रविवार, 23 अप्रैल 2023

 प्रसन्न रहना 2


तुलना हमेशा अपने आप से करें। खुश रहना आपका अपना स्वाभाविक स्वभाव हे। पर आप न जाने क्यों अपने आपको बड़ा बताने के लिए कॉन्स्टीपेटेड चेहरा बनाए रखते हें।  सारा तनाव आपके चेहरे पर झांकता ही रहता है। आप कितना भी  अच्छा अभिनय करलें अगर आप दुखी है। तनाव में है , तो आपकी नकली मुस्कराहट , दो मिनट के बाद ही हट जाती है। हम बच्चें को बचपन से ही उन्हें बहुत अधिक गंभीरता सौंपते आए हैं। वे स्वाभाविक रूप से हॅंसना ही भूल गए।

मैं एक परिवार में अतिथि था , बच्चों की मॉं हर समय यही ध्यान रख रही थी कि उसके बच्चे घड़ी की सुई की तरह क्यों नही चल रहे हें, जाओ , पढ़ो , अब टी़वी देखलो ,  वे बच्चे के लिए अंग्रेजी काहिमक ही बाजार से तलाश कर रहे थे, जहॉं स्वाभाविक ंसा ही परोसी जारही है। मोबाइल पर  बहुत छोटे बच्चों को नर्सरी ”राइम सुनाई जारही हे। दो साल का नन्हा शिशु मोबाइल लिए अपना गाना सुन रहा हे, मा कहती है , देखिए यह अभी से कितना इंटैलीजेन्ट है।  दादा- दादी , और तो और अब माता-पिता भी  अपने ही घर में विस्थापित होगए हे। गूगल ही मार्गदर्शक बन गया है छोटा बच्चा , घर के और लोगों से बात करने के स्थान वा ”एलैक्सा से बतियाना अधिक पसंद कर रहा हे। हम उनकी खुशियॉं छीनकर उन्हें यंत्र मानव बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।   घर में कोई मेहमान आजाए तो अब बच्चों को पहले वहॉं से हटा दिया जाता है , ”अब नीचे घूम आओ ,जाओ टी़वी पर मैंच देखलो,  हम उनकी सहजता को ही छीन रहे हे। 

हम बच्चें को यंत्र ही बना रहे हे। 


मेरे एक मित्र थे , बहुत ही हॅंसमुख स्वभाव के थे , वे जहॉं भी जाते , महफिल सी लग जाती , आसपास खुशी का माहौल बन जाता , पर न जाने क्यों , उनके परिजनो को लगा , वे विदूषक हैं। उनके हॅंसने , बोलने पर निरंतर टोका- टाकी होती रही अंत में वे अपने आप में ही सिमिट गए। 

आज न तो हम हॅंस सकते हैं , न दूसरों को खुश देख सकते है।ं घर में अगर पति खुश है , प्रसन्न है तो पत्नी यही समझती है , कोई रहस्य है? और पति तो यही चाहता है कि उसकी पत्नी उसे प्रसन्न नहीं दिखे , अगर दिख गई तो वह अतीत की दुखात्मक घटना को खींच कर ले आएगा। दोनो ही कुढ़े- चढ़े रहते हैं, ये दोनो ही चाहते हैं। जो दुखी है , वह अपने चारों ओर दुख ही भेजता हे। बुद्ध बहुत पहले कह गए कि दुख ही सत्य है। हमें न जाने क्यों, सुखी आदमी पसन्द नहीं आता है।  


सौ बीमारियों की एक ही दवा है , आप खुश रहें , प्रसन्न रहें, संसार में दुख और तनाव तो हर घर के दरवाजे पर पसरा हुआ हे। बस आप किंवाड़ खोलदें, दुख हवा की तरह अंदर आकर पसर जाएगा। 


यह आपको ही सोचना है , तय करना हे। कैसे रहा जाएं दो रातके बीच एक दिन है या दो दिनो के बीच एक रात है। आप कहीं भी जाएॅं , पूछें और यार कैसे हो? बस, उसका अंतस का कल्मष सरोवर हिलारें लेने लग जाएगा। आप कहीं सड़क किनारे बाजार में खड़े होजाएॅं आती-जाती भीड़ को देखें , उनके लंबे लटके हुए चेहरों को देखें , अचानक आपको भी लगेगा , आपका चेहरा भी  लटक गया है। हम अपना स्वाभाविक चेहरा भी भूल गए हें।”आए थे हरि भजन को औटन लबे कपास“यही हमारा स्वभाव बन गया है। 


हम सोचते हें, , अच्छी नौकरी मिल जाएगी , सुख आएगा , विवाह होगा , पत्नी आएगी या पति मिलेगा सुख आएगा , घर होगा , कार होगी , बैंक बैलेंस होगा तो सुख आएगा। पर मैंने हर घर पर जाकर संधान किया , सब कुछ होते हुए भी , सब तो आगया , पर सुख ही नहीं आया। मैंने बाहर खड़े , सुख से पूछा , भाई , ये आपकी प्रतीक्षा में सारी उमर निकाल आए , अब बूढ़े होगए , बीमार भी  हैं। भारी बीमा पॉलिसी है।  गौतम बुद्ध की सभी आवश्यकताओं को पूरा कर आए हैं, आप भीतर क्यों नही ं आए? एक दिन के लिए तो आजाओ,


वह बोला , आप गलती कर रहे हे। , ये बस सुख की चर्चा ही करते हे। , इन्हें तो  महाभारत की कुंती की तरह दुख की ही चाहत है। ताकि ये बाहर की दुनिया में और दोड़ते रहें। जब सबकुछ इन्हें मिल गया तब इनका असंतोष वैसा ही रहा। ये बड़ी कार ले आए, फैक्ट्री एक थी , एक और डाल दी , फिर फार्म हाउस बना लिया , अब दूध  का प्लांट डाल दिया, कई मकान बना लिए ,बेचने चल पड़े हैं। जब तक ये दौड़ते रहेंगे , मुझे आने की कोई जल्दी नहीं हे। कभी  ना कभी इन्हें बाहर की दुनिया में कमी मिलती रहेगी, इनका अहंकार अभी प्यासा है, ये दुखी ही रहेंगे, दुख ही इनके साथ अंत तक ही बना रहेगा। 

  

अपनी  तुलना  हमेशा अपनी ही उपलब्धियों से ..करो। देखना है तो अपने आपको ही देखो। कल घूमने नहीं गया... व्यायाम नहीं किया... ब्लड शुगर बढ़ गई है... अपने आप अपने स्वास्थ्य के प्रति ध्यान जाएगा। कल बगीचे में पानी दिया था... पौधे अच्छे. लग रहे हैं... आप हमेशा अपने आज की अपने कल से तुलना कर, बेहतर खुशी पा सकते हैं। अपनी कार्य कुशलता को बढ़ा सकते हैं। कमसे कम अपने आप से तो प्यार करना सीखें, शरीर आका मित्र है , मन आपका मित्र हे। प्राण आपका मित्र है, जहब अवपे आपसे प्यार घना होता है , तब जिसे छूटना है , वह अपने आप हो जाता है। 


मेरे एक लेखक मित्र थे , मैंने देखा , वे बहुत लिखते थे , बहुत रचनाएॅं प्रकाशन के लिए भेजते। उन दिनो पत्र- पत्रिकाएॅं बहुत थीं। हर दूसरे दिन कुछ नाकुछ लौटकर आ जाता , वे उसी तन्मयता के साथ फिर और कहीं भेज देते। उनके चहरे पर न कहीं असंतोष था न कोई खिन्नता , मैंने पूछा , आप हताश नहीं होते , वे बोले नहीं , बचपन में हमारे गॉंव में आम के बहुत पेड़ थे , हम बच्चे उन पर पत्थर मारते थे , टूट गया तो ठीक , नहीं तो अपना क्या गया? उधर चौकीदार भी था , आम लेकर भागने का उत्साह बना रहता था। वही आज भी हे। बस इससे अधिक कुछ नहीं।

 

यह अपना शौक है , जो धन राशि आजाती है , उसके डाक टिकिट और लिफाफे ले आता हूॅं। किसी पर कोई बोझा नहीं , मुझे पता है, , न तो प्रेमवंद , या प्रसाद बन पाउंगा , न मुझे कोई पुरस्कार मिलेगा , न सम्मान , में किसी से किसी तुलना में नहीं हूंॅं, मुझे अपने आप से मतलब है। मैं खुश हूॅ। मुझे अच्छा लगता है, बस मैं लिखता रहता हूॅं। 


हम जब किसी दौड़ में शरीक हो जाते हैं , उसी दिन दुख हमारे कंधों पर सवार हो जाता है।

वह मेरे साथ , मेरे बचपन से मेरे ही साथ चल रहा है, कल आइने में अपना चेहरा देख रहा था , वह बोला, उसने पूछा था , तुम  ऐसे क्यों हो?, तो अचानक उत्तर हलक पर आते- आते ठहर गया , बहुत दिनो बाद मैं मुस्कराया , फिर हॅंसा , बोला, मैं तो ऐसा ही हूॅ।

 

जाना यही सुख का रहस्य है। 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें