शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

कहने को बहुत था

कहने को बहुत था

कहने को बहुत था
बहुत कुछ कहा गया
पर सुना कहां किसने
कान पर
न ठक्कन था
न आंख पर
पर्दा था, वह अपनी ही धुन पर नचता-नचाता रहा।


खुद को ही सुनता
देखता भी खुद को
बाहर का कोलाहल
चीख, आहत, आर्त्तनाद
माया, पाषाण वत
संवेदना मरी-मरी
लोलुप जीभ भीतर का रस
हड्डी चूसते श्वान- सी,
बुद्धिजीवी वह,

अपनी ही आत्मा
पर शिला सी अहल्या रख
स्वार्थ रस चाटती
आनंदोत्सव झूमती
सुनने से दूर वह
न देखने की चाह लिए
अपनी ही ढपली पर अपना ही राग सुनना ही बेहतर था,

अंँधेरा इतना था
सूझता नहीं था कुछ ,
कभी-कभी कान में उठती चीख भी
खेत से खलिहान से
झोंपड़ पट्टी से
मैले, कुचले पशुवत जीवित मनु संतान की,
पर कहीं कोई दस्तक नहीं
नतमस्तक झुके पाषाण हृदय पर
मरे हुए शब्दों के आर्तनाद की

पर, चुप-चुप
स्वार्थ, नाभि नालि युक्त
न सुनता
न देखता,
जो भी सुन रहा था
उसके कानों में सीसा ढोलता


फोड़ता आंख
शब्दों को छीनता।
जो अपना ही सुनहरा कल’
लाने को फिर स्वागतोत्सुक
जो न सुनता
न देखता
बड़बोला, अपनी ही त्वचा पर,
चिपटा परजीवी, वह,


उसकी पहचान.....
‘हवा दरख्तों को बताती फिरती है
फिर भी न जाने क्यों
... खामोश है....
आज भी यह वक्त,
न जाने क्यों
जो न कुछ करता है,बस सुनकर चुप रहता है,
उसी की ओर देखकर  ही ठगा सा रहता है।






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