गुरुवार, 15 जनवरी 2015

प्याज़ सी वह

प्याज़ सी वह


प्याज,
छिलके उतरने की सहती व्यथा, रोज-रोज
उतरते-उतरते
रहता है क्या
ब्रह्म ज्ञानी कहता, ‘वह महाशून्य था’।

... बस एक खाली सा
वर्ण, जाति, संप्रदाय की नीली काली परतें
रोज़-रोज़ उतरती
आहत बुद्धिजीवी बाहर की कालिमा
लीक-लीक उकेरता
परत दर परत, उतारता, छीलता
हंँसता, बतियाता,
पूछता जाता,
इतिहास है कहाँं, यह तो बस जोड़ है...
मात्र खाली परतों का,

देती गुलाबीपन
स्वाद भी कसैला
बेहद सस्ती यह
पड़ी रहती सड़कों पर
देश की जनता सी,
रोज-रोज छिलने को
परत- दर- परत छिल, यूं ही मर मिटने को।

क्या है, बल इसका,
क्या बस हरी दूब ही
सिरफिरा कहता था, जितनी कुचलती है, उतनी मुलायम रहती है।
उधर चिकित्सक कहता है,
‘‘रस प्याज का ही
मीठे शहद से मिल
बनता  ताकत का खजाना है।’’


तभी बाजारी ने
शहद को उठाकर दूर प्याज से रख छोड़ा है
और हर बार
परत- दर- परत
इस प्याज को छिलने को ही
यहांँ बाजार में छोड़ा है।



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