रविवार, 11 जनवरी 2015

एक फूल की चाह

एक फूल की चाह


चाह नहीं है मेरी यह
उनके कदमों से रौंदा जाऊॅ,
जो सत्ता के गलयिारे में
        बन भुजंग टहला करते ,

मैं गरीब हूॅं,
कॉंटों के ही साथ पला-बड़ा हूॅं,,
मेरी खुशबू, मेरी अपनी
मुझे जन्म के साथ मिली है,
रहॅंू शाख पर या माला बन
या झड़ जाऊॅं,
मेरा वरण मुझे पाना है।


चाह नहीं मेरी यह
बन पंखुड़ी
राजमार्ग पर
पॉंव तुम्हारे बिछूॅं
और कुचला जाऊॅं।


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