्तमान में रह रहे हैं। मन जब इससे अप्रभावित होगा,... तभी हम वर्तमान को साफ-साफ देखने में समर्थ हो पाएंगे।
9.अवलोकन एक रहस्य
यह तो मैं कह नहीं सकता कि मैं अपने ही घर के दरवाजे पर आ गया हूं। लगता है, दरवाजा दिखाई पड़ता है, पर देहरी तक आते-आते कोई बाहर से बुलाता है, मैं पीछे मुड़कर देखता हूं और फिर दरवाजे से दूर चला जाता है।
‘मन एक बहुत बड़ा भुलावा है।
पूज्य स्वामी जी कहा करते थ, मन एक बंदर की तरह, ... आंख मिलाते रहो वह दूर खड़ा रहेगा, पर पलक झपकते ही वह वस्तु को उठकर ले जाता है, ... सजगता इतनी सूक्ष्म रहे, ... अपलक देखते रहो।
... तब क्या ध्यान आंख मींचकर होता है, ... किसी नाम रूप पर मन को एकाग्र कर होता है, ... हो सकता है अनवरत ध्वनि की आवृतियां या ... एक ही चित्र पर एकाग्रता, ... मस्तिष्क को कुछ देर के लिए सुप्त कर दे। पर वहां सजगता नहीं रहती। मूर्च्छा आ जाती है।
... वर्षों इसी स्थिति में रहा।मूर्ति पूजा की,देवी आराधना की, बहुत मंत्र जपा। जप -योग पढ़ा था। फिर एकाग्रता ,‘नाद’ पर रही, ... सुनता रहा, सुनता रहा, ... ध्वनियों का अपना आकर्षण व रस रहता है। ग्रन्थों में बहुत तारीफ पढ़ी थी, ... पर पाया, ... भीतर का जो कुछ गंदलाया जल था, ...यथावत है। वही हीन भावना वही अहंकार, ... सरलता नहीं प्राप्त हो पाई। चित, प्रसन्न नहीं रहा। प्रसन्नता ही तो उपलब्धि है, ...जो स्वतः आती है। पर खिन्नता ने यथावत रखा।
... हां, जब भीतर के गंदलाये जल का अहसास तीव्र होता गया, ... तब पाया यही तो मैं हूं, बाहर जो आरोपित था, वह अब प्रभावहीन हो गया। बाहर किसी से सवाल पूछना, और किसको उपदेश देना, लगता है, सब व्यर्थ है।
...शांत बैठते ही, ... वही जल तट पर आकर टक्कर मारने लगता। यही तो वास्तविक मैं हूं। संस्कार बद्ध जड़ता। हर चीज के प्रति हर कायम राय। स्मृति का दबाव यथावत। देखते ही नामांकित हो जाने की निरंतर चालू रहने वाली प्रक्रिया यथावत थी। यही तो वह बाह्य मन था, जो निरन्तर सक्रिय था। एक फिरकनी की तरह, कोई बात आई, फिरकनी तेजी से घूम गई, फिर उसकी गति के साथ एक नहीं पचासों बात पैदा होती र्गइंं। यही तो सिलसिला है, जो निरंतर चल रहा है।
... जाना यही चेतना है। एक स्पंदन सा होता है, तरंगें ही तरंगें है, वहां ... उपर की सतह पर सभी कुछ है, ... बस प्रवाह बाहर आने को तैयार रहता है। हल्का सा इशारा मिला, वह बाहर निकल आता है, ... यह बाहर कहां से आना चाहता है, ... कहां तक गहरा है, यह कूप, ... पता नहीं भीतर जो कुछ है, अभी स्वप्न में दिखाई पड़ता है, ... वर्षों से न देखे दृश्य वे लोग जिन्हें कभी देखा नहीं, वे नगर जहां कभी नहीं गए, ... तब पाया भीतर भी अनेक परतें हैं, ... अंतहीन है।
एक बाहर का तल है, जो दिखाई पड़ता है।
दूसरा भीतर का है जो अगम व अगोचर है, हां कभी कभी इस चेतना के अहसास का संकेत मिलता है। बाहर का तल अत्यधिक सक्रिय है। भीतर का जल, शांत पर शक्ति संपन्न है। वहां हलचल अनुभव नहीं होती। मात्र स्वप्न कभी कभी उसकी ओर संकेत कर जाते हैं।
तब जाना, मैं जो देखता हूं, मैं जो बोलता हं, क्या वह वही है, जो दिख रहा है, या कहना है, लगता है, यहां एक प्रकार का अवरोध खड़ा हो जाता है। जानता हूं, यह कृत्य गलत है, परन्तु मेरे दल के सदस्य का है। मेरे परिवार की प्रतिष्ठा का है, मैं उसे न्यायोचित ठहराता हूं, जानबूझकर झूठ बोलता हूं। सच है, हम वही देखते हैं, जो देखना चाहते हैं। वही सुनते हैं, जो सुनना चाहते हैं। परिणामतः हमारा कथन, दर्शन, श्रवण सब छिछले स्तर का होता है। हम समग्रता में जी नहीं पाते।
व्यक्ति सामने आया नहीं कि हम उसके बारे में पहले से ही सब सोच लेते हैं। उसके कथन की भी कल्पना कर लेते हैं तथा अपना उत्तर भी तैयार कर लेते हैं।
यह हमारा बाह्य मन, इन्द्रियों के दरवाजों से सूचना तो लेता है, पर हमारा मन इस सूचना को अपने ही रंग में रंगकर सामने लाता है, तब बुद्धि का लिया गया निर्णय भी दूषित हो जाता है।
समग्रता में, सजगता में जब हम क्रियारत रहते हैं, तब पूर्णतः अपने आपको अवलोकन के लिए समर्थ पाते हैं। पर यही नहीं हुआ। जब भी देखा, मन ने उसके पहले ही अपनी जानकारी दे दी। परिणामतः जो देखा, वह अपने स्तर ही गलत देखा, यही द्वन्द्व भीतर तक बैचेनी खड़ी कर गया। दो मिनट भी नहीं मिलते जब यह मन अपनी क्रियाशीलता को स्थगित कर गया हो।
गलती यहीं ही हुयी थी।
मैं वर्षों एकाग्रता की ही साधना करता रहा। एकाग्रता पचास चीजों को छोड़कर एक पर केन्द्रित हो जाना। मूर्ति पूजा, मानसिक पूजा की, ध्यान किया, ... अपने आपको एक ही विचार, एक ही रूप पर एकाग्र करना। एकाग्रता भी महत्वपूर्ण रहीं। ... पर यह खंड-खंड एकाग्रता-समग्रता में बाधा भी पहुंचाती रही। ध्यान से हटते ही, बाहर की दुनिया में वहीं ओछापन साथ रहा, ... भाषा की दरिद्रता, रही,अहंकार और जोर से आया। अजीब विरोधाभास सा बन गया। भीतर का देवत्व एकाग्रता के समय तथा राक्षस शेष समय यथावत जगता रहा। इस द्वन्द्व को झेल पाया अत्यधिक कठिन था।
सजगता, ... हमेशा बनी रहती है। एक होना, ... रहता है, तभी गोरख को समझा था।
‘सदा सुचेत रहे दिन रात, ... सो दरवेश अलख की जाति, ...
... सदा सुचेत, ... सदा ही सचेत रहा जाए। जगते-उठते, बैठते-चलते, बेहोशी में नहीं, मन की विचारणा में नहीं, मात्र क्रिया के साथ रहा जाए’
‘जहां क्रिया नहीं हो, वहां मन शांत रहे, ... उसकी चयन करने के प्रक्रिया जो अपने आप चलती रहती है, वह रुक जावे।
... हां, जाना, यही साधन है, साध्य है। वहां क्या होगा, ... कोई कल्पना नहीं? पर हां इस समग्रता में भीतर गंदलाया जल जो निरंतर थपेड़े मारता रहता है, ... वह अब हर क्षण उद्वेलित नहीं कर पाएगा। और जाना, ... यह संभव है, ... मात्र इस मन की इस मन के द्वारा ही सतत निगरानी से, ...बिना चुनाव के मन का निरीक्षण तो करते रहो, पर जहां तक हो सके, शरीर को निरंतर क्रियाशील भी रखो। मात्र एकांत में जाकर, शांत बैठकर किताबें पढ़ते रहो, कैसेट सुनते रहो, जीवन जगत से दूर रहो ,यह तो मात्र पलायन है।
... निरंतर कर्मरत रहना है, सन्यास का अर्थ है, जो मन का अनावश्यक विचारणा में भटकाव है, उसका त्याग, तथा जो निरंतर कल्पना का जो वेग भगाता रहता है, ... उसके प्रति वैराग्य, तभी यह सन्यास सधता है। यहां वेशभूषा का परिवर्तन नहीं है। मात्र जो कल, अतीत में गया, स्मृति में गया उसका अप्रासंगिक होते जाना, साथ ही जो कल आया ही नहीं .... संभावना मात्र है, उसमें मनोराज्य में में विचरणा करना व्यर्थ है। तब जो आज है, मात्र वर्तमान है, उसमें रहा जाता है।
... हां, यहां जो भीतर के द्वन्द्व है, वे छूटने लगते हैं।
10. आत्म निरीक्षण
मैं क्या चाहता हूं,... यह सवाल कई वर्षों से उठता रहा।
मात्र सुख,... इंद्रिय जन्य सुख बौद्धिक सुख,... लोग प्रशंसा करंे,... सम्मान दें... शरीर स्वस्थ रहे,... धन प्रचुरता में रहे,... यही तो सुख है।
इन सबका होना ही एक तृप्ति देता है। एक पूर्णता।
यह दिमाग की चालाकी नहीं है। निरंतर उठने वाली भूख नहीं है। यह एक आवश्यकता है। जैविक भी। मानसिक भी। बौद्धिक भी।
देखा, मैं ही नहीं सब ही यही चाहते हैं। सुख की नींव पर ही, मैं भी खड़ा हूं, पूरा परिवार और समाज खड़ा हैं।
... पर यहीं आकर दुविधा भी मिली। सुख तो आया, पर अपनी अंतिम घड़ी में दुख भी लाया। जो आया वह गया भी। यह भी आया, वह भी गया। धन भी आया वह भी गया। कल तक बहुत भीड़ थी,... आज कोई आता ही नहीं। यही तो गति है। यहां कुछ भी स्थिर नहीं है। स्थाई नहीं है।
सुख अकेला नहीं आता। दुख भी साथ लाता हैं सुख दुखमें बदल जाए इससे पहले भय आता है। भय यह कि दुख न आ जाए, जो आज है वह, इस अनुरूप में ही नहीं रहे।
तब सोचा क्या ऐसा सुख आ सकता है, जिसके साथ दुख नहीं आए। जैसे शरीर के साथ छाया चलती है। दुख भी सुख के साथ चलता है। ... पढ़ रहा था,... कहा गया था- सुख इन्द्रिय जन्य होता है- देखा,... उससे उत्तेजना हुई,... वह मन के स्तर पर होती है। इन्द्रिय संवेदन, संवेदना पैदा कर देते हैं। ... फिर उससे जुड़ने की इच्छा पैदा होती है।
... तात्विक दृष्टि से कहा जाता है- अनुभवन की स्थिति में अचानक विचार आता है, वह स्मृति से आता है, वह इस स्थिति को तुरंत नामांकित करना चाहता है,... चाहता है, उसे नाम दे,... यह स्थिति बार-बार बनी रहे, पर यह होता नहीं है, तब वह अनुभवन था, वह निःशेष हो जाता है। ... अनुभव की स्थिति में, विचार नहीं था,... वह क्षण अपने आप में अविस्मरणीय हो जाता है, बस वह अनुभव ही शेष रह जाता है। उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। उसके साथ ही विचार के आते ही जब नामांकित कर पुनः प्राप्त करने की इच्छा जगती है, उसे सुख कहा जाता है।
यह विचार ही इच्छा के माध्यम से उस स्थिति की निरंतरता की मांग करता है,... उसको बनाए रखना चाहता है,... विचार स्मृति से आता है, उस स्थिति को स्मृति में बदल देता है,... चिंतन के रस से उसे पोषण मिलता है।
हां, जब हम निर्विचारता में जाने का क्षण प्राप्त कर लेेते हैं। यह कभी कभी अनायास भी प्राप्त हो जाता है। वहां स्मृति का दबाव नहीं रहता,... वहीं उस अवस्था विशेष में अचानक ही ‘राग-द्वेष’ की शृंखला भी अप्रसांगिक हो जाती है। वही अवस्था,... ‘प्रसादम’ की है। यहीं वह प्रसाद प्राप्त होता है, जिसे प्रेम कहा जाता है।
मैंने पाया-
जब लिखते समय,... या बोलते समय, अपने आपको समग्रता में पाया,... वहां स्मृति का दबाव नहीं था। परन्तु जब अपने आपको बचाकर रखा, सोचते हुए बोला, सोचते हुए लिखा तो अपने आपको एक द्वंद्व में पाया,... मन पूरी तरह अपनी विचारणा व अवधारणा के साथ सक्रिय था।
.. तब जाना, स्मृति से ही उत्तर आ रहा था,... और जो था जो बन रहा था वह स्मृति में ही जा रहा था।
एकाग्रता का लाभ और उससे नुकसान यही पाया कि यह एकाग्रता स्मृति को ही मजबूत करती जाती है, स्मृति का भंडार ही सवाल पैदा करता है, वही उसके उत्तर भी लाता जाता है।
तब जाना ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य और कुछ नहीं’ विचार से स्वतंत्रता है यही व्यक्ति को मनुष्यत्व में ढाल सकती है।
विचार कभी नए नहीं होते, मैं सोचता हूं, ये मेरे विचार हैं, ये मात्र मेरी स्मृति की ऊपरी सतह की लहरों का प्रवाह है, जो तट से टकरा रहा है, और जब मैं इस विचार से किसी नए दृश्य को, नई वस्तु को, नए रूप को देखता हूं, स्पर्श करता हूं तब उसी समय में इसे स्पर्श कर, अपनी स्मृति का हिस्सा बना देता हूं। यही तो भस्मासुर है, जो जहां भी हाथ रखता है उसे भस्म कर देता है।
हां, हम देखें, पर सोचें नहीं,
सुने पर सोचें नहीं
वहां स्मृति का सहयोग नहीं रहे। ... इंद्रिय संवेदन की अपनी ऊर्जा है... उनका अपना सम्मोहन है, वे जब चेतना पर छाप छोड़ते हैं, तब विचार का आधार न होकर, शुद्ध चेतना का जहां आधार मिलता है, वहां जो घटता है, वह अविस्मरणीय है।
‘सर्वथा नूतन,... अनुभवन है। शांत मन है।
हां, वहां सुख नहीं है।
सुख का आधार तो स्मृति है। सुख तो संचयन की प्रक्रिया है, वहां विचार रहता है, विचार हमेशा पुराना होता है।
... जो नया है,... वह नूतन है,... वहां वैचारिक स्पर्श नहीं है। समय वहां नहीं है, वहीं तो वर्तमान है।
न भूत का दबाव है, न भविष्य की कल्पना है।
... वहां फिर बार-बार उस अनुभव को दोहराने की इच्छा नहीं होती। इच्छा ही विचार का आधार लेकर, सुख को पैदा करती हैं। वहां फिर छाया की तरह दुख भी छिपा रहता है।
पर जहां ... बिना विचार का सहारा लिए आस्वादन है, वहीं स्थायी सुख है। शांति है।
... तो फिर दुख से बचने का उपाय, सुख की यह समझ ही है कि इच्छा की पूर्ति को विचार कीं बंदिश से दूर रखा जाए। इच्छा को रोकना असंभव है।
... जो मिला है,... जो प्राप्त है,... वहां मात्र भोग तो है,... पर सातत्य.... की कामना अनुपस्थित है, बार-बार दोहराने वाला मन नहीं है। नामांकित कर,... वस्तु, परिस्थिति, घटना को विवेचित करने का आग्रह नहीं है। ... मात्र सामर्थ्य का सदुपयोग की यहां पर है। यहां हम सुख के विरोध में नहीं है। भूखा नहीं रहना है। नंगा नहीं फिरना हैं, पर भोग के समय ही भोग है।मन यहॉं अपनी पूर्णता में हे। तब हर क्रिया अपने आप ही सहज समाधि में ढल जाती है तब कर्ता अपने आप उसी क्रिया मे ंलीन ीो जाता है , यही अहंकार के विसर्जन की किगया है। यही वर्तमान में रहना है।। यहॉं मन का चिंतन पक्ष अनुपस्थित है। मात्र चेतना क्रियारत है। सुख सेेस्थायी सुख, स्थायी सुख से शांति यही मार्ग है।
मन दो कार्य एक साथ कर सकता है। वह देखते हुए, चखते हुए सोच भी सकता है। यहां चखना तो है, देखना तो है, पर विचारणा का आदर नहीं है। विचार ही इस मांग को सुख में बदल देता है, और दुख को, भय को निमंत्रण भी दे देता है। हमें स्थायी सुख में प्रवेश करना हे।
आनंद क्या है, मैं नहीं जानता।
मुझे इसका अहसास नहीं है। पर ‘इस विचारणा की अनुपस्थिति से जो सरलता व सहजता अनुभूत है, वह रसमय है। भीतर का द्वन्द्व; कोलाहल कम होने लगा है।
क्या यह मेरे लिए प्रिय नहीं है? शांत मन और मन की शांति दो अलग-अलग स्थितियॉं हैं, जहॉं शांत मन है, वहॉं किसी प्रकार का उद्वेलन नहीं है।
पर क्या व्यवहारिक जीवन में यह संभव है?
जाना, पहले भोग की ही इच्छा थी,... स्वाद में रस था,... खाना-पीना बहुत अच्छा लगता है। स्वादिष्ट भोजन,हो, बतरस हो। बातंे हों, बहुत अच्छा लगता था। पहले भोग का आकर्षण होता है, फिर संपत्ति का , फिर यश का।
फिर अचानक संपत्ति मोह जागा। ‘केरियर’ के पीछे पैसे कमाने का मोह होता है। धन का अपना आकर्षण है। अनावश्यक घर परिवार छोड़कर जो सन्यास ले लेते हैं, उनके भीतर ही यह आकर्षण बना रहता है। जो जितना त्यागी होता है, उसका आश्रम उतना अधिक बढ़ा। उतनी ही संपत्ति,... भगवान तो न तो प्रसाद चखते हैं,...न वे सोना चाहते हैं, न गहने,...
पर नाथ जी के यहां प्रसाद व वैभव,... यह वैभव मेरी ही तो आकांक्षा के प्रतिरूप है।
़11 सीढ़ी दर सीढ़ी
... संपत्ति की प्यास स्वाभाविक है। जो सन्यास लेते हैं, श्रमण... हो जाते हैं। उनसे चातुर्मास पर करोड़ों खर्च होते हैं। उनके नगर में मंगल प्रवेश पर बाजे बजते हैं, पूरे शहर में पोस्टर छपते हैं। यह श्रेय की भूख है।
‘क्या,... पहली भूख,... स्वाद की, भोजन की, भोग की, इसकी संपत्ति होती है। संपत्ति भोग का साधन सौंपती है। पर मन प्रेय से ही नहीं भरता, व श्रेय भी चाहता है। श्रेय सत्ता सौंपता है। कुछ नहीं तो गली के ही नेता बन गए। मालिक बन गए। वर्ग के बन गए। यह भूख भी आदिम है।
इन तीनों भूखों का शमन होने पर ही प्रेम जागता है। जो शुभ है, वह पैदा होता है।
इस क्रम को बीच में तोड़ देने से उपद्रव ही हुआ है।
... जो आत्मवादी हैं, ब्रह्मवादी हैं। वे निवृत्ति को ही साधन और साध्य मान बैठे। हमें कुछ नहीं करना है। भूख तो है, कपड़े और चाहिए, एक घर भी चाहिए। यह समाज की जिम्मेदारी है। वे बहुत बड़ा कार्य कर रहे हैं। वे समाज के भले के लिए कोई कार्य नहीं कर रहे हैं।
कार्य करना प्रवृत्ति है। प्रवृत्ति-बंधन है व ध्यान में बाधक है। चाहे ध्यान विपश्यना से आए या प्रेक्षा से आए, किसी तरफ से आए, वही सार है। वह मुक्ति देगा। मुक्ति के बाद कोई कार्य नहीं है। जगत के प्रति उदासीनता का जागरण ही निवृत्ति मार्गियों की देन है। पर उनकी अन्न की भूख, वस्त्र की, तथा रहने की आवश्यकता की पूर्ति यह जगत ही करता है।
जगत तो निंदा का पात्र है, उपहास का पात्र है। नरक का द्वार है। तब जाना, सबसे उपहासास्पद यह ‘निवृत्तिमार्गी ही है। जो समाज से लेते तो मनभर है, पद देते छटांग भर भी नहीं है। उल्टा सारी विकृतियों का बोझा समाज पर डाल देते हैं। फिर मार्ग कहां है-
समाज की विषमताओं का समाधान,... एक निश्चित विचारधारा में पाया, वह शोषण के विरूद्ध थी। समता का शासन। पर व्यवहार में पाया किसान मजदूर ने तो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़ दिए,... पर समाज में जो सत्तावादी स्वर उभरा,... वह निरंकुश हो गया,... उन व्यक्तियों के समूह ने अलगाव और अत्याचार इतना अपनाया कि वे उन व्यक्तियों का सर्वनाश करने लगे, जो अपनी व्यक्तिगत भूख और प्यास का समाधान उन्हें सौंप गए थे।
व्यक्ति को मनुष्य में बदलना, संस्कृति का धर्म है।
सभ्यता, व्यक्तित्व को और मजबूत बनाती है, मनुष्य जितना सभ्य होता जाता है, उतना ही स्वार्थी व एकांगी होता जाता है।
सभ्यता स्वार्थ की जननी तो है ही साथ ही वह अत्यधिक बुद्धि पर आग्रह रखने के कारण से उसे पृथक करती जाती है। वह धारा से टूटता चला जाता है।आज समाज में जितना अकेलापन , अवसाद , और आत्महनन का प्रभाव है उतना पहले भी नहीं था।
सोवियत संघ में इस नयी विचारधारा का क्रियान्वयन हुआ,... पर व्यक्ति को सामाजिकता प्रदान करने में असफल हो गया है। सत्ता ने व्यक्ति को बदलने नहीं दिया।
अच्छा सिद्धांत था, व्यक्ति के मनुष्यत्व में बदलने का प्रयास मात्र सिद्धांत के गलत लोगों के हाथ में जाने से लक्ष्य को पाने में असमर्थ हो गया।
‘सत्ता’ का चेहरा विकृत होता है, अधिनायकवाद से।
चाहे वह लोकतंत्र में हो या पूंजीवाद में या समाजवाद में। सत्ता के चेहरे को स्पष्ट साफ रखने में,... जो सत्ता के स्वाद से भी परे चले गए हो, उनके नैतिक दबाव की आवश्यकता होती है। यह कार्य वे कर पाते हैं,... जो संस्कृति प्रेमी है। साहित्य, कला, अध्यात्म, की यही भूमिका है।
आज ‘धर्मशब्द’ इतना विकृत हो चला है कि वह अपने स्वाभाविक अर्थ धारणा, स्वभाव को खो बैठा है। वह मूल्य जिसके धारण करने से अभ्युदय या निश्रेयस की प्राप्ति होती है, वह धर्म है। धर्म स्वभाव है। जो वस्तु का नैसर्गिक गुण होता है। धर्म तब संस्कृति से जुड़ जाता है। संस्कृति वह रसायन है जिससे व्यक्ति का रूपांतरण मनुष्य में, मानव में हो जाता है। व्यक्ति सांप्रदायिक होता है, उसका मत होता है, उसका विचार होता है,... मानव की मात्र मांग होती है। उसकी मांग मात्र प्रेम है।
12.इस मोड़ पर
यह यात्रा की चौथी सीढ़ी होती है।
जो इस चौथी सीढ़ी पर होता है, वह ‘सत्ता’ की यांत्रिकता पर उसकी कुरुपता पर अंकुश लगा पाता है।
‘रचना,... समाज का दर्पण बन जाती है। जो प्रेम है, वह मात्र दर्पण है। वह सत्ता की न तो निंदा में है, न प्रशंसा में वह उसके यथावत रूप का प्रतिरूप बना सकता है।
साहित्यकार को इसीलिए ऋषि कहा था-
उसके भीतर का प्रेम,... मानव की प्यास है। वह व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह से बहुत ऊपर उठ चुका होता है।
इसीलिए रसवादी दर्शन में, मधुमती भूमिका का वर्णन आता है।
यहां अनुभवन में विचार की अनुपस्थिति है।
तो विचार कहां गया?
‘विचार और भाव, सांद्र रूप में, एक्य होकर, अनुभूति की वह तीव्रता दे रहे हैं, कि वहां विचार का दबाव हट जाता है। पिघलता द्रव्य मात्र आकार की तलाश में मचल उठता है। वस्तु और रूप का यहीं एक्य होता है।
‘आकार पहले आता है, या वस्तु पहले’
यह प्रश्न यहां खड़ा नहीं होता।
‘ऊर्जा का रूप ही तो पदार्थ है। पदार्थ के विसर्जन के बाद क्या शेष रह जाता है, मात्र ऊर्जा’
शब्द पदार्थ ही है, विचार भी पदार्थ ही है। इनके परे जो है जहां विचार विसर्जित हो जाता है, क्या शेष रह जाता है- मात्र मौन,... जो अपरिभाषित है,... ‘मात्र प्रेम’
... यही चौथी अवस्था होती है।
कभी कवि जायसी ने कहा था, चार बसेरे जो चढ़े सत सौं उतरे पार“
समाज को बलपूर्वक निवृत्ति में नहीं भेज सकते। ‘आत्मवादी समाज की पराधीनता, पराजय व सार्वभौमिक मूल्यहीनता का यही कारण है। सच तो यह है कि संपूर्ण निवृत्ति के बाद, जो पूर्णावस्था की स्थिति है, जिसे मुक्ति कह सकते हैं, वहां भी समाज के लिए उपयोगिता है, प्रवृत्ति है, पर वह प्रेम मय है। ‘हीनयान धर्म से’ महायान तक की यही यात्रा है।
बोधिसत्व, मानवीय करुणा के प्रेरक हैं। उनकी समाज में उपस्थिति मंगलकारी है।
यह निवृत्ति का फिर प्रवृत्ति में ही सहयोग है।
तो क्या हम मात्र ‘निर्विचारता’ की स्थिति को समाज से हटकर किसी एकांत में, किसी अभ्यास शिविर में, जाकर पा सकते हैं? हमने पहले विश्लेषित किया था-
‘एकाग्रता हमारा आराध्य नहीं है-
एकाग्रता प्रारंभ में सहायक होती है, हम पचास चीजों में एक पर मन को ले आते हैं, इससे मन की शक्ति बढ़ती है, पर बाद में हम उस एक के गुलाम हो जाते हैं।
पुनः भय लौट आता है। मस्तिष्क की मूढ़ता बढ़ने लगती है। कोई मौलिक रूपांतरण हमारे भीतर नहीं हो पाता है। हम जैसे आए थे, वैसे ही चले जाते हैं। शायद जो साथ लाए थे, उसे भी गवां जाते हैं।
इस प्रेम को, इस आनंद को, हम समाज से कटकर नहीं पा सकते, ‘यह सच है-
‘भोग, संपत्ति, सत्ता,... इन तीनों की गहरी समझ के बाद ही चौथा आयाम जाता है। ‘हमारे अधिकांश पुरोधा.. सत्ता तक की प्यास में जगे,... जगाते रहे,... आध्यात्म के गुरु भी सत्ता के भूखे होते हैं। उनका अहंकार उनकी हरवृत्ति में परिलक्षित है। इसीलिए वे सत्ता के निरंकुश चेहरे पर मेकअप ही अधिक करते रहे। , हमारे अधिकतर धर्म गुरुओं की यही स्थिति है।
वे एक अदृश्य गठजोड़ के साथ रहते हैं। वे ‘सत्ता’ की इस तीसरी भूख को जगाते हैं, और उसमें रह जाते हैं, उससे पार जाने की चेष्टा ही नहीं करते,... इसीलिए सभ्यता का पूंजीवाद से, जो कि ‘सत्ता का ही एक चेहरा है, प्रशासनिक सत्ता से तथा बाबा वाद से गहरा संबंध है। ये तीनों एक साथ बढ़ते हैं। भारत में संपत्ति के विस्तार के साथ, राजनैतिक सत्ता का वर्चस्व तथाबाबा वाद में बढोतरी... ही एक साथ बढ़ती दिखाई पड़ती है।
मैंने जाना,...
मेरी प्रारंभिक यात्रा, इस संपत्ति और सत्ता की भूख ही थी। सोचता था,... आध्यात्मिक यात्रा, मेरी संपत्ति में बढ़ोतरी करेगी, मुझे समाज में हैसियत देगी। मैं अध्यात्म से भी इसीलिए जुड़ा था। बचपन से सुनता आया था, जीवन में एक न एक गुरु बनाना चाहिए, एक न एक सत्संग में जाना चाहिए इससे सुरक्षा मिलती है। ... हमारे काम पूरे होने के लिए बल मिलता है।
काम पूरा हो गया, दूसरे की कृपा। गुरु की कृपा।
काम पूरा नहीं हुआ, असफलता मिली,... सुना,... कर्मों का फल,... यह तो होना ही था।
तब पता लगा,... यही आत्मविश्वास की अत्यधिक कमी है, विपरीत परिस्थितियों का प्रभाव लेश मात्र भी बर्दाश्त नहीं होता है। मात्र पलायन,... यही तो जीवन था।
... जब समझ जगती है, तभी भीतर का विश्लेषण प्रारंभ होता है। बाहर जब असंतोष स्वयं के प्रति गहराता जाता है, तब भीतर का रास्ता खुलता है,... बाहर इन तीनों ही ‘सत्ताओं’ का दबाव है। दबाव बहुत गहरा है। एक बात सदा याद रहती है, हमसे कम सामर्थ्य के लोग इतना धन कमा रहे हैं, इतनी राजनैतिक सत्ता का उपयोग कर रहे हैं, पर हम इतने पीछे क्यों है? यह तनाव तब तक भगाता रहता है, जब तक हम पड़कर गिरकर टूट नहीं जाते।
भागते-भागते ही तो पाया जाता है,,...कि, अचानक ठहरा भी जाता है।और यह सत्य हाथ में आया कि जब तक दौड़ते रहोगे , अपने आपको न देख पाओगे , न समझ पाओगे , मोैत ही आकर रोकदे , इससे बेहतर है किइस दौड़ से बाहर आजाओ , तभी अपने केन्द्र की तरफ ध्यान जाएगा।
या तो मौत आकर ठहरा देती है। उसकी धमक से ही विचार शक्ति कुंद हो जाती है। संज्ञाहीनता आ जाती है। या फिर हम उन सबके प्रति जो बाहर की दौड़ के प्रेरक हैं, अब उनकी निस्सारता को जानकर,... उसकी अतृप्ति का अहसास पाकर, रुक जावंे। यही गहरी समझ की प्राप्ति है।
... गीता में इसे ‘कछुवा धर्म कहा है’- अब कछुवे ने बाहर की यात्रा की अनावश्यकता पाकर अंगों को समेट लिया है, अंग भी रहेंगे, यात्रा भी रहेगी, पर जब आवश्यकता हो, तब चला जाए।
यहां यात्रा ‘अन्तर्मुखी होने लगती है।
बाहर यथावत रहेगा,... कुछ छोड़ना नहीं है।जो छूट रहा है, उसे छूट जाने दें।
गहरी समझ,... बाह्य के हर दबाव के प्रति सजग है। एकाग्रता नहीं यहां सजगता आधार है।
हमने पहले ही इस बात पर विचार किया था कि क्या इस स्थिति को जीवन में पाया भी जा सकता है? क्या यह मात्र एक ‘अवधारणा’ (कन्सेप्ट) ही है?
सच तो यह है कि हमारे सभी धर्म गुरुओं ने जीवन और जगत से काटकर ही इस ‘अध्यात्म’ शब्द की वर्णना भी है। ‘बुद्ध’ और ‘महावीर’ फिर ‘शंकर’ का गृहत्याग आराध्य रहा। हमारे सांसक्ृतिक इतिहास में वरेण्य रहा।
‘कृष्ण’ जी की गीता भी ‘निवृत्ति मार्गियों के हाथ में जाकर, ‘वीतरागता’ का वाहक बन गई।
‘गीता का सार है-
‘तस्मात सवर्षु कालेषु माम् अनुस्मर युध्य च’
सभी कालों में , मेरा स्मरण करते हुएयुद्ध कर...
‘निरंतर सजगता में, निर्विचारता में रहते हुए कार्य करते रहो।’
यह संभव होता है- जब हम जीवन के सभी कार्यों में, चाहे वह छोटे हो या बड़े, हर काम में अपने मन को पूर्णतः लगाते हुए उस किंचित मात्र भी विपरीत नहीं होने दे’
यही प्रवृत्ति में निवृति है।
व्यक्ति जब इससे जुड़ता है, तब वह स्वाभाविक रूप में अपने भीतर विचारों की संख्या कम पाने लगता है। विचार ही क्रोध है, वही राक्षस है, हम पहले चिन्हित कर आए थे, ज्योहि यहां गति होती है, जो भी कार्य हम कर रहे हैं, वह बेहतर होने लगता है।
साथ ही हमें प्रसन्नता भी प्राप्त होती है। प्रसन्नता ही प्रेम की पहचान है।
बहुत छोटा सा सरल अभ्यास है।
हमारा मन इतना विकृत हो चुका है कि किसी सरल बात को समझ ही नहीं पाता है।
उसे कोई जटिल, टेढ़़ा अभ्यास चाहिए, जिसे उसके अहंकार की पूर्ति होती हो।
यहां क्रिया के समय, मन अधिक से अधिक क्रिया में रहे, विचार के समय विचार के साथ, पर अनावश्यक विचारणा के साथ न बहे,... यह ध्यान हमेशा रखना है।
किसी कमरे में बैठकर, एकांत में शांत होना नहीं, बाहर आते ही सारे उपद्रव यथावत चले आते हैं।
यही मेरा दोष था। एकाग्रता की खोज में उपद्रव ही पीठ पर लादे चलता रहा। उन्हें न्यायोचित ठहराता रहा।
सजगता ही द्वार है।
यह वैज्ञानिक सोच जब व्यक्ति को मानव में रुपांतरण की चाह रखता है, कामना रखता है, तब उसे इस वैचारिक दुराग्रह से बचना होगा, जहां विरोधी स्वर का उत्तर गला घोंटने में होता है।
सिद्धांत अपने आप में श्रेयस्कर नहीं होते, उनका व्यवहार में आना महत्वपूर्ण है। आत्मवादी दर्शन, सोच, ‘विश्व बंधुत्व व मानव धर्म की घोषणा व एकात्म पुरुष के चारों वर्ण एक ही शरीर के अवयव हैं। सभी महत्वपूर्ण है, यह घोषणा करता रहा,... पर पूर्व मीमांसक आचार्य गण, मूर्ति पूजते-पूजते इतने पाषाण हृदय हो गए कि वे मनुष्य मात्र को छुआछूत के आधार पर पशु से भी बदतर बनाते चले गए। वे भी अपने अपराधों के लिए दोषी हैं। भारत में, मानव के पतन के उतने ही अपराधी हैं, जितने विदेशी आततायी जो भारत को लूटने या धर्म प्रसार करने आए थे।
जब हम स्मृतियों के दबाव, अनावश्यक विचारणा, तथा अवधारणाओं से मुक्त आकाश पाते हैं, तभी हम मानव हृदय में प्रवेश पाने में सफल होते हैं।
‘मानव हृदय में प्रवेश ही धर्म में प्रवेश है, धर्म यहां अपने विराट अर्थ में संप्रेषित हैं धर्म संस्कृति में प्रवेश कराता है। धर्म वह स्वभाव, व धारणा तत्व जो मनुष्य होने के लिए अपरिहार्य है। धर्म यहां किसी मत या संप्रदाय का सूचक नहीं है। तब संस्कृति अपने सार तत्व ‘प्रेम’ से व्यक्ति को सिंचित कर, उसकी जैविक भूख, संपत्ति की भूख, व सत्ता की भूख का शमन कर,... उसका उत्तरोत्तर विकास कर उसे ‘मानव में रूपांतरित करने में समर्थ होती है। संभवतः श्रेष्ठ मानववादी विचार व आत्मवादी विचार का यही लक्ष्य बिन्दु है।
..13. अभय
. हां, यहीं पहला ‘अभय’ प्राप्त होता है।
बाहर के सम्मान को छोड़कर, बाहर के परंपरागत ढांचे को अस्वीकार कर अपने ‘बोध’ के आग्रह को स्वीकारना, अपने विवेक के आधार पर मार्ग बनाना, ... सच्चाई के मार्ग पर चलने का प्रारंभ होता है। सरलता यहीं से आती है। यह सरलता ओढ़ी हुई नहीं होती। जैसी हमारे धार्मिक आस्थाओं में होती है, ... बाहर से सरल भीतर से बहुत कुंठित, जड़, ... जहां सम्मान की भूख है, कुछ होने की संभावना जागृत है, वहां केन्द्र से दूरी बढ़ती ही जाती है।
मुझे न तो कहीं जाना है,
न हीं जो जाना गया है, उसका अनादर करना है।
मैंनें यही जाना, जो परंपरागत मार्ग था, ... वहां मैं बस कदमताल करता रहा, ... भीतर का असंतोष, जड़ता यथावत बनी रही।
स्वामीजी हर कदम पर मार्गदर्शन करते रहे। पर भीतर सामाजिक लोभ यथावत था। भय भी था। अपनी परंपरागत मान्यताएॅं भीतर कहीं ना कहीं , किसी आलंबन में सुरक्षा देती हैं। पर स्वामीजी जहॉं संकेत कर रहे थे, वहॉं अज्ञात में गहरी छलांग की तरह ही था।
पराश्रय का अपना सुख हेै। आपका मन दूसरें में समर्पि रहता हें उस अज्ञात से ही सुरक्षा मिलती हेै। मन अपने आप में अपनी धारणा में लीन और संतुष्ट रहता हेै पर यहॉं पराश्रय को छोड़ते हुए निराश्रय से स्वाश्रय में आने का संकेत था। कई वर्ष इसी भय में चले गए।
आप नदी तट पर आकर घाट पर उतरकर लोटे से स्नान करना चाहते हेैं, या डुबकी लगाकर बाहर आजाएॅं, या तैरते हुए दूसरे तट को छूकर आजाएॅं , यह आपका अपना निर्णय है। । पर उस अनंत भागीरथी में उसकी थाह को पाने को ही डूब जाएॅं , यह नया ही सोच हे। यहॉं अपना ही खोना पड़ता है। बाहर के वस्त्र घाट पर ही गिर जाते हें यही दिगम्बरत्व है। यही रासपंचाध्यायी का चीर हरण है।
... सोचा, नया रास्ता जो होगा, उसकी भी कोई व्यवस्था होगी। यही उधेड़बुन रही, ... पर जाना, क्रिया की यह भी प्रतिक्रिया है। हम जब परंपरा से विद्रोह कर, बाहर आते हैं। भीतर की मनोवैज्ञानिक जड़ता, पराधीनता को हटा देते हैं। या वह छूट जाती है, ... तब अनायास हम भी उसकी प्रतिक्रिया में अपने आपको ढालना शुरू कर देते हैं। फिर हम सांप्रदायिक हो जाते हैं। हम अपने ही विचारों के दास हो जाते हैं। हमारे विचार, हमारे आदर्श हो जाते हैं।
... तो फिर क्या किया जाए?
यही सवाल सामने था।
जो कुछ पुराना था, उसकी अस्वीकृति विवेक के आधार पर थी, अब किसी भी आग्रह को न्यायोचित ठहराने का या अस्वीकार करने का उत्साह नहीं रहा था’
पर मात्र ‘एक बोध’ जगा था। बाजार है, सामान से अटा पड़ा है, ... पर सामान की पहचान भी है, पर भीतर यह बोध था कि इनकी जरूरत अब नहीं है। घर में वैसे भी बहुत कबाड़ रखा है, जो इस साल काम नहीं आएगा, उसे पहले हटाना है।
... पहले आग्रह बाहर का जो कुछ था, जैसा है, खरीद लाओ यह आग्रह था, ...जरूरत का पता नहीं था, ... परन्तु एक मनोवैज्ञानिक दबाव था, ... भीतर एक खालीपन था, ... रीतापन .... जो बाहर चमक रहा है, सब सोना है, ले आओ, ... घर नहीं हुआ कबाड़ खाना हो गया, बस सारी उमर इस कबाड़ को संभालने में चली गई।
तब मात्र ‘बोध’ शेष रह जाता है।
बाहर, बाहर है, ... भीतर का पता नहीं है। वहां की मात्र हलचल आकर्षित करती है। पर बाहर का सम्मोहन अब कम होने लगता है।
... हां यहां आकर, यह ‘बोध जागता है, अब खरीदना नहीं है, कुछ, ... अब कोई इच्छा विशेष नहीं है। ... यह यात्रा का एक प्रस्थान बिन्दु है। जो बाहर परिधि पर घूम रहा था, जब वह केन्द्र की ओर आना चाहता हे, तब यह क्रमबद्ध नहीं घटता, ... बाहर जो घूम रहा था, ठहरेगा, फिर गति बदलेगा, ... फिर प्रवाह बदलता है।
यह ‘ठहराव’ का बिन्दु विलक्षण है।
यह ठहराव, समय की सीमा मंे नहीं है।
समय सापेक्ष नहीं है।
बहिर्मुखी मन जब अन्तर्मुखी होता है। तब ठहरता है.... एक क्षण फिर केन्द्र की ओर आता है।
परंपरागत मार्ग में, ‘तीसरी आंख’ का मनोहारी वर्णन है।
मस्तिष्क मंे मन जब तक रहता है, वह बाहर घूमता रहता है, पर जब वह दोनों भृकुटियों के बीच आता है, ... तब एक क्षण रूकता है फिर नीचे उतरना शुरू होता है’
... पर यह यात्रा ‘अगम व अगोचर’ है। वर्णनातीत है। संकेत ही सार है।
... अब आप ‘स्वयं ही साधक हैं, और मार्ग भी आपका ही है। यहां आने की पहचान यही है कि आपका ‘बोध’ ही आपके साथ है। आप मात्र विवेक के अनुगामी हैं। आप और विवेक एक ही हैं। विवेक जो ‘सही’ है, उस पथ पर ले जाता है। ... प्रश्न जो भी है, वह आपका है। अब आपको अपने विचारों पर, अपनी भाषा पर विश्वास होने लगता है। विश्वास भीतर ही रहता है।
दूसरा कोई निर्णायक नहीं है। न हीं दूसरों से आपको अपने मत की पुष्टि करनी है। आपका विवेक जो अविवेक पूर्ण कृत्य है, उसे हटा देगा, ... वह आपको गतिशील रखेगा।
‘आप स्वयं में, एक स्थिर इकाई नहीं हैं। आप स्वयं विचार करें क्या आप समय के अंतराल में नहीं है, जो पहले थे। आज भी निरंतर बदलते जा रहे हैं।
... आप जब समाज में रहते हैं। अपनी पहचान बनाते हैं। आपका एक नाम होता है। पहचान होती है। आप एक स्वतंत्र इकाई होते हैं। आपका सुख-दुख आपके लिए महत्वपूर्ण होता है।
... पर आपके भीतर, ... ‘आप का स्वयं भी रहता है, जो आपको इस व्यक्तित्व से बाहर आने का दबाव डालता रहता है। वह आपका मानव मन है।
आप मुसलमान है, आप हिन्दू हैं, आप ईसाई हैं , सिक्ख हैं, यह आपका व्यक्ति मन ,सामाजिक मन के दबाब में है। , जो अपने भीतर अपने संस्कारों या मानयताओं का दबाव महसूस करता है। आप कभी अपने इस मन से संतुष्ट होते हैं।यह भीड़ का अंग है। यहॉं पहचान है। सम्मान है। आपका अहंकार तृप्त होता है। इसी में आप आते हैं , और रंगमंच पर अपना पार्ट अदाकर लौट जाते हैं।
पर कभी- कभी ं आपका व्यक्ति मन है , जो इस बाहरी सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच अपनी दीनता को देखता है। अपने अशांत मन को देखता हेैं।अपनी असमर्थता को देखता है ,वह कुछ नया हो जो उसका अपना ही हो , जहॉं सुख हो , शांति हो ऐसा अपना मन चाहता है , उसके अंतः करण में जिज्ञासा उठती है , वही मुमुक्षु बनजाता है। यह मोक्ष की कल्पना नहीं है। यह तो इसी वर्तमान में , इसी जगत में अपने स्वस्थ , स्वाभाविक आनंद दायी जीवन की खोज है।
तब आपका ,व्यथ्क्तमन अपने से बड़ेे ,विस्तृत मानव मन में अपने भीतर इस छोटी सी ‘कारा’ को तोड़ने को व्याकुल रहता है। कवि का मन कलाकार का मन, व्यक्तिमन से ‘मानव मन’ में बदल जाता है। वह दूसरे के मन को भी अपने काव्य के रसास्वादन से बदल देता है। यही साधारणीकरण कहलाता है। पर वह कुछ झलक पाकर ही संतुष्ट होकर अपने सामाजिक मन में जहॉं प्रतिष्ठा है , सम्मान है , लौट जाता है।
व्यक्तिमन, संस्कार की कुंठा से जड़ बना रहता है, ...पर मानव मन ... ऊँचाइयों को छूना चाहता है, वह सौंदर्य का पान करना चाहता है। वहां छोटापन नहीं रहता।वह सांप्रदायिक , धार्मिक दबाबों , राजन्ैतिक मतवादों से बाहर आकर अपने मन की मुक्ति देखता हे। , इसी लिए हम सृजनशील मनुष्यों को बेहतर मानते हे। , उन्हें आदर देते हे।
पर जो आध्यात्मिक है , वहॉं व्यक्ति मन अपने पैतृक निवास स्थान की ओर लौटना चाहता हे। जो उसका स्वाभाविक घर है। वह अपने अस्थायी निवास स्थान मस्ष्कि के चिपकाव से अलग होने लगता हें यही अलग होने की यात्रा , स्वयं की धारणाआंे से , मान्यताओं से मुक्ति , विचार और विकारों से अलगाव ही इस आध्ध्यात्मिक यात्रा की पहचान हेै, इसकी उपलब्धि , उस व्यक्तिमन का मानव मन में निवास हेै
स्वामीजी कहा करते थे, हमने ईश्वर शब्द को अपनी कल्पना में गढ़ लिया हेै। वह महान शक्ति जिसके कारण यह ब्रह्मांड हेै, जो निरंतर गतिशील हेै, उसकी गति से ही जीवन और जगत में परिवर्तन हो रहा है ,क्या वह हमारे व्यक्तिमन की आशाओ ं, अपेक्षाओ ंकी पूर्ति के लिए सहभागी है?सब हमारी मान्यताएॅं ही है।
विश्वास जब स्वयं के प्रति होगा , तब जिम्मेदारी खुद पर आती है। तभी बोध जगता हैं अपने सुख, दुख के लिए , हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। हमने उस परमात्मा की दी गइ्र शक्ति का दुरुपयोग ही चाहे व्यक्तिगत स्तर हो , या सामाजिक स्तर या राष्ट्रीय स्तर हो हम ही देाषी हेैं। हम नियति पर बोझा सौंपकर निरंतर प्रमाद में ही डूबे रहते हैं।
... इसीलिए जब हम परिधि पर घूमते हैं, हम मात्र व्यक्ति मन की कारा में रहते हैं। हम सांप्रदायिक होते हैं। हम जड़बद्ध संस्कार धर्मी विचारक होते हैं। हां, जब केन्द्र की ओर आना चाहते हैं, सहज ही हम ‘मानव मन’ के समीप होते हैं।
. हो सकता है अनवरत ध्वनि की आवृतियां या ... एक ही चित्र पर एकाग्रता, ... मस्तिष्क को कुछ देर के लिए सुप्त कर दे। पर वहां सजगता नहीं रहती। मूर्च्छा आ जाती है।
... वर्षों इसी स्थिति में रहा।मूर्ति पूजा की,देवी आराधना की, बहुत मंत्र जपा। जप -योग पढ़ा था। फिर एकाग्रता ,‘नाद’ पर रही, ... सुनता रहा, सुनता रहा, ... ध्वनियों का अपना आकर्षण व रस रहता है। ग्रन्थों में बहुत तारीफ पढ़ी थी, ... पर पाया, ... भीतर का जो कुछ गंदलाया जल था, ...यथावत है। वही हीन भावना वही अहंकार, ... सरलता नहीं प्राप्त हो पाई। चित, प्रसन्न नहीं रहा। प्रसन्नता ही तो उपलब्धि है, ...जो स्वतः आती है। पर खिन्नता ने यथावत रखा।
... हां, जब भीतर के गंदलाये जल का अहसास तीव्र होता गया, ... तब पाया यही तो मैं हूं, बाहर जो आरोपित था, वह अब प्रभावहीन हो गया। बाहर किसी से सवाल पूछना, और किसको उपदेश देना, लगता है, सब व्यर्थ है।
...शांत बैठते ही, ... वही जल तट पर आकर टक्कर मारने लगता। यही तो वास्तविक मैं हूं। संस्कार बद्ध जड़ता। हर चीज के प्रति हर कायम राय। स्मृति का दबाव यथावत। देखते ही नामांकित हो जाने की निरंतर चालू रहने वाली प्रक्रिया यथावत थी। यही तो वह बाह्य मन था, जो निरन्तर सक्रिय था। एक फिरकनी की तरह, कोई बात आई, फिरकनी तेजी से घूम गई, फिर उसकी गति के साथ एक नहीं पचासों बात पैदा होती र्गइंं। यही तो सिलसिला है, जो निरंतर चल रहा है।
... जाना यही चेतना है। एक स्पंदन सा होता है, तरंगें ही तरंगें है, वहां ... उपर की सतह पर सभी कुछ है, ... बस प्रवाह बाहर आने को तैयार रहता है। हल्का सा इशारा मिला, वह बाहर निकल आता है, ... यह बाहर कहां से आना चाहता है, ... कहां तक गहरा है, यह कूप, ... पता नहीं भीतर जो कुछ है, अभी स्वप्न में दिखाई पड़ता है, ... वर्षों से न देखे दृश्य वे लोग जिन्हें कभी देखा नहीं, वे नगर जहां कभी नहीं गए, ... तब पाया भीतर भी अनेक परतें हैं, ... अंतहीन है।
एक बाहर का तल है, जो दिखाई पड़ता है।
दूसरा भीतर का है जो अगम व अगोचर है, हां कभी कभी इस चेतना के अहसास का संकेत मिलता है। बाहर का तल अत्यधिक सक्रिय है। भीतर का जल, शांत पर शक्ति संपन्न है। वहां हलचल अनुभव नहीं होती। मात्र स्वप्न कभी कभी उसकी ओर संकेत कर जाते हैं।
तब जाना, मैं जो देखता हूं, मैं जो बोलता हं, क्या वह वही है, जो दिख रहा है, या कहना है, लगता है, यहां एक प्रकार का अवरोध खड़ा हो जाता है। जानता हूं, यह कृत्य गलत है, परन्तु मेरे दल के सदस्य का है। मेरे परिवार की प्रतिष्ठा का है, मैं उसे न्यायोचित ठहराता हूं, जानबूझकर झूठ बोलता हूं। सच है, हम वही देखते हैं, जो देखना चाहते हैं। वही सुनते हैं, जो सुननाा चाहते हैं। परिणामतः हमारा कथन, दर्शन, श्रवण सब छिछले स्तर का होता है। हम समग्रता में जी नहीं पाते।
व्यक्ति सामने आया नहीं कि हम उसके बारे में पहले से ही सब सोच लेते हैं। उसके कथन की भी कल्पना कर लेते हैं तथा अपना उत्तर भी तैयार कर लेते हैं।
यह हमारा बाह्य मन, इन्द्रियों के दरवाजों से सूचना तो लेता है, पर हमारा मन इस सूचना को अपने ही रंग में रंगकर सामने लाता है, तब बुद्धि का लिया गया निर्णय भी दूषित हो जाता है।
समग्रता में, सजगता में जब हम क्रियारत रहते हैं, तब पूर्णतः अपने आपको अवलोकन के लिए समर्थ पाते हैं। पर यही नहीं हुआ। जब भी देखा, मन ने उसके पहले ही अपनी जानकारी दे दी। परिणामतः जो देखा, वह अपने स्तर ही गलत देखा, यही द्वन्द्व भीतर तक बैचेनी खड़ी कर गया। दो मिनट भी नहीं मिलते जब यह मन अपनी क्रियाशीलता को स्थगित कर गया हो।
गलती यहीं ही हुयी थी।
मैं वर्षों एकाग्रता की ही साधना करता रहा। एकाग्रता पचास चीजों को छोड़कर एक पर केन्द्रित हो जाना। मूर्ति पूजा, मानसिक पूजा की, ध्यान किया, ... अपने आपको एक ही विचार, एक ही रूप पर एकाग्र करना। एकाग्रता भी महत्वपूर्ण रहीं। ... पर यह खंड-खंड एकाग्रता-समग्रता में बाधा भी पहुंचाती रही। ध्यान से हटते ही, बाहर की दुनिया में वहीं ओछापन साथ रहा, ... भाषा की दरिद्रता, रही,अहंकार और जोर से आया। अजीब विरोधाभास सा बन गया। भीतर का देवत्व एकाग्रता के समय तथा राक्षस शेष समय यथावत जगता रहा। इस द्वन्द्व को झेल पाया अत्यधिक कठिन था।
सजगता, ... हमेशा बनी रहती है। एक होना, ... रहता है, तभी गोरख को समझा था।
‘सदा सुचेत रहे दिन रात, ... सो दरवेश अलख की जाति, ...
... सदा सुचेत, ... सदा ही सचेत रहा जाए। जगते-उठते, बैठते-चलते, बेहोशी में नहीं, मन की विचारणा में नहीं, मात्र क्रिया के साथ रहा जाए’
‘जहां क्रिया नहीं हो, वहां मन शांत रहे, ... उसकी चयन करने के प्रक्रिया जो अपने आप चलती रहती है, वह रुक जावे।
... हां, जाना, यही साधन है, साध्य है। वहां क्या होगा, ... कोई कल्पना नहीं? पर हां इस समग्रता में भीतर गंदलाया जल जो निरंतर थपेड़े मारता रहता है, ... वह अब हर क्षण उद्वेलित नहीं कर पाएगा। और जाना, ... यह संभव है, ... मात्र इस मन की इस मन के द्वारा ही सतत निगरानी से, ...बिना चुनाव के मन का निरीक्षण तो करते रहो, पर जहां तक हो सके, शरीर को निरंतर क्रियाशील भी रखो। मात्र एकांत में जाकर, शांत बैठकर किताबें पढ़ते रहो, कैसेट सुनते रहो, जीवन जगत से दूर रहो ,यह तो मात्र पलायन है।
... निरंतर कर्मरत रहना है, सन्यास का अर्थ है, जो मन का अनावश्यक विचारणा में भटकाव है, उसका त्याग, तथा जो निरंतर कल्पना का जो वेग भगाता रहता है, ... उसके प्रति वैराग्य, तभी यह सन्यास सधता है। यहां वेशभूषा का परिवर्तन नहीं है। मात्र जो कल, अतीत में गया, स्मृति में गया उसका अप्रासंगिक होते जाना, साथ ही जो कल आया ही नहीं .... संभावना मात्र है, उसमें मनोराज्य में में विचरणा करना व्यर्थ है। तब जो आज है, मात्र वर्तमान है, उसमें रहा जाता है।
... हां, यहां जो भीतर के द्वन्द्व है, वे छूटने लगते हैं।
14 भय की पहचान
सच है, रामायण के धोबी प्रसंग ने जहॉं मर्यादा पुरुषेत्तम राम को भी भयभीत कर दिया था। वे जिस रावण से नहीं हारे , वे धोबी के वचन से हार गए। अपनी पत्नी को छोड़ आए।
हम जानते हैं, सड़क पर चलने वाला शोहदा गलत हरकत कर रहा ह
हम, हम चुप रह जाते हैं, जाने दो , इसे , इसका क्या बिगड़ेगा, हम चुप रह जाते हैं, हमारा हृदय सिकुड़ जाता है।
हम जानते हैं, सड़क पर चलता हुआ शोहदा.... गंदी हरकतें कर जाता है,... पर हृदय संकुचित सा हो जाता है,... ‘जाने दो इनका क्या बिगड़ेगा।
हम चुप रह जाते हैं।
मैंने बहुत सोचा, अपने भीतर उतरना चाहा,... एक-एक परत की पहचान तलाश की। पाया, भीतर केन्द्र में, मैं ही हूं। बचपन से आज तक के सारे प्रयास, अपने आपको ही केन्द्र में रखकर किए।
... इन प्रयासों से तुष्टि मिलती है। तृप्ति मिलती है। पिताजी की सेवा की, गुरु की सेवा की, बच्चों के प्रति कर्तव्य का पालन किया, पत्नी का पूरा ध्यान रखा, प्रेम किया, क्यों? यह मुझे अपने लिए प्रिय था। इससे मुझे एक प्रसन्नता मिली।
समाज में कार्य किया,... अपना विशिष्ट स्थान बनाने का प्रयास किया।
हमेशा अपने आपकोे विशिष्ट माना जाए इसलिए कोशिश की। प्रशासनिक सेवा में भी यही ध्यान रहा। कहीं मैं मामूली न रह जाऊँ,... अदना होने का भय बना रहा,... जानता था, जब तक पद है, तभी तक लोग बुलाते हैं,... समाज का ढांचा यही है। जब पद पर रहा,... हर जगह बुलाया जाता रहा। समाज व्यक्तियों को नहीं देखता, उसके पद तथा प्रतिष्ठा को देखता है। फिर भीड़ में अपना्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र चेहरा मूल्यवान बना रहे, यही प्रयास रहा। छवि को चमकाने में ही उमर निकल गई।
... पर भीतर ही भीतर असुरक्षा बनी रही। सेवानिवृत्ति के समय पत्नी का प्रयास रहा,... यह सेवाकाल बढ़ जावे,... ताकि सुरक्षा, सुविधा जो पद के साथ प्राप्त है, वह निरंतरता में रहे। सेवानिवृत्ति के बाद ही, आयु सीमा साठ वर्ष हो गई। लोगों ने कहा, आप के साथ अन्याय हो गया,...
मैं सोचता, न्याय-अन्याय क्या? सारी उम्र विशिष्ट होने का अभियान जगता रहा, जलाता रहा। भीतर से अपना ओछापन, छोटापन दिखता,... दब्बूपन दीखता, पर बाहर सम्मान की भूख, जगती रही। जानता भीतर से जो जितना छोटा होता है, वह बाहर उतना ही महान होना चाहता है। विशिष्टता समाज में सम्मान दिलाती है। एक कुर्सी या पद की चाह सारी उमर भटकाती है।
भय अपने आप में कारावास है। यह जकड़ लेता है,... भीतर और बाहर का द्वैत हमें हरा देता हैै। ब्लैक मेलर का सबसे बड़ा हथियार यही होता है। वह बाहर जो सम्मान है, प्रतिष्ठा है, उसे तहस नहस कर देगा,... यह धमकी देकर शोषण करता है। हम प्रतिकार नहीं कर पाते। शोषित होते जाते हैं। स्त्री के शोषण का सबसे बड़ा कारण उसका भय ही है।
... भय अतीत से जुड़ा है,... भय की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है,... आप जितना भय से भागते हैं, भय उतनी ही तीव्रता से सामने आता जाता है। भय अंधेरा है।
वह अतीत और भविष्य में रहता है।
उसका कारण मिला- हम जैसे है, उसका सामना करना नहीं चाहते। नहीं होगा कुछ, चलो समाज में प्रतिष्ठा भी गिर जाएगी,... उसको रहने दो,.
“
... सामना करने की चाहत ही अभय होती है। भागो मत , ठहरो, सामना करो।
पलायन ही भय है।
पलायन के अनेक रूप है। ‘धर्म’ भी पलायनवादियों की शरण स्थली बन गया है। गीता में ‘धमर्, अभय का संदेश है। अर्जुन की क्लीवता का हरण है। उसे जीवन संग्राम में लाने वाली शक्ति है।
... न तो भय पर विजय प्राप्त की जा सकती है, न ही भय से पलायन उचित है। ... भय पर विजय पाने में द्वन्द्व उपस्थित हो जाता है। ‘मन’ दोनों सिरों पर खड़ा होकर, स्वयं भय बनाता है, तथा दूसरे छोर से. भय को देखता है। फिर किस पर कौन विजय प्राप्त कर सकता है?
भय को उसकी बनावट व बुनावट में समझना होगा। जाना, मैं शांत हूं, अपना कार्य कर रहा हूं,,‘‘परन्तु उसने धमकी दी, शिकायत करूंगा, बदनामी करूंगा, उसका क्या वं तो कई बार जेल हो आया हैं, हूं, आप क्या बिगाड़ लोगे,’’... आदि आदि।
वह यह भी जानता था, कि मित्र ंने कुछ भी गलत नहीं किया।
पर उनके भीतर भय जकड़ता चला गया,... सम्मान छिन जाने का भय, लोग कहेंगे, कुछ तो हुआ ही होगा, बिना बात के बतंगड़ नहीं होता,... यह भय ही जाना सारी समस्याओं की जड़ है।
मन अनायास द्वन्द में चला जाता है।
स्मृति का द्वार खुल जाता है। वहां अतीत के सारे दबाव है,... अपनी समस्त जटिल प्रक्रियाओं के साथ नए-नए खांचे व सांचे सौंपता जाता है। यह नहीं तो वो,... वो यह करेगा, तो यह,... यह बोलेगा तो यह,... उहापोह में पूरा मन डूब जाता है।
भाव जगत जो है, वह संक्रमित हो जाता है। ‘वायरस की तरह भय आता है। पूरी ‘हार्ड डिस्क’’ ... खराब हो जाती है।
... जितना भय आता है, बाहर उतना ही पाखंड बढ़ता जाता है। हम पलायन के अनेक रास्ते निकाल लेते हैं। सामना नहीं कर पाते।
यह भय अनेक कारणों से उत्पन्न होता है, फिर हमारे अंतःकरण पर कब्जा कर लेता है। शारीरिक भय रहेगा, यह शाश्वत है। सॉंप से ,रोग से, शत्रु से, दुर्घटना से भय रहना स्वाभाविक हे। पर मानसिक भय का होना तथा उससे हमारे जीवन को लील जाना अस्वाभाविक है।
कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर में नाईयों की संख्या महमूद की सेना से अधिक थी, अगर वे उसकी सेना पर टूट पड़ते थे, तो सोमनाथ का मंदिर नहीं टूटता,... पर हजारों सिर कटाते चले गए। या इस्लाम कबूल करते गए। भय ही हमारी सांस्कृतिक पहचान है।
जब तैमूर आया था,... दो लाख उसके कैदी थे, जिन्हें उसने दिल्ली में कत्ल किया था, पर अगर वे सब लड़ने को तैयार हो जाते थे, तब इतिहास कुछ और ही होता।
... राजस्थान के छोटे से हिस्से से आए अंग्रेज जो बुनियादी रूप से व्यापारी थे, पूरे हिन्दुस्तान पर दो सो साल राज करते रहे। क्यों?
‘क्यों? भयभीत समाज चूहों और भेड़ों का होता है। हम चाहे धर्म की कारा हो, जटिल सामाजिक विधान भी कारा हो, जातिगत कारा हो, कारावास में रहना ही श्रेयस्कर मानते हैं।
यह कोरा प्रलाप नहीं है।
यह निश्चितता से अनिश्चितता में, अंधकार में धकेलने की चाहत है। अंधेरा हमेशा भय देता है।
वर्तमान में प्रकाश है, वहां उजास है। वहां भय नहीं है। पर जो कल आएगा,... पता नहीं क्या हो? यह अनिश्चितता की सूचना ही भयभीत कर जाती है। अतीत में क्या क्या कब किसके साथ घटा,... क्या क्या हुआ, सब दृश्य पटल पर आ जाता है।
अतीत की पुनरावृत्ति न हो जाए, वे समस्त दुख के सरोवर फिर नहीं भर पाएं भयभीत हो गया। जो दूसरों के साथ घटा वह फिर न घट जाए। भविष्य ही भय देता है।
स्मृति में अतीत का भंडार है। यह अतीत के संबंधों के आधार पर ही भय को पैदा करती है। सारी उमर प्रयास एकाग्रता का रहा। एकाग्रता में जो भी चीज पकड़ने में आती है, वह बहुत देर तक ठहरती है।
यह एक फिरकनी की तरह है, इसके घूमते ही नाना विचार अपने आप पैदा हो जाते हैं। विचार ऊर्जा है, ये फिरकनी को और तेज घुमाते हैं। बस भय अपने इस पूरे परिवार के साथ मूर्त हो जाता है।
स्मृति, अवधारणा, अनावश्यक विचारणा, तीनों भय की निर्मित के साधन हैं। जितना अधिक एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है, उतना अधिक भय भी रहता है। विचार ही विकार है। पूरी दुनिया में हमने ही भय से मुक्ति के लिए देवताओं की कल्पना की है। जितने अधिक हनुमान मंदिर होंगे उतने ही अधिक हम भयभीतरहेंगे। कभी सोचा है?
मैं तो स्वस्थ हूं, पर भय ने अचानक आकर जड़ता दे दी। ... विचारणा बरसाती नदी की तरह होती है। तेज प्रवाह, बहाकर ले गई। यह स्मृति से ही जन्मती है। वहीं उसका कैलाश पर्वत है। अतः विचारणा हमेशा पुरानी होती है।
यह विचारणा ही भय उत्पन्न कर रही थी।
वह आया तब भय नहीं था। वे बात करते रहे।
पर उसके जाते ही, विचार का आगमन हो गया। यह वह कर देता तो, फिर विचारों का सिलसिला शुरू हो गया। जितने विचार आते रहे उतना भय बढ़ता रहा।
जाना, जो भयभीत होता है, वह भय ही सौंपता है।
इतने मंदिर, इतने भगवान, गली गली में हनुमान, पर भूत पिचास भागते ही नहीं हैं आम भारतीय वह भी हिन्दू सबसे अधिक भयभीत होता है। क्योंकि उसके पास देवी-देवता, उनकी पूजा के विचार हजारों हैं। वह बिना भय के चार कदम भी वह चल नहीं सकता है।
यह भी सच है कि बिना विचारणा के कार्य नहीं हो सकता है। ‘विचार’ एक शक्ति हैं पत्रावली पर लिखना है, बिना विचार किए लिखा नहीं जा सकता है। पर जब हमेशा मन भूत और भविष्य में भटकता रहे, अनावश्यक विचारणा का दबाव बना रहे,
तब जाना
स्मृतियों से असहयोग रखना ही त्याग है।
तथा भविष्य के अनावश्यक कल्पनाओं से मुक्त होना ही वैराग्य है।
... इसीलिए जब मन, भूत और भविष्य में ही भटकता रहता है, तब विचारणा का दबाव बना रहता है, इससे सृजनात्मकता का अभाव होने लगता है।.. इसीलिए,... पाया,... भय भी एक ही है। उसकी आकृतियां, उसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं। पर अब विचार का दबाव न हो, उस शांत अवस्था में ही भय का दर्शन हो सकता है।
मन एक साथ दो काम कर सकता है।
वह देख सकता है, वह सुन भी सकता है
पर यहां मात्र वह देख रहा है, पर विचार का आवागमन नहीं हो रहा है। उसको टिकने का आधार नहीं मिल पा रहा है।
... यहां अतीत का कोई दबाव नहीं है, तथा भविष्य की छलांग भी नहीं है। इस निरीक्षण के समय मन शांत है, कोई कोलाहल नहीं है।
तब क्या होता है
जो देख रहा है, और जो दिख रहा है
दोनों ही एक धागे के दो सिरे हो जाते हैं
जब देखने वाला स्मृतियों का आधार होता है,... वहां मात्र जड़ता रहती है, वह अपने विचार ही देखता है पर जब अवलोकन कर्ता,... अत्यधिक संवेदनशील होता है। स्मृतियों के दबाव से मुक्त, न तो वह चयनकर्ता रहा है, न ही वह नामांकित कर रहा है। न ही वह अपने आपको न्यायोचित ठहरा रहा है।
तब वह एक मरी हुई सत्ता के स्थानपर, एक चैतन्य, सजग स्थिति में पाता है।
... तब भय का समूल दर्शन होता है।
पाते है कि भय कहीं और नहीं, आप ही भय है।
जाना , भय बाहर और कहीं नहीं, मैं ही तो भय हूं।
मैं ही भय की सृष्टि करता हूं,... मैं ही अपने इस कृत्य से भयभीत हो जाता हूं। वह तो क्षण था आया, चला भी गया। पर मैं ही अपनी शक्ति से उसे बार-बार पैदा कर रहा हॅंू।
पर मैं, मेरा मन बार-बार उसका चिंतन करके, स्मृति से खाद बीज लाकर, उसकी आकृति को खड़ा कर देता है। मेरा मन ही उसे भाषा सौंपता है, मेरा मन ही दूसरे छोर से उसे उत्तर देता है.. और भयभीत हो जाता है।
भय का सृष्टा मैं ही हूं,... मैं ही तो भय हूं।
मुक्ति किसी अन्य से नहीं, अपने आप से होनी है जब जाना विचार ही विकार है, तब अचानक भय के विचार बनते ही उसके पीले पत्ते की तरह वृक्ष से झरित हो जाने का विष्वास जग गया।
यह स्वयं में लौटते हुए अपने ही विश्वास की प्राप्ति थी।
‘क्या भय अप्रसांगिक हो सकता है,...अब यह प्रश्न अब यहां उत्तर की तलाश मे था।
15 आलोचना का सुख
बचपन में एक बात सीखी थी,... जो भी हमारे साथ नहीं है, उसकी बुराई करने में बहुत सुख मिलता है। जीभ अपने आप फिसलती जाती है।
...पांच महिलाएं बैठी हैं, बहुत देर से बैठी हैं,... किसी एक को जरूरी काम से जाना है,... पर वह रूकी रहती हैं,... प्राकृतिक आवश्यकता है,... जरूरी है, वह ज्योंही जाएगी शेष उसकी बुराई में लग जावेंगी।
हां, हम दूसरों की बुराई में ही जीवन जीते हैं। सुबह से शाम तक की अपनी दिनचर्या का आकलन करें, हमारा अधिकांश समय दूसरों की बुराई,... उनका चिंतन,... उनके प्रति नाराजगी,... और अंत में घृणा तक में बीत जाता है।
कैंसर का मुख्य कारण यह घृणा ही है तथा जोड़ों का दर्द हमारे भीतर निरंतर बने हुए क्रोध से होता है। आधुनिक चिकित्सा अधिकांश बीमारियों का कारण बिगड़ती जीवन शैली को मानते हैं।
हमें दूसरों के प्रति, जाति के प्रति, रिश्तों के प्रति,... उन्हें नापसंद करने में एक अजीब सा सुख मिलता है।
हम अपने परिचित के घर गए थे। पारिवारिक मुखिया एक ही बात कहा करते थे- उन्हें इन इन लोगों से घृणा है,... वे जब भी मिलते,... इन्हीं लोगों की चर्चा में डूब जाते,... उनका दुखद अंत गंभर बीमारी से हुआ। पाया उनके बच्चों में भी यह भाव संक्रमित हो गया है। वे भी अपने परिजनों के प्रति नाराजगी के भाव को घृणा के स्तर तक ले जा चुके हैं। साथ वाले ने पूछा- ये नाराज क्यों है? हमतो वर्षों बाद इनके घर आए हैं?‘यह इनका स्वभाव है।
‘पर क्यों?
‘इन्हें इसमें रस मिलता है। जैसे कुत्ता सूखी हुई हड्डी को चबाता है, उसके जबड़े से खून निकलता है, वह अपना ही खून पीता है, रस उसका ही उसे ‘रस’ देता है। हम जब घृणा में होते हैं, अपने ही रस को पीकर सुखी होते हैं।घृणा जिसके प्रति होती है, वह तो बहुत दूर होता है, उससे उसका अहित भी नहीं होता, कई बार तो उसे इसका पता भी नहीं होता, पर हम अपने प्रिय धरोहर मानकर इसे अंतस से चिपकाए रहते हैं।
गीता में संकेत सूत्र आया है-
‘वीत राग भय क्रोध’राग ही सुख-दुख का कारण है। भय और क्रोध भी वहीं रहते हैं। जो जितना भयभीत होता है, वह उतना ही क्रोधित भी होता है।
मैंने अपने आपको देखा,... बहुत भीतर उतरकर पाया,... अंतस में अंधकूप में ज्वालामुखी फटने को तैयार ही रहता है,... मानो कपास जलने को तैयार है,... एक चिंनगारी उठेगी, सब स्वाहा हो जाएगा,... हमेशा तनाव सा बना रहता है।
जब हम तनाव में होते हैं तो क्या होता है? हम वही सब कुछ तलाश करते रहते हैं, जो हमें हमारे इस तनाव को बढ़ाने में सहायक हो। सच है हम तनाव खुद दूर करना नहीं चाहते,... मात्र गोलियों और दवाइयों से इसे दूर करना चाहते हैं। वहां भय है, जल्दी नहीं मर जाएं,... पर दिन-रात तनाव बढ़ाने के तरीके ढूंढते रहते हैं।
पहले मैं मान बैठा था,... यह जो मेरा पैतृक गुण है, वंशानुगत है,... मैं इन सबके साथ सामंजस्य बना बैठा था। जैसे सब बैठे हैं, भइया आप भी जमे रहो। क्यांेकि यह सब शाब्दिक चर्चा है, हिंसा कभी जा नहीं सकती ,सदा रहेगी।
पर,... मैं ही क्यों चौबीस घंटे,... प्रेशर कूकर में रखे आलू की तरह उबलता रहूं,... मुझे भी तो अपने परिवार के साथ, अपने समाज के साथ, शांति के साथ, प्रेम के साथ जीने का हक है। दुनिया इतनी खराब नहीं है कि मैं असमय मृत्यु की कामना करूं, शरीर को नाश की तरफ ले जाऊं।
... उस दिन सुना,... मेरा चेहरा तना रहता है, आंखे भी चढ़ी रहती है,... यह तो मुझे पता ही नहीं था। मैंने कहां, मैं कहां नाराज हूं,... मुझे तो पता ही नहीं है?
‘आइने में देखो,... लगता है, चेहरा चढ़ा हुआ है?
देखा, हम अपने चेहरे की मुद्रा भी भूल गए हैं। निरंतर सोचते रहने से, वह भी अमंगल और अशुभ चाहे दूसरे के प्रति हो या अपन प्रतिे, सोच तो हमारा मन रहा है, रंगमंच तो हमारा अंतस ही है।
हमारा चेहरा तो मात्र,... कुछ और हो रहा है, इसकी सूचना देता है। चेहरा तभी कुरूप और बदसूरत होता जाता है। हम जान ही नहीं पाते हैं। हमारे चेहरे पर क्रोध व घृणा ही नृत्य करती रहती है। हम साधारण जीवन जीना ही भूल चुके हैं।
... जब हम दूसरे के प्रति भाषा में तेजी लाते हैं। भाषा के साथ ही हमारे चेहरे की मुद्रा बदल जाती है। हम कोमल और प्रेरित भाषा ही भूल गए हैं। प्यार की अभिव्यक्ति मात्र (प् सवअम लवन) आई लव यू रह गई है। दूसरा कहता है। (टू) तुमसे ज्यादा, इसके अतिरिक्त संवेदना जड़ हो चुकी है। स्पर्श की भाषा तो सचमुच खो बैठे हैं। पशु पक्षियों के पास यह अभी जीवित है। वे मात्र स्पर्श से अपनी भावनाओं को कहने में समर्थ हैं।
तो हम जब दूसरे के प्रति कठोरता रखते हैं, तो भाषा अपने आप बदल जाती है। भाषा के साथ भंगिमा बदल जाती है। हम तो चुप रहते हैं मौनी बाबा हैं। पर सोचते रहते हैं। कटुता चेहरे पर आ जाती है। युवक-युवतियां प्रोढ़ हो चुके हैं।
... हम जब भय और प्रलोभन से किसी के आगे झुकते हैं। अपने विवेक का अनादर करके प्रतिकूल कार्य करते हैं, वह भी हिंसा है, घृणा का जनक है। क्योंकि हम दोहरी जिंदगी जीते हैं। न करना चाहते हुए भी करते हैं, वहां न आदर है, न प्रेम... मात्र आदेश की पालना है, परिणामतः हमारे परिवारों का वातावरण हिंसात्मक व घृणा पर रहता है। यह प्रभाव जन्मजात है, या वातावरण से हमें मिलता है, इस पर चर्चा करना व्यर्थ है। मुख्य बात है, हमारा स्वभाव ही निरंतर सोचने का हो गया है। और हम मात्र दूसरे के साथ-साथ अपना भी अमंगल सोचते रहते हैं। हत्या और आत्महत्या दोनों ही बराबर है।
फिर सवाल उठता है,... अनावश्यक आदर्शों की अनुपालना के बिना हम दूसरे के दबाव से बाहर कैसे आएं, कुछ लोग अहिंसा और नैतिकता की चर्चा कर रहे हैं। वे अहिंसा को चादर की तरह ओढ़ना चाहते हैं। वहां चरित्र ही दूषित होता जाता है। भाषा में आप कुछ और हैं, आचरण कुछ और है। समाज में आप आर्थिक शोषण करते हैं, गरीब को भारी ब्याज पर कर्जा दे रहे हैं।
उसके उत्पादन को कम मूल्य पर खरीदकर, महंगी बेच रहे हैं। कम तोल रहे है, मिलावट कर रहे हैं। उत्तर-पूर्वी भारत के इलाकों में, यहां आदिवासी संभाग में जितना शोषण होता है, उसकी कोई सीमा नहीं है। भारत में फैलते नक्सलवाद का मुख्य कारण, गरीब का शोषण है, और वह भी उनके द्वारा जो निरंतर शांति, अहिंसा, प्रेम की अधिक चर्चा कर रहे हैं।
क्या, इस दोहरे आचरण से बचा जा सकता है।
हम समाज को नहीं बदल सकते, परन्तु अपने आपको तो बेहतर बना सकते हैं। क्या मैं अपने आपको सही, सही देख पाने में समर्थ हूं? यही सवाल था। किसी आदर्श को ओढ़ने से भीतर का गंदलाया जल निर्मल नहीं हो सकता है।
... यहां मात्र अपने क्रोध को ही स्पष्ट देखना मेरे सामने था। मैं आदर्श को उसके गलत प्रभाव को समझ गया था। पाया, परिवार के प्रति भी व्यवहार गलत ही रहा। गाड़ी पटरी पर नहीं चली। मेरी मान्यता ही प्रमुख रही उसके आधार पर परिजनों को न पाकर तनावग्रस्त हो गया। क्रोध अतीत से उपजा, भविष्य में प्रक्षेपित होता रहा। वर्तमान में तो कोई आधार ही नहीं था।
... मैंने पाया,... भीतर गंदलाया जल है,... घृणा का सरोवर है,... है,... और वह निरंतर अशांत व उद्वेलित है,... क्या होना चाहिए, यह सवाल अब महत्वपूर्ण नहीं था,... अपनी पहचान स्पष्ट थी,... न तो मुझे अपने आपको किसी आदर्श से समझना था,... न ही अपने आपको न्यायोचित ठहराना था,... जो था, वह स्पष्ट था।
मेरा चेहरा ही, अपने वास्तविक चेहरे को भूल गया था,... निरंतर सोचते रहने से, तनाव में रहने से,... चेहरा कठोर व टेढ़ा हो गया था। मुक्ति बोध की कविता है ‘चांद का मुंह टेढ़ा है, टेढ़ा क्यो? पानी में रखी गई, डंडी टेढ़ी क्यों दिखाई देती है? यह सवाल सदियों से पूछा जाता रहा है। ऋषि अष्टावक्र,... टेढ़े थे,... हम अपने भीतर की सरलता को खो आए हैं,...क्या हम अपने इस टेढ़ेपन के साथ बेहतर दुनिया का सपना भी देख सकते हैं?
16मौलिक परिवर्तन
मेरी सारी कोशिशों के बाद भी, मैं अपने भीतर कोई परिवर्तन नहीं पा सका,... इसका मैंने कारण तलाश करना चाहा,... पहला, तो मैं हमेशा दूसरों के बारे में ही सोचता रहा, बाहर भी दूसरे रहे, भीतर भी वही रहे,... संपूर्ण विचारणा के केन्द्र में पाया, मैं नहीं था, सदा दूसरे रहे। जिनसें कोई लेना-देना नहीं,... कोई परिचय भी नहीं,... उनके विचार आते रहे,... कल्पना जो है,... चाहे दिवास्वप्न हो, या रात्रि स्वप्न,... सदा दूसरे ही केन्द्र में रहे।
अपने साथ रहने का मौका ही नहीं मिलता।
यह देह भी घर है,... पर हम कितना इस देह में रह पाते हैं, हमेशा मन बाहर ही बाहर घूमता रहता है।
शास्त्र कहता है, ”आत्मनि एव आत्मन तुष्टः,“ जो आत्मा में रहता हुआ आत्मा में संतुष्ट हो।
पर होता क्या है,... न तो हम देह हमें ही स्थिर रह पाते हैं, जो यह देह है,... चाहे लाखों का मकान हो, या करोड़ का,...उसी में भी नहीं रहती है,...
... इधर उधर मारे-मारे फिरते हैं,... रात को शरीर सोने आता है, बस,...वहॉं भी हम दूसरो के सपने देखते हैं, कई बार दूसरों के मकान में भी चले जाते हैं, अपना मकान भूलकर गरीब के झोंपड़ें में सारी रात सपनो में निकाल देते हैं। यही विरोधाभास पाया है।
... हम सोचते हैं,... अभी बचपन है,... अभी युवावस्था है,... कल प्रोढ़ होंगे, फिर वृद्ध होंगे,... यह काम तब करेंगे, व्यवस्थित जीवन तब हो पाएगा,... पर अव्यवस्था ही साथ रहती है। वही साथ लेकर ही एक दिन चली जाती हे।
‘”डासन ही गदी बीत निसा सब, कबहुंक नाथ नींद भर सोया’े.... फिर यही पछतावा अंत तक बना रहता है। घर व्यवस्थित नहीं हो पाता है। ... यह जो शांति है,... शांति, जहां अशांति न हो,... साम्यावस्था हो,... विचारणा का दबाव नहीं हो, विचारणा का दबाव ही तनाव है,..उससे,. मस्तिष्क कुंद तथा मंद हो जाता है। वह वर्तमान की चुनौति का सामना नहीं कर पाता है। बुढ़ापा और कुछ नहीं, सृजनात्मकता का ह्रास तथा विचारों का अहर्निश दबाब ही है।
...सच यही है, यह शांति समय के आधीन नहीं है।
हम कल आश्रम जावेंगे,... सत्संग में होंगे,... शांति मिलेगी। जो यहां नहीं मिली है, वह वहां कैसे मिल जाएगी? इसका समय से कोई संबंध नहीं है। जो वृद्ध है, वे ज्यादा अशांत है, ज्यादा अव्यवस्थित है। उनका चेहरा देखो,... पशुता पूरी तरह झांकती है। उनकी आंखों में सरलता, निर्दोषता नहीं है,... एक चालाकपन हिंसक वृत्ति उभरती है। चर्चा वहां शांति की परमात्मा होती है,... पर चेहरा भीतर की विद्रूपता को प्रकट कर जाता है।चंपक पत्रिका के पशुपात्रों की तरह जानवर अधिक इन्सानी कपड़ों में दिखाई पड़ते हैं।
शांति तो वर्तमान में ही उपलब्ध होती है। यहीं संभव है।
तत्क्षण!
शास्त्र कहता है-” क्षिप्रं भवति धर्मात्मा,..“,. तब वर्षों तक इस पर मनन होता रहा,...पर अर्थ नहीं मिला।
.... क्या क्षण में संभव है?
माना हां, समय का सातत्य तो मात्र भ्रम है। धोखा है। परिवर्तन तो तत्काल संभव है। जब यह अनुभव गहरा हो जाता है,... ‘विचार ही विकार है,... विचार की निस्सारता का बोध वर्तमान में होता है और वहीं धार्मिकता है।
... तब भीतर की भाग दौड़ कम हो जाती है। जब हम भीतर ठहर जाते है,... तब अचानक बाहर का आकर्षण कम हो जाता है। सवाल अपने आप कम हो जाते हैं, प्रश्न उठते ही भीतर से उत्तर अपने आप आता है। क्यों वहां व्यवस्था होने लगी है। असंगतता अब नहीं रही है।
शांति की खोज,... कहीं बाहर संभव नहीं है।
मैं जहॉं हूं,... वहीं मैं अपनी शांति पा सकता हूं, शांत रह सकता हूं,... यह बोध मेरा है।
बाहर जो है, वह वैसा ही रहेगा,... उसके परिवर्तन की कामना नहीं रही है। न मैं बदल सकता हूं, जो बदलने की बात करते हैं, वे शायद अपने आपको ही भ्रमित कर रहे हैं।
.... हां, अपने भीतर जब हम ठहर जाते हैं। तब दर्पण में साफ-साफ देख पाते हैं।
‘पर मैं हूं,... क्यों अब तक भटक रहा था,... न तो मैंने चाहा था,... न मैं चाह हीरहा था, फिर भी भटकता रहा, क्यों भागता रहा, मात्र अनुकरण में था,... दूसरों की ऑंख में अपने आपको महत्वपूर्ण मानने का आग्रह था।
... जब रुक गया,... तब आइने में अपने आपको देखने में सफल हो सका।
... जब ठहरा जाता है,... बाहर का कोई दबाव न तो बाहर , न भीतर रहता है ... तब अचानक वह क्षण कौंधता है, जब आज और कल का अन्तर अनुभव में आता है।
जो आज है, जो अभी है, वह वर्तमान में ,... जो सातत्य है, ... जहां क्रिया और देखना में भेद नहीं रहा है,... कल करेंगे, कल बाजार जाएंगे,... कल तुम्हारे साथ ऐसा घटेगा,... वहां समय चुपचाप चला आता है, पर जहां देखा और किया, सोचा और किया...
यह अंतराल नहीं होता, वहां समय नहीं होता। वहां मात्र क्रिया होती है, तथा क्रिया निर्दोषता में सही- सही तभी होती है जब विचारणा का दबाव नहीं रहता। विचार, ही समय को पकड़ता है।
वहां क्रिया अनुपथित हो जाती है। कल करेंगे,... विचारणा, समय को ले आती है। जहां तक घड़ी के समय का प्रश्न हे, वह निरंतर चल रही है। पर एक समय हमारे भीतर भी घटता हैं
वह हमारे विचार और विचार के बीच का अंतराल होता है।
सोचने और करने के बीच की दूरी होती है,... यह समय हमारे मन का होता है। मन अपने आपको खंड- खंड में बांटकर रखता है।
पर जब हम इस अंतराल को पाटने में समर्थ हो पाते हैं, तब हम पाते हैं,... वहां मात्र क्रिया है
या यूं कहें
‘जो भी क्रिया उपस्थित है, वहां मन को अधिक से अधिक वहीं रखने का प्रयास किया जाए, तो मन स्वाभाविक रूप से वर्तमान में रहने लग जाता है।
क्यों, क्या कारण रहा है, हम इस मानसिक समय की उपेक्षा नहीं कर कर पाते हैं? सारी उमर हम इसी के दबाब में बॅंधे रहते हैं।
... हमारी विचारणा के पीछे, हमारी चयन करने की प्रक्रिया होती है, जिससे हम ‘धारणाएं बनाते जाते हैं। अनावश्यक विचारणा जिस तरक अभिशाप है, उसी तरह यह धारणा भी दुष्कर्म हैं।
... धारणाएं पहले बनती हैं,... फिर विचारणा का प्रवाह रहता है, फिर क्रिया हो पाती है।
दर्पण तो शुद्ध था,... साफ था,... निर्मल था, वस्तुगत था।
पर धारणा ने उसे विषयीगत कर दिया,... जिससे जो समय का अंतराल आया उससे वह प्रदूषित हो गया,... क्रिया न होकर वहां मात्र प्रतिक्रिया ही शेष रह गई।
... हमारे आपसी व्यवहार में जो कटुता आ गई है,... जो विसंगति आ गई है उसके पीछे इसी अवधारणा का या पूर्वाग्रहों का हाथ है।
मेरे साथ यही दिक्कत थी।
मैं जीवन को पूरी समग्रता से जीना चाह रहा था। जहां बीता हुआ कल मेरी आज की स्थिति पर अतिक्रमण न करे, आने वाला कल हस्तक्षेप न करे। मैं आज पूरी तन्मयता के साथ, पूरी समग्रता के साथ, इस आनंदोत्सव को जीलूं।
अमृत मेरी हथेली पर है, मेरी प्यास भी है, पर मन कल के छोड़े हुए विष कलष की याद बार-बार दिला जाता है। कल,... यह बूंद तो गिर जाएगी तब,... अंजुली भरी अमृत की घूंट मेरी होटों पर आते-आते रूक जाती है।
मैं पूरे प्राणों की शक्ति के साथ उसका पान नहीं कर पाता हूं।
क्यों? मेरी अपनी विवशता है।
... कल दुख था,... वह समय के साथ, आज की इस दीवार पर धक्का दे रहा है, लौट-लौटकर स्मृति का ज्वार आता है, और कल,... यह भी नहीं, रहा तो भय के काले बादल बरसने को तैयार दिखते हैं।
... मात्र वर्तमान ही वह क्षण है, जहां समय का यह दबाव नहीं है। मन न, भूत में जा रहा है,... न भविष्य में जा रहा है।
मात्र, वहां मौन है,... या निष्क्रिय सजगता है,... या कुछ और शब्द उसे प्रकट नहीं कर पाते हैं,... पर हां वहां वास्तव में समय अवरूद्ध हो जाता है। ठहर जाता है। घड़ियां समय बताती रहेंगी,... परंतु जहां मैं हूं,... वहां समय की बाध्यता नहीं है।
जो कल का था,... वह है,... पर अब धक्का नहीं दे पा रहा है,... जो कल आएगा,... आए पर उसकी आतुतरता नहीं है,... जो आज है वहां मात्र अनुभव है,... वह है,...
वह अमृत भी मेरा है, विष भी मेरा है, बस मैं हूं।
... क्या में आत्मा हूं? यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण नहीं रहा है। क्योंकि जहां तक जानने का प्रश्न है,... वहां तक विचारणा है। जहां तक विचार जा सकता है,... वह अतीत है,... वह जगत की ही वस्तु है,... जो उससे परे है,... है भी अथवा नहीं,... यह विचारणा ही भ्रामक है। विचार और इस संसार में जो निरंतर परिवर्तनशील है,... स्वामित्व की खोज अपने आप में भ्रम है। बुद्ध इसीलिए चुप रह गए। उन्होंने अव्याकृत प्रश्न कहा था। उनको नास्तिक माना गया। पर वे परम आस्तिक थे। परम आस्तिक प्रश्न नहीं कर सकता,... जानता है विचार जिसका समाधान नहीं कर सकता,... उस प्रश्न का उत्तर भी व्यर्थ है।
जो बुद्धि से परे हैं,... जो प्रश्न विचार से जगा है,... वह मात्र विचार की तृप्ति का है। और विचार निरंतर परिवर्तित हो रहा हैं। यह जानना ही वास्तविक बोध है,... सीमा का ज्ञान है।
‘क्योंकि मैं नहीं जानता हूं,... यही बोध शेष रह जाता है।
... मीरा कहा करती थीं- चालो वाही देस, यह देस अज्ञात है। वहां जाने की इच्छा नहीं होती है, इसीलिए हम जो ज्ञात है। जो हमारी धारणाएं हैं,हमारे विश्वास हैं उनसे चिपकना ही बेहतर मानते हैं। कर्मकांड का हमेशा ही बहुमूल्य रहने का यह कारण है। हम जो हमें प्राप्त है ज्ञात है, उसे उसी रूप में ठहराए रखना चाहते हैं।
मेरे सामने यही सवाल शेष था।
मैं प्रतिदिन आनंद के साथ उल्लास के साथ कैसे जीऊं,... क्या संभव है?
मैं कल की कटुता को पूरा भूल जाऊं,... न आने वाला कल मुझे भयभीत कर पाए।
आज जो मिला है, घर, पत्नी, बच्चे, भोजन, पड़ौसी,... यह हवा, ये वृक्ष इनके साथ समग्रता के साथ जी पाऊं।
जाना,... इनसे परे जाने का एक ही उपाय, बस एक ही।
या तो प्रकृति मुझे उठाकर ले जाएगी,... जिसे मृत्यु कहा जाता है। समाचार पत्रों मैं रोज चित्र छपते हैं,... उनका निर्वाण हो गया।’
बुद्ध ने कहा था, निर्वाण, चित्त की वृत्तियों का शांत हो जाना, दीपक का बुझ जाना’
यहां मृत्यु ही निर्वाण हो गई है। कुछ कहते हैं वैकुन्ठवास होगया है।
सच तो यह है कि यहॉं मात्र देहांत ही होता है, मृत्यु तो वास्तविक निर्वाण हे। जहॉं दिया बुझ गया है।
देखा,... मृत्यु से कितना भय था,... उन्हे,ं जिनकी शव यात्रा में हम जाते हैं। वे मौत से लड़कर हार कर जाते हैं।
तब जाना,... भीतर रोज जो कल है, उसका मरते हुए देखना ही’ निर्वाण है। कबीर दास कहा करते थे- अपुन मरन का अंग ‘मैंने मरकर अपने आपको देखा,... रोजाना मरना,... जो कल था गया,... गया उसे मत आने दो,... चिंतन का रस उसे जीवित कर देता है, नहीं, नहीं, सोचना ... तब यह रोज जो मौत होगी,... वह नूतन रखेगी,... सृजनशील, वहां मात्र वह होगा, जीवन तो वही होगा, पर खुशबू दूसरी ही होगी। भीतर का जो संग्रह है, उसका राख ही हो जाना, होली पर्व है। मात्र ‘आत्म कृपा ’बची रहताी है-
‘मैं हूं,... जो ‘यह’ का बोझा है, कूड़ा कचरा, अवधारणा के रूप में सुरक्षित है,... यह जब धू-धूकर जल उठता है,... तब मन खाली होना शुरू होता है,... वहीं वर्तमान में रहना कहा जाता है।
‘मेरा सवाल मेरा था,... उत्तर भी मेरा था,... पर मेरी कठिनाई यही थी,... मैं रोज-रोज मरने से बच रहा था- समय का अंतराल मुझे अगले ‘कल’ के लिए प्रेरित कर रहा था, दोष मेरा ही था, जब जानातब पता लगा, सारी उमर तो बिस्तर बिछाने में ही बीत गई, नींद आएगी या नहीं पता नहीं, यही बड़ा सच है।
17 संपŸिा और संपदा
मैंने अपने भीतर झांकने का प्रयास किया,... पाया क्या है, मेरी संपत्ति जिस पर मुझे गर्व है।
कल सुना था, वक्ता कह रहे थे,.. वही सब कुछ जो उनका नहीं था,... जो उनके आचरण का हिस्सा ही नहीं था,... स्वयं सारी उमर अनैतिक जीवन जीते रहे,... घृणा बॉंटते रहे,.. े,... वे मंच पर नैतिकता की सदाचार की शिक्षा लोकलुभावनी भाषा में देकर प्रशंसा बटोरने का प्रयास करते रहे,... पर भीतर ही भीतर जानते थे गड़बड़ है,,... वे अपने आपको न्यायोचित ठहराने की कोशिश भी करते रहे।
.... सामने उनका पुत्र बैठा था, वे मंच के संयोजक को अपना पुत्र,.कहकर.. वही भविष्य में तीसरे में पगड़ी बांधेगा बता रहे थे, ,... क्या उनकी संतान उनकी इस भाषा का सम्मान कर पाएगी,... शायद वे भी नहीं,... मंच पर हटते ही, वे संभवतः उस वाक्य को भी भूल जाएं जो वे कहकर आए हैं।
भाषा की यह असंगतता बहुत देर तक व्यथित करती रही।
अपनी भाषा पर तत्काल ध्यान गया, कहीं यह बड़बोलापन मेरे चरित्र का हिस्सा तो नहीं बन गया?
क्यों, यह असंगतता क्यों होती है,... हम इस विसंगति के ढेर पर क्यों रहते हैं। अपसंस्कृति,की चर्चा करते हैं,... संस्कृति के पतन पर चिंतित है, पर काग दृष्टि से रस वहीं देखते हैं। भीतर ही भीेतर रस वहीं पाते हैं।
तब जाना,... भीतर का कोलाहल थमने का नाम नहीं देता है। विचारणा का संघात अप्रेम में छोड़ जाता है।
... प्रेम,... यानी सुरक्षा, पुत्र मुझे प्रेम करता है,... वह मेरी शारीरिक मानसिक आवश्यकता की पूर्ति में सहायक है, सम्मान करता है। मुझे उससे प्रेम है। पत्नी भी मेरी हितों की पूर्ति में सहायक है,... मुझे प्रेम है। हां जब प्रतिकूलता आती है, तब उद्धिग्नता आ जाती है,... जाना क्या यह प्रेम है? ... यह तो मात्र चाहत की पूर्ति का एक सिलसिला है,... हम एक दूसरे का अपने निजी आत्मीय लाभ के लिए शोषण कर रहे हैं।
‘‘स्वामी जी को देखा था,... न वहां अतीत का प्रक्षेपण था न भविष्य का आग्रह,... अगले पल का भी नहीं,... मृत्यु के कुछ ही क्षण पहले मैं छोड़कर गया था,... प्रसन्न थे। दस मिनट बाद आया,... वे जा चुके थे। ... शांत,... क्या निर्वाण या महानिर्वाण यही होता है,... वे कहा करते थे,... यहां भीतर कुछ भी नहीं है, ... खाली है।
‘सब खतम हो गया,... हिसाब चुकता हो गया,... तब भाषा समझ में नहीं आती थी।
‘क्या यह सचमुच संभव है? हम भीतर से रीते होते चले जाएं,... बाह्य का दबाव बिल्कुल नहीं हो,... वहां एक शब्द भी असंगत नहीं था।
.... जाना जब भीतर का सिलसिला रूक जाता है,... उसी शांत में, मौन में प्रेम प्रकट होता है। प्रेम, विचार नहीं हैं प्रेम कोई अवधारणा नहीं है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्रेम को, उसके सौंदर्य को, इसीलिए व्याख्या करने में संकोच करता है। क्योंकि जहां ‘द्वन्द्व’ की समाप्ति है। पर्यवसान है,... वहीं प्रेम है। वही अद्वैत है।
... आत्म से द्वन्द्वात्मकता की यात्रा है,... या द्वन्द्वात्मकता से एकाग्रता की यात्रा है... शरीर से प्रेम तक की यात्रा है। सत्य की सुई दोनों धु्रवों पर जाती है। सच तो यह है कि मैंने जाना,... जो कुछ मैं बाहर तलाश कर रहा था,... पुस्तकों में ढूंढ रहा था, वह यात्रा, मेरे प्रारंभ के लिए जो आवश्यक थी। पर जब खुले आकाश को देखता हूं,... उगते और डूबते सूरज को देखता हूं। सामने गुलमोहर से लदे लाल फूलों को छूता हूं,... तब पास आई हवा जो गुजर जाती है,... तब उसका स्पर्श,... उसकी घुंधरूओं को गति देती हुई ध्वनियां,... बहुत कुछ कह जाती है।
अचानक पाया, वह बांध लेती है, दृश्य चुप कर जाता है, भीतर का तोता बोलता-बोलता चुप हो जाता है,... वहां मात्र शेष रह जाता हैं,... देखना,... मात्र देखना,... सुनना, मात्र सुनना। छत पर पड़ी आलपिन भी दिख जाती है,... जो अब जंग खा चुकी है। बाहर का जब साफ-साफ दिखता है, तभी भीतर का भी दिखने लग जाता है।
जिन्दगी बहुत सीधी-साधी है,... यही सहज है। जो असहज है वह ओढ़ा हुआ है, वह आपका नहीं है। कल एक सज्जन कह रहे थे,... क्या आप कुंडलिनी पर विश्वास करते हैं,...
‘मैं चुप रहा था।
‘उन्होंने फिर अपना प्रश्न दोहराया।
‘मैंने कहा, मेरा कोई अनुभव नहीं है-
‘क्या पतंजलि के योग पर आपको विश्वास है।
‘मैं फिर चुप रहा।
‘उनने वाक्य फिर दोहराया।
‘मैं गृहस्थ हूं योगी नहीं जब तक मैं पूरी तरह उसका पालन नहीं कर सकता हूं, कुछ भी नहीं कह सकता।
... सच है मैं क्या चाहता हूं? मेरे लिए यह महत्वपूर्ण है’
शांत जीवन, प्रेमिल बस
क्या शांति के लिए असहज, कृत्रिम मार्ग अपनाना आवश्यक था, जाना सबसे बड़ा सच सीधा और साफ देखना और सुनना ही है। हम वही देखते हैं, जो देखना चाहते हैं, वही सुनते हैं, जो सुनना चाहते हैं। हम अपने पूर्वाग्रहों की पुष्टि सब जगह चाहते हैं।एक मित्र थे,... सब जगह जहां भी संत हो, वहां जाया करते थे। एक बार बंबई गए थे, वहां से आए, बोले- ‘महाराज ने कहा, ‘डीप मेडीटेशन किया करो।’
मैं चुप रहा था।
‘उन्होंने फिर दोहराया,... बोले ध्यान तो करता हूं, बहुत देर तक करता हूं, क्या यह ‘डीप’ नहीं है।
एक दूसरे मित्र का फोन आया था। बोले में घंटों ध्यान में रहता हंू। क्या मैं आनंदमय भाव में पहुंच गया हूं।
मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैंने मौन रहकर उनकी बात सुनी थी। क्योंकि उत्तर भी उनके पास ही था। वे तो मात्र मुझसे अपनी सहमति की आशा चाह रहे थे।
सच है, उस शाम को चिड़ियों को जब वे कतार बांधे आकाश में उड़ रही थी,... देखा, सूरज डूबने को ही था,... न गुलाबी न पीला,... रंगीन आकाश था,... देखते-देखते लगा,... मात्र देखा ही जा रहा है।
दृष्टा अचानक कहीं चला गया हैं दृश्य भी खो गया, मात्र दर्शन ही रह गया था और एक सजगता थी,... बस दिख रहा है,... पास आती हुई आवाजें,... चहचहाहट,... वृक्षों पर आकर बैठना,... मात्र दर्शन वहां न नामांकन था,... न चित्रांकन, अचानक कोई पक्षी तेज आवाज में चीखा,... तब ध्यान आया,... मैं छत पर खड़ा हूं।
... ध्यान, यूंही आंखों से नहीं होता, वहां तो मूर्च्छा होती है। नींद में चले जाते हैं। ध्यान मात्र सजगता है, एक होश,... यह होश हर क्रिया में रहे,... मन पूरी तरह वहीं रहे,... यही अभ्यास सार है, पूरा उत्साह, पूरी चेतना वहीं रहे,... कोई भी क्रिया न छोटी है न बड़ी, बिना क्रिया के हम रह नहीं सकते हैं।
... तब क्या होता है? जाना,... मन जब विसर्जित होता है। तब उर्जा फूट पड़ती है। और वह उर्जा उस क्रिया को संचालित करने लगती है, जब क्रिया नहीं होती,... वहां यह ऊर्जा अपने मूल से जुड़ना चाहती है,... उधर मुड़ जाती है, जो विराट है। जो ऊर्जाा का स्रोत है।
... वहां क्या शेष रहता है,...
विचार पदार्थ है,... जहां पदार्थ का विसर्जन होगा,... वहां जो शेष रहेगा वह मात्र ऊर्जा ही हैं और यह ‘ऊर्जा’ का जागरण है, तांत्रिक शब्दावली में ‘कुंडलिनी जागरण’ है।
पर यहां क्रिया मात्र ‘सहज’ है, सहज सीधा और साफ, निर्मल, अप्रदूषित देखना, और सुनना,.अपनी भीतरी आवाजों को सुननन,.. अपनी भीतरी किताब को पढ़ना,... यह सब कुछ हो सकता है, जब हम अपने प्रति ईमानदार रहें। यह ईमानदारी आपको अपने प्रति सहृदय व उदार बनाती है। आप जो नहीं है, वे बाहर ‘दिखाने की होड़ से बचने लगते हैं। झूठ, यहीं पाखंड को रचता है। सत्य,... यहां दृष्टि सौंप जाता है।
पाया जब तक ‘यह भोक्ता रहता है, तब तक सुख और वासना शेष रहती है। भोगी भोग को प्राप्त होता है। वहां वह भोक्ता है। पर जहां मात्र,... भोग ही शेष रह गया है,... दर्शन ही शेष रह गया है, अचानक दृष्टा ही वहॉं रह जाता है,,...और वहां क्या हो सकता है। विचार वहीं तक है, जहां तक दृष्टा है।दृश्य भी है, ? पर दृश्य क लाप होते ही , दर्शन भी खो जाता है।
... स्वाद है,... मिठास की वर्णना असंभव है, वह मीठा है, बढ़िया है। अनुभूति, शब्द को खोजती है, पर शब्द भी झूठे हो जाते हैं।
सत्य, वर्तमान में है, भाषा अतीत से आती है, इसलिए सत्य कोहोने के लिए लिए भाषा को बदलना पड़ता है।
यही दोनों की युति है,... जब भी भाषा में बदलाव आता है, युग सत्य बदलता है।
... इसलिए जहां मात्र दृष्टा भी नहीं हैं, वहां क्या होता है? वहां मात्र ‘मौन’ ही अभिव्यक्त है। बाहर भीड़ है,... पर भीतर एकाकीपन है। यहां न सुख की चाह है, न कोई वांछा है, मात्र ‘प्रेम ही शेष रह जाता है।
पर यह क्या स्वभाव बन सकता है?
मेरे सामने सवाल यही था।
बहुत पहले ‘स्वामीजी ने कहा था’- जीपदा वदबम कमबपकम वदबम मुझे बात तब समझ में नहीं आई थी। देखा और करना। सोचा बस एक बार, बार बार नहीं पर, विद्वान कहते हैं, सोचो बार-बार सोचो।
जाना,... समस्या आई,... मैंने सोचा,... खूब सोचा, जितना सोचा वह उतनी की बड़ी होती गई। मैं टालता रहा,... वह फांसी के फंदे की तरह हो गई। निर्णय नहीं होना ही त्रासदी है। यह अनावश्यक विचारणा किसी प्रकार का निर्णय नहीं होने देती है।
... क्योंकि न तो मैं समस्या को पूरी तरह देख पा रहा था,... हम प्रायः विचारणा के आधार पर ही ‘रज्जू’ को सर्प समझते हैं। ‘पर जब मात्र’ देखना ही शेष रह जाता है। विचार का दबाव नहीं, रहता, तब सांप-सांप ही दिखाई पड़ता है।
यह साफ-साफ देखना ही ध्यान है।तब समस्या का समाधान स्वतः हमारे भीतर से आता है,... अगर हम चूक गए तो यह हमारे चित्त पर ठहर जाता है, फिर यह समस्या अनेक रूप धारण करती चली जाती है।
... यह संस्कार का हिस्सा बन जाती है। संस्कार और कुछ नहीं- ‘इन चित्रों का, इन प्रभावों का, कुल जोड़ है,... जो हम संचित करते आए हैं।
हां, जाना,... जब विचारणा का दबाव नहीं होता है,... तब व्यवहार सहज अकृत्रिम होता है। वही ‘निष्काम कर्म कहलाता है। क्रिया तो सदा होती रहेगी, वह तो प्रकृति का नियम है। वह कभी रूकी तो सृष्टि का विकास ही रूक जाएगा। यहां सत-असत, पाप-पुण्य का भेद चलता रहेगा। जीवन जन्म और मृत्यु के बीच में जीवन हैं यही संश्लेषण हैं पर जहां यह खेल शुरू होता है, प्रकृति का,... वहां जब हम इस खेल के प्रारंभ तक पहुंचने का प्रयास करते हैं, तब ‘खेल’ की छोटी इकाई हमारी विचारणा है, जो विचारों का प्रवाह है।
अगर विचार का दबाव रूक जाए,... हम विचार को जो अतीत और भविष्य का प्रक्षेपण मात्र है,... मात्र वर्तमान में एक क्षण भी आ जाएंे तो, पाएंगे,... ऊर्जा का एक अनवरत प्रवाह है,... जहां शांति है,... प्रेम है। संबंध हैं, समाज है, पर पर दिशा परिवर्तित है।
18. प्रेम
मैंने इस शब्द का बहुत प्रयोग किया था; मैं तुम्हे प्रेम करता हूं?
.. पर सच है,...कभी इस शब्द को कभी समझ ही नहीं पाया था-
‘देखा था,... स्वामीजी को, एकांत में,... पूर्ण मौन में,... वहां बाह्य का लेश मात्र भी आभास नहीं था,... आंखे खुली हुई थी,... पर संबंध मानों इन्द्रियों का मन से हटा हुआ हो’
उस मात्र ‘वर्तमान’ में प्रश्न कौंध गया था।
‘पूछा था,... यहां कौन रहता है?
‘वे बोले थे-प्रेम
‘मुझे पता था,... मैं पत्नी से प्रेम करता हूं- बच्चों से प्रेम करता हूं,... पर हल्के से आघात से,... मन के चाहे गए के विपरीत होते ही पत्नी से नाराजगी बढ़ जाती थी,... भाषा भी असंगत हो जाती। बच्चों के प्रति भी क्रोध बढ़ जाता है।’
‘जाना यह प्रेम नहीं था।
मात्र आसक्ति। एक सुरक्षा का भाव था। ... मैं ,अपनी पत्नी पर, आश्रित था,... पुत्र है, यह मेरी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है,... मैं जिसे प्रेम कह रहा था,... वहां कामना थी,... चाहत थी,... कर्तव्य परायण का भाव था,... पर क्या प्रेम था?
मैं अपने सवाल से ही परेशान हो गया था। कविता, कहानी में प्रेम शब्द का प्रयोग किया,... पर लगा प्रेम मात्र ऐन्द्रिय चाहत, सम्मोहन का नाम नहीं है। जिस प्रेम का प्रयोग बार-बार किया जा रहा है, वह -एक प्रकार की धारणा है,... अपने विचारों का मात्र फैलाव है। चेहरा तो कमनीय होता है, पर भीतर का सब कुछ यथावत रहता है।
... क्या स्त्री, प्रेम के पथ में एक अनावश्यक बोझा है। संत काव्य में प्रेम की अभिव्यंजना है,... परन्तु ‘नारी’ को लेकर एक वितृष्णा का भाव है। यह द्वन्द हमारे सामाजिक जीवन में इतना घुल गया है कि हम सहज और नैतिक जीवन को हेय मान बैठे हैं। पत्नी के पास बैठना,... स्त्री के संग प्रेमानुभूति का क्षण मात्र वासनात्मक है, यह घृणित है,... क्या यह प्रेम नहीं है? कहा गया है कि प्रेम इससे परे हैं।
‘प्रेम ही परमात्मा है,... परमात्मा से प्रेम करो। पर उसे तो देखा नहीं,... मात्र एक धारणा है,... कल्पना का फैलाव ही तो है,... वहां प्रेम क्या है? पूरा प्रेमाख्यान काव्य इसी प्रेमानुभूति का काव्य है।
यह उलझन रही।
... जहां भी गए सुना,... गोस्वामी जी ने अपनी कामवासना का उर्ध्वगमन पाया था... वे महाकवि हो गए,... अगर कामवासना के दास है,... तो परमात्मा के प्रेम से दूर होंगे।
... क्या इस प्रेम की अनेक कोटिया हैं? क्या मेरी चाहत,... क्या मेरी कामना,... प्रेम का पथ नहीं है? मीरा का प्रेम,... कृष्ण के प्रति समर्पण का भाव, इन्हें प्रेम की कवियित्री बना गया है।
क्या प्रेम वैव्यक्ति नहीं होता,... क्या प्रेम पारलौकिक ही होता है। भक्त कहते हैं,... परमहंस ने पत्नी का त्याग कर दिया था,... वे पत्नी से कोई शारीरिक संबंध नहीं रखते थे,... उनका मां कालिका के प्रति असाधारण प्रेम था।
भक्त, प्रभु से प्रेम करता है। भक्त से परमात्मा भी प्रेम करता है। .... जैसे बिल्ली अपने शिशु को मुंह में दबाए ले जाती है, वह अपने भक्तों को अपने साथ रखता है,... अनेक उदाहरण भाषा के स्तर पर समझाने को दिए जाते है-
पर प्रेम अबूझ ही रहता है
‘मैं जब अपनी पत्नी से कहता हूं,... मैं तुमसे प्रेम करता हूं, तब पाया मेरे भीतर मेरा अहंकार सीमित हो गया था,... पर कुछ क्षण बाद ही वह लौट आया पाया ‘तुमने यह नहीं किया, वह नहीं किया,... मेरा स्व,... अहंकार जग गया था। जाना,... भले ही एक क्षण हो, हां जब अहंकार हरी घास की तरह बिछ गया था,... उस क्षण पाया था हृदय कमनीय हो गया है,... दुनिया बेहतर नजर आती है,...
सौंदर्य,... वस्तु में नहीं, भीतर होता है,... जब अचानक एक क्षण जो बादल सूर्य को ढका रहता है,... विचारों का वह समूह या तो बरस जाता है,... या कहीं दूर हट जाता है,... बस
वस्तु तो वही रहती है।
... मैंने पाया,... और इस विरोधाभास को जाना।
अपने भीतर के इस तनाव को जाना।
क्षण मानो प्रेम,... फिर गहरी उदासी, वितृष्णा के दर्द को पहचाना। पाया हमेशा एक विरोधाभास सा बना रहता हैं मैं ऐसा ही क्या हूं? यह प्रश्न बार-बार उठता रहा।
... तब जाना,... हम दोनों के बीच, कभी-कभी हां,... विचारणा का सेतु नहीं है,... विचारों का दबाव नहीं है,... तब पाया स्पर्श का भी अपना पृथक अहसास होता हैं। एक पुलक का नहीं तो जिस प्रकार एक मेज, एक कुर्सी के पास रखी रहती है,... वह जड़ता नस नस में व्याप्त सी अनुभव सी होती।
... जाना जब दूसरे का आश्रय,... चाहे वह आवश्यकता की पूर्ति के लिए हो,... या कामना की पूर्ति के लिए,... जब दूसरा निरंतर कचोटता है।,... वह क्या कर रहा है वह क्या सोच रहा है,... उसका काम मेरे हितों के कितना अनुकूल है,... कितना नहीं है,... यह सोच जब निरंतरता में रहता है,... तब पाया निरंतर एक तनाव सा रहा,...
तनाव मात्र अपने भीतर, दूसरे की उपस्थिति का अहसास था। दूसरा है ,... न तो वह मुझे मुक्त कर रहा है,... न मैं उसे,... मैं चाहता था,... वह निरंतर मेरे बारे में सोचे,... कोई ऐसी बात कही जाए,... वह दुखी हो, आहत हो, ताकि उसके चित में मेरी तस्वीर जमी रहे,...
‘क्या यह सही था?
पाया,... जब हम मुक्ति की बात करते हैं,... तब दूसरों को हमसे मुक्त होने का पहला प्रयास होना चाहिए।
वह निरंतरता में हम पर मनोवैज्ञानिक रूप से आश्रित न रहे, हम जानबूझकर, अहंकार की निर्मित करते हैं। बच्चे भी हमसे भयभीत रहे, हमारे बारे में सोचे,... हमारा ध्यान रखे।
और हम इसे प्रेम कहते हैं?
एक आततायी शासनकर्ता हम मन ही मन अपने बारे मंे हमें एक सामंती शासक बनने का मौन निमंत्रण दे रखा है,... वहां शोषण हो सकता है, अहं की तुष्टि हो सकती है,... पर प्रेम नहीं हो सकता,
प्रेम में भीतर का दबाव पिघल जाता है,... यादों के बादल अहर्निश बरस जाते हैं,... ताकि एक दिन ज्योतित पूर्णिमा का प्रकाश हो सके। ... पर सच तो यह है कि मैंने अपने सीमित दायरे में पाया,... समाज में जो भी प्राप्तव्य हो सकता था,... मकान, गाड़ी, ओहदा, सामाजिक सम्मान,... सभी पाया.... पर भीतर का दारिदय्र यथावत रहा। भीतर एक खालीपन सा अनुभव होता। लगता, चट्टान है,... पानी तो बरसा था,... पर वह बहकर चला गया है। एक बूंद भी नहीं ठहर पाई हैं।
एक बूंद भी नहीं।
यह प्यास तीव्रता में बढ़ती ही गई। पाया जब हम शोषक मनोवैज्ञानिक के रूप से बाहर जाते हैं,... तब वहां विचार ही रहता हैं जहां विचार रहते हैं,... वहां विकार रहते हैं। वहां भय है, क्रोध है, तनाव है, एक खिन्नता सी यथावत रहती है।
तब पाया,... मैं जिसे चाहता हूं, वह मेरी एक चाहत से परे हैं। जहां तक चाहत है,... वहां तक विचार का दबाव है।
... और यह भी जाना जब विचार प्रभावी होता है, तभी दूसरे का आदर भी होता है, अनादर भी, क्रोध भी होता है, घृणा भी....
पर जहां सचमुच प्रेम होता है
भले ही वह देहिक स्तर पर हो,... क्षणिक हो, वहां न आदर होता है, न अनादर...
अपने आपको खाली करने का भाव होता है,... बादल बरस जाते हैं, घुटन विदा हो जाती है।
माना यह क्षणिक स्थिति, अनवरत बनी रहे, संभवतः यही कारण वासना पूर्ति की निरंतरता के अहसास को जन्म देता है।
... मैंने पाया,... मैं दोेनों तटों पर दौड़ रहा था, क्षणिक प्रेमानुभूति भी साथ भी,... परन्तु उससे गहरी पीड़ा,... संताप, विचारों का यह दबाव था,... जहां तुलना थी, क्रोध था,... कभी-कभी घृणा का भाव भी था। हम जब दूसरे से बहुत अधिक अपेक्षा करते हैं, आशाएं बना लेते हैं, तब उसकी पूर्ति न पाने पर हमारा क्रोधित हो जाना, कुंठित हो जाना स्वाभाविक ही होता है।
... हम प्राय कहा करते हैं,... बच्चों को पढ़ाया, लायक बनाया, हमसे बेहतर बनाया,... हमने कर्तव्य का पालन किया,... बहुत दिनों तक यह शब्द गूंजते रहे,... क्या कर्तव्य पालन प्रेम है,... गुरु की सेवा की, पिता की सेवा की,... क्या यह कर्तव्य था?
बहुत सोचा, पाया भीतर से गहरी अस्वीकृति अपने प्रति ही हो गई है। ... हम जब कतवर््य शब्द का प्रयोग करते हैं,... तब ‘दूसरे’ की प्रतीति तय हो जाती है। हमारी जिम्मेदारी है,... कुछ नियम है, पालन करो, बस छुटकारा मिल जाएगा? क्या यह प्रेम था? प्रेम है? लगा कहीं बहुत बड़ी गलती हो गई है।
जहां अहंकार है, वहां तृप्ति तो होती है, उससे संतुष्टि मिलती है, पर साथ ही अनेक कठोर निर्मम विचारों का समूह भी बन जाता है। चित्त और कठोर हो जाता है।
जाना,... यह भाव, यह सोच, भीतर कीले की तरह जड़ गया,... जहां प्रेम है, वहां क्रिया स्वाभाविक है। अंतःप्रेरणा का प्रस्फुटन है। वहां सहज है। ‘सहज’ वही है, जिसके लिए प्रयास नहीं होता है, जिसके पीछे विचारणा का दबाव नहीं होता है।
जहां विचारणा का दबाव होता है,... वहीं प्रयास होता हैं, वहीं दूसरे के आदर व अनादर का भाव होता है। कृत्रिमता स्वभाव में आ जाती है। एक बनावटी विनम्रता रहती है।
तनाव का यही सबसे बड़ा कारण है।
यहां कर्तव्य और उत्तरदायित्व का दबाव भी नहीं है। नहीं ‘सेवा’ शब्द का बोझा है। ... बाह्य की कोई उत्तेजना नहीं है। कर्म, सहज और स्वाभाविक है। कर्म से निवृत्ति नहीं हो सकती है।‘..महारास ... एक रूपक है। सृष्टि में सभी कर्मरत हैं। निरंतर कर्मरत महाशक्ति सभी के साथ नृत्यरत हैं पर, एक बोध है,... समष्टि का अहित, नहीं है, मैं नृत्य कर रहा हूं, उसके साथ भी वह शक्ति नृत्यरत है,... यहां वह मैं ही हूं,... पर की सत्ता का अभाव है’
यह स्थिति ‘सहज’ है। जहां ‘सहज’ हैं, वहीं प्रेम है। ‘सहज’ मात्र होना है, प्रेम में हुआ जाता है।
वहां दूसरे की उपेक्षा नहीं है, परन्तु उससे कोई अपेक्षा भी नहीं है। पर दूसरे का अहित भी आपके द्वारा नहीं है। आप नैतिकता का पाठ नहीं दोहरा रहे हैं- पर आप ‘अनैतिक’ भी नहीं हैं, वहां मात्र जो आचरण है, वही धर्म है।
इस प्रेम को पाने के लिए, ‘वन गमन’ की आवश्यकता नहीं है। न ही किसी सत्संग शिविर में जाकर अभ्यास करता है, दुख का लबादा ओढ़ने की कोई जरूरत नहीं हैं। तथाकथित सन्यासी अनावश्यक दुख का वरण कर रहे हैं। शरीर को यातना दे रहे हैं, वह अनुचित है। अनैतिक है।
‘देह, संसार में है, घर में है, वह व्यवस्थित रहे, सुंदर रहे। स्वच्छ रहे। देह में चेतना है, वहां भी विचारणा का आधिक्य न हो, धीरे-धीरे कम होता जाए,... विचार ही विकार है, यह बोध बना रहे,... जो शेष रहेगा,.... वही सार तत्व है, वही आनंद है, और दूसरे को अनुभव होगा’ वह ‘प्रेम’ है।’
प्रेम, इस आनंदित भागवत सत्ता की जगत पर प्रतिछाया है,... जगत उसकी प्रेमानुभूति का पात्र होता है। दुख से प्रेम का कोई संबंध नहीं है। कष्ट से भी नहीं है। प्रेम घृणा का विपर्यर्य भी नहीं है। यह तो मात्र एक अभिव्यक्ति है, जो आनंदित अनुभूति का प्रकटीकरण है।
‘क्या यह प्रेम किसी आश्रम में जाकर पाया जा सकता हैं।
बहिन ने कहा था- जब तक घर में थी,... प्रेम नहीं पाया, सच्चा प्रेम तो गुरु के पास रहकर जाना है-
... प्रेमी में आकर्षण होता है, खिंचाव होता हैं लोहा चुम्बक की तरफ जाता हैं चुंबक लोहे की तरफ नहीं आता।
सागर चांद की और उछलता है, ज्वार सागर में आता है। ... पर आकाश में पूरा ज्योतित चांद होना चाहिए।
... यह तो पूर्णता है, यहां विचारों का आधिक्य अब निःशेष होने लगा है यहीं प्रेमाभिव्यक्ति संभव है।
... इस प्रेम को सीखने की कोई कला नहीं है। कोई पाठशाला नहीं है,... परन्तु प्रेम हमारे भीतर की छटपटाहट है। हिमालय पर जब था,... अचानक व्यास नदी के साथ,... चलते हुए भाव विभोर होकर पर्वत को देखा,... झुके हुए वृक्ष’ वर्षा होकर थकी थी, पूरा चांद आकाश पर था,... लगा भीतर अचानक सब खामोश हो गया है,... क्या था वह!’
....मणिकर्ण के मंदिर में था,... अचानक पाया,... भीतर का कुछ बहने का आतुर है,... बादल अचानक बरस गया,... क्यों?
कन्याकुमारी में ‘मातृका’ में मंदिर में था,... अचानक लगा कोई खींच रहा है,... भीतर का कोई घट खुल गया है, एक तेज बहाव, मैं बह रहा हूं, बस
तब जाना,... जहां हृदय की दरिद्रता, कुरुपता, भय, क्रोध अचानक विदा होने को होता है, उसकी छटपटाहट अनुभव होती है,... वहां अचानक एक दृश्य,... एक स्थिति, उस अनुभव को सौंप जाती है,... जहां मन अपने आपको शांत और हृदय को खुला पाता है। तब ‘प्रेम का अहसास जगता है,... वही तो है, जब देहिक स्तर पर उतरता है तब हल्की सी थिरहन के साथ और प्यास जगा जाता है-
... तब जाना,... ‘वह’ है
वह मेरी वैचारिक संपत्ति के परे है,... मेरा सारा संग्रह झाड़फूस से अधिक मूल्यवान नहीं है। उसके बिना, मेरे संबंध सभी यांत्रिक हो चले हैं। मै। अपनी अर्थवत्ता भी खो चला हूं। जाना,... भीतर में प्यास जगे,... गहरी प्यास, एक आवेग,... एक उत्कंठा,... ऐसा ही कुछ,... जगे कि भीतर का शेष सब प्रयोजन हीन सा हो जावे। शायद तभी भीतर जो यह निरंतर विचारणा का दबाव धकेलता रहता है।यह अप्रसांगिक हो सके।
मैं, नहीं जान पाया,... पर अहसास है,... मेरी पहचान वही है। मेरी सार्थकता भी वही है।
संभवतः जो भी सवाल होंगे, उनका उत्तर भी वहीं है।
वहां जाना अकेले ही है, पर यात्रा तनाव मय नहीं है।
दुखद नहीं है।
कहीं जाना नहीं है, यह यात्रा शास्त्र कहता है- ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’ ... तुरंत प्रारंभ हो जाती है।
शास्त्र यह भी कहता है’
‘कोई कितना पापी भी क्यों न हो, वह भी इसका हकदार है’
‘यही सहज मार्ग है’सारे बोझों का निरंतर उतरते जाना,... एक खालीपन के साथ चित्त की कोमलता, सहृदयता, कमनीयता के साथ, जहां सृजनात्मकता है, और गहरी तृप्ति,... यही तो ‘मुक्तिपथ है।
19 देखना और देखना
मेरी अपनी ही समस्या थी, जिससे में वर्षों से उलझता रहा था।
मैंने ही यह कभी कहा था, अवधारणा दुष्कर्म है
... अवधारणा, जो मैंने उन सबके बारे में, मैं जिनसे मिला हूं, देखा है, सुना है,... सबके बारे में अपनी राय सुरक्षित रख रखी है। जब भी बाहर जाता हूं। मेरी यह आंख मेरे साथ जाती है, यह नहीं देखती है,... जो वह देखना चाहती है, जो दिख रहा है, उसके प्रति कोई आग्रह नहीं रहता है।
तो मैं हूं जो देख रहा हूं, जो अपनी स्मृतियों, अवधारणाओं, तथा निरंतर चल रही विचारणा का पुंज है,... वह पुराना भी है, और नया थी,... निरंतर बैंक के ब्याज की तरह उसमें घट-जोड़ होता रहता है। जो कल था, वह आज बदला है, पर थोड़ा सा,... कुछ नया संग्रह आ गया है।
यह जो भीतर का संग्रह है, यही तो मैं हूं।
... मेरे भीतर हजार, लोगों की हजार बातों के चित्र हैं,... हल्का सा संवेदन हुआ रील एकदम खुल जाती है। टी.वी. के चैनल की तरह,... हर क्षण बदलती रील है,... मैं ही बनाता हूं, मैं ही चलाता हूं, मैं ही देखता हूं।
... हर क्षण मैंने पाया,... मेरा धारणाएं, नई-नई होती जाती है। हर धारणा अपने आप में एक बड़ी फिल्म का बीज रखती है।
... मैं जो देख रहा हूं, सुन रहा हूं, मैं अपनी ही धारणाओं से लड़ता हूं। ... आंखं झपकाता हूं, सिर के बाल नोचता हूं,... थप्पड़ लगाता हूं,... पर जो चैनल्स खुल गया है, वह जाता ही नहीं है। जानता हूं, यह मेरा ही सोच है, इसको मैंने ही बुना है,... पर कल्पना जितना हटाओ, उतनी ही मजबूती से सामने आ जाती है।
मैं जिसे दृष्टा कहता हूं,... वह मेरा आत्म नहीं है। जिस रूप में शास्त्र ने ‘आत्म’ को कहा है। यह मेरा बाह्य मन ही है। मन ही सृष्टा है, मन ही दृष्टा है। मन अपनी ही सृष्टि को देख रहा है। भय का जाल मैंने ही बुना है, मैं ही उसमें उलझ गया हूं। तनाव और कुछ नहीं है। तनाव मकड़ी का अपने ही जाले में उलझ जाना है। तब मैं अपने आपसे लड़ने लग जाता था,... आत्महीनता, े
शास्त्र कहता है- ‘तान तितिश्सत्व भारतः, यही सहन करना कहा जाता है।
यह मात्र कोई बौद्धिक कसरत नहीं है।
बहुत सरल प्रारंभिक बोध है।
बाहर वही घट रहा है, जो मैं हूं,... मैंने चाहा है,... मुझे आज अभी पता नहीं है, पर मैंने चाहा था, वही आया है,
तब मैं अपनी चाहना के प्रति सजग हो जाता हूं।
‘यहां मात्र एक यह अवधारणा भी नहीं है। जैसा कि उस दिन मित्र जो सत्संग से आए थे, कह रहे थे, उनसे कहा गया था,... डीप मेडीटेशन करो।’... वे बार बार इसका अर्थ समझना चाह रहे थे। जब ध्यान कोई दूसरी चीज होती है, जो निज से पृथक है, सीखनी है, तब उलझन पैदा होती है। उसे कम और ज्यादा किस प्रकार किया जा सकता है, पर जब वह - ‘मात्र’ रहना है कि, वहां अधिक से अधिक रहा जाए,... मन जो भी क्रिया हो मन वहां अधिक से अधिक रहे, किंचित मात्र भी प्रतिकूल न जाने पाए, तब हम सजगता में प्रवेश कर जाते हैं।
जहां क्रिया नहीं होती है, वहां मन स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है, यह शांति किसी बाह्य अनुशासन से नहीं आती है,... सहज है, निसर्ग है, स्वाभाविक है, इसकी एक मात्र पहचान, आपकी शांत सजगता है।
आप निवृति में नहीं हैं, आप समाज को हेय बताकर, पत्नी, परिवार, नौकरी, व्यवसाय को जंजाल बताकर पलायन में नहीं है। आप कमरा बंदकर... कभी श्वास पर, तो कभी मंत्र पर, कभी रूप पर चित्त को एकाग्र करने के लिए कठोर बल का प्रयोग नहीं कर रहे हैं। ... यहां बस मन को क्रिया के साथ, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, यह महत्वपूर्ण नहीं है, उसके साथ अधिक से अधिक रखना है।’
‘तब बाह्य मन,... अंतर्मन में लीन होने लगता है।
बाह्य मन, विचार है, विचारणा है, अवधारणा है, स्मृतियां है,... अंतर्मन,... स्मृति तो है पर वह बार -बार सतह पर आकर उत्तेजित नहीं कर रही है। विचार भी है,पर यहां विचारणा का प्रवाह नही है, एक नियंत्रण है।
जब कहा, वह सतह पर आएगी,... अन्यथा नहीं,... उस सेवक की तरह जो अनुशासित है, आदेश की प्रतीक्षा में विश्राम में है। आदेश मिलते ही तुरंत हाजिर होता है।
मन मर नहीं सकता, वह जन्म के साथ, प्राण की युति के साथ आता है।
मृत्यु इस मन का प्राण के साथ लौट जाना है...
पर मुक्ति,... एक अवधारणा भी है,... कन्सेप्ट है। जीवन की अवस्था है। जहां बाह्य मन अनुशासित है।
वहां शांति है, रस है, प्रेम है। प्रचंड शक्ति कार्य करने की है। क्योंकि ‘अंतर्मन’, शक्तिशाली है, जब वह जागृत होता है, तब हम अपनी स्वाभाविक स्थिति में आते हैं, जो हमारा साध्य है।
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