शनिवार, 17 जनवरी 2015

कविता वह


 कविता वह


कविता न खाद होती है, न बीज
न दवा
जो बीमारी को मार देती है,
वह, वह जमीन है
ताप, नमी पाकर
बीज,
दरख्त में बदल देती है,


दरख्त का दरख्त होना जरूरी है
वह फलदार हो या नहीं
चाहे वह श्मशान में लकड़ी बन जले
या अंगीठी में कोयला बन दहके
या किंवाड़ में लग जाए
या किसी खूबसूरत मेज के पांवों में ठहर जाए।

कविता  वह बीज है,जो दरख्त जनती है
कभी मशाल बन दहकती है
लपट उसका शृंगार है
उसके जिस्म पर फलती है,

वक्त बार-बार कहता है
लिखो, और और लिखो
जब तक
दरख्त मशाल बन जल  न जाएं
समय अपने अपको दोहराता नहीं
अंधेरा यह,
नियॉन लाइट से कम होगा नहीं
‘पावर कट’ का जमाना है
दहकना मशालों को है
अंधेरा उन्हें, दहक, खिसकता जरूर है।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

कहने को बहुत था

कहने को बहुत था

कहने को बहुत था
बहुत कुछ कहा गया
पर सुना कहां किसने
कान पर
न ठक्कन था
न आंख पर
पर्दा था, वह अपनी ही धुन पर नचता-नचाता रहा।


खुद को ही सुनता
देखता भी खुद को
बाहर का कोलाहल
चीख, आहत, आर्त्तनाद
माया, पाषाण वत
संवेदना मरी-मरी
लोलुप जीभ भीतर का रस
हड्डी चूसते श्वान- सी,
बुद्धिजीवी वह,

अपनी ही आत्मा
पर शिला सी अहल्या रख
स्वार्थ रस चाटती
आनंदोत्सव झूमती
सुनने से दूर वह
न देखने की चाह लिए
अपनी ही ढपली पर अपना ही राग सुनना ही बेहतर था,

अंँधेरा इतना था
सूझता नहीं था कुछ ,
कभी-कभी कान में उठती चीख भी
खेत से खलिहान से
झोंपड़ पट्टी से
मैले, कुचले पशुवत जीवित मनु संतान की,
पर कहीं कोई दस्तक नहीं
नतमस्तक झुके पाषाण हृदय पर
मरे हुए शब्दों के आर्तनाद की

पर, चुप-चुप
स्वार्थ, नाभि नालि युक्त
न सुनता
न देखता,
जो भी सुन रहा था
उसके कानों में सीसा ढोलता


फोड़ता आंख
शब्दों को छीनता।
जो अपना ही सुनहरा कल’
लाने को फिर स्वागतोत्सुक
जो न सुनता
न देखता
बड़बोला, अपनी ही त्वचा पर,
चिपटा परजीवी, वह,


उसकी पहचान.....
‘हवा दरख्तों को बताती फिरती है
फिर भी न जाने क्यों
... खामोश है....
आज भी यह वक्त,
न जाने क्यों
जो न कुछ करता है,बस सुनकर चुप रहता है,
उसी की ओर देखकर  ही ठगा सा रहता है।






गुरुवार, 15 जनवरी 2015

प्याज़ सी वह

प्याज़ सी वह


प्याज,
छिलके उतरने की सहती व्यथा, रोज-रोज
उतरते-उतरते
रहता है क्या
ब्रह्म ज्ञानी कहता, ‘वह महाशून्य था’।

... बस एक खाली सा
वर्ण, जाति, संप्रदाय की नीली काली परतें
रोज़-रोज़ उतरती
आहत बुद्धिजीवी बाहर की कालिमा
लीक-लीक उकेरता
परत दर परत, उतारता, छीलता
हंँसता, बतियाता,
पूछता जाता,
इतिहास है कहाँं, यह तो बस जोड़ है...
मात्र खाली परतों का,

देती गुलाबीपन
स्वाद भी कसैला
बेहद सस्ती यह
पड़ी रहती सड़कों पर
देश की जनता सी,
रोज-रोज छिलने को
परत- दर- परत छिल, यूं ही मर मिटने को।

क्या है, बल इसका,
क्या बस हरी दूब ही
सिरफिरा कहता था, जितनी कुचलती है, उतनी मुलायम रहती है।
उधर चिकित्सक कहता है,
‘‘रस प्याज का ही
मीठे शहद से मिल
बनता  ताकत का खजाना है।’’


तभी बाजारी ने
शहद को उठाकर दूर प्याज से रख छोड़ा है
और हर बार
परत- दर- परत
इस प्याज को छिलने को ही
यहांँ बाजार में छोड़ा है।



मंगलवार, 13 जनवरी 2015

आकाशवाणी कोटा और आज का दिन


आकाशवाणी कोटा और आज का दिन

आज क्षमाजी की कहानी की रिकार्डिग के लिए आकाशवाणी कोटा जाना पड़ गया। वहॉं सदाबहार कवि दयाकृष्ण विजय के साथ हुई मुलाकात यादगार बन गर्इ्र। छयासी वर्षीय विजय जी आज भी उतने ही युवा लगे , जब वे कवि गोष्ठियों में मुखरित हुआ करते थे। कह रहे थे , अपनी पचासी वर्षगांठ मनाना भूल गया, इमारी प्रार्थना थी वे धूमधाम से मनाएॅं, जब नब्बे की होगी , सारे साहित्यकार मिल कर मनाएॅंगे। वे जल्दी ही शुभ सूचना देंगे। उनकी कविताओ का प्रसारण 26 जनवरी को होगा , आप उनकी ओजस्वी कतिाओं को सुनें।

क्षमा की कहानी चक्रव्यूह 14 जनवरी मकर संक्रांति को सुबह 8.45 पर साहित्यिक कार्यक्रम में आरही हे। आप सुनें, यही आग्रह हे। आकाशवाणी कोटा से कुछ माह पूर्व मेरी एक वार्ता आई थी। वार्ता के बाद ही अनेक मित्रों के फोन आगए, मैं चमत्कृत था, सचमुच कोटा का आकाशवाणी केन्द्र और उसके साहित्यिक कार्यक्रम , इस अंचल में सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र बन गए हैं। आकाशवाणी केन्द्र से पिछले कुछ दिनो में शरद तैलंग, आर.सी शर्मा की कविताओं को सुना, इंद्रबिहारी जी को सुना, वास्तव में बहुत कुछ साहित्यिक सरोकारों से  यह जुड़ाव अच्छा लगने लगा हें
क्षमाजी की कहानी चक्रव्यूह का एक अंश है-

और यही सब सोचकर वह यहां आया था। मां ने तो सोचा कि बेटा अब अपनी पुरानी यादों से उबर गया है तो उन्होंने फिर लंबी लिस्ट लड़कियों की उसे थमा दी। पर वह कैसे कहता कि मैंने मुम्बई में ही एक लड़की पसंद कर ली है, वह विधवा है, उसके एक बेटा भी है। मां, बाबूजी कैसे इस सबकी इजाजत देते।
वह चाहकर भी कुछ कह नहीं पाया। कई बार अपने मन को तैयार किया पर मां का चेहरा देखते ही चुप हो जाता।
अब लगा जैसे एक चक्रव्यूह में वह घिरता जा रहा है, तेज सरदी में भी माथे पर पसीने की बूंदे आ गई थी।
नहीं, उसे तो इस व्यूह को तोड़ना ही है। फिर से सोनू और जूही के चेहरे सामने आ गए थे। हां, बहुत सोच समझकर ही वह निर्णय ले रहा है। जूही के साथ एक खुशहाल जिंदगी जी सकेगा वह। और फिर... उसे खुश देखकर मां, बाबूजी भी क्या खुश नहीं होंगे। आखिर बेटे की खुशी ही तो चाहते हैं मां, बाप।
एकाएक उसके विचारों को विराम लग गया था-
गाड़ी अभी भी अपनी अबाध गति से दौड़ रही थी, ।
,आप कहानी चक्रव्यूह को कल सुबह मकर संक्रांति पर 8.45 के साहित्यिक कार्यक्रम में,  सुने अपनी प्रतिक्रिया दें।

रविवार, 11 जनवरी 2015

एक फूल की चाह

एक फूल की चाह


चाह नहीं है मेरी यह
उनके कदमों से रौंदा जाऊॅ,
जो सत्ता के गलयिारे में
        बन भुजंग टहला करते ,

मैं गरीब हूॅं,
कॉंटों के ही साथ पला-बड़ा हूॅं,,
मेरी खुशबू, मेरी अपनी
मुझे जन्म के साथ मिली है,
रहॅंू शाख पर या माला बन
या झड़ जाऊॅं,
मेरा वरण मुझे पाना है।


चाह नहीं मेरी यह
बन पंखुड़ी
राजमार्ग पर
पॉंव तुम्हारे बिछूॅं
और कुचला जाऊॅं।